Millets Benefits: अब मिलेट्स को बनाएं अपनी डाइट का हिस्सा, पेट की परेशानियों से मिलेगी राहत

Millets Benefits: अब मिलेट्स को बनाएं अपनी डाइट का हिस्सा, पेट की परेशानियों से मिलेगी राहत


Better Digestion: अगर आपका पाचन ठीक से काम नहीं कर रहा है और कई उपाय करने के बाद भी आराम नहीं मिल रहा है, तो ऐसे में मिलेट को अपने खाने में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है. मिलेट में फाइबर की भरपूर मात्रा होती है, जो न सिर्फ पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है, बल्कि कब्ज की समस्या से भी राहत दिलाने में मदद करता है. इससे आपका पाचनतंत्र मजबूत बनता है और पेट से जुड़ी दिक्कतें धीरे-धीरे कम होने लगती हैं.

मिलेट एक तरह का पोषक अनाज है, जिसे हिंदी में बाजरा, ज्वार, रागी, कोदो और सांवा जैसे नामों से जाना जाता है. इसके दाने छोटे होते हैं, लेकिन यह पोषण से भरपूर होता है, इसलिए इसे अक्सर “सुपरफूड” भी कहा जाता है. मिलेट का सेवन पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मदद करता है. इसके साथ ही, अगर इसे रोजाना खाया जाए तो यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम करने में भी मदद करता है. इसमें मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे जरूरी खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर के लिए बहुत फायदेमंद हैं.

मधुमेह और वजन कम में भी असरदार

मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए मिलेट बेहद फायदेमंद माना जाता है. इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिसकी वजह से ब्लड शुगर धीरे-धीरे बढ़ता है, न कि अचानक. इसी कारण यह डायबिटीज के मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि मिलेट का सेवन वजन को नियंत्रित रखने में भी मदद करता है. इसमें फाइबर और प्रोटीन अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे पेट देर तक भरा रहता है और बार-बार भूख नहीं लगती. यही वजह है कि यह वजन कम करने या उसे संतुलित रखने में मदद करता है.

हड्डियों और दांतों को बनाए मजबूत

मिलेट शरीर की हड्डियों को मजबूत करने में मदद करता है और दांतों के स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाता है. इसमें मौजूद पोषक तत्व बच्चों और बुजुर्गों दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं.

सेवन से पहले रखें कुछ सावधानियाँ

मिलेट सेहत के लिए फायदेमंद जरूर है, लेकिन इसे खाने से पहले कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए. सबसे पहले, मिलेट का ज्यादा मात्रा में सेवन करने से बचना चाहिए, क्योंकि जरूरत से ज्यादा खाने पर यह नुकसान भी पहुंचा सकता है. कुछ किस्मों जैसे बाजरा में गोइट्रोजेनिक तत्व होते हैं, जो ज्यादा मात्रा में लेने पर थायरॉइड जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं. इसके अलावा, कुछ लोगों को मिलेट खाने के बाद पेट में भारीपन या गैस जैसी समस्या हो सकती है. बहुत कम मामलों में, कुछ लोगों को मिलेट से एलर्जी भी हो सकती है. 

हालांकि मिलेट से एलर्जी या दिक्कत बहुत ही कम लोगों में देखने को मिलती है, फिर भी सावधानी जरूरी है. अगर आप मिलेट को अपनी डाइट में शामिल करना चाहते हैं, तो इसे कई तरह से खाया जा सकता है — जैसे रोटी, खिचड़ी, दलिया, उपमा, डोसा, इडली या सलाद के रूप में. लेकिन इसे अपनाने से पहले एक बार डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें, ताकि यह तय हो सके कि यह आपके शरीर के लिए सुरक्षित है या नहीं.

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खून की कमी से लेकर त्वचा की चमक तक… बेहद फायदेमंद है किशमिश, महिलाओं के लिए अमृत समान

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Health Tips: किशमिश दिखने में भले ही छोटी हो, लेकिन इसके फायदे बहुत बड़े होते हैं. यह पोषक तत्वों से भरपूर होती है और शरीर में खून की कमी दूर करने में मदद करती है. खासकर महिलाओं के लिए यह बेहद फायदेमंद मानी जाती है.

हेल्थ एक्सपर्ट किशमिश को एक बेहतरीन सुपरफूड मानते हैं, जो शरीर को कई तरह के फायदे पहुंचाती है. उनका कहना है कि अगर रोज सुबह खाली पेट किशमिश खाई जाए, तो इससे न सिर्फ सेहत में सुधार होता है, बल्कि खून की कमी भी दूर की जा सकती है.

पोषण से भरपूर होती हैं किशमिश

अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के एक रिसर्च के अनुसार, किशमिश असल में सूखे अंगूर होते हैं जो पोषण से भरपूर होते हैं. इनमें फाइबर और कई उपयोगी तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं. हालांकि इनमें प्राकृतिक चीनी की मात्रा ज्यादा होती है, लेकिन ये धीरे-धीरे ब्लड शुगर बढ़ाते हैं, इसलिए इन्हें एक हेल्दी स्नैक के रूप में भी खाया जा सकता है. रिसर्च भी बताते हैं कि किशमिश का सेवन स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है.

पाचन को काफी बेहतर बनाती हैं किशमिश

आयुर्वेदाचार्य प्रमोद तिवारी बताते हैं कि किशमिश पोषक तत्वों से भरपूर होती है. इसमें आयरन, पोटैशियम, कैल्शियम, विटामिन बी और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे जरूरी तत्व मौजूद होते हैं. इसमें फाइबर भी अच्छी मात्रा में होता है, जो पाचन को काफी बेहतर बनाता है. अगर सुबह खाली पेट किशमिश खाई जाए, खासकर रातभर भिगोई हुई, तो कब्ज की समस्या दूर होती है और पेट भी साफ रहता है. इससे पाचन एंजाइम सक्रिय हो जाते हैं, जिससे खाना आसानी से पचता है.

महिलाओं के लिए फायदेमंद और दिल को रखे स्वस्थ

आयुर्वेद के मुताबिक किशमिश आयरन का अच्छा स्रोत है, जो शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया को दूर करने में मदद करती है. यह महिलाओं के लिए खासतौर पर फायदेमंद मानी जाती है, खासकर उन महिलाओं के लिए जो मासिक धर्म के समय कमजोरी या आयरन की कमी से परेशान रहती हैं. आयुर्वेदाचार्य का कहना है कि अगर रोज 10 से 12 किशमिश खाई जाए तो हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है और शरीर की थकान और कमजोरी कम होती है. किशमिश में मौजूद पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे तत्व दिल को भी मजबूत बनाते हैं. यह कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करती है और ब्लड प्रेशर को संतुलन में रखती है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा घटता है.

चमकदार त्वचा और मजबूत बालों का राज

साथ ही, किशमिश में पाए जाने वाले विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को निखारने में मदद करते हैं. यह चेहरे की झुर्रियों और दाग-धब्बों को कम करते हैं. वहीं, इसमें मौजूद विटामिन बी कॉम्प्लेक्स और जिंक बालों को जड़ से मजबूत बनाते हैं और बालों का झड़ना कम करते हैं.

किशमिश में कैल्शियम और बोरोन जैसे ज़रूरी तत्व पाए जाते हैं, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं और उन्हें लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखते हैं.

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Covid 19 News: कोरोना का प्रोटीन स्वस्थ कोशिकाओं पर करता है हमला, रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

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Covid 19: कोरोना का प्रोटीन स्वस्थ कोशिकाओं पर करता है हमला, रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

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Covid 19 Damages Healthy Cells: कोविड-19 की नई लहर के बीच इजरायल के वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि इस वायरस का एक प्रोटीन हमारी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करवाता है. यह खोज पत्रिका सेल रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुई है और कोविड-19 की गंभीर समस्याओं को समझने में मदद कर सकती है. सेल रिपोर्ट्स पत्रिका में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, कोविड-19 की गंभीर समस्याएं कैसे होती हैं, इस पर नई जानकारी मिली है. यह रिसर्च वायरस से होने वाले प्रतिरक्षा-संबंधी नुकसान को रोकने के नए तरीके भी सुझाता है.

रिसर्च में क्या पाया गया?

यरुशलम के हिब्रू विश्वविद्यालय के रिसर्चर ने पाया कि वायरस का न्यूक्लियोकैप्सिड प्रोटीन (NP), जो आमतौर पर संक्रमित कोशिकाओं में वायरस की आनुवंशिक सामग्री को पैक करता है, पास की स्वस्थ इपिथिलियल सेल्स तक फैल सकता है.

जब न्यूक्लियोकैप्सिड प्रोटीन (NP) स्वस्थ कोशिकाओं की सतह पर पहुंचता है, तो प्रतिरक्षा प्रणाली इसे गलती से खतरा समझ लेती है. इसके बाद प्रतिरक्षा प्रणाली एंटी-एनपी एंटीबॉडीज भेजती है, जो इन स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए चिह्नित कर देती हैं.

यह प्रक्रिया ‘क्लासिकल कॉम्प्लीमेंट पाथवे’ को शुरू करती है, जो प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का हिस्सा है. इससे सूजन और ऊतकों को नुकसान होता है, जो गंभीर कोविड लक्षणों और लंबे समय तक कोविड का कारण बन सकता है.

कोविड-19 मरीजों के नमूनों का इस्तेमाल करके क्या मिला?

रिसर्चर ने प्रयोगशाला में विकसित कोशिकाओं, उन्नत इमेजिंग तकनीक और कोविड-19 मरीजों के नमूनों का इस्तेमाल करके पाया कि न्यूक्लियोकैप्सिड प्रोटीन (एनपी) कोशिका की सतह पर मौजूद एक खास अणु से जुड़ जाता है. इस जुड़ाव के कारण यह प्रोटीन स्वस्थ कोशिकाओं पर जमा हो जाता है, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली और अधिक भ्रमित हो जाती है.

रिसर्च में यह भी पता चला कि एनोक्सापारिन नाम की दवा, जो खून को पतला करने के लिए इस्तेमाल होती है और हेपरिन का एक रूप है, एनपी को स्वस्थ कोशिकाओं से चिपकने से रोक सकती है. प्रयोगशाला परीक्षणों और मरीजों के नमूनों में एनोक्सापारिन ने उन जगहों को ब्लॉक कर प्रतिरक्षा हमलों को रोकने में मदद की, जहां एनपी चिपकता है. रिसर्चर का कहना है कि यह खोज कोविड समेत अन्य वायरल संक्रमण में प्रतिरक्षा प्रणाली से होने वाली मुश्किलों को कम करने में कारगर हो सकती है.

नया वैरिएंट एनबी दुनिया के कई हिस्सों में तेजी से फैल रहा

इस बीच, कोविड का एक नया वैरिएंट एनबी 1.8.1 दुनिया के कई हिस्सों में तेजी से फैल रहा है, जिससे नई चिंताएं बढ़ रही हैं. यह वैरिएंट ओमिक्रॉन फैमिली का हिस्सा है, जो जनवरी 2025 में पहली बार पाया गया था. यह भारत के साथ ही अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, चीन, मालदीव और मिस्र जैसे देशों में फैल चुका है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे ‘निगरानी में रखा गया वैरिएंट’ घोषित किया है, यानी यह इतनी तेजी से फैल रहा है कि इस पर ध्यान देना जरूरी है, लेकिन अभी इसे बड़ा खतरा नहीं माना गया है.

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क्या मोटापा घटाने के लिए आप भी करते हैं इंजेक्शन का इस्तेमाल? रिसर्च में बड़ा खुलासा

क्या मोटापा घटाने के लिए आप भी करते हैं इंजेक्शन का इस्तेमाल? रिसर्च में बड़ा खुलासा


Injections Claiming to Reduce Obesity: मोटापा घटाने का दावा करने वाले इंजेक्शन वास्तविक जीवन में क्लीनिकल परीक्षण जितने कारगर साबित नहीं होते, क्योंकि मरीज या तो इन्हें लेना बंद कर देते हैं या फिर इनकी खुराक कम कर देते हैं. अमेरिका में हुए एक नये रिसर्च में यह बात सामने आई है. डॉक्टर टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित मरीजों को वेगोवी और ओजेंपिक सहित और इंजेक्शन सुझाते हैं, जिनमें पाए वाले सेमाग्लूटाइड या टिर्जेपेटाइड जैसे घटक वजन घटाने के साथ-साथ ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित करने में मददगार हैं.

क्या निकाला गया रिसर्च में?

‘ओबेसिटी जर्नल’ में प्रकाशित रिसर्च में रिसर्चर ने वास्तविक जीवन में वजन घटाने और ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मोटापा-रोधी इंजेक्शन का असर आंका. मुख्य रिसर्चर और अमेरिका स्थित क्लीवलैंड क्लीनिक से जुड़े डॉ. हैमलेट गैसोयन ने कहा, “हमारा रिसर्च दिखाता है कि मोटापे पर काबू पाने के लिए सेमाग्लूटाइड या टिर्जेपेटाइड का सहारा लेने वाले मरीज वास्तविक जीवन में क्लीनिकल परीक्षण जितना वजन नहीं घटा पाते हैं.”

उन्होंने कहा, “हमारे डेटा के मुताबिक, मरीजों का वास्तविक जीवन में मोटापा-रोधी इंजेक्शन का इस्तेमाल कुछ समय बाद बंद कर देना या फिर उनकी खुराक कम कर देना इसकी मुख्य वजह है.”

रिसर्च में 7,881 वयस्क मरीज शामिल

रिसर्च में 7,881 वयस्क मरीज शामिल हुए, जिनका औसत ‘बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई)’ 39 से ऊपर से था यानी वे “मोटापे के गंभीर स्वरूप” का सामना कर रहे थे. बीएमआई के तहत व्यक्ति की लंबाई और वजन के अनुपात के आधार पर शरीर में वसा की मात्रा का अनुमान लगाया जाता है.

प्रतिभागियों में से 1,320 रिसर्च की शुरुआत के दौरान ‘प्री-डायबिटीज स्टेज’ में थे, जिसका मतलब यह है कि उनके टाइप-2 डायबिटीज की चपेट में आने का खतरा ज्यादा था. सभी प्रतिभागियों ने 2021 से 2023 के बीच सेमाग्लूटाइड या टिर्जेपेटाइड से लैस मोटापा-रोधी इंजेक्शन लेना शुरू किया था.

ब्लड शुगर के प्रभाव का पता लगाया- रिसर्चर

रिसर्चर ने इंजेक्शन लेने के एक साल बाद प्रतिभागियों के वजन और ब्लड शुगर के स्तर पर उसके प्रभाव का पता लगाया. उन्होंने पाया कि जिन प्रतिभागियों ने तीन महीने के भीतर इंजेक्शन लेना बंद कर दिया, उनका वजन 3.6 फीसदी कम हुआ. वहीं, तीन से 12 महीने के बीच इंजेक्शन लेना बंद करने वाले प्रतिभागियों के वजन में औसतन 6.8 फीसदी की कमी आई.

रिसर्चर ने बताया, “एक साल तक इंजेक्शन लेने वाले प्रतिभागी औसतन 8.7 फीसदी वजन घटाने में सफल रहे. जल्द इंजेक्शन छोड़ने (तीन महीने के भीतर), देर से बंद करने (तीन से 12 महीने के भीतर) और एक साल के बाद भी इसे जारी रखने वाले प्रतिभागियों के वजन में क्रमश: औसतन 3.6 फीसदी, 6.8 फीसदी और 11.9 फीसदी की कमी दर्ज की गई.”

रिसर्च में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों को वजन और ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित रखने के लिए सेमाग्लूटाइड या टिर्जेपेटाइड की अधिक खुराक सुझाई गई थी, उनके वजन में क्रमश: औसतन 13.7 फीसदी और 18 फीसदी की कमी आई.

3 से 12 महीने के भीतर इंजेक्शन लेना बंद

‘प्री-डायबिटीज स्टेज’ वाले प्रतिभागियों की बात करें, तो जिन्होंने तीन महीने के भीतर इंजेक्शन लेना बंद कर दिया, उनमें से 33 फीसदी में ब्लड शुगर का स्तर सामान्य बना रहा. वहीं, तीन से 12 महीने के भीतर इंजेक्शन लेना बंद करने वालों में यह आंकड़ा 41 फीसदी और इंजेक्शन जारी रखने वालों के मामले में 67.9 फीसदी था.

रिसर्च से यह भी पता चला कि इसमें शामिल 20 फीसदी से ज्यादा प्रतिभागियों ने तीन महीने के भीतर इंजेक्शन लेना बंद कर दिया, जबकि 32 फीसदी ने तीन से 12 महीने के अंदर ऐसा किया. रिसर्चर के मुताबिक, इंजेक्शन की कीमत, बीमा संबंधी कारण, दुष्प्रभाव और बाजार में (इंजेक्शन की) कमी जैसे कारक इन्हें लेना बंद करने की मुख्य वजहों में शामिल हैं.

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पौष्टिकता से भरपूर है मखाना, इसे अंग्रेजी में क्यों कहते हैं फॉक्स नट्स? दिलचस्प है वजह

पौष्टिकता से भरपूर है मखाना, इसे अंग्रेजी में क्यों कहते हैं फॉक्स नट्स? दिलचस्प है वजह


Benefits of Makhana: मखाना स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी होता है. यह एक हल्का, आसानी से पचने वाला खाद्य पदार्थ है और इसमें प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटेशियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. मखाने को अंग्रेजी में फॉक्स नट्स भी कहते हैं, जानते हैं क्यों?

मखाने को फॉक्स नट्स इसलिए कहते हैं क्योंकि इसका आकार फॉक्स यानि लोमड़ी की तरह होता है. सफेद चेहरे पर एक बिंदु ऐसा जो हूबहू चालाक लोमड़ी की याद दिलाता है.

इन राज्यों में होता है मखाने का उत्पादन

इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के मुताबिक, मखाने का मुख्य रूप से उत्पादन बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और ओडिशा में उगाया जाता है. अकेले बिहार में, यह लगभग 15,000 हेक्टेयर जल निकाय में उगाया जाता है. लगभग 5 लाख परिवार सीधे मखाना की खेती – कटाई, पॉपिंग, बिक्री और उत्पादन – में शामिल हैं. बिहार से हर साल लगभग 7,500 से 10,000 टन पॉप्ड मखाना बेचा जाता है.

मखाना की पॉपिंग (बीज को छिलके से पॉप करने की प्रक्रिया) मखाने को तैयार करने की प्रक्रिया तीन चरणों में शामिल है. बीज को पारंपरिक मिट्टी के बर्तन में या कच्चे लोहे के पैन में 250° सेल्सियस से 320° सेल्सियस तक उच्च तापमान पर भुना जाता है, 2 से 3 दिनों के लिए तड़के, फिर से भुनकर कर एक मैलेट (लकड़ी का हथौड़ा या मुंगरी) का उपयोग करके हाथ से मखाने को छिलके से अलग किया जाता है. भुनने के बाद हटाने के लिए अत्यधिक कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है क्योंकि हटाने में कुछ सेकंड की देरी से खराब गुणवत्ता वाला पॉप्ड मखाना बन जाएगा.

वजन घटाने के लिए फायदेमंद है मखाना

रिसर्च बताते हैं कि मखाने में मैग्नीशियम और पोटेशियम पाया जाता है, जो कि हृदय स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद पाया जाता है. कम कैलोरी और ज्यादा फाइबर होने से यह भूख को नियंत्रित करता है. अगर आप वजन घटाने के बारे में सोच रहे हैं, तो इसका सेवन कर सकते हैं.

मखाने में मौजूद मैग्नीशियम तनाव कम करके अच्छी नींद लाने में मदद करता है. कैल्शियम की मौजूदगी हड्डियों और दांतों के लिए लाभकारी है. व्रत के दौरान अधिक मात्रा में इनका सेवन करने से बचने की सलाह दी जाती है, हालांकि बड़े बुजुर्ग निसंकोच सेवन की सलाह देते हैं. मखाना एक कम कैलोरी वाला स्नैक है. इसमें कैल्शियम, प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम, फास्फोरस और पोटेशियम के साथ-साथ शरीर के लिए कई जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं. मखाना भूख को कंट्रोल करने में मदद करता है. साथ ही इससे पेट भी भरा-भरा लगता है.

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