सोते समय दिखें ये 6 लक्षण तो समझ जाएं पूरी तरह खराब हो गई किडनी, तुरंत भागें डॉक्टर के पास
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Deadlift Injury Risk: “डेडलिफ्ट कर लो, बॉडी बन जाएगी!” जिम में अक्सर ये बात सुनने को मिलती है. भारी वजन उठाते समय खुद को ताकतवर महसूस करना और मसल्स का उभरना हर फिटनेस लवर का सपना होता है. लेकिन यह दमदार दिखने वाली एक्सरसाइज आपकी रीढ़ की हड्डी को गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकती है? कई लोग बिना सही टेक्निक और ट्रेनिंग के जब डेडलिफ्ट करते हैं, तो वे अनजाने में अपनी पीठ की सेहत को दांव पर लगा देते हैं.
क्या है डेडलिफ्ट?
डेडलिफ्ट एक कंपाउंड वेट ट्रेनिंग एक्सरसाइज है, जिसमें वजन को जमीन से उठाकर सीधा खड़ा होकर पकड़ा जाता है. यह बैक, फोरआर्म्स और कोर मसल्स को टारगेट करती है. सही तरीके से किया जाए तो यह बहुत प्रभावी है, लेकिन जरा सी गलती भी भारी पड़ सकती है.
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गलत पोजिशनिंग
डेडलिफ्ट करते समय अगर आपकी कमर झुकी रहती है या पीठ सीधी नहीं होती, तो रीढ़ पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिससे रीढ़ की हड्डी का खतरा बढ़ जाता है.
जरूरत से ज्यादा वजन उठाना
खुद को साबित करने के चक्कर में जब लोग अपनी क्षमता से ज्यादा वजन उठाते हैं, तो शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है और डिस्क पर चोट लग सकती है.
वार्मअप ना करना
बिना वार्मअप करे मसल्स के साथ डेडलिफ्ट करने से मांसपेशियों में खिंचाव और पीठ दर्द की संभावना बहुत बढ़ जाती है.
लगातार गलत फॉर्म में अभ्यास
अगर कोई व्यक्ति बार-बार गलत तकनीक से डेडलिफ्ट करता है, तो यह उसकी रीढ़ की हड्डी के लिए खतरा बन सकता है.
डेडलिफ्ट ने रीढ़ को नुकसान पहुंचाया है?
पीठ के निचले हिस्से में तेज दर्द
खड़े होने या बैठने में परेशानी
टांगों में सुन्नपन या झनझनाहट
चलने-फिरने में रुकावट महसूस होना
कैसे करें डेडलिफ्ट को सुरक्षित तरीके से?
सर्टिफाइड ट्रेनर की निगरानी में ही डेडलिफ्ट करें
वजन धीरे-धीरे बढ़ाएं, कभी भी झटके में न उठाएं
हर बार पीठ सीधी, छाती बाहर और कोर टाइट रखें
प्रॉपर वॉर्मअप करें और बैक सपोर्ट बेल्ट का इस्तेमाल करें
एक्सरसाइज के बीच में ब्रेक लेना जरूरी है
डेडलिफ्ट एक शानदार एक्सरसाइज़ है, लेकिन तभी जब इसे सही ढंग से किया जाए. अगर आपने टेक्निक को नजरअंदाज किया, तो यह आपके शरीर की रीढ़ की मजबूत नींव को ही हिला सकता है. इसलिए, फिटनेस की दौड़ में जल्दबाजी नहीं, समझदारी ज़रूरी है.
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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Pregnant During Periods: “अरे, मुझे तो इस महीने पीरियड्स आ गए थे, मैं प्रेग्नेंट कैसे हो सकती हूं?” यह सवाल बहुत सी महिलाओं के मन में तब उठता है जब वे पीरगनेंसी के लक्षण अनुभव करती हैं, लेकिन हाल ही में पीरियड्स आने का भी उन्हें यकीन होता है. कई बार महिलाएं यह सोचकर निश्चिंत हो जाती हैं कि जब पीरियड्स आए हैं, तो प्रेग्नेंसी संभव ही नहीं है. पर क्या वाकई ऐसा है? क्या पीरियड्स आने के बावजूद कोई महिला गर्भवती हो सकती है?
क्या पीरियड्स के दौरान प्रेग्नेंसी संभव है?
जब महिला को मासिक धर्म होता है, तो इसका मतलब होता है कि गर्भधारण नहीं हुआ है और गर्भाशय की परत बाहर निकल रही है. लेकिन कुछ मामलों में, पीरियड्स जैसे खून आना और गर्भावस्था साथ-साथ हो सकते हैं, जो महिलाओं को भ्रम में डाल सकता है.
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किन कारणों से पीरियड्स जैसी ब्लीडिंग के बावजूद हो सकती है प्रेग्नेंसी?
इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग
जब निषेचित अंडाणु गर्भाशय में चिपकता है, तो हल्की ब्लीडिंग हो सकती है. इसे कई महिलाएं पीरियड्स समझ लेती हैं, जबकि यह गर्भावस्था का पहला संकेत होता है.
हार्मोनल असंतुलन
कुछ महिलाओं में हार्मोनल बदलाव के कारण प्रेगनेंसी के दौरान भी स्पॉटिंग या हल्की ब्लीडिंग हो सकती है. यह भ्रम पैदा कर सकती है कि पीरियड्स आए हैं.
ओव्यूलेशन जल्दी या देर से होना
यदि महिला का ओव्यूलेशन चक्र अनियमित है, तो सम्भावना रहती है कि वो अपने प्रजननशील दिनों में सेक्स करें और प्रेगनेंसी हो जाए और फिर भी हल्का ब्लड आ सकता है.
यदि पीरियड्स के बावजूद प्रेग्नेंसी का शक हो?
अगर पीरियड्स के बाद भी थकान, मतली, ब्रेस्ट में बदलाव या मूड स्विंग्स जैसे लक्षण महसूस हों, तो प्रेग्नेंसी टेस्ट करना चाहिए.
किसी भी असामान्य ब्लीडिंग के मामले में गाइनोकॉलॉजिस्ट से संपर्क करना जरूरी है.
सिर्फ ब्लीडिंग के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि आप गर्भवती नहीं हैं.
पीरियड्स और प्रेगनेंसी के बीच का रिश्ता जितना सीधा लगता है, उतना है नहीं. हां, आमतौर पर पीरियड्स का मतलब होता है कि आप प्रेग्नेंट नहीं हैं, लेकिन कुछ खास स्थितियों में यह नियम टूट सकता है. इसलिए यदि आपको संदेह हो, तो प्रेग्नेंसी टेस्ट करना या डॉक्टर से सलाह लेना ही समझदारी है. अपने शरीर की आवाज सुनिए, क्योंकि जवाब अक्सर वही देता है.
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<p><strong>IVF Treatment Benefits:</strong> शादी के बाद हर किसी का यही सपना होता है कि, घर में बच्चों की किलकारियां गूंजें, लेकिन जब लंबे इंतज़ार के बाद भी ये सपना अधूरा रह जाता है, तो कई सवाल मन में उठते हैं. क्या हमारी किस्मत में बच्चा है? क्या हम कभी माता-पिता बन पाएंगे? इसी कशमकश के बीच IVF यानी In Vitro Fertilization एक नई उम्मीद की किरण बनकर सामने आता है. लेकिन सवाल यही है कि क्या IVF से मनचाहा बच्चा सच में पाया जा सकता है? चलिए जानते हैं इसका सही जवाब. </p>
<p><strong>क्या है IVF?</strong></p>
<p>IVF के जरिए महिलाओं के अंडाणु और पुरुषों के शुक्राणु को शरीर के बाहर लैब में मिलाया जाता है. यह प्रक्रिया उन दंपत्तियों के लिए फायदेमंद होती है, जो प्राकृतिक रूप से संतान प्राप्त नहीं कर पा रहे होते. </p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>IVF से क्या सच में मनचाहा बच्चा पाया जा सकता है?</strong></span></p>
<p><strong>सफलता की दर कितनी है</strong></p>
<p>IVF की सफलता कई बातों पर निर्भर करती है, महिला की उम्र, हार्मोनल स्थिति, अंडाणुओं और शुक्राणुओं की गुणवत्ता, और हेल्थ कंडीशन. <br />30 साल से कम उम्र की महिलाओं में इसकी सफलता दर 40 से 50% तक होती है, जबकि उम्र बढ़ने पर यह घट सकती है. </p>
<p><strong>मनचाही संतान का मतलब क्या है?</strong></p>
<p>अगर आप "मनचाही संतान" से लिंग चयन या विशेष गुणों वाले बच्चे की बात कर रहे हैं, तो ये भारत में गैरकानूनी और अनैतिक है. लेकिन अगर मनचाही संतान का मतलब है स्वस्थ और सुरक्षित गर्भधारण के साथ संतान प्राप्ति तो IVF एक सशक्त विकल्प है. </p>
<p><strong>IVF के फायदे क्या-क्या हैं</strong></p>
<p>उन दंपत्तियों के लिए सहारा जो लंबे समय से निःसंतान हैं</p>
<p>ट्यूब ब्लॉकेज, PCOS, एंडोमेट्रिओसिस जैसी समस्याओं में सहायक</p>
<p>पुरुष बांझपन के मामलों में भी उपयोगी</p>
<p>पूरी तरह से सफलता मिलेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है</p>
<p>जिन्हें बच्चे नहीं हो रहे, वो इसे ट्राई कर सकते हैं</p>
<p>IVF कोई जादू नहीं, लेकिन यह विज्ञान का ऐसा चमत्कार जरूर है जिसने लाखों दंपत्तियों को संतान सुख दिया है. अगर सही उम्र, सही मेडिकल गाइडेंस और मानसिक रूप से तैयार होकर इस प्रक्रिया को अपनाया जाए, तो IVF के ज़रिए संतान की प्राप्ति बिल्कुल संभव है. यह “मनचाही संतान” देने का वादा नहीं करता, लेकिन बच्चा पाने की उम्मीद जरूर जगाता है. </p>
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Dark Chocolate for Period Cramps: हर महीने जब पीरियड्स का समय आता है तो महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान की जगह दर्द, थकान और चिड़चिड़ापन नजर आने लगता है. पेट में ऐंठन, कमर में दर्द और मूड स्विंग्स से दिन तो खराब होता ही है, साथ ही रोजमर्रा की जिंदगी भी मुश्किल लगने लगती है. ऐसे में अगर कोई कहे कि सिर्फ एक टुकड़ा चॉकलेट, वो भी डार्क चॉकलेट, आपके दर्द को कम कर सकता है, तो क्या आप यकीन करेंगी? सुनने में भले ही यह मीठी बात लगे, लेकिन इसके पीछे गजब का साइंस है.
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क्यों होता है पीरियड्स में दर्द?
पीरियड्स के दौरान यूटरस की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं, ताकि ब्लड और टिशू शरीर से बाहर निकल सकें. कई महिलाओं को यह दर्द हल्का होता है, लेकिन कुछ के लिए यह इतना ज्यादा हो सकता है कि दवा लेने की नौबत आ जाती है.
डार्क चॉकलेट क्यों है फायदेमंद?
मैग्नीशियम से भरपूर
डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम की अच्छी मात्रा होती है, जो मांसपेशियों को रिलैक्स करता है और ऐंठन को कम करने में मदद करता है. यह यूटरस की मांसपेशियों पर आरामदायक असर डालता है.
एंटीऑक्सिडेंट का खजाना
डार्क चॉकलेट में फ्लैवोनॉयड्स और पॉलीफेनोल्स जैसे एंटीऑक्सिडेंट्स पाए जाते हैं, जो शरीर की सूजन को कम करते हैं और दर्द में राहत देते हैं.
हैप्पी हार्मोन का स्रोत
डार्क चॉकलेट खाने से सेरोटोनिन और एंडॉर्फिन जैसे हैप्पी हार्मोन रिलीज़ होते हैं, जो मूड को बेहतर बनाते हैं और तनाव कम करते हैं.
आयरन की पूर्ति
पीरियड्स के दौरान शरीर में आयरन की कमी हो जाती है. डार्क चॉकलेट में थोड़ा बहुत आयरन भी होता है, जिससे थकान से राहत मिल सकती है.
कितना और कब खाएं डार्क चॉकलेट?
इसे पीरियड्स शुरू होने से एक-दो दिन पहले और पहले दो दिनों में खाना ज्यादा असरदार हो सकता है.
अधिक खाने से ब्लड शुगर बढ़ सकता है, इसलिए सीमित मात्रा में ही सेवन करें.
पीरियड्स के दर्द को सहन करना अब मजबूरी नहीं है. छोटी-सी मिठास, जैसे डार्क चॉकलेट, न केवल मूड को अच्छा बनाती है, बल्कि शरीर को राहत भी देती है. अगली बार जब पेट में ऐंठन हो, तो दवाई की बजाय एक टुकड़ा डार्क चॉकलेट खाकर देखें, शायद यह आपकी सबसे मीठी राहत बन जाए.
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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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<p style="text-align: justify;">किडनी स्टोन यानी गुर्दे की पथरी और गॉलब्लैडर स्टोन यानी पित्त की थैली की पथरी दो सामान्य, लेकिन गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम्स हैं. ये शरीर के अलग-अलग हिस्सों में बनती हैं और इनके कारण, लक्षण, और इलाज में काफी अंतर होता है. आइए जानते हैं कि इन दोनों स्टोन प्रॉब्लम में क्या अंतर है और किसका इलाज ज्यादा मुश्किल है? </p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किडनी स्टोन और गॉलब्लैडर स्टोन में क्या है अंतर?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किडनी स्टोन और गॉलब्लैडर स्टोन के बीच मुख्य डिफरेंस उनके बनने की जगह, केमिकल कंपोजिशन, और प्रभावित अंगों में हैं. किडनी स्टोन गुर्दे (किडनी) या मूत्रमार्ग में बनती हैं. किडनी का मुख्य काम ब्लड को छानकर पेशाब बनाना है. जब पेशाब में कैल्शियम, ऑक्सलेट, यूरिक एसिड या सिस्टीन जैसे मिनरल्स की मात्रा ज्यादा और पानी की कमी हो जाती है तो ये मिनरल्स क्रिस्टल बनाकर पथरी का रूप ले लेते हैं. वहीं,गॉलब्लैडर स्टोन पित्त की थैली (गॉलब्लैडर) में बनती हैं, जो पाचन तंत्र का हिस्सा है. गॉलब्लैडर का काम लिवर द्वारा निर्मित पित्त (बाइल) को जुटाना है, जो फैट के पाचन में मदद करता है. जब पित्त में कोलेस्ट्रॉल, बिलीरुबिन या अन्य पदार्थों का संतुलन बिगड़ता है तो ये पथरियां बनती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किडनी और गॉलब्लैडर में क्यों बनते हैं स्टोन?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किडनी में स्टोन बनने की वजह कैल्शियम ऑक्सलेट, कैल्शियम फॉस्फेट, यूरिक एसिड, स्ट्रुवाइट या सिस्टीन होते हैं. इनका आकार रेत के दाने से लेकर कुछ सेंटीमीटर तक हो सकता है.वहीं, गॉलब्लैडर में स्टोन बनने की वजह कोलेस्ट्रॉल या बिलीरुबिन होता है. कोलेस्ट्रॉल से बनी पथरियां पीली होती हैं, जबकि बिलीरुबिन से बनी पथरियां भूरी या काली हो सकती हैं. इनका आकार रेत के दाने से लेकर गोल्फ बॉल तक हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या है इन दोनों स्टोन के लक्षण?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किडनी स्टोन के दौरान दर्द आमतौर पर पीठ के निचले हिस्से या पेट के निचले हिस्से में होता है, जो कमर, ग्रोइन (जांघ), या मूत्रमार्ग तक फैल सकता है. अन्य लक्षणों में पेशाब में खून, बार-बार पेशाब आना, जलन, और उल्टी शामिल हैं. कई बार दर्द अचानक और तेज होता है, जो पथरी के मूत्रमार्ग में हिलने पर बढ़ता है. उधर, गॉलब्लैडर स्टोन का दर्द पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से या कंधे और पीठ के बीच होता है. यह दिक्कत उस वक्त ज्यादा होती है, जब आप फैट वाला खाना खाते हैं. अन्य लक्षणों में मतली, उल्टी, बुखार और पीलिया (जॉन्डिस) शामिल हो सकते हैं. यदि पथरी पित्त की नली में रुकावट डालती है तो कोलेसिस्टाइटिस (पित्त की थैली में सूजन) या पैनक्रियाटाइटिस जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कैसे होता है इन दोनों का इलाज?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किडनी स्टोन और गॉलब्लैडर स्टोन के इलाज में काफी अंतर है. वहीं, इलाज की गंभीरता पथरी के आकार, जगह और मरीज की हालत पर निर्भर करती है. किडनी स्टोन का इलाज इस बात पर तय होता है कि पथरी का आकार कितना बड़ा है और यह मूत्रमार्ग में कहां मौजूद है. इसके अलावा गॉलब्लैडर के स्टोन का इलाज आमतौर पर ज्यादा मुश्किल होता है, क्योंकि ये पथरियां अपने आप निकल नहीं पाती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-consuming-curd-is-beneficial-for-human-body-2957415">दही के बिना अधूरी रहती है आपके खाने की थाली तो जान लें ये बातें, शरीर को नहीं पहुंचेगा नुकसान</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. </strong></p>
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