फल खाने के लिए कौन-सा होता है सबसे सही वक्त, जिससे मिले सबसे ज्यादा फायदा?
फल खाने के लिए कौन-सा होता है सबसे सही वक्त, जिससे मिले सबसे ज्यादा फायदा?
Source link
फल खाने के लिए कौन-सा होता है सबसे सही वक्त, जिससे मिले सबसे ज्यादा फायदा?
Source link
पीरियड्स में नहीं लेनी चाहिए दर्द की दवा? जानें इस बात में कितना है सच
Source link
<p style="text-align: justify;">डायबिटीज न केवल ब्लड शुगर को प्रभावित करती है, बल्कि शरीर के कई अंगों खासकर किडनी को भी नुकसान पहुंचाती है. कई रिसर्च में सामने आया है कि डायबिटीज के मरीजों में किडनी रोग (डायबिटिक नेफ्रोपैथी) का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 30-40% ज्यादा होता है. चिंताजनक बात यह है कि किडनी रोग के शुरुआती लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि डायबिटीज के मरीज इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. आइए इनके बारे में जानते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लगातार थकान और कमजोरी</strong></p>
<p style="text-align: justify;">डायबिटीज के मरीजों में किडनी रोग का एक प्रमुख लक्षण है लगातार थकान और कमजोरी. जब किडनी ठीक से काम नहीं करती तो शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को फिल्टर करने की उनकी क्षमता कम हो जाती है, जिसके कारण ब्लड में यूरिया जैसे विषाक्त पदार्थ जमा होने लगते हैं. यह थकान और कमजोरी का कारण बनता है. रिसर्च में पाया गया कि 60% से अधिक डायबिटीज मरीज जो किडनी रोग के शुरुआती चरण में हैं, इस लक्षण को सामान्य तनाव या थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पैरों और एड़ियों में सूजन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किडनी रोग के कारण शरीर में एक्स्ट्रा फ्लूड जमा होने लगता है, जिससे पैरों, एड़ियों, और कभी-कभी चेहरे पर सूजन (एडिमा) दिखाई देती है. डायबिटीज के मरीजों में यह लक्षण तब होता है, जब किडनी प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) को रक्त में बनाए रखने में नाकाम होती है, जिसके कारण प्रोटीन मूत्र में रिसने लगता है. रिसर्च के अनुसार, यह लक्षण मध्यम से गंभीर किडनी रोग (स्टेज 3 या 4) में आम है, लेकिन इसे अक्सर गलतफहमी में सामान्य सूजन समझ लिया जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पेशाब में बदलाव</strong></p>
<p style="text-align: justify;">झागदार पेशाब (प्रोटीन की अधिकता के कारण), बार-बार पेशाब आना (खासकर रात में) या पेशाब का रंग गाढ़ा होना किडनी रोग का स्पष्ट सिग्नल हो सकता है. रिसर्च में पाया गया कि डायबिटीज के मरीजों में माइक्रोएल्ब्यूमिनुरिया (मूत्र में थोड़ी मात्रा में प्रोटीन) किडनी रोग का सबसे शुरुआती लक्षण है, जिसे केवल टेस्ट के माध्यम से ही पकड़ा जा सकता है. दुर्भाग्यवश, डायबिटीज के मरीज इस लक्षण को सामान्य समझकर टेस्ट कराने से बचते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हाई ब्लडप्रेशर</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हाई ब्लडप्रेशर (हाइपरटेंशन) डायबिटीज और किडनी रोग दोनों का एक प्रमुख कारण है. डायबिटीज के कारण किडनी की छोटी रक्त वाहिकाएं डैमेज हो जाती हैं, जिससे ब्लडप्रेशर बढ़ता है. रिसर्च के अनुसार, हाई ब्लडप्रेशर किडनी रोग का कारण और रिजल्ट दोनों हो सकता है. डायबिटीज के मरीजों में हाई ब्लडप्रेशर को अक्सर नॉर्मल माना जाता है, जबकि यह किडनी की सेहत को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भूख में कमी और जी मिचलाना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किडनी रोग के कारण रक्त में अपशिष्ट पदार्थों का स्तर बढ़ने से भूख में कमी, जी मिचलाना और कभी-कभी उल्टी की समस्या हो सकती है. यह लक्षण तब दिखाई देता है, जब किडनी रोग एडवांस्ड स्टेज में पहुंच जाता है. रिसर्च में पाया गया कि डायबिटीज के मरीजों में ये लक्षण प्रारंभिक चरणों में हल्के हो सकते हैं, जिसके कारण इन्हें पाचन संबंधी समस्याओं से जोड़कर नजरअंदाज कर दिया जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डायबिटीज और किडनी रोग का संबंध</strong></p>
<p style="text-align: justify;">डायबिटीज किडनी रोग का प्रमुख कारण है और यह ग्लोबल लेवल पर अंतिम चरण के किडनी रोग (ESRD) के लगभग 44% मामलों के लिए जिम्मेदार है. डायबिटीज के कारण ब्लड में ग्लूकोज का लेवल बढ़ जाता है, जो किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं (ग्लोमेरुली) को नुकसान पहुंचाता है. ये खून की धमनियां ब्लड को फिल्टर करने का काम करती हैं और जब ये डैमेज हो जाती हैं तो किडनी अपशिष्ट पदार्थों को हटाने में असमर्थ हो जाती है. इसकी वजह से प्रोटीन पेशाब में रिसने लगता है, जिसे माइक्रोएल्ब्यूमिनुरिया कहा जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/where-can-you-get-free-treatment-for-corona-indian-government-providing-free-food-also-2955528">मुफ्त में कहां करा सकते हैं कोरोना का इलाज, क्या खाना-पीना भी फ्री दे रही सरकार?</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. </strong></p>
Source link
सुबह उठते ही नजर आते हैं थायरायड के ये 6 लक्षण, संकेत दिखते ही जाएं डॉक्टर के पास
Source link
<p style="text-align: justify;">ग्लूकोमा आंखों की इतनी खतरनाक बीमारी है, जो धीरे-धीरे देखने की क्षमता छीन लेती है और अंधेपन का कारण बन सकती है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, ग्लूकोमा दुनियाभर में अंधेपन का दूसरा सबसे बड़ा कारण है और भारत में लगभग 12 मिलियन लोग इससे प्रभावित हैं. आज हम आपको सात ऐसी आई केयर हैबिट बताने जा रहे हैं, जो न सिर्फ ग्लूकोमा से बचाव में मदद करेंगी, बल्कि आंखों को भी हेल्दी रखेंगी.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ग्लूकोमा क्या है और यह क्यों खतरनाक?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ग्लूकोमा आंखों की एक ऐसी कंडीशन है, जिसमें दिमाग को विजुअल मैसेज पहुंचाने वाली ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है. यह नुकसान आमतौर पर आंखों में दबाव (इंट्राओकुलर प्रेशर) बढ़ने के कारण होता है. ग्लूकोमा को चुपके से आंखों की रोशनी चुराने वाली बीमारी कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर नजर नहीं आते हैं. जब तक मरीज को इसका पता चलता है, तब तक आंखों की रोशनी को काफी नुकसान हो जाता है. एक रिसर्च के अनुसार, नियमित जांच और हेल्दी हैबिट्स अपनाकर ग्लूकोमा के खतरे को 50 पर्सेंट तक कम किया जा सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये हैं ग्लूकोमा के लक्षण</strong></p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>पेरीफेरल विजन का नुकसान:</strong> शुरुआती स्टेज में ग्लूकोमा पेरीफेरल विजन को प्रभावित करता है, जिसे मरीज अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>आंखों में दर्द या दबाव:</strong> तीव्र ग्लूकोमा में आंखों में तेज दर्द या दबाव महसूस हो सकता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>धुंधली दृष्टि:</strong> रात में देखने में कठिनाई या धुंधलापन.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>हलो प्रभाव:</strong> रोशनी के चारों ओर रंगीन छल्ले दिखना.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>सिरदर्द और जी मिचलाना:</strong> गंभीर मामलों में यह लक्षण दिखाई दे सकते हैं.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये हाई केयर हैबिट्स करेंगी आपकी मदद</strong></p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>नियमित आंखों की जांच:</strong> आंखों की नियमित जांच ग्लूकोमा का जल्दी पता लगाने में सबसे अहम है. 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और जिनका पारिवारिक इतिहास ग्लूकोमा से जुड़ा हो, उन्हें हर एक-दो साल में आंखों का टेस्ट जैसे टोनोमेट्री, ऑप्टिक नर्व इमेजिंग करवाने चाहिए. शुरुआती जांच से ग्लूकोमा को प्रारंभिक स्टेज में पकड़ा जा सकता है, जिससे इलाज आसान हो जाता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>हेल्दी डाइट:</strong> आंखों की सेहत के लिए एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन्स और मिनरल्स से भरपूर डाइट जरूरी है. रिसर्च में पाया गया कि हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, केला, मछली और फल जैसे संतरा, जामुन) ग्लूकोमा के खतरे को कम करते हैं. विटामिन A, C, और E आंखों की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाते हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>नियमित एक्सरसाइज:</strong> नई रिसर्च के अनुसार, मीडियम लेवल की एक्सरसाइज जैसे तेज चलना, योग या साइकिलिंग आंखों में ब्लड फ्लो को बेहतर बनाती हैं और इंट्राओकुलर प्रेशर को कम करती हैं. हफ्ते में 150 मिनट की मीडियम फिजिकल एक्टिविटी से ग्लूकोमा का खतरा 30 पर्सेंट तक कम हो सकता है. हालांकि, भारी वजन उठाने वाली एक्सरसाइज से बचना चाहिए, क्योंकि इससे आंखों पर प्रेशर बढ़ सकता है. </li>
<li style="text-align: justify;"><strong>स्क्रीन टाइम का मैनेजमेंट:</strong> लंबे समय तक स्क्रीन पर काम करने से आंखों पर तनाव पड़ता है, जिससे ग्लूकोमा के लक्षण बढ़ सकते हैं. रिसर्च में 20-20-20 नियम की सलाह दी गई है. इसके लिए हर 20 मिनट में 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर की वस्तु को देखें. इसके अलावा ब्लू लाइट से बचने के लिए स्क्रीन पर ब्लू लाइट फिल्टर इस्तेमाल करें.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>धूम्रपान और शराब से परहेज:</strong> स्मोकिंग और ज्यादा शराब पीने से ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंच सकता है. रिसर्च में पाया गया कि स्मोकिंग करने वालों को ग्लूकोमा का खतरा 20 पर्सेंट ज्यादा होता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>पर्याप्त नींद:</strong> रात में 7-8 घंटे की अच्छी नींद आंखों के प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद करती है. रिसर्च के अनुसार, अनियमित नींद या नींद की कमी ग्लूकोमा के जोखिम को बढ़ा सकती है. सोते समय सिर को थोड़ा ऊंचा रखने से आंखों पर दबाव कम होता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>टेंशन मैनेजमेंट:</strong> लंबे समय तक तनाव और चिंता आंखों के दबाव को बढ़ा सकती है. योग, मेडिटेशन और गहरी सांस लेने की तकनीक तनाव को कम करने में मदद करती हैं. रिसर्च में पाया गया कि नियमित मेडिटेशन करने वालों में इंट्राओकुलर प्रेशर 10-15% तक कम हो सकता है.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/where-can-you-get-free-treatment-for-corona-indian-government-providing-free-food-also-2955528">मुफ्त में कहां करा सकते हैं कोरोना का इलाज, क्या खाना-पीना भी फ्री दे रही सरकार?</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. </strong></p>
Source link
<p style="text-align: justify;">अंगदान यानी ऑर्गन डोनेशन, किसी को जीवन देने का माध्यम. एक मृत इंसान नाै लोगों को नया जीवन दे सकता है. एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल 5 लाख लोगों को ऑर्गन ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, जबकि सिर्फ 52 हजार ऑर्गन ही उपलब्ध हो पाते हैं. हाल ही में जयपुर के एक फेसम अस्पताल में 84 साल की महिला ने अपनी 46 वर्षीय बेटी को किडनी डोनेट की. इसके बाद एक सवाल फिर से जेहन में खड़ा हो गया है कि आखिर किस उम्र तक ऑर्गन डोनेट किया जा सकता है? और इसको लेकर सरकार की क्या गाइडलाइंस हैं? आइए इन सवालों के जवाब जानते हैं…</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कितनी उम्र तक कर सकते हैं अंगदान?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">एक्सपर्ट्स बताते हैं कि किसी भी अंग को दान करने का फायदा तभी है, जब वह ऑर्गन बिलकुल फिट हो. एक हेल्दी ऑर्गन से ही दूसरे व्यक्ति को नया जीवन दिया जा सकता है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति के ऑर्गन की क्या स्थिति है. अगर किसी 30 साल की उम्र के व्यक्ति का ऑर्गन बेहतर काम नहीं कर रहा है तो उसे ट्रांसप्लांट के लिए यूज नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर 65 साल के व्यक्ति का ऑर्गन हेल्दी है तो वह भी डोनेट किया जा सकता है. पिछले दिनों ऑर्गन डोनेट को लेकर सरकार ने भी नीति में बदलाव कर दिया है. नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (नोटो) की गाइडलाइंस के मुताबिक 65 साल से अधिक आयु के लोगों के ऑर्गन लेने पर पाबंदी थी, जिसे हटा लिया गया है. सरकार ने इस आयु सीमा को खत्म करने का फैसला लिया. अब किसी भी उम्र का व्यक्ति ऑर्गन लेने के लिए रजिस्ट्रेशन कर सकेगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>काैन-कौन से ऑर्गन किए जा सकते हैं डोनेट?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मृत व्यक्ति के दिल, फेफड़े, लिवर, किडनी, आंत, पैंक्रियाज दान किए जा सकते हैं. आंख का कॉर्निया, हड्‌डी, त्वचा, नस, मांसपेशियां, लिंगामेंट, कार्टिलेज, हार्ट वॉल्व और टेंडन भी मौत के बाद किसी के काम आ सकते हैं. जिंदा इंसान पूरी किडनी और लिवर का कुछ हिस्सा दान दे सकते हैं. </p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कौन लोग नहीं कर सकते ऑर्गन डोनेट?</strong></p>
<ul>
<li style="text-align: justify;">हार्ट डिजीज या कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में अंगदान नहीं किया जा सकता.</li>
<li style="text-align: justify;">उम्र अधिक होने पर अंग सही तरह काम नहीं कर रहा है, तो अंगदान नहीं कर सकता है.</li>
<li style="text-align: justify;">संक्रामक रोग जैसे एचआईवी या हेपेटाइसिस के शिकार होने पर भी अंगदान नहीं कर सकते.</li>
<li style="text-align: justify;">मानसिक रूप से बीमार इंसान अंगदान नहीं कर सकते.</li>
<li style="text-align: justify;">अगर कानूनी तौर पर कोई अड़चन है या कानूनी तौर पर कोई योग्य नहीं है तो अंगदान नहीं कर सकते हैं.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>मौत के कितनी देर बाद अंगदान?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">दिमाग के मृत होने की स्थिति यानी ब्रेन डेड होने के बाद शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है. इसके बिना कोई भी ऑर्गन बाॅडी में फंक्शन नहीं कर सकता है. इसलिए मौत के बाद जितनी जल्दी हो सके, अंगों को दान किया जाता है. शरीर से बाहर निकालने के बाद जरूरी ऑक्सीजन सप्लाई देनी पड़ती है. ताकि वह पहले जैसी स्थिति में रह सकें.</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/which-medicines-should-be-kept-at-home-during-spread-covid-19-infections-2955393">तेजी से बढ़ रहे कोरोना के केस… घर में रखें ये दवाएं, बीमार होने पर मिल सकती है राहत</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. </strong></p>
Source link