गलती, लापरवाही या डॉक्टरों पर बढ़ता प्रेशर, भारत में क्यों जानलेवा बन रही हैं सामान्य सर्जरी?

गलती, लापरवाही या डॉक्टरों पर बढ़ता प्रेशर, भारत में क्यों जानलेवा बन रही हैं सामान्य सर्जरी?


Medical Negligence In Hospitals India: जयपुर की 34 साल की एक महिला के साथ डिलीवरी के दौरान ऐसा हादसा हुआ, जिसने सामान्य मानी जाने वाली सर्जरी के जोखिमों को सामने ला दिया/ सी-सेक्शन के लिए दिए गए स्पाइनल एनेस्थीसिया के बाद वह कमर के नीचे से लकवाग्रस्त हो गई. एमआरआई में पता चला कि उसकी रीढ़ की हड्डी में दुर्लभ ब्लीडिंग हो गई थी, जिससे नसों पर दबाव पड़ रहा था. महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के न्यूरोसर्जनों की टीम, जिसमें डॉ. अनमोल सिंह रंधावा शामिल थे, ने सर्जरी कर ब्लड क्लॉट हटाया. इस केस का जिक्र 2025 में Surgical Neurology International में भी किया गया. करीब तीन महीने बाद महिला धीरे-धीरे ठीक हुई और व्हीलचेयर पर निर्भर होने से बच गई.

हालांकि हर मरीज इतना भाग्यशाली नहीं होता. TOI की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के PSRI अस्पताल के सर्जन डॉ. प्रशांत कुमार कहते हैं कि अगर समय पर दिक्कतों की पहचान न हो या सही इलाज न मिले, तो सामान्य सर्जरी भी जानलेवा बन सकती है. भारत में सर्जरी के बाद होने वाली जटिलताओं के राष्ट्रीय आंकड़े तो नहीं हैं, लेकिन कई स्टडीज चिंता बढ़ाती हैं. मुंबई के टाटा मेमोरियल, बेंगलुरु के NIMHANS और अहमदाबाद के CIMS में हुए एक स्टडी Indian Journal of Critical Care Medicine, 2021 में पाया गया कि 27.5 प्रतिशत मरीजों में सर्जरी के बाद दिक्कतें हुईं, जबकि वैश्विक औसत 19.8 प्रतिशत है. 

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क्यों होती हैं दिक्कतें?

डॉक्टरों के मुताबिक इंफेक्शन, हार्ट से जुड़ी समस्याएं और किडनी फेलियर आम दिक्कतें हैं. एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इंडिया पहले ही सख्त प्रोटोकॉल की जरूरत बता चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई कमियां बनी हुई हैं. सीनियर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. जॉर्ज थॉमस का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाना जरूरी है, लेकिन इससे लागत बढ़ सकती है.

लापरवाही की भी समस्या

लापरवाही के मामलों की भी कमी नहीं है. मुंबई की एक बुजुर्ग महिला को 2007 में हिस्टरेक्टॉमी के बाद हेपेटाइटिस C हो गया, जो संभवतः अनक्लीन उपकरणों के कारण हुआ. कोर्ट ने इसे मेडिकल नेग्लिजेंस मानते हुए अस्पताल को मुआवजा देने का आदेश दिया. प्लास्टिक सर्जन डॉ. उत्कर्ष श्रीवास्तव बताते हैं कि सर्जरी में लापरवाही अक्सर बेसिक नियमों के पालन न करने से होती है, जैसे गलत जगह सर्जरी, शरीर में उपकरण छूट जाना या स्टेरिलाइजेशन में कमी. तमिलनाडु में एक मामले में अस्वच्छ उपकरण से इंफेक्शन फैलने के कारण कई लोगों की मौत तक हो गई थी.

छोटी- छोटी गलतियां भारी पड़ जाती हैं

कई बार छोटी गलती भी बड़ी त्रासदी बन जाती है. चेन्नई में एक खिलाड़ी की सर्जरी के दौरान टॉर्निकेट हटाना भूल जाने से उसकी टांग काटनी पड़ी और बाद में उसकी मौत हो गई. वहीं केरल में एक महिला के शरीर में ऑपरेशन के पांच साल बाद तक फोर्सेप्स पाया गया. डॉक्टरों का कहना है कि सिस्टम पर दबाव भी एक कारण है. तमिलनाडु गवर्नमेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के डॉ. के. सेंथिल के अनुसार सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों पर काम का बोझ ज्यादा है और संसाधन सीमित हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट यह भी बताते हैं कि आजकल डायबिटीज, हाई बीपी और मोटापा जैसी बीमारियां सर्जरी को और जटिल बना देती हैं. लीलावती अस्पताल के डॉ. जलील डी पार्कर के मुताबिक, छोटी सर्जरी भी पूरी तरह जोखिम मुक्त नहीं होती. डॉक्टरों की सलाह है कि सर्जरी से पहले और बाद के प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन जरूरी है. मरीज को अपनी पूरी मेडिकल हिस्ट्री बतानी चाहिए और अस्पतालों को WHO की सर्जिकल सेफ्टी गाइडलाइंस अपनानी चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट में क्या है अंतर, जानिए कौन है ज्यादा खतरनाक?

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सावधान! क्या आपको भी है ‘ब्रेन रॉट’ की बीमारी? मोबाइल की लत से कमजोर हो रही याददाश्त-एकाग्रता

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How Screen Time Affects Mental Health: आजकल “ब्रेन रॉट” शब्द खूब सुनने को मिल रहा है. इसका मतलब है कि इतना ज्यादा ऑनलाइन रहना कि दिमाग पर असर पड़ने लगे. घंटों तक सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करने के बाद जो थकान, चिड़चिड़ापन या ध्यान भटकने की समस्या होती है, उसे भी इसी नाम से जोड़ा जा रहा है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह शब्द भले ही हल्का लगे, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर सच्चाई छिपी है. 

लोगों को हो रही है दिक्कत

कई लोगों को अब ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत होने लगी है. जो लोग पहले आराम से किताब पढ़ लेते थे, वे अब कुछ पन्नों के बाद ही ध्यान खो देते हैं. इसका एक बड़ा कारण स्मार्टफोन और लगातार मिलने वाले नोटिफिकेशन हैं, जो दिमाग को बार-बार भटकाते रहते हैं. रिसर्च बताती है कि TikTok, Instagram या YouTube Shorts जैसे प्लेटफॉर्म पर छोटे-छोटे वीडियो देखने से हमारी कंसंट्रेशन, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकते हैं. बार-बार विषय बदलने और लगातार स्क्रॉल करने की आदत दिमाग को लंबे समय तक किसी एक चीज पर टिकने नहीं देती. 

क्या कहते हैं रिसर्चर?

MIT की रिसर्चर नतालिया कोस्माइना के अनुसार, आज लोगों के लिए 20 मिनट का एक वीडियो भी देखना मुश्किल हो गया है, क्योंकि दिमाग अब छोटे-छोटे कंटेंट का आदी हो चुका है. हालांकि, लंबे समय में इसका असर कितना गंभीर होता है, इस पर अभी पूरी तरह सहमति नहीं है. कुछ रिसर्च बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले लोगों के दिमाग के कुछ हिस्सों में बदलाव देखे गए हैं, लेकिन यह साफ नहीं है कि यह कारण है या परिणाम.

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किन लोगों पर हुई स्टडी?

2025 में प्रकाशित एक स्टडी में 7,000 से ज्यादा बच्चों पर शोध किया गया, जिसमें पाया गया कि ज्यादा स्क्रीन टाइम से दिमाग की बाहरी परत यानी कॉर्टेक्स की मोटाई कम हो सकती है. यह हिस्सा सोचने, याद रखने और फैसले लेने में मदद करता है. इसके अलावा, ज्यादा स्क्रीन टाइम नींद पर भी असर डालता है. खासकर बच्चे और किशोर देर रात तक फोन इस्तेमाल करते हैं, जिससे उन्हें पूरी नींद नहीं मिलती. लगातार नींद की कमी से दिमाग के विकास पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि, एक्सपर्ट्स यह भी कहते हैं कि हर तरह का स्क्रीन टाइम खराब नहीं होता. फर्क इस बात से पड़ता है कि आप स्क्रीन पर क्या कर रहे हैं. 

छात्रों पर क्या होता है असर?

AI चैटबॉट्स पर हुई एक स्टडी में पाया गया कि जो छात्र इनका ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, वे खुद कम सीख पाते हैं और अपनी ही लिखी चीजों को याद नहीं रख पाते. इसका कारण यह है कि दिमाग कम सक्रिय रहता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि स्क्रीन का इस्तेमाल संतुलित तरीके से करें. सोने से पहले फोन से दूरी रखें, जरूरत से ज्यादा ऐप्स हटाएं और तकनीक का इस्तेमाल सोच-समझकर करें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या मल्टीविटामिन से थमेगी बढ़ती उम्र की रफ्तार? नई स्टडी में मिले चौंकाने वाले संकेत

क्या मल्टीविटामिन से थमेगी बढ़ती उम्र की रफ्तार? नई स्टडी में मिले चौंकाने वाले संकेत


Do Multivitamins Slow Biological Ageing: रोजाना मल्टीविटामिन लेने से क्या उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है? एक नई स्टडी में ऐसा संकेत मिला है, हालांकि साइंटिस्ट ने इसके असर को सीमित बताते हुए सावधानी बरतने की सलाह दी है. दरअसल, उम्र दो तरह की मानी जाती है, एक क्रोनोलॉजिकल एज, यानी आप कितने साल जी चुके हैं, और दूसरी बायोलॉजिकल एज, जो शरीर की असल स्थिति को दर्शाती है. यह आमतौर पर डीएनए में होने वाले बदलावों, खासकर डीएनए मिथाइलेशन के आधार पर मापी जाती है, जो उम्र के साथ बदलते रहते हैं और जीन के काम करने के तरीके को प्रभावित करते हैं. 

क्या निकला रिसर्च में?

अमेरिका में हुई इस रिसर्च में पाया गया कि रोजाना मल्टीविटामिन लेने से बायोलॉजिकल एजिंग के कुछ संकेतकों पर हल्का असर पड़ सकता है. हालांकि, इसका सीधा मतलब स्वास्थ्य में बड़ा सुधार होगा, यह अभी साफ नहीं है. इस स्टडी में करीब 70 साल की औसत उम्र वाले 958 स्वस्थ लोगों को शामिल किया गया. उन्हें चार अलग-अलग समूहों में बांटा गया, जहां कुछ लोगों को मल्टीविटामिन, कुछ को कोको एक्सट्रैक्ट और कुछ को प्लेसीबो दिया गया. दो साल तक चले इस ट्रायल के दौरान प्रतिभागियों के खून के नमूनों की जांच की गई और डीएनए मिथाइलेशन के पांच अलग-अलग पैमानों पर बदलाव देखा गया.

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क्या निकला रिजल्ट?

 Nature Medicine जर्नल में पब्लिश हुए इस रिसर्च में पाया गया कि जो लोग मल्टीविटामिन ले रहे थे, उनमें पांच में से दो एपिजेनेटिक क्लॉक्स पर उम्र बढ़ने की रफ्तार थोड़ी धीमी दिखी, खासकर वे जो मृत्यु जोखिम का अनुमान लगाते हैं. कुल मिलाकर यह असर दो साल में करीब चार महीने की धीमी एजिंग के बराबर था. रिसर्चर ने यह भी पाया कि जिन लोगों में शुरुआत में बायोलॉजिकल एजिंग तेजी से हो रही थी, उनमें यह असर थोड़ा ज्यादा दिखा. इसका एक कारण उनके शरीर में पोषण की कमी भी हो सकती है. वहीं कोको एक्सट्रैक्ट का इस प्रक्रिया पर कोई खास प्रभाव नहीं पाया गया. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

स्टडी के सीनियर राइटर डॉ. हावर्ड सेसो ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति मल्टीविटामिन लेना शुरू कर दे, क्योंकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इससे किसे और कितना फायदा होता है. इस पर कोलंबिया यूनिवर्सिटी मेलमैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एक्सपर्ट ने भी कहा कि इसका असर बहुत छोटा है और इसे बड़े स्वास्थ्य लाभ से जोड़ना जल्दबाजी होगी. वहीं, डॉ. मार्को डी एंटोनियो के मुताबिक, केवल मल्टीविटामिन लेने से फायदा नहीं होगा, जब तक कि लाइफस्टाइल स्वस्थ न हो. खराब आदतों का असर किसी भी सप्लीमेंट से पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! बिना डॉक्टरी सलाह के यह विटामिन लेना पड़ सकता है भारी, जा सकती है आंखों की रोशनी

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What Happens If You Take Too Much Niacin: कई लोग रोजाना विटामिन लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये हमेशा सुरक्षित और फायदेमंद होते हैं. ऐसा ही एक विटामिन है विटामिन B3 (नियासिन), जिसे कोलेस्ट्रॉल कम करने और हार्ट की सेहत सुधारने के लिए जाना जाता है. डॉक्टर भी कभी-कभी हाई कोलेस्ट्रॉल या हाइपरलिपिडेमिया के मरीजों को इसे लेने की सलाह देते हैं. लेकिन जब यही विटामिन बिना डॉक्टर की सलाह के ज्यादा मात्रा में लिया जाए, तो नुकसान भी हो सकता है.

आंखों की रोशनी पर पड़ता है असर

अमेरिका के न्यूयॉर्क आई एंड ईयर इन्फर्मरी ऑफ माउंट सीनाई के डॉक्टरों ने एक ऐसा ही मामला सामने रखा, जिसमें ज्यादा मात्रा में नियासिन लेने से एक व्यक्ति की आंखों की रोशनी पर असर पड़ा. 61 साल के एक व्यक्ति की नजर धीरे-धीरे एक महीने में इतनी कमजोर हो गई कि उसे साफ दिखाई देना बंद हो गया. जांच में पाया गया कि उसकी आंखों की रोशनी खतरनाक स्तर तक गिर चुकी थी.

शुरुआत में मरीज ने सिर्फ हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की बात बताई, लेकिन बाद में उसने स्वीकार किया कि वह कई महीनों से रोजाना 3 से 6 ग्राम तक नियासिन ले रहा था. उसने यह सप्लीमेंट बिना डॉक्टर की सलाह के खुद ही खरीदकर लेना शुरू किया था, क्योंकि उसे लगा कि इससे दिल की सेहत बेहतर होगी.

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क्या होती है दिक्कत

डॉक्टरों ने जब उसकी आंखों की गहराई से जांच की, तो पता चला कि उसे एक दुर्लभ समस्या हो गई है, जिसे नियासिन-इंड्यूस्ड सिस्टॉइड मैक्युलोपैथी कहा जाता है. इसमें आंख की रेटिना के मैक्युला हिस्से में तरल जमा हो जाता है, जिससे सूजन आ जाती है और नजर धुंधली या कमजोर हो जाती है. हालांकि राहत की बात यह रही कि जैसे ही मरीज ने नियासिन लेना बंद किया, उसकी हालत में सुधार होने लगा. एक हफ्ते के अंदर उसकी नजर बेहतर होने लगी और करीब दो महीने बाद उसकी आंखों की रोशनी पूरी तरह सामान्य हो गई.

एक्सपर्ट का क्या कहना 

डॉक्टरों के मुताबिक, नियासिन की सामान्य मेडिकल डोज 1 से 3 ग्राम प्रतिदिन होती है और अधिकतम 6 ग्राम तक ही, वह भी डॉक्टर की निगरानी में ली जानी चाहिए. मरीज ने यह मात्रा बिना किसी मेडिकल सुपरविजन के ली थी. जांच के दौरान आधुनिक इमेजिंग तकनीक से रेटिना के मैक्युला हिस्से में सूजन पाई गई, जो साफ देखने के लिए जरूरी होता है. इस केस की रिपोर्ट Journal of VitreoRetinal Diseases में प्रकाशित हुई. रिसर्च टीम के प्रमुख डॉ. रिचर्ड रोसेन ने चेतावनी दी कि बिना डॉक्टर की सलाह के सप्लीमेंट लेना खतरनाक हो सकता है.

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सोने से पहले पीना शुरू कर दें ये 5 आयुर्वेदिक कूलिंग ड्रिंक, कसम से रात भर आएगी चैन की नींद

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माना जाता है कि एक स्वस्थ आदमी को आमतौर पर प्रति रात 7 से 9 घंटे की अच्छी नींद की जरूरत होती है. यह नींद का स्तर व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और लाइफस्टाइल के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है, लेकिन 7 घंटे से कम नींद स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है. वहीं, अधिकांश लोग हर रात 6 से 7 घंटे भी अच्छी तरह से नहीं सो पाते हैं, जिसकी वजह से पूरे दिन चिड़चिड़े रहते हैं. साथ ही, पाचन में भी परेशानी होती है, परंतु घबराएं नहीं. आपके खान-पान में थोड़े से बदलाव से यह परेशानी कम हो सकती है. डॉक्टरों ने पांच ऐसे पीने वाले पदार्थों के नाम बताए हैं, जिन्हें सोने से पहले पीने से नींद न आने की समस्या से आपको मदद मिल सकती हैं. साथ ही, आपकी नींद में सुधार हो सकता है.  

सत्तू शरबत-ठंडक देने वाला प्रोटीन ड्रिंकः सत्तू को ठंडे पानी और एक चुटकी भुने हुए जीरे के साथ मिलाकर पीने से यह पाचन तंत्र को तुरंत ठंडक पहुंचाता है. इसमें प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होने के कारण यह आपको आधी रात को भूख लगने से बचाता है, जिससे आपका शरीर रात भर शांत और हाइड्रेटेड रहता है.

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सौंफ का पानी – पाचन के लिए ड्रिंकः  एक चम्मच सौंफ को पानी में भिगोकर और सोने से पहले उसका छना हुआ पानी पीने से शरीर की गर्मी कम होती है और रात के समय होने वाली एसिडिटी से बचाव होता है। इसकी हल्की, मीठी खुशबू nervous system के लिए एक प्राकृतिक relaxant  के रूप में काम करती है, जिससे शांति भरी नींद आना आसान हो जाता है.

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गुलकंद वाला दूध – फूलों की ठंडक का एहसासः गुलकंद, जो धूप में पकाया गया गुलाब की पंखुड़ियों का मिश्रण होता है. यह शरीर के लिए रेफ्रिजरेंटर का काम करता है. एक गिलास दूध में एक चम्मच गुलकंद मिलाकर पीने से  आंतरिक गर्मी और जलन से राहत मिलता है.

बेल फल का रसः बेल का फल गर्मियों का मौसमी चमत्कार है जो शरीर के मुख्य अंगों से गर्मी को खींच निकालने की  क्षमता के लिए जाना जाता है, शाम को बिना चीनी वाले बेल के रस का थोड़ा सा सेवन करने से आपकी metabolic heat कंट्रोल में रहता है,  जिससे हृदय गति धीमी हो जाती है और आपका शरीर गहरी नींद के लिए तैयार हो जाता है.

वेटिवर (खस) इन्फ्यूजनः खस, या वेटिवर, एक सुगंधित घास है जिसकी जड़ों का उपयोग शरीरों को ठंडा रखने के लिए किया जाता  है,  पीने के पानी में खस की जड़ों को डालने से एक ऐसा ड्रिंक बनता है जो शरीर के तापमान को काफी कम कर देता है और प्यास बुझाता है, जो दिन भर के तनाव को कम करने में मदद करती है.

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