सबसे खतरनाक कैंसर के खिलाफ दमदार वैक्सीन, जानें इससे कितना सफल होगा पैनक्रिएटिक कैंसर का इलाज

सबसे खतरनाक कैंसर के खिलाफ दमदार वैक्सीन, जानें इससे कितना सफल होगा पैनक्रिएटिक कैंसर का इलाज


Pancreatic cancer Vaccine: कैंसर एक गंभीर समस्या है जिसके बारे में सुनते ही इंसान अंदर से टूट जाता है. इसी में अगर बात करें पैनक्रिएटिक कैंसर की, तो यह एक बेहद गंभीर और तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है जो पैनक्रियास (Pancreas) में होता है. पैनक्रियास शरीर का वह अंग है जो पाचन एंजाइम और इंसुलिन जैसे हार्मोन बनाने में अहम भूमिका निभाता है. यह कैंसर अक्सर शुरुआती चरण में पकड़ में नहीं आता क्योंकि पैनक्रियास शरीर में काफी अंदर होता है और शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य या अस्पष्ट होते हैं, जैसे पेट दर्द, वजन कम होना या पाचन संबंधी समस्याएं, जो इतने गंभीर नहीं लगते. जब तक इसका पता चलता है, तब तक कई मामलों में यह शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका होता है, जिससे इसका इलाज और भी कठिन हो जाता है.

इसी वजह से इसे सबसे खतरनाक और जानलेवा कैंसर में गिना जाता है. आंकड़ों के मुताबिक, मुताबिक दो दशकों में पैनक्रिएटिक कैंसर होने का आंकड़ा दोगुना बढ़ गया है. यह पहले 1000000 व्यक्तियों में से लगभग 2.5 से 3 था, अब बढ़कर 6 से 7 हो गया है. हाल ही में इस कैंसर के इलाज को लेकर एक वैक्सीन का ट्रायल संभव हुआ है, जिससे इसके इलाज में एक नई दिशा मिली है, जानते हैं पूरी बात. 

पैनक्रिएटिक कैंसर का इलाज करने वाली mRNA वैक्सीन क्या है?

हाल ही में पैनक्रिएटिक कैंसर के इलाज में ऑटोजीन सेव्युमेरन नाम की वैक्सीन के ट्रायल ने एक नई उम्मीद जगाई है. यह एक पर्सनलाइज्ड वैक्सीन है जो मरीज के ट्यूमर की जेनेटिक जानकारी (neoantigens) के आधार पर तैयार की जाती है और शरीर की इम्यून सिस्टम को कैंसर सेल्स को पहचानने और खत्म करने के संकेत देती है. शोध करने वालों के अनुसार, यह mRNA टेक्नोलॉजी पर आधारित है- यानी मैसेंजर राइबो-न्यूक्लिक एसिड (mRNA) पर आधारित एक ऐसी तकनीक जिसे इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है, न कि बीमारी होने की संभावना को कम करने के लिए. यह वैक्सीन सर्जरी के बाद दी जाती है ताकि शरीर में बची हुई माइक्रोस्कोपिक कैंसर कोशिकाओं को खत्म किया जा सके और दोबारा कैंसर होने के खतरे को कम किया जा सके.

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क्लिनिकल ट्रायल्स के नतीजे – कितनी सफलता मिली

क्लिनिकल ट्रायल्स के नतीजों की बात करें तो फेज-1 स्टडी में कुल 16 मरीजों को पैनक्रिएटिक कैंसर की सर्जरी के बाद ऑटोजीन सेव्युमेरन वैक्सीन दी गई थी. इसके साथ मरीजों को कीमोथेरेपी और एक इम्यूनोथेरेपी दवा (चेकपॉइंट इनहिबिटर) भी दी गई. वैक्सीन हर मरीज के ट्यूमर के DNA के हिसाब से अलग-अलग तैयार की गई थी. इन 16 में से 8 मरीजों में वैक्सीन का अच्छा असर हुआ. इनके शरीर के इम्यून सिस्टम ने ट्यूमर को पहचाना और कैंसर सेल्स पर हमला करने वाले टी-सेल्स बनने लगे. 8 मरीजों में से 7 लोग सर्जरी के 4 से 6 साल बाद भी जिंदा रहे. दूसरी तरफ जिन 8 मरीजों में वैक्सीन का असर नहीं हुआ, उनमें से सिर्फ 2 ही जिंदा रहे. इन अच्छे शुरुआती नतीजों के बाद अब इस वैक्सीन का फेज-2 क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया गया है, जिसमें इसे ज्यादा मरीजों पर टेस्ट किया जा रहा है. यह स्टडी न्यूयॉर्क के MSK (मेमोरियल स्लोन केटरिंग) समेत कई दूसरी जगहों पर चल रही है, ताकि इसके असर और सुरक्षा को और अच्छे से समझा जा सके.

mRNA वैक्सीन पैनक्रिएटिक कैंसर के इलाज के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आई है. हालांकि इसका फेज-2 अभी शुरू ही हुआ है, लेकिन मेडिकल साइंस के क्षेत्र में इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर फेज-2 और फेज-3 में भी ऐसे ही नतीजे आते हैं, तो यह मेडिकल क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.

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क्या आपको भी गर्मी में आ रहा है बुखार? इग्नोर किया तो जा सकती है जान!

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How To Identify Malaria Symptoms Early: गर्मियों में आने वाला बुखार अक्सर सामान्य वायरल कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. घरों और क्लीनिकों में हर साल यही पैटर्न देखने को मिलता है कि बुखार, शरीर में दर्द और थकान, और फिर इसे हल्का समझकर छोड़ दिया जाता है. ज्यादातर मामलों में यह सही भी होता है, लेकिन हर बार नहीं. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉक्टर क्या कहते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. संदीप रेड्डी कोप्पुला ने TOI को बताया  कि गर्मियों में ऐसे कई मामले आते हैं जिन्हें सीधे वायरल मान लिया जाता है, जबकि उनमें कुछ और गंभीर छिपा हो सकता है. असल चिंता यहीं से शुरू होती है. क्योंकि जब मलेरिया जैसे संक्रमण को साधारण बुखार समझ लिया जाता है, तो इलाज में देरी हो जाती है और स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ सकती है, सामान्य बुखार आमतौर पर तीन से चार दिनों में आराम, तरल पदार्थ और बुनियादी देखभाल से ठीक हो जाता है, लेकिन हर बुखार ऐसा नहीं होता. 

किस बात का आपको रखना चाहिए ध्यान?

वे बताते हैं कि कुछ बुखार लंबे समय तक बने रहते हैं, कुछ रुक-रुक कर आते हैं, और कुछ के साथ तेज ठंड लगना महसूस होता है. ये कोई सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि संकेत हैं. भारत सरकार के वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र के अनुसार, मलेरिया के लक्षण शुरुआत में हल्के हो सकते हैं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने पर यह गंभीर रूप ले सकता है. अक्सर लोग बुखार को सिर्फ शरीर के तापमान से जोड़कर देखते हैं, जबकि शरीर और भी संकेत देता है. अचानक ठंड लगना, फिर तेज बुखार आना और उसके बाद पसीना आना यह एक खास तरह का क्रम होता है. डॉ. संदीप बताते हैं कि ठंड और पसीना सिर्फ बुखार का हिस्सा नहीं, बल्कि एक अहम संकेत हो सकता है. 

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थकान भी अहम संकेत

थकान भी एक अहम संकेत है. सामान्य थकान और इस तरह की कमजोरी में फर्क होता है. कभी-कभी यह इतनी ज्यादा होती है कि छोटे-छोटे काम भी मुश्किल लगते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, मलेरिया शरीर के रेड ब्लड सेल्स को प्रभावित करता है, जिससे एनर्जी स्तर पर असर पड़ता है और थकान बढ़ जाती है. कई लोग यह सोचकर इंतजार करते हैं कि दो-तीन दिन में बुखार अपने आप ठीक हो जाएगा. हल्के मामलों में यह तरीका ठीक हो सकता है, लेकिन अगर बुखार इससे ज्यादा समय तक बना रहे, तो जांच जरूरी हो जाती है. साधारण खून की जांच से मलेरिया जैसे संक्रमण का जल्दी पता लगाया जा सकता है, 

कैसे फैलती हैं ये बीमारियां?

गर्मी और बरसात के मौसम में मलेरिया, डेंगू और टाइफाइड जैसे कई इंफेक्शन एक साथ फैलते हैं. शुरुआती लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं, हल्का बुखार, सिरदर्द और बदन दर्द. यही समानता भ्रम पैदा करती है और हर बुखार को वायरल मान लेना आसान रास्ता बन जाता है, लेकिन यह जोखिम भरा हो सकता है. बचाव के लिए जरूरी है कि बुखार के व्यवहार पर ध्यान दिया जाए, सिर्फ तापमान पर नहीं. अगर बुखार दो-तीन दिन से ज्यादा बना रहे, ठंड और पसीने का पैटर्न दिखे या असामान्य थकान हो, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. इसके साथ ही, आसपास पानी जमा न होने दें, मच्छरों से बचाव के उपाय अपनाएं और साफ-सफाई का ध्यान रखें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्रेग्नेंसी के टाइम मलेरिया तो हो जाएं सावधान, बन सकता है प्रीमैच्योर डिलीवरी की वजह 

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Malaria In Pregnancy: गर्मी और बरसात का मौसम आते ही मच्छरों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है और इसी के साथ मलेरिया जैसी बीमारी का डर भी सताने लगता है. ऐसे में मां के लिए पेट में पल रहे बच्चे का ख्याल रखना एक बहुत ही अनोखा और नाजुक एहसास होता है. इस दौरान हर मां चाहती है कि वे अपने बच्चे को हर खतरे से बचाये जिसके लिए वे पूरी कोशिश करती है. लेकिन क्या आपको पता है कि एक छोटा सा मच्छर भी इस सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकता है?

आम लोगों के लिए यह बीमारी जितनी खतरनाक है, प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए यह उससे भी कहीं ज्यादा गंभीर साबित हो सकती है. गर्भावस्था के दौरान शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता थोड़ी कमजोर हो जाती है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. वही अगर इसी समय उनको मलेरिया हो जाए तो यह मां और बच्चे दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकता है. यही कारण है कि डॉक्टर इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हैं.

प्रीमैच्योर डिलीवरी का बढ़ सकता है खतरा

प्रेग्नेंसी के दौरान मलेरिया होने पर सबसे बड़ा खतरा प्रीमैच्योर डिलीवरी यानी समय से पहले बच्चे के जन्म का होता है. विशेषज्ञों के अनुसार, प्रेग्नेंसी में मलेरिया को कभी भी एक सामान्य बुखार समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए. यह बीमारी केवल होने वाली मां के स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुंचाती है, बल्कि इसका सीधा और बुरा असर अजन्मे बच्चे के विकास पर भी पड़ता है. मलेरिया का परजीवी शरीर में खून को प्रभावित करता है, जिससे प्लेसेंटा पर भी असर पड़ सकता है. इससे बच्चे को सही मात्रा में पोषण और ऑक्सीजन नहीं मिल पाता. कई मामलों में यह भी देखा गया है कि इससे बच्चे का वजन कम हो जाता है या फिर समय से पहले डिलीवरी हो जाती है. कुछ गंभीर स्थितियों में गर्भपात का खतरा भी बढ़ जाता है, इसलिए इस बीमारी को हल्के में लेना बिल्कुल भी सही नहीं है.

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मां और बच्चे दोनों पर पड़ता है असर

मलेरिया केवल बच्चे के लिए ही नहीं, बल्कि मां की सेहत के लिए भी खतरनाक होता है. ऐसे में गर्भवती महिलाओं को अपने शरीर में नजर आने वाले लक्षणों को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए. जैसे तेज बुखार, कमजोरी, सिर दर्द और शरीर में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं. अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह एनीमिया का कारण भी बन सकता है, जिससे शरीर में खून की कमी हो जाती है. मां की खराब सेहत का सीधा असर बच्चे के विकास पर पड़ता है. ऐसे में जरूरी है कि लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया जाए और सही इलाज शुरू किया जाए.

बचाव ही सबसे बेहतर उपाय

प्रेग्नेंसी के दौरान मलेरिया से बचाव करना सबसे जरूरी होता है. इसके लिए मच्छरों से दूर रहना बेहद जरूरी है. इसके लिए आपके अपनी दिनचर्या में कुछ आसान कदम शामिल करना होगा, जैसे घर के आसपास पानी जमा न होने दें, मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और पूरे कपड़े पहनें. डॉक्टर की सलाह के बिना कोई भी दवा न लें. अगर बुखार या मलेरिया के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत जांच कराएं. डॉक्टर का मानना है कि इस बीमारी से डरने के बजाय सतर्क रहने की जरूरत है. समय पर इलाज और सही देखभाल से इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा के लिए सावधानी और जागरूकता बहुत जरूरी है.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या गर्मी में आपका भी पेट बार-बार हो रहा खराब? डॉक्टर से जानें इसकी असली वजह

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Why Stomach Infections Increase In Summer: गर्मी के मौसम में अक्सर ऐसा होता है कि अचानक घर या दफ्तर में कई लोगों को पेट से जुड़ी दिक्कतें होने लगती हैं. किसी को उल्टी, किसी को दस्त, तो किसी को पेट में मरोड़ की शिकायत. ज्यादातर लोग इसे सीधे तौर पर खाने की वजह मान लेते हैं, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा मुश्किल है. चलिए आपको बताते हैं इसके बारे में. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. आकाश चौधरी, जो केयर हॉस्पिटल में क्लिनिकल डायरेक्टर और सीनियर सलाहकार हैं, उन्होंने TOI को बताया कि जिसे हम आमतौर पर फूड पॉइजनिंग कहते हैं, वह अक्सर कई कारणों का मिला-जुला असर होता है. इसमें गर्मी, खाना रखने का तरीका, पानी की क्वालिटी और आसपास का वातावरण सबकी भूमिका होती है. दरअसल, गर्मी सिर्फ असहज महसूस कराने तक सीमित नहीं है, यह खाने की सुरक्षा पर भी सीधा असर डालती है. जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वैसे-वैसे बैक्टीरिया तेजी से पनपने लगते हैं. कई बार खाना देखने और सूंघने में बिल्कुल ठीक लगता है, लेकिन उसमें माइक्रोब्स खतरनाक स्तर तक बढ़ चुके होते हैं. डॉक्टर चौधरी के मुताबिक, गर्मियों में खाना पकने और खाने के बीच थोड़ा सा अंतर भी जोखिम बढ़ा सकता है. 

किससे होती है दिक्कत?

लोग अक्सर यह सोचते हैं कि बीमारी सिर्फ खाने से हुई है, लेकिन कई बार असली वजह पानी होता है. पीने का पानी, पेय पदार्थों में डाली गई बर्फ, या कच्चे फल-सब्जियां जिन्हें ठीक से साफ नहीं किया गया, ये सभी इंफेक्शन के सोर्स बन सकते हैं. खास बात यह है कि पानी को लेकर हम उतनी सावधानी नहीं बरतते जितनी खाने को लेकर करते हैं, और यही चूक भारी पड़ जाती है. 

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लाइफस्टाइल से भी प्रभाव

गर्मियों में खानपान की आदतें भी बदल जाती हैं. बाहर खाना, यात्रा के दौरान खाना या सड़क किनारे से कुछ लेना ये सब आम हो जाता है. ज्यादातर बार सब ठीक रहता है, लेकिन कभी-कभी इनमें से कोई एक चीज समस्या पैदा कर देती है और यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि असल कारण क्या था.  अगर एक ही घर में कई लोग एक साथ बीमार पड़ते हैं, तो यह जरूरी नहीं कि वजह वही खाना हो. कई बार यह इंफेक्शन एक से दूसरे में फैलता है, जो आमतौर पर वायरस के कारण होता है. गंदे हाथ, साझा सतहें और साफ-सफाई की कमी इसके पीछे बड़ी वजह बनती हैं. डॉक्टर चौधरी साफ कहते हैं कि ऐसे मामलों में बीमारी किसी खास खाने से नहीं, बल्कि संपर्क से फैलती है.

कब डॉक्टर से करना चाहिए संपर्क?

इसके अलावा, गर्मी में शरीर खुद भी ज्यादा दबाव में रहता है. पानी की कमी, अनियमित भोजन और तेज तापमान डाइजेशन सिस्टम को सेंसेटिव बना देते हैं. ऐसे में वही खाना, जो पहले कभी नुकसान नहीं करता था, अब परेशानी पैदा कर सकता है. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में यह समस्या कुछ दिनों में खुद ही ठीक हो जाती है. लेकिन अगर उल्टी लगातार हो, तेज बुखार हो, मल में खून आए या शरीर में पानी की कमी के संकेत दिखें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

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