लिवर कैंसर से पहले शरीर करता है ये 5 इशारे, पहचान लिया तो बच जाएगी जान

लिवर कैंसर से पहले शरीर करता है ये 5 इशारे, पहचान लिया तो बच जाएगी जान


लिवर हमारे शरीर के दाहिने हिस्से में होता है, इसलिए जब इसमें कोई समस्या होती है तो उसी हिस्से में दर्द, भारीपन या खिंचाव महसूस होता है. अगर आपको भी ऐसा दर्द होता है और लगातार बना रहे या बढ़ जाता तो यह लिवर कैंसर का शुरुआत हो सकता है. वहीं कई लोग इसे गैस समझकर अनदेखा करते हैं जो खतरनाक होता है.

वहीं अगर आप डाइट या एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं और फिर भी वजन तेजी से कम हो रहा है तो भी लिवर कैंसर का संकेत हो सकता है. दरअसल, ट्यूमर के कारण शरीर की ऊर्जा तेजी से खत्म होने लगती है, जिससे बिना कुछ किए भी वजन गिरने लगता है.

वहीं अगर आप डाइट या एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं और फिर भी वजन तेजी से कम हो रहा है तो भी लिवर कैंसर का संकेत हो सकता है. दरअसल, ट्यूमर के कारण शरीर की ऊर्जा तेजी से खत्म होने लगती है, जिससे बिना कुछ किए भी वजन गिरने लगता है.

इसके अलावा भूख में कमी और जल्दी पेट भर जाना लिवर की खराब पाचन क्रिया को सीधे प्रभावित करता है. इस कारण खाने की इच्छा कम होती है और थोड़ा सा खाना खाने के बाद भी पेट भर भारी महसूस होता है. यह भी ज्यादातर लिवर कैंसर का शुरुआती के संकेत हो सकता है.

इसके अलावा भूख में कमी और जल्दी पेट भर जाना लिवर की खराब पाचन क्रिया को सीधे प्रभावित करता है. इस कारण खाने की इच्छा कम होती है और थोड़ा सा खाना खाने के बाद भी पेट भर भारी महसूस होता है. यह भी ज्यादातर लिवर कैंसर का शुरुआती के संकेत हो सकता है.

वहीं लिवर खराब होने पर शरीर में बिलीरुबिन बढ़ जाता है, जिससे आंखें और स्किन पीली पड़ने लगती है. वहीं अगर अचानक पीलिया हो जाए और लंबे समय तक ठीक न हो तो इसे भी बिल्कुल हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह भी लिवर कैंसर का गंभीर संकेत हो सकता है.

वहीं लिवर खराब होने पर शरीर में बिलीरुबिन बढ़ जाता है, जिससे आंखें और स्किन पीली पड़ने लगती है. वहीं अगर अचानक पीलिया हो जाए और लंबे समय तक ठीक न हो तो इसे भी बिल्कुल हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह भी लिवर कैंसर का गंभीर संकेत हो सकता है.

जब लिवर ठीक से काम नहीं कर पाता है तो शरीर को पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल पाती है. इसी कारण लगातार थकान, कमजोरी और सुस्ती महसूस होती है. यह थकान आराम करने के बाद भी दूर नहीं होती है जो कैंसर का चेतावनी संकेत हो सकता है.

जब लिवर ठीक से काम नहीं कर पाता है तो शरीर को पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल पाती है. इसी कारण लगातार थकान, कमजोरी और सुस्ती महसूस होती है. यह थकान आराम करने के बाद भी दूर नहीं होती है जो कैंसर का चेतावनी संकेत हो सकता है.

Published at : 08 Dec 2025 05:54 PM (IST)

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सर्दियों में क्या फायदेमंद समझ भर-भरकर खाते हैं गुड़, ज्यादा गुड़ खाने से होती हैं ये दिक्कतें?

सर्दियों में क्या फायदेमंद समझ भर-भरकर खाते हैं गुड़, ज्यादा गुड़ खाने से होती हैं ये दिक्कतें?



Disadvantages Of Eating Jaggery: भारत में मीठा खाना सिर्फ आदत नहीं, बल्कि एक तरह की परंपरा है. कई लोग इसे स्वाद के लिए खाते हैं, तो कई अपनी फिटनेस या डायबिटीज जैसी स्थितियों के कारण मीठे से दूरी बनाए रखते हैं. फिर भी थोड़ा-सा मीठा मन को अच्छा महसूस कराता है, और ज्यादातर लोग रिफाइंड शुगर की जगह ‘नेचुरल स्वीट’ चुनना ज्यादा हेल्दी मानते हैं. इन्हीं में से सबसे पसंद किया जाने वाला विकल्प है गुड़. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर दिन गुड़ खाना कितना सुरक्षित है? अगर आप बिना सोचे-समझे गुड़ खा रहे हैं, तो एक बार इसके नुकसान जानना जरूरी है.

क्यों गुड़ हमेशा सुरक्षित विकल्प नहीं होता?

गुड़ में आयरन, पोटैशियम, मैग्नीशियम और कई पोषक तत्व होते हैं, इसलिए इसे हेल्दी माना जाता है. लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि किसी भी चीज की अधिकता नुकसान करती है, गुड़ पर भी यही नियम लागू होता है. अगर आपको डायबिटीज जैसी लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्याएं हैं, तो गुड़ आपकी ब्लड शुगर और ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ा सकता है. इसलिए इसे हेल्दी समझकर ज़रूरत से ज्यादा खाना कई दिक्कतें पैदा कर सकता है.

गुड़ में भी है शुगर और काफी मात्रा में

कई लोग गुड़ को चीनी का सुरक्षित विकल्प मानकर रोजाना खाते हैं, लेकिन उन्हें शायद पता नहीं कि 100 ग्राम गुड़ में करीब 10 से 15 ग्राम फ्रक्टोज होता है. रोजाना गुड़ खाने से ब्लड शुगर बढ़ना बिल्कुल संभव है. यानी जरूरत से ज्यादा सेवन करने पर गुड़ भी चीनी की तरह ही काम करता है कि इसलिए खाने से पहले जरूर सोचें.

इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ सकता है

गुड़ गन्ने के रस से तैयार किया जाता है और इसे बनाने की प्रक्रिया हमेशा साफ-सुथरी नहीं होती. कई बार कच्चे रस की ठीक से सफाई न होने पर इसमें कीटाणु या अशुद्धियां रह जाती हैं. अगर गुड़ की गुणवत्ता खराब है या यह गंदे माहौल में बना है, तो इससे पेट के इंफेक्शन होने की संभावना रहती है. इसलिए हमेशा भरोसेमंद ब्रांड का गुड़ ही चुनें और एक बार में ज़रूरत से ज्यादा न खाएं.

खाने से एलर्जी भी हो सकती है

आमतौर पर गुड़ को सुरक्षित माना जाता है, लेकिन कुछ लोगों में इसकी अधिक मात्रा एलर्जिक रिएक्शन पैदा कर सकती है, जैसे पेट दर्द, सर्दी, खांसी, मतली, सिरदर्द या उल्टी.
इसलिए अगर गुड़ खाने के बाद शरीर में कोई असामान्य प्रतिक्रिया दिखे, तो इसे नियंत्रित मात्रा में ही लें.

वजन बढ़ने का भी खतरा

हेल्थ-कॉन्शियस लोग अक्सर सोचते हैं कि गुड़ खाने से उनकी डाइट पर असर नहीं पड़ेगा. लेकिन सच यह है कि गुड़ में फ्रक्टोज, ग्लूकोज और कुछ मात्रा में फैट भी मौजूद रहता है. सिर्फ 100 ग्राम गुड़ में लगभग 383 कैलोरी होती हैं, इसलिए इसका ज्यादा सेवन वजन बढ़ाने में योगदान दे सकता है.

ज्यादा गुड़ पाचन गड़बड़ कर सकता है

थोड़ी मात्रा में गुड़ इम्यूनिटी और मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाता है, लेकिन अधिक मात्रा में यह पाचन को बिगाड़ देता है. गुड़ शरीर में गर्मी पैदा करता है कि इससे पेट में जलन, कब्ज या असहजता हो सकती है. इसलिए गुड़ खाने का सही तरीका है, कम मात्रा, सही समय और गुणवत्ता पर ध्यान.

इसे भी पढ़ें- पित्त की पथरी अब बच्चों में भी आम, क्या है इसके पीछे की बड़ी वजह?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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15 साल उम्र होते ही दिखने लगते हैं ये 5 लक्षण, इग्नोर करने वालों को हो जाता है यह कैंसर

15 साल उम्र होते ही दिखने लगते हैं ये 5 लक्षण, इग्नोर करने वालों को हो जाता है यह कैंसर


दरअसल, बच्चों में कैंसर बहुत दुर्लभ होता है, इसलिए सामान्य बच्चों के लिए कोई रूटीन स्क्रीनिंग टेस्ट की सलाह नहीं दी जाती. लेकिन जिन बच्चों में जेनेटिक जोखिम होता है, उन्हें डॉक्टर जेनेटिक काउंसलिंग या टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं.

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी बच्चों में कैंसर के आम लक्षणों में गर्दन, सीने, बगल या पेट में नई गांठ या सूजन शामिल है. बिना वजह होने वाली बहुत ज्यादा थकान भी एक महत्वपूर्ण शुरुआती संकेत है.

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी बच्चों में कैंसर के आम लक्षणों में गर्दन, सीने, बगल या पेट में नई गांठ या सूजन शामिल है. बिना वजह होने वाली बहुत ज्यादा थकान भी एक महत्वपूर्ण शुरुआती संकेत है.

बिना कारण चोट लगना, आसानी से खून बहना या रुकने में दिक्कत, बिना वजह दर्द होना, चलने में लड़खड़ाना या लंगड़ाना भी गंभीर बीमारियों के संकेत हो सकते हैं.

बिना कारण चोट लगना, आसानी से खून बहना या रुकने में दिक्कत, बिना वजह दर्द होना, चलने में लड़खड़ाना या लंगड़ाना भी गंभीर बीमारियों के संकेत हो सकते हैं.

अनजान बुखार, लंबे समय तक ठीक न होने वाली बीमारी, बार-बार सिरदर्द के साथ उल्टी, आंखों या नजर में अचानक बदलाव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. आंख के बीच सफेद चमक दिखना भी एक चेतावनी है.

अनजान बुखार, लंबे समय तक ठीक न होने वाली बीमारी, बार-बार सिरदर्द के साथ उल्टी, आंखों या नजर में अचानक बदलाव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. आंख के बीच सफेद चमक दिखना भी एक चेतावनी है.

बिना कोशिश के तेजी से वजन कम होना भी एक आम लक्षण है. हालांकि ये संकेत कई सामान्य बीमारियों में भी दिख सकते हैं, लेकिन अगर लक्षण लगातार बने रहें तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं.

बिना कोशिश के तेजी से वजन कम होना भी एक आम लक्षण है. हालांकि ये संकेत कई सामान्य बीमारियों में भी दिख सकते हैं, लेकिन अगर लक्षण लगातार बने रहें तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं.

डॉक्टर पहले बच्चे का मेडिकल हिस्ट्री  और लक्षण समझते हैं, फिर शारीरिक जांच करते हैं. जरूरत पड़ने पर वे ब्लड टेस्ट, इमेजिंग टेस्ट या गांठ होने पर बायोप्सी करवाकर उसकी जांच कर सकते हैं.

डॉक्टर पहले बच्चे का मेडिकल हिस्ट्री और लक्षण समझते हैं, फिर शारीरिक जांच करते हैं. जरूरत पड़ने पर वे ब्लड टेस्ट, इमेजिंग टेस्ट या गांठ होने पर बायोप्सी करवाकर उसकी जांच कर सकते हैं.

Published at : 08 Dec 2025 03:11 PM (IST)

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साइलेंट किलर होती हैं ये 5 बीमारियां, बिना कोई वॉर्निंग दिए बना लेती हैं अपना शिकार

साइलेंट किलर होती हैं ये 5 बीमारियां, बिना कोई वॉर्निंग दिए बना लेती हैं अपना शिकार



Diseases With No Early Symptoms: अक्सर लोग मानते हैं कि शरीर हर समस्या का संकेत खुद दे देता है, लेकिन सच यह है कि कई गंभीर बीमारियां धीरे-धीरे बिना किसी जाहिर लक्षण के बढ़ती रहती हैं. इन्हें ही ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है. ये दिल, लीवर, किडनी और पैंक्रियाज जैसे अहम अंगों को चुपचाप नुकसान पहुंचाती रहती हैं. जब तक इनके लक्षण सामने आते हैं, तब तक कई बार शरीर को बड़ा नुकसान हो चुका होता है. इसलिए इन बीमारियों के बारे में जागरूक रहना और उनके जोखिम कारणों को समझना बेहद जरूरी है. नियमित हेल्थ चेकअप, सही लाइफस्टाइल और समय पर जांच ही इन छिपे हुए खतरों से बचाने का सबसे असरदार तरीका है. चलिए आपको 5 बीमारियों के बारे में बताते हैं. 

डब्ल्यूएचओ की चेतावनी

WHO का कहना है कि नॉन-कम्यूनिकेबल डिजीजेस आज दुनिया में सबसे बड़े छिपे हुए किलर हैं, जो हर साल करीब तीन-चौथाई मौतों के लिए जिम्मेदार हैं. इन बीमारियों में हार्ट की बीमारी, कैंसर, क्रॉनिक रेस्पिरेटरी डिजीज और डायबिटीज शामिल हैं, जो धीरे-धीरे महीनों या सालों में बढ़ती हैं और अचानक गंभीर रूप ले लेती हैं. इसमें

 फैटी लिवर रोग

जब लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है, तो शुरुआत में इसका कोई ख़ास लक्षण दिखाई नहीं देता. यही वजह है कि कई लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते. समय रहते ध्यान न देने पर यह सूजन, स्कारिंग और बाद में लिवर फेलियर तक का कारण बन सकता है.

कैसे बचें
संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, वजन कंट्रोल और समय-समय पर लिवर टेस्ट करवाना बेहद जरूरी है.

 हार्ट डिजीज

दिल की बीमारी दुनिया में मौत का सबसे बड़ा कारण है. कई बार शुरुआती चरणों में कोई लक्षण नजर नहीं आते. जैसे कोरोनरी आर्टरी डिजीज में नसें धीरे-धीरे संकरी होती जाती हैं, लेकिन दर्द या असुविधा महसूस नहीं होती और अचानक दिल का दौरा आ सकता है. साइलेंट हार्ट अटैक भी बेहद खतरनाक होता है, क्योंकि इसमें छाती में तेज दर्द नहीं होता, बल्कि थकान, हल्का दर्द या सांस फूलने जैसी मामूली बातें नज़र आती हैं, जिन्हें लोग इग्नोर कर देते हैं.

कैसे बचें

हार्ट-हेल्दी डाइट, व्यायाम, तनाव कम करना और नियमित हार्ट चेकअप सबसे जरूरी हैं.

 हाइपरटेंशन 

हाइपरटेंशन  को ‘साइलेंट किलर’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह अक्सर बिना किसी संकेत के बढ़ता रहता है. यह धीरे-धीरे रक्त वेसल्स को नुकसान पहुंचाता है और दिल का दौरा, स्ट्रोक और किडनी फेलियर तक का कारण बन सकता है.

कैसे बचें

रोज ब्लड प्रेशर चेक करना, नमक कम करना, एक्टिव रहना, शराब-तंबाकू से दूरी और तनाव कंट्रोल करना.

एचआईवी और एड्स

HIV इंफेक्शन शुरू में कोई खास लक्षण नहीं दिखाता. कई बार हल्का बुखार या गले में दर्द जैसे सामान्य संकेत दिखते हैं, जिन्हें लोग सामान्य वायरल समझकर नजरअंदाज़ कर देते हैं. लेकिन वायरस धीरे-धीरे इम्यून सिस्टम को कमजोर करता रहता है.

कैसे बचें

सेफ फिजिकल रिलेशन प्रैक्टिस करें, नियमित HIV टेस्ट करवाएं और पॉजिटिव होने पर ART ट्रीटमेंट समय पर शुरू करें. इससे वायरस नियंत्रण में रहता है और AIDS बनने से रोका जा सकता है.

टाइप-2 डायबिटीज

इस बीमारी में शरीर इंसुलिन पर ठीक से प्रतिक्रिया नहीं देता या पर्याप्त इंसुलिन बन नहीं पाता. शुरुआती समय में इसके कोई अलग लक्षण नहीं दिखते, लेकिन धीरे-धीरे यह दिल, किडनी, आंखों और नसों को नुकसान पहुंचाने लगता है.

कैसे बचें

संतुलित डाइट, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण और समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच से इस बीमारी को शुरुआती स्टेप्स में पकड़ा जा सकता है.

इसे भी पढ़ें- Low Calorie Snacks: मूंगफली या मखाना… वजन घटाने के लिए कौन-सा स्नैक्स बेस्ट? देख लें पूरी रिपोर्ट

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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40 से कम उम्र की महिलाओं में बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले, क्यों मिस होती हैं इसकी वॉर्निंग?

40 से कम उम्र की महिलाओं में बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले, क्यों मिस होती हैं इसकी वॉर्निंग?



Early Signs Of Heart Attack In Women: हाल के स्टडी में यह बात साफ सामने आई है कि 40 साल से कम उम्र की महिलाओं में हार्ट अटैक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. इसकी बड़ी वजह है लगातार तनावभरी लाइफस्टाइल, नींद की कमी और वे शुरुआती संकेत जिन्हें महिलाएं अक्सर नजरअंदाज कर देती हैं, जैसे लगातार थकान, सांस फूलना या थोड़ा चलने पर भारीपन महसूस होना. कई बार महिलाएं इन लक्षणों को सामान्य तनाव, कमजोरी या डाइट से जुड़ी समस्या समझ लेती हैं, जिससे इलाज में देरी हो जाती है.

डॉ. नवीन भामरी, वाइस चेयरमैन एवं HOD, कार्डियोलॉजी, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग ने TOI में लिखे अपने लेख में बताया कि अब हार्ट अटैक सिर्फ उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं रहा. डॉक्टरों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में युवा महिलाओं में हार्ट ब्लॉकेज और अटैक दोनों के मामले तेजी से बढ़े हैं. लंबे काम के घंटे, अनरेगुलर डेली रूटीन, कम नींद और शरीर के संकेतों को हल्के में लेना इस ट्रेंड की बड़ी वजहें हैं. सबसे मुश्किल बात यह है कि यंग महिलाएं अक्सर सोच भी नहीं पातीं कि जो वे महसूस कर रही हैं, उसका हार्ट से कोई संबंध हो सकता है.

किन संकेतों को महिलाएं कर देती हैं इग्नोर

  • बहुत ज्यादा थकान, जो वजह समझ न आए
  • चलते समय या सीढ़ियां चढ़ते वक्त सांस फूलना
  • जबड़े, गर्दन, पीठ या पेट के ऊपरी हिस्से में दबाव या तकलीफ
  • मतली, चक्कर आना या अचानक पसीना आना
  • सीने में दबाव या कसावट, भले ही वह बहुत तेज न हो

ये लक्षण अक्सर गैस, एंग्जायटी या सामान्य कमजोरी जैसे लगते हैं, इसलिए महिलाएं इन्हें गंभीरता से नहीं लेतीं.

क्यों 40 से कम उम्र की महिलाएं संकेतों को समझ नहीं पातीं?

तनाव, काम का दबाव और लाइफस्टाइल में ज्यादातर महिलाएं सोचती हैं कि सारी परेशानी लंबे काम के घंटे, नींद की कमी या मानसिक तनाव की वजह से है. दूसरा सबसे बड़ा कारण है कि उनको यह गलतफहमी होती है कि “मेरी उम्र में हार्ट की दिक्कत कैसे होगी?” यह सोच उन्हें अस्पताल जाने में देर करा देती है. तीसरा कारण  हार्मोनल दिक्कतें और एनीमिया. PCOS, थायरॉइड, और कम हीमोग्लोबिन यंग महिलाओं में आम हैं, ये हार्ट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं. चौथे कारण की बात करें, तो इसमें हेल्थ चेकअप न करवाना शामिल है. होता क्या है कि कई महिलाएं एक्टिव रहने को ही फिटनेस मान लेती हैं और नियमित जांचें नहीं करवातीं.  स्मोकिंग और गलत फिटनेस तरीके भी इसमें शामिल हैं. सिगरेट, क्रैश डाइट और ओवर-ट्रेनिंग भी हार्ट के लिए जोखिम बढ़ाते हैं. 

यह ट्रेंड क्यों चिंता बढ़ा रहा है?

भारत में युवाओं में हार्ट अटैक के मामलों में करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है. यंग महिलाएं अक्सर अपने लक्षणों को तनाव या गैस समझकर टाल देती हैं, जिससे इलाज देर से मिल पाता है.

 महिलाओं को क्या करना चाहिए?

सांस फूलना, असामान्य थकान या सीने, ऊपरी शरीर में दबाव जैसे संकेतों को कभी न नजरअंदाज करें, समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराएं, तनाव, नींद और लाइफस्टाइल को संतुलित रखें और कोई भी लक्षण दिखे तो तुरंत डॉक्टर से मिलें. 

इसे भी पढ़ें: सर्दियों में ऐसे बढ़ाएं बच्चों की इम्यूनिटी, बीमारियों से रहेंगे दूर

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मसूड़ों से आ रहा है खून या मुंह से बदबू? घर पर बनाएं ये देसी टूथपेस्ट

मसूड़ों से आ रहा है खून या मुंह से बदबू? घर पर बनाएं ये देसी टूथपेस्ट



Ayurvedic Toothpaste For Gums: आजकल बड़ी संख्या में लोग मसूड़ों के दर्द से परेशान हैं. आज के दौर में यह एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, जो शुरुआत में तो कम लेकिन बाद में इंसान के लिए खतरनाक साबित हो रही है. इस समस्या के पीछे हम खुद ही जिम्मेदार होते हैं, क्योंकि हमारी लाइफस्टाइल से जुड़ी चीजें जैसे खराब ओरल हाइजीन, ज्यादा मीठा खाना, स्मोकिंग और डेली ब्रश न करने की आदत इसको ट्रिगर करती है. इसके चलते मसूड़ों के आसपास प्लाक और बैक्टीरिया इकट्ठा हो जाते हैं, जिसके चलते सूजन, खून आना और बदबू की दिक्कत होने लगती है. अगर आप समय पर इसका इलाज नहीं करवाते हैं, तो स्थिति दांतों की जड़ों तक और उनके गिरने तक पहुंच जाती है. चलिए आपको बताते हैं कि आप इस तरह की स्थिति से कैसे बच सकते हैं.

नेचुरल तरीकों से देखभाल

ज्यादातर लोग दांत साफ करने के लिए टूथपेस्ट का यूज करते हैं, जिसमें फ्लोराइड, ट्राइक्लोसन और आर्टिफिशियल फ्रेगरेंस केमिकल मिलाए जाते हैं. इनका असर कुछ समय तक होता है, लेकिन समय के साथ ये दिक्कत देने लगते हैं. अगर आप लगातार इनका यूज करते हैं, तो मसूड़ों में जलन, मुंह की स्किन ड्रायनेस और एलर्जी जैसी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है. इससे खासतौर पर बच्चे और बड़े लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं. इसलिए सबसे जरूरी है कि नेचुरल तरीके से घर में बने टूथपेस्ट की तरफ देखा जाए, जो सेहत और दांतों के लिए पूरी तरह फायदेमंद हो.

घर पर कैसे बना सकते हैं टूथपेस्ट?

आप घर पर आसानी से आयुर्वेदिक टूथपेस्ट बना सकते हैं. इसके लिए आपको भारी-भरकम चीजों की जरूरत नहीं होती है. बस आपको कुछ चीजों की जरूरत होती है, जो असरदार टूथपेस्ट बनाने में आपकी मदद करें. इसमें 2 चम्मच नारियल तेल, 1 चम्मच बेकिंग सोडा, 1 चम्मच नीम पाउडर, 1/2 चम्मच दालचीनी पाउडर और 2-3 बूंद पेपरमिंट ऑयल लें. इनको मिक्स करके आप कांच की शीशी में भरकर रख लें. जब आप सुबह और रात में मंजन करते हैं, तो इसका यूज करें. यह आपके दांतों और मसूड़ों के लिए फायदेमंद है और आपकी सेहत को भी किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाता है.

घर के टूथपेस्ट के फायदे

घर पर तैयार किए गए इस देसी टूथपेस्ट में हर सामग्री किसी न किसी तरह से ओरल हेल्थ को फायदा पहुंचाती है. इसमें मौजूद बेकिंग सोडा दांतों की ऊपरी सतह पर जमा पीलापन और दाग हल्के करने में मदद करता है. नारियल तेल मुंह के भीतर मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को कम करता है, जबकि नीम पाउडर मसूड़ों को मजबूत बनाकर इंफेक्शन का खतरा घटाता है. दालचीनी अपने एंटीसेप्टिक गुणों से मुंह में होने वाले इंफेक्शन से लड़ती है, और पेपरमिंट तेल सांसों को ठंडक और ताजगी देता है. कुल मिलाकर, यह टूथपेस्ट पूरी तरह प्राकृतिक है और बिना किसी साइड इफेक्ट के दांत व मसूड़ों की देखभाल करता है.

इसे भी पढ़ें: Low Calorie Snacks: मूंगफली या मखाना… वजन घटाने के लिए कौन-सा स्नैक्स बेस्ट? देख लें पूरी रिपोर्ट

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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