बिस्तर से अचानक गिर जाए न्यू बॉर्न बेबी तो क्या करें? डॉक्टर से समझें लाइफ सेविंग टिप्स

बिस्तर से अचानक गिर जाए न्यू बॉर्न बेबी तो क्या करें? डॉक्टर से समझें लाइफ सेविंग टिप्स


Newborn Fall Prevention Tips: जब आप एक नवजात बच्चे की देखभाल कर रहे होते हैं, तो जिंदगी अचानक बहुत सतर्क हो जाती है. बच्चे के छोटे-छोटे हिलने-डुलने, हाथ-पैर चलाने और पलटने की कोशिशें कई बार ऐसे हादसों का कारण बन सकती हैं, जिनकी कल्पना भी डराने वाली होती है. अक्सर माता-पिता बच्चे को कुछ पल के लिए बिस्तर पर लिटा देते हैं, यह सोचकर कि वह अभी पलटेगा नहीं, लेकिन कई बार यही लापरवाही भारी पड़ जाती है और बच्चा अचानक नीचे गिर जाता है. ऐसे हालात में घबराना स्वाभाविक है, लेकिन सही जानकारी और समय पर लिया गया फैसला बच्चे की जान बचा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि क्या करना चाहिए. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

पटना स्थित ऑरो सुपर स्पेशलिटी क्लीनिक की डॉक्टर दीपा सिंह बताती हैं कि “अगर नवजात बिस्तर से गिर जाए, तो सबसे पहले खुद को शांत रखना बेहद जरूरी है. घबराहट में की गई जल्दबाज़ी नुकसान पहुंचा सकती है. बच्चे को तुरंत उठाने से पहले देखें कि वह रो रहा है या शांत है, सांस सामान्य है या नहीं और शरीर में कोई असामान्य हरकत तो नहीं हो रही. अगर बच्चा बेहोश हो, सुस्त पड़ा हो, सिर से खून आ रहा हो या झटके जैसा कुछ महसूस हो, तो यह मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है. ऐसी स्थिति में तुरंत नजदीकी अस्पताल या इमरजेंसी सेवा से संपर्क करना चाहिए.”

वे आगे कहती हैं कि यदि बच्चा होश में है और गंभीर चोट के लक्षण नजर नहीं आते, तो उसे धीरे से गोद में लेकर सांत्वना दें. बच्चे का रोना अक्सर डर और झटके की वजह से होता है उसे शांत करते समय उसके सिर, गर्दन, हाथ-पैर और शरीर के दूसरे हिस्सों को ध्यान से देखें, किसी जगह सूजन, नीला निशान या दर्द की प्रतिक्रिया तो नहीं है, इस पर नजर रखें. अगर कहीं से खून निकल रहा हो, तो साफ कपड़े या गॉज से हल्का दबाव डालें, लेकिन ज्यादा जोर न लगाएं.

इन बातों का रखना चाहिए ध्यान

डॉक्टरों के मुताबिक, एक साल से कम उम्र के बच्चे के गिरने के बाद भले ही वह ठीक दिखे, फिर भी डॉक्टर को जानकारी देना जरूरी होता है. कई बार चोट के लक्षण तुरंत सामने नहीं आते. कुछ घंटों बाद बच्चे का व्यवहार बदल सकता है. जैसे जरूरत से ज्यादा नींद आना, बार-बार उल्टी होना, तेज और असामान्य तरीके से रोना, दूध पीने से मना करना या सामान्य से अलग प्रतिक्रिया देना. ऐसे किसी भी बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कुछ खास संकेत ऐसे होते हैं, जिनमें बिना देर किए इमरजेंसी रूम जाना जरूरी हो जाता है. जैसे सिर के आगे वाले नरम हिस्से में उभार दिखना, नाक या कान से खून या पीला तरल निकलना, आंखों की पुतलियों का बराबर न होना, रोशनी या आवाज से असहज होना या बच्चे का संतुलन बिगड़ना. ये लक्षण अंदरूनी चोट या सिर पर गंभीर असर की ओर इशारा कर सकते हैं.

काफी महत्वपूर्ण होते हैं 24 घंटे

गिरने के बाद अगले 24 घंटे बच्चे के लिए सबसे अहम होते हैं. डॉक्टर की सलाह के अनुसार बच्चे को आराम करने देना चाहिए, लेकिन जरूरत पड़ने पर बीच-बीच में हल्के से जांच भी करते रहना चाहिए. अगर बच्चा सामान्य तरीके से सांस ले रहा है और ठीक से प्रतिक्रिया दे रहा है, तो उसे सोने दिया जा सकता है. हालांकि, अगर उसे जगाने में परेशानी हो या वह बिल्कुल प्रतिक्रिया न दे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. इस दौरान बच्चे को जोरदार खेल, उछल-कूद या किसी भी तरह की गतिविधि से दूर रखना चाहिए. शांत खेल, गोद में लेकर कहानी सुनाना या स्ट्रॉलर पर हल्की सैर जैसी चीजें सुरक्षित मानी जाती हैं. अगर बच्चा डे-केयर जाता है, तो वहां के स्टाफ को गिरने की जानकारी जरूर दें, ताकि वे अतिरिक्त सतर्कता बरत सकें.

इसे भी पढ़ें: Oversleeping Side Effects: कहीं जरूरत से ज्यादा तो नहीं सो रहे आप? हो सकती है यह गंभीर समस्या, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

लंबी उम्र चाहिए तो आज से ही शुरू करें ये काम, जानें देश के सबसे बड़े कार्डियोलॉजिस्ट के टिप्स

लंबी उम्र चाहिए तो आज से ही शुरू करें ये काम, जानें देश के सबसे बड़े कार्डियोलॉजिस्ट के टिप्स


Cardiologist Recommended Habits: लंबी और सेहतमंद जिंदगी के लिए किसी महंगे ट्रेंड या असाधारण मेहनत की ज़रूरत नहीं होती. असली राज़ छुपा है रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों और समझदारी भरे फैसलों में, जो समय के साथ शरीर को मजबूत बनाते हैं. इसको लेकर डॉक्टर नरेश त्रेहान चेयरमैन मेडिसिटी मेदान्ता हॉस्पिटल ने कुछ हेल्थ के मंत्र सुझाए हैं, जिन्हें अगर हम अपनी लाइफ में फॉलो करते हैं, तो हम एक बेहतर जिंदगी जी सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि उन्होंने लाइफ को लेकर कौन सा मंत्र दिया है, जिससे आप अपनी उम्र लंबी और हेल्दी दोनों कर सकते हैं. 

क्या कहते हैं डॉक्टर 

डॉक्टर नरेश त्रेहान ने जो लाइफ जीने के लिए 10 प्वाइंट्स बताए हैं, वे इस प्रकार हैं कि –

  • सबसे पहले आपको ध्यान रखना है कि आपको प्यास लगे न लगे पानी पीते रहना है. कम से कम दो लीटर पानी दिन में पीना जरूरी है. पानी पीने से आपके शरीर को तमाम तरह के फायदे होते हैं, इसलिए पानी पीते रहना चाहिए. 
  • दूसरी बात यह है कि ज्यादा से ज्यादा काम करते रहिए, हमेशा लेटे या फिर लेजी बॉय की तरह मत रहिए. चलिए, फिरिए काम करते रहिए. अगर आप एक्सरसाइज करते हैं, तो शरीर एक्टिव रहता है.

 

  • तीसरी सबसे जरूरी बात, खाना कम खाइए. जितना शरीर के लिए जरूरी हो, उतना ही खाना खाने की कोशिश कीजिए. इसमें भी आपको पौष्टिक भोजन खाना है. रात में कार्बोहाइट्रेट खाना बंद कर दीजिए.
  • चौथा मंत्र यह है कि वाहन का प्रयोग कम करना चाहिए. अगर आपको एक सीमित दूरी तक जाना है, तो कोशिश करिए कि पैदल जाना चाहिए, इससे शरीर में एनर्जी बर्न होती है. कोशिश करिए कि वाहन, लिफ्ट का प्रयोग कम हो.
  • पांचवा और सबसे जरूरी बात कि गुस्से पर आपको कंट्रोल करना है. इसके लिए आपको कम बोलना है, बोलने से पहले सोचिए कि आपको क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है.
  • छठा मंत्र यह है कि आपको धन का मोह छोड़ देना चाहिए, एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि उतना ही धन कमाना जरूरी है, जितना जीने के लिए जरूरी हो.
  • सातवां मंत्र यह है कि आपको अगर लाइफ में जो चाहिए वह नहीं मिल रहा है, तो निराश नहीं होना है. इसको साइड में रखकर अपनी लाइफ इंजॉय करना चाहिए.
  • आठवां यह है कि आपको अहंकार और इगो को त्यागकर अपनी लाइफ को अच्छे से जीना चाहिए. सबसे साथ मिलकर हंसी-खुशी से लाइफ जीना चाहिए.
  • नौवां मंत्र यह है कि अगर आपके बाल सफेद हो जाते हैं, तो यह मत सोचिए कि आपको इसको काला करना है. जिंदगी को स्मृतियों में जिए और यात्रा करिए और जिंदगी का आनंद लीजिए.
  • दसवां मंत्र यह है कि अपने छोटों से प्यार करिए, उनके साथ सहानुभूति रखिए और मिल-जुलकर उनके साथ रहिए, क्योंकि कभी-कभी वे आपको बहुत कुछ सिखा सकते हैं.

इसे भी पढ़ें: Oversleeping Side Effects: कहीं जरूरत से ज्यादा तो नहीं सो रहे आप? हो सकती है यह गंभीर समस्या, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator





Source link

अनियमित पीरियड्स और स्ट्रेस कितना खतरनाक, जानें PCOS कैसे बनता है रिश्ता टूटने की वजह?

अनियमित पीरियड्स और स्ट्रेस कितना खतरनाक, जानें PCOS कैसे बनता है रिश्ता टूटने की वजह?


आज भी बहुत से लोग PCOS का नाम सुनते ही डर जाते हैं. उन्हें लगता है कि यह कोई बहुत गंभीर या लाइलाज बीमारी है. असल में PCOS एक मैनेज होने वाली समस्या है, जिसे सही खान-पान, एक्सरसाइज़ और डॉक्टर की सलाह से कंट्रोल किया जा सकता है. जब पार्टनर या परिवार को इसकी सही जानकारी नहीं होती, तो डर और शक रिश्ते में कड़वाहट ला देते हैं.

PCOS में पीरियड्स का अनियमित होना आम बात है.लेकिन कई लोग इसे महिला की कमजोरी या बड़ी बीमारी समझ लेते हैं. बार-बार डॉक्टर के चक्कर, दवाइयां और शरीर में होने वाले बदलाव महिला को पहले ही परेशान कर देते हैं. ऊपर से अगर उसे जज किया जाए, तो मानसिक तनाव और बढ़ जाता है, जो रिश्ते पर सीधा असर डालता है.

PCOS में पीरियड्स का अनियमित होना आम बात है.लेकिन कई लोग इसे महिला की कमजोरी या बड़ी बीमारी समझ लेते हैं. बार-बार डॉक्टर के चक्कर, दवाइयां और शरीर में होने वाले बदलाव महिला को पहले ही परेशान कर देते हैं. ऊपर से अगर उसे जज किया जाए, तो मानसिक तनाव और बढ़ जाता है, जो रिश्ते पर सीधा असर डालता है.

Published at : 11 Jan 2026 10:53 AM (IST)

हेल्थ फोटो गैलरी



Source link

सोते वक्त 32 पर्सेंट लोगों की सांसें रोकती है यह बीमारी, जानें कैसे करा सकते हैं इसकी पहचान?

सोते वक्त 32 पर्सेंट लोगों की सांसें रोकती है यह बीमारी, जानें कैसे करा सकते हैं इसकी पहचान?


Breathing Problems During Sleep: स्लीप एपनिया एक आम लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जिसमें सोते समय बार-बार सांस रुकने लगती है. इसकी वजह से शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और दिल समेत कई अंगों पर बुरा असर पड़ता है. यह बीमारी दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है और हाई ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक और हार्ट डिजीज जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा देती है. इसके अलावा, यह दिमाग की काम करने की क्षमता को भी धीमा कर सकती है, कामकाज की क्षमता घटाती है और जीवन की क्वालिटी को प्रभावित करती है.

स्लीप एपनिया क्या है?

स्लीप एपनिया में नींद के दौरान बार-बार सांस रुकने या बहुत धीमी हो जाने की घटनाएं होती हैं. ये रुकावटें एक रात में सैकड़ों बार हो सकती हैं, जिससे फेफड़ों तक हवा का सही फ्लो नहीं हो पाता और शरीर में ऑक्सीजन का लेवल गिर जाता है. ऑक्सीजन की यह कमी हार्ट और अन्य अंगों पर दबाव डालती है और शरीर में सूजन को बढ़ावा देती है. साथ ही, सर्कैडियन रिदम भी टूट जाता है, जिससे याददाश्त, एकाग्रता और मेंटल क्लियरिटी पर निगेटिव असर पड़ता है.

स्लीप एपनिया के लक्षण

इस बीमारी की पहचान समय पर हो जाए तो इलाज आसान हो सकता है. इसके मुख्य लक्षण हैं

  • तेज खर्राटे लेना
  • दिन में जरूरत से ज्यादा नींद आना

इसके अलावा कुछ अन्य लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे

  • सुबह सिरदर्द
  • याददाश्त कमजोर होना
  • दिनभर थकान या सुस्ती
  • नींद से उठते समय गला सूखा या खराश होना

कई बार स्लीप एपनिया गंभीर हाई ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन की गड़बड़ी का कारण भी बन सकता है, इसलिए इन स्थितियों में इसकी जांच कराना जरूरी माना जाता हैच

जांच और इलाज

स्लीप एपनिया की पुष्टि पॉलीसोमनोग्राफी  से की जाती है. यह जांच नींद के दौरान की जाती है, जिसमें शरीर पर लगे सेंसर नींद की गहराई, सांस में रुकावट और ऑक्सीजन लेवल को रिकॉर्ड करते हैं. इसके आधार पर बीमारी की गंभीरता तय की जाती है. आजकल घर पर होने वाली स्लीप स्टडी की सुविधा भी उपलब्ध है, जो कम खर्चीली और ज्यादा सुविधाजनक होती है. आप इसकी जांच 500 के आसपास में करव सकते हैं.  इलाज की बात करें तो सीपीएपी मशीन स्लीप एपनिया के इलाज में क्रांतिकारी साबित हुई हैच यह मशीन सांस की नली को खुला रखने में मदद करती है. इसके अलावा सर्जरी, ओरल डिवाइस और सबसे अहम वजन कम करना भी लंबे समय तक असरदार समाधान माना जाता है.

भोपाल में 32 प्रतिशत लोग इससे पीड़ित

हाल ही में एम्स भोपाल और आईसीएमआर की एक क्मबाइंड स्टडी में यह निकल कर सामने आया कि मध्य प्रदेश में स्लिप की दिक्कत से करीब 32 प्रतिशत लोग जूझ रहे हैं. इसमें1080 मरीजों पर यह रिसर्च हुआ था. जिसमें 15-60 साल उम्र के लोगों को शामिल थे.इसमें निकल कर आया कि 66 प्रतिशत लोग बीपी से पीडित थे. इसमें 50 साल वालों की संख्या सबसे ज्यादा थी. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

हाल ही में X और यूट्यूब पर साझा किए गए एक वीडियो में डॉ. सुधीर कुमार, एमडी (MD) वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, अपोलो हॉस्पिटल्स, हैदराबाद ने खर्राटों की समस्या से जूझ रहे लोगों को एक आसान लेकिन असरदार सलाह दी है. उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को पीठ के बल सोने से बचना चाहिए. इसकी बजाय करवट लेकर, यानी साइड में सोना बेहतर होता है. इससे न सिर्फ खर्राटे कम हो सकते हैं, बल्कि हल्के से मध्यम स्तर के स्लीप एपनिया के लक्षणों में भी राहत मिल सकती है.

यह भी पढ़ें: ब्रश करते वक्त हो सकता है ये हादसा, दुनियाभर में ऐसे सिर्फ 10 मामले

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator





Source link

इन फूड प्रिजर्वेटिव्स से बढ़ सकता है कैंसर और डायबिटीज का खतरा, नई स्टडी में हुआ खुलासा

इन फूड प्रिजर्वेटिव्स से बढ़ सकता है कैंसर और डायबिटीज का खतरा, नई स्टडी में हुआ खुलासा


आजकल हम में से बहुत लोग पैकेटबंद और तैयार खाने वाले उत्पादों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं. ये खाने में सुविधाजनक होते हैं और आसानी से उपलब्ध भी होते हैं, लेकिन हाल ही में हुए बड़े शोध से पता चला है कि कुछ फूड आइटम्स में यूज होने वाले कुछ सामान्य प्रिजर्वेटिव्स यानी रासायनिक संरक्षक हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं. फ्रांस में किए गए और ब्रिटिश मेडिकल जर्नल और नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित दो बड़े अध्ययनों में 2009 से 2023 के बीच 1 लाख से ज्यादा वयस्कों के डाइट और स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण किया गया. यह अध्ययन न्यूट्रीनेट-सैंट समूह के तहत किया गया था और इसका मकसद यह समझना था कि लंबे समय तक इन प्रिजर्वेटिव्स का सेवन करने से कैंसर और टाइप 2 डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है या नहीं. 

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स क्या हैं?

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स वे होते हैं जो फैक्ट्री में तैयार किए जाते हैं. इनमें आमतौर पर बहुत ज्यादा चीनी, नमक और अनहेल्दी फैट्स होती है, जबकि जरूरी पोषक तत्व जैसे विटामिन और मिनरल्स बहुत कम होते हैं. इन प्रोडक्ट में अक्सर प्रिजर्वेटिव्स, इमल्सीफायर और स्टेबिलाइजर जैसे एडिटिव्स भी शामिल होते हैं. ये ऐसे रसायन हैं जो सामान्य घर के खाने में शायद ही यूज  होते हैं. 

शोध से क्या मिला?

शोध में 17 आम प्रिजर्वेटिव्स की जांच की गई, जिनमें पोटेशियम सॉर्बेट, सोडियम नाइट्राइट और एसीटिक एसिड जैसे पदार्थ शामिल हैं. ये सभी भारत में बिकने वाले पैकेटबंद फूड में आमतौर पर पाए जाते हैं. पोटेशियम सॉर्बेट का ज्यादा सेवन करने पर समग्र कैंसर का खतरा 14 प्रतिशत और स्तन कैंसर का खतरा 26 प्रतिशत बढ़ सकता है. सल्फाइट्स समग्र कैंसर का खतरा 12 प्रतिशत बढ़ा. सोडियम नाइट्राइट से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा 32  प्रतिशत ज्यादा पाया गया. पोटैशियम नाइट्रेट और एसीटिक एसिड का सेवन समग्र कैंसर और स्तन कैंसर से जुड़ा. 

हालांकि शोधकर्ताओं ने साफ किया कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन प्रिजर्वेटिव्स का सेवन सीधे तौर पर कैंसर का कारण है. इसके लिए और गहन अध्ययन की जरूरत है.लेकिन यह जरूर माना गया कि ये रसायन शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ा सकते हैं और आंत के माइक्रोबायोटा को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे कैंसर और अन्य रोगों का खतरा बढ़ सकता है. 

भारतीय प्रिजर्वेटिव्स

भारत में पैकेटबंद फूड का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि ये निष्कर्ष इस बात को और पुष्ट करते हैं कि आधुनिक डाइट पैटर्न, जो ज्यादातर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाने पर आधारित है, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है. विशेषज्ञ का कहना है कि इन परिणामों के आधार पर तुरंत नियामक समीक्षा और जनता में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है. उनका कहना है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पहले ही मेटाबॉलिज्म और मानसिक विकारों, असमय मृत्यु समेत लगभग 32 स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े पाए जा चुके हैं. 

कैसे नुकसान पहुंचाते हैं प्रिजर्वेटिव्स?

फूड आइटम्स में प्रिजर्वेटिव्स मुख्य रूप से उन्हें खराब होने से रोकने और उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए मिलाए जाते हैं. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये खाने की प्राकृतिक संरचना को भी प्रभावित कर सकते हैं.जब यह संरचना खराब हो जाती है, तो स्वस्थ पोषक तत्व भी हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं. कई प्रिजर्वेटिव्स लंबे समय तक शरीर में कई स्तर की सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव और आंत के माइक्रोबायोटा में गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं.

क्या किया जा सकता है?

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि नियामकों को प्रिजर्वेटिव्स के यूज पर कड़ी निगरानी और नियम बनाने चाहिए. तब तक, उपभोक्ताओं को जितना संभव हो ताजा और कम प्रोसेस्ड फूड लेने की सलाह दी जाती है. दुनिया के कई देशों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को लेकर नीतिगत कार्रवाई शुरू हो चुकी है. ब्रिटेन में बच्चों की सुरक्षा के लिए टीवी और ऑनलाइन विज्ञापन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. अमेरिका ने अपनी डाइट दिशानिर्देश अपडेट किए और लोगों से पैकेटबंद उत्पादों के बजाय ताजे और कम प्रोसेस्ड फूड को प्राथमिकता देने की सलाह दी. 

यह भी पढ़ें: बच्चों के जन्म के समय शरीर पर क्यों होता है जन्मदाग, इसको लेकर डॉक्टर्स क्या बताते हैं?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

छोटे बच्चों से ये एक्टिविटीज कराईं तो ब्रेन होगा बूस्ट, एक्सपर्ट्स भी देते हैं यह सलाह

छोटे बच्चों से ये एक्टिविटीज कराईं तो ब्रेन होगा बूस्ट, एक्सपर्ट्स भी देते हैं यह सलाह



छोटे बच्चों से ये एक्टिविटीज कराईं तो ब्रेन होगा बूस्ट, एक्सपर्ट्स भी देते हैं यह सलाह



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp