छोटे बच्चों से ये एक्टिविटीज कराईं तो ब्रेन होगा बूस्ट, एक्सपर्ट्स भी देते हैं यह सलाह

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हमारी रोज की ये 5 गलतियां धीरे-धीरे बढ़ा देती हैं ब्लड प्रेशर, एक्सपर्ट ने किया खुलासा

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कार या गाड़ी में बैठते ही आने लगती है उल्टी, जानें किस बीमारी में होता है ऐसा?

कार या गाड़ी में बैठते ही आने लगती है उल्टी, जानें किस बीमारी में होता है ऐसा?


ट्रैवल करना किसी के लिए मजेदार होता है, लेकिन कई लोगों के लिए यह एक परेशानी का कारण भी बन जाता है.खासकर कार, बस, ट्रेन, जहाज या हवाई यात्रा के दौरान बहुत से लोग उल्टी, चक्कर या बेचैनी महसूस करते हैं. इसे मेडिकल भाषा में मोशन सिकनेस कहा जाता है. हर तीन में से एक व्यक्ति कभी न कभी इस समस्या का सामना करता है.

मोशन सिकनेस सिर्फ बच्चों या बुजुर्गों की समस्या नहीं है. यह किसी भी उम्र के इंसान को हो सकती है और सफर शुरू होते ही महसूस होने लगती है. कई लोग सोचते हैं कि बस मुझे ऐसा क्यों होता है. लेकिन इसके पीछे शरीर और दिमाग का असर छुपा होता है. तो आइए जानते हैं कि कार या गाड़ी में बैठते ही उल्टी क्यों आने लगती है और किस बीमारी में ऐसा होता है. 

मोशन सिकनेस क्या है?

मोशन सिकनेस एक ऐसी स्थिति है जिसमें सफर के दौरान आपको मतली, उल्टी, चक्कर, सिर दर्द या बेचैनी महसूस होती है. यह समस्या तब होती है जब दिमाग, आंखें और कान एक जैसी जानकारी नहीं भेजते हैं. जैसेअगर आप कार में बैठकर नीचे किताब पढ़ रहे हैं या मोबाइल देख रहे हैं, तो आपकी आंखें दिमाग को यह बताती हैं कि आप हिल नहीं रहे हैं. लेकिन आपके कान के अंदर बैलेंस बनाने वाला सिस्टम दिमाग को बताता है कि शरीर चल रहा है.इस तरह सिग्नल्स में विरोधाभास होने पर शरीर सोचता है कि कुछ गलत या जहरीली चीज अंदर चली गई है और इसका नतीजा उल्टी होता है. 

दिमाग और संतुलन का कैसे है संबंध
 
हमारे शरीर में ऐसे छोटे-छोटे सेंसर होते हैं जिन्हें रिसेप्टर्स कहा जाता है. ये सेंसर हमारे आंखों, कान और शरीर में मौजूद बदलावों को महसूस करते हैं और दिमाग को संदेश भेजते हैं. जब हम गाड़ी, ट्रेन या हवाई जहाज में सफर करते हैं, तो आंखें, कान और शरीर से मिलने वाली जानकारी एक जैसी नहीं होती है. इससे वेस्टिबुलर सिस्टम यानी संतुलन बनाने वाला सिस्टम परेशान हो जाता है. दिमाग का वह हिस्सा जो ब्रेन स्टेम और हाइपोथैलेमस कहलाता है, तेज हो जाता है. जिसके कारण मतली, चक्कर और कभी-कभी उल्टी आती है. इसलिए कहा जा सकता है कि मोशन सिकनेस संतुलन प्रणाली की गड़बड़ी का परिणाम है. 
 
सफर के दौरान उल्टी क्यों होती है?

सिर्फ गाड़ी में हिलना ही कारण नहीं है. पेट की स्थिति और सफर का तरीका भी बहुत मायने रखता है. खाली पेट सफर में पेट की वोसस नर्व ज्यादा सक्रिय हो जाती है. इससे चक्कर और बेचैनी महसूस होती है. इसके अलावा भारी खाना के बाद सफर यानी पेट भरा होने पर भी उल्टी की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए सफर से पहले हल्का खाना ही लेना बेहतर है. साथ ही, ऊबड़-खाबड़ सड़कें, पहाड़ी रास्ते, गाड़ी के झटके, या गाड़ी में दुर्गंध जैसी चीजें भी मोशन सिकनेस बढ़ा सकती हैं. डॉक्टरों के अनुसार, जब हम गाड़ी में बैठते हैं, तो कान के अंदर का फ्लूइड हिलता है, जिससे गर्दन और खोपड़ी में कंपन पैदा होता है. यही कंपन दिमाग में संतुलन बिगाड़ता है और उल्टी या चक्कर का कारण बनता है. 

मोशन सिकनेस से बचने के आसान उपाय

1. भारी भोजन से बचें – सफर से पहले हल्का खाना ही खाएं. 

2. खाली पेट सफर न करें – हल्का स्नैक्स या फल ले सकते हैं. 

3. डॉक्टर की सलाह – दवा की जरूरत पड़े तो डॉक्टर की सलाह से लें. 

4. चलती गाड़ी में सोने से बचें – सोते समय संतुलन बिगड़ सकता है. 

5. गाड़ी रोकें – मतली महसूस होते ही गाड़ी रोकें. मोबाइल या किताब से ध्यान भटकाने से बचें. 

6. शरीर की स्थिति स्थिर रखें – सिर, कंधे, कमर और घुटनों की हलचल कम करें. 

7. आगे की सीट पर बैठे या खुद गाड़ी चलाएं – ऐसा करने से संतुलन बनाए रखना आसान होता है. निकोटीन और धूम्रपान से बचें. 

8. हल्का म्यूजिक सुनें – इससे दिमाग शांत होता है और मतली कम होती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अब तेलंगाना में बच्चों के सिरप में मिला इथाइलीन ग्लाइकॉल, जानें कितना जहरीला होता है यह केमिकल

अब तेलंगाना में बच्चों के सिरप में मिला इथाइलीन ग्लाइकॉल, जानें कितना जहरीला होता है यह केमिकल


बच्चों की सेहत से जुड़ा एक बहुत गंभीर मामला सामने आया है. तेलंगाना औषधि नियंत्रण प्रशासन ने अल्मोंट-किड सिरप की बिक्री और इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगा दी है. इस सिरप को आमतौर पर बच्चों में एलर्जी, एलर्जिक बुखार और अस्थमा के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है. जांच में इस दवा में इथाइलीन ग्लाइकॉल नाम का खतरनाक और जहरीला रसायन पाए जाने की पुष्टि हुई है. यह कार्रवाई केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन कोलकाता से प्राप्त लैब रिपोर्ट के आधार पर की गई है.

रिपोर्ट में पुष्टि हुई है कि बिहार स्थित कंपनी ट्रिडस रेमेडीज की ओर से निर्मित बैच नंबर AL-24002 की यह दवा मिलावटी और जानलेवा है. आमतौर पर यह सिरप बच्चों में एलर्जी, हेवी फीवर और अस्थमा के इलाज के लिए डॉक्टरों की ओर से लिखी जाती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि इथाइलीन ग्लाइकॉल केमिकल जहरीला होता है.

क्या है इथाइलीन ग्लाइकॉल और कितना जहरीला है ये केमिकल?

एक्सपर्ट्स के अनुसार इथाइलीन ग्लाइकॉल एक इंडस्ट्रियल केमिकल है, जिसका इस्तेमाल एंटी फ्रीज, कूलेंट, ब्रेक फ्लूड और इंजन से जुड़े उत्पादों में किया जाता है. यह दिखने में मीठा और रंगहीन होता है, लेकिन शरीर में पहुंचने पर बहुत खतरनाक साबित होता है. यह किडनी को खतरनाक नुकसान पहुंचा सकता है, नर्वस सिस्टम पर असर डालता है और कई मामलों में मौत का कारण भी बन सकता है. वहीं बच्चों में इसका असर और ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि उनका शरीर और वजन कम होता है. ऐसे में तेलंगाना औषधि नियंत्रण प्रशासन ने राज्य के सभी ड्रग इंस्पेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि वे मेडिकल स्टोर, थोक विक्रेताओं, दवा डीलरों और हॉस्पिटल से इस बैच का स्टॉक तुरंत जब्त करें. वहीं इसे लेकर साफ निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी हालत में इस सिरप की बिक्री न होने पाए. पेरेंट्स से भी अपील की गई है कि अगर उनके पास अल्मोंट-किड सिरप बैच नंबर AL-24002 मौजूद है, तो उसे बच्चों को बिल्कुल न दें और तुरंत दवा नियंत्रण विभाग को इसकी सूचना दें.

कंपनी के खिलाफ शुरू हुई सख्त कानूनी कार्रवाई

मिलावटी दवा बनाने और सप्लाई करने के मामले में संबंधित कंपनी के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है. अधिकारियों का कहना है कि बच्चों की दवाओं में इस तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी. वहीं DCA ने यह भी कहा है कि जनता की हेल्थ से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है. आपको बता दें कि बीते समय में इथाइलीन और डाई एथिलीन ग्लाइकॉल से मिलावटी कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं. मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में ऐसे हादसों ने देश की दवा निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं. वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस केमिकल को लेकर गंभीर चेतावनी जारी कर चुका है.

ये भी पढ़ें-बच्चों के जन्म के समय शरीर पर क्यों होता है जन्मदाग, इसको लेकर डॉक्टर्स क्या बताते हैं?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कब्ज की समस्या कब बन जाती है कैंसर, कब हो जाना चाहिए सावधान?

कब्ज की समस्या कब बन जाती है कैंसर, कब हो जाना चाहिए सावधान?


आज की तेज रफ्तार जिंदगी, गलत खान-पान, तनाव और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण कब्ज की समस्या बहुत आम हो गई है. दुनिया भर में लाखों लोग रोजाना इस परेशानी से जूझ रहे हैं. कभी-कभार कब्ज होना आम बात है और आमतौर पर इसे लोग नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन जब यही समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह चिंता का कारण बन सकती है. अक्सर लोगों के मन में यह डर बैठ जाता है कि कहीं उनकी लंबे समय से चली आ रही कब्ज आंत या कोलन कैंसर का संकेत तो नहीं, ज्यादातर मामलों में कब्ज का कारण कैंसर नहीं होता, बल्कि यह हमारी लाइफस्टाइल और खान-पान से जुड़ी समस्या होती है. लेकिन कुछ विशेष स्थितियों में कब्ज किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकती है. ऐसे में आइए आज हम आपको बताते हैं कि कब्ज की समस्या कब कैंसर बन जाती है और कब इससे सावधान हो जाना चाहिए. 

कब्ज क्या होता है?

कब्ज का मतलब है जब मल त्याग नियमित न हो, मल बहुत सख्त हो, मल त्याग में जोर लगाना पड़े और हफ्ते में 2–3 बार से कम शौच हो. जब यह समस्या 3 हफ्ते या उससे ज्यादा समय तक बनी रहे, तो इसे दीर्घकालिक या क्रोनिक कब्ज कहा जाता है. इसके सामान्य लक्षण हफ्ते में 2 या उससे कम बार शौच जाना, मल का बहुत सख्त या सूखा होना, जोर लगाने पर भी पूरी तरह पेट साफ न होना और पेट में भारीपन या गैस है. अधिकतर मामलों में कब्ज के कारण फाइबर की कमी वाला खाना, पूरी तरह पानी न पीना, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, लंबे समय तक बैठकर काम करना, कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट और चिड़चिड़ा आंत्र सिंड्रोम (IBS) है. 

कब्ज की समस्या कब कैंसर बन जाती है

ज्यादातर मामलों में कब्ज कैंसर नहीं बनती है. लेकिन कुछ खास स्थितियों में लंबे समय तक रहने वाली कब्ज कैंसर का संकेत हो सकती है. कब्ज तब खतरनाक मानी जाती है जब कब्ज 3 हफ्तों से ज्यादा समय से बनी हो, अचानक मल त्याग की आदत बदल जाए, मल में खून आए या मल काला हो, बिना कारण वजन कम हो रहा हो. लगातार थकान महसूस हो, पेट में लगातार दर्द, भारीपन या गांठ लगे, कब्ज और दस्त बारी-बारी से हो रहे हों. ऐसे मामलों में कोलन कैंसर की जांच जरूरी हो जाती है. कोलन कैंसर बढ़ने पर आंत का रास्ता छोटा कर देता है, इससे मल आगे नहीं बढ़ पाता है. जिसके कारण लगातार कब्ज, दर्द और खून की समस्या होती हबै लेकिन कैंसर बहुत बढ़ने के बाद ही कब्ज पैदा करता है. कैंसर तभी कब्ज पैदा करता है जब ट्यूमर काफी बड़ा हो जाए, आंत का रास्ता आंशिक रूप से बंद होने लगे यानी शुरुआत में सिर्फ कब्ज होना, आमतौर पर कैंसर का संकेत नहीं होता है. 

कब इससे सावधान हो जाना चाहिए

1. कब्ज 3 हफ्तों से ज्यादा समय तक बनी रहे. खानपान बदलने, पानी पीने या घरेलू उपायों से भी ठीक न हो. 

2. मल में खून दिखाई दे, लाल खून या काले रंग का मल, यह अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है. 

3. पेट में लगातार या तेज दर्द हो. खासकर दर्द रोज-रोज बना रहे. पेट में भारीपन या गांठ जैसा महसूस होना. 

4. बिना वजह वजन कम होने लगे. डाइट बदले बिना वजन घटना खतरे का संकेत है. 

5. बहुत ज्यादा थकान या कमजोरी महसूस हो. आराम करने के बाद भी थकान ठीक न हो. 

6. मल त्याग की आदत अचानक बदल जाए. पहले सब ठीक था, अब अचानक कब्ज रहने लगी या कब्ज और दस्त बार-बार बदल रहे हों. 

7. 45–50 साल की उम्र के बाद पहली बार लगातार कब्ज हो. इस उम्र में नई पाचन समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. 

यह भी पढ़ें : क्या ठंड में रोज नहाना सेहत के लिए जरूरी है? जानिए एक्सपर्ट्स की राय

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बच्चों के जन्म के समय शरीर पर क्यों होता है जन्मदाग, इसको लेकर डॉक्टर्स क्या बताते हैं?

बच्चों के जन्म के समय शरीर पर क्यों होता है जन्मदाग, इसको लेकर डॉक्टर्स क्या बताते हैं?


जब किसी बच्चे के जन्म के साथ ही उसके शरीर पर दाग या निशान नजर आता है, तो उसे बर्थमार्क यानी जन्मदाग कहा जाता है. यह निशान कई रंगों के हो सकते हैं, जिनमें हल्के भूरे, गहरे काले, लाल या नीले रंग शामिल है. वहीं यह दाग चेहरे, हाथ, पैर या शरीर के किसी भी हिस्से पर दिख सकता है. कई बार यह निशान पूरी जिंदगी रहता है, तो कई मामलों में समय के साथ हल्का पड़ जाता है या खत्म भी हो जाता है.

ऐसे में अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर बच्चों के शरीर पर जन्म से ही ऐसे निशान क्यों होते हैं और क्या इसका किसी बीमारी से कोई कनेक्शन होता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि बच्चों के जन्म के समय शरीर पर जन्मदाग क्यों होता है और इसे लेकर डॉक्टर्स क्या बताते हैं.

क्यों होते हैं बर्थमार्क?

डॉक्टर्स के अनुसार, ज्यादातर बर्थमार्क अपने आप होते हैं और इनका किसी भी बीमारी से कोई कनेक्शन नहीं होता है. वहीं कई बार यह भी माना जाता है कि प्रेग्नेंसी के दौरान मां के कुछ गलत खाने-पीने या किसी गलती की वजह से बर्थमार्क होता है, हालांकि यह मानना सही नहीं है. आपको बता दें कि करीब 80 प्रतिशत नवजात शिशु बर्थमार्क के साथ पैदा होते हैं. इसके अलावा बहुत सारे मामलों में बर्थमार्क का कोई स्पष्ट कारण भी सामने नहीं आता है. वहीं माना जाता है कि बहुत कम मामलों में यह वंशानुगत भी हो सकते हैं.

कितने प्रकार के होते हैं बर्थमार्क?

बर्थमार्क आमतौर पर वस्कुलर और पिगमेंट दो तरह के होते हैं. इनमें वस्कुलर बर्थमार्क तब बनते हैं, जब स्किन के अंदर ब्लड सेल्स सही तरीके से विकसित नहीं हो पाती है. वस्‍कुलर बर्थमार्क में मैकुलर स्‍टेन भी आता है, मैकुलर स्टेन हल्के लाल रंग के पैच होते हैं, जो माथे, पलकों, नाक या गर्दन के पीछे दिख सकते हैं. वस्‍कुलर बर्थमार्क हेमंगिओमा और पोर्ट वाइन स्टेन भी आते हैं. हेमंगिओमा लाल या नीले रंग के उभरे हुए निशान होते हैं, जो स्किन की सतह पर या अंदर की ओर हो सकते हैं. वहीं पोर्ट वाइन स्टेन में त्वचा पर गहरे लाल या वाइन रंग का दाग दिखता है, जो उम्र के साथ गहरा भी हो सकता है. जबकि पिगमेंटेड बर्थमार्क स्किन में ज्यादा पिगमेंट बनने की वजह से होते हैं, जिससे वहां का रंग बाकी स्किन से अलग दिखने लगता है.

जन्मदाग को लेकर क्या कहते हैं डॉक्टर्स?

जन्मदाग को लेकर डॉक्टर्स का कहना है कि कई बर्थमार्क समय के साथ खुद ही हल्के पड़ जाते हैं या फिर पूरी तरह खत्म हो जाते हैं, खासकर मैकुलर स्टेन और हेमंगिओमा बर्थमार्क. हालांकि कुछ निशान स्थायी भी होते हैं. वहीं आमतौर पर बर्थमार्क सेहत के लिए खतरनाक नहीं होते, लेकिन कभी-कभी यह लोगों के कॉफिडेंस पर असर डाल सकते हैं. 

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