क्या ठंड में प्रेग्नेंट महिलाओं को नहीं खाने चाहिए अमरूद, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?

क्या ठंड में प्रेग्नेंट महिलाओं को नहीं खाने चाहिए अमरूद, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?



Immunity Boosting Foods In Pregnancy: अमरूद दुनियाभर  में एक बेहद लोकप्रिय फल है. इसका मीठा–खट्टा स्वाद न सिर्फ टेस्ट बढ़ाता है बल्कि कई प्रेग्नेंट महिलाओं को भी खूब पसंद आता है. इसमें विटामिन C और कई जरूरी मिनरल भरपूर मात्रा में मिलते हैं. लेकिन कई लोगों को यह चिंता रहती है कि अमरूद शरीर में गर्मी बढ़ाता है  तो क्या गर्भावस्था में इसे खाना सुरक्षित है?. चलिए आपको बताते हैं कि क्या महिलाओं को ठंड में अमरूद खाना चाहिए या नहीं और इसको लेकर डॉक्टर क्या कहते हैं. 

क्या कहते हैं डॉक्टर?

एक इंस्टाग्राम वीडियो में गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मनीषा मीना गुप्ता बताती हैं कि सर्दियों के दौरान गर्भवती महिलाओं को अमरूद जरूर शामिल करना चाहिए. उनके अनुसार, ठंड के मौसम में अमरूद सबसे फायदेमंद फलों में से एक है. अमरूद में विटामिन C अच्छी मात्रा में होता है, जो शरीर में आयरन के ऑब्जर्व को बेहतर बनाता है और इम्युनिटी को मजबूत करता है. इससे प्रेग्नेंट महिलाओं को सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं से बचाव मिलता है. इसके साथ ही, अमरूद में पानी की मात्रा भी काफी होती है, जिससे शरीर हाइड्रेट रहता है और डिहाइड्रेशन की दिक्कत नहीं होती

 


क्या गर्भवती महिलाओं के लिए अमरूद खाना फायदेमंद?

अमरूद में विटामिन C, A, E और B2 भरपूर मिलते हैं. विटामिन C की मात्रा तो इसमें इतने अधिक होती है कि यह संतरे और ग्रेपफ्रूट तक से आगे है. इसमें कॉपर, कैल्शियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, मैंगनीज और थायमिन जैसे पोषक तत्व भी पाए जाते हैं. अमरूद में मौजूद आयरन गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का खतरा कम करता है और शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर संतुलित रखने में मदद करता है.

अमरूद में मौजूद एस्कॉर्बिक एसिड (विटामिन C) महिलाओं की इम्युनिटी और  स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है. अमरूद में विटामिन B9 और फोलिक एसिड जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी होते हैं, जो गर्भ में पल रहे शिशु के नर्वस सिस्टम के विकास और हार्ट–संबंधी बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं. इसमें मौजूद नेचुरल कैल्शियम गर्भवती महिलाओं और शिशु दोनों के लिए जरूरी है. इन सभी लाभों के बावजूद, महिलाओं को इसे खाते समय कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए, ताकि कोई असहजता न हो.

गर्भवती महिलाओं के लिए अमरूद खाने के फायदे

ब्लड प्रेशर को स्थिर रखने में मदद

अमरूद ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है और ब्लड क्लॉट बनने की संभावना भी कम करता है. गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर का ध्यान रखना ज़रूरी होता है, ताकि प्रीमेच्योर डिलीवरी या मिसकैरेज का खतरा कम रहे.

 ब्लड कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने में सहायक

अमरूद में मौजूद फाइबर खून में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है. हाई कोलेस्ट्रॉल गर्भवती महिलाओं और भ्रूण दोनों के लिए जोखिम बढ़ाता है, खासकर हार्ट रोगों का.

कब्ज और बवासीर में आराम

अमरूद का फाइबर कब्ज जैसी आम समस्या को कम करता है और बवासीर की परेशानी से भी बचाता है. लेकिन गर्भवती महिलाओं के लिए एक सलाह अमरूद खाते समय बीज निकालकर केवल गूदा खाना बेहतर माना जाता है.

मांसपेशियों और नसों को आराम देता है

अमरूद में मैग्नीशियम मौजूद होता है, जो मांसपेशियों और नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करने में मदद करता है. इस वजह से प्रेग्नेंट महिलाओं में अचानक होने वाले क्रैम्प्स की समस्या कम हो सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पुरानी प्लास्टिक की बोतल में पीते हैं पानी तो हो जाएं सावधान, धीरे-धीरे मौत आ रही करीब

पुरानी प्लास्टिक की बोतल में पीते हैं पानी तो हो जाएं सावधान, धीरे-धीरे मौत आ रही करीब



Plastic Bottle Chemicals Side Effects: प्लास्टिक की बोतल से पानी पीने की आदत दिखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसका छिपा असर काफी बड़ा होता है. रोजमर्रा की भागदौड़ में हम अक्सर रास्ते में पानी की प्लास्टल-पैक्ड बोतल खरीद लेते हैं या फिर पुरानी बोतल को धोकर बार-बार इस्तेमाल करते रहते हैं. अगर आप भी ऐसा करते हैं, तो अब इसे रोकने का समय आ गया है. ये बोतलें देखने में भले हार्मलैस लगें, लेकिन इनमें छिपा खतरा हमारी सेहत और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुंचा रहा है.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन बोतलों से हमारे पीने के पानी में माइक्रोप्लास्टिक पहुंच जाते हैं. माइक्रोप्लास्टिक ऐसे बेहद छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो 5 मिमी से भी छोटे होते हैं. ये हमारे पानी के सोर्स में कई तरीकों से घुस जाते हैं, पुराने प्लास्टिक के टूटने से, कपड़ों के माइक्रोफाइबर बहने से और खुद बोतलों के घिसने-टूटने के कारण. आज हालत ये है कि समुद्र ही नहीं, नदियां, झीलें और यहां तक कि हवा भी माइक्रोप्लास्टिक से भरी पड़ी है.

माइक्रोप्लास्टिक शरीर पर कैसे असर करते हैं?

जब हम प्लास्टिक की बोतल से पानी पीते हैं, तो हम अनजाने में इन सूक्ष्म कणों को भी निगल लेते हैं. कई अंतरराष्ट्रीय स्टडीज में बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए हैं, जिससे इनके स्वास्थ्य प्रभाव को लेकर गंभीर चिंताएं उठी हैं. प्लास्टिक से जुड़े कुछ केमिकल तो शरीर में घुसकर और भी नुकसान करते हैं, जैसे हार्मोनल असंतुलन, मोटापा बढ़ना, इंसुलिन प्रतिरोध, प्रजनन क्षमता पर असर और कुछ मामलों में कैंसर तक. हालांकि इन कणों के लंबे समय तक असर पर रिसर्च जारी है, लेकिन अभी तक के प्रमाण बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में सूजन, ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस, और हानिकारक रसायनों के ट्रांसफर का कारण बन सकते हैं.

हम क्या कर सकते हैं?

National Institutes of Health (NIH)ने इसको लेकर रिपोर्ट जारी की थी. चलिए आपको बताते हैं कि आप इससे बचने के लिए क्या कर सकते हैं. इसमें  सबसे पहले, प्लास्टिक की बोतल छोड़कर स्टील, ग्लास या बीपीए फ्री बोतलों का इस्तेमाल करें. दूसरा, ऐसे वॉटर फिल्ट्रेशन सिस्टम का उपयोग करें, जो पानी में मौजूद प्रदूषकों खासतौर पर माइक्रोप्लास्टिक को कम कर सके. हर फिल्टर परफेक्ट नहीं होता, लेकिन बेहतर टेक्नोलॉजी वाला फिल्टर माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा काफी घटा देता है.प्लास्टिक बोतलों से होने वाला पर्यावरणीय नुकसान भी किसी खतरे से कम नहीं है. हर एक इस्तेमाल के बाद फेंकी गई बोतल समुद्री जीवों, नदियों और पूरे इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचाती है और प्लास्टिक कचरे की समस्या को और बढ़ाती है.

इसे भी पढ़ें: Tips For Regular Pooping: जॉब पर जाने से पहले कैसे एकदम साफ करें पेट? ये टिप्स करेंगे आपकी मदद

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ग्लाइकोलिक एसिड क्यों कहलाता है लिक्विड गोल्ड? डर्मेटोलॉजिस्ट से जानें 5 हैरान करने वाले फायदे

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8 घंटे की लगातार नींद या दो हिस्सों में सोना, क्या है सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद?

8 घंटे की लगातार नींद या दो हिस्सों में सोना, क्या है सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद?


कुछ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि लगातार 7 से 8 घंटे की नींद सबसे नेचुरल और रेस्टोरेटिव मानी जाती है. क्योंकि शरीर सभी नींद के लेवल जैसे डीप स्लीप और रेम से आराम से गुजरता है, इससे मेमोरी, इम्यूनिटी, मूड और एनर्जी में सुधार होता है.

जब वहीं कुछ लोग नेचुरल रूप से बाईफैजिक पैटर्न फॉलो करते हैं, जैसे रात में 6 से 7 घंटे और दिन में 20 से 30 मिनट की नींद लेते हैं. वहीं कई कल्चर में पहली नींद और दूसरी नींद का पैटर्न भी देखा गया है.

जब वहीं कुछ लोग नेचुरल रूप से बाईफैजिक पैटर्न फॉलो करते हैं, जैसे रात में 6 से 7 घंटे और दिन में 20 से 30 मिनट की नींद लेते हैं. वहीं कई कल्चर में पहली नींद और दूसरी नींद का पैटर्न भी देखा गया है.

इसे लेकर भी एक्सपर्ट्स बताते हैं कि आज की लाइफस्टाइल और कामकाजी दिनचर्या के हिसाब से एक लंबी नींद का ब्लॉक ज्यादा सही है. वहीं दो हिस्सों की नींद तभी सही है जब दोनों हिस्से लंबे हो और स्लीप साइकिल पूरा कर सके जो ज्यादातर दो लोगों के लिए मुश्किल होता है.

इसे लेकर भी एक्सपर्ट्स बताते हैं कि आज की लाइफस्टाइल और कामकाजी दिनचर्या के हिसाब से एक लंबी नींद का ब्लॉक ज्यादा सही है. वहीं दो हिस्सों की नींद तभी सही है जब दोनों हिस्से लंबे हो और स्लीप साइकिल पूरा कर सके जो ज्यादातर दो लोगों के लिए मुश्किल होता है.

वहीं एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अगर कुल नींद पूरी हो जाती है और आप फ्रेश महसूस करते हैं तो दो हिस्सों में बंटी हुई नींद भी ठीक हो सकती है. एक्सपर्ट्स नींद को लेकर बताते हैं कि नींद के लिए सबसे जरूरी नियमितता होती है.

वहीं एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अगर कुल नींद पूरी हो जाती है और आप फ्रेश महसूस करते हैं तो दो हिस्सों में बंटी हुई नींद भी ठीक हो सकती है. एक्सपर्ट्स नींद को लेकर बताते हैं कि नींद के लिए सबसे जरूरी नियमितता होती है.

कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं की शिफ्ट वर्कर्स, नए पेरेंट्स, केयर गिवर्स और अनियमित शेड्यूल वाले लोग अक्सर दो हिस्सों में सोते हैं. उनके लिए यह पैटर्न परिस्थितियों के हिसाब से ठीक हो सकता है, लेकिन यह आम लोगों के लिए लंबे समय का समाधान नहीं माना जाता है.

कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं की शिफ्ट वर्कर्स, नए पेरेंट्स, केयर गिवर्स और अनियमित शेड्यूल वाले लोग अक्सर दो हिस्सों में सोते हैं. उनके लिए यह पैटर्न परिस्थितियों के हिसाब से ठीक हो सकता है, लेकिन यह आम लोगों के लिए लंबे समय का समाधान नहीं माना जाता है.

दरअसल फ्रेगमेंट नींद से स्लो वेव स्लिप कम हो सकता है, जो मेमोरी, इमोशनल बैलेंस और इम्यूनिटी से जुड़ा होता है. इससे दिनभर थकान, धीमी प्रतिक्रिया और कैफीन पर निर्भरता बढ़ सकती है. वहीं लंबे समय में यह नींद संबंधी समस्याएं भी बढ़ा सकता है.

दरअसल फ्रेगमेंट नींद से स्लो वेव स्लिप कम हो सकता है, जो मेमोरी, इमोशनल बैलेंस और इम्यूनिटी से जुड़ा होता है. इससे दिनभर थकान, धीमी प्रतिक्रिया और कैफीन पर निर्भरता बढ़ सकती है. वहीं लंबे समय में यह नींद संबंधी समस्याएं भी बढ़ा सकता है.

इसके अलावा ज्यादातर लोग रात में दो से चार बार बिना महसूस किए जागते हैं. वहीं यह आदत उस समय समस्या बन जाती है, जब जागने का समय बहुत बढ़ने लगे और कुल नींद में परेशानी आए. लंबे समय तक जागना तनाव, खराब आदतों या स्लीप एपनिया जैसी समस्याओं का संकेत हो सकता है.

इसके अलावा ज्यादातर लोग रात में दो से चार बार बिना महसूस किए जागते हैं. वहीं यह आदत उस समय समस्या बन जाती है, जब जागने का समय बहुत बढ़ने लगे और कुल नींद में परेशानी आए. लंबे समय तक जागना तनाव, खराब आदतों या स्लीप एपनिया जैसी समस्याओं का संकेत हो सकता है.

ऐसे में एक्सपर्ट्स बताते हैं कि एक ही बार की नींद ज्यादातर लोगों के लिए बेहतर होती है, नियमित स्लीप वेक शेड्यूल सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना और शांत, ठंडा कमरा इसे आसान बनाता है.

ऐसे में एक्सपर्ट्स बताते हैं कि एक ही बार की नींद ज्यादातर लोगों के लिए बेहतर होती है, नियमित स्लीप वेक शेड्यूल सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना और शांत, ठंडा कमरा इसे आसान बनाता है.

वहीं अनियमित नींद, बीच-बीच में जागना या दिन में ज्यादा सोना बॉडी क्लॉक को बिगाड़ सकता है ऐसे में एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि नींद को लेकर ऐसा पैटर्न चुनना जिससे दिनभर एनर्जी फोकस और मानसिक ताजगी बनी रहे.

वहीं अनियमित नींद, बीच-बीच में जागना या दिन में ज्यादा सोना बॉडी क्लॉक को बिगाड़ सकता है ऐसे में एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि नींद को लेकर ऐसा पैटर्न चुनना जिससे दिनभर एनर्जी फोकस और मानसिक ताजगी बनी रहे.

Published at : 05 Dec 2025 06:21 PM (IST)

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जॉब पर जाने से पहले कैसे एकदम साफ करें पेट? ये टिप्स करेंगे आपकी मदद

जॉब पर जाने से पहले कैसे एकदम साफ करें पेट? ये टिप्स करेंगे आपकी मदद



Best Morning Habits For Easy Bowel Movement: अगर ऑफिस के कम्युनल बाथरूम में टॉयलेट जाने का ख्याल भी आपको असहज कर देता है, तो यकीन मानिए, आप अकेले नहीं हैं. सर्वे बताते हैं कि करीब एक-तिहाई कर्मचारी ऑफिस में पॉटी करने से घबराते हैं और हर पांच में से एक इसे पूरी तरह अवॉइड करता है. वजह वही प्राइवेसी की कमी, बदबू, आवाज, और आसपास किसी के होने की शर्म. अच्छी खबर ये है कि एक्सपर्ट्स बताते हैं कुछ आसान आदतें आपकी मदद कर सकती हैं कि आप ऑफिस जाने से पहले ही आराम से पेट साफ कर लेंताकि बगल वाले स्टॉल में बैठे सहकर्मी की मौजूदगी आपका दिन खराब न करे.

गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. लेबेलिस पादिला कहती हैं कि हर किसी का सिस्टम घड़ी की तरह चल ही जाए ऐसा जरूरी नहीं, लेकिन कुछ आदतें जरूर हैं जो आपके शरीर को एक आसान, नियमित पैटर्न में ला सकती हैं. और यह सब लाइफस्टाइल  से शुरू होता है. डॉ. पादिला के अनुसार, नियमित और प्रिडिक्टेबल बाउल मूवमेंट मुख्य रूप से आपकी रोजमर्रा की आदतों का नतीजा होते हैं. जब ये आदतें एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करती हैं, तो शरीर भी एक तय रफ्तार पकड़ लेता है, यहां तक कि टॉयलेट जाने के समय पर भी.

यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं है. रिसर्च कहती है कि आप कितनी बार टॉयलेट जाते हैं, यह आपके पूरे स्वास्थ्य का भी संकेत है. कुछ अध्ययनों में पाया गया कि दिन में एक से दो बार स्टूल पास करना शरीर के लिए सबसे बेहतर रेंज माना जाता है.

 फाइबर बढ़ाएं

नियमित मल त्याग के लिए सबसे पहली जरूरत है पर्याप्त फाइबर. फाइबर स्टूल को बल्की और सॉफ्ट बनाता है, जिससे निकालना आसान हो जाता है. साथ ही ये आपके कोलन की अच्छी सफाई करता है और जमा गंदगी व बैक्टीरिया हटाने में मदद करता है. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि 95 प्रतिशत  वयस्क रोजाना की फाइबर जरूरत पूरी नहीं करते. एक्सपर्ट कम से कम 25 ग्राम फाइबर रोज़ लेने की सलाह देती हैं.

 सुबह पानी पिएं

अगर आप चाहते हैं कि ऑफिस निकलने से पहले ही पॉटी हो जाए, तो सुबह उठते ही सबसे पहला काम पानी पीना होना चाहिए कॉफी नहीं. कॉफी कुछ लोगों में लैक्सेटिव की तरह काम कर सकती है, लेकिन पानी की असली भूमिका है कब्ज रोकना. पर्याप्त पानी स्टूल को नरम रखता है और पास करना आसान बनाता है.

शरीर को हल्का-सा हिलाएं

थोड़ी बहुत हलचल भी आपकी आंतों को एक्टिव कर देती है. जरूरी नहीं कि आप सुबह-सुबह दौड़ लगाने निकल जाएं. कुछ हल्के योगासन जैसे सीटेड स्पाइनल ट्विस्ट, फॉरवर्ड फोल्ड, योगा स्क्वाट और घुटनों को छाती से लगाना ये सभी आंतों की मूवमेंट बढ़ाते हैं.

इसे भी पढ़ें- IVF Cost In India: IVF इलाज मतलब कर्ज! सरकारी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, पढ़ें गरीब क्यों हो रहे इससे दूर?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर साल जरूर कराएं ये 5 टेस्ट, शरीर में घर बना चुकी हर बीमारी का बताते हैं पता

हर साल जरूर कराएं ये 5 टेस्ट, शरीर में घर बना चुकी हर बीमारी का बताते हैं पता


डॉक्टरों का कहना है कि सालाना हेल्थ चेकअप सिर्फ एक मेडिकल रूटीन नहीं, बल्कि खुद के प्रति जिम्मेदारी का संकेत है. रोजमर्रा की जिम्मेदारियों में महिलाएं अक्सर खुद को पीछे कर देती हैं, लेकिन एक सालाना टेस्ट कई गंभीर बीमारियों की दिशा बदल सकता है.

कई समस्याएं खासकर हार्मोनल और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी शुरुआत में बिल्कुल चुप रहती हैं. इसलिए लक्ष्य साफ है: जो दिक्कतें छिपी हैं उन्हें समय रहते पकड़ना, जो उभर रही हैं उन्हें रोकना और आने वाले जोखिमों से बचाव करना. एक्सपर्ट कहते हैं कि कुछ वार्षिक जांचें महिलाओं में बड़ा फर्क लाती हैं.

कई समस्याएं खासकर हार्मोनल और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी शुरुआत में बिल्कुल चुप रहती हैं. इसलिए लक्ष्य साफ है: जो दिक्कतें छिपी हैं उन्हें समय रहते पकड़ना, जो उभर रही हैं उन्हें रोकना और आने वाले जोखिमों से बचाव करना. एक्सपर्ट कहते हैं कि कुछ वार्षिक जांचें महिलाओं में बड़ा फर्क लाती हैं.

सर्वाइकल और प्रजनन स्वास्थ्य की जांच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सर्वाइकल कैंसर कई साल तक बिना किसी चेतावनी के बढ़ सकता है. डॉक्टर 21 साल की उम्र से सालाना पॉप टेस्ट की सलाह देते हैं. यौन सक्रिय महिलाओं के लिए एचपीबी और एसटीआई जांच उपयोगी साबित होती है. पेल्विक एग्जाम और अल्ट्रासाउंड से फाइब्रॉइड, पीसीओडी, सिस्ट और एंडोमेट्रियोसिस जैसी आम समस्याएं जल्दी पकड़ी जा सकती हैं.

सर्वाइकल और प्रजनन स्वास्थ्य की जांच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सर्वाइकल कैंसर कई साल तक बिना किसी चेतावनी के बढ़ सकता है. डॉक्टर 21 साल की उम्र से सालाना पॉप टेस्ट की सलाह देते हैं. यौन सक्रिय महिलाओं के लिए एचपीबी और एसटीआई जांच उपयोगी साबित होती है. पेल्विक एग्जाम और अल्ट्रासाउंड से फाइब्रॉइड, पीसीओडी, सिस्ट और एंडोमेट्रियोसिस जैसी आम समस्याएं जल्दी पकड़ी जा सकती हैं.

ब्रेस्ट हेल्थ की सालाना जांच भी उतनी ही जरूरी है. युवा महिलाओं के लिए क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जाम या अल्ट्रासाउंड बेहतर विकल्प है, जबकि 40 की उम्र के बाद मैमोग्राफी छोटी से छोटी गांठ तक पकड़ लेती है. कई महिलाएं लक्षण न होने पर जांच टाल देती हैं, जबकि ब्रेस्ट से जुड़ी बीमारियां अक्सर चुपचाप बढ़ती रहती हैं.

ब्रेस्ट हेल्थ की सालाना जांच भी उतनी ही जरूरी है. युवा महिलाओं के लिए क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जाम या अल्ट्रासाउंड बेहतर विकल्प है, जबकि 40 की उम्र के बाद मैमोग्राफी छोटी से छोटी गांठ तक पकड़ लेती है. कई महिलाएं लक्षण न होने पर जांच टाल देती हैं, जबकि ब्रेस्ट से जुड़ी बीमारियां अक्सर चुपचाप बढ़ती रहती हैं.

ब्लड टेस्ट महिलाओं की सेहत की आधारशिला माने जाते हैं. CBC से एनीमिया और इंफेक्शन का पता चलता है, टीएसएच थायरॉयड समस्याओं की ओर इशारा करता है, शुगर और एचबीसी1c डायबिटीज का शुरुआती संकेत देते हैं और लिपिड प्रोफाइल हार्ट डिज़ीज के जोखिम को दिखाता है. लिवर और किडनी फंक्शन भी इन जांचों में शामिल होते हैं.

ब्लड टेस्ट महिलाओं की सेहत की आधारशिला माने जाते हैं. CBC से एनीमिया और इंफेक्शन का पता चलता है, टीएसएच थायरॉयड समस्याओं की ओर इशारा करता है, शुगर और एचबीसी1c डायबिटीज का शुरुआती संकेत देते हैं और लिपिड प्रोफाइल हार्ट डिज़ीज के जोखिम को दिखाता है. लिवर और किडनी फंक्शन भी इन जांचों में शामिल होते हैं.

विटामिन D और B12 की कमी 30 की उम्र के बाद महिलाओं में बहुत आम है. ये कमियां चुपचाप बढ़ती हैं और थकान, बालों का झड़ना, मूड स्विंग और हड्डियों के दर्द जैसी परेशानियाँ पैदा करती हैं. सालाना जांच से इन कमियों को आसानी से पहचाना और सही किया जा सकता है.

विटामिन D और B12 की कमी 30 की उम्र के बाद महिलाओं में बहुत आम है. ये कमियां चुपचाप बढ़ती हैं और थकान, बालों का झड़ना, मूड स्विंग और हड्डियों के दर्द जैसी परेशानियाँ पैदा करती हैं. सालाना जांच से इन कमियों को आसानी से पहचाना और सही किया जा सकता है.

35 से 40 की उम्र के बाद दिल, हड्डियों और मेटाबॉलिज्म से जुड़े जोखिम बढ़ने लगते हैं. इसलिए ब्लड प्रेशर, BMI, कमर का माप, यूरिन टेस्ट, ECG और 40 से 50 के बाद बोन डेंसिटी स्कैन बेहद उपयोगी हैं. जिन महिलाओं के परिवार में दिल की बीमारी या कैंसर का हिस्ट्री है, उन्हें कुछ अतिरिक्त जांचों की भी सलाह दी जाती है.

35 से 40 की उम्र के बाद दिल, हड्डियों और मेटाबॉलिज्म से जुड़े जोखिम बढ़ने लगते हैं. इसलिए ब्लड प्रेशर, BMI, कमर का माप, यूरिन टेस्ट, ECG और 40 से 50 के बाद बोन डेंसिटी स्कैन बेहद उपयोगी हैं. जिन महिलाओं के परिवार में दिल की बीमारी या कैंसर का हिस्ट्री है, उन्हें कुछ अतिरिक्त जांचों की भी सलाह दी जाती है.

Published at : 05 Dec 2025 03:27 PM (IST)

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