नॉनवेज नहीं खाते? फिर भी बढ़ा सकते हैं Vitamin B12, जानें कौन से 5 देसी शाकाहारी फूड्स फायदेमंद

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एक गिलास गाय के दूध में करीब 1.1 माइक्रोग्राम विटामिन B12 होता है,जो रोजाना की जरूरत का लगभग 45 प्रतिशत पूरा कर देता है. दूध भारतीय घरों में चाय, शेक या डायरेक्ट रोजाना इस्तेमाल होता है, जिससे इसे डाइट में शामिल करना आसान हो जाता है. रिसर्च के अनुसार दूध में मौजूद B12 शरीर आसानी से एब्जॉर्ब कर लेता है. हल्दी वाला दूध पीने से इसके एंटीइंफ्लेमेटरी फायदे भी मिलते हैं.

एक कटोरी सादे दही में 0.6 से 1.0 माइक्रोग्राम तक विटामिन B12 होता है. दही में मौजूद लाइव बैक्टीरिया आंतों की सेहत सुधारते हैं, जिससे B12 का एब्जॉर्प्शन बेहतर होता है. वहीं भारतीय खाने में दही आमतौर पर रोजाना शामिल किया जाता है. कई रिसर्च में सामने आया है कि नियमित रूप से दही खाने वाले वेजिटेरियन लोगों में B12 का लेवल बेहतर रहता है.

एक कटोरी सादे दही में 0.6 से 1.0 माइक्रोग्राम तक विटामिन B12 होता है. दही में मौजूद लाइव बैक्टीरिया आंतों की सेहत सुधारते हैं, जिससे B12 का एब्जॉर्प्शन बेहतर होता है. वहीं भारतीय खाने में दही आमतौर पर रोजाना शामिल किया जाता है. कई रिसर्च में सामने आया है कि नियमित रूप से दही खाने वाले वेजिटेरियन लोगों में B12 का लेवल बेहतर रहता है.

Published at : 09 Jan 2026 07:04 AM (IST)

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कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल से लेकर स्किन-हेयर तक, जानिए अलसी पाउडर के 7 चौंकाने वाले हेल्थ बेनिफिट्स

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अलसी पाउडर में मौजूद ओमेगा 3 फैटी एसिड खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है. इससे ब्लड वेसल्स रिलैक्स होती है और दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है. रिसर्च के अनुसार अलसी पाउडर के नियमित सेवन से कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के लेवल में कमी देखी गई है. इसमें मौजूद लिग्नान्स सूजन कम करने और धमनियों में प्लाक बनने से भी बचाते हैं.

वहीं अलसी पाउडर में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है, जो कार्बोहाइड्रेट के पाचन को धीमा करता है. इससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता है. टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों में इसके नियमित सेवन से फास्टिंग शुगर लेवल में सुधार होता है.

वहीं अलसी पाउडर में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है, जो कार्बोहाइड्रेट के पाचन को धीमा करता है. इससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता है. टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों में इसके नियमित सेवन से फास्टिंग शुगर लेवल में सुधार होता है.

Published at : 08 Jan 2026 08:03 PM (IST)

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इम्यूनिटी सिर्फ काढ़े में नहीं, आपके शरीर के इन 7 खास अंगों में होती है छिपी, जानें सारे फैक्ट

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Immune Response Explained: हमारी इम्यून सिस्टम शरीर की एक मजबूत सुरक्षा व्यवस्था है, जो इंफेक्शन फैलाने वाले कीटाणुओं से हमें बचाती है. इसमें कई अंग, सेल्स और प्रोटीन मिलकर काम करते हैं. जब भी कोई बैक्टीरिया, वायरस या फंगस शरीर में घुसता है, तो इम्यून सिस्टम उससे लड़ता है और उसे खत्म करता है. खास बात यह है कि इम्यून सिस्टम उन कीटाणुओं को याद भी रखता है, जिन्हें वह पहले हरा चुका होता है. यह काम कुछ खास सफेद व्हाइट ब्लड सेल्स करती हैं, जिन्हें मेमोरी सेल्स कहा जाता है. इसी वजह से अगर वही कीटाणु दोबारा शरीर में आएं, तो इम्यून सिस्टम उन्हें जल्दी पहचानकर नष्ट कर देता है, इससे हमें बीमार होने का मौका नहीं मिलता.

हालांकि हर बीमारी में ऐसा नहीं होता। जैसे सर्दी-जुकाम और फ्लू. ये बार-बार इसलिए होते हैं क्योंकि इनके वायरस के कई प्रकार होते हैं. एक बार सर्दी या फ्लू होने से दूसरे वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी नहीं बनती, इसलिए इंसान इन्हें कई बार झेलता है.

इम्यून सिस्टम के मुख्य हिस्से

इम्यून सिस्टम कई जरूरी हिस्सों से मिलकर बना होता है. Betterhealth के अनुसार इसमें व्हाइट ब्लड सेल्स , एंटीबॉडी, कॉम्प्लीमेंट सिस्टम, लिम्फैटिक सिस्टम,स्प्लीन, बोन मैरो और थाइमस ग्रंथि शामिल हैं. ये सभी मिलकर शरीर को इंफेक्शन से बचाने का काम करते हैं. 

व्हाइट ब्लड सेल्स

व्हाइट ब्लड सेल्स हमारी इम्यून सिस्टम की सबसे अहम ताकत होती हैं. ये बोन मैरो में बनती हैं और लिम्फैटिक सिस्टम का हिस्सा होती हैं. ये सेल्स पूरे शरीर में खून और टिश्यू के जरिए घूमती रहती हैं और बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी और फंगस जैसे बाहरी कीटाणुओं की तलाश करती हैं. जैसे ही इन्हें कोई कीटाणु मिलता है, ये तुरंत उस पर हमला कर देती हैं. व्हाइट व्लड सेल्स में लिम्फोसाइट्स शामिल होते हैं, जैसे B-सेल्स, T-सेल्स और नेचुरल किलर सेल्स, इसके अलावा इम्यून सिस्टम की कई दूसरी सेल्स भी होती हैं.

एंटीबॉडी

एंटीबॉडी शरीर को कीटाणुओं और उनके द्वारा बनाए गए जहरीले तत्वों से लड़ने में मदद करती हैं. ये कीटाणुओं की सतह पर मौजूद खास तत्वों को पहचान लेती हैं, जिन्हें एंटीजन कहा जाता है. एंटीबॉडी इन एंटीजन को बाहरी मानकर चिन्हित कर देती हैं, ताकि इम्यून सिस्टम उन्हें नष्ट कर सके. इस पूरी प्रक्रिया में कई तरह की सेल्स, प्रोटीन और रसायन मिलकर काम करते हैं.

कॉम्प्लीमेंट सिस्टम

कॉम्प्लीमेंट सिस्टम प्रोटीन का एक समूह होता है, जो एंटीबॉडी के काम को और ज्यादा प्रभावी बनाता है. यह सिस्टम एंटीबॉडी की मदद से कीटाणुओं को खत्म करने की प्रक्रिया को तेज करता है.

लिम्फैटिक सिस्टम

लिम्फैटिक सिस्टम शरीर में फैली पतली वेसल्स का एक जाल होता है. इसका काम शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखना, बैक्टीरिया पर प्रतिक्रिया करना, कैंसर सेल्स से निपटना और ऐसे गंदे पदार्थों को हटाना है जो बीमारी का कारण बन सकते हैं. इसके अलावा यह आंतों से कुछ वसा को शरीर में एब्जॉर्ब करने में भी मदद करता है. लिम्फैटिक सिस्टम में लिम्फ नोड्स होते हैं, जो कीटाणुओं को फंसाते हैं, लिम्फ वेसल्स होती हैं जो लिम्फ नामक तरल को ढोती हैं और इसमें व्हाइट ब्लड सेल्स भी शामिल होती हैं.

स्प्लीन

स्प्लीन एक ऐसा अंग है जो खून को साफ करता है. यह शरीर से कीटाणुओं को हटाता है और पुराने या खराब हो चुके रेड ब्लड सेल्स को नष्ट करता है. इसके साथ ही यह इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी एंटीबॉडी और लिम्फोसाइट्स भी बनाता है.

बोन मैरो

बोन मैरो हड्डियों के अंदर मौजूद मुलायम टिश्यू होता है. यहीं पर रेड ब्लड सेल्स बनती हैं, जो शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाती हैं. इसी जगह से व्हाइट ब्लड सेल्स भी बनती हैं, जो इंफेक्शन से लड़ती हैं, और प्लेटलेट्स भी यहीं बनते हैं, जो खून को जमाने में मदद करते हैं.

थाइमस

थाइमस ग्रंथि खून की निगरानी और फिल्टरिंग का काम करती है. यह खास तरह की व्हाइट ब्लड सेल्स बनाती है, जिन्हें T-लिम्फोसाइट्स कहा जाता है. ये सेल्स इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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डायबिटीज की दवा क्या कैंसर से लड़ने में भी है मददगार, जानें क्या कहती है रिसर्च?

डायबिटीज की दवा क्या कैंसर से लड़ने में भी है मददगार, जानें क्या कहती है रिसर्च?


Does Metformin Reduce Cancer Risk: डायबिटीज एक लंबे समय तक चलने वाली बीमारी है, इससे दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित हैं. इसमें ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी होता है, ताकि आगे चलकर गंभीर समस्याएं न हों. टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों को दी जाने वाली दवा मेटफॉर्मिन सालों से ब्लड शुगर कंट्रोल करने में असरदार मानी जाती है. अब हाल के कुछ शोधों में यह भी देखा गया है कि मेटफॉर्मिन का कैंसर पर भी असर हो सकता है, खासकर कोलन, लिवर और ब्रेस्ट कैंसर जैसे मामलों में. हालांकि, इसे कैंसर की दवा समझ लेना सही नहीं होगा. चलिए आपको बताते हैं इसके बारे में.

डायबिटीज की दवा और कैंसर पर रिसर्च

रिसर्च के मुताबिक, मेटफॉर्मिन शरीर में इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ाती है और लिवर में बनने वाली शुगर को कम करती है. यही वजह है कि यह टाइप-2 डायबिटीज की पहली पसंद की दवा रही है. ब्लड शुगर कंट्रोल के अलावा, साइंटिस्ट अब इसके कुछ दूसरे ऑर्गेनिक असर भी समझने की कोशिश कर रहे हैं. लैब स्टडी और कुछ आब्जर्वेशनल रिसर्च में संकेत मिले हैं कि मेटफॉर्मिन कैंसर के खतरे को कम करने में सहायक हो सकती है.

डायबिटीज और कैंसर का कनेक्शन

टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों में कुछ कैंसर का खतरा ज्यादा देखा गया है, जैसे लिवर, पैंक्रियाज, कोलन और ब्रेस्ट कैंसर. इसकी वजह इंसुलिन रेजिस्टेंस, शरीर में सूजन और मोटापा मानी जाती है. जब शरीर में इंसुलिन ज्यादा रहता है, तो यह सेल्स की असामान्य ग्रोथ को बढ़ावा दे सकता है. मेटफॉर्मिन इंसुलिन लेवल को कम करने में मदद करती है, जिससे यह खतरा कुछ हद तक घट सकता है.

कैंसर सेल्स पर मेटफॉर्मिन कैसे असर डालती है?

कुछ नई रिसर्च बताती हैं कि मेटफॉर्मिन कैंसर की कोशिकाओं पर अलग-अलग तरीकों से असर डाल सकती है. यह उन रास्तों को धीमा कर सकती है, जिनसे कैंसर सेल्स तेजी से बढ़ती हैं. साथ ही, यह सेल्स के मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल कर सकती है और सूजन को कम करने में भी मदद कर सकती है. इन सब वजहों से कैंसर सेल्स की ग्रोथ रुक सकती है या धीमी हो सकती है.

सावधानी क्यों जरूरी है?

2025 में हुई एक मल्टी-सेंटर स्टडी में यह देखा गया कि जो डायबिटीज मरीज लंबे समय से मेटफॉर्मिन ले रहे थे, उनमें कोलन और लिवर कैंसर के मामले कुछ कम थे. लेकिन यह सिर्फ एक संबंध दिखाता है, पक्का सबूत नहीं. अभी इस पर और क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं, ताकि साफ तौर पर समझा जा सके कि मेटफॉर्मिन कैंसर में कितनी कारगर है.

खुद से दवा लेना क्यों गलत है?

एक्सपर्ट साफ कहते हैं कि कैंसर से बचाव के लिए खुद से मेटफॉर्मिन लेना ठीक नहीं है. इस दवा के कुछ साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं, जैसे मतली, दस्त और कुछ मामलों में गंभीर समस्या. डायबिटीज और कैंसर दोनों से बचाव के लिए सबसे जरूरी है संतुलित खानपान, नियमित व्यायाम, अच्छी नींद और समय-समय पर हेल्थ चेक-अप कराएं.  दवाएं हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही लेनी चाहिए. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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