युवाओं में तेजी से बढ़ रही बॉडी इमेज एंग्जायटी, AIIMS-ICMR ने किया चौंकाने वाला खुलासा

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लिवर कैंसर में कब बदल जाता है फैटी लिवर? दिक्कत बढ़ने से पहले समझें लक्षण

लिवर कैंसर में कब बदल जाता है फैटी लिवर? दिक्कत बढ़ने से पहले समझें लक्षण


How To Keep Liver Healthy: लिवर हमारे शरीर के सबसे ज़रूरी अंगों में से एक है. यह खून को साफ करने, जरूरी प्रोटीन बनाने, शरीर में ऊर्जा स्टोर करने और टॉक्सिन्स बाहर निकालने जैसे कई अहम काम करता है. इसके अलावा लिवर बाइल भी बनाता है, जो पाचन में मदद करता है. लेकिन जब लिवर की सेल्स असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, तो यही स्थिति आगे चलकर लिवर कैंसर का रूप ले लेती है, जो सेहत के लिए बेहद गंभीर साबित हो सकती है.

लिवर कैंसर होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. लंबे समय तक शराब का सेवन, हेपेटाइटिस B और C का इंफेक्शन, फैटी लिवर की समस्या, मोटापा या फिर परिवार में पहले किसी को कैंसर होना, ये सभी इसके जोखिम को बढ़ाते हैं. समय के साथ लिवर कैंसर शरीर की डिटॉक्स प्रक्रिया को प्रभावित करने लगता है, जिससे खून में ज़हरीले तत्व जमा होने लगते हैं, इसका असर थकान, बिना वजह वजन कम होना और पाचन संबंधी दिक्कतों के रूप में दिखाई दे सकता है.

कितने तरह के होते हैं लिवर कैंसर?

लिवर कैंसर मुख्य रूप से दो तरह का होता है. पहला है हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा, जो सबसे आम प्रकार है और सीधे लिवर की सेल्स से शुरू होता है. दूसरा है कोलैंजियोकार्सिनोमा, जो पित्त वेसल्स में विकसित होता है. लिवर कैंसर को खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं या लोग उन्हें नज़रअंदाज कर देते हैं। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक यह काफी आगे बढ़ चुकी होती है। लिवर की कार्यक्षमता कम होने से शरीर के दूसरे अंगों पर भी असर पड़ता है और धीरे-धीरे शरीर कमजोर होने लगता है.

क्या होते हैं लक्षण?

लिवर कैंसर के शुरुआती लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं और कई बार इन्हें आम बीमारियों की तरह समझ लिया जाता है. शुरुआत में लगातार थकान महसूस होना, कमजोरी, भूख कम लगना, बिना किसी कारण वजन घटना या पेट के दाहिने हिस्से में दर्द या भारीपन महसूस होना शामिल है. कुछ लोगों में आंखों और त्वचा का पीला पड़ना यानी पीलिया, बार-बार मतली या उल्टी की शिकायत भी हो सकती है.

जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, पेट और पैरों में सूजन आ सकती है, शरीर की ताकत और कम होने लगती है और गंभीर मामलों में खून की उल्टी या ब्लीडिंग जैसी स्थिति भी बन सकती है. चूंकि ये लक्षण दूसरी बीमारियों जैसे लग सकते हैं, इसलिए समय रहते डॉक्टर से जांच कराना बहुत जरूरी है. सीटी स्कैन, एमआरआई और लिवर बायोप्सी जैसी जांचें सही डायग्नोसिस में मदद करती हैं. अगर बीमारी का पता शुरुआती दौर में चल जाए, तो इलाज के बेहतर नतीजे मिल सकते हैं और गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

दिलशाद गार्डन स्थित एक प्रतिष्ठित निजी क्लीनिक के गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. आशीष सचान बताते हैं कि “लिवर कैंसर के लक्षण धीरे-धीरे उभरते हैं और शुरुआत में इन्हें आम कमजोरी या पेट की समस्या समझकर लोग नज़रअंदाज कर देते हैं. उनके मुताबिक लगातार थकान रहना, भूख न लगना, बिना वजह वजन कम होना और पेट के दाहिने हिस्से में दर्द या भारीपन महसूस होना ऐसे संकेत हैं, जिन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए.”

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गर्भावस्था में शुगर लेवल की अनदेखी पड़ सकती है भारी: जानें मां और बच्चे को कैसे रखें सुरक्षित?

गर्भावस्था में शुगर लेवल की अनदेखी पड़ सकती है भारी: जानें मां और बच्चे को कैसे रखें सुरक्षित?


How To Control Sugar During Pregnancy: अक्सर गर्भावस्था को खुशियों और उत्साह से भरा सफर माना जाता है, लेकिन इस दौरान कुछ छिपे हुए स्वास्थ्य जोखिम भी सामने आ सकते हैं. इन्हीं में से एक है जेस्टेशनल डायबिटीज, जो आजकल प्रेग्नेंसी के दौरान एक गंभीर समस्या के रूप में पहचानी जा रही है. भारत में डायबिटीज इन प्रेग्नेंसी स्टडी ग्रुप ऑफ इंडिया की गाइडलाइंस, जिन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय का समर्थन मिला है, सभी गर्भवती महिलाओं की जांच की सलाह देती हैं. इसका मकसद समय रहते बीमारी की पहचान करना है, ताकि मां और बच्चे दोनों को होने वाले खतरे कम किए जा सकें.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

जेस्टेशनल डायबिटीज अक्सर बिना किसी साफ लक्षण के बढ़ती है, इसलिए कई महिलाओं को तब तक पता नहीं चलता जब तक जांच में ब्लड शुगर ज्यादा न निकल आए. अगर इसका इलाज न हो, तो डिलीवरी के समय दिक्कतों बढ़ सकती हैं और आगे चलकर मां को टाइप-2 डायबिटीज होने का खतरा भी बढ़ जाता है. इसी वजह से समय पर जांच बेहद जरूरी मानी जाती है.

क्या  कहते हैं एक्सपर्ट?

स्वास्थ्य एक्सपर्ट और डब्ल्यूएचओ के अनुसार, गर्भावस्था के 24 से 28 हफ्तों के बीच ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए. हालांकि DIPSI की सलाह है कि यह जांच और भी पहले, यानी पहली एंटीनैटल विज़िट पर ही शुरू की जा सकती है, ताकि बीमारी को शुरुआती चरण में ही कंट्रोल किया जा सके. भले ही किसी महिला में डायबिटीज के सामान्य जोखिम न हों, फिर भी सभी की जांच करने से बीमारी जल्दी पकड़ में आ जाती है. इससे समय रहते खानपान में बदलाव, ब्लड शुगर मॉनिटरिंग और सुरक्षित शारीरिक गतिविधियों जैसी जरूरी सावधानियां अपनाई जा सकती हैं. DIPSI की 2023 की गाइडलाइंस के मुताबिक, बिना उपवास के 75 ग्राम ग्लूकोज वाला एक आसान टेस्ट किफायती और भरोसेमंद तरीका माना जाता है, जिसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी किया जा सकता है.

बच्चों पर पड़ता है इसका असर

प्रेग्नेंसी के दौरान अगर ब्लड शुगर कंट्रोल में न रहे, तो इसका असर बच्चे पर भी पड़ सकता है. ज्यादा शुगर की वजह से बच्चे का वजन जरूरत से ज्यादा बढ़ सकता है, जिससे डिलीवरी के समय दिक्कतें आ सकती हैं। कुछ नवजात बच्चों में जन्म के बाद ब्लड शुगर अचानक गिरने की समस्या हो सकती है और गंभीर मामलों में उन्हें NICU में भर्ती करना पड़ सकता है. इसलिए पूरी गर्भावस्था के दौरान सतर्क निगरानी जरूरी है. जेस्टेशनल डायबिटीज को मैनेज करने का मुख्य लक्ष्य मां के ब्लड शुगर लेवल को स्थिर रखना होता है. इसके लिए संतुलित डाइट बहुत जरूरी है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा नियंत्रित हो और फाइबर से भरपूर भोजन शामिल हो. प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा मीठी चीजों से दूरी रखने से ब्लड शुगर अचानक बढ़ने से बचती है और मां व बच्चे दोनों की सेहत बेहतर रहती है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

हल्की-फुल्की एक्सरसाइज, जैसे रोज़ टहलना या प्रेग्नेंसी के लिए सुरक्षित योग, इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ाने में मदद करते हैं. अगर सिर्फ लाइफस्टाइल बदलाव से शुगर कंट्रोल न हो, तो डॉक्टर की निगरानी में इंसुलिन या दवाएं दी जाती हैं, ताकि मां और भ्रूण दोनों सुरक्षित रहें. डिलीवरी के बाद भी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। जिन महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज हो चुकी होती है, उनमें आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का खतरा ज्यादा रहता है. इसलिए डिलीवरी के 4 से 12 हफ्तों के भीतर और फिर नियमित अंतराल पर ब्लड शुगर की जांच जरूरी मानी जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! दूषित पानी से फैल रहा है जानलेवा टाइफाइड, जानें लक्षण और बचाव के उपाय

सावधान! दूषित पानी से फैल रहा है जानलेवा टाइफाइड, जानें लक्षण और बचाव के उपाय


Food And Water Borne Diseases: भारत में टाइफाइड आज भी एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है. हर साल इसके कई मामले सामने आते हैं, खासतौर पर मानसून और उसके बाद के मौसम में. हाल ही में गुजरात के गांधीनगर में टाइफाइड के प्रकोप में करीब 100 लोगों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, जिससे साफ हो गया कि खराब पानी और साफ-सफाई की कमी वाले इलाकों में यह बीमारी कितनी तेजी से फैल सकती है. टाइफाइड साल्मोनेला टाइफी नाम के बैक्टीरिया से होता है, जो दूषित खाना और पानी के जरिए शरीर में प्रवेश करता है. समय पर इलाज न मिले, तो यह जानलेवा भी हो सकता है.

क्या होता है टाइफाइड फीवर?

टाइफाइड फीवर एक गंभीर इंफेक्शन है, जिसे मेडिकल भाषा में एंटरिक फीवर भी कहा जाता है. यह बीमारी मुख्य रूप से आंतों और खून को प्रभावित करती है, जिससे तेज बुखार, पेट दर्द और कमजोरी होती है. भारत में हर साल करीब 47 से  48 लाख टाइफाइड के मामले सामने आते हैं और कई लोगों की मौत भी हो जाती है. यह बीमारी बच्चों और युवाओं में ज्यादा देखी जाती है, लेकिन जहां साफ पानी और स्वच्छता की कमी है, वहां रहने या घूमने वाला कोई भी व्यक्ति इसकी चपेट में आ सकता है.

कब हो जाता है यह खतरनाक?

टाइफाइड का इलाज तब और खतरनाक हो जाता है, जब सही समय पर इसकी पहचान न हो या ऐसे एंटीबायोटिक दिए जाएं, जो बैक्टीरिया पर असर न करें. भारत के कई हिस्सों में टाइफाइड के बैक्टीरिया अब दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो चुके हैं, जिससे इलाज और मुश्किल हो गया है. भारत में टाइफाइड फैलने की सबसे बड़ी वजह दूषित पानी और खराब स्वच्छता है. कई जगहों पर आज भी खुले कुएं, हैंडपंप और पाइपलाइन का पानी इस्तेमाल किया जाता है, जो बारिश या बाढ़ के दौरान सीवेज से दूषित हो जाता है. खुले में शौच, ओवरफ्लो होते नाले और कमजोर सीवेज सिस्टम भी बैक्टीरिया को तेजी से फैलने में मदद करते हैं.

इसके अलावा, बिना साफ-सफाई के खाना बनाना और बेचना भी एक बड़ा कारण है. स्ट्रीट फूड, कच्ची सब्जियां, लस्सी और गन्ने का रस जैसी चीजें अगर साफ पानी और हाथों से न बनाई जाएं, तो इंफेक्शन फैलने का खतरा बढ़ जाता है. कुछ लोग टाइफाइड से ठीक होने के बाद भी अपने शरीर में बैक्टीरिया लिए रहते हैं और अनजाने में दूसरों को इंफेक्शन करते रहते हैं.

कब दिखने लगते हैं लक्षण?

टाइफाइड के लक्षण आमतौर पर इंफेक्शन के 1 से 3 हफ्ते बाद दिखने लगते हैं. शुरुआत में इसके लक्षण तेज फ्लू जैसे लगते हैं. धीरे-धीरे बढ़ने वाला तेज बुखार, सिरदर्द, कमजोरी, बहुत ज्यादा थकान, पेट दर्द, भूख न लगना, मतली या उल्टी, सूखी खांसी और तेज बुखार के बावजूद दिल की धड़कन का धीमा होना इसके आम लक्षण हैं. बीमारी बढ़ने पर छाती और पेट पर गुलाबी रंग के छोटे दाने दिखाई दे सकते हैं, पेट फूल सकता है और कमजोरी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. गंभीर मामलों में मरीज को भ्रम, बेहोशी, आंतों में खून आना या छेद होने जैसी स्थिति भी हो सकती है, जो मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है. अगर किसी को 3 से 4 दिन से ज्यादा तेज बुखार है और साथ में पेट दर्द है, तो टाइफाइड की जांच जरूर करानी चाहिए.

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क्या वेजाइना को होती है ‘स्पेशल वॉश’ की जरूरत? डॉक्टर ने तोड़े महिलाओं की सेहत से जुड़े 4 मिथक

क्या वेजाइना को होती है ‘स्पेशल वॉश’ की जरूरत? डॉक्टर ने तोड़े महिलाओं की सेहत से जुड़े 4 मिथक


NHS Doctor Advice For Women: साल 2026 आ चुका है, लेकिन इसके बावजूद वेजाइनल हेल्थ आज भी सबसे कम बात की जाने वाली हेल्थ से जुड़ी चीजों में शामिल है. गलतफहमियां, झिझक और अधूरी जानकारी अब भी महिलाओं के बीच बनी हुई है. इसका सबसे ज़्यादा फायदा उन कंपनियों को होता है, जो खास वॉश, वाइप्स, लाइटनिंग क्रीम और परफ्यूम बेचती हैं. ब्रैडफोर्ड, वेस्ट यॉर्कशायर के NHS डॉक्टर अमीर खान ने वेजाइनल हेल्थ से जुड़े कुछ ऐसे ही आम मिथकों को तोड़ा है, जिन पर आज भी कई महिलाएं भरोसा करती हैं.

मिथक 1: वेजाइना को साफ रखने के लिए खास साबुन या वॉश जरूरी

मार्केट में कई खुशबूदार साबुन, वाइप्स और स्प्रे यह दावा करते हैं कि वे वेजाइना को साफ रखते हैं. लेकिन सच यह है कि इनकी ज़रूरत ही नहीं होती. डॉक्टर के मुताबिक, वेजाइना खुद को साफ करने में सक्षम होती है. इसमें बैक्टीरिया और pH का एक सही संतुलन होता है. खुशबूदार प्रोडक्ट्स इस संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और इंफेक्शन की वजह बन सकते हैं.

 

मिथक 2: डिस्चार्ज मतलब कोई परेशानी

अक्सर महिलाओं को लगता है कि वेजाइनल डिस्चार्ज किसी बीमारी का संकेत है. जबकि ऐसा हमेशा नहीं होता. ज्यादातर महिलाओं को रोजाना डिस्चार्ज होता है और यह वेजाइना के हेल्दी रहने का एक तरीका है. अगर रंग, बदबू या बनावट में अचानक बदलाव आए, तब जांच जरूरी है. लेकिन सफेद या साफ डिस्चार्ज आमतौर पर नॉर्मल होता है.

मिथक 3: अगर बदबू है तो आप गंदी हैं

कई महिलाओं को यह गलतफहमी होती है कि उन्हें नीचे से फूलों जैसी खुशबू आनी चाहिए. सच यह है कि हर वेजाइना की एक नेचुरल स्मेल होती है और यह बिल्कुल सामान्य है. इसका मतलब यह नहीं कि आप साफ-सफाई नहीं रखतीं. अगर बदबू अचानक तेज हो जाए या बदले, तो डॉक्टर से दिखाना चाहिए, लेकिन परफ्यूम जैसी खुशबू की उम्मीद रखना गलत है.

मिथक 4: टैम्पॉन अंदर जाकर ‘गुम’ हो सकता है

कई महिलाएं टैम्पॉन इस्तेमाल करने से डरती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह वेजाइना के अंदर खो सकता है. डॉक्टर साफ कहते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता. वेजाइना के ऊपर सर्विक्स होता है, जो एक बंद दरवाज़े की तरह है. टैम्पॉन उससे आगे नहीं जा सकता. कभी-कभी वह थोड़ा ऊपर चला जाता है, लेकिन वह गुम नहीं होता और डॉक्टर आसानी से निकाल सकते हैं. घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है.

डॉ. खान कहते हैं कि अगली बार अगर कोई आपको फेमिनिन वॉश बेचने की कोशिश करे या टैम्पॉन को लेकर डर फैलाए तो याद रखें कि वेजाइना लाखों साल से खुद का ख्याल रखती आ रही है. 

इसे भी पढ़ें- Oman Premarital Medical Test: शादी से पहले इस मुस्लिम देश में जरूरी हुआ मेडिकल टेस्ट, इसमें किन चीजों की होती है जांच?

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ना तला-भुना और न ही प्रोसेस्ड… आपके ब्रेन के लिए ये है सबसे खराब चीज, 99% लोग खाते हैं इसे

ना तला-भुना और न ही प्रोसेस्ड… आपके ब्रेन के लिए ये है सबसे खराब चीज, 99% लोग खाते हैं इसे


आजकल लोग तला-भुना, फास्ट फूड और प्रोसेस्ड खाने से दूर रहने की कोशिश करते हैं, लेकिन एक चीज ऐसी भी है, जो लगभग हर घर में इस्तेमाल होती है और ब्रेन को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है. यह है चीनी (खासकर सफेद चीनी और मीठे ड्रिंक्स में मिली एडेड शुगर). डॉक्टरों और लेटेस्ट रिसर्च के मुताबिक, रोजाना ज्यादा चीनी खाने से ब्रेन फॉग, मेमोरी कमजोर होना, डिप्रेशन और यहां तक कि अल्जाइमर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं. 

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, लीडिंग न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. ऑस्टिन पर्लमटर (MD) कहते हैं कि तला-भुना या रिफाइंड कार्ब्स नहीं, बल्कि रोजाना इस्तेमाल होने वाली चीनी (खासकर लिक्विड शुगर यानी मीठे ड्रिंक्स) ब्रेन के लिए सबसे खराब है. यह चीज 99% लोग चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, जूस, बिस्किट या मिठाई में रोज लेते हैं.

ब्रेन को कैसे नुकसान पहुंचाती है चीनी?

  • ब्लड शुगर स्पाइक और क्रैश: जब आप ज्यादा चीनी लेते हैं तो ब्लड शुगर बहुत तेजी से बढ़ता है और फिर तेजी से गिरता है. इससे ब्रेन फॉग (दिमाग सुन्न होना) होने का खतरा और चिड़चिड़ापन बढ़ता है. साथ ही, फोकस में कमी होती है. 2025 में जारी हेल्थलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई GI वाली चीनी ब्रेन के हिप्पोकैंपस (मेमोरी वाला हिस्सा) को नुकसान पहुंचाती है.
  • इन्फ्लेमेशन बढ़ना: ज्यादा चीनी से ब्रेन में सूजन (इन्फ्लेमेशन) बढ़ती है. 2025 की न्यूरोसाइंस स्टडीज में पाया गया कि हाई शुगर डाइट से ब्रेन-डिराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) कम होता है, जो न्यूरॉन्स को हेल्दी रखता है. इससे लर्निंग और मेमोरी कमजोर पड़ती है.
  • इंसुलिन रेसिस्टेंस और ‘टाइप 3 डायबिटीज’: डॉक्टर अब अल्जाइमर को ‘टाइप 3 डायबिटीज’ कहते हैं, क्योंकि ज्यादा चीनी से ब्रेन इंसुलिन रेसिस्टेंट हो जाता है. इससे मेमोरी लॉस और डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है. 2025 की द लैंसेट स्टडी में पाया गया कि हाई शुगर से ब्रेन के ब्लड वेसल्स डैमेज होते हैं.
  • एडिक्शन जैसा असर: चीनी ब्रेन के रिवॉर्ड सिस्टम को उत्तेजित करती है, जैसे कोई नशा. इससे क्रेविंग बढ़ती है और छोड़ना मुश्किल हो जाता है।.वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के मुताबिक, फ्री शुगर रोजाना 5-10% कैलोरी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लेकिन ज्यादातर लोग इससे कहीं ज्यादा लेते हैं.
  • बच्चों को ज्यादा खतरा: छोटे बच्चों में ज्यादा मीठे ड्रिंक्स से ADHD, अटेंशन प्रॉब्लम और बाद में कम IQ का खतरा बढ़ता है. कोरियन स्टडी (2025) में पाया गया कि 2 साल से कम उम्र में 200ml से ज्यादा मीठा ड्रिंक पीने वाले बच्चों में ADHD ज्यादा होता है.

कैसे करें बचाव?

  • चाय-कॉफी में चीनी कम करें या छोड़ दें.
  • पैकेज्ड जूस, सोडा, एनर्जी ड्रिंक्स अवॉइड करें.
  • फ्रेश फ्रूट्स से मीठा लें. इनमें फाइबर होता है, जो शुगर को धीरे रिलीज करता है.
  • घर का खाना, साबुत अनाज, नट्स और हरी सब्जियां ज्यादा खाएं.
  • अगर मीठा चाहिए तो शहद, गुड़ या फ्रेश फ्रूट यूज करें, लेकिन कम मात्रा में.

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