भारत में HIV केस रिकॉर्ड स्तर पर, 72% केस युवाओं में! एक्सपर्ट बोले- जागरूकता कैंपेन बेहद जरूरी

भारत में HIV केस रिकॉर्ड स्तर पर, 72% केस युवाओं में! एक्सपर्ट बोले- जागरूकता कैंपेन बेहद जरूरी



विश्व एड्स दिवस पर HIV/AIDS को लेकर एक बार फिर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है. देश में बदलती जीवनशैली, सुरक्षित यौन संबंधों की अनदेखी और सेक्स एजुकेशन की कमी के कारण संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर टेस्टिंग, सही जानकारी और जिम्मेदार व्यवहार अपनाकर इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है.

एक्सपर्ट ने दी यह जानकारी

भारत मे HIV/AIDS के बढ़ते संक्रमण को लेकर देश के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. विनोद रैना (MD मेडिसिन) ने गंभीर चिंता जताई है. 25 साल से HIV के उपचार में अनुभव रखने वाले डॉ. रैना ने एबीपी लाइव की टीम को जानकारी देते हुए बताया कि विश्व के कई देशों ने समय रहते जागरूकता और कम्युनिटी हेल्थ प्रोग्राम्स की मदद से इस बीमारी को काफी हद तक रोक लिया, लेकिन भारत आज भी आवश्यक जागरूकता, शिक्षा और रोकथाम के अभाव में तेजी से संक्रमित होता जा रहा है. चेतावनी भरे लहजे में उन्होंने कहा कि, अगर अभी भी समाज और सरकार सक्रिय नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.

यूरोप-अमेरिका ने जागरूकता से रोका, भारत अब भी पिछड़ रहा

70–80 के दशक में यूरोप और अमेरिका में अनप्रोटेक्टेड सेक्स से HIV तेजी से फैला, लेकिन समय रहते उन देशों ने मजबूत हेल्थ प्रोग्राम शुरू किए. डॉ. रैना बताते हैं कि कम्युनिटी मेडिसिन को बढ़ावा देने और सेक्सुअल हेल्थ पर खुले संवाद ने उन देशों में संक्रमण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके उलट भारत में सोशल नेटवर्क और बदलती जीवनशैली के कारण युवा वर्ग बिना प्रोटेक्शन के संबंध बना रहा है. गांव से शहर आने वाले या नई सेक्सुअल लाइफ शुरू करने वाले युवाओं में जानकारी की कमी के कारण संक्रमण तेजी से फैल रहा है.

सेक्स एजुकेशन की कमी सबसे बड़ी कमजोरी’

डॉ. रैना का कहना है कि देश में आज भी सेक्स को एक टैबू की तरह देखा जाता है. बच्चों, युवाओं, हेल्थ वर्कर्स, यहां तक कि डॉक्टरों तक को सेक्सुअल हेल्थ की पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं मिलती. उनके मुताबिक, “जब लोग प्रोटेक्शन ही इस्तेमाल नहीं करते, इन्फेक्शन का अंदाज़ा नहीं होता और सेक्सुअल हाइजीन की समझ नहीं होती, तो बीमारी फैलना तय है. आज हालत यह है कि 25 साल पहले महीने में गिने-चुने मरीज आते थे, और अब एक दिन में 15–20 HIV केस देखने पड़ते हैं.”

पोस्ट-एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस: गलती के बाद भी बचाव मुमकिन

डॉ. रैना ने एक अहम जानकारी देते हुए कहा कि, यदि कोई व्यक्ति असुरक्षित संबंध बना ले और अगली सुबह उसे अपनी गलती का एहसास हो, तो 72 घंटों के अंदर डॉक्टर से संपर्क कर वह पोस्ट एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस (PEP) नाम की दवा शुरू कर सकता है 30 दिन तक यह दवा लेने पर HIV संक्रमण को रोका जा सकता है. लेकिन समस्या यह है कि देश में ज्यादातर लोग इस दवा के बारे में जानते ही नहीं, क्योंकि न तो उपयोगी प्रोग्राम हैं और न ही सही जानकारी.

कंडोम: छोटी सतर्कता, बड़ी सुरक्षा

डॉ. रैना के अनुसार कंडोम केवल HIV ही नहीं बल्कि सिफिलिस, गोनोरिया, हर्पीज़, क्लेमाइडिया जैसी गंभीर बीमारियों से भी बचाता है. इसलिए हर व्यक्ति को सुरक्षित संबंध बनाना चाहिए और मल्टीपल पार्टनर्स से बचना चाहिए.

शादी से पहले HIV टेस्ट को अनिवार्य करने की अपील

डॉ. रैना बताते हैं कि उनके पास खूब ऐसे केस आते हैं जिसमें शादी के बाद पति या पत्नी को HIV हो जाता है और जांच में पता चलता है कि बीमारी शादी से पहले ही किसी एक को थी. वे कहते हैं, “लोग शादी के पहले कुंडली मिलाते हैं, लेकिन महज 400-500 रुपये का एक टेस्ट है, क्या शादी से पहले इसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता? इससे न केवल घर बचेंगे बल्कि ज़िंदगियाँ भी.”

HIV एक बार हुआ तो पूरी जिंदगी रहता है साथ

वे चेतावनी देते हैं कि HIV एक ऐसी बीमारी है जिसे शरीर से पूरी तरह निकालने का कोई तरीका नहीं है. एक बार संक्रमित होने पर व्यक्ति को जीवनभर दवाइयां, नियमित चेकअप, और विशेष डाइट एवं जिंदगीभर की सावधानियों के साथ जीना पड़ता है. दैनिक कसरत, हाई प्रोटीन डाइट और जीवनशैली में अनुशासन जरूरी हो जाता है.

युवाओं और होमोसेक्सुअल कम्युनिटी में तेज़ी से फैल रहा संक्रमण

डॉ. रैना के अनुसार कॉलेज जाने वाले युवाओं और होमोसेक्सुअल समुदाय में HIV संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े हैं, जिनमें 72% तक अधिक प्रभाव देखा जा रहा है. वे कहते हैं कि बच्चों को गुड टच-बैड टच, सुरक्षित संबंध, और शरीर की समझ के बारे में शिक्षित किए बिना समाज को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता.

भारत में खुले संवाद की कमी

कई देशों में HIV जागरूकता के लिए रैलियां, परेड और सार्वजनिक कार्यक्रम होते हैं, लेकिन भारत में यह विषय अभी भी छिपाया जाता है. डॉ. रैना का मानना है कि सिर्फ एक दिन की जागरूकता से कुछ नहीं होगा. हेल्थ एजुकेशन में STDs को उतनी ही जगह देनी होगी जितनी रेस्पिरेटरी या कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम को दी जाती है.

WHO गाइडलाइंस पर आधारित आधुनिक इलाज मौजूद

आज तकनीक इतनी बढ़ चुकी है कि अगर माता-पिता दोनों HIV पॉजिटिव हों, लेकिन दवा नियमित रूप से लें, तो भी बच्चा HIV नेगेटिव पैदा हो सकता है. एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी से वायरस को इतना कम किया जा सकता है कि वह दूसरों में संक्रमित न हो.

घर में HIV मरीज हो तो किन बातों का रखें ध्यान?

यदि किसी परिवार में HIV संक्रमित व्यक्ति है और उसकी हालत गंभीर है, तो उनके बर्तन, कपड़े और तौलिए अलग रखें, साबुन आदि अलग रखें. ना उनका झूठा खाना है और ना ही देना है. उन्हें डॉक्टर को दिखा के, एंटी-वायरल थेरेपी शुरू करवाएं. इसके अलावा उन्हें प्रोटीन डाइट देना बहुत ही ज़्यादा जरूरी है.

HIV के लक्षणों को न करें नजरअंदाज

लगातार बीमार रहना, बार-बार टाइफाइड या लूज़मोशन होना, कमजोरी, लगातार थकान, वजन कम होना, तेज़ बुखार—ये HIV के संकेत हो सकते हैं. संक्रमण बढ़ने पर टीबी, सिफिलिस, क्लेमाइडिया, हर्पीज़ या HPV जैसी अन्य बीमारियां भी होने की संभावना रहती है.

समाज जागेगा, तभी देश सुरक्षित होगा

डॉ. रैना कहते हैं, “मैं एक डॉक्टर होकर हाथ जोड़ कर लोगों से विनती करता हूं कि इस मुद्दे को उठाइए. टेस्टिंग को बढ़ावा दीजिए, सेक्स एजुकेशन को पढ़ाइए, सुरक्षित संबंध को आदत बनाइए. आज कदम उठाएंगे, तभी आने वाली पीढियां स्वस्थ रहेंगी.”

इसे भी पढ़ें: Childbirth Lifespan: क्या बच्चे को जन्म देकर घट जाती है मां की उम्र? रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मोटापे के खिलाफ WHO ने दी GLP-1 हार्मोन-आधारित दवा को इजाजत, जानें कैसे काम करेगी यह मेडिसिन?

मोटापे के खिलाफ WHO ने दी GLP-1 हार्मोन-आधारित दवा को इजाजत, जानें कैसे काम करेगी यह मेडिसिन?



How GLP-1 Medicines Help Reduce Weight: मोटापे का मामला तेजी से बढ़ रहा है, इससे तमाम तरह की बीमारियां हो रही हैं. इसीलिए दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे मोटापे की समस्या से निपटने के लिए WHO ने एक बड़ा कदम उठाया है. WHO ने पहली बार साफ कहा है कि नई पीढ़ी की वजन कम करने वाली दवाएं GLP-1 थैरेपीमोटापा कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. इन दवाओं में ओजेम्पिक और मौन्जारो जैसे मशहूर ब्रांड शामिल हैं, जो हाल के वर्षों में बेहद लोकप्रिय हुए हैं.

WHO के मुताबिक मोटापा अब सिर्फ एक लाइफस्टाइल इश्यू नहीं, बल्कि एक क्रॉनिक और री-लैप्सिंग बीमारी है, जिसे लंबे समय तक इलाज और देखभाल की जरूरत होती है. इसलिए संस्था ने सलाह दी है कि वयस्कों में मोटापे के इलाज के लिए GLP-1 दवाओं को लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर विचार किया जाना चाहिए. हालांकि इससे गर्भवती महिलाओं को बाहर रखा गया है.

मोटापे का खतरनाक स्तर

2022 में मोटापे या बढ़े हुए वजन से जुड़ी बीमारियों के कारण 37 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई. यह संख्या मलेरिया, टीबी और HIV की कुल मौतों से भी अधिक है. WHO का अनुमान है कि अगर स्थिति नहीं बदली तो 2030 तक दुनिया में मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या दोगुनी हो जाएगी. WHO प्रमुख डॉ. टेड्रोस अधानोम का कहना है कि “मोटापा एक वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती है. दवाएं अकेले इस संकट को खत्म नहीं कर सकतीं, लेकिन GLP-1 थैरेपी लाखों लोगों को मोटापा कम करने और उससे जुड़े खतरों को घटाने में मदद कर सकती है.” हालांकि WHO ने यह भी कहा कि अभी भी इन दवाओं के लंबे समय के प्रभाव और सुरक्षा पर और डेटा की जरूरत है.

 

जादुई इलाज नहीं, लेकिन अहम हथियार

 WHO का कहना है कि GLP-1 दवाओं को सिर्फ दवा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें कई चीजों के साथ जोड़ना चाहिए जिनमें-

  • बेहतर खानपान
  • नियमित शारीरिक एक्सरसाइज
  • व्यवहार में बदलाव

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

रायपुर स्थित शहीद अस्पताल में  एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. शैलेश जेना कहते हैं कि WHO की यह नई गाइडलाइन सही दिशा में उठाया गया कदम है. उनके अनुसार “GLP-1 दवाओं ने मोटापे के इलाज में उम्मीद से कहीं बेहतर नतीजे दिए हैं. ये दवाएं भूख को नियंत्रित करती हैं, मेटाबॉलिज्म बेहतर करती हैं और इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाती हैं. ऐसे में जिन मरीजों पर डाइट और वर्कआउट का असर सीमित रहता है, उनके लिए यह एक बड़ी सहायता साबित हो सकती हैं.” डॉ. शैलेश जेना के मुताबिक मोटापा एक साधारण वजन बढ़ने की समस्या नहीं, बल्कि शरीर में होने वाला मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है, जिसे लंबी अवधि की मैनेजमेंट की जरूरत होती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या मछली के स्पर्म से बना इंजेक्शन बढ़ाता है खूबसूरती? ब्यूटी मार्केट का यह ट्रेंड कर देगा हैर

क्या मछली के स्पर्म से बना इंजेक्शन बढ़ाता है खूबसूरती? ब्यूटी मार्केट का यह ट्रेंड कर देगा हैर



Skin Regeneration Therapy: लोग खूबसूरत दिखने के लिए नया-नया ट्रेंड ट्राई कर रहे हैं, उन्हीं में से एक है ट्राउट मछली का स्पर्म इंजेक्ट. इसका चलन काफी तेजी के साथ बढ़ा है, खासकर पश्चिमी देशों में. इसमें लोगों को एस्थेटिक क्लिनिक में पतली-सी कैनुला उनके गाल में धीरे से धंसाई जाती है, वह हल्की-सी दर्द भरी आवाज निकालती हैं. इनमें से बहुत से लोगों को ट्राउट स्पर्म अपनी असली अवस्था में नहीं दिया जा रहा. उनके चेहरे के निचले हिस्से में ट्राउट या साल्मन मछली के स्पर्म से निकाले गए छोटे-छोटे डीएनए फ्रैगमेंट डाले जा रहे हैं, जिन्हें ‘पॉली-न्यूक्लियोटाइड्स’ कहा जाता है.

लेकिन आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ती है?

अब आते हैं इस बात पर कि इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है. इससे पहले एक दिलचस्प बात हमारा डीएनए और मछली का डीएनए काफी हद तक एक-दूसरे से मिलता-जुलता है.
इसी वजह से माना जाता है कि एबी का शरीर इसे आसानी से स्वीकार कर लेता है. बदले में उनकी त्वचा के सेल्स सक्रिय हो जाते हैं और ज्यादा कोलेजन व इलास्टिन बनाने लगते हैं. यही दोनों प्रोटीन हमारी त्वचा को मजबूती, कसावट और यंग होने का फील देते हैं. एबी का उद्देश्य है, अपनी त्वचा को रिफ्रेश करना, हेल्दी रखना और कई सालों से परेशान कर रहे मुंहासों के निशानों को हल्का करना.

इसको लेकर क्या कहते हैं एक्सपर्ट

पॉली-न्यूक्लियोटाइड्स को स्किनकेयर की दुनिया में नया चमत्कार बताया जा रहा है. ब्रिटेन समेत कई देशों में यह उपचार तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. कई सेलिब्रिटीज तो खुलेआम अपने साल्मन स्पर्म फेशियल का जिक्र कर चुके हैं. कुछ समय पहले ब्रिटिश पॉप स्टार चार्ली XCX ने भी बताया कि उन्हें लगता है फिलर्स अब पुराने पड़ चुके हैं और वह अब पॉली-न्यूक्लियोटाइड्स पर भरोसा करती हैं कि जिन्हें वह “डीप स्किन विटामिन्स” जैसी चीज बताती हैं.

क्या वाकई यह स्किनकेयर में बदलाव ला रहा है?

डर्मा फोकस नाम की कंपनी में काम करने वाली सुजैन मैन्सफ़ील्ड कहती हैं कि  “हमें लगता है जैसे हम बेंजामिन बटन वाले पल जी रहे हों.” उनका इशारा उस फिल्म की तरफ था जिसमें ब्रैड पिट का किरदार उम्र के साथ उलटी दिशा में बढ़ता है और समय के साथ जवान होता जाता है. हालांकि वैसा चमत्कार तो संभव नहीं, लेकिन मैन्सफील्ड मानती हैं कि पॉली-न्यूक्लियोटाइड्स स्किन रीजनरेशन की नई दिशा खोल रहे हैं. कुछ शुरुआती रिसर्च बताती हैं कि ये इंजेक्शन त्वचा को नया जीवन दे सकते हैं, झुर्रियों, निशानों और फाइन लाइंस को कम कर सकते हैं.

6-9 महीने में बूस्टर जरूरी

सुज़ैन कहती हैं कि यह उपचार उन्हीं तत्वों का उपयोग करता है जिन्हें हमारा शरीर पहले से जानता है कि यही इसकी खासियत है. लेकिन इसकी कीमत भी कम नहीं. एक सीजन की लागत 200 से 500 पाउंड तक होती है और तीन सत्रों की सलाह दी जाती है. इसके बाद हर 6 से 9 महीने में एक बूस्टर.

साइड इफेक्ट्स 

कुछ रिसर्च इसे सुरक्षित बताते हैं, लेकिन कई एक्सपर्ट इसकी तेज लोकप्रियता को लेकर सतर्क हैं, उन्हें लगता है कि हाइप इसके विज्ञान से आगे निकल रही है. ऑस्ट्रेलियाई स्किन एक्सपर्ट डॉ. जॉन पाग्लियारी कहते हैं कि  “हम जानते हैं कि न्यूक्लियोटाइड्स शरीर के लिए जरूरी हैं, लेकिन क्या साल्मन डीएनए के छोटे टुकड़े इंजेक्ट करना वाकई हमारे अपने डीएनए जैसा असर देगा? हमारे पास पर्याप्त डेटा ही नहीं है.”

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क्या बच्चे को जन्म देकर घट जाती है मां की उम्र? रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

क्या बच्चे को जन्म देकर घट जाती है मां की उम्र? रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा



How Childbirth Affects Women’s Long-Term Health: क्या आने कभी कहीं ऐसा पढ़ा या सुना है कि बच्चे को जन्म देने के बाद मां की उम्र कम हो जाती है, शायद हो सकता है. हालांकि हम में से काफी लोग इसके बारे में नहीं जानते हैं. रिकॉर्ड बताते हैं कि कई बार एक-एक बच्चे को जन्म देने पर महिलाओं की उम्र करीब छह महीने तक घट सकती है.  खासकर वे महिलाएं जो कठिन या खराब हालात में जिंदगी गुजार रही हों, उनमें इसका असर और भी ज्यादा देखा गया है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं कि इस बात में कितनी सच्चाई है. 

क्या निकला रिसर्च में?

मानव विकास पर काम कर रहे शोधकर्ताओं ने 1866 से 1868 के बीच आए ग्रेट फिनलैंड अकाल के दौरान वहां की 4,684 महिलाओं के रिकॉर्ड का अध्ययन किया. नीदरलैंड्स की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रोनिंगन के शोधकर्ता डॉक्टर युआन यांग बताते हैं कि यह “यूरोप के हालिया इतिहास के सबसे भयावह अकालों में से एक” था. डॉ. यांग, प्रोफेसर हन्ना डगडेल, प्रोफेसर विर्पी लूमा और डॉक्टर एरिक पोस्टमा की टीम ने पाया कि अकाल के उन वर्षों में हर बार बच्चे के जन्म पर महिलाओं की अनुमानित उम्र लगभग छह महीने कम होती चली गई. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट  का मानना है कि ऐसे मुश्किल हालात में महिलाएं अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा गर्भधारण और बच्चे को जन्म देने में लगा देती थीं, जिसकी वजह से उनके शरीर की सेल्स को उतनी मजबूती नहीं मिल पाती थी. इससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता था.  दिलचस्प बात यह है कि अकाल से पहले या बाद में बच्चे पैदा करने वाली महिलाओं में उम्र पर ऐसा असर नहीं दिखाय  डॉ. यांग कहते हैं, “यह बदलाव हमें सिर्फ उन्हीं महिलाओं में दिखा, जो अकाल आने के समय प्रजनन वाली उम्र में थीं.” उनके अनुसार यह साफ संकेत देता है कि बच्चे पैदा करने वाले वर्षों में वातावरण महिला की सेहत पर गहरा असर डालता है. 

क्या मां बनने का असर उम्र पर पड़ता है?

एक वजह यह हो सकती है कि कठिन परिस्थितियों में बच्चे पैदा करने का दबाव महिलाओं की लंबी-अवधि वाली सेहत को ज्यादा प्रभावित करता है. यह पहले से जाना हुआ तथ्य है कि माताओं में दिल की बीमारियों और मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, जिसका संबंध वजन बढ़ने और शारीरिक तनाव से है.

बच्चों की संख्या और उम्र की ‘तुलना’

इस रिसर्च में देखा गया कि ज्यादा बच्चों वाली महिलाओं में यह प्रभाव और स्पष्ट था. हालांकि हर महिला एक-जैसी प्रभावित नहीं हुई. शोधकर्ताओं के मुताबिक यह स्थिति तब ज्यादा दिखती है जब महिलाएं लगातार कई बच्चों को जन्म दे रही हों या हालात बेहद कठिन हों, जैसे अकाल.  अब सवाल यह है कि क्या दो सौ साल पहले की महिलाओं पर आधारित निष्कर्ष आज की महिलाओं पर लागू हो सकते हैं?

डॉ. यांग का कहना है कि इन परिणामों को उस दौर के हिसाब से समझना होगा. 2023 में औसतन एक महिला दो से थोड़े अधिक बच्चों को जन्म दे रही थी. यह बदलाव शिक्षा, नौकरी के अवसर, गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता और बच्चों की मौत की कम दर के कारण आया. डॉ. यांग का कहना है कि इस विषय पर और रिसर्च की जरूरत है, लेकिन यह परिणाम बताते हैं कि दुनिया के कुछ इलाकों में ये बातें आज भी लागू हो सकती हैं.

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सर्दियों में फटाफट कम हो जाएगा वजन, ये देसी नुस्खे आजमाएं तो तुरंत मिलेगा फायदा

सर्दियों में फटाफट कम हो जाएगा वजन, ये देसी नुस्खे आजमाएं तो तुरंत मिलेगा फायदा



सर्दियां आते ही हमारी लाइफस्टाइल काफी बदल जाती है. मौसम ठंडा होता है, शरीर सुस्त पड़ जाता है और ज्यादातर समय रजाई-कंबल में बिताने का मन करता है.ऐसे में लोग गर्म-गर्म और टेस्टी चीजें जैसे परांठे, हलवा, पकौड़े, समोसे, चाय-कुकीज और तली-भुनी चीजें ज्यादा खाने लगते हैं. कम एक्टिविटी और ज्यादा कैलोरी वाला खाना मिलकर वजन को तेजी से बढ़ा देता है.

बहुत से लोग इस मौसम में वजन बढ़ने की वजह से परेशान रहते हैं और बाद में इसे कम करना मुश्किल लगने लगता है. लेकिन अच्छी बात यह है कि सर्दियों में जिस तरह वजन बढ़ना आसान है, उसी तरह वजन कम करना भी आसान हो जाता है. ऐसे में सही खान-पान, थोड़ी सी सावधानी और कुछ देसी घरेलू नुस्खों की जरूरत है. अगर आप ठंड के मौसम में अपनी डाइट में कुछ खास चीजें शामिल कर लें, तो पेट की चर्बी और बढ़ते वजन को आसानी से काबू में किया जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि कौन से देसी नुस्खे आजमाएं, जिससे सर्दियों में फटाफट वजन कम हो जाएगा और तुरंत फायदा मिलेगा. 

सर्दियों में वजन क्यों बढ़ता है?

ठंड के कारण शरीर आलसी हो जाता है और लोग कम चल-फिरते हैं. ज्यादातर समय रजाई में बिताने से कैलोरी बर्न बहुत कम होती है. रात में भारी खाना, तला-भुना और अधिक तेल-घी का सेवन वजन बढ़ाता है. सर्दियों में चाय-कुकीज और मीठा ज्यादा खाया जाता है, जिससे फैट जमने लगता है. लेकिन ठंड में शरीर खुद को गर्म रखने के लिए ज्यादा एनर्जी खर्च करता है. इसका मतलब आपकी बॉडी नैचुरली कैलोरी ज्यादा बर्न करती है.अगर इस समय सही खान-पान और घरेलू नुस्खे अपनाए जाएं, तो वजन बहुत जल्दी घटने लगता है. 

वजन कम करने के आसान और देसी नुस्खे

1. सुबह धूप जरूर लें: सुबह 10 से 15 मिनट धूप लेने से विटामिन D मिलता है, जिससे मेटाबॉलिज्म अच्छा रहता है. शरीर की एनर्जी बढ़ती है और वजन घटाने में मदद मिलती है. 

2. खाली पेट गुनगुना पानी पिएं: गर्म पानी शरीर में जमा टॉक्सिन निकालता है और पाचन को सही रखता है. रोज सुबह 1 से 2 गिलास गुनगुना पानी वजन घटाने में मददगार होता है. 

3. डाइट में फल, सब्जियां और दालें शामिल करें: फाइबर से भरपूर चीजें खाने से पेट देर तक भरा रहता है और ओवरईटिंग नहीं होती है. गेहूं, दाल, सलाद, सूप सर्दियों में वजन घटाने के लिए बहुत असरदार हैं. 

4. ग्रीन टी: तेजी से वजन घटाने वाले के लिए दिन में 2 से 3  बार ग्रीन टी पिएं. ग्रीन टी में मौजूद कैटेचिन फैट को जल्दी तोड़ते हैं और मेटाबॉलिज्म बढ़ाते हैं. 

5. एलोवेरा जूस: वजन कम करने के लिए सुबह खाली पेट आधा कप एलोवेरा जूस पिएं.  एलोवेरा जूस मेटाबॉलिक रेट बढ़ाता है और पाचन प्रक्रिया को सुधारता है. इससे फैट तेजी से बर्न होता है. 

6. शहद और नींबू:  तेजी से वजन घटाने वाले के लिए एक गिलास गर्म पानी में आधा नींबू और 1 से 2 चम्मच शहद मिलाकर दिन में 2 से 3 बार पिएं. नींबू का विटामिन C फैट ऑक्सीडेशन तेज करता है और शहद शरीर की चर्बी कम करने में मदद करता है. 

7. काली मिर्च: काली मिर्च में पाइपरिन नाम का तत्व होता है, जो फैट को कम करने में मदद करता है. वजन घटाने वाले के लिए अपने खाने में रोज एक चुटकी काली मिर्च डालें. 

8. सेब का सिरका:  वजन कम करने के लिए 1 गिलास पानी में 1 चम्मच सेब का सिरका मिलाकर सुबह पिएं. इसमें मौजूद एसिटिक एसिड सूजन कम करता है और फैट बर्निंग बढ़ाता है. 

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किन तरीकों से रख सकते हैं अपने दिल को सुरक्षित? आप भी जान लें ये बेहद काम के टिप्स

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