सर्दियों में नहीं होगी इम्युनिटी कम होने की प्रॉब्लम, घर में ऐसे बनाएं आयुर्वेदिक काढ़ा

सर्दियों में नहीं होगी इम्युनिटी कम होने की प्रॉब्लम, घर में ऐसे बनाएं आयुर्वेदिक काढ़ा



Winter Health Tips: सर्दियों के शुरू होते ही कई लोगों को ठंड से होने वाली बीमारियां शुरू हो जाती हैं, जैसे खांसी, जुकाम, गले की बीमारी आदि. तापमान कम होते ही इसका असर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता या इम्युनिटी पर पड़ता है, जिससे हमें कई और बीमारियां होने का खतरा बना रहता है. और एक बात यह भी है कि लोग सर्दियों में ज़रा सी तबीयत खराब होने पर, जैसे खांसी, जुकाम, गले में बलगम जमना आदि, सीधे डॉक्टरों के पास दवाइयों के लिए भागते हैं, जो कि गलत है. ज्यादा दवाइयों का सेवन करना हमारी सेहत के लिए हानिकारक होता है. अगर आपको नॉर्मल सर्दियों वाली बीमारी है तो आप आयुर्वेदिक काढ़े का सेवन कर सकते हैं, जो आपकी इम्युनिटी बढ़ाने और शरीर को तंदुरुस्त तथा बीमारियों से मुक्त करने में मदद करता है.

आयुर्वेदिक काढ़ा कैसे बनाएं?

आयुर्वेदिक काढ़े का सेवन हमारे भारत में प्राचीन समय से बीमारियों को खत्म करने के लिए किया जा रहा है, जिसे आप अपने घर में भी आसानी से बना सकते हैं. घर में ही आयुर्वेदिक काढ़ा बनाने के लिए हमारी रसोई में आसानी से मौजूद चीजें जैसे हल्दी, दालचीनी, तुलसी के कुछ पत्ते, लौंग और काली मिर्च जैसी रोजमर्रा की मसालों की जरूरत पड़ेगी. इसे बनाने के लिए एक बर्तन में जितना आपको काढ़ा बनाना है उतना पानी डालें. आसान तरीके से समझने के लिए बर्तन में 2-3 गिलास पानी डालकर उसे उबालें. फिर 3-4 तुलसी के पत्ते डालें और आधी कटी हुई अदरक को भी उबलते पानी में डालें. फिर दो-तीन लौंग, थोड़ी दालचीनी और चुटकी भर हल्दी डालकर धीमी आंच पर उबालें. इसे तब तक पकाएं जब तक बर्तन में पानी आधा न रह जाए. तैयार हुए काढ़े को छानकर थोड़ा गुड़ या शहद मिलाकर गर्म-गर्म पिएं, जिससे आपकी इम्युनिटी मजबूत रहेगी. आयुर्वेदिक काढ़े में उपयोग होने वाली सभी चीजें हमारी रसोई में ही मिल जाती हैं.

आयुर्वेद के अनुसार सर्दियों के मौसम में काढ़ा पीने से हमारी पाचन शक्ति भी मजबूत होती है, जिससे हमारा खाना पेट में आसानी से पच जाता है. इसके सेवन से ठंड से होने वाली बीमारियां छूमंतर हो जाती हैं, जैसे काढ़े के सेवन से गले में जमा कफ और बलगम खत्म हो जाता है. सर्दियों में शरीर में होने वाला जोड़ों का दर्द भी काफी कम होता है. और काढ़े को सिर्फ बड़े और वृद्ध लोग ही नहीं, बच्चे भी पी सकते हैं, क्योंकि ठंड में सबसे ज्यादा बीमार बच्चे ही होते हैं. उनकी इम्युनिटी बढ़ाने के लिए माता-पिता को उन्हें काढ़ा जरूर पिलाना चाहिए.

आयुर्वेदिक काढ़ा बनाने की सामग्री

  • 8–10 तुलसी की पत्तियां
  • 1 टुकड़ा आधी पीसी हुई अदरक
  •  4–5 काली मिर्च (हल्की कुचली हुई)
  •  5–6 लौंग
  • 1 छोटा टुकड़ा दालचीनी
  • 1/4 चम्मच हल्दी
  • 2 गिलास पानी
  • 2–3 चम्मच शहद

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एड्स के मामलों में सबसे आगे है ये राज्य, HIV के केस भी बढ़े, एलर्ट पर सरकार, जानें क्या कहा?

एड्स के मामलों में सबसे आगे है ये राज्य, HIV के केस भी बढ़े, एलर्ट पर सरकार, जानें क्या कहा?



HIV cases rise in Andhra Pradesh: देश भर में आईटी कर्मचारियों में एचआईवी के मामले दर्ज होने पर आंध्र प्रदेश राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सत्यकुमार यादव ने चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि विलासितापूर्ण जीवन और नशीली दवाओं के उपयोग जैसे कारणों से यह प्रवृत्ति नई लग रही है. राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के अवलोकन में, आईटी क्षेत्र के लोगों में एचआईवी का प्रसार बढ़ रहा है, यह हाल ही में पाया गया. मंत्री ने इस मामले में राज्य एड्स नियंत्रण संगठन को भी सतर्क रहने का आदेश दिया. 

नशीली दवाओं से युवा रहे दूर- स्वास्थ्य मंत्री 

मंत्री ने युवाओं से नशीली दवाओं से दूर रहने का आग्रह किया. उन्होंने ‘सुरक्षित’ यौन प्रथाओं को अपनाने का सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि माता-पिता को बच्चों को सुरक्षित यौन संबंध और एड्स की गंभीरता के बारे में जागरूक करना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी को भी एड्स रोगियों के प्रति भेदभाव नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि एचआईवी छात्रों के मामले में ज्यादा सावधान रहना चाहिए. विजयवाड़ा के तुम्मलपल्ली कलाक्षेत्र में ‘विश्व एड्स दिवस- 2025’ कार्यक्रम आयोजित किया गया.

मुख्य अतिथि के रूप में आए मंत्री श्री सत्यकुमार ने कहा कि सरकार के संज्ञान में आया है कि डॉक्टर एचआईवी रोगियों में बीमार लोगों के लिए आवश्यक सर्जरी करने से इनकार कर रहे हैं. मंत्री ने कहा कि अगर एचआईवी रोगियों को जिलों में लोकपाल के रूप में नियुक्त डीएम एंड एचओ से शिकायत की जाती है तो पीड़ितों को न्याय मिलेगा. उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाओं को सरकार के ध्यान में भी लाया जा सकता है. 

मंत्री ने कहा कि एचआईवी रोगियों को हर महीने दवा (एआरटी) के लिए दूर-दराज के अस्पतालों में जाने में कुछ समस्याएं हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के अनुरोधों के मुताबिक, पश्चिम गोदावरी और नेल्लोर जिलों में चुनिंदा पीएचसी में एआरटी दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं. उन्होंने कहा कि सरकार पीड़ितों से प्राप्त अनुरोधों के मुताबिक अन्य स्थानों पर भी ऐसी सुविधा प्रदान करने के लिए तैयार है.

2030 तक एड्स मुक्त राज्य बनाने का प्रयास 

मंत्री सत्यकुमार ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें 2030 तक एड्स मुक्त देश और राज्य बनाने का प्रयास कर रही हैं. इस क्रम में, उन्होंने कहा कि वर्तमान में आंध्र प्रदेश एचआईवी के नए मामलों को नियंत्रित करने में पहले स्थान पर है. आगे कहा कि 2015-16 में जांच किए गए लोगों में 2.34% पॉजिटिविटी दर्ज की गई, जबकि 2024-25 तक यह 0.58% तक घट गई. उन्होंने कहा कि 2024-25 में 13,383 नए मामले सामने आए. उन्होंने कहा कि जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजन और लोगों में बदलाव के कारण मामले कम हो रहे हैं.

दवाओं के उपयोग से मौतों की संख्या भी कम हुई है. उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें हर साल एचआईवी रोगियों को 30,000 रुपये से 40,000 रुपये मूल्य की दवाएं प्रदान कर रही हैं. मंत्री ने एड्स रोग नियंत्रण संगठन के अधिकारियों और कर्मचारियों को बधाई दी, जो 2030 तक नए मामलों को रोकने के लक्ष्य के साथ काम कर रहे हैं.

उन्होंने टिप्पणी की कि एड्स पर शुरुआती डर अब मौजूद नहीं है. उन्होंने कहा कि इस लापरवाही से काम नहीं चलेगा कि एड्स होने से जान नहीं जा रही है. मंत्री सत्यकुमार ने खुलासा किया कि वर्तमान में 42,000 एचआईवी रोगियों को सरकार से पेंशन मिल रही है. उन्होंने कहा कि 95,000 नए आवेदन सरकार के विचाराधीन हैं. उन्होंने घोषणा की कि इनमें से योग्य लोगों को जल्द ही पेंशन स्वीकृत करने के लिए कदम उठाए जाएंगे.

सतर्क करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए

राज्य एड्स नियंत्रण संगठन के परियोजना निदेशक नीलकंठारेड्डी ने कहा कि समाज को सतर्क करने के लिए एड्स जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. उन्होंने युवाओं से सही रास्ते पर चलने का आग्रह किया. इस कार्यक्रम में विधायक गद्दे राममोहन राव, माध्यमिक स्वास्थ्य निदेशक चक्रधर बाबू, एनटीआर जिला कलेक्टर लक्ष्मीशा और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया. छात्रों ने एचआईवी के प्रति सावधान रहने और पीड़ितों के प्रति भेदभाव नहीं करने के बारे में ‘स्किट’ प्रस्तुत किए, जिसने दर्शकों का मनोरंजन किया. मंत्री सत्यकुमार ने एड्स मामलों को नियंत्रित करने के लिए काम करने वालों में से कई को सम्मानित किया.

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प्रदूषण से परेशान हुए दिल्ली-एनसीआर वाले, इतने लोग कर रहे शहर छोड़ने की तैयारी

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Why People Are Leaving Delhi: दिल्ली में हवा इस समय काफी खराब है. एक तरफ जहां उत्तर भारत ठंड की मार झेल रहा है, तो वही दिल्ली ठंड के साथ-साथ प्रदूषण की मार भी झेल रही है.आनंद विहार, गाजीपुर, इंडिया गेट और कर्तव्य पथ, आईटीओ और अक्षरधाम मंदिर जैसे इलाकों में कोहरे  की चादर ने सूरज की रोशनी को भी थोड़ा हल्का कर दिया. दिल्ली की बदतर होती हवा अब लोगों को मुश्किल फैसले लेने पर मजबूर कर रही है. कई परिवार शहर छोड़कर बेंगलुरु जैसे साफ हवा वाले शहरों में बसने लगे हैं. कई ऐसे परिवार है, जिन्होंने दिल्ली की गलियों में अपनी जिंदगी गुजारी लेकिन अब जिंदगी बचाने के लिए दिल्ली की गलियों को छोड़कर जाने के लिए मजबूर हैं. 

दिल्ली छोड़ रहे लोग

कहानी अब सिर्फ एक, दो परिवार की नहीं रही. पिछले हफ्ते सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हुई, जिसमें एक प्रोफेशनल ने बताया कि उनकी पत्नी ने बच्चे की सेहत के डर से दिल्ली की प्रदूषित हवा छोड़ने के लिए एक प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी तक छोड़ दी. इस पोस्ट ने दिल्ली-एनसीआर की असुरक्षित हवा को लेकर लोगों के भीतर दबी हताशा और बेचैनी को बाहर ला दिया. पिछले कई हफ्तों से शहर की एयर क्वालिटी खराब  श्रेणी में अटकी हुई है. अब प्रदूषण सिर्फ मौसम का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि लोगों की लाइफस्टाइल और भविष्य के फैसलों को प्रभावित करने लगा है.

कई लोग सर्दियां गुजर जाने तक किसी दूसरी जगह चले जाते हैं, जबकि कुछ स्थायी रूप से शहर छोड़ने का फैसला कर रहे हैं. कई लोगों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि “शायद मैं दिल्ली की हवा का आदी हो गया था, पर हर सर्दी में माता-पिता की तबीयत बिगड़ने लगी थी. बच्चे के आने के बाद तो तय हो गया कि अब रुकना नहीं है. नौकरी दूसरे शहर  में मिली और हमने घर भी वही ले लिया. वापस आने का कोई कारण नहीं दिखता.” कुछ लोग मजबूरी में शहर में रुक तो जाते हैं, लेकिन जीवन आसान नहीं रहा.  कुछ लोग काम के सिलसिले से प्रदूषण वाले महीनों में शहर से बाहर निकल जाते हैं.  बाकी लोग रानीखेत, मसूरी, चैल या कसौली जैसे पहाड़ी इलाकों में कुछ हफ्ते बिताकर राहत ढूंढते हैं.

सबके लिए आसान नहीं

हालांकि, हर किसी के लिए शहर छोड़ देना इतना आसान नहीं है. जैसा कि एक यूज़र ने एक्स पर लिखा कि हर कोई जगह छोड़कर नहीं जा सकता. अधिकतर लोग नौकरी या मजबूरियों में बंधे होते हैं. असली ज़रूरत है सक्षम प्रशासन की और मजबूत नीतियों की. भाग जाना आसान है, लेकिन समस्या को ठीक करना मुश्किल.

इसे भी पढ़ें: Patient Rights in Hospital: अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीज के ये होते हैं अधिकार, जान लें अपने काम की बात

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कोविड वैक्सीन से गंभीर दुष्प्रभाव का खुलासा! मायोकार्डिटिस के चलते 10 बच्चों की मौत का दावा

कोविड वैक्सीन से गंभीर दुष्प्रभाव का खुलासा! मायोकार्डिटिस के चलते 10 बच्चों की मौत का दावा



Corona Vaccine: दुनिया की महाशक्ति अमेरिका में कोरोना वैक्सीन की सुरक्षा पर एक बड़ी चिंता सामने आई है. मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के एक आंतरिक डॉक्यूमेंट के लीक होने से यह बात सामने आई है कि कोविड-19 वैक्सीन लेने के बाद 10 बच्चों की मौत हुई थी. बताया जा रहा है कि इन बच्चों में वैक्सीन के बाद मायोकार्डिटिस यानी दिल की मांसपेशियों में सूजन पाई गई, जो खतरनाक साबित हुई.

‘कॉन्फिडेंशियल मेमो’ में लिखी हुई थी जानकारी

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह जानकारी एक ‘कॉन्फिडेंशियल मेमो’ में लिखी हुई थी, जिसे FDA के चीफ मेडिकल ऑफिसर विनय प्रसाद ने तैयार किया था. इस मेमो में बच्चों में मायोकार्डिटिस के मामलों का जिक्र किया गया है. मायोकार्डिटिस को अब तक वैक्सीन का दुर्लभ दुष्प्रभाव माना जाता था, लेकिन इस डॉक्यूमेंट के सामने आने के बाद कई सवाल उठने लगे हैं.

हालांकि, इन रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि प्रभावित बच्चों की उम्र क्या थी और उन्हें किस कंपनी की वैक्सीन दी गई थी. साथ ही, यह भी साफ नहीं है कि यह डॉक्यूमेंट आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किया गया है या अभी भी उसकी पुष्टि बाकी है.

सुरक्षा को लेकर उठे सवाल

अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसियां अब तक बच्चों के लिए कोरोना वैक्सीन को सुरक्षित बताती रही हैं, लेकिन आंतरिक रिपोर्ट के लीक होने के बाद अभिभावकों के मन में डर बढ़ गया है. कई विशेषज्ञ भी इस पर चर्चा कर रहे हैं कि वैक्सीन के दुर्लभ दुष्प्रभावों पर और गहराई से अध्ययन करने की जरूरत है. रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि FDA के शीर्ष अधिकारियों ने मेमो में लिखी बातों की पुष्टि की है, हालांकि इस विषय पर अभी कोई आधिकारिक प्रेस रिलीज या विस्तृत बयान जारी नहीं हुआ है.

नियमों में बदलाव की चर्चा

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस घटना के बाद वैक्सीन की मंजूरी प्रक्रिया में कई बड़े बदलावों पर विचार किया जा रहा है. कहा जा रहा है कि अब क्लीनिकल ट्रायल में हर आयु वर्ग के लोगों को शामिल करना अनिवार्य किया जाएगा, ताकि किसी भी दुष्प्रभाव की पहचान समय रहते हो सके.

अभिभावकों में बढ़ी चिंता

इस खबर के आते ही अमेरिका के साथ-साथ दुनिया भर के माता-पिता चिंतित हो गए हैं. बच्चों के लिए वैक्सीन कितनी सुरक्षित है. यह सवाल फिर से चर्चा में आ गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी किसी भी रिपोर्ट की पूरी तरह वैज्ञानिक जांच जरूरी है, ताकि भ्रम और डर फैलने से रोका जा सके.

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अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीज के ये होते हैं अधिकार, जान लें अपने काम की बात

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Patient Rights During Medical Treatment: अस्पताल और डॉक्टर अपनी ओर से पूरी कोशिश करते हैं कि हर मरीज को बेहतरीन इलाज मिले. लेकिन इलाज के दौरान कुछ जिम्मेदारियां मरीज की भी होती हैं, और साथ ही कुछ अधिकार भी, जिनके बारे में जानना बेहद जरूरी है. ज्यादातर अस्पताल इन अधिकारों और जिम्मेदारियों की सूची उपलब्ध कराते हैं ताकि मरीज और उनके परिजन इलाज का पूरा लाभ उठा सकें. चलिए आपको बताते हैं कि अगर आप अस्पताल में इलाज करवाते हैं, तो आपका अधिकार क्या-क्या है और इसके साथ वहां पर आपकी जिम्मेदारी क्या-क्या है. 

मरीज के अधिकार

मरीज को अस्पताल में रहते हुए निम्नलिखित अधिकार दिए जाते हैं.

  • इलाज की लागत जानने का अधिकार- किस प्रक्रिया या जांच का कितना खर्च आएगा  यह जानकारी मरीज को पहले से दी जानी चाहिए.
  •  इलाज करने वाले डॉक्टर और स्टाफ की पहचान जानने का अधिकार- इसका मतलब है कि मरीज को यह बताया जाना चाहिए कि उसका इलाज कौन-कौन कर रहा है.
  •  परामर्श और उपचार के दौरान प्राइवेसी का अधिकार- चाहे डॉक्टर से बातचीत हो, जांच या कोई प्रक्रिया, हर स्थिति में गोपनीयता बनाए रखी जानी चाहिए.
  • बिना भेदभाव सेवाएं पाने का अधिकार- धर्म, जाति, उम्र, रंग, लिंग, आर्थिक स्थिति या शारीरिक या मानसिक क्षमता के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.
  •  सुरक्षा का अधिकार- इसका मतलब यह है कि मरीज की सुरक्षा सर्वोपरि है.
  • स्वास्थ्य संबंधी सभी जानकारी पाने का अधिकार- इलाज क्या है, क्यों किया जा रहा है, जोखिम क्या हैं यह सब स्पष्ट बताया जाए.
  •  उपचार लेने या मना करने का अधिकार- मरीज अपनी इच्छा से इलाज को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है, बशर्ते जोखिम समझा दिया गया हो.
  • मेडिकल रिपोर्ट पाने का अधिकारअस्पताल की नीति के अनुसार सभी दस्तावेज मरीज को उपलब्ध कराए जाएं.
  •  जरूरत पड़ने पर दूसरे अस्पताल में रेफर करवाने का अधिकार
  •  दर्द और तकलीफ के प्रबंधन की जानकारी पाने का अधिकार
  •  सेवा की गुणवत्ता पर शिकायत दर्ज करने और उसका जवाब पाने का अधिकार
  • किसी भी प्रक्रिया, जांच, एनेस्थीसिया या रक्त चढ़ाने से पहले सहमति देने का अधिकार
  •  अपनी मेडिकल फाइल देखने की अनुमति पाने का अधिकार
  • पसंद का भोजन (डॉक्टर की सलाह के अनुसार) और अपने धर्म का पालन करने का अधिकार

मरीज की जिम्मेदारियां

जिस तरह मरीज के अधिकार हैं, उसी तरह कुछ जिम्मेदारियां भी हैं.

  • अपनी स्वास्थ्य स्थिति की सही और पूरी जानकारी देना- बीमारी, दवाओं और मेडिकल इतिहास से जुड़ी बातों को छुपाएं नहीं.
  •  पता, नाम और अन्य जरूरी विवरण सही देना- गलत जानकारी इलाज में बाधा डाल सकती है.
  •  इलाज से जुड़ी सलाह का पालन करना- दवाएं, डायट, जांच, जो भी निर्देश दिए जाएं, उनका पालन जरूरी है.
  • अस्पताल स्टाफ का सम्मान करना- डॉक्टर और स्टाफ आपकी मदद के लिए हैं, उनसे विनम्रता से पेश आएं.
  •  आपातकालीन मरीजों को प्राथमिकता मिलने की आवश्यकता समझें
  •  अस्पताल के नियम मानें- जैसे धूम्रपान निषेध, विजिटिंग आवर्स, मोबाइल फोन का उपयोग आदि.
  • इलाज से जुड़े आर्थिक दायित्वों को समय पर पूरा करना
  • किसी भी प्रक्रिया के लिए सूचित सहमति देना
  •  दवाएं दूसरों को न दें और न ही किसी की दवा खुद लें
  •  बीमा दावे के लिए सही और पूरी जानकारी उपलब्ध कराएं
  •  अपॉइंटमेंट समय पर लें और न आ पाने की स्थिति में जल्द बताएं
  •  कोई दिक्कत या हालत बिगड़ने पर तुरंत अस्पताल को सूचित करें
  •  फॉलो-अप विजिट समय पर करें
  • डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न शुरू करें
  •  अपने व्यवहार से दूसरे मरीजों और स्टाफ के लिए सुरक्षित वातावरण बनाए रखें

इसे भी पढ़ें- World AIDS Day 2025: बिहार में कितने लोग HIV पॉजिटिव? जानें इस बीमारी के लक्षण और बचाव के तरीके

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बिहार में कितने लोग HIV पॉजिटिव? जानें इस बीमारी के लक्षण और बचाव के तरीके

बिहार में कितने लोग HIV पॉजिटिव? जानें इस बीमारी के लक्षण और बचाव के तरीके



विश्व एड्स दिवस के मौके पर पूरे बिहार में जागरूकता का माहौल है. बिहार राज्य एड्स नियंत्रण समिति और स्वास्थ्य विभाग ने पटना से लेकर राज्य के हर जिले में रैली, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर-बैनर और सेमिनार का आयोजन किया गया. इसका मकसद लोगों को एचआईवी/एड्स के बारे में सही जानकारी देना, डर खत्म करना और बचाव के तरीके बताना था. 

बिहार में कितने लोग एचआईवी पॉजिटिव?

एबीपी न्यूज़ से खास बातचीत में बिहार राज्य एड्स नियंत्रण समिति के विभागाध्यक्ष एनके गुप्ता ने कई जरूरी बातें साफ-साफ बताईं. उन्होंने कहा कि बिहार में अभी करीब 97 हजार लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं. सबकी देखभाल हमारी समिति कर रही है. अच्छी बात यह है कि दवा नियमित चलती रहे तो यह बीमारी बढ़ती नहीं है और मरीज बिल्कुल सामान्य जिंदगी जी सकता है.

क्यों होता है एड्स?

एनके गुप्ता ने बताया कि एचआईवी वायरस चार मुख्य रास्तों से फैलता है.

  1. असुरक्षित यौन संबंध. सबसे ज्यादा मामले इसी वजह से सामने आते हैं.
  2. इस्तेमाल की हुई सुई. इस वजह से खासकर नशा करने वालों को एचआईवी होता है.
  3. संक्रमित खून चढ़ाने से.
  4. गर्भवती मां से बच्चे तक, लेकिन अब इसका भी इलाज है.

लोगों को रहती है यह गलतफहमी

एचआईवी पॉजिटिव होने को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि मां को एड्स है तो बच्चे को भी जरूर होगा. ऐसा बिल्कुल नहीं है. अगर गर्भावस्था के दौरान मां सही दवा लेती रहे तो 99 पर्सेंट तक बच्चा पूरी तरह हेल्दी पैदा होता है. बिहार में यह प्रोग्राम काफी अच्छी तरह चल रहा है. 

कब दिखने लगते हैं एड्स के लक्षण?

एनके गुप्ता ने बताया कि शुरुआती कई साल तक एचआईवी के कोई खास लक्षण नहीं दिखते हैं. जब इम्यूनिटी बहुत कमजोर हो जाती है यानी यह बीमारी अपनी आखिरी स्टेज में पहुंच जाती है, तब इसके लक्षण दिखने शुरू होते हैं. उन्होंने कहा कि अगर कोई बीमारी बार-बार हो रही है और ठीक नहीं हो रही तो एक बार एचआईवी टेस्ट जरूर करवा लें. इससे डरने की कोई बात नहीं है.

  • बार-बार बुखार आना
  • लंबे समय तक दस्त लगना, जो ठीक न हो
  • वजन तेजी से गिरना
  • मुंह में छाले, गले में इंफेक्शन
  • स्किन पर चकत्ते या फोड़े
  • बार-बार निमोनिया या टीबी होना

बचाव के ये तरीके बेहद आसान

  • हमेशा कंडोम इस्तेमाल करें.
  • नशा करने के लिए कभी सुई शेयर न करें.
  • सैलून में नया ब्लेड और टैटू बनवाते समय नई सुई ही इस्तेमाल हो.
  • खून चढ़वाने या ऑपरेशन से पहले अस्पताल का विश्वास करें, जो स्क्रीनिंग करता हो.
  • शक हो तो तुरंत टेस्ट करवाएं. इसका टेस्ट बिलकुल फ्री है.

एचआईवी से निपटने के लिए मुस्तैद है बिहार

  • पूरे राज्य में 186 एआरटी सेंटर (दवा देने वाले केंद्र) हैं.
  • इसकी दवा पूरी तरह मुफ्त है, जो जिंदगी भर मिलती रहेगी.
  • हर जिले के बड़े अस्पताल से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक मुफ्त टेस्टिंग की सुविधा.
  • टोल फ्री हेल्पलाइन 1800 180 5544 भी है.

किन लोगों को होती है दिक्कत?

एनके गुप्ता ने बताया कि जो लोग आखिरी स्टेज तक लापरवाही करते हैं, उनकी जान चली जाती है. वहीं, जो लोग टेस्ट करवाकर तुरंत दवा शुरू कर देते हैं, वे दशकों तक हेल्दी रहते हैं. आज एड्स से डरने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरत है.

ये भी पढ़ें: फैटी लिवर पेट में क्यों देता है तकलीफ? जानें शुरुआती संकेत और बचाव के तरीके

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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