Safe Motherhood And Maternal Health Care: भारत में मैटरनल हेल्थ के क्षेत्र में पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है. ‘द लैंसेट ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनाकोलॉजी एंड वीमेन हेल्थ’ में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार, देश की मैटरनल हेल्थ दर वर्ष 2000 में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 384 मौतों से घटकर 2023 में 88 रह गई है. यह गिरावट दुनिया में सबसे तेज सुधारों में से एक मानी जा रही है. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि इस उपलब्धि को आगे भी बनाए रखने के लिए एनीमिया जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या पर विशेष ध्यान देना होगा.
मैटरनल हेल्थ में सुधार के क्या हैं रीजन?
देश में महिलाओं की मैटरनल यात्रा अलग-अलग परिस्थितियों से गुजरती है. शहरी क्षेत्रों में कई महिलाएं शिक्षा, करियर और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए देर से परिवार बढ़ाने का निर्णय ले रही हैं. वहीं ग्रामीण इलाकों में महिलाएं कम उम्र में गर्भधारण तो कर लेती हैं, लेकिन उन्हें गर्भावस्था से पहले और बाद की नियमित हेल्थ सेवाएं पर्याप्त रूप से नहीं मिल पातीं. ऐसे में सुरक्षित मैटरनल हेल्थ सुनिश्चित करने के लिए व्यापक और निरंतर स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है.
57 प्रतिशत महिलाएं इस दिक्कत से जूझ रहीं हैं
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों के मुताबिक, 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं. पिछली सर्वे रिपोर्ट में यह आंकड़ा 53 प्रतिशत था. एक्सपर्ट के अनुसार एनीमिया गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग, इंफेक्शन और समय से पहले प्रसव जैसी दिक्कतों का खतरा बढ़ा देता है. यही वजह है कि इसे ब्लीडिंग से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों में गिना जाता है.
आयरन की कमी के क्या हैं कारण?
हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि आयरन की कमी एक दिन में नहीं होता. भोजन में पोषक तत्वों की कमी, पर्याप्त आहार विविधता का अभाव और पीरियड्स के दौरान अधिक ब्लीडिंग के कारण शरीर में आयरन का स्तर धीरे-धीरे कम होता जाता है। .इसी वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए जीवन-चक्र आधारित दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत उपलब्ध आयरन और फोलिक एसिड सप्लीमेंट्स को समय रहते महिलाओं तक पहुंचाना जरूरी बताया गया है.
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एनीमिया की दिक्कत से बचने के उपाय?
हल्के और मध्यम एनीमिया के मामलों में आयरन की गोलियां उपचार का पहला विकल्प मानी जाती हैं क्योंकि वे सस्ती, सुलभ और प्रभावी हैं. हालांकि कई बार महिलाओं के लिए इन्हें नियमित रूप से लेना आसान नहीं होता या शरीर में इनका एब्जॉर्व पर्याप्त नहीं हो पाता. ऐसे मामलों में फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज आईवी-एफसीएम जैसी नसों के माध्यम से दी जाने वाली आयरन थेरेपी महत्वपूर्ण विकल्प साबित हो सकती है, विशेषकर उन गर्भवती महिलाओं के लिए जिन्हें गर्भावस्था के अंतिम महीनों में गंभीर एनीमिया का पता चलता है.
किस स्टेज में सबसे ज्यादा होते हैं मैटरनल मोर्टलिटी?
भारत में प्रसव के बाद होने वाला अत्यधिक ब्लीडिंग यानी पोस्टपार्टम हेमरेज आज भी मैटरनल मोर्टलिटी के प्रमुख कारणों में शामिल है. इससे निपटने के लिए ई-मोटिव बंडल जैसे उपाय प्रभावी साबित हुए हैं. सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में दो लाख से अधिक प्रसवों पर किए गए परीक्षणों में इस मॉडल ने गंभीर ब्लीडिंग से जुड़ी दिक्कतों को 60 प्रतिशत तक कम किया.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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