घर में नया पेंट करवाने के बाद क्यों होने लगती है खांसी और घुटन? जानें कारण और बचाव के टिप्स

घर में नया पेंट करवाने के बाद क्यों होने लगती है खांसी और घुटन? जानें कारण और बचाव के टिप्स


Can Fresh Paint Cause Breathing Problems: नया पेंट हुआ कमरा अक्सर ताजगी का एहसास देता है, चमकती दीवारें, साफ माहौल और बदलाव की संतुष्टि. लेकिन जो तेज, केमिकल जैसी गंध कुछ दिनों तक बनी रहती है, वह सिर्फ नएपन की निशानी नहीं है, इसके साथ ही यह वोलेटाइल कार्बनिक यौगिकों यानी वीओसी के हवा में घुलने का संकेत है, जो सांस के जरिए शरीर में जा सकते हैं. पेंट, वार्निश, थिनर और चिपकाने वाले पदार्थों में फॉर्मल्डिहाइड, बेंजीन और टोल्यून जैसे वीओसी पाए जाते हैं. यूनाइटेड स्टेट एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी के अनुसार, पेंटिंग जैसी गतिविधियों के दौरान घर के अंदर बीओसी लेवल बाहर की हवा से कई गुना अधिक हो सकता है. ये केमिकल सांस डक्ट्स कोएक्साइटेड करते हैं, जिससे खांसी, गले में खराश और सीने में जकड़न महसूस हो सकती है.

क्या होती हैं दिक्कतें?

डॉ. आकाश शाह, वाइस प्रेसिडेंट टेक्निकल,न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक्स बताते हैं कि वीओसी सांस के रास्ते ब्रॉन्कियल ट्यूब्स में सूजन पैदा कर सकते हैं और म्यूकस बढ़ा सकते हैं. इससे सांस की डक्ट्स संकरी हो जाती हैं. अगर इसके लक्षणों की बात करें, तो इसमें लगातार सूखी खांसी, घरघराहट और हल्की सांस फूलना शामिल हो सकता है. हेल्दी एडल्ट में ये लक्षण आमतौर पर एक्सपोजर बंद होने पर कम हो जाते हैं. लेकिन बार-बार संपर्क में आने से एयरवे अधिक संवेदनशील हो सकते हैं. बच्चों, बुजुर्गों, स्मोकिंग करने वालों और अस्थमा मरीजों में जोखिम अधिक होता है. लंबे समय में लगातार सूजन क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस जैसी समस्या की ओर बढ़ सकती है.

कब जांच करवानी चाहिए?

अगर पेंटिंग के बाद 3 से 4 हफ्ते तक खांसी बनी रहे, तो लंग्स की जांच जरूरी हो सकती है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन भी बताता है कि लंग फंक्शन टेस्ट शुरुआती सीओपीडी पैटर्न पहचानने में मददगार होते हैं.डॉ. हर्षा जैन ने TOI को बताया कि खराब वेंटिलेशन स्थिति को और गंभीर बना सकता है. बंद खिड़कियां, सिर्फ एसी पर निर्भर रहना और नमी भरे मौसम में पेंटिंग बीओसी को घर के अंदर फंसा देता है. क्रॉस-वेंटिलेशन यानी एक से ज्यादा खिड़कियां खोलना केमिकल को तेजी से बाहर निकालने में मदद करता है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

बचाव के लिए लो-वीओसी या नो वीओसी पेंटचुनना बेहतर है. पेंटिंग के दौरान मास्क पहनें और कम से कम 48 से 72 घंटे तक कमरे को खुला रखें. जहां संभव हो, छोटे बच्चों और बुजुर्गों को कुछ दिन दूसरे कमरे या स्थान पर रखें. इसके अलावा पेंट करते समय मास्क पहनना भी फायदेमंद है और इससे आप इस दिक्कत से बच सकते हैं. घर की सुंदरता जरूरी है, लेकिन सेहत उससे भी ज्यादा जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! अक्सर ‘साइलेंट’ होती है किडनी की बीमारी, इन संकेतों को न करें नजरअंदाज

सावधान! अक्सर ‘साइलेंट’ होती है किडनी की बीमारी, इन संकेतों को न करें नजरअंदाज


Early Warning Signs Of Kidney Problems: किडनी हमारे शरीर के सबसे अहम अंगों में से एक है. ये खून से गंदगी और टॉक्सिन्स को फिल्टर करती हैं, शरीर में फ्लुइड का संतुलन बनाए रखती हैं और कई जरूरी एक्टिविटी को सपोर्ट करती हैं. लेकिन अगर इनकी सही देखभाल न की जाए तो कई तरह की बीमारियां जन्म ले सकती हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि किडनी की बीमारी अक्सर चुपचाप बढ़ती है और लक्षण तब सामने आते हैं, जब स्थिति काफी गंभीर हो चुकी होती है. इसलिए समय-समय पर जांच और जोखिम कारकों की जानकारी बेहद जरूरी है.

क्यों किडनी को दिक्कत होती है?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्थान मायो क्लिनिक के अनुसार, किडनी के काम करने की क्षमता में किसी भी तरह की रुकावट को किडनी रोग कहा जाता है. इनमें किडनी इंफेक्शन, क्रॉनिक किडनी डिजीज, पथरी, ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिसऔर पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज समस्या) शामिल हैं. कुछ स्थितियां किडनी रोग का खतरा बढ़ा देती हैं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, धूम्रपान और परिवार में किडनी फेलियर का पुराना केस होना. इसके साथ ही 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में भी खतरा ज्यादा रहता है.

क्यों जरूरी है किडनी का सेहतमंद रहना?

किडनी सिर्फ शरीर से गंदगी निकालने का काम नहीं करती. ये ऐसे हार्मोन बनाती हैं जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करते हैं और रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करते हैं. इसके साथ ही इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखना और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालना भी इनकी जिम्मेदारी है. अगर किडनी ठीक से काम न करे तो इन सभी प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है. दुनियाभर में किडनी रोग के मामले बढ़ रहे हैं और इनका सीधा संबंध हार्ट रोगों से भी जुड़ा है, किडनी की खराबी से हार्ट की बीमारी से मौत का खतरा बढ़ जाता है और डायबिटीज व हाइपरटेंशन की दिक्कतें भी बढ़ सकती हैं. इलाज न मिलने पर यह स्थिति किडनी फेलियर तक पहुंच सकती है, जहां डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है.

इसे भी पढ़ें- Motherhood Age In India: भारत में किस उम्र की महिलाएं ज्यादा बन रहीं मां, किस ऐज ग्रुप की महिलाएं कब ले रहीं यह फैसला?

क्या होते हैं इसके लक्षण?

अगर लक्षण की बात करें, तो किडनी की बीमारी शुरुआत में अक्सर बिना लक्षण के रहती है. लेकिन जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ती है, कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं, बार-बार यूरिन आना, टखनों और पैरों में सूजन, भूख कम लगना और वजन घटना, यूरिन में खून या झाग आना, त्वचा का सूखना और खुजली, सांस लेने में तकलीफ, आंखों के आसपास लगातार सूजन, मांसपेशियों में ऐंठन और नींद न आने की दिक्कत हो सकती है. इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कौन-कौन से टेस्ट जरूरी हैं?

अगर लक्षण दिखें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. रेगुलर जांच से समस्या का शुरुआती स्टेप में पता लगाया जा सकता है. आमतौर पर ये टेस्ट कराए जाते हैं, उसमें सीरम क्रिएटिनिन, सिस्टेटिन C, अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट , ब्लड यूरिया नाइट्रोजन , यूरिन जांच और यूरिन एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन रेशियो शामिल है.

यह भी पढ़ें: क्या खाली पेट काम करता है दिमाग ज्यादा बेहतर? जानिए फास्टिंग का मेंटल हेल्थ पर असर और फायदे

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! अक्सर ‘साइलेंट’ होती है किडनी की बीमारी, इन संकेतों को न करें नजरअंदाज

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Early Warning Signs Of Kidney Problems: किडनी हमारे शरीर के सबसे अहम अंगों में से एक है. ये खून से गंदगी और टॉक्सिन्स को फिल्टर करती हैं, शरीर में फ्लुइड का संतुलन बनाए रखती हैं और कई जरूरी एक्टिविटी को सपोर्ट करती हैं. लेकिन अगर इनकी सही देखभाल न की जाए तो कई तरह की बीमारियां जन्म ले सकती हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि किडनी की बीमारी अक्सर चुपचाप बढ़ती है और लक्षण तब सामने आते हैं, जब स्थिति काफी गंभीर हो चुकी होती है. इसलिए समय-समय पर जांच और जोखिम कारकों की जानकारी बेहद जरूरी है.

क्यों किडनी को दिक्कत होती है?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्थान मायो क्लिनिक के अनुसार, किडनी के काम करने की क्षमता में किसी भी तरह की रुकावट को किडनी रोग कहा जाता है. इनमें किडनी इंफेक्शन, क्रॉनिक किडनी डिजीज, पथरी, ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिसऔर पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज समस्या) शामिल हैं. कुछ स्थितियां किडनी रोग का खतरा बढ़ा देती हैं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, धूम्रपान और परिवार में किडनी फेलियर का पुराना केस होना. इसके साथ ही 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में भी खतरा ज्यादा रहता है.

क्यों जरूरी है किडनी का सेहतमंद रहना?

किडनी सिर्फ शरीर से गंदगी निकालने का काम नहीं करती. ये ऐसे हार्मोन बनाती हैं जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करते हैं और रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करते हैं. इसके साथ ही इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखना और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालना भी इनकी जिम्मेदारी है. अगर किडनी ठीक से काम न करे तो इन सभी प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है. दुनियाभर में किडनी रोग के मामले बढ़ रहे हैं और इनका सीधा संबंध हार्ट रोगों से भी जुड़ा है, किडनी की खराबी से हार्ट की बीमारी से मौत का खतरा बढ़ जाता है और डायबिटीज व हाइपरटेंशन की दिक्कतें भी बढ़ सकती हैं. इलाज न मिलने पर यह स्थिति किडनी फेलियर तक पहुंच सकती है, जहां डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है.

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क्या होते हैं इसके लक्षण?

अगर लक्षण की बात करें, तो किडनी की बीमारी शुरुआत में अक्सर बिना लक्षण के रहती है. लेकिन जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ती है, कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं, बार-बार यूरिन आना, टखनों और पैरों में सूजन, भूख कम लगना और वजन घटना, यूरिन में खून या झाग आना, त्वचा का सूखना और खुजली, सांस लेने में तकलीफ, आंखों के आसपास लगातार सूजन, मांसपेशियों में ऐंठन और नींद न आने की दिक्कत हो सकती है. इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कौन-कौन से टेस्ट जरूरी हैं?

अगर लक्षण दिखें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. रेगुलर जांच से समस्या का शुरुआती स्टेप में पता लगाया जा सकता है. आमतौर पर ये टेस्ट कराए जाते हैं, उसमें सीरम क्रिएटिनिन, सिस्टेटिन C, अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट , ब्लड यूरिया नाइट्रोजन , यूरिन जांच और यूरिन एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन रेशियो शामिल है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या रोज रोटी खाना आपकी सेहत के लिए ठीक है, जानें एक्सपर्ट का क्या है कहना?

क्या रोज रोटी खाना आपकी सेहत के लिए ठीक है, जानें एक्सपर्ट का क्या है कहना?


रोटी लंबे समय से भारतीय खानपान का अहम हिस्सा रही है खासतौर पर उत्तर भारत में लोग इसको एक टाइम के भोजन में जरूर शामिल करते हैं. इसे हल्का, संतुलित और पचने में आसान माना जाता है. सादगी और परंपरा से जुड़ी यह डिश लोगों के लिए फेवरेट भी है. लेकिन क्या रोटी वाकई उतनी ही बेफिक्र होकर खाने लायक है, जितना हम मानते आए हैं?. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर इसको लेकर एक्सपर्ट की क्या राय है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

गुरुग्राम, हरियाणा के ऑर्थोपेडिक और आर्थ्रोस्कोपी एक्सपर्च डॉ. मनु बोरा ने अपने साझा किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस पर अलग नजरिया रखा. उनका कहना है कि गेहूं का नियमित और अधिक मात्रा में सेवन, खासकर उन लोगों के लिए जो वजन और मेटाबॉलिक हेल्थ को लेकर सतर्क हैं, छिपे हुए जोखिम पैदा कर सकता है. डॉ. बोरा के अनुसार “डाइट में सबसे खराब चीज अगर कोई है, तो वह गेहूं हो सकता है. ज्यादातर लोग मिठाइयां रोज नहीं खाते, कुछ तो बिल्कुल भी नहीं खाते. यहां तक कि चीनी का सेवन भी हर किसी के लिए समान रूप से समस्या नहीं बनता. लेकिन जो लोग रोजमर्रा के भोजन में लगातार गेहूं लेते हैं, उनके लिए यह नुकसानदायक हो सकता है. पुराने समय में इंसान प्राकृतिक रूप से गेहूं का सेवन नहीं करते थे.”

क्यों सेहत के लिए फायदेमंद नही है?

उनका तर्क यह है कि जिस चीज को हम सामान्य और सुरक्षित मानते हैं, वह भी अगर जरूरत से ज्यादा ली जाए तो शरीर पर असर डाल सकती है. खासकर आज के समय में जब गेहूं अक्सर प्रोसेस्ड या रिफाइंड रूप में इस्तेमाल होता है, तो उसके प्रभाव और भी बढ़ सकते हैं. डॉ. बोरा बताते हैं कि ज्यादा प्रोसेस्ड गेहूं से बने उत्पाद शरीर में सूजन, वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक गड़बड़ी जैसी समस्याओं को बढ़ावा दे सकते हैं. जब इन्हें बड़ी मात्रा में और नियमित रूप से खाया जाता है, तो यह धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं. यही वजह है कि वे संतुलन और संयम पर जोर देते हैं.

 

 

क्या रोटी नहीं खानी चाहिए?

इसका मतलब यह नहीं कि रोटी पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए, बल्कि यह समझना जरूरी है कि मात्रा और गुणवत्ता दोनों मायने रखती हैं. साबुत अनाज का चयन, सीमित मात्रा में सेवन और संतुलित डाइट अपनाना ज्यादा समझदारी भरा कदम हो सकता है. उनके अनुसार, रोजमर्रा की थाली में शामिल खाद्य पदार्थ भी बिना सोचे-समझे खाने के बजाय समझदारी से चुने जाने चाहिए. हेल्दी डाइट सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप क्या खा रहे हैं, बल्कि इस पर भी कि कितना और किस रूप में खा रहे हैं.

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क्या ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कैंसर, ट्यूमर बनने से पहले कैसे पता लगेगी दिक्कत?

क्या ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कैंसर, ट्यूमर बनने से पहले कैसे पता लगेगी दिक्कत?


Can A Blood Test Detect Cancer Early: दुनियाभर में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इसके पीछे जो सबसे बड़ा रीजन है वह है कि इसके लक्षण जल्दी दिखाई नहीं देते हैं. तमाम तरह के जांच कराने के बाद इसका पता चलता है. हालांकि, अब एक साधारण ब्लड टेस्ट भविष्य में कैंसर का पता उस समय लगा सकता है. दरअसल साइंटिस्ट ने एक बेहद सेंसिटिव लाइट-आधारित सेंसर डिवेलप्ड किया है, जो खून में मौजूद कैंसर बायोमार्कर की अत्यंत सूक्ष्म मात्रा सब-एटोमोलर लेवल तक पहचान सकता है. यानी जांच के लिए सिर्फ कुछ मॉलिक्यूल की मौजूदगी ही काफी हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या खोज हुई है और यह तकनीक कैसे काम करती है. 

कैसे काम करता है यह?

Optica जर्नल में पब्लिश स्टडी के अनुसार, शेनजेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हान झांग की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने डीएनए नैनोस्ट्रक्चर, क्वांटम डॉट्स, क्रिसपर जीन-एडिटिंग तकनीक और सेकंड हार्मोनिक जनरेशन नामक एक ऑप्टिकल तकनीक को मिलाकर यह सिस्टम तैयार किया. यह तकनीक मरीज के खून में कैंसर से जुड़े माइक्रोआरएनए को पारंपरिक RT-qPCR से अधिक सेंसिटिविटी के साथ पहचानने में सक्षम रही.

अभी किस तरह होती हैं जांच?

अभी ज्यादातर शुरुआती जांच या तो इमेजिंग पर आधारित होती है, जिसमें ट्यूमर तब दिखता है जब वह एक निश्चित आकार ले चुका हो, या फिर पीसीआर जैसी तकनीकों पर, जो जेनेटिक सामग्री को कई गुना बढ़ाकर मापती हैं. नई तकनीक इन दोनों से अलग है. इसमें किसी केमिकल एम्प्लीफिकेशन की जरूरत नहीं पड़ती. जैसे ही कैंसर बायोमार्कर मौजूद होता है, लाइट सिग्नल में सीधा बदलाव आता है और वही जांच का आधार बनता है.

मॉलिक्यूल जीन को कंट्रोल करते हैं छोटे आरएनए

यह सेंसर खास तौर पर माइक्रोआरएनए पर ध्यान देता है.ये छोटे आरएनए मॉलिक्यूल जीन को नियंत्रित करते हैं. miR-21, miR-155 और miR-10b जैसे माइक्रोआरएनए लंग्स के कैंसर के शुरुआती चरण से जुड़े पाए गए हैं. शुरुआती अवस्था में इनकी मात्रा बेहद कम होती है, इसलिए इन्हें पकड़ने के लिए असाधारण संवेदनशीलता चाहिए. लैब में यह डिवाइस miR-21 को 168 जेप्टोमोलर तक की बेहद कम कंसंट्रेटेड पर भी पहचान सका, जो सामान्य सैंपल में महज कुछ दर्जन अणुओं के मॉलिक्यूल होती है. इसमें मोलिब्डेनम डिसल्फाइड की एक पतली परत का इस्तेमाल किया गया, जो SHG सिग्नल के लिए जानी जाती है.

एक्सपर्ट का मानना है कि यदि माइक्रोआरएनए को ट्यूमर बनने से पहले ही पकड़ा जा सके तो कैंसर स्क्रीनिंग का तरीका बदल सकता है. भविष्य में यह अन्य कैंसर, वायरल संक्रमण, बैक्टीरियल रोग और यहां तक कि अल्जाइमर जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों की पहचान में भी उपयोगी हो सकता है.

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बुढ़ापा आपसे कोसों दूर रहेगा! बस अपनी रोजमर्रा की आदतों में शामिल करें ये 5 आसान बदलाव

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Why Some Seniors Stay Energetic in Their 70s: क्या आपने गौर किया है कि कुछ लोग 60 से 70 की उम्र में भी इतनी फुर्तीले और ऊर्जा से भरे रहते हैं, मानो उम्र ने उन पर असर ही न डाला हो? वे जिम में घंटों पसीना बहाने वाले या मैराथन दौड़ने वाले लोग नहीं होते. वे बस अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को थोड़ा अलग ढंग से जीते हैं. लोगों को लगता है कि ऐसे लोग शायद बेहतर जीन के साथ पैदा हुए हैं. हालांकि,  साइकोलॉजिस्ट रिसर्च को समझने के बाद पता चलेगा कि राज कुछ और ही है. ये लोग किसी खास डाइट या कठिन एक्सरसाइज पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि दिनभर हलचल को अपनी जिंदगी में इस तरह शामिल कर लेते हैं कि शरीर लगातार सक्रिय बना रहता है.

असल फर्क सोच का है. जब चलना-फिरना “वर्कआउट” न लगकर रोजमर्रा का हिस्सा बन जाए, तो दिमाग उसे बोझ नहीं समझता. इसलिए ये आदतें लंबे समय तक बनी रहती हैं. चलिए आपको विस्तार से बताते हैं. 

सीढ़ियां इनके लिए बाधा नहीं, अवसर हैं

एशिया के कई शहरों में मैंने देखा कि जो बुजुर्ग लोग बिना लिफ्ट वाले घरों में रहते हैं, वे अक्सर ज्यादा चुस्त दिखते हैं. वे सीढ़ियां चढ़ते वक्त “एक्सरसाइज” नहीं कर रहे होते, वे बस घर जा रहे होते हैं. यही साइकोलॉजिस्ट काम करता है, जब गतिविधि का मकसद फिटनेस से अलग हो, तो हम उसे टालते नहीं. 

छोटे कामों को भी सक्रिय बनाना

आजकल हम किराने से लेकर फर्नीचर तक सब कुछ ऑनलाइन मंगवा लेते हैं. लेकिन जो बुजुर्ग ज्यादा फिट रहते हैं, वे अभी भी पैदल बाजार जाते हैं, साइकिल से सब्जी लाते हैं और अपना सामान खुद उठाते हैं. AARP Research भी कहती है, “Walking is good for you, and older Americans generally know it.” यानी पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है, और लोग इसे समझते भी हैं. फर्क बस इतना है कि कुछ लोग इसे जीवन का हिस्सा बना लेते हैं.

बागवानी को साधना की तरह करना

बागवानी करते बुजुर्गों को देखें, तो वे झुकते हैं, उठते हैं, मिट्टी खोदते हैं, गमले उठाते हैं। यह अपने आप में एक पूरा वर्कआउट है, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं लगताय. Mayo Clinic की रिसर्च बताती है कि“The sports most associated with increased longevity were tennis, badminton, soccer and cycling.” यानी जो गतिविधियां मजेदार और सामाजिक हों, वे लंबी उम्र से जुड़ी पाई गई हैं।

शौक चुनते हैं, जिम नहीं

फिट रहने वाले सीनियर नागरिक अक्सर डांस क्लास, बैडमिंटन, वॉकिंग ग्रुप या टेबल टेनिस जैसे शौक अपनाते हैं. ये एक्टिविटी एक्सरसाइज कम और मनोरंजन ज्यादा लगती हैं, इसलिए नियमित बनी रहती हैं.

छोटी-छोटी हरकतें भी मायने रखती हैं

साइंटिस्ट इसे NEAT- Non-Exercise Activity Thermogenesis कहते हैं, यानी बिना औपचारिक व्यायाम के दिनभर की छोटी-छोटी एक्टिविटी. जैसे बात करते समय टहलना, टीवी देखते हुए खड़े होना या फोन पर बात करते वक्त इधर-उधर चलना. इसका मतलब साफ है कि लंबी उम्र और बेहतर एनर्जी का रहस्य कठिन एक्सरसाइज नहीं, बल्कि लगातार हल्की-फुल्की सक्रियता है. जब चलना-फिरना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाता है, तब फिटनेस अलग से हासिल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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