खाने में मौजूद यह चीज मर्दों को बना रही नामर्द, लगातार घट रहा स्पर्म काउंट

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Low Sperm Count Causes: पुरुषों में लगातार फर्टिलिटी रेट की कमी आ रही है. अब इसमें एक चौकाने वाला खुलासा हुआ है. दरअसल  नई रिसर्च के मुताबिक खेती में इस्तेमाल होने वाले आम कीटनाशक पुरुषों की प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुंचा सकते हैं. अध्ययन में पाया गया है कि नीओनिकोटिनॉइड नामक कीटनाशक लैब में रखे नर जानवरों के स्पर्म काउंट को घटाते हैं और उनकी प्रजनन सिस्टम को कमजोर करते हैं. चूंकि ये रसायन खेती में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं, इसलिए इनके जरिए इंसानों में भी इनके असर की संभावना बढ़ जाती है 

क्या निकला रिसर्च में?

पिछले कुछ वर्षों में किए गए स्टडी  से यह साफ हो गया है कि खेती में इस्तेमाल होने वाले ये कीटनाशक पुरुषों में घटती प्रजनन क्षमता और स्पर्म की गुणवत्ता में गिरावट के पीछे एक बड़ा कारण हो सकते हैं. एनवायर्नमेंटल रिसर्च जर्नल में प्रकाशित नई समीक्षा में 2005 से 2025 के बीच किए गए 21 प्रयोगों का एनलिसिस किया गया. नतीजे बताते हैं कि नीओनिकोटिनॉइड रसायनों के संपर्क में आए नर चूहों में स्पर्म की संख्या, गतिशीलता और संरचना तीनों पर निगेटिव असर देखा गया, साथ ही टेस्टिस के डिश्यू में भी नुकसान पाया गया.

एक्सपर्ट का क्या कहना है?

रिसर्च की प्रमुख राइटर सुमैया एस. इरफान, जो जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी में एपिडेमियोलॉजिस्ट के अनुसार “हमने पाया कि इन रसायनों के संपर्क से स्पर्म क्वालिटी कम होती है, हार्मोन असंतुलित होते हैं और टेस्टिकुलर टिश्यू को नुकसान पहुंचता है.” उनकी सहयोगी वेरोनिका जी. सांचेज, जो उसी यूनिवर्सिटी में रिसर्च असिस्टेंट का कहना है कि यह स्टडी आम लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि “खाने में मौजूद कीटनाशक अवशेष भी धीरे-धीरे फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकते हैं.”

चिंता की बात क्यों?

हालांकि यह रिसर्च जानवरों पर की गई थी, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि सभी स्तनधारियों में स्पर्म बनने की प्रक्रिया लगभग समान होती है, इसलिए जानवरों में पाया गया असर इंसानों के लिए भी चिंता का विषय है. अमेरिका में किए गए एक सर्वे में पाया गया कि तीन साल से ऊपर की लगभग आधी आबादी के शरीर में नीओनिकोटिनॉइड्स के रासायनिक निशान पाए गए और बच्चों में यह स्तर और भी ज़्यादा था. यह कीटनाशक पौधों में पूरी तरह समा जाते हैं, इसलिए फलों या सब्जियों को धोने के बाद भी इनके अंश रह जाते हैं.  रिसर्च के मुताबिक, ये रसायन शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाते हैं, जिससे स्पर्म सेल्स और डीएनए को नुकसान होता है. साथ ही ये हार्मोन सिग्नलिंग को प्रभावित करते हैं और टेस्टिस के टिश्यू को भी नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे स्पर्म बनने की प्रक्रिया बाधित होती है. यही वजह है कि स्पर्म की गतिशीलता घटती है और फर्टिलिटी की संभावना कम हो जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अंडों का पीला हिस्सा क्यों नहीं खाना चाहिए? जानें इससे होने वाले नुकसान और फायदे

अंडों का पीला हिस्सा क्यों नहीं खाना चाहिए? जानें इससे होने वाले नुकसान और फायदे



अंडे दुनिया भर में हर उम्र के लोगों का पसंदीदा खाना हैं. ये सिर्फ टेस्टी ही नहीं बल्कि पोषण का खजाना भी हैं. अंडे में प्रोटीन, विटामिन, खनिज और अच्छा फैट जैसे कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को मजबूत बनाते हैं. अक्सर कहा जाता है कि अंडे की सफेदी वजन घटाने और मांसपेशियां बनाने के लिए अच्छी होती है, जबकि जर्दी यानी अंडे का पीला हिस्सा पोषक तत्वों से भरा होता है. इसमें विटामिन A, D, E, B12, कोलीन, और हेल्दी फैट होते हैं, जो दिमाग, आंखों और हड्डियों के लिए फायदेमंद हैं. लेकिन अक्सर लोगों को कंफ्यूजन रहती है कि क्या हर व्यक्ति अंडे की जर्दी खा सकता है. कुछ लोगों के लिए अंडे की जर्दी का सेवन नुकसानदायक हो सकता है.  तो चलिए जानते हैं कि अंडों का पीला हिस्सा क्यों नहीं खाना चाहिए, इससे होने वाले नुकसान और फायदे क्या हैं?

अंडों का पीला हिस्सा क्यों नहीं खाना चाहिए?

1. उच्च कोलेस्ट्रॉल और हार्ट डिजीज वाले लोग – अंडे की जर्दी में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. एक जर्दी में लगभग 185 mg कोलेस्ट्रॉल होता है. ज्यादातर हेल्दी लोगों के लिए यह ठीक है, लेकिन जिन लोगों का कोलेस्ट्रॉल पहले से ज्यादा है या जिन्हें दिल से जुड़ी बीमारियां हैं, उनके लिए यह हानिकारक हो सकता है. ज्यादा कोलेस्ट्रॉल से ब्लड में चर्बी बढ़ सकती है, धमनियों में प्लाक जम सकता है, दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है. ऐसे लोग जर्दी कम खाएं या डॉक्टर की सलाह से ही आहार तय करें. 

2. टाइप 2 डायबिटीज वाले लोग – डायबिटीज वाले लोगों में दिल की बीमारी का खतरा पहले से ज्यादा रहता है. अगर वे ज्यादा कोलेस्ट्रॉल खाते हैं, तो यह जोखिम और बढ़ सकता है. इसलिए डायबिटीज वाले लोगों को जर्दी का सेवन सीमित रखना चाहिए. 

3. गठिया के मरीज – अंडे की जर्दी में प्यूरीन नाम का तत्व होता है.प्यूरीन शरीर में यूरिक एसिड बनाता है, जो गाउट के मरीजों में समस्या बढ़ा सकता है. यूरिक एसिड बढ़ने से जोड़ों में दर्द, सूजन, अचानक तीखे दर्द के अटैक हो सकते हैं इसलिए गठिया के मरीज जर्दी बहुत सीमित मात्रा में ही खाएं. 

4. अंडे से एलर्जी वाले लोग – कई लोगों को अंडों से एलर्जी होती है, खासकर बच्चों को, हालांकि अक्सर एलर्जी सफेदी से होती है, लेकिन कुछ लोगों को जर्दी से भी समस्या हो सकती है. इससे पेट दर्द, उल्टी, स्किन पर रैश और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है. एलर्जी वाले व्यक्ति को जर्दी पूरी तरह से छोड़ देनी चाहिए. 

5. कुछ दवाइयां लेने वाले लोग – जो लोग स्टैटिन या blood thinner दवाएं लेते हैं, उन्हें भी अपनी डाइट में बदलाव करना पड़ सकता है. जर्दी कभी-कभी दवाइयों के असर को बदल सकती है या साइड इफेक्ट बढ़ा सकती है. ऐसे लोग डॉक्टर से सलाह लिए बिना जर्दी ज्यादा न खाएं. 

इससे होने वाले नुकसान और फायदे

1.  बेहतरीन प्रोटीन का स्रोत: अंडे में हाई क्वालिटी वाला प्रोटीन होता है, जो मांसपेशियां बनाने, शरीर की मरम्मत और ग्रोथ में मदद करता है. 

2.  दिमाग के लिए फायदेमंद: जर्दी में कोलीन पाया जाता है, जो याददाश्त, दिमागी ग्रोथ और नर्व्स के काम को बेहतर करता है. 

3. विटामिन और खनिजों से भरपूर: अंडे में विटामिन A, D, E, B12, आयरन और सेलेनियम जैसे कई पोषक तत्व होते हैं जो आंखों, हड्डियों, इम्यूनिटी के लिए जरूरी हैं. 

4. दिल की सेहत: अगर आप ज्यादा जर्दी नहीं खाते और आपके स्वास्थ्य की स्थिति ठीक है, तो जर्दी में मौजूद ओमेगा–3 फैट आपको फायदा भी दे सकती है. 

5. आंखों के लिए फायदेमंद: जर्दी में ल्यूटिन और जेक्सैन्थिन होते हैं, जो आंखों को उम्र के साथ कमजोर होने से बचाते हैं. 

6. वजन घटाने में मदद: अंडे पेट भरकर रखते हैं, जिससे भूख कम लगती है और वजन कंट्रोल में मदद मिलती है. 

7. शरीर की इम्यूनिटी  बढ़ाते हैं: जर्दी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन शरीर की इम्यूनिटी क्षमता बढ़ाते हैं. 

यह भी पढ़ें: यूरिन करते वक्त फ्लो रहता है स्लो तो हो जाएं अलर्ट, इस कैंसर का मिलता है सिग्नल

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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यूरिन करते वक्त फ्लो रहता है स्लो तो हो जाएं अलर्ट, इस कैंसर का मिलता है सिग्नल

यूरिन करते वक्त फ्लो रहता है स्लो तो हो जाएं अलर्ट, इस कैंसर का मिलता है सिग्नल



हम अपनी डेली लाइफ में शरीर के कई छोटे-छोटे बदलावों को नजरअंदाज कर देते हैं, खासकर पेशाब यानी यूरिन से जुड़े संकेतों को, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पेशाब के तरीके में आया हल्का-सा फर्क भी कभी-कभी किसी गंभीर बीमारी का शुरुआती इशारा हो सकता है. अगर आपको कुछ समय से ऐसा महसूस हो रहा है कि यूरिन का फ्लो पहले जैसा तेज नहीं है, पेशाब रुक-रुक कर आता है, या बार-बार बाथरूम की जरूरत महसूस होती है लेकिन राहत नहीं मिलती, तो इन संकेतों को हल्के में लेना सही नहीं है. ऐसे बदलाव किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकते हैं, जिनमें से एक कैंसर है. तो चलिए जानते हैं कि यूरिन करते वक्त फ्लो स्लो हो जाएं तो किस कैंसर का सिग्नल मिलता है. 

यूरिन करते वक्त फ्लो स्लो हो जाएं तो किस कैंसर का सिग्नल मिलता है

यूरिन करते वक्त फ्लो स्लो हो जाएं तो ब्लैडर कैंसर का सिग्नल मिलता है. ब्लैडर कैंसर वह बीमारी है जिसमें कैंसर की शुरुआत ब्लैडर में होने वाली कोशिकाओं से होती है. विशेषज्ञ बताते हैं कि मूत्राशय कैंसर के लगभग 90 प्रतिशत मामले एक ही प्रकार के कैंसर, यूरोथेलियल सेल कार्सिनोमा (UCC)  के होते हैं. यह कैंसर  ब्लैडर के अलावा उन नलियों और हिस्सों में भी हो सकता है जिनसे होकर पेशाब शरीर से बाहर निकलता है. 

किसे होता है ज्यादा खतरा?

डॉक्टरों के अनुसार ब्लैडर कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम कारक सिगरेट पीना है. लंबे समय तक स्मोकिंग करने से शरीर में ऐसे रसायन जमा होते हैं जो ब्लैडर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसके अलावा भी कई कारण खतरा बढ़ाते हैं, जैसे ब्लैडर में बार-बार इन्फेक्शन या सूजन, रंगों, केमिकल या सॉल्वेंट्स के संपर्क में लंबे समय तक काम करना, कुछ तरह की पुरानी कीमोथेरेपी, बढ़ती उम्र. पुरुषों में यह बीमारी महिलाओं की तुलना में लगभग चार गुना ज्यादा पाई जाती है. हालांकि महिलाएं और युवा भी इससे पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं. 

ब्लैडर कैंसर के लक्षण 

शरीर कई बार शुरू में हल्के-हल्के संकेत देता है. जैसे पेशाब में खून दिखाई देना, फ्लो स्लो महसूस होना, पेशाब करते समय जलन, बार-बार यूरिन की आना लेकिन पूरा खाली न कर पाना. लेकिन ये लक्षण कई बार यूरिन इन्फेक्शन, बढ़ती उम्र या रोजमर्रा की आदतों से भी जुड़े हो सकते हैं. इसी वजह से लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते और डॉक्टर के पास देर से पहुंचते हैं. अगर आपके साथ इन लक्षणों में से कोई बदलाव लगातार बना हुआ है तो समय रहते यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना बहुत जरूरी है. कई बार शुरुआती अवस्था में ब्लैडर कैंसर का इलाज आसानी से हो सकता है, लेकिन देर होने पर बीमारी बढ़ जाती है.

यह भी पढ़ें क्या है सबक्लेड के और इसे क्यों माना जा रहा खतरनाक फ्लू स्ट्रेन, जानें टेंशन में क्यों वैज्ञानिक?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या है सबक्लेड के और इसे क्यों माना जा रहा खतरनाक फ्लू स्ट्रेन, जानें टेंशन में क्यों वैज्ञानि

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सिर्फ गांठ नहीं, ये 5 सिग्नल भी बताते हैं बेस्ट कैंसर का पता, गलती से भी न करें इग्नोर

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कई महिलाओं में त्वचा संतरा के छिलके जैसी दिखने लगती है. त्वचा रफ हो जाती है, लालपन आता है या दबा हुआ सा हिस्सा दिखाई देता है. यह बदलाव तब होता है जब कैंसर सेल्स त्वचा के नीचे की छोटी नलियों को रोक देती हैं. यह इंफेक्शन जैसा लग सकता है, लेकिन यह एक गंभीर रूप का संकेत भी हो सकता है, इसलिए डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है.

निप्पल में बदलाव भी एक शुरुआती संकेत है. निप्पल अचानक अंदर की ओर मुड़ जाए, उसका रंग या आकार बदल जाए या उस जगह पर रैश और परत उतरने लगे, तो इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए. अगर निप्पल से दूध जैसा न दिखने वाला कोई तरल निकले, जैसे साफ पानी, खून या पस, तो यह मिल्क डक्ट्स में समस्या का संकेत हो सकता है और तुरंत जांच की जरूरत होती है.

निप्पल में बदलाव भी एक शुरुआती संकेत है. निप्पल अचानक अंदर की ओर मुड़ जाए, उसका रंग या आकार बदल जाए या उस जगह पर रैश और परत उतरने लगे, तो इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए. अगर निप्पल से दूध जैसा न दिखने वाला कोई तरल निकले, जैसे साफ पानी, खून या पस, तो यह मिल्क डक्ट्स में समस्या का संकेत हो सकता है और तुरंत जांच की जरूरत होती है.

ऐसा दर्द जो पीरियड्स से जुड़ा न हो, उसे भी गंभीरता से लेना चाहिए. कुछ महिलाओं को लगातार रहने वाला तेज या चुभन वाला दर्द होता है. केवल दर्द से बीमारी की पुष्टि नहीं होती, लेकिन दर्द के साथ सूजन, निप्पल बदलाव या त्वचा में परिवर्तन दिखाई दें तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है.

ऐसा दर्द जो पीरियड्स से जुड़ा न हो, उसे भी गंभीरता से लेना चाहिए. कुछ महिलाओं को लगातार रहने वाला तेज या चुभन वाला दर्द होता है. केवल दर्द से बीमारी की पुष्टि नहीं होती, लेकिन दर्द के साथ सूजन, निप्पल बदलाव या त्वचा में परिवर्तन दिखाई दें तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है.

ब्रेस्ट या बगल में सूजन दिखना भी अक्सर शुरुआती लक्षण होता है. कई बार बिना किसी गांठ के भी बगल या कॉलर बोन के पास लिंफ नोड्स सूज जाते हैं. यह सूजन बताती है कि सेल्स लिंफ नलियों तक पहुँच चुकी हैं, इसलिए जांच तुरंत करानी चाहिए.

ब्रेस्ट या बगल में सूजन दिखना भी अक्सर शुरुआती लक्षण होता है. कई बार बिना किसी गांठ के भी बगल या कॉलर बोन के पास लिंफ नोड्स सूज जाते हैं. यह सूजन बताती है कि सेल्स लिंफ नलियों तक पहुँच चुकी हैं, इसलिए जांच तुरंत करानी चाहिए.

ब्रेस्ट के आकार या रूप में हल्का सा भी बदलाव नजर आए तो इसे हल्के में न लें. एक ब्रेस्ट अचानक बड़ा दिखना, अनियमित आकार, त्वचा में खिंचाव या गड्ढा बनना, नई छाया दिखना, ये सभी संकेत शुरुआत में ही दिखाई दे सकते हैं. अलग-अलग हाथ की पोजिशन में ब्रेस्ट को देखना इन बदलावों को पहचानने में मदद करता है.

ब्रेस्ट के आकार या रूप में हल्का सा भी बदलाव नजर आए तो इसे हल्के में न लें. एक ब्रेस्ट अचानक बड़ा दिखना, अनियमित आकार, त्वचा में खिंचाव या गड्ढा बनना, नई छाया दिखना, ये सभी संकेत शुरुआत में ही दिखाई दे सकते हैं. अलग-अलग हाथ की पोजिशन में ब्रेस्ट को देखना इन बदलावों को पहचानने में मदद करता है.

इन संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी है क्योंकि इलाज की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि बीमारी किस स्टेज में पकड़ी गई. सिर्फ गांठ ढूंढना काफी नहीं है. दर्द, सूजन, त्वचा में परिवर्तन या निप्पल बदलाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.

इन संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी है क्योंकि इलाज की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि बीमारी किस स्टेज में पकड़ी गई. सिर्फ गांठ ढूंढना काफी नहीं है. दर्द, सूजन, त्वचा में परिवर्तन या निप्पल बदलाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.

खुद को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप अपने ब्रेस्ट के सामान्य रूप को जानें और किसी भी नए बदलाव को गंभीरता से लें. निप्पल से तरल आना, त्वचा में बदलाव, लगातार दर्द, सूजन या आकार में फर्क दिखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. शुरुआती पहचान ही सबसे बड़ा बचाव है.

खुद को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप अपने ब्रेस्ट के सामान्य रूप को जानें और किसी भी नए बदलाव को गंभीरता से लें. निप्पल से तरल आना, त्वचा में बदलाव, लगातार दर्द, सूजन या आकार में फर्क दिखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. शुरुआती पहचान ही सबसे बड़ा बचाव है.

Published at : 21 Nov 2025 06:52 PM (IST)

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माइग्रेन करता है परेशान तो भूलकर भी मत खाना ये दो फल, बुरी तरह बिगड़ जाएगी तबीयत

माइग्रेन करता है परेशान तो भूलकर भी मत खाना ये दो फल, बुरी तरह बिगड़ जाएगी तबीयत



Tyramine Foods Migraine: माइग्रेन एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जो कई तरह की डाइट और एनवायरनमेंट कारणों से ट्रिगर हो सकती है. दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को माइग्रेन की समस्या रहती है, उनके लिए केले और एवोकाडो जैसे बेहद पौष्टिक फल भी कभी-कभी दिक्कत बढ़ा सकते हैं. दोनों ही फलों में जरूरी विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट और हेल्दी फैट भरपूर मात्रा में होते हैं, लेकिन इनमें मौजूद कुछ प्राकृतिक तत्व संवेदनशील लोगों में माइग्रेन की प्रक्रिया को सक्रिय कर सकते हैं.

पके हुए केले में टायरामिन ज्यादा होता है, जबकि एवोकाडो में मौजूद कुछ फेनोलिक कंपाउंड दिमाग के केमिकल बैलेंस को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए जिन लोगों को बार-बार माइग्रेन होता है, उनके लिए यह समझना जरूरी है कि ये फल दिमाग की केमिकल गतिविधियों पर कैसे असर डालते हैं. थोड़ी सावधानी और सही मात्रा का ध्यान रखें, तो इन फलों के पोषण का फायदा उठाया जा सकता है बिना दर्द बढ़ाए.

केले और एवोकाडो के फायदे

केला पोटैशियम, विटामिन B6, मैग्नीशियम और नेचुरल शर्करा का अच्छा सोर्स है, जो शरीर को स्थिर ऊर्जा देते हैं. पोटैशियम ब्लड प्रेशर और शरीर में तरल संतुलन बनाए रखने में मदद करता है, जबकि विटामिन B6 दिमाग और मेटाबॉलिज़्म के लिए जरूरी है. केले में मौजूद मैग्नीशियम मांसपेशियों को रिलैक्स करने और नसों की गतिविधि को बेहतर बनाता है.

केला पचने में भी आसान होता है, इसलिए बीमारी या थकान के बाद इलेक्ट्रोलाइट्स की पूर्ति के लिए यह एक भरोसेमंद विकल्प है. दूसरी ओर एवोकाडो में हेल्दी मोनोअनसैचुरेटेड फैट, फाइबर, पोटैशियम, फोलेट और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर पाए जाते हैं. ये सभी तत्व दिल, दिमाग और ब्लड शुगर कंट्रोल के लिए फायदेमंद हैं. एवोकाडो विटामिन E और ल्यूटिन जैसे घटकों से भी भरपूर होता है, जो स्किन और इंफ्लेमेशन कंट्रोल में मदद करते हैं. इसकी हेल्दी फैट प्रोफाइल शरीर को फैट-सॉल्यूबल विटामिन्स अवशोषित करने में भी सहायक होती है.

माइग्रेन क्यों ट्रिगर कर सकते हैं केला और एवोकाडो?

दोनों ही फलों में एक प्राकृतिक अमीनो एसिड बाय-प्रोडक्ट होता है टायरामिन. यह कंपाउंड शरीर में प्रोटीन टूटने पर बनता है. टायरामिन ब्लड सेल्स के फैलाव और न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज को प्रभावित करता है, जो माइग्रेन से जुड़े अहम कारक हैं. जैसे-जैसे केला ज्यादा पकता है, उसमें टायरामिन का स्तर बढ़ता है. यही बात बहुत पके हुए एवोकाडो पर भी लागू होती है. एवोकाडो में थोड़ी मात्रा में हिस्टामीन और पॉलीफेनॉल भी होते हैं, जो संवेदनशील लोगों में सूजन और नर्वस सिस्टम को ज्यादा ट्रिगर कर सकते हैं.

माइग्रेन में टायरामिन की भूमिका

कई स्टडीज में पाया गया है कि टायरामिन वाले खाने वाले चीज माइग्रेन का कारण बन सकते हैं. PubMed पर मौजूद रिसर्च बताती है कि टायरामिन सेंपेथिक नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर रक्त प्रवाह और ब्लड प्रेशर पर असर डाल सकता है और यही प्रक्रिया माइग्रेन को ट्रिगर कर सकती है.

किन लोगों को केला और एवोकाडो सावधानी से खाने चाहिए?

  • बहुत पके फल न खाएं, क्योंकि पकने के साथ टायरामिन बढ़ जाता है.
  • फूड डायरी रखें कब क्या खाने पर सिरदर्द बढ़ता है, यह नोट करें.
  • मात्रा नियंत्रित रखें, क्योंकि थोड़ी सी मात्रा कई बार समस्या नहीं करती.

इसे भी पढ़ें- सुबह के नाश्ते में भूलकर भी नहीं खानी चाहिए ये चीजें, पूरा दिन हो जाता है खराब

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