क्या अदरक वाली चाय सच में घटाती है वजन, जानें इस दावे को लेकर क्या कहती है रिसर्च?

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प्रोटीन की कमी के ये 5 संकेत न करें नजरअंदाज, वरना बढ़ सकती है दिक्कत

प्रोटीन की कमी के ये 5 संकेत न करें नजरअंदाज, वरना बढ़ सकती है दिक्कत


महिलाओं को रोज लगभग 46 ग्राम और पुरुषों को करीब 56 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होती है, या फिर शरीर के हर किलो वजन पर लगभग 0.8 ग्राम. जब यह जरूरत पूरी नहीं होती तो शुरुआत में हल्के-फुल्के बदलाव दिखते हैं, लेकिन वक्त रहते ध्यान न दिया जाए तो यह कमी गंभीर रूप ले सकती है.

सबसे पहला संकेत होता है शरीर में सूजन.  इसे एडिमा कहा जाता है. यह सूजन पैरों, पंजों, हाथों या पेट पर दिखाई दे सकती है. वजह यह है कि शरीर में मौजूद एल्ब्यूमिन नाम का प्रोटीन तरल को संतुलित रखने में मदद करता है. जब इसकी कमी होती है तो फ्लूइड बाहर निकलकर आसपास के टिश्यू में जमा होने लगता है. यह संकेत लिवर जैसी बीमारियों से भी जुड़ा हो सकता है, इसलिए जांच कराना जरूरी है.

सबसे पहला संकेत होता है शरीर में सूजन. इसे एडिमा कहा जाता है. यह सूजन पैरों, पंजों, हाथों या पेट पर दिखाई दे सकती है. वजह यह है कि शरीर में मौजूद एल्ब्यूमिन नाम का प्रोटीन तरल को संतुलित रखने में मदद करता है. जब इसकी कमी होती है तो फ्लूइड बाहर निकलकर आसपास के टिश्यू में जमा होने लगता है. यह संकेत लिवर जैसी बीमारियों से भी जुड़ा हो सकता है, इसलिए जांच कराना जरूरी है.

प्रोटीन की कमी सिर्फ शरीर नहीं, दिमाग को भी प्रभावित करती है. मूड अचानक खराब होना, चिड़चिड़ापन, बेचैनी और ध्यान न लग पाना, ये सब संकेत हैं. प्रोटीन से बनने वाले अमीनो एसिड ही दिमाग के वे केमिकल बनाते हैं जो मूड और मोटिवेशन को कंट्रोल करते हैं. इनकी कमी होने पर मानसिक संतुलन पर असर दिखना स्वाभाविक है.

प्रोटीन की कमी सिर्फ शरीर नहीं, दिमाग को भी प्रभावित करती है. मूड अचानक खराब होना, चिड़चिड़ापन, बेचैनी और ध्यान न लग पाना, ये सब संकेत हैं. प्रोटीन से बनने वाले अमीनो एसिड ही दिमाग के वे केमिकल बनाते हैं जो मूड और मोटिवेशन को कंट्रोल करते हैं. इनकी कमी होने पर मानसिक संतुलन पर असर दिखना स्वाभाविक है.

एक और आम लक्षण है लगातार थकान रहना. अगर अच्छी नींद के बाद भी शरीर बोझिल लगे या एनर्जी जल्दी खत्म हो जाए, तो यह प्रोटीन की कमी की ओर इशारा करता है. प्रोटीन खून में शुगर को स्थिर रखने, हार्मोन बनाने और शरीर को एनर्जी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कमी होने पर हमेशा थकान महसूस हो सकती है.

एक और आम लक्षण है लगातार थकान रहना. अगर अच्छी नींद के बाद भी शरीर बोझिल लगे या एनर्जी जल्दी खत्म हो जाए, तो यह प्रोटीन की कमी की ओर इशारा करता है. प्रोटीन खून में शुगर को स्थिर रखने, हार्मोन बनाने और शरीर को एनर्जी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कमी होने पर हमेशा थकान महसूस हो सकती है.

प्रोटीन की कमी का असर बाहरी रूप पर भी दिखता है. बाल झड़ना, बाल पतले होना, नाखून टूटना या त्वचा का रूखी और बेजान होना, ये सब संकेत हैं कि शरीर को पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिल रहा. क्योंकि बाल, त्वचा और नाखून बनाने वाले प्रोटीन. केराटिन, कोलेजन और इलास्टिन सही मात्रा में नहीं बन पाते.

प्रोटीन की कमी का असर बाहरी रूप पर भी दिखता है. बाल झड़ना, बाल पतले होना, नाखून टूटना या त्वचा का रूखी और बेजान होना, ये सब संकेत हैं कि शरीर को पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिल रहा. क्योंकि बाल, त्वचा और नाखून बनाने वाले प्रोटीन. केराटिन, कोलेजन और इलास्टिन सही मात्रा में नहीं बन पाते.

ऐसे लोग बहुत जल्दी भूख महसूस करते हैं. वजह सीधी है. प्रोटीन पेट को लंबे समय तक भरा रखता है और एनर्जी की स्थिरता बनाए रखता है. जब यह कम हो जाता है तो भूख जल्दी-जल्दी लगती है, क्रेविंग बढ़ती है और एनर्जी लगातार गिरती रहती है.

ऐसे लोग बहुत जल्दी भूख महसूस करते हैं. वजह सीधी है. प्रोटीन पेट को लंबे समय तक भरा रखता है और एनर्जी की स्थिरता बनाए रखता है. जब यह कम हो जाता है तो भूख जल्दी-जल्दी लगती है, क्रेविंग बढ़ती है और एनर्जी लगातार गिरती रहती है.

कुल मिलाकर, प्रोटीन की कमी पहली नजर में बड़ी समस्या नहीं लगती, लेकिन शरीर इसके छोटे-छोटे संकेत देकर हमें आगाह करता रहता है. इन लक्षणों को हल्के में न लेकर समय पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

कुल मिलाकर, प्रोटीन की कमी पहली नजर में बड़ी समस्या नहीं लगती, लेकिन शरीर इसके छोटे-छोटे संकेत देकर हमें आगाह करता रहता है. इन लक्षणों को हल्के में न लेकर समय पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

Published at : 21 Nov 2025 08:16 AM (IST)

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हार्ट फेल होने से पहले दिखते हैं ये 5 छिपे हुए संकेत, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं हम

हार्ट फेल होने से पहले दिखते हैं ये 5 छिपे हुए संकेत, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं हम


हार्ट फेल का सबसे छिपा हुआ संकेत अचानक वजन बढ़ाना है. यह शरीर में पानी जमा होने के कारण होता है. जब दिल ठीक से पंप नहीं कर पाता तो पैर, पेट और शरीर के अन्य हिस्सों में सूजन आने लगती है.और कुछ दिनों में वजन तेजी से बढ़ जाता है. हालांकि समय रहते पहचान पर इलाज जल्दी शुरू हो सकता है.

वहीं लेटते समय खांसी आना या सीने में घरघराहट होना दिल की परेशानियों का संकेत हो सकता है. यह इसलिए होता है क्योंकि शरीर में जमा पानी लेटते ही फेफड़ों की ओर बढ़ जाता है. जिससे सांस की नली में जलन होती है और खांसी शुरू हो जाती है. इसे हल्की खांसी समझ कर अनदेखा नहीं करना चाहिए.

वहीं लेटते समय खांसी आना या सीने में घरघराहट होना दिल की परेशानियों का संकेत हो सकता है. यह इसलिए होता है क्योंकि शरीर में जमा पानी लेटते ही फेफड़ों की ओर बढ़ जाता है. जिससे सांस की नली में जलन होती है और खांसी शुरू हो जाती है. इसे हल्की खांसी समझ कर अनदेखा नहीं करना चाहिए.

दिल की कार्य क्षमता कम होने पर पाचन तंत्र पर भी असर पड़ता है. कई लोगों को भूख न लगना, थोड़ा सा खाने पर ही पेट भर जाना या जी मिचलाना जैसी समस्याएं शुरू हो जाती है. यह संकेत भी बताते हैं कि दिल शरीर में सही तरीके से खून नहीं पहुंचा पा रहा है. ऐसी समस्याओं भी आप हल्के में न लें.

दिल की कार्य क्षमता कम होने पर पाचन तंत्र पर भी असर पड़ता है. कई लोगों को भूख न लगना, थोड़ा सा खाने पर ही पेट भर जाना या जी मिचलाना जैसी समस्याएं शुरू हो जाती है. यह संकेत भी बताते हैं कि दिल शरीर में सही तरीके से खून नहीं पहुंचा पा रहा है. ऐसी समस्याओं भी आप हल्के में न लें.

वहीं जब दिल शरीर को पर्याप्त खून नहीं पहुंचा पाता है तो दिमाग पर इसका सीधा असर पड़ता है. ऐसे में भ्रम होना, छोटी-छोटी बातें भूलना या ध्यान न लगना जैसे संकेत दिखाई देने लगते हैं. इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

वहीं जब दिल शरीर को पर्याप्त खून नहीं पहुंचा पाता है तो दिमाग पर इसका सीधा असर पड़ता है. ऐसे में भ्रम होना, छोटी-छोटी बातें भूलना या ध्यान न लगना जैसे संकेत दिखाई देने लगते हैं. इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

रात में बार-बार नींद खुलना, लेटते ही ही सांस फूलना या फिर ऊंचा करके तकिया लगाकर सोने की जरूरत महसूस होना यह सभी शुरुआती संकेत होते हैं कि दिल पर दबाव बढ़ रहा है. यह समस्या शरीर में जमा पानी के कारण सांस लेने में होने वाली दिक्कत से जुड़ी होती है. ऐसे में इस समस्या को भी हल्के में नहीं लेना चाहिए, नहीं तो हार्ट फेल होने जैसी दिक्कत भी हो सकती है.

रात में बार-बार नींद खुलना, लेटते ही ही सांस फूलना या फिर ऊंचा करके तकिया लगाकर सोने की जरूरत महसूस होना यह सभी शुरुआती संकेत होते हैं कि दिल पर दबाव बढ़ रहा है. यह समस्या शरीर में जमा पानी के कारण सांस लेने में होने वाली दिक्कत से जुड़ी होती है. ऐसे में इस समस्या को भी हल्के में नहीं लेना चाहिए, नहीं तो हार्ट फेल होने जैसी दिक्कत भी हो सकती है.

Published at : 21 Nov 2025 06:40 AM (IST)

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तिहाड़ की गौशाला में चल रही काऊ थैरेपी, यह क्या है और कैदियों के लिए कितनी फायदेमंद?

तिहाड़ की गौशाला में चल रही काऊ थैरेपी, यह क्या है और कैदियों के लिए कितनी फायदेमंद?



Prison Cow Shelter: तिहाड़ जेल में कैदियों की मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने के लिए एक नया कदम उठाया गया है. अब यहां बंदियों को अकेलापन और इमोशनल तनाव से उबरने में मदद करने के लिए काऊ थैरेपी दी जाएगी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार 19 नवंबर को उपराज्यपाल वी. के. सक्सेना और दिल्ली के गृह मंत्री आशीष सूद ने जेल परिसर में बनी नई गौशाला का उद्घाटन किया

तिहाड़ की गौशाला में अभी कितनी गायें?

फिलहाल तिहाड़ जेल में 10 गायों को रखा गया है. कुछ खरीदी गईं और कुछ दान में मिली हैं. गौशाला की क्षमता और 10 गायों को रखने की भी है. रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण बैकग्राउंड से आने वाले कुछ कैदियों को गायों को चारा खिलाने और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है. दिल्ली के गृह मंत्री ने बताया कि 1 जनवरी से 19 जनवरी के बीच दिल्ली पुलिस को आवारा और छोड़ दी गई गायों से जुड़े 25,000 से अधिक मामले मिले हैं. उन्होंने कहा कि राजधानी में गायों की संख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन गौशालाएं कम हैं.

उन्होंने कहा कि “हमारी मौजूदा गौशालाओं की क्षमता 19,800 है, लेकिन इनमें 21,800 से ज्यादा पशु ठहरे हुए हैं. ऐसे में तिहाड़ जेल की पहल छोटी जरूर दिख सकती है, लेकिन यह दूर की सोच वाला कदम है.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि इससे आवारा पशुओं की देखभाल, संरक्षण और सेवा का दायरा बढ़ेगा.

कैसे मदद करेगी काऊ थैरेपी?

अब जान लेते हैं कि यह थैरेपी कैसे मदद करेगी. इसको लेकर गृह मंत्री आशीष सूद  ने इसे काऊ थैरेपी का नाम देते हुए कहा कि यह कदम उन कैदियों के लिए उम्मीद की नई किरण है जो अकेलेपन से जूझते हैं. उनके मुताबिक, गायों के साथ समय बिताने से अकेलेपन की भावना कम होती है. साथ ही, यह थैरेपी कैदियों को भावनात्मक तनाव से उबरने, झगड़ों को कम करने और आपसी करुणा बढ़ाने में भी मदद कर सकती है.

जेल महानिदेशक एस. बी. के. सिंह ने बताया कि इस विचार की प्रेरणा देश और विदेश के ऐसे कार्यक्रमों से मिली है, जहां पशुओं की मदद से कैदियों की मानसिक हालत सुधारने की कोशिश की गई.

तिहाड़ में भी कई कैदी ऐसे हैं जिन्हें परिवार से न फोन आते हैं और न मुलाकात, जिससे वे तनाव और अकेलेपन में चले जाते हैं. आपको बता दें कि 2018 में हरियाणा की जेलों में भी इसी तरह का प्रयोग किया गया था और स्वीडन जैसे देशों की कुछ कम सुरक्षा वाली जेलों में पशु-सहायता कार्यक्रम पहले से चल रहे हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किस दबाव में काम कर रहे बीएलओ, हार्ट अटैक और सुसाइड के पीछे क्या है वजह?

किस दबाव में काम कर रहे बीएलओ, हार्ट अटैक और सुसाइड के पीछे क्या है वजह?



BLO SIR Workload: देशभर में SIR का दूसरा चरण 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चल रहा है. अंतिम मतदाता सूची 7 फरवरी 2026 को जारी की जानी है. इस बीच बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) लगातार बढ़ते काम के बोझ के कारण बेहद तनाव में काम कर रहे हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, SIR से जुड़े काम में शामिल एक सीनियर टीचर ने बिंदयका रेलवे क्रॉसिंग पर ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली. अपने सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा कि SIR से जुड़े काम को लेकर एक अधिकारी लगातार दबाव डाल रहा था, जिससे वे टूट गए.

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में भी बीएलओ ने काम के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली. केरल में रविवार को एक BLO, अनीश जॉर्ज (44), पय्यानूर, कन्नूर में अपने घर पर फंदे से झूलते मिले. इसके अलावा राजस्थान के सवाई माधोपुर में मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम यानी SIR के काम में लगे बीएलओ की हार्ट अटैक से मौत हो गई. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर हार्ट अटैक और सुसाइड के मामले क्यों बढ़ रहे हैं?

क्यों बढ़ रहे हैं सुसाइड और हार्ट अटैक के मामले?

Centers for Disease Control and Prevention (CDC) के अनुसार, वर्क प्लेस पर अलग-अलग कारणों के चलते लोग सुसाइड अटेंप्ट कर लेते हैं. यही हाल बीएलओ के साथ भी हो रहा है. कुछ ऐसे कारण हो सकते हैं, जिसके चलते बीएलओ इस तरह के कदम उठा रहे हैं. इसमें-

लगातार बढ़ता काम का दबाव

जब जिम्मेदारियों की मात्रा क्षमता से कई गुना ज़्यादा हो जाए, जैसे BLOs के साथ SIR के दौरान हो रहा है तब शरीर और दिमाग दोनों पर लगातार तनाव पड़ता रहता है. लंबे समय तक यही तनाव दिल पर असर डालता है और हार्ट अटैक का जोखिम बढ़ाता है.

समय सीमा का दबाव

डेडलाइन पूरा न कर पाने का डर, अधिकारियों द्वारा लगातार फॉलो-अप, रिपोर्ट जल्द-से-जल्द जमा करने की मानसिक थकान यह सब मिलकर दिमाग पर जबरदस्त वजन डालता है. कई लोग इस दबाव को झेल नहीं पाते और टूट जाते हैं.

काम और निजी जीवन का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाना

जब काम इतना ज़्यादा हो जाए कि परिवार, आराम, नींद और खुद के लिए समय ही न बचे, तो शरीर की रिकवरी रुक जाती है, मानसिक थकान बढ़ती है और दिल कमजोर पड़ता है.

लगातार तनाव से शरीर में हार्मोनल बदलाव

लंबे तनाव में शरीर स्ट्रेस हार्मोन यानी कॉर्टिसोल अधिक मात्रा में बनाता है. इसके चलते यह दिल की धड़कन बढ़ाता है, हाइपरटेंशन पैदा करता है, ब्लड क्लॉटिंग बढ़ाता है और नींद खराब करता है. ये सभी हार्ट अटैक के बड़े कारण बनते हैं.

गलती का डर और ऊपरी दबाव

जब हर गलती पर फटकार, शिकायत या सस्पेंशन का डर बना हो, तो इंसान हमेशा चिंता में रहता है. यह चिंता धीरे-धीरे मानसिक बीमारी, पैनिक, डिप्रेशन और आखिरी में  सुसाइड जैसे कदम तक ले जा सकती है.

अत्यधिक तनाव में मानसिक स्वास्थ्य कैसे संभालें?

अगर कभी महसूस हो कि चीज़ें हाथ से निकल रही हैं या इमोशनल संकट गहरा रहा है, तो तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति, विशेषज्ञ या हेल्पलाइन से मदद लें. मदद मिलना वास्तविक है और यह सच में फर्क लाती है. इसमें आप यह कर सकते हैं कि अगर काम का दबाव जब असहनीय होने लगे, तो सबसे पहले खुद को रोककर संभालें. काम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटें. क्या ज़रूरी है और क्या इंतजार कर सकता है, इसकी प्राथमिकता तय करें और जरूरत हो तो ना कहना भी ठीक है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या है एजोस्पर्मिया, जिसमें ‘जीरो’ हो जाता है मर्द का स्पर्म काउंट?

क्या है एजोस्पर्मिया, जिसमें ‘जीरो’ हो जाता है मर्द का स्पर्म काउंट?



Zero Sperm Count In Men: अगर आप पिता बनना चाहते हैं और आपको अचानक पता चले कि आपका स्पर्म काउंट एकदम से जीरो हो गया है. आपको लग रहा होगा कि ऐसा थोड़ी होता है, लेकिन ऐसा होता है और इसे एजोस्पर्मिया कहा जाता है. एजोस्पर्मिया वह स्थिति है, जब पुरुष के सेमन में बिल्कुल भी स्पर्म मौजूद नहीं होते. यह दो तरह की हो सकती है ऑब्स्ट्रक्टिव, जिसमें किसी रुकावट की वजह से स्पर्म सेमन तक पहुंच ही नहीं पाते, और नॉन-ऑब्स्ट्रक्टिव, जिसमें समस्या स्पर्म बनने की प्रक्रिया में ही होती है. चलिए आपको बताते हैं कि यह समस्या कब होती है और इसका इलाज क्या है.

कितनी आम है यह समस्या?

अब सवाल आता है कि कितनी आम है यह समस्या, इसका जवाब है काफी ज्यादा. अगर इनफर्टिलिटी से लगभग 10 प्रतिशत पुरुष जूझ रहे हैं, तो उनमें कुल मिलाकर 1 प्रतिशत पुरुषों में एजोस्पर्मिया पाई जाती है.

एजोस्पर्मिया होने की वजहें क्या हैं?

इसके होने के कई कारण हो सकते हैं. कुछ जेनेटिक कंडीशंस जैसे क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम, कुछ मेडिकल ट्रीटमेंट जैसे कीमोथेरेपी या रेडिएशन और कई दूसरे कारण भी. सबसे सीधी वजह वेसैक्टमी भी हो सकती है, जिसमें स्पर्म बाकी फ्ल्यूइड्स में मिल ही नहीं पाते. कई मामलों में वजह पूरी तरह समझ नहीं आती जैसे गर्भावस्था या बचपन में खराब टेस्टिक्युलर डेवलपमेंट.

इस दिक्कत से कैसे निपटा जाए

hopkinsmedicine के अनुसार, सबसे पहले तो किसी पुरुष इनफर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलें. इसके बाद एक दोबारा सीमन एनालिसिस कराना जरूरी है. ऐसी लैब में जो स्पर्म टेस्टिंग में माहिर हो, क्योंकि अलग-अलग जगहों की रिपोर्टों में काफी फर्क आ सकता है. यह भी जरूरी है कि यह पता चले कि थोड़ी मात्रा में स्पर्म मौजूद हैं या नहीं, क्योंकि इससे इलाज का रास्ता पूरी तरह बदल सकता है. पहले लगभग हर एजोस्पर्मिक पुरुष का बायोप्सी किया जाता था ताकि यह तय हो सके कि समस्या ऑब्स्ट्रक्टिव है या नॉन-ऑब्स्ट्रक्टिव. लेकिन अब आमतौर पर बायोप्सी अकेले नहीं की जाती, क्योंकि ज्यादातर मामलों में बिना बायोप्सी के भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि रुकावट है या स्पर्म बन ही नहीं रहे.

टेस्टिकुलर डिसेक्शन के दौरान यह पाया गया है कि टेस्टिस के अलग-अलग हिस्सों में स्पर्म बनने की स्थिति अलग हो सकती है. कहीं कम स्पर्म बन रहे होते हैं, कहीं मैचुरेशन रुक जाती है, और कहीं स्पर्म बनाने वाली सेल्स ही मौजूद नहीं होतीं. इसी वजह से सिर्फ डायग्नोस्टिक बायोप्सी अक्सर इलाज को नहीं बदलती.

इलाज कैसे तय होता है?

यह पूरी तरह मरीज पर निर्भर है. पार्टनर की उम्र, दोनों की प्रजनन क्षमता, मेडिकल रिपोर्ट, परिवार की योजनाएं और आर्थिक परिस्थिति जैसे कई कारक इलाज तय करते हैं.
कुछ लोगों में रुकावट दूर करना जैसे वेसैक्टमी रिवर्सल, कुछ में हानिकारक दवाएं या नशे छोड़ना, कुछ में हार्मोनल समस्याएं ठीक करना और कुछ में वैरिकोसील की सर्जरी मददगार हो सकती है. कई पुरुषों में सीधे टेस्टिस से स्पर्म निकालकर ART ही सबसे बेहतर रास्ता होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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