रोज ब्रश करने के बाद भी पीले हो रहे दांत, जानें क्या है इस दिक्कत की वजह?

रोज ब्रश करने के बाद भी पीले हो रहे दांत, जानें क्या है इस दिक्कत की वजह?


हम सभी चाहते हैं कि हमारी स्माइल अट्रैक्टिव और कॉन्फिडेंस से भरी हो. एक चमकदार सफेद दांतों वाली स्माइल न सिर्फ खूबसूरती बढ़ाती है, बल्कि लोगों पर पॉजिटिव इंपैक्ट भी डालती है. इसके लिए लोग रोजाना ब्रश करने की आदत रखते हैं, फ्लॉस करते हैं और माउथवॉश का भी यूज करते हैं फिर भी कई लोग इस समस्या से परेशान रहते हैं कि उनके दांत पीले या फीके क्यों दिखते हैं.

यह सवाल बहुत आम है और इसका जवाब जानना जरूरी है. अक्सर लोग समझते हैं कि सिर्फ ब्रश करना ही दांतों को सफेद बनाए रखने के लिए पर्याप्त है, लेकिन असल में स्थिति इससे थोड़ी जटिल है. तो आइए जानते हैं कि  रोज ब्रश करने के बाद भी दांत क्यों पीले हो रहे और इस दिक्कत की वजह क्या है. 

रोज ब्रश करने के बाद भी दांत क्यों पीले हो रहे

हमारे दांतों की संरचना परतों में होती है. सबसे ऊपर की परत को एनामेल कहते हैं, जो सफेद और थोड़ी पारदर्शी होती है. इसके नीचे की परत डेंटिन होती है, जो प्राकृतिक रूप से पीली होती है. उम्र बढ़ने के साथ, या कभी-कभी जन्मजात रूप से, एनामेल पतली हो जाती है और डेंटिन ज्यादा दिखाई देने लगता है. इसका मतलब यह है कि कुछ लोगों के दांत स्वाभाविक रूप से थोड़े पीले दिखाई देते हैं, भले ही वे कितनी भी अच्छी तरह से ब्रश करें. दांतों का पीला होना हमेशा सिर्फ बाहरी कारणों से नहीं होता है. कई बार यह आंतरिक कारणों से भी हो सकता है. 

इस दिक्कत की वजह क्या है

1. खराब ब्रशिंग आदतें – रोजाना ब्रश करना अच्छा है, लेकिन ब्रश करने का सही तरीका और नियमितता भी उतनी ही जरूरी है. अगर दांतों की सफाई अधूरी हो, तो प्लाक जमा हो जाता है. प्लाक धीरे-धीरे टार्टर में बदल जाता है, जिसे केवल ब्रश से हटाना मुश्किल होता है. इसके लिए पेशेवर डेंटल क्लीनिंग करवाना जरूरी है. 

2. खाने-पीने की चीजें – कुछ खाद्य पदार्थ और पेय दांतों पर दाग छोड़ सकते हैं. कॉफी, चाय, रेड वाइन, गहरे रंग के सोडा और शराब दांतों को पीला कर सकते हैं. खट्टे फल और अम्लीय चीजें एनामेल को कमजोर कर सकती हैं, जिससे पीला डेंटिन और ज्यादा दिखाई देता है. खाने के बाद नमक वाले पानी से कुल्ला करने से दाग कम हो सकते हैं. 

3. धूम्रपान और तंबाकू – तंबाकू और सिगरेट में मौजूद टार और निकोटीन दांतों पर स्थायी दाग छोड़ते हैं. धूम्रपान से न सिर्फ दांत पीले होते हैं, बल्कि मसूड़ों की बीमारी का खतरा भी बढ़ जाता है. 

4. उम्र और प्राकृतिक कारण – उम्र बढ़ने के साथ दांतों की ऊपरी परत पतली होती है. कुछ लोगों में एनामेल प्राकृतिक रूप से पतला होता है, जिससे पीला डेंटिन ज्यादा दिखाई देता है. यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि प्राकृतिक संरचना है. 

5. दवाइयां और स्वास्थ्य समस्याएं – कुछ एंटीबायोटिक्स, आयरन सप्लीमेंट या मेडिकल ट्रीटमेंट जैसे कीमोथेरेपी दांतों के रंग को प्रभावित कर सकते हैं. अगर दवाइयों से दांत पीले हो रहे हैं, तो डेंटिस्ट से सलाह लेना जरूरी है. 

6. चोट और दुर्घटनाएं – दांतों पर चोट लगने से उनका आंतरिक रंग बदल सकता है, जिससे वे पीले या भूरे दिखाई देते हैं. इसके लिए सही ट्रीटमेंट जैसे वेनीर्स या व्हाइटनिंग मदद कर सकते हैं. 

दांतों को सफेद और चमकदार कैसे बनाएं?

1. पेशेवर क्लीनिंग – साल में दो बार डेंटिस्ट से स्केलिंग और क्लीनिंग करवाने से प्लाक और टार्टर हट जाते हैं. यह बाहरी दाग कम करने में मदद करता है. 

2. व्हाइटनिंग ट्रीटमेंट – अगर दांत प्राकृतिक रूप से पीले हैं या धब्बे लग गए हैं, तो डेंटिस्ट के मार्गदर्शन में व्हाइटनिंग सबसे असरदार तरीका है. 

3. सही ब्रशिंग और फ्लॉसिंग – दो बार दिन में ब्रश और रोजाना फ्लॉसिंग जरूरी है. सॉफ्ट ब्रश और फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट यूज करें. ब्रश ज्यादा कड़ा करने से एनामेल घिस सकता है, जिससे पीला डेंटिन और दिख सकता है.

4. लाइफस्टाइल में बदलाव – गहरे रंग के पेय और तंबाकू से बचें. खट्टे फल और अम्लीय चीजें खाने के बाद कुल्ला करें. पर्याप्त पानी पिएं और बैलेंस डाइट लें. 

5. . कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट – अगर दांत बहुत पीले हैं या एनामेल कमजोर है, तो वेनीर्स, बांडिंग या अन्य डेंटल रिस्टोरेशन के ऑप्शन मददगार हो सकते हैं. 

यह भी पढ़ें – Periods After Delivery: बच्चे की डिलीवरी के कितने दिन तक पीरियड्स न आना नॉर्मल, कब डॉक्टर से मिलना होता है जरूरी?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं ये कैंसर, लक्षण दिखने तक हो जाती है देर

बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं ये कैंसर, लक्षण दिखने तक हो जाती है देर


आमतौर पर हम किसी भी गंभीर बीमारी को दर्द, तेज तकलीफ या अचानक बिगड़ती हालत से जोड़कर देखते हैं. हमें लगता है कि जब शरीर में कुछ गड़बड़ होगी, तो शरीर खुद हमें चेतावनी दे देगा. लेकिन कैंसर के कई प्रकार ऐसे होते हैं जो इस सोच को पूरी तरह गलत साबित कर देते हैं. ये कैंसर सालों तक शरीर के अंदर बिलकुल खामोशी से बढ़ते रहते हैं. न तेज दर्द, न कोई बड़ा लक्षण, न ऐसा कुछ जो इंसान को तुरंत डॉक्टर के पास जाने पर मजबूर करे और जब तक इनके लक्षण साफ तौर पर सामने आते हैं, तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है.

 

कैंसर का सबसे खतरनाक रूप उसकी तेजी नहीं, बल्कि उसकी चुप्पी होती है.कई बार कैंसर शरीर में मौजूद रहता है, लेकिन मरीज और डॉक्टर दोनों को इसका अंदाजा नहीं लग पाता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि कौन से कैंसर बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं. 

 

कौन से कैंसर बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं 

 

1. डिम्बग्रंथि का कैंसर – डिम्बग्रंथि का कैंसर लंबे समय से साइलेंट किलर माना जाता है. इस कैंसर के शुरुआती लक्षण बहुत हल्के और भ्रमित करने वाले होते हैं, जैसे पेट का थोड़ा फूलना, जल्दी पेट भर जाना, नीचे पेट या श्रोणि में हल्की-सी बेचैनी. ज्यादातर महिलाएं इन लक्षणों को गैस, अपच या सामान्य पीरियड्स की समस्या समझकर नजरअंदाज कर देती हैं.इसी वजह से लगभग दो-तिहाई मामलों में ओवरी कैंसर का पता तीसरे या चौथे स्टेज में चलता है, जब बीमारी पेट में फैल चुकी होती है. 

 

2. पैंक्रियाज का कैंसर – अगर सबसे ज्यादा जानलेवा साइलेंट कैंसर की बात करें, तो पैंक्रियाज का कैंसर सबसे ऊपर आता है. सिर्फ 15 प्रतिशत से कम मामलों में ही यह कैंसर शुरुआती स्टेज में पकड़ा जाता है. ज्यादातर मरीज तब आते हैं जब कैंसर फैल चुका होता है. इसके शुरुआत में न दर्द होता है, न पीलिया, न कोई गंभीर पाचन समस्या होती है. जब लक्षण आते हैं, जैसे तेज दर्द, वजन कम होना या पीलिया तब तक सर्जरी का मौका निकल चुका होता है. इसी कारण यह कैंसर बहुत कम मामलों में ठीक हो पाता है. 

 

3.  फेफड़ों का कैंसर – फेफड़ों का कैंसर दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण है, फिर भी यह भी अक्सर चुपचाप बढ़ता है.  इसके शुरुआती लक्षण हल्की लेकिन लंबे समय तक रहने वाली खांसी, थोड़ी-सी सांस फूलना, लगातार थकान, धूम्रपान करने वाले लोग इन लक्षणों को नॉर्मल समझ लेते हैं. परिवार वाले भी ज्यादा  गंभीरता नहीं दिखाते. नतीजा यह होता है कि लगभग 70 प्रतिशत मरीज तीसरे या चौथे स्टेज में डॉक्टर के पास पहुंचते हैं. 

 

4. कोलोरेक्टल का कैंसर – आंतों का कैंसर लंबे समय तक बिना किसी परेशानी के रह सकता है. इसके शुरुआती संकेत बहुत मामूली होते हैं. जैसे मल में थोड़ा सा खून (जो दिखता नहीं), आयरन की कमी से खून की कमी, शौच की आदतों में हल्का बदलाव. लोग इन्हें बवासीर, कमजोरी या उम्र का असर मान लेते हैं. जबकि सच यह है कि समय पर जांच हो जाए तो यह कैंसर पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. 

 

5. ब्रेस्ट कैंसर – भारत में ब्रेस्ट कैंसर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके शुरुआती चरण में दर्द नहीं होता है. अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि दर्द नहीं है, तो कुछ गंभीर नहीं होगा.  लेकिन  भारत में लगभग आधे मरीज उन्नत स्टेज में आते हैं. 8–10 प्रतिशत मरीजों में तो कैंसर पहले से शरीर में फैल चुका होता है. गांठ, स्किन में बदलाव या निप्पल से डिस्चार्ज को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. 

 

6. गॉलब्लैडर का कैंसर – उत्तर भारत में गॉलब्लैडर का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है. शुरुआत में इसके लक्षण पित्त की पथरी, हल्का पेट दर्द, अपच जैसे लगते हैं. मरीज और कई बार डॉक्टर भी इसे सामान्य पथरी समझ लेते हैं. जब पीलिया या तेज दर्द होता है, तब तक 70–80 प्रतिशत मामलों में कैंसर काफी फैल चुका होता है. 

 

 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किस बीमारी की चपेट में हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, जानें तबीयत बिगड़ने की वजह?

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देसी खाना तो ठीक है, लेकिन प्रोटीन का क्या, यहां जानें आपकी थाली कितनी ताकतवर?

देसी खाना तो ठीक है, लेकिन प्रोटीन का क्या, यहां जानें आपकी थाली कितनी ताकतवर?


आजकल फिटनेस का मतलब सिर्फ पतली कमर या उभरी हुई मसल्स नहीं रह गया है, बल्कि हेल्दी और एनर्जेटिक रहना भी उतना ही जरूरी हो गया है. इसी चाह में जिम जाने वाले युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है और उनके साथ बढ़ा है प्रोटीन पाउडर, शेक और सप्लीमेंट्स का ट्रेंड. कई लोग महीने के हजारों रुपये सिर्फ सप्लीमेंट्स पर खर्च कर देते हैं, यह सोचकर कि बिना इनके मसल्स नहीं बन सकतीं. लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई अच्छी बॉडी और ताकत पाने के लिए महंगे प्रोटीन पाउडर जरूरी हैं. एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर आपकी डाइट सही और संतुलित है तो देसी खाने से ही शरीर को भरपूर प्रोटीन, एनर्जी और ताकत मिल सकती है. 

बाजार में मिलने वाले कई प्रोटीन पाउडर तुरंत एनर्जी तो देते हैं, लेकिन लंबे समय तक इसके ज्यादा सेवन से लिवर और किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है. इसके अलावा ये काफी महंगे भी होते हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई सस्ता, सुरक्षित और नेचुरल ऑप्शन मौजूद है. तो आइए जानते हैं कि आपकी थाली कितनी ताकतवर है. इसमें देसी खाने के साथ प्रोटीन है या नहीं.  

आपकी थाली कितनी ताकतवर है

क्या आपने कभी सोचा है कि रोज आपकी प्लेट में जो खाना होता है, वही आपकी असली ताकत बनता है. आज के समय में लोग फिट रहने के लिए महंगे प्रोटीन पाउडर और सप्लीमेंट्स का सहारा ले रहे हैं, जबकि असली सेहत और ताकत तो हमारी देसी थाली में ही छुपी हुई है. दाल, चना, राजमा, सब्जियां, अनाज और दूध से बने खाद्य पदार्थ, ये सभी मिलकर शरीर को जरूरी प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स देते हैं.  यही पोषक तत्व मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं, इम्यूनिटी बढ़ाते हैं और पूरे दिन शरीर में एनर्जी बनाए रखते हैं.

अगर आपकी थाली में दाल-चावल, रोटी-सब्जी, दही या पनीर शामिल है, तो समझ लीजिए आपकी डाइट संतुलित है. खासकर बीन्स जैसे चना और राजमा प्राकृतिक प्रोटीन के बेहतरीन स्रोत हैं, जो बिना किसी नुकसान के शरीर को ताकत देते हैं. इसलिए अगली बार जब आप खाना खाएं, तो सिर्फ टेस्ट ही नहीं, बल्कि पोषण पर भी ध्यान दें. 
 
प्रोटीन की कमी से क्या-क्या परेशानियां हो सकती हैं?

अगर शरीर को पर्याप्त प्रोटीन न मिले, तो कई समस्याएं सामने आ सकती हैं. जैसे नाखून जल्दी टूटने लगते हैं, इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है, बार-बार बीमार पड़ना, मूड स्विंग्स और सोचने-समझने में दिक्कत, मांसपेशियों में कमजोरी और हड्डियां कमजोर होने से फ्रैक्चर का खतरा. 

इन चीजों से पूरी करें प्रोटीन की कमी

अगर आप सप्लीमेंट नहीं लेना चाहते, तो कुछ नेचुरल चीजों को डाइट में शामिल करें. जैसे दालें, बीन्स और मटर, दूध, दही, पनीर जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स, अंडे, मछली और लीन मीट, बीज और मेवे, टोफू और टेम्पेह जैसे सोया प्रोडक्ट्स. 

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वायु प्रदूषण से भारत में हर दिन 4657 मौतें, सामने आए डराने वाले आंकड़े

वायु प्रदूषण से भारत में हर दिन 4657 मौतें, सामने आए डराने वाले आंकड़े


Number Of Deaths Due To Air Pollution In India: भारत में वायु प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण की चिंता नहीं रहा, बल्कि यह देश के लिए एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है. एक्सपर्ट का कहना है कि प्रदूषित हवा हर साल लाखों लोगों की जिंदगी छीन रही है और इसका असर चुपचाप अर्थव्यवस्था को भी कमजोर कर रहा है. हाल ही में जिनेवा में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान इकोनॉमिस्ट गीता गोपीनाथ ने इस मुद्दे पर गं भीर चिंता जताई. उन्होंने बताया कि भारत में वायु प्रदूषण से हर साल करीब 17 लाख मौतें होती हैं. इसका मतलब यह हुआ कि देश में होने वाली हर पांच में से लगभग एक मौत प्रदूषित हवा से जुड़ी है

अगर इस आंकड़े को रोजाना के हिसाब से देखें, तो स्थिति और भी डरावनी हो जाती है, भारत में हर दिन औसतन 4,657 लोग जहरीली हवा के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं.

स्वास्थ्य के साथ अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर

एक्सपर्ट के मुताबिक, वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियां सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि इसका सीधा असर देश की उत्पादकता और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है. एक रिपोर्ट के अनुसार, समय से पहले होने वाली मौतों और प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण भारत को हर साल अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. साल 2019 में ही प्रदूषण से जुड़ी समय से पहले मौतों के कारण देश को करीब 28 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ, जबकि बीमारियों से जुड़ा आर्थिक नुकसान 8 अरब डॉलर आंका गया. कुल मिलाकर यह नुकसान 36.8 अरब डॉलर, यानी भारत की जीडीपी का करीब 1.36 प्रतिशत था.

PM2.5 बना सबसे बड़ा खतरा

पिछले हफ्ते जारी वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत की 100 प्रतिशत आबादी हानिकारक PM2.5 कणों के संपर्क में है. PM2.5 को सबसे खतरनाक वायु प्रदूषक माना जाता है, जो कई सोर्स से निकलता है और सीधे फेफड़ों में जाकर नुकसान पहुंचाता है।

दिल, फेफड़े और दिमाग पर सीधा असर

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, वायु प्रदूषण से स्ट्रोक, दिल की बीमारी, क्रॉनिक लंग डिजीज, फेफड़ों का कैंसर और निमोनिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. सिर्फ लंबे समय तक ही नहीं, बल्कि थोड़े समय के लिए भी अत्यधिक प्रदूषण में सांस लेना अस्थमा के दौरे, सांस की तकलीफ और फेफड़ों की क्षमता घटने जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है. स्टडी के अनुसार, गर्भवती महिलाओं के लिए प्रदूषित हवा और भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है. इससे कम वजन वाले बच्चे का जन्म, समय से पहले डिलीवरी और शिशु के विकास में बाधा जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं.

हर साल बढ़ता जा रहा संकट

द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, अगर भारत में वायु गुणवत्ता WHO के मानकों पर खरी उतरती, तो हर साल करीब 15 लाख अतिरिक्त मौतों को रोका जा सकता था. रिपोर्ट के अनुसार, केवल फॉसिल फ्यूल के जलने से हर साल लगभग 7.5 लाख मौतें होती हैं. इसमें कोयले से करीब 4 लाख और बायोमास जलने से लगभग 3.5 लाख मौतें शामिल हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि प्रदूषित हवा के संपर्क में थोड़े समय के लिए आने से भी सांस से जुड़ी दिक्कतें, अस्थमा और फेफड़ों की काम करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. जबकि लंबे समय तक संपर्क में रहने से दिल, दिमाग और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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