घर में पाल रखी है बिल्ली तो हो जाएं सावधान, आपको हो सकता है सीरियस मेंटल डिसऑर्डर

घर में पाल रखी है बिल्ली तो हो जाएं सावधान, आपको हो सकता है सीरियस मेंटल डिसऑर्डर



Cat Ownership Mental Health: आजकल इंसान, इंसानों से ज्यादा जानवरों से प्यार करने लगा है. लेकिन अब थोड़ा रूक जाइए.  अगर आप कैट पैरेंट हैं, तो सतर्क हो जाना जरूरी है. 17 स्टडीज के एनालिसिस के बाद यह रिजल्ट सामने आया है कि बिल्ली पालने से स्किजोफ्रेनिया जैसे मानसिक रोगों का जोखिम दोगुना हो सकता है.

ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ रिसर्च के साइंटिस्ट ने बिल्ली के संपर्क और साइकोटिक बीमारियों के बीच एक मजबूत संबंध पाया है. चलिए आपको बताते हैं कि रिसर्च में क्या निकला. 

स्टडी में क्या सामने आया

साइकेट्रिस्ट जॉन मैक्ग्राथ और उनकी टीम ने पिछले 40 साल में 11 देशों, जिनमें अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं. उनमें इसको लेकर हुई 17 स्टडीज की समीक्षा की. Schizophrenia Bulletin में पब्लिश इस मेटा-एनालिसिस में यह मिला कि जिन लोगों का बिल्ली से संपर्क रहा, उनमें आगे चलकर मेंटल हेल्थ विकसित होने की संभावना लगभग दोगुनी थी. रिसर्चर ने दूसरे कारणों के असर को हटाकर भी यही पैटर्न पाया.

संभावित वजह

इस संबंध को समझाने के लिए जिस वजह की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है Toxoplasma gondii. एक पैरासाइट जो आमतौर पर बिल्लियों में पाया जाता है. यह कैट फिकल मैटर, काटने, या फिर अधपके मीट और गंदे पानी के जरिए भी शरीर में पहुंच सकता है. एक बार अंदर आने पर यह दिमाग तक जा सकता है और न्यूरोट्रांसमीटरों को प्रभावित कर सकता है, जिससे व्यक्तित्व में बदलाव, साइकोटिक लक्षण या मानसिक बीमारियां ट्रिगर हो सकती हैं. हालांकि वैज्ञानिक यह भी साफ कर रहे हैं कि सिर्फ संबंध मिलना ही कारण साबित नहीं करता.

स्टडी की सीमाएं और उलझनें

रिस्क दोगुना सुनने में जितना बड़ा लगता है, तस्वीर उतनी सरल नहीं है. 17 में से 15 स्टडीज केस-कंट्रोल थीं. यानी पहले से बीमार और स्वस्थ लोगों की तुलना की गई, न कि उन्हें लंबे समय तक फॉलो किया गया. ऐसे डिजाइन से कारण-प्रभाव साबित नहीं होता. कई स्टडीज की क्वालिटी भी बहुत अच्छी नहीं थी और उनके नतीजे एक जैसे नहीं थे. कुछ स्टडीज ने तो इस दावे का खंडन भी किया. जैसे, अमेरिका में कॉलेज स्टूडेंट्स पर हुई एक स्टडी में कैट ओनरशिप और स्किजोटाइपी स्कोर के बीच कोई स्पष्ट रिलेशन नहीं मिला. एक अन्य स्टडी में जिन लोगों को बिल्ली ने काटा था, उनमें साइकोटिक-जैसे लक्षण ज्यादा दिखे. लेकिन रिसर्चर का मानना था कि इसमें शायद दूसरे बैक्टीरिया  की भूमिका हो सकती है.

इन रिसर्च में कुछ अलग ही बात

हर रिसर्च इस संबंध को सपोर्ट नहीं करती. उदाहरण के लिए, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की 2017 की स्टडी ने 5,000 लोगों को जन्म से 18 साल तक फॉलो किया और कैट एक्सपोजर और आगे चलकर साइकोटिक लक्षणों के बीच कोई ठोस संबंध नहीं पाया. इस स्टडी में सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे फैक्टर्स को भी कंट्रोल किया गया था, जिससे कैट-स्किजोफ्रेनिया थ्योरी और कमजोर लगती है.

कैट ओनर क्या समझें

ताजा मेटा-एनालिसिस यह साबित नहीं करता कि बिल्ली पालना स्किजोफ्रेनिया का कारण है. यह सिर्फ एक संभावित रिस्क फैक्टर की ओर इशारा करता है. रिसर्चर खुद कह रहे हैं कि इस संबंध को समझने के लिए बड़े और बेहतर डिजाइन वाले अध्ययनों की जरूरत है. अगर आपके घर में बिल्ली है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. बस कुछ आसान आदतें अपनाई जा सकती हैं, जैसे कि लिटर बॉक्स साफ रखें, बिल्ली के मल-मूत्र को संभालने के बाद हाथ धोएं और पालतू को हेल्दी रखें.

इसे भी पढ़ें- TB Disease: टीबी की कितनी स्टेज होती हैं, किस स्टेज में इंसान का बचना होता है मुश्किल?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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9 में से 1 भारतीय है इन्फेक्शियस डिजीज से पीड़ित, ICMR की रिपोर्ट ने बढ़ाई टेंशन

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कोरोना संक्रमित रह चुके लोगों के खून में बन रहे थक्के, नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

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Covid-19 Infection: आज भी दुनिया कोविड महामारी से पूरी तरह उबर नहीं पाई है. अब इसको लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है. दरअसल साइंटिस्ट ने लॉन्ग कोविड मरीजों के खून में ऐसे छोटे-छोटे थक्के और इम्यून सिस्टम से जुड़े बदलाव पाए हैं, जो इस लंबे समय तक रहने वाली स्थिति का कारण बन सकते हैं और भविष्य के इलाज का रास्ता भी खोल सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादातर लोग कोविड-19 इंफेक्शन से कुछ दिनों की सर्दी, गले में दर्द, खांसी या बुखार के बाद पूरी तरह ठीक हो जाते हैं. लेकिन कई मरीज ऐसे हैं जिन्हें थकान, ब्रेन फॉग, शरीर दर्द और सांस फूलने जैसी समस्याएं लंबे समय तक परेशान करती हैं. इसे ही लॉन्ग कोविड कहा जाता है. इन लक्षणों के पीछे की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं थी. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर अब साइंटिस्ट को क्या मिला है.

रिसर्च में क्या निकला?

अब साइंटिस्ट ने लॉन्ग कोविड मरीजों में दो महत्वपूर्ण बदलावों की पहचान की है, खून में मौजूद माइक्रोक्लॉट्स और इम्यून सेल्स न्यूट्रोफिल में होने वाले परिवर्तन. माइक्रोक्लॉट्स खून में घूमने वाले क्लॉटिंग प्रोटीन के असाधारण गुच्छे होते हैं, जिन्हें सबसे पहले कोविड मरीजों के सैंपल में देखा गया था.

रिसर्च में यह भी पाया गया कि लॉन्ग कोविड मरीजों में न्यूट्रोफिल नाम की व्हाइट ब्लड सेल्स एक खास बदलाव से गुजरती हैं. यह बदलाव इन्हें अपना डीएनए बाहर निकालकर धागेनुमा संरचनाएं बनाने के लिए आगे बढ़ाने का काम करता है. इन्हें न्यूट्रोफिल एक्स्ट्रासेल्युलर ट्रैप्स कहा जाता है, जो इंफेक्शन को खोजकर नष्ट करने में मदद करते हैं.

एक्सपर्ट का क्या कहना है?

साइंटिस्ट का मानना है कि कुछ कोविड मरीजों में माइक्रोक्लॉट्स और NETs के बीच होने वाला यह इंटरैक्शन शरीर में ऐसी प्रतिक्रियाओं की सीरीज शुरू कर देता है, जो आखिरी में लॉन्ग कोविड का कारण बन सकती है. माना जाता है कि माइक्रोक्लॉट्स NETs को अत्यधिक बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे सूजन और खून के थक्कों से जुड़ी समस्याएं बढ़ती हैं और कोविड जैसे लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं.

लॉन्ग कोविड मरीजों के प्लाज्मा की स्ट्रक्चरल जांच में माइक्रोक्लॉट्स और NETs की मात्रा स्वस्थ लोगों की तुलना में काफी अधिक पाई गई. स्टडी में यह भी सामने आया कि मरीजों के माइक्रोक्लॉट्स आकार में भी बड़े थे.

स्टडी के राइटर एलैन थिएरी के अनुसार, “यह खोज बताती है कि माइक्रोक्लॉट्स और NETs के बीच कुछ ऐसी शारीरिक प्रोसेस चल रही हैं, जो कंट्रोल से बाहर होकर रोग की वजह बन सकती हैं.”

रिसर्चर रिसिया प्रिटोरियस ने बताया कि यह इंटरैक्शन माइक्रोक्लॉट्स को शरीर की प्राकृतिक क्लॉट ब्रेकिंग प्रक्रिया से बचा सकता है, जिससे वे लंबे समय तक खून में बने रहते हैं और रक्त वाहिकाओं से संबंधित समस्याएं पैदा कर सकते हैं.

Journal of Medical Virology में पब्लिश स्टडी में साइंटिस्ट ने बताया कि NETs का अत्यधिक निर्माण माइक्रोक्लॉट्स को और अधिक स्थिर बनाता है, जो लॉन्ग कोविड के लक्षणों में योगदान दे सकता है. रिसर्च टीम का कहना है कि यह खोज लॉन्ग कोविड को समझने के लिए एक मौका देने का काम करने वाली है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दही से ब्रेड तक… इन चीजों में होता है बेशुमार शुगर, कहीं अपना नुकसान तो नहीं कर रहे आप?

दही से ब्रेड तक… इन चीजों में होता है बेशुमार शुगर, कहीं अपना नुकसान तो नहीं कर रहे आप?



Effects of excess sugar: आज के समय में हमें इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि हम रोजाना कितना शुगर का सेवन करते हैं. कई बार हम बिना जाने ही जरूरत से ज्यादा शुगर ले लेते हैं, जो धीरे-धीरे हमारी सेहत को नुकसान पहुंचाती है. अधिक चीनी खाने से टाइप 2 डायबिटीज़, दिल की बीमारियों और कुछ तरह के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. पिछले कुछ दशकों में लोगों की खाने-पीने की आदतों में बड़ा बदलाव आया है. प्रोसेस्ड और मीठे खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत ने मोटापे और डायबिटीज के मामलों में तेजी से इजाफा किया है. द लांसेट मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2050 तक दुनिया के आधे से अधिक वयस्क और लगभग एक तिहाई बच्चे व किशोर या तो ओवरवेट होंगे या मोटापे की समस्या से जूझ रहे होंगे. दुनिया भर के कई देश इस बढ़ती समस्या से निपटने की कोशिश कर रहे हैं.

इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन (IDF) के आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल दुनिया में लगभग 58.9 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जिनमें से करीब 10.7 करोड़ सिर्फ दक्षिण-पूर्व एशिया में हैं. अनुमान है कि साल 2050 तक यही संख्या बढ़कर 18.5 करोड़ तक पहुंच सकती है. ये आंकड़े बताते हैं कि अगर हमने अभी से अपनी डाइट और लाइफस्टाइल पर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले समय में शुगर से जुड़ी बीमारियां दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकती हैं. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे पता करें कि जिन चीजों का हम सेवन कर रहे हैं, उनमें शुगर है या नहीं और कितनी मात्रा में है. 

शुगर का पता कैसे करें?

सवाल आता है कि, तो कैसे पता लगाया जाए कि क्या हेल्दी है और क्या नहीं? एक्सपर्ट बताते हैं कि “सबसे अच्छा तरीका है कि आप खाने की चीज़ों के न्यूट्रिशन लेबल को ध्यान से पढ़ें.” शुगर हमेशा sugar नाम से नहीं लिखी होती. यह कई बार ग्लूकोज, हाई-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप, डेक्सट्रोज़ या माल्ट एक्सट्रैक्ट जैसे नामों के पीछे छिपी होती है. 

किन चीजों में कितना शुगर?

1. ब्रेकफास्ट सीरियल्स
कॉर्नफ्लेक्स, व्हीट फ्लेक्स या म्यूसली. ये सब हेल्दी ब्रेकफास्ट के नाम पर बेचे जाते हैं, लेकिन इनमें ऊपर से डाली गई चीनी या शहद इन्हें ज़रूरत से ज्यादा मीठा बना देती है.

2. सॉस और ड्रेसिंग्स
टोमैटो केचप, चिली सॉस या सलाद ड्रेसिंग्स स्वाद में नमकीन लग सकते हैं, लेकिन इनमें फ्लेवर बैलेंस करने के लिए खूब सारा शुगर मिलाया जाता है.

3. प्रोटीन और ग्रेनोला बार्स
हेल्दी स्नैक के नाम पर बिकने वाले ये बार्स नट्स और सीड्स से भरे होते हैं, लेकिन इन्हें चिपकाने के लिए सिरप, शहद या स्वीटनर का इस्तेमाल किया जाता है.

4. फ्लेवर्ड योगर्ट
रंगीन पैक में दिखने वाला फ्रूटी दही बाहर से जितना हेल्दी लगता है, असल में उसमें शुगर की मात्रा काफी ज़्यादा होती है. फलों के साथ साथ उसमें मीठा भी डाला जाता है.

5. क्रीमर और कंडेंस्ड मिल्क
कॉफी क्रीमर या मिल्क पाउडर में सिर्फ दूध नहीं होता, बल्कि टेक्सचर और स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें भी चीनी मिलाई जाती है.

6. पैक्ड जूस
100 प्रतिशत फ्रूट जूस लिखे होने के बावजूद इनमें अक्सर अतिरिक्त स्वीटनर मिलाया जाता है, जिससे ये ताजे फलों से ज्यादा सॉफ्ट ड्रिंक जैसे हो जाते हैं.

7. फ्लेवर्ड मिल्क
चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी या बनाना फ्लेवर वाले दूध बच्चों को बहुत पसंद आते हैं, लेकिन इनमें छिपी शुगर की मात्रा भी उतनी ही ज्यादा होती है.

8. कैन्ड फ्रूट्स और जैम्स
कैन में बंद फल, जैम या जेली में शुगर सिर्फ स्वाद के लिए नहीं डाली जाती, बल्कि यह उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने का काम भी करती है.

9. बेकरी प्रोडक्ट्स
ब्रेड, पेस्ट्री या बन. इन सबमें शुगर सिर्फ मीठा करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें मुलायम और लंबे समय तक ताजा रखने के लिए डाली जाती है, भले ही स्वाद में मीठा महसूस न हो.

बढ़ रहा खतरा 

दुनिया के कई हेल्थ संगठनों के मुताबिक, प्रति व्यक्ति सबसे अधिक शुगर की खपत अमेरिका में होती है. वहीं भारत, चीन, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी मीठे उत्पादों का सेवन तेजी से बढ़ रहा है. इसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है, खासकर मोटापा और उससे जुड़ी बीमारियों के रूप में. मार्च में द लांसेट ने 200 देशों पर किए गए एक अध्ययन के आंकड़े साझा किए, जिनमें बताया गया कि अगर मौजूदा रुझान ऐसे ही जारी रहे, तो साल 2050 तक मोटापा और ओवरवेट लोगों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगी. रिपोर्ट के अनुसार, वयस्क पुरुषों में लगभग 57.4 प्रतिशत और महिलाओं में करीब 60.3 प्रतिशत लोग अधिक वजन या मोटापे की समस्या से ग्रस्त होंगे. अगले 25 वर्षों में चीन, भारत और अमेरिका उन देशों में शामिल होंगे जहां मोटापे की आबादी सबसे ज्यादा होगी.

यह भी पढ़ें: मां बनने का सपना तोड़ सकता है तेजी से बढ़ रहा बेली फैट, जानें इस पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बॉडी में दिखें ये 12 लक्षण तो हो जाएं अलर्ट, देते हैं इस चीज की कमी की जानकारी

बॉडी में दिखें ये 12 लक्षण तो हो जाएं अलर्ट, देते हैं इस चीज की कमी की जानकारी


मूड का बार-बार बदलना, बेचैनी, दिमाग का धुंधला महसूस होना ये सिर्फ तनाव नहीं, बल्कि मैग्नीशियम की कमी भी हो सकती है. NIH में प्रकाशित एक स्टडी बताती है कि यह मिनरल दिमाग में सेरोटोनिन और स्ट्रेस-रेस्पॉन्स को कंट्रोल करता है. इसलिए इसकी कमी चिंता, चिड़चिड़ापन या कम फोकस जैसी समस्याएं बढ़ा देती है.

अगर अक्सर मांसपेशियों में खिंचाव, दर्द या अचानक झटके महसूस हों, तो ये सिर्फ थकान नहीं है. कई बार ऐसा तब होता है जब शरीर में मैग्नीशियम कम हो जाता है और मांसपेशियों को आराम व रिकवरी में मुश्किल होती है. NIH की स्टडी भी बताती है कि एथलीट या अधिक सक्रिय लोग इस कमी से ज्यादा प्रभावित होते हैं. समय रहते डायट में बदलाव से यह समस्या आसानी से सुधर सकती है.

अगर अक्सर मांसपेशियों में खिंचाव, दर्द या अचानक झटके महसूस हों, तो ये सिर्फ थकान नहीं है. कई बार ऐसा तब होता है जब शरीर में मैग्नीशियम कम हो जाता है और मांसपेशियों को आराम व रिकवरी में मुश्किल होती है. NIH की स्टडी भी बताती है कि एथलीट या अधिक सक्रिय लोग इस कमी से ज्यादा प्रभावित होते हैं. समय रहते डायट में बदलाव से यह समस्या आसानी से सुधर सकती है.

बार-बार माइग्रेन होना या हाथ-पैर में झुनझुनी जैसा एहसास होना भी नर्वस सिस्टम में गड़बड़ी का संकेत है. मैग्नीशियम उन न्यूरोट्रांसमीटर को संतुलित करता है, जो दिमाग और शरीर के बीच संदेश भेजते हैं. कमी होने पर नसें जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, जिससे सिरदर्द या सनसनी जैसे लक्षण उभरते हैं. सही मात्रा लेने से नसों का कामकाज स्थिर होता है.

बार-बार माइग्रेन होना या हाथ-पैर में झुनझुनी जैसा एहसास होना भी नर्वस सिस्टम में गड़बड़ी का संकेत है. मैग्नीशियम उन न्यूरोट्रांसमीटर को संतुलित करता है, जो दिमाग और शरीर के बीच संदेश भेजते हैं. कमी होने पर नसें जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, जिससे सिरदर्द या सनसनी जैसे लक्षण उभरते हैं. सही मात्रा लेने से नसों का कामकाज स्थिर होता है.

नींद न आना, पैर हिलते रहना या रात में कई बार जागना यह सब भी मैग्नीशियम की कमी से जुड़ा हो सकता है. यह मिनरल दिमाग को शांत करने वाले रसायनों और मेलाटोनिन को संतुलित करता है. कमी होने पर नींद की क्वालिटी गिरती है और दिनभर थकान महसूस होती है. इसकी पूर्ति करने से नींद बेहतर होती है और शरीर को रिकवरी का समय मिलता है.

नींद न आना, पैर हिलते रहना या रात में कई बार जागना यह सब भी मैग्नीशियम की कमी से जुड़ा हो सकता है. यह मिनरल दिमाग को शांत करने वाले रसायनों और मेलाटोनिन को संतुलित करता है. कमी होने पर नींद की क्वालिटी गिरती है और दिनभर थकान महसूस होती है. इसकी पूर्ति करने से नींद बेहतर होती है और शरीर को रिकवरी का समय मिलता है.

पेट फूलना, कब्ज या गैस जैसी दिक्कतें भी अक्सर मैग्नीशियम की कमी की वजह से होती हैं. यह मिनरल आंतों की मांसपेशियों को आराम देता है और पानी को आकर्षित करके मल त्याग में मदद करता है. कमी होने पर पाचन धीमा हो जाता है और न्यूट्रिशन का अब्जॉर्ब भी प्रभावित होता है. इसका संतुलन डाइजेशन सिस्टम को सुचारू रखने में मदद करता है.

पेट फूलना, कब्ज या गैस जैसी दिक्कतें भी अक्सर मैग्नीशियम की कमी की वजह से होती हैं. यह मिनरल आंतों की मांसपेशियों को आराम देता है और पानी को आकर्षित करके मल त्याग में मदद करता है. कमी होने पर पाचन धीमा हो जाता है और न्यूट्रिशन का अब्जॉर्ब भी प्रभावित होता है. इसका संतुलन डाइजेशन सिस्टम को सुचारू रखने में मदद करता है.

कमजोर इम्युनिटी, बार-बार बीमार पड़ना या जल्दी थक जाना, ये शरीर के डिफेंस सिस्टम के कमजोर होने के संकेत हैं. मैग्नीशियम एंटीबॉडी बनाने और वाइट ब्लड सेल्स को ऊर्जा देने में अहम भूमिका निभाता है. इसकी कमी से शरीर संक्रमणों के प्रति जल्दी संवेदनशील हो जाता है. पर्याप्त मात्रा लेने से इम्युनिटी मजबूत रहती है और रिकवरी तेज होती है.

कमजोर इम्युनिटी, बार-बार बीमार पड़ना या जल्दी थक जाना, ये शरीर के डिफेंस सिस्टम के कमजोर होने के संकेत हैं. मैग्नीशियम एंटीबॉडी बनाने और वाइट ब्लड सेल्स को ऊर्जा देने में अहम भूमिका निभाता है. इसकी कमी से शरीर संक्रमणों के प्रति जल्दी संवेदनशील हो जाता है. पर्याप्त मात्रा लेने से इम्युनिटी मजबूत रहती है और रिकवरी तेज होती है.

कमजोर इम्युनिटी, बार-बार बीमार पड़ना या जल्दी थक जाना, ये शरीर के डिफेंस सिस्टम के कमजोर होने के संकेत हैं. मैग्नीशियम एंटीबॉडी बनाने और वाइट ब्लड सेल्स को ऊर्जा देने में अहम भूमिका निभाता है. इसकी कमी से शरीर इंफेक्शन के प्रति जल्दी संवेदनशील हो जाता है. पर्याप्त मात्रा लेने से इम्युनिटी मजबूत रहती है और रिकवरी तेज होती है.

कमजोर इम्युनिटी, बार-बार बीमार पड़ना या जल्दी थक जाना, ये शरीर के डिफेंस सिस्टम के कमजोर होने के संकेत हैं. मैग्नीशियम एंटीबॉडी बनाने और वाइट ब्लड सेल्स को ऊर्जा देने में अहम भूमिका निभाता है. इसकी कमी से शरीर इंफेक्शन के प्रति जल्दी संवेदनशील हो जाता है. पर्याप्त मात्रा लेने से इम्युनिटी मजबूत रहती है और रिकवरी तेज होती है.

Published at : 20 Nov 2025 11:21 AM (IST)

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देश में वायरल इंफेक्शन बढ़ा तो डॉक्टरों ने किया अलर्ट, डरा देगी ICMR  की रिपोर्ट

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ICMR की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर नौ में से एक व्यक्ति किसी न किसी संक्रमण से प्रभावित मिला. 4.5 लाख सैंपल में से 11.1 प्रतिशत में वायरस या रोगजनक मिले यह स्थिति बेहद गंभीर है.

स्टडी में कई प्रमुख वायरस सामने आए जैसे ARI/SARI में इन्फ्लूएंजा A, तेज बुखार वाले मामलों में डेंगू, पीलिया में हेपेटाइटिस A, डायरिया में नोरोवायरस और दिमागी बुखार जैसे मामलों में HSV. यह दिखाता है कि वायरस कई लेवल पर सक्रिय हैं.

स्टडी में कई प्रमुख वायरस सामने आए जैसे ARI/SARI में इन्फ्लूएंजा A, तेज बुखार वाले मामलों में डेंगू, पीलिया में हेपेटाइटिस A, डायरिया में नोरोवायरस और दिमागी बुखार जैसे मामलों में HSV. यह दिखाता है कि वायरस कई लेवल पर सक्रिय हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि यह बढ़ती संख्या सिर्फ हल्के बुखार का मामला नहीं है. बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर immunity वाले लोगों में ये संक्रमण गंभीर बीमारी का रूप ले रहे हैं और अस्पतालों पर अतिरिक्त दबाव बना रहे हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि यह बढ़ती संख्या सिर्फ हल्के बुखार का मामला नहीं है. बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर immunity वाले लोगों में ये संक्रमण गंभीर बीमारी का रूप ले रहे हैं और अस्पतालों पर अतिरिक्त दबाव बना रहे हैं.

भीड़भाड़ और तेजी से बढ़ती जनसंख्या वायरस फैलने की सबसे बड़ी वजह है. शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट, ऑफिस और बाजार रोज लाखों लोगों को करीब लाते हैं, जिससे संक्रमण तेजी से फैलता है.

भीड़भाड़ और तेजी से बढ़ती जनसंख्या वायरस फैलने की सबसे बड़ी वजह है. शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट, ऑफिस और बाजार रोज लाखों लोगों को करीब लाते हैं, जिससे संक्रमण तेजी से फैलता है.

प्रदूषण भी असर डाल रहा है. खराब हवा फेफड़ों और इम्यून सिस्टम को कमजोर करती है, जिससे बार-बार खांसी, जुकाम और बुखार का खतरा बढ़ता है. मौसम में उतार-चढ़ाव और नमी मच्छरों और वायरस को तेजी से बढ़ने देती है.

प्रदूषण भी असर डाल रहा है. खराब हवा फेफड़ों और इम्यून सिस्टम को कमजोर करती है, जिससे बार-बार खांसी, जुकाम और बुखार का खतरा बढ़ता है. मौसम में उतार-चढ़ाव और नमी मच्छरों और वायरस को तेजी से बढ़ने देती है.

COVID-19 के बाद immunity में आए बदलाव भी कारणों में शामिल हैं. इसके अलावा गंदगी, कचरे का खराब प्रबंधन और दूषित पानी हेपेटाइटिस, नोरोवायरस और डायरिया जैसी बीमारियों को तेजी से फैलाते हैं.

COVID-19 के बाद immunity में आए बदलाव भी कारणों में शामिल हैं. इसके अलावा गंदगी, कचरे का खराब प्रबंधन और दूषित पानी हेपेटाइटिस, नोरोवायरस और डायरिया जैसी बीमारियों को तेजी से फैलाते हैं.

एक्सपर्ट के अनुसार रोजमर्रा की आदतें ही सबसे बड़ा बचाव हैं  हाथ धोना, मास्क पहनना, साफ पानी पीना, मच्छरों से बचाव, घर में पानी जमा न होने देना, पौष्टिक खाना और पर्याप्त नींद. साथ ही फ्लू,  और हेपेटाइटिस के टीके समय पर लगवाना बेहद जरूरी है.

एक्सपर्ट के अनुसार रोजमर्रा की आदतें ही सबसे बड़ा बचाव हैं हाथ धोना, मास्क पहनना, साफ पानी पीना, मच्छरों से बचाव, घर में पानी जमा न होने देना, पौष्टिक खाना और पर्याप्त नींद. साथ ही फ्लू, और हेपेटाइटिस के टीके समय पर लगवाना बेहद जरूरी है.

Published at : 20 Nov 2025 10:39 AM (IST)

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