इम्युनिटी से लेकर वेट लॉस तक…कच्चा टमाटर खाने के ये 10 फायदे जानकर आप भी हो जाएंगे हैरान

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सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है घुटनों का दर्द, क्या है इसकी वजह? जानें आयुर्वेदिक इलाज

सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है घुटनों का दर्द, क्या है इसकी वजह? जानें आयुर्वेदिक इलाज


सर्दियों के मौसम में बहुत से लोगों को घुटनों के दर्द और जोड़ों की जकड़न की समस्या सताने लगती है, खासकर बुजुर्गों, आर्थराइटिस के मरीजों और उन लोगों को जो पहले से जोड़ों की परेशानी झेल रहे होते हैं. ठंड बढ़ते ही ऐसा लगता है जैसे घुटनों में जंग लग गई हो, उठना-बैठना और चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है. आइए जानते हैं कि इसकी वजह और इलाज क्या है? 

क्या कहते हैं डॉक्टर्स?

डॉक्टरों के अनुसार, सर्दियों के दौरान घुटनों में दर्द होने की वजह सिर्फ ठंड नहीं, बल्कि शरीर के अंदर होने वाले कई बदलाव जिम्मेदार होते हैं. दरअसल, सर्दियों में वायुमंडलीय दबाव यानी बैरोमेट्रिक प्रेशर कम हो जाता है. इससे जोड़ों के आसपास मौजूद टिश्यू में सूजन बढ़ सकती है, जिससे दर्द और अकड़न महसूस होती है. वहीं, ठंड के कारण ब्लड सर्कुलेशन धीमा हो जाता है. घुटनों में मौजूद सायनोवियल फ्लूइड, जो जोड़ों को चिकनाई देता है, ठंड में गाढ़ा हो जाता है. नतीजा यह होता है कि जोड़ों की मूवमेंट कम हो जाती है और दर्द बढ़ने लगता है. इसके अलावा सर्दियों में धूप कम मिलने से विटामिन-डी की कमी भी हो जाती है, जो हड्डियों और जोड़ों को कमजोर बना देती है.

क्या कहता है आयुर्वेद? 

आयुर्वेद इसे वात दोष के बढ़ने से जोड़कर देखता है. आयुर्वेद के अनुसार, ठंड और सूखे मौसम में वात दोष बढ़ जाता है, जिससे जोड़ों में रूखापन, दर्द और जकड़न आने लगती है. शरीर में मौजूद श्लेषक कफ, जो जोड़ों को प्राकृतिक रूप से चिकनाई देता है, वात के बढ़ने से सूखने लगता है. यही वजह है कि सर्दियों में घुटनों की समस्या ज्यादा महसूस होती है.

क्या है आयुर्वेदिक इलाज?

आयुर्वेदिक इलाज और घरेलू उपाय इस दर्द में काफी राहत दे सकते हैं. सबसे आसान और असरदार उपाय है तेल मालिश. रोजाना तिल के तेल या महानारायण तेल से घुटनों की हल्की मालिश करने से जोड़ों में गर्माहट आती है और जकड़न कम होती है. सुबह खाली पेट भिगोए हुए मेथी दाने खाना भी फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि मेथी की तासीर गर्म होती है और सूजन घटाने में मदद करती है. हल्दी और अदरक का काढ़ा पीने से अंदरूनी सूजन कम होती है और जोड़ों को ताकत मिलती है.

ये तरीके भी आते हैं काम

इसके साथ-साथ सर्दियों में गुनगुना पानी पीना, धूप में रोज कुछ देर बैठना और हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करना बहुत जरूरी है. इसके अलावा, ठंडी फर्श पर बैठने, नंगे पैर चलने और ठंडे खाने से बचना चाहिए. अगर दर्द ज्यादा हो या लंबे समय तक बना रहे, तो आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह लेना बेहतर रहता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या LED बल्ब की रोशनी से स्किन को होता है खतरा, जानिए क्या है हकीकत?

क्या LED बल्ब की रोशनी से स्किन को होता है खतरा, जानिए क्या है हकीकत?


Do LED Bulbs Emit Harmful UV Radiation: आज के समय में LED यानी लाइट-एमिटिंग डायोड बल्ब लगभग हर घर में इस्तेमाल हो रहे हैं. कम बिजली खपत और लंबी उम्र की वजह से ये लाइटिंग की सबसे लोकप्रिय तकनीक बन चुके हैं. LED लाइट्स ने घरों और दफ्तरों की रोशनी का तरीका पूरी तरह बदल दिया है. लेकिन एक सवाल अक्सर उठता है कि क्या LED बल्ब से निकलने वाली रोशनी में हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणें होती हैं? वही यूवी किरणें, जो सूरज की रोशनी से निकलकर त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचा सकती हैं. चलिए आपको इसका जवाब देते हैं. 

क्या होती है यूवी रेडिएशन?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यूवी रेडिएशन तीन तरह का होता है. यूवीए सबसे लंबी तरंगों वाला होता है, जो त्वचा की उम्र तेजी से बढ़ाने और हल्के नुकसान से जुड़ा है.
यूवीबी मध्यम तरंगों का होता है, जो सनबर्न और गंभीर स्किन डैमेज की वजह बन सकता है. यूवीसी सबसे छोटी लेकिन सबसे शक्तिशाली किरणें होती हैं, जो बेहद खतरनाक मानी जाती हैं, हालांकि ये पृथ्वी के वातावरण में ही काफी हद तक एब्जर्व हो जाती हैंय

iere में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, अगर यूवी लाइट का संपर्क बहुत ज्यादा या लंबे समय तक हो, तो इससे त्वचा जल्दी बूढ़ी हो सकती है और आंखों को नुकसान पहुंच सकता है. इसी वजह से लोगों को आर्टिफिशियल लाइट सोर्स, जैसे बल्बों से निकलने वाली यूवी किरणों को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है.

 क्या एलईडी बल्ब यूवी किरणें छोड़ते हैं?

इसका सीधा जवाब है नहीं, या फिर बेहद कम मात्रा में. आमतौर पर घरों में इस्तेमाल होने वाले एलईडी बल्ब कुल रोशनी का 1 प्रतिशत से भी कम यूवी उत्सर्जित करते हैं. एलईडी की डिजाइन और उसमें इस्तेमाल होने वाले फॉस्फर की वजह से चिप से निकलने वाली संभावित यूवी किरणें बाहर तक पहुंच ही नहीं पातीं. इनका स्तर प्राकृतिक धूप की तुलना में बहुत कम होता है.  रोजमर्रा के घरेलू एलईडी बल्ब इस तरह से बनाए ही नहीं जाते कि वे हानिकारक यूवी किरणें छोड़ें.

घर  वाली लाइटों का कोई संपर्क नहीं

हां, कुछ खास एलईडी ऐसे होते हैं जिन्हें जानबूझकर यूवी उत्सर्जन के लिए डिजाइन किया जाता है, जैसे स्टरलाइजेशन, नेल क्योरिंग या इंडस्ट्रियल इस्तेमाल वाले यूवी एलईडी. ये सामान्य घरेलू लाइटिंग के लिए नहीं होते. लेकिन सफेद एलईडी  बल्ब से निकलने वाली यूवी मात्रा इतनी कम होती है कि उसे त्वचा या आंखों के लिए नुकसानदायक नहीं माना जाता. सूरज की रोशनी की तुलना में एलईडी का यूवी आउटपुट न के बराबर है. आसान शब्दों में कहें तो घरों में इस्तेमाल होने वाली एलईडी लाइट से यूवी का कोई वास्तविक खतरा नहीं होता.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बार-बार आती है बेहोशी तो सिर्फ लाइफस्टाइल नहीं, हो सकता है दिल की सेहत से जुड़ा खतरनाक संकेत

बार-बार आती है बेहोशी तो सिर्फ लाइफस्टाइल नहीं, हो सकता है दिल की सेहत से जुड़ा खतरनाक संकेत


Is Frequent Fainting A Sign Of Heart Disease: बार-बार बेहोशी आना एक आम समस्या मानी जाती है, लेकिन इसे हल्के में लेना कई बार खतरनाक साबित हो सकता है. आंकड़ों के अनुसार, सामान्य आबादी के करीब 15 से 25 प्रतिशत लोग जीवन में कभी न कभी बेहोशी का अनुभव करते हैं. अक्सर लोग इसे थकान, पानी की कमी, तनाव या खाना न खाने से जोड़कर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट  का कहना है कि कुछ मामलों में यह दिल की गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है।

फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल, नई दिल्ली के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर प्रमोद कुमार के मुताबिक “बेहोशी दो तरह के लोगों में हो सकती है, एक, जिनका दिल पूरी तरह स्वस्थ है और दूसरे, जिन्हें पहले से कोई हार्ट रोग है. खासतौर पर जिन लोगों का दिल कमजोर है या जिनका पंपिंग फंक्शन कम है, उनमें बेहोशी का खतरा ज्यादा होता है. कई बार यह दिल की धड़कन में गड़बड़ी यानी अरिदमिया का पहला और इकलौता चेतावनी संकेत भी हो सकता है.”

हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है

तेज धड़कनें जैसे वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया या वेंट्रिकुलर फिब्रिलेशन, या फिर बहुत धीमी धड़कन, कुछ सेकंड के लिए दिल की धड़कन रुकने जैसी स्थिति पैदा कर सकती हैं. इससे दिमाग तक ब्लड फ्लो अचानक कम हो जाता है और व्यक्ति बेहोश हो सकता है. इसके अलावा, खड़े होते समय अचानक ब्लड प्रेशर गिर जाना भी बेहोशी की एक आम वजह है.

कब बढ़ जाती है दिक्कत?

डॉक्टर बताते हैं कि समस्या तब बढ़ जाती है जब बेहोशी को गलत तरीके से मिर्गी या फिट समझ लिया जाता है. ऐसे मामलों में मरीज को अनावश्यक जांचों और इलाज से गुजरना पड़ता है, जबकि असली कारण दिल से जुड़ा हो सकता है. एक्सपर्ट के अनुसार,  कुछ तरह की बेहोशी का समय पर सही इलाज हो जाए तो लंबे समय में परिणाम अच्छे रहते हैं, लेकिन कुछ मामलों में सही समय पर पहचान न होने पर जान का खतरा भी हो सकता है.

इन मामलों में तुरंत डॉक्टर से करना चाहिए संपर्क

कार्डियोलॉजिस्ट्स का कहना है कि बार-बार या बिना किसी स्पष्ट कारण के बेहोशी आना एक रेड फ्लैग है. खासतौर पर अगर बेहोशी एक्सरसाइज करते समय, लेटे हुए, या बिना किसी चेतावनी के हो, तो तुरंत जांच जरूरी है. अगर इसके साथ सीने में दर्द, तेज धड़कन, सांस फूलना या परिवार में अचानक मौत का हिस्ट्री हो, तो खतरा और बढ़ जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, “सिन्कोपी कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक लक्षण है. असली सवाल यह है कि ब्रेन तक ब्लड फ्लो अचानक क्यों कम हुआ.” कई बार मरीज खुद ही इसे लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्या मान लेते हैं, जिससे सही समय पर जांच नहीं हो पाती.

अच्छी बात यह है कि दिल से जुड़ी कई खतरनाक वजहों को शुरुआती जांच से ही पकड़ा जा सकता है. एक साधारण ईसीजी, हार्ट मॉनिटरिंग या इको टेस्ट से यह पता चल सकता है कि बेहोशी का कारण मामूली है या जानलेवा हो सकता है.

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दिल की सेहत के लिए कितनी तेज चलना है फायदेमंद, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?

दिल की सेहत के लिए कितनी तेज चलना है फायदेमंद, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?


How Fast Should You Walk For Heart Health: एक स्टडी में सामने आया है कि अगर कोई व्यक्ति एक ही बार में 10 से 15 मिनट लगातार चलता है, तो यह हार्ट की सेहत के लिए छोटे-छोटे अंतराल में चलने की तुलना में कहीं ज्यादा फायदेमंद होता है. खासकर उन लोगों के लिए जो शारीरिक रूप से कम सक्रिय हैं, लगातार थोड़ी देर तक चलना मौत और हार्ट से जुड़ी बीमारियों के खतरे को कम करता है. यानी चलने के तरीके में थोड़ा-सा बदलाव भी हार्ट की सेहत पर बड़ा असर डाल सकता है. 

वॉक करना फायदेमंद

हार्ट को स्वस्थ रखने के लिए वॉक करना सबसे आसान और असरदार तरीका माना जाता है. आज के समय में हार्ट हेल्थ का ध्यान रखना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है. WHO के अनुसार, हर साल दुनिया भर में लगभग 1.79 करोड़ लोगों की मौत हार्ट रोगों के कारण होती है. इन जोखिमों को कम करने का सबसे सरल उपाय है चलना. लेकिन सवाल यह है कि कितनी तेज चलना जरूरी है?

कितनी तेज चलना चाहिए?

2023 में GeroScience में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, जो लोग तेज़ रफ्तार से चलते हैं, लगभग 3 से 4.5 मील प्रति घंटा की गति से उनमें दिल से जुड़ी बीमारियों से मौत का खतरा कम होता है. इतना ही नहीं, इन लोगों में स्ट्रोक और डिमेंशिया का जोखिम भी धीमी चाल से चलने वालों की तुलना में कम पाया गया. आसान शब्दों में कहें तो यह रफ्तार एक मील 20 मिनट से लेकर 13 मिनट में तय करने के बराबर होती है.

रिसर्च यह भी बताती है कि तेज चाल से चलने के छोटे-छोटे सेशन भी बेहद फायदेमंद होते हैं. अगर कोई व्यक्ति रोज सिर्फ 10 मिनट तेज चलता है और ऐसा एक हफ्ते तक करता है, तो इससे फिटनेस में सुधार, मूड बेहतर होने और समय से पहले मौत के खतरे में करीब 15 प्रतिशत तक कमी देखी गई है, वहीं, अगर आप 30 मिनट तक लगातार तेज चाल से चलते हैं, तो यह एक मीडियम-इंटेंसिटी वर्कआउट माना जाता है, जिसकी सिफारिश अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन भी करता है.

कितनी देर चलना चाहिए?

ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी और स्पेन की यूनिवर्सिदाद यूरोपीया के एक्सपर्ट के नेतृत्व में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय स्टडी में पाया गया कि दिन में कुछ ही मिनट सही तरीके से चलना भी दिल की सेहत में बड़ा फर्क ला सकता है.  इस रिसर्च के नतीजे Annals of Internal Medicine में प्रकाशित हुए हैं. रिसर्चर के अनुसार, अगर आप 10 से 15 मिनट तक बिना रुके चलते हैं, तो इसका असर दिल पर ज्यादा पॉजिटिव होता है.

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बच्चे की डिलीवरी के कितने दिन तक पीरियड्स न आना नॉर्मल, कब डॉक्टर से मिलना होता है जरूरी?

बच्चे की डिलीवरी के कितने दिन तक पीरियड्स न आना नॉर्मल, कब डॉक्टर से मिलना होता है जरूरी?


How Long Is It Normal To Miss Periods After Delivery: प्रेग्नेंसी और प्रसव का अनुभव महिला शरीर में कई बड़े बदलाव लेकर आता है. ऐसे में नई मां बनी महिलाओं के मन में सबसे आम सवाल होता है कि “डिलीवरी के बाद पीरियड्स कब वापस आते हैं?”. इसका जवाब हर महिला के लिए अलग हो सकता है. आमतौर पर पीरियड्स 6 हफ्ते से लेकर एक साल या उससे भी ज्यादा समय में लौट सकते हैं. यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि महिला ब्रेस्टफीडिंग करा रही है या नहीं, हार्मोनल स्थिति कैसी है और शरीर की रिकवरी कितनी जल्दी हो रही है.

2023 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के मुताबिक, भारत में करीब 65 प्रतिशत महिलाओं को डिलीवरी के 6 महीने के भीतर पहला पीरियड आ जाता है. हालांकि, जो महिलाएं पूरी तरह से ब्रेस्टफीडिंग कराती हैं, उनमें पीरियड्स 18 महीने तक भी टल सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि डॉक्टर इस पूरे मामले को लेकर क्या कहते हैं. 

डिलीवरी के बाद पीरियड्स लौटने को प्रभावित करने वाले कारण

दिलशाद गार्डन स्थित मेटरनिटी क्लीनिक की गाइनकॉलजिस्ट डॉक्टर नीतू सिंह बताती हैं कि “प्रसव के बाद पीरियड्स का लौटना कई बातों पर निर्भर करता है. इनमें सबसे अहम भूमिका स्तनपान की होती है. ब्रेस्टफीडिंग के दौरान शरीर में प्रोलैक्टिन नामक हार्मोन बनता है, जो दूध बनने में मदद करता है और ओव्यूलेशन को दबा देता है. यही वजह है कि जो महिलाएं दिन-रात नियमित रूप से और पूरी तरह ब्रेस्टफीडिंग कराती हैं, उनमें पीरियड्स देर से आते हैं.” उनके अनुसार, यह शरीर की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो अगली गर्भावस्था के बीच अंतर बनाए रखने में मदद करती है. डिलीवरी के बाद पीरियड्स काफी दर्दभरे हो सकते हैं, अगर ज्यादा दिक्कत हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

पीरियड्स दोबारा नियमित करने में कैसे मदद करें?

डिलीवरी के बाद शरीर को दोबारा संतुलन में आने के लिए सही देखभाल की जरूरत होती है. इसमें सबसे पहले पोषण और पानी की भूमिका बेहद अहम है. संतुलित और पौष्टिक आहार हार्मोनल बैलेंस बनाए रखने और शरीर की रिकवरी में मदद करता है. आयरन से भरपूर चीजें जैसे हरी सब्जियां, दालें और प्रोटीन युक्त भोजन डिलीवरी के दौरान हुए खून की कमी को पूरा करने में सहायक होते हैं. वहीं, मछली, अलसी और अखरोट जैसे ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर खाद्य पदार्थ सूजन कम करने और शरीर को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, क्योंकि इससे शरीर की सभी प्रक्रियाएं बेहतर ढंग से काम करती हैं.

एक्सरसाइज भी होती है मददगार

इसके साथ ही हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधि भी फायदेमंद होती है. रोजाना टहलना या हल्का व्यायाम ब्लड सर्कुलेशन बेहतर करता है, तनाव कम करता है और मूड को भी ठीक रखता है. पोस्टनेटल योग और हल्की स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज शरीर की लचीलापन वापस लाने में मदद करती हैं, जिससे हार्मोनल संतुलन सुधरता है और पीरियड्स धीरे-धीरे सामान्य होने लगते हैं.

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