क्या एक-दूसरे को किस करने से कम हो जाता है स्ट्रेस, जानें कैसे काम करता है यह?

क्या एक-दूसरे को किस करने से कम हो जाता है स्ट्रेस, जानें कैसे काम करता है यह?


फरवरी का महीना आते ही प्यार का मौसम भी शुरू हो जाता है. कपल्स पूरे हफ्ते को बड़े उत्साह के साथ सेलिब्रेट करते हैं, जिसे हम वैलेंटाइन वीक के नाम से जानते हैं. इस हफ्ते का हर दिन अपने आप में खास होता है, लेकिन 13 फरवरी को मनाया जाने वाला Kiss Day सबसे ज्यादा रोमांटिक माना जाता है.  इस दिन कपल्स एक-दूसरे को किस करके अपने प्यार का इजहार करते हैं और रिश्ते को और भी गहरा बनाते हैं.

अक्सर लोग किस को सिर्फ प्यार जताने का तरीका मानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि किस करना स्ट्रेस से लेकर हमारे दिल, दिमाग और शरीर को भी कई तरह के फायदे देता है.  यह बात सुनने में थोड़ी अलग लग सकती है, लेकिन कई रिसर्च में पाया गया है कि एक सच्चा और प्यार भरा किस तनाव कम करने से लेकर दिल की सेहत सुधारने तक में मददगार हो सकता है. तो आइए जानते हैं कि क्या एक-दूसरे को किस करने से स्ट्रेस कम हो जाता है और यह कैसे काम करता है?

क्या सच में किस करने से स्ट्रेस कम होता है?

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी तरह के तनाव से जूझ रहा है. काम का दबाव, जिम्मेदारियां और निजी जीवन की परेशानियां दिमाग पर असर डालती हैं. ऐसे में एक प्यारा सा किस भी तनाव कम करने में मदद कर सकता है. जब हम अपने पार्टनर को किस करते हैं, तो हमारे दिमाग में कुछ खास हार्मोन रिलीज होते हैं.  जैसे ऑक्सीटोसिन, इसे लव हार्मोन भी कहा जाता है. यह अपनापन और जुड़ाव बढ़ाता है. दूसरा डोपामाइन, यह खुशी और उत्साह का एहसास कराता है औप तीसरा सेरोटोनिन, यह मूड को बेहतर बनाता है. इन हार्मोन्स के बढ़ने से शरीर में मौजूद स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर कम होने लगता है यानी अगर आपका दिन थकान और तनाव से भरा रहा हो, तो एक सच्चा और प्यार भरा किस आपके मन को शांत कर सकता है

यह कैसे काम करता है?

कुछ स्टडीज के अनुसार, किस करने से ब्लड वेसल्स थोड़ी फैल जाती हैं, जिससे ब्लड फ्लो बेहतर होता है. इससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने में मदद मिलती है, उनमें दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा थोड़ा कम देखा गया है. साथ ही सिरदर्द में भी राहत मिल सकती है. किस करने से दिमाग को सिग्नल मिलते हैं. दिमाग में सिग्नल को पाकर रिवॉर्ड सिस्टम को सक्रिय कर देता है, जिससे हमें अच्छा महसूस होता है. लव और हैप्पी हार्मोन रिलीज होते हैं, साथ ही जब खुशी वाले हार्मोन बढ़ते हैं, तो शरीर में मौजूद तनाव वाला हार्मोन कोर्टिसोल कम होने लगता है. कोर्टिसोल ज्यादा होने पर तनाव, चिड़चिड़ापन और थकान महसूस होती है. लेकिन किस के दौरान इसका स्तर घटता है, जिससे मन हल्का और शांत हो जाता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या दवाओं से ज्यादा असरदार होंगे न्यूट्रास्युटिकल्स? प्रिवेंटिव हेल्थकेयर का नया ट्रेंड समझें

क्या दवाओं से ज्यादा असरदार होंगे न्यूट्रास्युटिकल्स? प्रिवेंटिव हेल्थकेयर का नया ट्रेंड समझें


आजकल की लाइफस्टाइल में सेहत के प्रति भी लोगों का नजरिया बदल रहा है. अब लोग बीमार होने के बाद अस्पताल जाने की जगह बीमार न पड़ने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इसी सोच ने भारत में न्यूट्रास्युटिकल्स (Nutraceuticals) के बाजार को जन्म दिया है, जो काफी तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या न्यूट्रास्युटिकल्स दवाओं से ज्यादा कारगर साबित होंगे? आइए आपको प्रिवेंटिव हेल्थकेयर के नए ट्रेंड से रूबरू कराते हैं. 

क्या होते हैं न्यूट्रास्युटिकल प्रॉडक्ट्स?

न्यूट्रास्युटिकल ऐसे प्रॉडक्ट्स होते हैं, जो डाइट के साथ-साथ औषधीय लाभ भी देते हैं, जैसे विटामिन सप्लीमेंट्स, प्रोबायोटिक्स और हर्बल प्रॉडक्ट्स आदि. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का न्यूट्रास्युटिकल उद्योग विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा. मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में आयोजित वीटाफूड्स इंडिया 2026 के चौथे एडिशन में एफएसएसएआई (FSSAI) की रीजनल डायरेक्टर प्रीति चौधरी ने बताया कि भविष्य में इस क्षेत्र की क्षमता फार्मास्यूटिकल्स (दवा उद्योग) से कम से कम दस गुना ज्याद हो सकती है. इसका कारण यह है कि दवाएं आमतौर पर बीमारी के बाद ली जाती हैं, जबकि न्यूट्रास्युटिकल का इस्तेमाल रोजाना सेहत को बनाए रखने और बीमारियों को रोकने के लिए किया जाता है.

बदलती आबादी और बढ़ती मांग

इंफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के एमडी योगेश मुद्रास के मुताबिक, भारत में इस ट्रेंड के पीछे दो बड़े कारण हैं. इनमें पहला बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और दूसरा युवाओं का बदलता लाइफस्टाइल है. अनुमान है कि 2050 तक भारत में बुजुर्गों की आबादी 347 मिलियन तक पहुंच जाएगी, जिन्हें एनर्जी और बेहतर पाचन के लिए खास पोषण की जरूरत होगी. वहीं, 25 से 45 वर्ष के युवा अब सप्लीमेंट्स को अपने डेली रूटीन का हिस्सा बना रहे हैं. मध्यम वर्ग के लगभग 35% लोग अब अपनी डेली वेलनेस (रोजमर्रा की सेहत) पर खर्च करने को तैयार हैं.

आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का मेल

हेल्थ फूड्स एंड डायटरी सप्लीमेंट्स असोसिएशन के महासचिव कौशिक देसाई का कहना है कि भारत के लिए सबसे बड़ी ताकत उसकी जैव विविधता और आयुर्वेद की विरासत है. विशेषज्ञों का कहना है कि आयुर्वेदिक उत्पादों का बाजार 18.4% की तेज गति से बढ़ रहा है और 2030 तक यह 22.37 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है. आजकल के उपभोक्ता अब केवल दवा नहीं चाहते, बल्कि वे क्लीन-लेबल (बिना मिलावट वाले शुद्ध प्रॉडक्ट्स) और पौधों पर आधारित (plant-based) ऑप्शंस तलाश रहे हैं. अब पोषण केवल कड़वी गोलियों तक सीमित नहीं है. बाजार में अब स्वादिष्ट गमीज (Gummies), खास पेय पदार्थ और व्यक्तिगत पोषण (personalized nutrition) जैसे नए ऑप्शंस युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रहे हैं.

सरकार का सहयोग और भविष्य की राह

भारत सरकार भी इस क्षेत्र की गंभीरता को समझते हुए बड़ा निवेश कर रही है. बायोफार्मास्युटिकल उद्योग के लिए 10,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिन्हें अगले पांच वर्षों (2026-2031) में खर्च किया जाएगा. इससे कंपनियों को नए शोध और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी. भारत अब न केवल घरेलू मांग पूरी कर रहा है, बल्कि यूके, यूएसए और यूएई जैसे बड़े देशों के साथ व्यापार समझौतों के जरिए वैश्विक स्तर पर भी अपनी धाक जमा रहा है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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एम्स से राजीव गांधी अस्पताल तक, ये हैं दिल्ली के सबसे भरोसेमंद कैंसर अस्पताल; जानें सुविधाएं

एम्स से राजीव गांधी अस्पताल तक, ये हैं दिल्ली के सबसे भरोसेमंद कैंसर अस्पताल; जानें सुविधाएं


Top Cancer Hospitals in Delhi: भारत में कैंसर आज एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च (NICPR) के अनुसार, वर्ष 2022 में देश में लगभग 14,61,427 नए कैंसर मामलों का अनुमान लगाया गया था. TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कैंसर तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है. हर साल करीब 15 लाख नए मामले सामने आ रहे हैं और आने वाले दशकों में यह संख्या और बढ़ने की आशंका है. कैंसर मामलों के लिहाज से भारत अब चीन और अमेरिका के बाद दुनिया में तीसरे स्थान पर है. चलिए आपको दिल्ली के कुछ फेमस कैंसर के अस्पतालों के बारे में बताते हैं. 

AIIMS

AIIMS देश का सबसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल माना जाता है. इसका ऑन्कोलॉजी विभाग अत्याधुनिक रेडियोथेरेपी और रेडियो डायग्नोस्टिक मशीनों से लैस है. यहां स्टीरियोटैक्टिक रेडियोथेरेपी, आधुनिक लीनियर एक्सेलेरेटर और ब्रैकीथेरेपी जैसी एडवांस तकनीकें उपलब्ध हैं. भारत में पहली बार यहां वैक्यूम-असिस्टेड एडवांस्ड मैमोग्राफी यूनिट की शुरुआत की गई, जो स्टीरियोटैक्टिक ब्रेस्ट बायोप्सी में मददगार है. इसके अलावा, अस्पताल में हीमेटोपोएटिक स्टेम सेल बोन मैरो ट्रांसप्लांट कार्यक्रम भी सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है. शुरुआती चरण में कैंसर की पहचान के लिए यहां प्रिवेंटिव ऑन्कोलॉजी और स्क्रीनिंग प्रोग्राम भी चलाया जाता है.

BLK सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल

BLK सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल दिल्ली के प्रमुख निजी कैंसर अस्पतालों में गिना जाता है. यहां सर्जिकल, मेडिकल और रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट की अनुभवी टीम मिलकर मरीजों को व्यक्तिगत देखभाल प्रदान करती है. अस्पताल में आधुनिक तकनीक और विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिससे कैंसर की पहचान और उपचार अधिक सटीक और प्रभावी हो पाता है. यहां मरीजों को कैंसर उपचार की पूरी सुविधा एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराई जाती है.

राजीव गांधी कैंसर अस्पताल

इंद्रप्रस्थ कैंसर सोसायटी एंड रिसर्च सेंटर द्वारा संचालित यह अस्पताल 1994 में स्थापित हुआ था. आज यह एशिया के प्रमुख कैंसर केंद्रों में शुमार है. NABH और NABL से मान्यता प्राप्त यह संस्थान मेडिकल, सर्जिकल और रेडिएशन ऑन्कोलॉजी की विशेष सेवाएं प्रदान करता है. यहां स्वतंत्र बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट है, जहां स्टेम सेल और अनरिलेटेड डोनर ट्रांसप्लांट जैसी उन्नत प्रक्रियाएं की जाती हैं.

धरमशिला नारायणा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में स्थित यह अस्पताल दो दशक से अधिक समय से कैंसर उपचार में अग्रणी रहा है. 2017 में नारायणा हेल्थ नेटवर्क से जुड़ने के बाद यहां मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग और अधिक मजबूत हुआ. अस्पताल में कीमोथेरेपी, हार्मोनल थेरेपी, बायोलॉजिकल और टार्गेटेड थेरेपी जैसी सेवाएं एक्सपर्ट डॉक्टरों की निगरानी में दी जाती हैं.

एक्शन कैंसर अस्पताल

पश्चिमी दिल्ली के केंद्र में स्थित एक्शन कैंसर अस्पताल आधुनिक सुविधाओं से लैस कैंसर केयर सेंटर है. यहां मरीजों को अत्याधुनिक तकनीक और अनुभवी एक्सपर्ट की देखरेख में उपचार उपलब्ध कराया जाता है.यहां अफगानिस्तान, नाइजीरिया, केन्या, तंजानिया, इराक और नेपाल जैसे तमाम देशों के लोग इलाज कराने के लिए आते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या होता है इनट्यूशन थॉट, हमारी जिंदगी को बदलने में ये कितने मददगार?

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What Is Intuition Thought: खेल, बिजनेस और कला की दुनिया में हाई लेवल पर काम करने वाले लोग अक्सर कहते हैं कि वे अपने इनट्यूशन थॉट्स यानी अंदर की आवाज पर भरोसा करते हैं. यही इनट्यूशन उन्हें बिना ज्यादा सोचे, सही मौके पर तुरंत फैसला लेने में मदद करती है. कई बार यह फैसला पलक झपकते ही लेना पड़ता है, वरना मौका हाथ से निकल सकता है.चलिए आपको बताते हैं कि कि आखिर यह होता क्या है और  हमारी जिंदगी को बदलने में ये कितने मददगार है.

कैसे काम करता है इनट्यूशन थॉट?

खेल जगत में इसका सबसे सटीक उदाहरण बेसबॉल खिलाड़ियों में देखने को मिलता है. मेजर लीग बेसबॉल में गेंद की रफ्तार 90 मील प्रति घंटे से ज्यादा होती है.बल्लेबाज के पास सिर्फ करीब 150 मिलीसेकेंड का समय होता है यह तय करने के लिए कि उसे शॉट खेलना है या नहीं. गेंद आख़िरी कुछ फीट में आंखों से लगभग ओझल हो जाती है और हिटिंग जोन में बहुत कम समय के लिए रहती है. ऐसे में दिमाग के पास सोचने का वक्त नहीं होता, वहां सिर्फ अनुभव और इनट्यूशन ही काम करती है. टॉप खिलाड़ियों के फैसले इसलिए हमें “नेचुरल” लगते हैं.

हर इंसान के पास मौजूद होती है क्षमता

हालांकि, 2016 में प्रकाशित एक स्टडी साफ कहती है कि इनट्यूशन कोई खास ताकत नहीं है जो सिर्फ रिकॉर्ड तोड़ने वाले एथलीट्स या सफल लोगों के पास होती है. यह क्षमता हर इंसान में मौजूद होती है और सही तरीके से इसे मजबूत किया जा सकता है.

न्यूरोसाइंस के अनुसार, इंसानी दिमाग दो तरह की सोच पर काम करता है,एनालिटिकल और इनट्यूटिव. हार्वर्ड इनोवेशन लैब से जुड़ी ब्रेन-टेक कंपनी BrainCo के प्रेसिडेंट मैक्स न्यूलॉन बताते हैं कि एनालिटिकल सोच तर्क, आंकड़ों और प्लानिंग पर आधारित होती है, जबकि इनट्यूटिव सोच भावनाओं, अनुभव और बड़ी तस्वीर को समझने में मदद करती है. उदाहरण के तौर पर, घर खरीदने का फैसला लेते समय इनट्यूटिव व्यक्ति यह देखता है कि उसे वह जगह कैसी महसूस हो रही है, जबकि एनालिटिकल सोच वाला व्यक्ति बजट, स्कूल और दूरी जैसे फैक्टर्स पर ध्यान देता है.

खुद पर भरोसा बनाने से आती है फैसला लेने की क्षमता

तेज और सही इनट्यूटिव फैसले लेने की क्षमता खुद पर भरोसा बनाने से आती है. Toronto Blue Jays की एप्लाइड परफॉर्मेंस रिसर्च डायरेक्टर डॉ. देहरा हैरिस के मुताबिक इनट्यूशन को विकसित करने के लिए दो बातें जरूरी हैं कि अपनी अंदर की आवाज को सुनना और फैसलों के नतीजों पर नियमित रूप से विचार करना. हैरिस बताती हैं कि हमारे भीतर आमतौर पर दो आवाजें होती हैं. एक डर और बेचैनी से जुड़ी होती है, जबकि दूसरी शांत और सच्ची. फर्क पहचानने का तरीका यह है कि कौन-सी आवाज आपको शांति देती है. इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि समय-समय पर अपने फैसलों की समीक्षा की जाए, क्योंकि इनट्यूशन हमारे अनुभव और सीख से ही बनती है.

अल्बर्ट आइंस्टीन भी कह चुके हैं कि इनट्यूशन पहले के बौद्धिक अनुभवों का नतीजा होती है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि नियमित अभ्यास, सांस पर ध्यान, क्रिएटिव एक्टिविटीज और तनाव में भी शांत रहने की आदत इनट्यूशन को और मजबूत बनाती है.

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अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड लोगों को बना रहा शुगर का मरीज, नेपाल में शुरू हुई रिसर्च बनेगी गेम-चेंजर

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भारत सहित दुनियाभर के तमाम देशों में डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के नेतृत्व में नेपाल में एक अहम  स्टडी शुरू होने जा रहा है, जिसका उद्देश्य यह जानना है कि क्या पारंपरिक खानपान की ओर लौटकर टाइप-2 डायबिटीज को रोका जा सकता है या यहां तक कि उसे उलटा भी जा सकता है. रिसर्चर का कहना है कि प्रोसेस्ड फूड कम करना और हल्का वजन घटाना दक्षिण एशिया के लिए कम लागत वाला प्रभावी समाधान साबित हो सकता है.

टाइप-2 डायबिटीज तेजी से बढ़ रही

दक्षिण एशिया और अन्य निम्न व मध्यम आय वाले देशों में टाइप-2 डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है. एक्सपर्ट अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या आधुनिक, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ इस बीमारी के फैलाव के पीछे बड़ी वजह हैं. इसी दिशा में ग्लासगो विश्वविद्यालय ने नेपाल के धुलीखेल अस्पताल के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय परियोजना शुरू की है, जिसका नाम CoDIAPREM रखा गया है.

4 साल में निकलेगा निष्कर्ष

यह चार वर्षीय परियोजना 2026 से 2030 तक चलेगी और इसे हॉवर्ड फाउंडेशन से 17.8 लाख पाउंड की फंडिंग मिली है. डायबिटीज और मानव न्यूट्रिशियन एक्सपर्ट प्रोफेसर माइकल लीन के नेतृत्व में यह स्टडी जांच करेगा कि क्या समुदाय के स्तर पर पारंपरिक आहार अपनाने से टाइप-2 डायबिटीज की रोकथाम संभव है और क्या पहले से बीमार लोग लंबे समय तक रिमिशन हासिल कर सकते हैं.

नेपाल में भी तेजी से बढ़े मामले

कुछ दशक पहले तक नेपाल में टाइप-2 डायबिटीज बहुत कम थी. हालांकि दक्षिण एशियाई आबादी में जेनेटिक जोखिम मौजूद है, लेकिन जैसे-जैसे प्रोसेस्ड और ऊर्जा-घने खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ा और लोगों का वजन बढ़ा, बीमारी के मामले भी तेजी से बढ़ने लगे. आज अनुमान है कि नेपाल में 40 वर्ष से अधिक उम्र के हर पांच में से एक व्यक्ति टाइप-2 डायबिटीज से प्रभावित है. लंबे समय तक दवाइयों और नियमित जांच का खर्च कई लोगों के लिए वहन करना मुश्किल है.

क्या होगा इसमें?

CoDIAPREM परियोजना यह जांचेगी कि पारंपरिक भोजन को फिर से अपनाने और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को कम करने से क्या लोग हल्का वजन घटा सकते हैं. वजन कम होना डायबिटीज की रोकथाम और रिमिशन में अहम भूमिका निभाता है. यह कार्यक्रम अस्पतालों पर आधारित नहीं होगा, बल्कि समुदाय स्तर पर स्थानीय स्वयंसेवकों की मदद से चलाया जाएगा, ताकि कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी इसे लागू किया जा सके. स्टडी में यह देखा जाएगा कि क्या पारंपरिक आहार नई डायबिटीज के मामलों को रोक सकता है, क्या मरीज बिना दवा के लंबे समय तक सामान्य ब्लड शुगर बनाए रख सकते हैं और क्या यह बदलाव कई वर्षों तक टिकाऊ रहता है. नेपाल में किए गए शुरुआती पायलट स्टडी ने कम लागत में उत्साहजनक परिणाम दिखाए हैं.

यह रिसर्च वैश्विक प्रमाणों पर आधारित है, जो अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, मोटापे और इंसुलिन रेजिस्टेंस के बीच संबंध दिखाते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार, शरीर में अतिरिक्त चर्बी लीवर और पैंक्रियास जैसे अंगों को नुकसान पहुंचाती है और ब्लड शुगर कंट्रोल बिगाड़ती है.

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सिरहाने मोबाइल रखकर सोने से क्या हो जाता है कैंसर, डॉक्टर से जानें कितनी सच है यह बात?

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Does Sleeping with Phone Cause Cancer in India: भारत में ज्यादातर लोग सोने से पहले मोबाइल स्क्रॉल करते हैं या फोन को सिरहाने रखकर ही सो जाते हैं. यह आदत आम हो चुकी है, लेकिन क्या यह सेहत पर असर डाल सकती है? लॉस एंजेलिस, कैलिफोर्निया के एनेस्थीसियोलॉजिस्ट डॉ. मायरो फिगुरा ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में इसी मुद्दे पर चेतावनी दी है. चलिए आपको बताते हैं कि क्या उन्होंने क्या कहा और क्या सच में इससे कैंसर का खतरा होता है. 

क्या सच में इससे कैंसर हो सकता है?

क्या सच में मोबाइल सेहत को प्रभावित कर सकता है? डॉ. फिगुरा का कहना है कि सोते समय फोन को सिर के पास रखना ठीक नहीं है. उनके मुताबिक, “अगर आप फोन को सिर के बिल्कुल पास रखकर सोते हैं, तो इस आदत को बदल देना चाहिए. फोन तब भी रेडिएशन छोड़ता है जब आप उसे इस्तेमाल नहीं कर रहे होते. यह नींद की गुणवत्ता बिगाड़ सकता है, सिरदर्द की वजह बन सकता है और लंबे समय में कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है.”

नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन

रेडिएशन को लेकर वे स्पष्ट करते हैं कि मोबाइल से निकलने वाला विकिरण “नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन” होता है. यह आयोनाइजिंग रेडिएशन जैसे सूरज की किरणें, मेडिकल इमेजिंग या रेडियोधर्मी सोर्स की तरह सीधे डीएनए को नुकसान नहीं पहुंचाता. लेकिन फिर भी यह रेडिएशन की श्रेणी में आता है. इसी कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे “इंसानों के लिए संभावित रूप से कार्सिनोजेनिक” श्रेणी में रखा है. उसी श्रेणी में जहां कॉफी और अचार जैसी चीजें भी आती हैं.

 

डॉ. फिगुरा यह भी बताते हैं कि जोखिम केवल रेडिएशन तक सीमित नहीं है. कई बार चार्जिंग के दौरान फोन ओवरहीट हो जाता है और आग लगने की घटनाएं भी सामने आई हैं. सोते समय फोन को बेहद पास रखना इसलिए भी सुरक्षित नहीं माना जाता. उनका सुझाव सीधा है कि फोन को बिस्तर से दूर रखें. बेहतर होगा कि उसे कमरे के दूसरी ओर रख दें. इससे न सिर्फ नींद बेहतर हो सकती है, बल्कि लंबे समय में सेहत पर पड़ने वाले संभावित जोखिम भी कम हो सकते हैं.

क्या कहते हैं बाकी एक्सपर्ट?

कोलकाता के अपोलो कैंसर सेंटर में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी की कंसल्टेंट डॉ. अरुंधति डे कहती हैं कि अब तक ऐसा कोई पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, जिससे यह साबित हो कि मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडियोफ्रीक्वेंसी तरंगें ब्रेन ट्यूमर या कैंसर का कारण बनती हैं. उनका साफ कहना है कि “अब तक यह सिद्ध नहीं हुआ है कि मोबाइल से निकलने वाली रेडियोफ्रीक्वेंसी वेव्स ब्रेन ट्यूमर या कैंसर पैदा करती हैं.” दुनिया भर में बड़े स्तर पर लंबे समय तक मोबाइल इस्तेमाल पर अध्ययन किए जा रहे हैं, लेकिन मौजूदा आंकड़े यह नहीं बताते कि सिर्फ सिर के पास फोन रखकर सोने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.

 डॉक्टरों के मुताबिक, सबसे बड़ा असर नींद पर पड़ता है. आज के स्मार्टफोन लगातार रोशनी, नोटिफिकेशन, अलर्ट, वाइब्रेशन और स्क्रीन की चमक छोड़ते रहते हैं. भले ही आप उन पर प्रतिक्रिया न दें, लेकिन दिमाग इन संकेतों को दर्ज करता रहता है. यही वजह है कि फोन पास रखने से नींद की क्वालिटी प्रभावित हो सकती है.

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