बदलते मौसम में जरा-सी लापरवाही पड़ रही भारी, डॉक्टर से जानें अपना ख्याल रखने का तरीका

बदलते मौसम में जरा-सी लापरवाही पड़ रही भारी, डॉक्टर से जानें अपना ख्याल रखने का तरीका



सर्दी का मौसम जैसे-जैसे दस्तक दे रहा है, वैसे-वैसे लोगों की सेहत पर इसका असर साफ दिखने लगा है. सुबह-शाम की ठंड और दिन में कभी-कभी निकलने वाली हल्की धूप का खेल शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर बना रहा है. इसकी वजह से वायरल बुखार, जुकाम, खांसी, गले में खराश और पूरे बदन में दर्द के मरीजों की तादाद अस्पतालों में तेजी से बढ़ रही है. खासकर बच्चे और बुजुर्ग इस मौसम में सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं, क्योंकि उनकी इम्यूनिटी पहले से ही कमजोर होती है.

अस्पतालों में तेजी से बढ़े मरीज

हालिया रिपोर्ट्स पर गौर करें तो नवंबर 2025 के पहले पखवाड़े में ही नॉर्थ इंडिया के बड़े अस्पतालों में वायरल इंफेक्शन के केस 30-40 फीसदी तक बढ़ गए हैं. दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों में ओपीडी में रोजाना सैकड़ों मरीज बुखार और खांसी की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, इस बार वायरल का रूप थोड़ा अलग है. पहले बुखार 2-3 दिन में उतर जाता था, अब वह ठीक होने के बाद भी सूखी खांसी, गले में जलन, कमजोरी और थकान जैसी दिक्कतें काफी वक्त तक परेशान कर रही हैं. कई मरीज तो हल्का बुखार ठीक होने के एक हफ्ते बाद अचानक खांसी के तेज दौरे पड़ने पर दोबारा अस्पताल आ रहे हैं.

क्यों बढ़ रही है दिक्कत?

डॉक्टरों की मानें तो इस बार इंफ्लुएंजा ए और बी वायरस के साथ-साथ रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस (आरएसवी) भी एक्टिव है. बच्चों में आरएसवी की वजह से ब्रॉन्कियोलाइटिस के केस बढ़े हैं, जबकि बुजुर्गों में निमोनिया का खतरा ज्यादा है. इंडियन मेडिकल असोसिएशन (आईएमए) की लेटेस्ट एडवायजरी में कहा गया है कि मौसम के बदलाव के साथ प्रदूषण का लेवल भी बढ़ रहा है, जो वायरल को ज्यादा खतरनाक बना रहा है. दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स 300 के पार पहुंच चुका है, जिससे सांस की तकलीफें दोगुनी हो रही हैं.

डॉक्टर ने बताए बचाव के तरीके

मेदांता हॉस्पिटल नोएडा की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अर्पिता कुलश्रेष्ठ के मुताबिक, लोगों को लगता है कि हल्का-सा बुखार है, खुद ही ठीक हो जाएगा. यही छोटी-सी लापरवाही बड़ी मुसीबत बन जाती है. वायरल में शरीर को पूरा आराम चाहिए. दवाइयां बीच में छोड़ना, रात भर जागना, बाहर का तला-भुना खाना और ठंड से बचाव न करना, ये सब दोबारा बीमार करने का न्योता देते हैं. इस बार कई मरीजों को कोविड जैसी पोस्ट-वायरल थकान हो रही है, जो हफ्तों तक चलती है. ऐसे में शुरू से ही सतर्क रहे.

इन बातों का रखें ध्यान

डॉ. कुलश्रेष्ठ के मुताबिक, अगर बुखार 101 डिग्री से ऊपर हो और खांसी के साथ बलगम में खून आए या सांस लेने में तकलीफ हो तो तुरंत डॉक्टर से मिलें. बच्चों में अगर तेज सांस चल रही हो या खाना-पीना छोड़ दिया हो तो इंतजार बिल्कुल न करें. इस मौसम में एंटीबायोटिक्स की जरूरत बहुत कम पड़ती है, क्योंकि ज्यादातर केस वायरल के होते हैं. गलत दवा लेने से बैक्टीरियल रेसिस्टेंस बढ़ता है, जो बाद में बड़ी बीमारी का कारण बन सकता है. बच्चों को स्कूल भेजने से पहले मास्क जरूर लगवाएं. घर में हैंड सैनिटाइजर रखें और बार-बार हाथ धुलवाएं. ठंडी हवा से बचाने के लिए गर्म कपड़े पहनाएं, लेकिन ज्यादा गर्मी भी न दें वरना पसीना आने पर फिर जुकाम हो जाएगा. 

इन नुस्खों को आजमाने से मिलेगा फायदा

गर्म पानी में हल्दी-नमक डालकर गरारा करें. अदरक वाली चाय पिएं. शहद के साथ तुलसी का काढ़ा लें, लेकिन ये सब दवाइयों की जगह नहीं ले सकते. अगर लक्षण 3-4 दिन से ज्यादा रहें तो सेल्फ मेडिकेशन बंद कर दें. विटामिन सी और डी की कमी भी इम्यूनिटी कम करती है, इसलिए संतरा, आंवला, दही और धूप जरूर लें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ठंड में कमरे में बैठे-बैठे हो सकती है विटामिन डी की कमी, डाइट में इन चीजों को करें शामिल

ठंड में कमरे में बैठे-बैठे हो सकती है विटामिन डी की कमी, डाइट में इन चीजों को करें शामिल



Vitamin D deficiency: ठंड का मौसम आ चुका है, चारों तरफ मौसम में ठंडापन का अहसास होने लगा है. लोग अपने घरों में दुबककर बैठ गए हैं. इस समय हमें हेल्थ रिलेटेड तमाम तरह की दिक्कत भी होती है. अधिकतर लोग, खासकर पहाड़ी इलाकों या स्मॉग से ढके उत्तर भारत में रहने वाले लोगों को लगता है कि विटामिन D की कमी सिर्फ सर्दियों में इसलिए बढ़ती है क्योंकि धूप कम मिलती है. लेकिन भारत जैसा गर्म और धूप वाला देश पूरी तरह ऐसा नहीं है. केरल, पश्चिम बंगाल, बिहार जैसे कई राज्यों में सर्दियों में भी अच्छी-खासी धूप रहती है. फिर भी लोग अक्सर पूछते हैं कि “धूप तो है, फिर विटामिन D कम क्यों हो रहा है?”.

असल वजह मौसम नहीं, बल्कि हमारी लाइफस्टाइल है. घंटों ऑफिस में बंद रहना, घर से बाहर कम निकलना, धूप में न बैठना, और खानपान में विटामिन D की कमी. ये सब मिलकर शरीर में इसके स्तर को गिरा देते हैं. कम लोग जानते हैं कि विटामिन D का गिरा हुआ लेवल पर भी असर डालता है. मूड गिरना, थकान, चिड़चिड़ापन ये सब कई बार इसी कमी का नतीजा होता है. चलिए आपको बताते हैं कि अगर आपको विटामिन D की कमी हो गई है, तो आपको अपनी डाइट में क्या शामिल करना चाहिए.

डाइट में क्या कर सकते हैं शामिल?

सर्दियों में जब शरीर का सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्सा ही खुला रहता है, दोपहर में करीब दो घंटे की धूप चाहिए होती है ताकि पर्याप्त विटामिन D बन सके. इसलिए सर्दी के मौसम में इसकी कमी और ज्यादा देखने को मिलती है. हार्वर्ड की एक स्टडी के अनुसार, नेचुरल रूप से विटामिन D पाने के लिए मछली और सी-फूड मददगार हैं, लेकिन 400 IU पाने के लिए लगभग 5 औंस सैल्मन, 7 औंस हैलिबट, 30 औंस कॉड या दो बड़े टिन टूना मछली खाने पड़ेंगे जो संभव नहीं है.

क्या सप्लिमेंट्स करते हैं मदद?

विटामिन D के सप्लिमेंट्स शरीर में इस कमी को आसानी से पूरा कर सकते हैं, बिना घंटों धूप में खड़े हुए या बड़ी मात्रा में सी-फूड खाएं. आजकल विटामिन D3 चोलकैल्सीफेरॉल ऐसे ओरल सॉल्यूशन में उपलब्ध है, जिन्हें निगलना आसान है और नैनो टेक्नोलॉजी की मदद से ये शरीर में जल्दी अब्जॉर्ब भी होते हैं. ये शुगर-फ्री भी होते हैं, इसलिए डायबिटीज वाले लोग भी इन्हें सुरक्षित रूप से ले सकते हैं. ये सप्लिमेंट्स क्लिनिकली टेस्टेड होते हैं और शरीर को सही मात्रा में विटामिन D देते हैं. खासकर उन लोगों के लिए जो धूप या डाइट से पर्याप्त मात्रा नहीं ले पाते.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सूजे रहते हैं आपके पैर तो हो जाएं सावधान, कभी भी फेल हो सकते हैं शरीर के ये तीन अंग

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Swollen Feet Causes: अगर आपको बार-बार पैर और पंजों में सूजन की समस्या आ रही है, तो एक बार ध्यान रखिए कि पैरों और पंजों में बार-बार सूजन आना सिर्फ एक साधारण तकलीफ नहीं है. यह कई छुपी हुई बीमारियों का संकेत हो सकता है. क्रॉनिक वेन इंसफिशिएंसी और डीप वेन थ्रॉम्बोसिस जैसे कारणों से भी सूजन बन सकती है. इसके अलावा दिल, लिवर और किडनी से जुड़ी दिक्कतें भी पैरों में सूजन पैदा कर सकती हैं. लिम्फेडेमा या सेलुलाइटिस जैसे संक्रमण भी टांगों में सूजन का कारण होते हैं. इसलिए ऐसी सूजन को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. समय रहते डॉक्टर को दिखाना जरूरी है. चलिए आपको बताते हैं कि इससे क्या-क्या दिक्कत हो सकती है.

पैरों में लगातार सूजन यह संकेत क्या कहते हैं?

अगर आपके पैरों, टखनों या पंजों में बार-बार सूजन आ रही है, तो यह शरीर की ओर से एक साफ संदेश है कि कोई अंदरूनी समस्या बढ़ रही है. बहुत लोग इसे उम्र बढ़ने या ज्यादा चलने-फिरने का नतीजा मान लेते हैं, जबकि असल वजह कहीं ज्यादा गंभीर भी हो सकती है, जैसे दिल की बीमारी, लिवर या किडनी से जुड़ी दिक्कतें.

एक-एक कारण समझते हैं:

क्रॉनिक वेन इंसफिशिएंसी या वैरिकोज वेन्स

हम सीधा खड़े रहते हैं, इसलिए पैरों की नसों पर शरीर के खून का वजन सबसे ज्यादा पड़ता है. नसों में मौजूद वाल्व खून को ऊपर दिल की तरफ वापस भेजने का काम करते हैं.
लेकिन जब ये वाल्व कमजोर पड़ने लगते हैं, तो खून नीचे ही इकट्ठा होने लगता है और सूजन, वैरिकोज वेन्स, दर्द और कभी-कभी ऐंठन की समस्या शुरू हो जाती है.

हार्ट से जुडी समस्याएं

दिल शरीर के हर हिस्से से सीधे जुड़ा है. टांगों का खून वहीं से होकर वापस दिल की ओर आता है. अगर दिल ठीक से काम नहीं कर रहा, तो खून नीचे पैरों में जमा होने लगता है और सुजन व दर्द होने लगता है. इसके साथ कुछ और लक्षण भी दिख सकते हैं:

  • सीने में दर्द
  • सांस फूलना
  • हार्टबीट का तेज होना

ये संकेत दिल की बीमारी की ओर इशारा कर सकते हैं.

 डीप वेन थ्रॉम्बोसिस

जब पैर की गहरी नस में खून का थक्का जम जाता है, तो उसे DVT कहते हैं. यह बहुत खतरनाक स्थिति है क्योंकि, इसके लक्षण कुछ इस तरह दिखाई देते हैं-

  • नस में सूजन
  • दर्द और कोमलता
  • लाल या गर्म त्वचा
  • पैर भारी लगना

 अगर थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह पल्मनरी एंबोलिज्म जैसी जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है. इसलिए ऐसी सूजन पर तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरूरी है.

लिवर या किडनी की बीमारी

लिवर की समस्या में पेट और पैरों में पानी भरने लगता है. इसके साथ हाथों में लालपन, त्वचा का पीला होना या फीके रंग का मल जैसे संकेत भी दिख सकते हैं. किडनी की खराबी में पैरों की सूजन के साथ थकान, बार-बार पेशाब आना और ध्यान लगाने में दिक्कत देखने को मिल सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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जिम की जरूरत नहीं, घर पर करें ये उपाय और बैक फैट को कहें अलविदा

जिम की जरूरत नहीं, घर पर करें ये उपाय और बैक फैट को कहें अलविदा



जमी चर्बी या बैक फैट अक्सर सबसे ज्यादा परेशान करने वाली होती है. यह सिर्फ दिखने में समस्या नहीं है, बल्कि आपकी सेहत पर भी असर डालती है. साथ ही यह आपके कॉन्फिडेंस को भी प्रभावित कर सकती है. बहुत लोग कोशिश करते हैं कि अपनी पीठ की चर्बी कम करें, लेकिन सही तरीका न अपनाने की वजह से सफलता नहीं मिलती है. अक्सर लोग सोचते हैं कि पीठ की चर्बी सिर्फ खराब डाइट की वजह से ही होती है, लेकिन असल में इसके पीछे एक और बड़ा कारण लंबे समय तक एक ही जगह पर बैठना और एक्सरसाइज की कमी है.

अगर आप दिनभर बैठकर काम करते हैं और थोड़ी भी फिजिकल एक्टिविटी नहीं करते हैं, तो यह बैक फैट बहुत जल्दी और आसानी से जम जाता है. लेकिन अच्छी बात यह है कि जिम जाने की जरूरत नहीं है. आप घर पर ही कुछ आसान उपाय अपनाकर अपनी पीठ की जिद्दी चर्बी को कम कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि घर पर बैक फैट को कम करने के लिए कौन से उपाय करें. 

1. कार्डियो वर्कआउट को बनाएं लाइफस्टाइल का हिस्सा – पीठ की चर्बी को कम करने के लिए सबसे प्रभावी तरीका कार्डियो वर्कआउट है. घर पर भी आप इसे आसानी से कर सकते हैं. रोजाना तेज चलना, दौड़ना या जगह पर ही जॉगिंग करना आपके शरीर की कैलोरी बर्न करने में मदद करता है.अगर आपके पास साइकिल है तो साइकिलिंग भी एक शानदार ऑप्शन है. कार्डियो एक्सरसाइज से न सिर्फ बैक फैट कम होती है, बल्कि आपकी हार्ट हेल्थ भी बेहतर होती है. 

2. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी जरूरी है – सिर्फ कार्डियो ही काफी नहीं है. पीठ की चर्बी को घटाने और मसल्स टोन करने के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी करनी चाहिए. घर पर आप पुशअप्स, प्लैंक, डंबल या पानी की बोतल से वर्कआउट कर सकते हैं. ये एक्सरसाइज आपके पीठ की मसल्स को मजबूत करती हैं और चर्बी कम करने में मदद करती हैं. शुरुआत में हल्के वर्कआउट्स से शुरू करें और धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ाएं. 

3. योगा भी है फायदेमंद – अगर आप जिम या भारी एक्सरसाइज नहीं कर सकते, तो योगा भी बैक फैट कम करने में बहुत मददगार है. खासकर भुजंगासन और ताड़ासन जैसी आसान योगासन आपके पीठ की मांसपेशियों को मजबूत करती हैं और फैट कम करती हैं. इन योगासनों को रोजाना 15 से 20 मिनट करना काफी फायदेमंद होता है. 

4. डाइट का ख्याल रखना बहुत जरूरी – आप जितना भी वर्कआउट करें, अगर डाइट सही नहीं है तो परिणाम धीमे मिलेंगे, बैक फैट कम करने के लिए तली-भुनी चीजों, ज्यादा मीठे और जंक फूड से परहेज करें. इसके बजाय अपनी डाइट में प्रोटीन और फाइबर को शामिल करें. प्रोटीन मसल्स को मजबूत करता है और फाइबर लंबे समय तक पेट भरा रखता है, जिससे बिना जरूरत वाली कैलोरी कम होती है.

5. रोजाना एक्टिव रहें – पीठ की चर्बी को कम करने का सबसे बड़ा काम रोजाना एक्टिव रहना है. छोटे-छोटे बदलाव जैसे सीढ़ियां चढ़ना, थोड़ी देर टहलना या घर के काम करते समय शरीर को लगातार मूव करना भी मदद करता है. 

इसे भी पढ़ें:  आपके शरीर पर क्या पड़ता है असर? परेशानी बढ़ने से पहले जान लें समाधान

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मुंह में बार-बार हो रहे हैं छाले तो हल्के में लेने की न करें गलती, हो सकती है ये बड़ी बीमारी

मुंह में बार-बार हो रहे हैं छाले तो हल्के में लेने की न करें गलती, हो सकती है ये बड़ी बीमारी



Symptoms of Mouth Ulcers: मुंह में छाला तब बनता है जब अंदर की नाजुक परत यानम्यूकस मेम्ब्रेन किसी वजह से घिस जाती है या कट जाती है. इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे आम वजह है चोट जैसे अचानक गाल के अंदर वाली सतह को काट लेना. इसके अलावा दवाइयों के असर, कुछ तरह के चकत्ते, वायरल बैक्टीरियल, फंगल इंफेक्शन, केमिकल्स और कुछ मेडिकल कंडीशंस भी छालों की वजह बन सकते हैं. अगर कोई छाला लंबे समय तक ठीक न हो, तो यह मुंह के कैंसर का संकेत भी हो सकता है. क्योंकि अधिकतर मामलों में छाले हानिरहित होते हैं और बिना किसी इलाज के 10 से 14 दिन में खुद ठीक हो जाते हैं.

बार-बार होने वाले छाले

Betterhealth के अनुसार, कुछ लोग बार-बार छालों की समस्या से जूझते हैं. इन्हें एप्थस अल्सर कहा जाता है और यह लगभग 20 प्रतिशत लोगों में देखे जाते हैं. ज्यादातर व्यक्तियों में इसका कोई साफ कारण नहीं मिलता, लेकिन कुछ मामलों में विटामिन B, फोलेट या आयरन की कमी से भी यह समस्या हो सकती है. ये छाले होंठों के अंदर, गाल की स्किन, जीभ के किनारे, मुंह के नीचे वाले हिस्से, ऊपर के पीछे वाले हिस्से और टॉन्सिल के पास की नरम परत पर बनते हैं. ये आमतौर पर 5 मिमी से बड़े नहीं होते. कई बार एक से ज्यादा छाले एक साथ भी बन जाते हैं या आपस में मिल जाते हैं. ये 10 से 14 दिन में ठीक हो जाते हैं, लेकिन बार-बार दोहराने की आदत रहती है.

जो छाले ठीक नहीं होते

अगर कोई छाला दो हफ्ते से अधिक समय तक ठीक न हो या बार-बार बनने लगे, तो दंत चिकित्सक या डॉक्टर को दिखाना जरूरी है. खासकर अगर आप तंबाकू का सेवन करते हैं या शराब पीते हैं, तो ऐसे न भरने वाले छालों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें, क्योंकि दोनों चीजें मुंह के कैंसर का जोखिम बढ़ाती हैं.

छालों के लक्षण

कारण के हिसाब से लक्षण बदल सकते हैं, लेकिन आमतौर पर ये देखने को मिलते हैं

  • मुंह की त्वचा पर एक या अधिक दर्दनाक घाव
  • घावों के आसपास लालपन और सूजन
  • खाना चबाने या ब्रश करते समय दर्द
  • नमकीन, तीखा या खट्टा खाना खाने पर जलन
  • दांतों की गलत शेप, ब्रेसेस या डेंचर से रगड़कर छाला बढ़ना
  • कुछ रेयर मामलों में छाला बिल्कुल नहीं दर्द करता, ऐसा अक्सर तब होता है जब वजह गंभीर हो, जैसे मुंह का कैंसर.

छाले क्यों बनते हैं? कारण क्या हैं?

मुंह के छाले इन वजहों से हो सकते हैं, जैसे कि- 

  • गलती से गाल काट लेना
  • ब्रश करते समय चोट लगना
  • गलत आकार के दांतों से लगातार रगड़
  • डेंचर या ब्रेसेस का घिसाव
  • गरम खाना खाते समय जलना
  • तेज केमिकल वाले माउथवॉश का असर
  • एप्थस अल्सर
  • वायरल इंफेक्शन, जैसे कोल्ड सोर वायरस
  • कुछ दवाइयों के साइड इफेक्ट

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6 घंटे से कम सोते हैं तो आपके शरीर पर क्या पड़ता है असर? परेशानी बढ़ने से पहले जान लें समाधान

6 घंटे से कम सोते हैं तो आपके शरीर पर क्या पड़ता है असर? परेशानी बढ़ने से पहले जान लें समाधान



Lack of Sleep Effects: आज की तेज रफ्तार वाली जिंदगी में, जहां थकान को हम उपलब्धि समझने लगे हैं और आराम को एक इनाम की तरह देखते हैं, बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि 5 से 6 घंटे की नींद में भी काम चल जाता है. रात देर तक काम करना, सुबह कॉफी का सहारा लेना और दिनभर सुस्ती के साथ जैसे-तैसे खुद को खींचते रहना यह सब आम हो गया है. लेकिन यह आदत धीरे-धीरे शरीर पर भारी पड़ती है. नए शोध बता रहे हैं कि 6 घंटे से कम नींद लेना शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को बिगाड़ सकता है चाहे वो दिमाग हो, दिल हो, मेटाबॉलिज्म या फिर इम्युनिटी. चलिए आपको बताते हैं कि इससे शरीर पर क्या असर होता है.

नींद की कमी आपके शरीर के साथ क्या करती है?

ज्यादातर स्टडी में वयस्कों के लिए रोजाना कम से कम 7 घंटे की नींद जरूरी मानी गई है. लेकिन जब नींद लगातार छह घंटे से नीचे चली जाती है, तो असर सिर्फ थकान तक सीमित नहीं रहता, शरीर की कई सिस्टम गड़बड़ा जाती हैं.

मेटाबॉलिज्म, भूख और वजन पर असर

कम नींद से सबसे पहला झटका मेटाबॉलिज्म और भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन्स पर पड़ता है. कई स्टडीज में पाया गया है कि 5 से 6 घंटे नींद लेने वाले लोगों में प्री-डायबिटीज या टाइप-2 डायबिटीज का खतरा दोगुना हो जाता है. इसके साथ ही ऐसे लोगों का BMI बढ़ता है और मोटापा जल्दी घेरता है. इसके कुछ कारण भी होते हैं, जैसे कि लेप्टिन (पेट भरने का संकेत देने वाला हार्मोन) कम हो जाता है. घ्रेलिन (भूख बढ़ाने वाला हार्मोन) बढ़ जाता है, शरीर लगातार स्ट्रेस मोड में रहता है. इससे खाने की इच्छा बढ़ती है और वजन तेजी से बढ़ सकता है.

दिमाग, सोचने की क्षमता और मूड पर असर

कम नींद सिर्फ शरीर पर नहीं, बल्कि दिमाग पर भी बड़ा प्रभाव डालती है. दिमाग में टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं. याददाश्त, ध्यान और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है, इसके चलते रिस्पॉन्स देने की गति कम हो जाती है. लंबे समय में इससे डिमेंशिया जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है. मूड पर इसका असर तुरंत दिखता है. चिड़चिड़ापन, घबराहट, चिंता और डिप्रेशन जैसे लक्षण अक्सर नींद की कमी वाले लोगों में पाए जाते हैं.

इम्युनिटी की कमी

नींद शरीर की मरम्मत, इंफेक्शन से लड़ने और सूजन को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाती है. छह घंटे से कम नींद लेने पर शरीर के सैकड़ों जीन प्रभावित होते दिखे हैं. खासकर वे जो इम्यून सिस्टम और स्ट्रेस कंट्रोल से जुड़े होते हैं. इसका नतीजा यह होता है कि शरीर धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है, इंफेक्शन जल्दी पकड़ते हैं, रिकवरी धीमी हो जाती है. हार्मोन, ग्रोथ और टिश्यू रिपेयर पर असर पड़ता है. नींद के दौरान शरीर ग्रोथ हॉर्मोन रिलीज करता है, टिश्यू रिपेयर करता है और मेटाबॉलिज्म को संतुलित करता है.

मौत का खतरा

कई स्टडी में यह पाया गया है कि बहुत कम या बहुत ज्यादा नींद, दोनों ही स्थितियां समय से पहले मृत्यु का जोखिम बढ़ाती हैं. पांच घंटे या उससे कम सोने वालों में यह खतरा लगभग 15 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

इससे बचने के उपाय

नींद कोई विकल्प नहीं है. यह शरीर की बेसिक जरूरत है. अगर आप लगातार छह घंटे से कम सो रहे हैं, तो आपको लगता होगा कि आप मैनेज कर रहे हैं, लेकिन शरीर इसकी कीमत चुका रहा होता है. बेहतर नींद के लिए कुछ आसान कदम यह हैं कि रोज एक ही समय पर सोने और उठने की आदत डालें, सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप और तेज रोशनी से दूरी रखें और कमरा ठंडा और अंधेरा रखना चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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