गेम की लत ने ली 3 सगी बहनों की जान, जानें बच्चों के दिमाग को कैसे काबू करते हैं ये गेम्स?

गेम की लत ने ली 3 सगी बहनों की जान, जानें बच्चों के दिमाग को कैसे काबू करते हैं ये गेम्स?


Psychological Impact Of Online Games: गाजियाबाद में एक हाईराइज सोसायटी की नौवीं मंजिल से कूदने के बाद तीन नाबालिग बहनों की मौत हो गई. मरने वालों में 16 साल की एक किशोरी और उसकी दो सौतेली बहनें, 14 और 12 साल की, शामिल हैं. पुलिस के मुताबिक, शुरुआती जांच में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं, जिनमें एक ऑनलाइन गेम के प्रति उनका कथित अत्यधिक लगाव भी शामिल है. इस घटना ने न सिर्फ पुलिस, बल्कि माता-पिता और मानसिक स्वास्थ्य एक्सपर्ट को भी गंभीर चिंता में डाल दिया है.

पुलिस ने इस मामले को लेकर क्या कहा?

पुलिस के अनुसार, तीनों बच्चियां अपने पिता के साथ रहती थीं, जो पेशे से फॉरेक्स ट्रेडर हैं. सबसे बड़ी बेटी उनकी पहली पत्नी से थी, जबकि दो छोटी बेटियां दूसरी पत्नी से जन्मी थीं. घटना के समय तीनों अपनी-अपनी मां के साथ ही मौजूद थीं. सहायक पुलिस आयुक्त अतुल कुमार सिंह के हवाले से बताया गया कि बुधवार रात करीब 12:30 बजे तीनों बच्चियां पूजा वाले कमरे में गईं और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. इसके बाद उन्होंने एक कुर्सी का इस्तेमाल करते हुए खिड़की से एक-एक कर छलांग लगा दी. तीनों की मौके पर ही मौत हो गई.

गेम से अत्यधिक प्रभावित थीं बच्चियां

जांच के दौरान पुलिस को कुछ असामान्य संकेत भी मिले. अधिकारियों के अनुसार, बच्चियां एक कोरियाई टास्क-बेस्ड ऑनलाइन गेम से काफी प्रभावित थीं. पुलिस का कहना है कि वे खुद को भारतीय नहीं, बल्कि कोरियाई मानने लगी थीं और गेम के प्रभाव में खुद को “कोरियन प्रिंसेस” के रूप में प्रस्तुत करती थीं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिता ने देर रात मोबाइल पर ऑनलाइन गेम खेलने से मना किया था, जिससे नाराज़ होकर तीनों बहनों ने यह खौफनाक कदम उठा लिया.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इस मामले को लेकर एबीपी न्यूज ने अलग-अलग विशेषज्ञों से बात की. मंडलीय अस्पताल के वरिष्ठ साइकैट्रिस्ट डॉ. राकेश पासवान का कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग और मोबाइल एडिक्शन एक बेहद खतरनाक ट्रेंड बनता जा रहा है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 में मंडलीय अस्पताल में ऑनलाइन और मोबाइल एडिक्शन को लेकर एक विशेष कार्यक्रम शुरू किया गया था, जिसके तहत अब तक कई बच्चों को आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठाने से रोका जा चुका है.

पैसों के बजाय सैडिस्टिक प्लेजर की सोच

वहीं, साइबर एक्सपर्ट साक्षर दुग्गल का कहना है कि इस तरह के कुछ गेम्स बच्चों को आत्मघाती व्यवहार के लिए उकसाने की मानसिकता से बनाए जाते हैं. ऐसे गेम बनाने वाले लोग पैसों के बजाय सैडिस्टिक प्लेजर की सोच रखते हैं और इनका माइंडसेट आपराधिक होता है.

उन्होंने याद दिलाया कि ब्लू व्हेल गेम सामने आने के बाद दुनिया भर में बड़ा बवाल हुआ था और कई सरकारों ने उस पर प्रतिबंध लगाए थे. हालांकि, इंटरनेट पर किसी चीज पर आज बैन लगता है तो वह कल किसी और नाम से सामने आ जाती है. टेलीग्राम और कई वेबसाइट्स आज भी ऐसे अवैध और खतरनाक गेम्स को डाउनलोड कराने का माध्यम बन रही हैं.

गेम से निकल पाना हो जाता है मुश्किल

साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने कहा कि ऑनलाइन गेम्स इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि यूजर धीरे-धीरे उनकी लत में फंसता चला जाए. इस पूरे मामले में जिम्मेदारी सिर्फ बच्चे की नहीं होती. गेम बनाने वाली कंपनियों, सरकार और माता-पिता तीनों को जवाबदेह बनाना जरूरी है, वरना ऐसे मामले लगातार बढ़ते रहेंगे. कई ऑनलाइन गेम्स बिहेवियरल साइंस के आधार पर बनाए जाते हैं, ताकि यूज़र बार-बार गेम पर लौटे. इनका डिजाइन इस तरह किया जाता है कि यह धीरे-धीरे लोगों के दिमाग पर असर डालने लगता है और एक समय बाद उससे बाहर निकल पाना मुश्किल हो जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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AIIMS में बैठे-बैठे डॉक्टरों ने अंटार्कटिका में की मरीज का जांच, क्या है टेलीरॉबोटिक सिस्टम?

AIIMS में बैठे-बैठे डॉक्टरों ने अंटार्कटिका में की मरीज का जांच, क्या है टेलीरॉबोटिक सिस्टम?


Doctors In Delhi Examine Patient In Antarctica: आज के आधुनिक समय में हर चीज बदल चुकी है और इसमें सबसे ज्यादा सुधार मेडिकल के फील्ड में देखने को मिला है. दिल्ली में बैठे डॉक्टरों ने अंटार्कटिका में मौजूद मरीज की जांच की, वह भी वीडियो कॉल से नहीं, बल्कि लाइव अल्ट्रासाउंड के जरिए. AIIMS के डॉक्टरों द्वारा किया गया यह डेमो दिखाता है कि आधुनिक तकनीक की मदद से एक्सपर्ट इलाज अब महाद्वीपों की दूरी भी पार कर सकता है.

AIIMS रिसर्च डे 2026 के दौरान, डॉक्टरों ने भारत के अंटार्कटिक स्टेशन पर लगाए गए एक रोबोटिक आर्म पर लगे अल्ट्रासाउंड प्रोब को दूर से कंट्रोल किया. जैसे ही प्रोब को मूव किया गया, उसकी रियल-टाइम इमेज दिल्ली तक पहुंचती रहीं. इससे डॉक्टरों को ऐसा अनुभव मिला, मानो वे मरीज के पास खड़े होकर खुद जांच कर रहे हों.

कई बार हो चुका है ट्रायल

इस सिस्टम को अब तक कई ट्रायल्स में परखा जा चुका है. इन परीक्षणों के दौरान डॉक्टरों ने एब्डॉमिनल अल्ट्रासाउंड, ट्रॉमा स्कैन, हार्ट इमेजिंग, डॉप्लर स्टडी और गर्दन से जुड़ी जांच सफलतापूर्वक की. प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, इतनी लंबी दूरी और कठिन परिस्थितियों के बावजूद इमेज क्वालिटी क्लिनिकल फैसले लेने के लिए पर्याप्त रही.

एक्सपर्ट का क्या कहना है?

AIIMS के प्रोफेसर डॉ. चंद्रशेखर एसएच ने बताया कि फिलहाल यह तकनीक टेस्टिंग फेज में है, लेकिन दूर-दराज और संसाधनविहीन इलाकों के लिए इसमें जबरदस्त संभावनाएं हैं. आने वाले समय में इसके इस्तेमाल को और बड़े स्तर पर लागू करने की योजना है. अंटार्कटिका में मेडिकल केयर किसी भी आम जगह जैसी नहीं होती. वहां काम कर रहे लोग बेहद ठंडे मौसम, पूरी तरह अलग-थलग हालात और सीमित मेडिकल सुविधाओं के बीच रहते हैं. ऐसे में अचानक कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए, तो डॉक्टरों को तुरंत फैसला लेना पड़ता है कि मरीज का इलाज वहीं संभव है या उसे बाहर ले जाना पड़ेगा, जो कई बार मौसम के कारण दिनों तक संभव नहीं हो पाता. ऐसे हालात में तुरंत जांच की सुविधा न होना जानलेवा साबित हो सकता है.

AIIMS दिल्ली और IIT ने मिलकर डेवलेप किया

यह टेलीरॉबोटिक सिस्टम AIIMS दिल्ली और IIT दिल्ली के साथ मिलकर डेवलेप किया गया है. इसमें IHFC, नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च और राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल का भी सहयोग रहा है. डॉक्टरों का मानना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल आपदा प्रभावित इलाकों, ऊंचाई वाले क्षेत्रों, समुद्र में मौजूद इंस्टॉलेशंस और भारत के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में भी किया जा सकता है, जहां एक्सपर्ट इलाज तक पहुंच अक्सर देर से या बिल्कुल नहीं हो पाती.

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उंगलियों में महसूस हो रही है झुनझुनी, कहीं इस विटामिन की कमी तो नहीं?

उंगलियों में महसूस हो रही है झुनझुनी, कहीं इस विटामिन की कमी तो नहीं?


कई बार ऐसा लगता है जैसे उंगलियों पर चींटियां चल रही हों. कभी-कभी हल्का सा छूने पर भी अजीब सी तकलीफ महसूस होती है और कुछ देर बाद वह हिस्सा बिल्कुल सुन्न पड़ जाता है. अक्सर लोग इसे थकान, गलत तरीके से बैठने या देर तक एक ही पोजीशन में रहने का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन अगर यह समस्या बार-बार होने लगे या बिना किसी खास वजह के महसूस हो, तो यह शरीर के अंदर चल रही किसी कमी की ओर इशारा हो सकती है.

डॉक्टरों के अनुसार, हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन की सबसे आम वजहों में विटामिन और मिनरल की कमी शामिल है. खासतौर पर कुछ ऐसे विटामिन हैं जिनका सीधा संबंध हमारी नसों से होता है. जब इनकी मात्रा शरीर में कम हो जाती है, तो नसें सही तरीके से काम नहीं कर पातीं और हमें झनझनाहट, जलन या सुन्नपन महसूस होने लगता है. तो आइए जानते हैं कि उंगलियों में झुनझुनी आखिर क्यों होती है और किस विटामिन की कमी इसके पीछे सबसे बड़ी वजह बनती है. 

किस विटामिन की कमी से उंगलियों में झुनझुनी होती है?

हाथ-पैरों और उंगलियों में झुनझुनी होने की सबसे आम और गंभीर वजह विटामिन B12 की कमी मानी जाती है. विटामिन B12 हमारे शरीर में नसों को स्वस्थ रखने, नए ब्लड सेल्स बनाने और डीएनए के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है. जब शरीर में इस विटामिन की कमी हो जाती है, तो नसें कमजोर होने लगती हैं. इसका असर सबसे पहले हाथों और पैरों की उंगलियों में महसूस होता है.

विटामिन B12 की कमी के लक्षण
 
विटामिन B12 की कमी सिर्फ झुनझुनी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इससे शरीर में कई तरह की समस्याएं दिखने लगती हैं, जैसे हाथों और पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन, हर समय थकान और कमजोरी महसूस होना, मांसपेशियों में कमजोरी, त्वचा का पीला पड़ना, भूख कम लगना, बिना वजह वजन कम होना, मुंह में छाले, चिड़चिड़ापन और उदासी महसूस होना, ध्यान लगाने में परेशानी, डिप्रेशन जैसा महसूस होना. अगर लंबे समय तक B12 की कमी बनी रहे, तो नसों को स्थायी नुकसान भी हो सकता है.

विटामिन B12 की कमी कैसे पूरी करें?

विटामिन B12 पाने के लिए आप अपनी डाइट में दूध और दूध से बनी चीजें (दही, पनीर, चीज), अंडे, मछली, चिकन और लाल मांस, विटामिन B12 से फोर्टिफाइड ब्रेकफास्ट सीरियल, फोर्टिफाइड प्लांट मिल्क ये चीजें शामिल कर सकते हैं. अगर कमी ज्यादा हो, तो डॉक्टर की सलाह से विटामिन B12 सप्लीमेंट या इंजेक्शन भी लिया जा सकता है. 

हाथ-पैरों में झुनझुनी क्या है?

हाथ-पैरों में होने वाली इस अजीब सी समस्या को मेडिकल भाषा में पैरेस्थेसिया कहा जाता है. यह तब होती है जब नसों पर दबाव पड़ता है या नसें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं. कभी-कभी यह समस्या अस्थायी होती है, जैसे देर तक एक ही पोजीशन में बैठने या सोने से, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे, तो यह किसी अंदरूनी बीमारी या पोषण की कमी का संकेत हो सकता है. 
 
झुनझुनी के अन्य कारण
 
विटामिन B12 के अलावा भी कुछ कारण हाथ-पैरों में झुनझुनी पैदा कर सकते हैं, जैसे डायबिटीज (जिससे नसों को नुकसान होता है), रीढ़ की हड्डी या नर्व से जुड़ी समस्याएं, किसी प्रकार का संक्रमण, चोट या दुर्घटना और लंबे समय तक शराब का सेवन. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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30 की उम्र में ही दिखने लगते हैं अंकल, औरतों के बजाय पुरुषों में क्यों आता है जल्दी बुढ़ापा?

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Why Men Age Faster Than Women: आमतौर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा लंबी उम्र तक जीती हैं. लेकिन सवाल यह है कि उम्र बढ़ने की रफ्तार किसमें तेज होती है? कौन बेहतर तरीके से उम्र के साथ ढलता है? उम्र, सेहत और शरीर के काम करने के तरीके पर कई फैक्टर असर डालते हैं. एक सच्चाई यह भी है कि दुनिया के लगभग हर हिस्से में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा जीती हैं. इसके पीछे वैज्ञानिकों ने कई वजहें बताई हैं.

एक थ्योरी यह है कि पुरुष ज्यादा जोखिम वाले काम करते हैं और खतरनाक पेशों में उनकी भागीदारी ज्यादा होती है, जैसे सेना या भारी उद्योग. आंकड़ों के हिसाब से यह अंतर की एक वजह हो सकती है, लेकिन पूरी कहानी सिर्फ इतनी नहीं है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर रिसर्च क्या कहते हैं.

पुरुषों की उम्र जल्दी क्यों बढ़ती है?

Verywellhealth की रिपोर्ट के अनुसार,उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव आते हैं, जो यह तय करते हैं कि हम कैसे बूढ़े होते हैं, कितना मजबूत महसूस करते हैं और शरीर कैसे काम करता है. अक्सर हार्मोन को पुरुष या महिला से जोड़ दिया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति में सभी तरह के हार्मोन मौजूद होते हैं, फर्क सिर्फ उनकी मात्रा का होता है. उम्र के साथ ये हार्मोन धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और इसका सीधा असर शरीर और दिमाग पर पड़ता है.

पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन मांसपेशियों, हड्डियों और शारीरिक ताकत को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है. जैसे-जैसे इसकी मात्रा घटती है, शरीर कमजोर महसूस करने लगता है. पेट के आसपास चर्बी बढ़ सकती है, संतुलन बिगड़ सकता है और गिरने या चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है. लंबे समय तक यह कमी स्लीप एपनिया, डिप्रेशन, मोटापा, डायबिटीज और किडनी या लिवर से जुड़ी समस्याओं से भी जुड़ी पाई गई है. रिसर्च बताते हैं कि पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन जितना तेजी से गिरता है, उम्र उतनी ही कम हो सकती है.

महिलाओं में क्या होता है बदलाव?

महिलाओं में यही हार्मोन एस्ट्रोजन के निर्माण में मदद करता है, जो उनके शरीर के कई जरूरी काम संभालता है. जब यह हार्मोन घटता है, तो वजन बढ़ना, हड्डियों का कमजोर होना, भावनात्मक बदलाव और शारीरिक क्षमता में कमी देखी जा सकती है. एस्ट्रोजन सूजन कम करने, मांसपेशियों की मरम्मत, नसों के स्वास्थ्य और हड्डियों की मजबूती में भी भूमिका निभाता है. पुरुषों में इसका स्तर धीरे-धीरे घटता है, जबकि महिलाओं में मेनोपॉज के दौरान यह अचानक बहुत तेजी से कम हो जाता है.

हार्मोन का असर फिजिकल रिलेशन पर भी पड़ता है. पुरुषों में यह बदलाव धीरे-धीरे आता है, जबकि महिलाओं में मेनोपॉज के बाद इसमें बड़ा बदलाव देखा जाता है. उम्र बढ़ने के साथ दोनों में फिजिकल रिलेशन कम हो सकता है, लेकिन ज्यादातर लोगों में 50 की उम्र तक यह सामान्य बना रहता है.

ब्रेन पर भी होता है असर

दिमाग की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी पुरुषों और महिलाओं में अलग-अलग होती है. रिसर्च के मुताबिक औसतन पुरुषों का दिमाग व्यावहारिक रूप से महिलाओं की तुलना में थोड़ा ज्यादा उम्र का हो सकता है. हालांकि, दिमाग के बूढ़े होने की रफ्तार हर व्यक्ति में अलग होती है और यह वजन, डायबिटीज, स्ट्रोक, सामाजिक जुड़ाव और लाइफस्टाइल जैसे कई फैक्टर्स पर निर्भर करती है.

ये भी होते हैं कारण

इन सबके अलावा जेनेटिक्स, खान-पान, नींद, फिजिकल एक्टिविटी और पर्यावरण भी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, जेनेटिक्स को बदला नहीं जा सकता, लेकिन बाकी चीजों पर ध्यान देकर उम्र के असर को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर साल बढ़ रहा कैंसर का ग्राफ, एक्सपर्ट से जानें वे संकेत, जिन्हें नजरअंदाज करना पड़ता है भारी

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Cancers Increasing In Young Adults: दुनियाभर में हर साल 4 फरवरी को वर्ल्ड कैंसर डे मनाया जाता है, लेकिन 2026 में इसकी अहमियत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है. दुनिया भर में कैंसर लगातार लाखों जिंदगियों को प्रभावित कर रहा है. इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के अनुसार, साल 2022 में वैश्विक स्तर पर करीब 2 करोड़ नए कैंसर मामले सामने आए और लगभग 97 लाख लोगों की मौत कैंसर से जुड़ी वजहों से हुई.

भारत में स्थिति काफी गंभीर

भारत में भी स्थिति चिंताजनक है. यहां कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है. साल 2019 में जहां करीब 13.5 लाख केस दर्ज हुए थे, वहीं 2024 तक यह संख्या बढ़कर 15.3 लाख तक पहुंच गई. 2020 में 13.9 लाख, 2021 में 14.2 लाख, 2022 में 14.6 लाख और 2023 में 14.9 लाख कैंसर के मामले सामने आए. यानी हर साल आंकड़े नई चेतावनी दे रहे हैं. 

इस बार क्या है थीम

वर्ल्ड कैंसर डे 2026 की थीम है ‘United by Unique’. अगर इसके मतलब की बात करें, तो इसका मतलब है कि हर मरीज की कैंसर जर्नी अलग होती है, लेकिन मकसद सबका एक ही है, बेहतर इलाज, बेहतर सपोर्ट और बेहतर नतीजे. यह थीम बीमारी से ज़्यादा इंसान को केंद्र में रखती है और ऐसे हेल्थ सिस्टम की बात करती है जो हर व्यक्ति की ज़रूरत को समझे और उसके मुताबिक देखभाल करे.

वर्ल्ड कैंसर डे सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होना चाहिए. यह दिन हमें याद दिलाता है कि कैंसर के खिलाफ व्यक्तिगत और सामूहिक, दोनों स्तरों पर कदम उठाने की जरूरत है. अर्ली डिटेक्शन यानी समय रहते पहचान, जान बचा सकती है, लेकिन आज भी कई जगह स्क्रीनिंग टेस्ट नियमित रूप से नहीं होते. ब्रेस्ट, सर्वाइकल, ओरल और कोलोरेक्टल कैंसर की जांच को लोग टालते रहते हैं. 

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

टीओआई हेल्थ से बात करते हुए डॉ. वैशाली जामरे ने बताया  कि अगर किसी एक जांच के लिए लोगों को तैयार करना हो, तो वह मैमोग्राफी होगी. शुरुआती स्टेज का ब्रेस्ट कैंसर अक्सर बिना दर्द और लक्षण के होता है, ऐसे में मैमोग्राफी से बीमारी को पहले ही पकड़ लिया जाता है, जिससे इलाज आसान और सर्वाइवल के चांस बेहतर हो जाते हैं. वह यह भी बताती हैं कि लोग कई बार बिना दर्द की गांठ, अचानक वजन घटना, लगातार थकान, लंबी खांसी, ब्लीडिंग, न भरने वाले घाव या त्वचा में बदलाव जैसे संकेतों को गंभीरता से नहीं लेते. वहीं आजकल युवाओं में भी ब्रेस्ट, कोलोरेक्टल, थायरॉइड, एंडोमेट्रियल और स्किन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं, जिन्हें सही समय पर टेस्ट से पकड़ा जा सकता है.

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आम के आम, गुठलियों के दाम! कहावत को चरितार्थ करता है आंवला, औषधीय गुणों से है भरपूर

आम के आम, गुठलियों के दाम! कहावत को चरितार्थ करता है आंवला, औषधीय गुणों से है भरपूर


हर किसी ने आंवला का नाम सुना ही होगा-खट्टा-मीठा स्वाद और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए उत्तम. यह त्वचा, बाल, पाचन और हृदय के लिए भी लाभकारी होता है. आयुर्वेद में इसे ‘अमृतफल’ भी कहा गया है. हम सभी जानते हैं कि आंवला फल में विटामिन C भरपूर मात्रा में होता है. आयुर्वेदिक ग्रंथ जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम् में आंवला के गुणों का वर्णन है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके बीज, जिन्हें आमतौर हम सब लोग ही बेकार समझकर फेंक देते हैं, कितने कीमती हो सकते हैं?

परम पूज्य स्वामी रामदेव जी और परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी के मार्गदर्शन में पतंजलि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि आंवला के बीज में भी अद्भुत औषधीय गुण विद्यमान हैं, और अब इस शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति प्राप्त हो रही है. इस शोध के माध्यम से हम यह पता लगाने की चेष्टा कर रहे थे कि क्या आंवला के बीजों से निकाला गया तेल किसी रोग से लड़ने में उपयोगी हो सकता है? हमने इस शोध के लिए एक नई तकनीक का प्रयोग किया, यह तकनीक है, Supercritical Fluid Extraction (SCFE).

इस विधि में पर्यावरण को नहीं पहुंचती कोई हानि

यह एक आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक है, जिसमें किसी भी प्रकार का कोई हानिकारक रसायन (Chemical Solvent) का प्रयोग नहीं किया जाता है. पारंपरिक तेल निकालने की विधियों में विभिन्न हानिकारक रसायनों का उपयोग होता है, जिससे न केवल तेल की गुणवत्ता घटती है, बल्कि पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है. वहीं इस विधि में पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुंचती है. इस विधि में प्रयोग होने वाली Carbon dioxide (CO₂) को भी उपयोग के उपरांत पूरी तरह से वापस प्राप्त कर लिया जाता है, अर्थात यह एक Zero Waste टेक्नोलॉजी है. इस तकनीक से निकाला गया तेल भी पूर्ण रूप से शुद्ध रहता है, और उसमें विद्यमान प्राकृतिक पोषक तत्व नष्ट भी नहीं होते हैं.

इस तकनीक के माध्यम से निकाले गए तेल पर जब शोध किया गया तो परिणाम चौंकाने वाले थे. सर्वप्रथम यह ज्ञात हुआ कि यह तेल दो हानिकारक बैक्टीरिया पर प्रभावी है, यह दो बैक्टीरिया हैं E. coli, जो उल्टी, दस्त और पेट के संक्रमण के लिए जिम्मेदार है. K. pneumoniae, जो निमोनिया और मूत्र संक्रमण का कारण बनता है. ये दोनों बैक्टीरिया अपने चारों ओर एक अभेद्य चिपचिपी परत बना लेते हैं, जिसे Biofilm कहा जाता है.

एंटीबायोटिक दवाइयों का नहीं होता है असर

यह परत इतनी मज़बूत होती है कि इन पर एंटीबायोटिक दवाइयों का भी कोई असर नहीं होता है. शोध में पाया गया कि आंवला बीज का तेल इस परत को तोड़ देता है अर्थात यह तेल उन बैक्टीरिया की रक्षा कवच को ही भेद देता है. और इस तेल की सबसे विशेष बात यह है कि यह शरीर के लिए पूर्ण रूप से सुरक्षित है.

Ames Assay नामक परीक्षण में भी इस तथ्य की पुष्टि हुई कि यह तेल हमारे जींस को कोई हानि नहीं पहुंचाता है, अर्थात यह Non-Toxic और हानिरहित है. एक अन्य शोध में, इस तेल की कार्यशीलता को एक अन्य हानिकारक बैक्टीरिया P. aeruginosa, जो आंख, कान, त्वचा और मूत्र संक्रमण का कारक है, पर जांचा गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस बैक्टीरिया को Antibiotic Resistant की संज्ञा प्रदान की है.

अर्थात इस बैक्टीरिया पर दवाइयों का भी कोई प्रभाव नहीं होता है. परन्तु इस तेल में विद्यमान एक विशेष फैटी एसिड, Linolenic acid ने इस बैक्टीरिया की Quorum Sensing को समाप्त कर दिया. बैक्टीरिया में विद्यमान कोशिकाएं आपस में संचार के लिए जिस पद्यति का प्रयोग करते हैं उसे Quorum Sensing तकनीक कहते हैं. इस संचार माध्यम के समाप्त होने का परिणाम यह हुआ कि बैक्टीरिया की क्षमता और प्रभावशीलता को कम हो गई.

हमने इस तेल का C. elegans नामक एक मॉडल जीव पर भी परीक्षण किया, यह जीव वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए मानव शरीर के समान एक जैविक मॉडल के रूप में प्रयोग किया जाता है. सर्वप्रथम इन जीवों को P. aeruginosa बैक्टीरिया से संक्रमित कर उनको रोगग्रसित किया गया. तत्पश्चात आंवला बीज का तेल देने से इनमें अप्रत्याशित सुधर देखने को मिला.

इस तेल के प्रयोग से इन जीवों का जीवनकाल बढ़ गया, इनमें सक्रियता देखी गई और यह स्वस्थ दिखे, साथ ही साथ इनकी प्रजनन क्षमता में भी सुधार हुआ. पतंजलि अनुसन्धान के इन दोनों शोध को एक साथ, विश्वप्रसिद्ध Elsevier प्रकाशन के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Applied Food Research में एक साथ प्रकाशित किया गया है. यह प्रथम अवसर है कि हमारे दो शोध को एक ही जर्नल के एक अंक में स्थान मिला है. यह उपलब्धि न केवल पतंजलि की है, बल्कि पूरे भारत और आयुर्वेदिक विज्ञान के लिए गर्व की बात है.

एंटीबायोटिक प्रतिरोधकता का बढ़ रहा है खतरा

यह शोध इस कारण भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के समय में जब एंटीबायोटिक प्रतिरोधकता यानि Antibiotic Resistance का खतरा बढ़ता जा रहा है, अर्थात अब दुनिया भर में ऐसे कई बैक्टीरिया हैं जिनपर दवाइयों का कोई प्रभाव नहीं होता है, तो हमें ऐसे विकल्प चाहिए, जो इनका समाधान प्रदान करे. साथ ही साथ इस शोध के माध्यम से एक सुरक्षित और प्राकृतिक औषधि की खोज हुई है, और यह औषधि परीक्षणों में पूरी तरह सुरक्षित सिद्ध हुई है. साथ ही साथ आंवला बीज के तेल में बायोफिल्म हटाने की क्षमता इसे एक प्रभावी समाधान सिद्ध करती है.

अब जबकि यह प्रमाणित हो चुका है की आंवला बीज तेल में ऐसे सक्रिय तत्व हैं जो हानिकारक जीवाणुओं की क्षमता रखते हैं तो भविष्य की अनेक संभावनाओं के द्वारा खुल चुके हैं, जैसे कि इससे नई दवाइयां या क्रीम तैयार की जा सकती हैं जोकि त्वचा संक्रमण, बाल झड़ना, या मुंहासों के इलाज में भी उपयोगी हो सकता है. साथ ही इस तेल को हर्बल एंटीबैक्टीरियल उत्पादों जैसे हर्बल सैनिटाइज़र या हर्बल साबुन में सम्मिलित किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त भविष्य में इस तेल के क्लिनिकल ट्रायल भी किए जा सकते हैं ताकि मानव शरीर पर इसके प्रभाव को और गहराई से समझा जा सके.

आंवला बीज पर यह शोध केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक विचारधारा का परिवर्तन है. जहां पूरी दुनिया रासायनिक दवाइयों की ओर भाग रही है, वहीं पतंजलि यह प्रमाणित कर दिया है कि हमारे आसपास की प्राकृतिक चीज़ों में ही सबसे बड़े समाधान छिपे हैं. और उन्हें न समझ पाना हमारी अज्ञानता है, और यह अज्ञानता तब तक समाप्त नहीं होती, जब तक हम अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति को जीवंत कर, उस अज्ञानता को समाप्त करने का प्रयत्न नहीं करते.

आंवला के बीज, जिन्हें पहले किसी काम का न समझ कर, फेंक दिया जाता था, अब विज्ञान की दृष्टी में अनमोल बन गए हैं. आज पतंजलि के वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब परंपरा और विज्ञान साथ चलते हैं, तो नए युग की शुरुआत होती है. आंवला बीज का यह शोध भी भारत की उस वैज्ञानिक यात्रा का प्रतीक है जो प्रकृति, परंपरा और नवाचार को एक साथ जोड़ती है. और साथ ही साथ यह भारत की उस परंपरा को पुनर्जीवित करता है जो कहती है, “प्रकृति ही सबसे बड़ी प्रयोगशाला है, और हर पौधा एक औषधि.” तो अगली बार, जब आप भी आंवला खाएं, तो उसके बीजों को बेकार न समझें, क्योंकि अब सिद्ध हो चुका है कि उनमें छिपा है स्वास्थ्य और विज्ञान का नया भविष्य.

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