फूलगोभी की डंठल में होते हैं इतने विटामिन, 99% महिलाएं फेंक देती हैं इसे
Cauliflower Leaves: फूलगोभी की डंठल में होते हैं इतने विटामिन, 99% महिलाएं फेंक देती हैं इसे
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देश में एक बार फिर एक खतरनाक वायरस ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. निपाह वायरस के संदिग्ध मामलों की खबर सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड में आ गया है. पश्चिम बंगाल में दो नर्सों में इस वायरस के लक्षण मिलने की खबर के बाद आस-पास के राज्यों में भी सतर्कता बढ़ा दी गई है. निपाह वायरस कोई आम बीमारी नहीं है. यह तेजी से फैल सकता है और कई मामलों में जानलेवा भी साबित होता है.
यही वजह है कि जब भी इसके मामले सामने आते हैं, तो डर का माहौल बन जाता है. इस वायरस की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अभी तक इसका कोई पक्का इलाज या वैक्सीन मौजूद नहीं है. ऐसे में बचाव ही इसका सबसे बड़ा उपाय माना जाता है. तो आइए जानते हैं कि निपाह वायरल कितना खतरनाक है और इसमें जान बचाना मुश्किल कब हो जाता है.
निपाह वायरस क्या है?
निपाह वायरस एक जूनोटिक वायरस है, यानी यह बीमारी जानवरों से इंसानों में फैलती है. इस वायरस का मुख्य स्रोत फल खाने वाले चमगादड़ होते हैं, जिन्हें फ्लाइंग फॉक्स भी कहा जाता है. यह वायरस सबसे पहले साल 1999 में मलेशिया में पाया गया था. उस समय यह चमगादड़ों से सूअरों में फैला और फिर सूअरों के संपर्क में आए इंसानों को संक्रमित कर गया.उस प्रकोप में सैकड़ों लोग बीमार हुए और कई लोगों की मौत हो गई थी. इसके बाद भारत और बांग्लादेश में भी समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहे हैं.
निपाह वायरस कितना खतरनाक है?
निपाह वायरस को खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि इसकी मृत्यु दर बहुत ज्यादा होती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, इस वायरस में 40 से 70 प्रतिशत तक मरीजों की मौत हो सकती है. यह वायरस सीधे दिमाग पर असर डालता है और दिमाग में सूजन (एन्सेफेलाइटिस) पैदा कर सकता है. कई मामलों में मरीज की हालत इतनी जल्दी बिगड़ती है कि डॉक्टरों को संभलने का मौका तक नहीं मिलता है. यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने निपाह वायरस को सबसे खतरनाक बीमारियों की लिस्ट में शामिल किया है.
निपाह वायरस के लक्षण क्या होते हैं?
निपाह वायरस के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के 4 से 14 दिन बाद दिखने लगते हैं. कुछ मामलों में लक्षण दिखने में 45 दिन तक भी लग सकते हैं. इसके शुरुआती लक्षण तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, गले में खराश, खांसी, उल्टी, कमजोरी है. वहीं गंभीर लक्षण में चक्कर आना, भ्रम की स्थिति, बहुत ज्यादा सुस्ती, सांस लेने में दिक्कत, बेहोशी शामिल है. गंभीर मामलों में मरीज के दिमाग में सूजन आ जाती है और वह 24 से 48 घंटे के भीतर कोमा में जा सकता है.
कब हो जाता है जान बचाना मुश्किल?
निपाह वायरस में जान बचाना तब मुश्किल हो जाता है जब मरीज को समय पर इलाज न मिले, संक्रमण दिमाग तक पहुंच जाए, सांस लेने में ज्यादा परेशानी होने लगे, मरीज की इम्यूनिटी कमजोर हो या अस्पताल में संक्रमण फैल जाए. कई मामलों में यह वायरस अस्पतालों के अंदर भी फैल चुका है, जहां मरीजों की देखभाल करने वाले लोग भी इसकी चपेट में आ गए. इससे साफ है कि यह बीमारी इंसान से इंसान में भी फैल सकती है.
निपाह वायरस से बचाव कैसे करें?
निपाह वायरस का कोई टीका या पक्का इलाज नहीं है, इसलिए सावधानी ही सबसे बड़ा इलाज है. ऐसे में इससे बचाव के लिए हाथों को बार-बार साबुन और पानी से धोएं, चमगादड़ों और सूअरों से दूरी बनाकर रखें, जमीन पर गिरे या आधे कटे फल न खाएं, कच्चा खजूर का रस पीने से बचें, संक्रमित या संदिग्ध मरीज के संपर्क में न आएं, स्वास्थ्य विभाग की सलाह का पालन करें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Drinking Beer For Kidney Stones: हमारी बदलती लाइफस्टाइल के चलते हमें जिन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है, उनमें से एक है किडनी स्टोन का. यह एक आम लेकिन बेहद दर्दनाक समस्या है. इसे लेकर लोगों के बीच कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं. इन्हीं में से एक सबसे प्रचलित धारणा यह है कि बियर पीने से किडनी में फंसे स्टोन अपने आप निकल जाते हैं, क्योंकि बियर पेशाब की मात्रा बढ़ाती है. हालांकि सच्चाई यह है कि बियर को इलाज के तौर पर इस्तेमाल करना न तो सुरक्षित है और न ही भरोसेमंद. उल्टा, इससे दर्द बढ़ सकता है. चलिए आपको इशके बारे में विस्तार से बताते हैं.
बियर पीने से हर तरह का किडनी स्टोन निकल जाता है?
कई लोग मानते हैं कि बियर पीने से स्टोन अपने आप बाहर आ जाते हैं. यह सोच इस वजह से बनी क्योंकि बियर यूरिन आउटपुट बढ़ाती है और माना जाता है कि इससे छोटे स्टोन खिसक सकते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि बियर सिर्फ पेशाब बढ़ाती है, लेकिन इससे बने हुए स्टोन सुरक्षित तरीके से नहीं निकलते. 5 मिमी से छोटे स्टोन कभी-कभी खुद निकल सकते हैं, लेकिन बड़े स्टोन जबरदस्ती खिसकाने पर तेज दर्द और रुकावट पैदा कर सकते हैं. कुछ स्टडी में बियर को स्टोन बनने के जोखिम को कम करने से जोड़ा गया है, लेकिन यह बचाव के लिए है, इलाज के लिए नहीं.
क्या बियर सुरक्षित घरेलू उपाय?
कई लोग दवाओं या सर्जरी की बजाय बियर को आसान और नुकसानरहित उपाय मानते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि बियर में ऑक्सलेट की मात्रा होती है, जो स्टोन बनने का बड़ा कारण है. लंबे समय तक बियर पीने से शरीर डिहाइड्रेट हो सकता है और नए स्टोन बनने का खतरा बढ़ सकता है. इसके अलावा इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बिगड़ना, किडनी पर दबाव और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं.
ज्यादा बियर पीने से स्टोन जल्दी निकल जाएगा?
यह भी आम सोच है कि ज्यादा बियर पीने से स्टोन जल्दी फ्लश हो जाएगा. लेकिन सच्चाई यह है कि अचानक ज्यादा यूरिन बनने से स्टोन निकलना जरूरी नहीं है. अगर यूरिटर में रुकावट है, तो दर्द, मतली और जटिलताएं बढ़ सकती हैं. आजकल ऐसी दवाएं मौजूद हैं जो यूरिटर की मांसपेशियों को रिलैक्स करके स्टोन को सुरक्षित तरीके से निकलने में मदद करती हैं.
बियर मेडिकल इलाज से बेहतर है?
कुछ लोग इलाज को महंगा या झंझट भरा मानकर बियर को विकल्प समझते हैं. हालांकि सच्चाई यह है कि मेडिकल ट्रीटमेंट कहीं ज्यादा सुरक्षित और असरदार है. दवाओं से छोटे स्टोन निकल सकते हैं और जरूरत पड़ने पर आधुनिक, मिनिमली इनवेसिव प्रक्रियाओं से स्टोन आसानी से निकाले जा सकते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. दीपेश कालरा, एम.एस., एम.सी.एच. (यूरोलॉजी), डॉ.एन.बी. (यूरोलॉजी) ने इसको लेकर अपने वीडियो में बताया है कि “अक्सर लोगों को कहते सुना गया है कि पेट में पथरी हो तो बियर पीना शुरू कर दो. यह भी कहा जाता है कि बियर पीने से किडनी स्टोन निकल जाता है और बियर पथरी को काट-काटकर बाहर निकाल देती है. लेकिन स्वास्थ्य एक्सपर्ट के मुताबिक यह सबसे बड़ा मिथक है.”
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Why Doctors Hang Weights After Fracture: स्केलेटल ट्रैक्शन टूटी हुई हड्डियों के इलाज की एक खास तकनीक है. इसमें पिन, पुली और वज़न की मदद से टूटी हड्डियों को सही स्थिति में लाया जाता है, ताकि वे ठीक से जुड़ सकें. आमतौर पर इस पद्धति का इस्तेमाल शरीर के निचले हिस्से, जैसे पैर या कूल्हे की हड्डियों के फ्रैक्चर में किया जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है और इसका इस्तेमाल कब से होता आ रहा है, जिसके बारे में 99 प्रतिशत लोगों को नहीं पता है.
क्या होता है इस प्रक्रिया में?
इस प्रक्रिया में डॉक्टर हड्डी के अंदर एक पिन डालते हैं. यही पिन पुली सिस्टम का आधार बनता है, जिस पर वज़न लगाया जाता है. धीरे-धीरे खिंचाव देकर टूटी हुई हड्डियों को सीधा किया जाता है, जिससे वे अपनी सही जगह पर आ सकें और भरने की प्रक्रिया बेहतर हो. ट्रैक्शन के दो आम प्रकार होते हैं स्किन ट्रैक्शन और स्केलेटल ट्रैक्शन. स्किन ट्रैक्शन में त्वचा पर पट्टी या स्प्लिंट लगाकर खिंचाव दिया जाता है, जबकि स्केलेटल ट्रैक्शन में पिन सीधे हड्डी में डाला जाता है. दोनों में फर्क इस बात का होता है कि खिंचाव का आधार कहां बनाया गया है.
स्केलेटल ट्रैक्शन का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है, लेकिन आज के समय में इसे ज़्यादातर इमरजेंसी ट्रॉमा केस में अस्थायी इलाज के तौर पर अपनाया जाता है. इसका मकसद सर्जरी से पहले हड्डियों को स्थिर करना होता है. कई बार मरीज की हालत ऐसी होती है कि तुरंत ऑपरेशन संभव नहीं होता, ऐसे में ट्रैक्शन समय देने का काम करता है.
यह तकनीक आमतौर पर फीमर, टिबिया, ह्यूमरस, हिप, पेल्विस और कभी-कभी गर्दन की रीढ़ के फ्रैक्चर में इस्तेमाल की जाती है. कुछ मामलों में उंगली के जोड़ के पास की हड्डी में भी इसका प्रयोग किया जाता है.
डॉक्टर रखते हैं निगरानी
webmd की रिपोर्ट के अनुसार, इलाज के दौरान ऑर्थोपेडिक सर्जन स्थानीय एनेस्थीसिया देकर हड्डी में पिन डालते हैं. इसके बाद पुली से जुड़ा वज़न लगाया जाता है, जो हड्डी को धीरे-धीरे सही स्थिति में लाता है. अस्पताल में रहते हुए नर्स और डॉक्टर पिन वाली जगह पर इंफेक्शन के लक्षण, जैसे सूजन, लालिमा या दर्द, पर नजर रखते हैं और समय-समय पर एक्स-रे से हड्डी की स्थिति जांचते हैं.
क्या यह प्रक्रिया दर्दनाक होती है?
कई लोगों को लगता है कि यह प्रक्रिया बहुत दर्दनाक होगी, लेकिन पिन लगाने के समय एनेस्थीसिया दिया जाता है. जब हड्डियां सही स्थिति में आने लगती हैं, तो दर्द अक्सर कम हो जाता है. सर्जरी के बाद पिन को भी एनेस्थीसिया देकर ही निकाला जाता है. हालांकि इसके फायदे हैं जैसे हड्डी को स्थिर करना, मांसपेशियों के खिंचाव को कम करना और दर्द में राहत. लेकिन लंबे समय तक ट्रैक्शन में रहने से कुछ जोखिम भी होते हैं. इनमें पिन वाली जगह पर इंफेक्शन, लंबे समय तक एक ही पोज़िशन में रहने से बेडसोर्स, नसों को नुकसान और मांसपेशियों की कमजोरी शामिल है. इसी वजह से आजकल डॉक्टर स्केलेटल ट्रैक्शन को अस्थायी उपाय के तौर पर ही इस्तेमाल करते हैं और जल्द से जल्द ऐसे इलाज की ओर बढ़ते हैं, जिससे मरीज जल्दी चल-फिर सके और अस्पताल में कम समय बिताना पड़े.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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पलाश के पेड़ से निकलने वाला लाल गोंद को ढाक गोंद या कमरकस भी कहते हैं. ये सिर्फ देखने में ही खूबसूरत लाल नहीं है, बल्कि हमारी सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है, खासकर महिलाओं के लिए ये किसी वरदान से कम नहीं है. आइए आपको इसके फायदों के बारे में बताते हैं.
शरीर के लिए कितना जरूरी यह गोंद?
इस गोंद को खाने से शरीर अंदर से मजबूत बनता है, पीठ और कमर के दर्द में आराम मिलता है और कमजोरी दूर होती है. सर्दियों में कई लोग इसे घी, आटे और थोड़ी चीनी के साथ मिलाकर लड्डू या पंजीरी की तरह बनाकर खाते हैं. यह शरीर को गर्मी और एनर्जी दोनों देता है.
स्किन और बालों के लिए कितना फायदेमंद?
ढाक गोंद सिर्फ ताकत ही नहीं देता, बल्कि त्वचा और बालों के लिए भी फायदेमंद है. इसे खाने से त्वचा चमकदार और जवां रहती है और बाल मजबूत और हेल्दी बनते हैं. इसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं, जो शरीर को अंदर से पोषण देते हैं और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करते हैं.
पाचन के लिए भी लाभदायक
इसके अलावा यह पाचन के लिए भी अच्छा है और हल्की दस्त या पेट की तकलीफ में आराम दिला सकता है. इसलिए पुरानी पीढ़ी इसे ‘कमरकस’ भी कहती थी. यह न सिर्फ पीठ और कमर की मांसपेशियों को मजबूत करता है बल्कि जोड़ों और घुटनों के दर्द में भी राहत देता है. आजकल लोग इसके लड्डू खाने के साथ-साथ इसे हेल्थ टॉनिक की तरह भी इस्तेमाल करते हैं. इसकी मिठास और पौष्टिकता दोनों मिलकर इसे हर उम्र के लिए उपयुक्त बनाते हैं.
इन दिक्कतों में भी करता है मदद
अगर आप शरीर को अंदर से ताकतवर बनाना चाहते हैं, कमजोरी और थकान दूर करना चाहते हैं और साथ ही त्वचा और बालों की देखभाल भी करना चाहते हैं, तो ढाक गोंद आपके लिए एक बेहतरीन नेचुरल ऑप्शन है. ये सिर्फ एक साधारण गोंद नहीं, बल्कि प्रकृति का दिया हुआ टोटका है, जो कई तरह के फायदे देता है. सर्दियों में इसे अपनी डाइट में शामिल करना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है.
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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अपने खाने-पीने का ठीक से ध्यान नहीं रख पाते हैं. काम, मोबाइल और तनाव के बीच सबसे जरूरी चीज पानी पीना हम अक्सर भूल जाते हैं. कई लोग दिन भर में सिर्फ 2 से 3 गिलास पानी पीकर ही काम चला लेते हैं. क्या आप जानते हैं कि पानी की कमी आपके शरीर में एक गंभीर बीमारी को जन्म दे सकती है, जिसे गुर्दे की पथरी (Kidney Stone) कहते हैं.
किडनी स्टोन एक ऐसी समस्या है जिसमें अचानक पेट, कमर या पीठ में बहुत तेज और असहनीय दर्द उठता है. यह दर्द इतना ज्यादा हो सकता है कि व्यक्ति को अस्पताल तक जाना पड़ जाए. कई मामलों में पेशाब में खून आना, उल्टी, बुखार और जलन जैसी परेशानियां भी होने लगती हैं. इस बीमारी की सबसे बड़ी वजह कम पानी पीना और शरीर में पानी की कमी यानी निर्जलीकरण (Dehydration) है.
पानी की कमी से किडनी स्टोन कैसे बनता है?
जब हम पर्याप्त पानी नहीं पीते, तो शरीर में तरल पदार्थों की मात्रा कम हो जाती है. इसका सीधा असर हमारे पेशाब पर पड़ता है. कम पानी पीने से पेशाब गाढ़ा हो जाता है. गाढ़े मूत्र में कैल्शियम, ऑक्सालेट और यूरिक एसिड जैसे तत्व ज्यादा मात्रा में जमा हो जाते हैं. ये तत्व आपस में मिलकर छोटे-छोटे क्रिस्टल बना लेते हैं. यही क्रिस्टल धीरे-धीरे गुर्दे की पथरी में बदल जाते हैं. अगर लंबे समय तक पानी की कमी बनी रहे, तो शरीर इन क्रिस्टलों को न तो घोल पाता है और न ही बाहर निकाल पाता है.
किडनी स्टोन क्या होता है?
किडनी स्टोन ठोस कण या पत्थर जैसी संरचना होती है, जो गुर्दे के अंदर बनती है. यह रेत के दाने जितनी छोटी या कभी-कभी गोल्फ बॉल जितनी बड़ी भी हो सकती है. छोटी पथरी कई बार बिना किसी लक्षण के पेशाब के साथ निकल जाती है, लेकिन बड़ी पथरी मूत्र नली में फंस जाती है, जिससे भयानक दर्द होता है.
किडनी स्टोन के मुख्य लक्षण
किडनी स्टोन होने पर कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं. जैसे अचानक कमर, पीठ या पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द, दर्द का जांघ या कमर तक फैलना, पेशाब में जलन या दर्द, पेशाब में खून आना, बार-बार पेशाब आने की इच्छा, मतली और उल्टी, बुखार और ठंड लगना, बदबूदार या धुंधला पेशाब. कई बार छोटी पथरी बिना दर्द के भी हो सकती है.
पानी पीने से किडनी स्टोन कैसे रोका जा सकती है?
पर्याप्त पानी पीना किडनी स्टोन से बचाव का सबसे आसान और असरदार तरीका है. पानी पीने से पेशाब पतला रहता है. खनिज और लवण घुलकर आसानी से बाहर निकल जाते हैं. क्रिस्टल बनने की संभावना बहुत कम हो जाती है. डॉक्टर आमतौर पर सलाह देते हैं कि व्यक्ति को इतना पानी पीना चाहिए जिससे पेशाब का रंग हल्का पीला रहे.
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