पतंजलि का आयुर्वेदिक समाधान! दंतकांति गंडूष से स्वस्थ मुस्कान और मजबूत मसूड़ों का दावा

पतंजलि का आयुर्वेदिक समाधान! दंतकांति गंडूष से स्वस्थ मुस्कान और मजबूत मसूड़ों का दावा


Health News: मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ स्वास्थ्य की परिभाषा भी बदलती रही है. पहले जहां आयुर्वेदिक पद्धतियां जीवन का अनिवार्य हिस्सा थीं, वहीं आधुनिक समय में रासायनिक उत्पादों ने जीवनशैली पर गहरी छाप छोड़ी है. विशेषकर मौखिक स्वच्छता की बात करें तो आज के युग में टूथपेस्ट, माउथवॉश और केमिकल-आधारित उत्पादों की भरमार है, लेकिन इनके निरंतर और अंधाधुंध प्रयोग ने अनेक नई समस्याएं भी जन्म दी हैं. ऐसे समय में आयुर्वेद की ओर लौटना एक विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता है. इसी दिशा में पतंजलि अनुसन्धान संस्थान ने दंतकांति गंडूष ऑयल पुलिंग को प्रस्तुत किया है, जो न केवल हमारी प्राचीन परंपरा का जीवंत प्रमाण है बल्कि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रामाणिक और प्रभावशाली है.

आधुनिक जीवनशैली ने हमारे भोजन और रहन-सहन में भारी बदलाव ला दिया है. अत्यधिक मसालेदार भोजन, जंक फूड और चीनी का ज्यादा सेवन न केवल दांतों को कमजोर करता है बल्कि मसूड़ों की बीमारियों, पायरिया, कैविटी, दांतों के गिरने और मुंह से दुर्गंध जैसी समस्याओं को भी जन्म देता है. आज वैश्विक स्तर पर ओरल हेल्थ से जुड़ी समस्याएँ इतनी गंभीर हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती माना है. भारत में स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि यहां दांत और मसूड़ों की बीमारियाँ आम हैं और लोग ओरल हेल्थ को उतनी गंभीरता से नहीं लेते.

पतंजलि दंतकांति गंडूष: आधुनिक विज्ञान से जुड़ा आयुर्वेद

आयुर्वेद में किसी भी प्रकार की दन्त समस्याओं के लिए गंडूष क्रिया का वर्णन किया गया हैं. यह प्रक्रिया केवल मौखिक स्वच्छता तक सीमित नहीं है बल्कि इसका सीधा प्रभाव शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ता है. प्रात:काल मुंह में तेल भरकर कुछ मिनट तक मुख में डाले रखना गंडूष क्रिया कहलाता है. महान आयुर्वेद चिकित्सकों सुश्रुत और वाग्भट्ट ने भी इसे दैनिक दिनचर्या का अभिन्न अंग मानते हुए मौखिक स्वास्थ्य के लिए प्रभावशाली बताया है. गंडूष क्रिया का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि इस औषधीय तेल को 4 से 5 मिनट तक मुख में रखना चाहिए और उसके बाद कुल्ला नहीं करना चाहिए, जिससे कि इस औषधीय तेल का प्रभाव लम्बे समय तक मुख में बना रहे. गंडूष न केवल दांतों और मसूड़ों को मज़बूत करता है, बल्कि कंठ, स्वरयंत्र और पाचन क्रिया को भी स्वस्थ बनाए रखने में सहायक है.

पारंपरिक गंडूष प्रक्रिया में तेल या औषधीय द्रव का प्रयोग को आधार मान पतंजलि ने इसे आधुनिक विज्ञान से जोड़ते हुए दंतकांति गंडूष ऑयल पुलिंग विकसित किया है. यह विशेष औषधीय मिश्रण है, जिसे लंबे शोध और वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद तैयार किया गया है. इसमें ऐसे प्राकृतिक घटक शामिल किए गए हैं, जो दांतों और मसूड़ों की मजबूती, मुंह की दुर्गंध को दूर करने और कीटाणुओं को नष्ट करने में कारगर सिद्ध हुए हैं. साथ ही यह उत्पाद पूर्णतः सुरक्षित है, इसमें किसी भी प्रकार के हानिकारक रसायन, अल्कोहल या कृत्रिम तत्व नहीं डाले गए हैं.

प्राकृतिक तेलों की शक्ति से दांत और मसूड़े मजबूत

दंतकांति गंडूष के प्रयोग से मुख की स्वच्छता बनी रहती है. इसके औषधीय तत्व न केवल दांतों की सतह पर चिपके बैक्टीरिया को नष्ट करते हैं, बल्कि मसूड़ों की सूजन और खून आने की समस्या को भी दूर करते हैं. जिन लोगों को पायरिया या कैविटी की शिकायत रहती है, उनके लिए यह उत्पाद एक प्रभावी उपचार के रूप में सामने आया है. इसके अतिरिक्त यह दांतों को चमकदार, मसूड़ों को गुलाबी और सांस को ताज़गीपूर्ण बनाए रखता है.

दन्त कांति गंडूष ऑयल पुलिंग में तुंबुरु का तेल, लौंग का तेल, पुदीना का तेल, नीलगिरी का तेल एवं तुलसी का तेल सम्मिलित है. तुंबुरु तेल, दांतो और मसूड़ों को मजबूती प्रदान करता है, लौंग के तेल में एंटी – इंफ्लेमेटरी गुण विद्यमान है, जो दांत के दर्द में राहत प्रदान करते हैं, पुदीना के तेल में एंटी – वायरल और एंटी – फंगल गुण विद्यमान होते हैं जो मुंह की दुर्गन्ध दूर करने में सहायक होते हैं, नीलगिरी का तेल मुँह के बैक्टीरिया को रोकने में लाभकारी होता है, और तुलसी के तेल में जीवाणुनाशक गुण पाए जाते हैं जोकि दांतो की सड़न से बचाते हैं.

बैक्टीरिया और फंगस पर प्राकृतिक तेलों की निर्णायक मार

पतंजलि अनुसन्धान संस्थान के वैज्ञानिकों ने दन्त कांति गंडूष ऑयल पुलिंग पर शोध कर यह निष्कर्ष निकाला कि यह औषधीय तेल दांतो में पाए जाने वाले बैक्टीरिया और यीस्ट जोकि फंगस का एक प्रकार है, को डोज़ डेपेंडेंटली समाप्त करने की क्षमता रखता है. दन्त कांति गंडूष ऑयल पुलिंग के प्राकृतिक पादप घटको का रासायनिक विश्लेषण GC – MS /MS ने किया, जिससे यह प्रमाणित हुआ कि इस तेल में लिमोनीन, यूकलिप्टोल, लिनालूल, मेंथोल, एस्ट्राजॉल और यूजीनॉल आदि  प्रभावशाली घटक पाए गए हैं जोकि मुख के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं. दन्त कांति गंडूष ऑयल पुलिंग मुंह में पाए जाने वाले बैक्टीरिया और फंगस जैसे की Streptococcus pyogenes , Proteus mirabilis , Streptococcus mutans , Candida albicans , को समाप्त करने में महत्पूर्ण भूमिका निभाता है. Streptococcus mutans जोकि दांतो में होने वाली cavity का प्रमुख कारक है, यह बैक्टीरिया अपने चारों एक बायोफिल्म बना लेता है, जिसे समाप्त करने में यह तेल प्रभावकारी है.

बायोफिल्म बैक्टीरिया के बनाई गई एक चिपचिपी परत होती है जो उन्हें दवाओं से बचाती है. इस वजह से कई बार एंटीबायोटिक दवाएं भी बेअसर हो जाती हैं. साथ ही साथ यह तेल इस बैक्टीरिया की एसिड बनाने के क्षमता, जिसे एसिडोसिस कहा जाता है, कम करता है. यह तेल Candida albicans जैसे बैक्टीरिया जोकि अधिकांश रूप में मुंह में मिलने वाला बैक्टीरिया है, उसको समाप्त कर उसके द्वारा बनाई गई बायोफिल्म को भेदने की क्षमता रखता है. SEM तकनीक द्वारा किए गए विश्लेषण में पुष्टि हुई कि यह तेल Streptococcus mutans और Candida albicans  बैक्टीरिया को एक साथ, क्योंकि अधिकांश समय यह दोनों ही बैक्टीरिया एक साथ पाए जाते हैं और अलग-अलग रूप से भी समाप्त कर सकता है.

मुख स्वास्थ्य से समग्र शरीर स्वास्थ्य की रक्षा

टेढ़े – मेढ़े दांतो को सीधा करने के लिए लगाए जाने वाले ब्रेसेज़, डेंटल प्लाक को बढ़ावा देते है. यह डेंटल प्लाक बायोफिल्म पारम्परिक और आधुनिक सिलिकॉन, दोनों प्रकार के ब्रेसेज़ पर बनती है. इन बायोफिल्म्स को दन्त कांति गंडूष ऑयल पुलिंग खुराक की मात्रा के आधार पर समाप्त करने में प्रभावी पाया गया है.

आज के समय में जहां एलोपैथिक और केमिकल-आधारित उत्पादों का बाज़ार छाया हुआ है, वहीं दंतकांति गंडूष ऑयल पुलिंग जैसे आयुर्वेदिक उत्पाद न केवल स्वदेशी परंपरा का संरक्षण करते हैं बल्कि मानव स्वास्थ्य को प्राकृतिक ढंग से सुरक्षित भी रखते हैं. आयुर्वेद को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने और उसका वैश्विक प्रचार-प्रसार करने का जो अभियान पतंजलि ने शुरू किया है, दंतकांति गंडूष उसी का एक सशक्त उदाहरण है.

दंतकांति गंडूष ऑयल पुलिंग का महत्व केवल मौखिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. आयुर्वेद के अनुसार मुख शरीर का प्रवेश द्वार है और इसकी स्वच्छता का सीधा संबंध पाचन, श्वसन और हृदय स्वास्थ्य से भी है. जब मुख में बैक्टीरिया पनपते हैं तो वे केवल दांत और मसूड़ों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि रक्त प्रवाह के साथ पूरे शरीर में पहुंच जाते हैं. आधुनिक शोध भी इस बात को मानता है कि खराब ओरल हेल्थ का संबंध हृदय रोग, मधुमेह और स्ट्रोक तक से है. इस दृष्टिकोण से देखें तो दंतकांति गंडूष केवल एक माउथ क्लीनर नहीं बल्कि एक समग्र स्वास्थ्य रक्षक है.

परंपरा और विज्ञान का सफल संगम

पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का यह संगम ही पतंजलि के अनुसंधान कार्यों की सबसे बड़ी विशेषता है. दंतकांति गंडूष ऑयल पुलिंग ने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर सनातन ज्ञान को वैज्ञानिक कसौटी पर प्रमाणित कर प्रस्तुत किया जाए तो वह न केवल आज की पीढ़ी के लिए उपयोगी होगा बल्कि आने वाले समय में स्वास्थ्य सुरक्षा का मजबूत आधार भी बनेगा.

अंततः यही कहा जा सकता है कि दंतकांति गंडूष ऑयल पुलिंग आयुर्वेद की उस अमर परंपरा का आधुनिक स्वरूप है, जो जीवन को प्राकृतिक ढंग से स्वस्थ और संतुलित बनाए रखने का मार्ग दिखाती है. यह केवल एक उत्पाद नहीं बल्कि एक संदेश है कि अगर हम अपने मूल की ओर लौटें, तो हर समस्या का समाधान प्रकृति की गोद में सहज ही मिल सकता है. आयुर्वेद की इसी पुनर्स्थापना और वैज्ञानिक रूपांतरण का परिणाम है कि दंतकांति गंडूष ऑयल पुलिंग, और यह, वह शक्ति है जिससे लाखों लोगों के जीवन में मुस्कान आएगी और ओरल हेल्थ में सुधार होगा.

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पतंजलि का दावा, माइक्रोप्लास्टिक से फेफड़ों की सुरक्षा संभव, क्या कहती है सूक्ष्म-कोशिकीय जांच?

पतंजलि का दावा, माइक्रोप्लास्टिक से फेफड़ों की सुरक्षा संभव, क्या कहती है सूक्ष्म-कोशिकीय जांच?


Health News: आज प्लास्टिक हर जगह मौजूद है. वह बोतल जिसमें आप पानी पीते हैं, वह पैकेट जिसमें आपके बच्चे चिप्स खाते हैं, यहां तक कि दूध की थैली, दवाइयों की पैकिंग और हमारे दैनिक जीवन में काम आने वाली अधिकांश सभी वस्तुओं में. यह प्लास्टिक अब सिर्फ बाहरी जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे शरीर में प्रवेश कर चुका है.

माइक्रोप्लास्टिक वे अत्यंत छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जो 5 मिलीमीटर से भी छोटे होते हैं-कई बार तो 10 माइक्रोन से भी कम. एक मिलीमीटर में 1000 माइक्रोन होते हैं और अगर हम इसे आम भाषा में समझें तो ये कण सरसों के दाने से भी छोटे होते हैं. आज माइक्रोप्लास्टिक पृथ्वी के हर कोने में पाया जा रहा है—एवरेस्ट की ऊंचाइयों से लेकर समुद्र की गहराइयों तक.

अब तो यह हमारे शरीर के अंदर भी पहुंच चुका है. वैज्ञानिक शोध में यह सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक हमारे रक्त, प्लाज्मा, और यहां तक कि गर्भवती महिलाओं के एम्नियोटिक फ्लूइड (गर्भाशय द्रव) में भी पाया गया है. एक अध्ययन के मुताबिक, आज का औसत व्यक्ति हर सप्ताह एक क्रेडिट कार्ड जितना माइक्रोप्लास्टिक अपने शरीर में ले रहा है—या तो सांस के जरिए, भोजन से या जल के माध्यम से.

फेफड़ों पर मार: माइक्रोप्लास्टिक से फाइब्रोसिस तक

माइक्रोप्लास्टिक शरीर में पहुंचकर विभिन्न प्रकार की बीमारियों को जन्म देता है, विशेष रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है. यह कण श्वसन प्रणाली में जाकर फेफड़ों की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं. इससे फाइब्रोसिस जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं, जिसमें फेफड़ों की कोशिकाएं कठोर हो जाती हैं और फेफड़े ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाते.

श्वसन प्रणाली की संरचना और कार्य

श्वसन प्रणाली के प्रमुख अंग हैं: नाक, मुंह, गला, स्वरयंत्र (वॉइस बॉक्स), श्वास नली और फेफड़े. हम जब सांस लेते हैं, तो हवा नाक और मुंह से होते हुए गले से फेफड़ों में जाती है और सबसे नीचे स्थित एल्वियोलाई तक पहुंचती है. यहीं पर ऑक्सीजन का आदान-प्रदान होता है. आप यह जानकर चकित होंगे कि हमारी श्वसन प्रणाली लगभग 2400 किमी लंबी होती है, जिससे ऑक्सीजन शरीर के हर हिस्से तक पहुंचती है.

पतंजलि अनुसंधान संस्थान का अभिनव प्रयास: ब्रोन्कोम

जब 2022 में प्रकाशित एक प्रतिष्ठित शोधपत्र में यह बात सामने आई कि माइक्रोप्लास्टिक फेफड़ों तक पहुंच चुका है, तब पतंजलि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर कार्य करना आरंभ किया. 2023 में इस शोध की शुरुआत की गई और एक साल से अधिक गहन अध्ययन के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि माइक्रोप्लास्टिक के प्रभाव को आयुर्वेद की सहायता से कम किया जा सकता है. ब्रोन्कोम एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि है जिसे विशेष रूप से फेफड़ों की सफाई और सशक्तिकरण के लिए विकसित किया गया है.

शोध प्रक्रिया और वैज्ञानिक प्रमाण

इस शोध में लगभग 88 चूहों को माइक्रोप्लास्टिक कणों के संपर्क में लाया गया. इसके बाद इन्हें ब्रोन्कोम औषधि दी गई. उनके श्वसन तंत्र पर इसका क्या असर पड़ा, यह जानने के लिए Flexivent System नामक एक मशीन का प्रयोग किया गया, जो श्वसन तंत्र की कार्यक्षमता मापने में सक्षम है.

शोध के दौरान यह पाया गया कि ब्रोन्कोम ने चूहों के फेफड़ों की कार्यक्षमता को डोज़ डिपेंडेंट तरीके से पुनः स्थापित किया. इसका मतलब है कि जितनी अधिक मात्रा में ब्रोन्कोम दिया गया, उतना ही अधिक सुधार देखा गया.

क्या कहती है सूक्ष्म-कोशिकीय जांच?

श्वसन तंत्र की सूजन को समझने के लिए BALF (Bronchoalveolar Lavage Fluid) नामक तकनीक द्वारा चूहों के फेफड़ों से तरल पदार्थ एकत्र कर उसकी जांच की गई. इसमें पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक के कारण ल्यूकोसाइट्स, न्यूट्रोफिल्स और लिम्फोसाइट्स जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं का स्तर बढ़ गया था. लेकिन ब्रोन्कोम के प्रयोग से इन सभी कोशिकाओं का स्तर डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम हुआ. इतना ही नहीं, सूजन से जुड़े जीन जैसे IL-6, IL-8 और TNF-alpha का स्तर भी ब्रोन्कोम के सेवन से घटा.

हिस्टोपैथोलॉजी में भी स्पष्ट अंतर

फेफड़ों की ऊतकों की जांच (हिस्टोपैथोलॉजी) में भी यह सिद्ध हुआ कि माइक्रोप्लास्टिक से क्षतिग्रस्त वायु मार्ग ब्रोन्कोम के प्रयोग से पहले जैसे हो गए. फेफड़ों की इलास्टिसिटी, हवा छोड़ते समय लगने वाला दबाव और हवा के बहाव की गति जैसे पैरामीटर्स में भी सुधार देखा गया. THP-1 सेल्स (मानव आधारित सेल लाइन) पर किए गए प्रयोगों में भी ब्रोन्कोम ने सकारात्मक परिणाम दिए और डोज़ डिपेंडेंट प्रभाव दिखाया.

निष्कर्ष: आयुर्वेद के माध्यम से आधुनिक संकट का समाधान

आज जब माइक्रोप्लास्टिक से हम चारों ओर से घिरे हुए हैं और जब यह हमारे शरीर के अंदर पहुंचकर बीमारियों को जन्म दे रहा है, ऐसे समय में ब्रोन्कोम जैसी आयुर्वेदिक औषधि एक आशा की किरण बनकर सामने आई है.

यह शोध न केवल आयुर्वेद की वैज्ञानिकता को पुष्ट करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि अगर समर्पण और अनुसंधान के साथ प्रयास किया जाए, तो प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियां आधुनिक समस्याओं का समाधान बन सकती हैं.

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कमरे में लगी हैं LED लाइट्स तो हो जाइए सावधान, जानें कैसे कर रहीं दिमाग को कंफ्यूज

कमरे में लगी हैं LED लाइट्स तो हो जाइए सावधान, जानें कैसे कर रहीं दिमाग को कंफ्यूज


How Blue Light Affects Biological Clock: भले ही LED और दूसरी आर्टिफिशियल लाइट्स को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता हो, लेकिन इनसे निकलने वाली ब्लू लाइट नींद पर बुरा असर डाल सकती है और बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है. हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल में पब्लिश एक रिसर्च पेपर के अनुसार, आर्टिफिशियल रोशनी के आने से पहले सूर्य ही रोशनी का मुख्य सोर्स था और लोग शाम के समय काफी हद तक अंधेरे में रहते थे, आज हालात बदल चुके हैं शाम होते ही चारों तरफ रोशनी रहती है और हम इसे सामान्य मान लेते हैं. 

लेकिन इस रोशनी की कीमत हमें सेहत के रूप में चुकानी पड़ सकती है. रात के समय रोशनी शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक यानी सर्केडियन रिदम को बिगाड़ देती है.  इससे नींद प्रभावित होती है और रिसर्च बताती है कि आगे चलकर यह कैंसर, डायबिटीज़, हार्ट डिजीज और मोटापे जैसी समस्याओं का भी कारण बन सकती है. 

ब्लू लाइट क्या है?

हर रंग की रोशनी का असर एक जैसा नहीं होता. ब्लू वेवलेंथ दिन के समय फायदेमंद होती हैं, ये ध्यान, रिएक्शन टाइम और मूड को बेहतर बनाती हैं. लेकिन रात में यही ब्लू लाइट सबसे ज्यादा नुकसानदायक साबित होती है. स्क्रीन वाले इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और एनर्जी-एफिशिएंट लाइटिंग के बढ़ते इस्तेमाल से सूर्यास्त के बाद ब्लू लाइट के संपर्क में रहने का समय लगातार बढ़ रहा है.

रोशनी और नींद

हर व्यक्ति की सर्केडियन रिदम थोड़ी अलग होती है, लेकिन औसतन यह लगभग 24 घंटे 15 मिनट की होती है. देर रात तक जागने वालों की बायोलॉजिकल क्लॉक थोड़ी लंबी होती है, जबकि जल्दी सोने-जागने वालों की थोड़ी छोटी. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. चार्ल्स जाइस्लर ने 1981 में दिखाया था कि दिन की प्राकृतिक रोशनी शरीर की अंदरूनी घड़ी को वातावरण के साथ तालमेल में रखती है.

क्या रात की रोशनी वाकई नुकसानदायक है?

कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि रात में रोशनी के संपर्क में रहना, जैसे नाइट शिफ्ट में काम करना, डायबिटीज, हार्ट रोग और मोटापे से जुड़ा हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि रात की रोशनी ही इन बीमारियों की सीधी वजह है, और इसके पीछे के कारणों पर अभी और शोध की जरूरत है. 

एलईडी से क्या होती है दिक्कत

Vision Lighting के अनुसार, LED लाइट्स में बहुत तेजी से ऑन-ऑफ होने वाला फ्लिकर होता है, जिसे आंखें भले न देखें, लेकिन दिमाग महसूस करता है. इससे आंखों में थकान, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और रात में बेचैनी बढ़ सकती है. दूसरी ओर, नीली रोशनी दिमाग को दिन होने का संकेत देती है और मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है. रिसर्च बताती है कि रात में नीली रोशनी के संपर्क से नींद देर से आती है. यही वजह है कि आधुनिक घरों की तेज LED लाइटें नींद की समस्याओं को बढ़ा रही हैं.

ये भी पढ़ें-कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आपकी आंखें भी दे सकती हैं किडनी की बीमारी का संकेत, डॉक्टर से जानें इन 5 लक्षणों का सच

आपकी आंखें भी दे सकती हैं किडनी की बीमारी का संकेत, डॉक्टर से जानें इन 5 लक्षणों का सच


Eye Symptoms Of Kidney Disease: आमतौर पर आंखों को दिल का आईना कहा जाता है, लेकिन सच यह है कि आंखें आपकी किडनी की सेहत के बारे में भी बहुत कुछ बता सकती हैं. किडनी और आंखों की बनावट व काम करने की क्षमताओं में कई समानताएं होती हैं, इसलिए जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो उसके संकेत कई बार सबसे पहले आंखों में दिखने लगते हैं.

अधिकतर लोग किडनी की बीमारी को पैरों में सूजन या लगातार थकान से जोड़कर देखते हैं, लेकिन कुछ अहम लक्षण ऐसे भी होते हैं जो आंखों के जरिए सामने आते हैं. नई दिल्ली स्थित विजन आई केयर सेंटर के कंसल्टेंट ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट डॉ. प्रणव कृष्ण पटेल के मुताबिक, अगर इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है.

पफी आईलिड्स

सुबह उठते ही आंखों के आसपास सूजन दिखना किडनी की गड़बड़ी का शुरुआती संकेत हो सकता है. जब किडनी प्रोटीन को ठीक से फिल्टर नहीं कर पाती, तो शरीर में फ्लूड जमा होने लगता है, जिसका असर सबसे पहले आंखों के नाजुक हिस्से पर दिखता है. ऐसे में नमक का सेवन कम करना, प्रोटीन लेवल पर नजर रखना और किडनी फंक्शन टेस्ट कराना जरूरी है.

धुंधली नजर

किडनी की बीमारी से जुड़ा हाई ब्लड प्रेशर या बढ़ा हुआ ब्लड शुगर आंखों की रेटिना की महीन नसों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे नजर धुंधली होने लगती है. यह बदलाव कई बार धीरे-धीरे होता है, इसलिए नियमित आई चेकअप और बीपी व शुगर को कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है.

आंखों में सूखापन

जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर में टॉक्सिन जमा होने लगते हैं. इसका असर आंसुओं के निर्माण पर भी पड़ सकता है, जिससे आंखों में सूखापन, जलन या रेत जैसी चुभन महसूस होती है. पर्याप्त पानी पीना, लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल और लक्षण बने रहने पर डॉक्टर को बताना जरूरी है, खासकर अगर साथ में थकान या सूजन भी हो.

लाल या ब्लडशॉट आंखें

आंखों में जरूरत से ज्यादा लाल नसें दिखना या आंखों का लगातार लाल रहना हाई ब्लड प्रेशर या शरीर में टॉक्सिन जमा होने का संकेत हो सकता है, जो अक्सर किडनी की गंभीर अवस्था से जुड़ा होता है. ऐसे में शराब, कैफीन और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाना और अन्य लक्षणों के साथ यह समस्या हो तो मेडिकल जांच कराना जरूरी है.

आंखों का पीला पड़ना

अगर किडनी फेल होने के कारण शरीर में यूरिया जैसे जहरीले तत्व बढ़ जाएं या लिवर पर असर पड़ने लगे, तो आंखों का सफेद हिस्सा पीला दिख सकता है. यह स्थिति मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है और तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करना जरूरी होता है.

आंखें सिर्फ देखने का जरिया नहीं हैं, बल्कि आपकी किडनी की सेहत का भी संकेत देती हैं, इन बदलावों को नजरअंदाज न करें, क्योंकि समय पर पहचान और इलाज आपकी जान बचा सकता है.

इसे भी पढ़ें- Causes Of Body Lumps: शरीर पर बार-बार आ रही है सूजन या बन रही है गांठ, जानिए कब हो जाना चाहिए सावधान?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है पीरियड्स का दर्द? जानिए इसके कारण और राहत पाने के आसान तरीके

सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है पीरियड्स का दर्द? जानिए इसके कारण और राहत पाने के आसान तरीके


Does Winter Worsen Menstrual Cramps: कई महिलाओं को यह महसूस होता है कि सर्दियों में उनके पीरियड्स का दर्द ज्यादा बढ़ जाता है. अगर आपको भी ठंड के मौसम में तेज ऐंठन, मूड में बदलाव या ज्यादा बेचैनी महसूस होती है, तो आप अकेली नहीं हैं. रिसर्च और क्लिनिकल अनुभव बताते हैं कि सर्दियां पीरियड्स से जुड़ी परेशानियों को कई तरीकों से प्रभावित कर सकती हैं. चलिए आपको बताते हैं कि अगर सर्दियों में पीरियड्स में ज्यादा पेन हो रहा है, तो कैसे आप इनको कंट्रोल में रख सकते हैं और इसके कारण क्या होते हैं.

सर्दियों में पीरियड पेन क्यों बढ़ जाता है?

ठंड के मौसम में तापमान, धूप और शरीर की काम करने के तरीके में बदलाव आते हैं, जिससे पीरियड्स के लक्षण ज्यादा तीव्र लग सकते हैं, इसमें- 

ठंड में मांसपेशियों का सख्त होना

Dr Shivika Gupta, Obstetrician-Gynecologist (OBGYN) ने इसको लेकर अपने सोशल मीडिया वीडियो में बताया है कि ठंड पड़ते ही शरीर गर्मी बचाने के लिए ब्लड फ्लो को सीमित कर देता है. इससे यूट्रस की मांसपेशियां ज्यादा सख्त होकर सिकुड़ती हैं, जिससे ऐंठन और दर्द बढ़ सकता है.

विटामिन D की कमी

सर्दियों में धूप कम मिलने से विटामिन D का स्तर घट जाता है. विटामिन D सूजन कम करने और हार्मोन संतुलन में अहम भूमिका निभाता है. इसकी कमी से दर्द, थकान और मूड स्विंग्स बढ़ सकते हैं.

दर्द के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता

ठंड में शरीर दर्द को ज्यादा महसूस करता है. इसी वजह से सामान्य ऐंठन भी सर्दियों में ज्यादा तेज लग सकती है.

हार्मोनल बदलाव

सर्दियों में सेरोटोनिन और मेलाटोनिन जैसे हार्मोन्स में बदलाव हो सकता है, जिससे चिड़चिड़ापन, उदासी और पीएमएस के लक्षण बढ़ जाते हैं.

फिजिकल एक्टिविटी की कमी

ठंड के कारण लोग कम चलते-फिरते हैं. इससे पेल्विक एरिया में ब्लड फ्लो कम होता है और दर्द बढ़ सकता है.

सर्दियों में पीएमएस और मासिक स्वास्थ्य पर असर

इस मौसम में कई महिलाओं को भारीपन, पेट फूलना, मीठा खाने की इच्छा, ज्यादा थकान, नींद की समस्या, चिड़चिड़ापन और एक्सरसाइज की इच्छा कम लगने जैसी दिक्कतें होती हैं.

कैसे पहचानें कि सर्दी आपकी परेशानी बढ़ा रही है?

अगर सर्दियों में ऐंठन ज्यादा हो, पेल्विक दबाव बढ़े, पीएमएस के लक्षण तेज हों, थकान और कमर दर्द ज्यादा हो या मूड ज्यादा खराब रहे, तो यह मौसम से जुड़ा असर हो सकता है.

सर्दियों में पीरियड पेन कैसे कम करें?

  • गर्म पानी की बोतल या हीट पैड का इस्तेमाल करें
  • हल्की एक्सरसाइज, योग या वॉक जारी रखें
  • विटामिन D से भरपूर फूड लें और जरूरत हो तो डॉक्टर से सप्लीमेंट पर बात करें
  • गुनगुना पानी और हर्बल टी पिएं
  • सूजन कम करने वाला खाना जैसे फल, सब्जियां, नट्स शामिल करें
  • तनाव कम करने की कोशिश करें और पर्याप्त नींद लें
  • अपने साइकिल और लक्षणों को ट्रैक करें

डॉक्टर को दिखाना कब जरूरी?

Continentalhospitals की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर दर्द बहुत ज्यादा हो, कई दिनों तक बना रहे, कामकाज प्रभावित करे, बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो, पीरियड्स अनियमित हों या घरेलू उपायों से राहत न मिले, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें. एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड्स या पीसीओएस जैसी समस्याएं भी इसकी वजह हो सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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