क्या ब्रांडी पीने से वाकई ठीक हो जाती है खांसी, डॉक्टर से जानें यह बात कितनी सच?

क्या ब्रांडी पीने से वाकई ठीक हो जाती है खांसी, डॉक्टर से जानें यह बात कितनी सच?


Does Brandy Cure Cough: सर्दियों में खांसी, जुकाम या गले में खराश होने पर कई लोग ब्रांडी या रम पीने की सलाह देते हैं. माना जाता है कि इससे गला साफ होता है और जुकाम में राहत मिलती है. लेकिन डॉक्टर इस घरेलू नुस्खे को पूरी तरह सही नहीं मानते. एक्सपर्ट का साफ कहना है कि खांसी या जुकाम के इलाज के तौर पर किसी भी तरह की शराब पीना सही तरीका नहीं है. चलिए आपको इस मिथक की सच्चाई बताते हैं. 

ब्रांडी इलाज नहीं है

इस मिथक को लेकर डॉक्टर बताते हैं कि गर्म पानी के साथ रम या ब्रांडी पीने से सिर्फ थोड़ी देर के लिए गर्माहट महसूस होती है, जिससे लक्षणों में हल्की राहत मिल सकती है. लेकिन यह किसी वायरल इंफेक्शन जैसे खांसी या सर्दी का इलाज नहीं है. उल्टा, नियमित रूप से शराब पीने से इम्युनिटी कमजोर हो सकती है. कई एक्सपर्ट का मानना है कि शराब ब्लड वेसल्स को फैलाती है, जिससे शरीर में गर्माहट महसूस होती है. ऐसे में ब्रांडी या रम गले की खराश पर हल्का सुन्न करने वाला असर डाल सकती है. अगर इसे शहद, नींबू या मसालों के साथ लिया जाए, तो कुछ देर के लिए आराम मिल सकता है, लेकिन यह सिर्फ सतही राहत है, इलाज नहीं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

कुछ लोग बच्चों को भी सर्दी और जुकाम से बचाने के लिए एक चम्मच ब्रांडी पिला देते हैं. इसको लेकर डॉ रवि मलिक ने अपने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करके इसके नुकसान के बारे में विस्तार से बताया है. उनके अनुसार, ब्रांडी सर्दी-जुकाम का इलाज नहीं है. यह सिर्फ एक गलत धारणा है, जो समय के साथ घरों में आम हो गई है. उनके अनुसार, ब्रांडी खासतौर पर बच्चों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है. इससे शरीर में ब्लड ग्लूकोज का स्तर तेजी से गिर सकता है, जिससे दौरे पड़ने का खतरा रहता है. इतना ही नहीं, यह सांस से जुड़ी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती है और बच्चे के दिमाग के विकास पर भी बुरा असर डाल सकती है.

तो फिर क्या करें?

डॉक्टरों का कहना है कि खांसी और जुकाम में शराब की जगह गर्म हर्बल चाय ज्यादा फायदेमंद होती है. एक रिसर्च के मुताबिक, गर्म पेय लेने से खांसी, बहती नाक और छींक जैसे लक्षणों में तुरंत राहत मिल सकती है. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि सर्दियों में खांसी-जुकाम होने पर शरीर को हाइड्रेट रखें, भरपूर आराम करें, गुनगुने तरल पदार्थ पिएं और भाप लें. डॉक्टरों के अनुसार, ये उपाय ब्रांडी या रम पीने से कहीं ज्यादा सुरक्षित और असरदार हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें 

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भरपूर नींद के बाद भी दोपहर में महसूस होती है कमजोरी? शरीर में हो सकती है इस एक विटामिन की कमी

भरपूर नींद के बाद भी दोपहर में महसूस होती है कमजोरी? शरीर में हो सकती है इस एक विटामिन की कमी


Why Do I Feel Tired In The Afternoon: दोपहर होते-होते अचानक थकान, सुस्ती और नींद आना आजकल एक आम समस्या बनती जा रही है. कई लोग पूरी नींद लेने, एक्सरसाइज करने और हेल्दी डाइट फॉलो करने के बावजूद दोपहर के बाद खुद को पूरी तरह एनर्जी-लेस महसूस करते हैं. इसको अक्सर इसे काम का दबाव, उम्र या मानसिक थकान मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इसके पीछे एक अहम पोषक तत्व की कमी जिम्मेदार हो सकती है विटामिन D.

डॉ. शोवाना वैष्णवी, इंडियन एक्सप्रेस के अपने एक आर्टिकल में बताती हैं कि विटामिन D सिर्फ हड्डियों के लिए ही नहीं, बल्कि शरीर की एनर्जी लेवल बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है. इसकी कमी होने पर शरीर की कोशिकाएं सही तरीके से काम नहीं कर पातीं, जिससे दिन के बीच में अचानक थकान महसूस होने लगती है. सामान्य तौर पर विटामिन D का स्वस्थ स्तर 20 से 50 ng/mL के बीच माना जाता है, लेकिन बड़ी आबादी इससे काफी नीचे है.

भारत में विटामिन D की कमी क्यों आम है?

धूप से भरपूर देश होने के बावजूद भारत में विटामिन D की कमी एक गंभीर समस्या बन चुकी है. कई स्टडी के अनुसार, शहरी भारत में 70 प्रतिशत से ज्यादा लोग इसकी कमी से जूझ रहे हैं। इसके पीछे प्रमुख कारण हैं कि ज्यादातर समय घर या ऑफिस के अंदर रहना, वायु प्रदूषण के कारण यूवी किरणों का कमजोर होना और धूप से बचने की आदत. विटामिन D माइटोकॉन्ड्रिया के सही कामकाज के लिए जरूरी होता है, जिन्हें शरीर की एनर्जी फैक्ट्री कहा जाता है. जब यह प्रक्रिया प्रभावित होती है, तो एनर्जी प्रोडक्शन भी घटने लगता है.

दोपहर की थकान कैसे बढ़ती है?

विटामिन D की कमी से शरीर एटीपी यानी एनर्जी करंसी पर्याप्त मात्रा में नहीं बना पाता. इसका सीधा असर मांसपेशियों और दिमाग पर पड़ता है. यह सेरोटोनिन नामक न्यूरोट्रांसमीटर के निर्माण में भी मदद करता है, जो मूड और एनर्जी को नियंत्रित करता है. दोपहर के समय शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर स्वाभाविक रूप से गिरता है. अगर विटामिन D की कमी हो, तो शरीर इस बदलाव को संतुलित नहीं कर पाता और सुस्ती हावी हो जाती है. इसके अलावा, सूजन बढ़ने से नींद-सी महसूस होने लगती है.

सर्कैडियन रिदम का रोल

शरीर की प्राकृतिक घड़ी के अनुसार दोपहर 2 से 4 बजे के बीच हल्की थकान सामान्य मानी जाती है. लेकिन विटामिन D की कमी इस सामान्य थकान को ज्यादा गहरा बना देती है. यह नींद-जागने के चक्र और मेलाटोनिन के संतुलन में भी भूमिका निभाता है.

अन्य कारण भी हैं जिम्मेदार

भारी और ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला लंच, पानी की कमी, प्रोटीन का कम सेवन और लंबे समय तक बैठे रहना भी दोपहर की थकान को बढ़ा सकता है.

क्या करें?

डॉक्टरों के अनुसार, इस समस्या से निपटने के लिए सिर्फ ज्यादा सोना काफी नहीं है. मेडिकल सलाह के बाद विटामिन D सप्लीमेंट, संतुलित भोजन, लंच के बाद हल्की वॉक और सीमित लेकिन नियमित धूप शरीर की एनर्जी वापस लाने में मदद कर सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सस्ता भी और दमदार भी! महज इतने रुपये में मिलेगा 100 ग्राम प्रोटीन, जानें पूरे दिन का मील प्लान

सस्ता भी और दमदार भी! महज इतने रुपये में मिलेगा 100 ग्राम प्रोटीन, जानें पूरे दिन का मील प्लान


How To Get 100g Protein On A Vegetarian Diet: शाकाहारी डाइट में पर्याप्त प्रोटीन लेना अक्सर जरूरत से ज्यादा मुश्किल बताकर पेश किया जाता है. फिटनेस कंटेंट देखिए तो ऐसा लगता है जैसे बिना व्हे प्रोटीन, इम्पोर्टेड सुपरफूड्स या सख्त मील प्लान के प्रोटीन टारगेट पूरा ही नहीं हो सकता. लेकिन हकीकत इससे अलग है. भारतीय किचन में पहले से ही ऐसे कई फूड्स मौजूद हैं, जिनसे एक मजबूत हाई-प्रोटीन वेज डाइट बनाई जा सकती है, बस सही चुनाव और बेहतर कॉम्बिनेशन की जरूरत होती है.

यही बात न्यूट्रिशनिस्ट खुशी छाबड़ा  ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में समझाई है. उन्होंने यह मिथक तोड़ा है कि प्रोटीन पूरा करने के लिए मांस या सप्लीमेंट जरूरी हैं. उनका कहना है कि बिना व्हे, पूरी तरह शाकाहारी और बजट-फ्रेंडली डाइट से भी रोज़ाना 100 ग्राम प्रोटीन हासिल किया जा सकता है. उनके अनुसार-

दिन की शुरुआत में इसका रखें ध्यान

खुशी छाबड़ा बताती हैं कि सुबह की शुरुआत भुने हुए अलसी के बीजों से की जा सकती है, जिससे करीब 2 ग्राम प्रोटीन मिलता है. चाहें तो कद्दू के बीज या चिया सीड्स भी शामिल किए जा सकते हैं. 

 बिना भारी कुकिंग के प्रोटीन वाला नाश्ता

अब बात करते हैं नाश्ते की, तो आप इसमें होल व्हीट वेज पनीर सैंडविच के साथ ग्रीक योगर्ट या स्कायर योगर्ट लिया जा सकता है. इससे करीब 15 ग्राम प्रोटीन मिलता है. जो लोग पनीर नहीं खाते, उनके लिए टोफू एक आसान विकल्प है.

मिड-मॉर्निंग के लिए क्या है विकल्प?

मिड-मॉर्निंग में आपके पास बादाम और अमरूद जैसे फलों का कॉम्बिनेशन है, इसमें करीब 6 ग्राम प्रोटीन आपको मिलता है. यह एनर्जी बनाए रखने में मदद करता है और साथ ही साथ मील्स के बीच लंबा गैप नहीं होने देता.

 

लंच में आपके पास क्या होता है विकल्प?

आप बात करते हैं दोपहर के खाने की. लंच में सबसे ज्यादा प्रोटीन मिलता है करीब 41 ग्राम. इसमें होल व्हीट चपाती, मसाला सोया चंक्स, मूंग दाल और सब्जियां शामिल हैं. विकल्प के तौर पर मसूर दाल या टोफू भी लिया जा सकता है.

जंक के बिना शाम का स्नैक

शाम को मखाना वेज चाट, ऊपर से टोफू और बीज डालकर, साथ में अदरक की चाय ली जा सकती है. इससे लगभग 13 ग्राम प्रोटीन मिलता है.

डिनर में क्या खास?

रात के खाने में बेसन चिल्ला, चटनी और रायता शामिल किया गया है, जिससे करीब 26 ग्राम प्रोटीन मिलता है. इसमें आपके पास मूंग दाल चिल्ला या टोफू बेस्ड रायता भी अच्छे विकल्प हैं. पूरे दिन का यह प्लान करीब 103 ग्राम प्रोटीन, 1500 से 1800 कैलोरी देता है और इसकी लागत लगभग 220 रुपये प्रति दिन बताई गई है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिना डॉक्टर की सलाह के लेते हैं सर्दी-खांसी की दवा, जानें इससे सेहत को कितना नुकसान?

बिना डॉक्टर की सलाह के लेते हैं सर्दी-खांसी की दवा, जानें इससे सेहत को कितना नुकसान?


ठंड का मौसम आते ही सर्दी, जुकाम, खांसी और गले में खराश की शिकायतें आम हाे जाती है. ऐसे में ज्यादातर लोगों डॉक्टर के पास जाने के बजाय सीधे मेडिकल स्टोर का रुख करते हैं और बिना पर्ची के दवाएं खरीद लेते हैं. रंगीन पैकिंग, जल्दी राहत की दवाएं और हल्की बीमारी का सोचकर ली गई. ये ओवर-द-काउंटर दवाएं कई बार सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि बिना सलाह दवा लेने की यह आदत आगे चलकर दिल, दिमाग, लिवर और किडनी तक को नुकसान पहुंचा सकती है. 

ओवर-द-काउंटर दवाएं हमेशा सुरक्षित नहीं 

नोएडा स्थित मेदांता अस्पताल में ​चिकित्स्क डॉ. अर्पिता कुलश्रेष्ठ ने बताया कि सर्दी-खांसी में इस्तेमाल होने वाली आम ओटीसी दवाओं में डिकंजेस्टेन्ट, एंटीहिस्टामिन, खांसी दबाने वाली दवाएं और दर्द-बुखार की गोलियां शामिल होती है. लोग अक्सर इनके साइड इफेक्ट्स जाने बिना ही इनका सेवन शुरू कर देते हैं. कई घरों में तो इन दवाओं का स्टॉक पहले से ही रखा रहता है. ताकि लक्षण दिखते ही तुरंत गोली खा ली जाए.

इन दवाओं का शरीर पर गहरा असर पड़ता है और अगर व्यक्ति पहले से कोई दूसरी दवा ले रहा हो तो दवाओं के आपसी रिएक्शन का खतरा भी बढ़ जाता है. वहीं डिकंजेस्टेन्ट दवाएं नाक की सूजन कम कर सांस लेने में राहत देती है, लेकिन इनका लगातार इस्तेमाल उल्टा असर भी दिख सकता है. कई दिनों तक लेने पर नाक की सूजन कम कर सांस लेने में राहत देती है, लेकिन इनका लगातार इस्तेमाल उल्टा असर  भी दिख सकता है. 

खांसी दबाने वाली दवाएं और दर्द-बुखार की गोलियां 

डेक्स्ट्रोमेथोर्फन जैसी खांसी दबाने वाली दवाओं का गलत ज्यादा इस्तेमाल दिमाग पर बुरा असर डाल सकता है. इससे चक्कर, भ्रम, अजीब व्यवहार और मूड में बदलाव जैसी समस्याएं देखी जा सकती है. वहीं पेरासिटामोल और इब्रप्रोफेन जैसी दर्द और बुखार की दवाएं जरूरत से ज्यादा लेने पर लिवर और किडनी को नुकसान पहुंचा सकती है. कुछ मामलों में पेट में खून की समस्या और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. 

डॉक्टर क्यों देते हैं चेतावनी?

डॉ. अर्पिता कुलश्रेष्ठ बताती हैं कि आजकल भारतीयों में एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस बढ़ती जा रही है. छोटी से छोटी परेशानी के लिए भी एंटीबायोटिक्स ले लेते हैं. उससे हमारी बॉडी में गट बैक्टीरिया का बैलेंस खराब हो जाता है. साथ ही साथ उन्हीं दवाइयों के प्रति रेजिस्टेंस भी डेवेलोप हो जाती है. आगे जाकर जब हमें उन दवाओं की असल में जरूरत होती है तब तक हमारी बॉडी इतनी रेजिस्टेंस हो जाती है कि वो एंटीबायोटिक्स काम नहीं करती हैं. ज्यादा दवा खाने से हमारे गट बैक्टीरिया पर असर पड़ता है. 

ये भी पढ़ें-कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण 

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कैंसर की ये 17 दवाएं हुई सस्ती, यहां देख लें पूरी लिस्ट

कैंसर की ये 17 दवाएं हुई सस्ती, यहां देख लें पूरी लिस्ट


Which Cancer Drugs Became Cheaper In Budget 2026: बजट 2026-27 में कैंसर मरीजों को बड़ी राहत मिली है. सरकार ने ब्रेस्ट कैंसर, लंग कैंसर, ब्लड कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर और कुछ रेयर व  कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 17 अहम दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी से छूट देने का ऐलान किया है. यह फैसला उन मरीजों के लिए राहत लेकर आया है, जो लंबे समय तक चलने वाले और महंगे इलाज पर निर्भर रहते हैं. इनमें से ज्यादातर दवाएं आधुनिक कैंसर ट्रीटमेंट का हिस्सा हैं. इनमें इम्यूनोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और सेल-बेस्ड ट्रीटमेंट से जुड़ी दवाएं शामिल हैं. बजट 2026-27 में लिया गया यह फैसला हेल्थकेयर को ज्यादा किफायती बनाने और आयातित जीवनरक्षक दवाओं पर मरीजों का आर्थिक बोझ कम करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.

कस्टम ड्यूटी छूट का मतलब क्या है?

कस्टम ड्यूटी वह टैक्स होता है, जो विदेश से भारत आने वाले सामान पर लगाया जाता है. जब कैंसर की दवाओं पर यह टैक्स हटा दिया जाता है, तो उनकी कुल लागत अपने आप कम हो जाती है. आसान शब्दों में कहें तो अब इन दवाओं को आयात करने पर अस्पतालों और कंपनियों को बेसिक कस्टम ड्यूटी नहीं देनी होगी, जिससे मरीजों को ये दवाएं पहले की तुलना में कम कीमत पर मिल सकती हैं.

कैंसर के इलाज के लिए ज्यादा खर्च

कैंसर का इलाज अक्सर लंबे समय तक चलता है और इसमें खर्च भी लगातार बढ़ता जाता है. ऐसे में दवाओं की कीमत में थोड़ी-सी भी कमी मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है. सरकार का यह कदम बताता है कि बजट 2026-27 में कैंसर के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी देश की हेल्थ पॉलिसी के केंद्र में रखा गया है.

किन दवाओं के दाम हुए कम?

1. Ribociclib

2. Abemaciclib

3. Talycabtagene autoleucel

4. Tremelimumab

5. Venetoclax

6. Ceritinib

7. Brigatinib

8. Darolutamide

9. Toripalimab

10. Serplulimab

11. Tislelizumab

12. Inotuzumab ozogamicin

13. Ponatinib

14. Ibrutinib

15. Dabrafenib

16. Trametinib

17. Ipilimumab

इन दवाओं के दाम कम होने के क्या हैं लाभ?

ये दवाएं एडवांस कैंसर के इलाज में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाती हैं और कई मामलों में मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होती हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि इन दवाओं पर कस्टम ड्यूटी हटाने से सरकार ने यह साफ संकेत दिया है कि हेल्थकेयर की लागत कम करना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है. हालांकि कैंसर का कुल इलाज अभी भी महंगा है, लेकिन इस फैसले को मरीजों के आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च को घटाने की दिशा में एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है.

इसे भी पढे़ें- Causes Of Body Lumps: शरीर पर बार-बार आ रही है सूजन या बन रही है गांठ, जानिए कब हो जाना चाहिए सावधान?

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शरीर पर बार-बार आ रही है सूजन या बन रही है गांठ, जानिए कब हो जाना चाहिए सावधान?

शरीर पर बार-बार आ रही है सूजन या बन रही है गांठ, जानिए कब हो जाना चाहिए सावधान?


When Is A Body Lump Dangerous: शरीर में कहीं भी अचानक सूजन या गांठ महसूस होना किसी के लिए भी चिंता की वजह बन सकता है. हालांकि, ज्यादातर गांठें सामान्य और नुकसान नहीं करती हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर बीमारी, यहां तक कि कैंसर का संकेत भी हो सकती हैं. उदाहरण के तौर पर, ब्रेस्ट में गांठ, खासकर 45 से 50 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में, ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षणों में से एक मानी जाती है. इसलिए शरीर में किसी भी तरह की असामान्य गांठ को समझना और सही समय पर डॉक्टर से संपर्क करना बेहद जरूरी है.

कब होती है दिक्कत?

Manipalhospitals की रिपोर्ट के अनुसार, शरीर में गांठ या सूजन कई कारणों से हो सकती है. कई बार यह पूरी तरह बेनाइन यानी बिना- कैंसर वाली होती है, जबकि कुछ स्थितियों में इसके पीछे इंफेक्शन या सूजन जिम्मेदार होती है. बैक्टीरियल या वायरल इंफेक्शन के कारण लिम्फ नोड्स में सूजन आ सकती है या पस से भरी फुंसी बन सकती है, जिसमें दर्द और बुखार भी हो सकता है. इसके अलावा, सिस्ट यानी तरल पदार्थ से भरी थैलियां लिवर, किडनी या त्वचा के नीचे बन सकती हैं, जो आमतौर पर हानिकारक नहीं होतीं, लेकिन बड़ी होने या इंफेक्शन होने पर परेशानी पैदा कर सकती हैं.

कब होती है दिक्कत

रिपोर्ट में बताया गया है कि  चोट या सूजन के कारण भी शरीर के किसी हिस्से में गांठ बन सकती है, खासकर मांसपेशियों और जोड़ों के आसपास. वहीं, कुछ बेनाइन ग्रोथ जैसे लिपोमा  या फाइब्रोएडेनोमा  धीरे-धीरे बढ़ती हैं और आमतौर पर बिना दर्द के होती हैं. हालांकि, कुछ गांठें कैंसर के कारण भी हो सकती हैं, जो अक्सर सख्त होती हैं, हिलती नहीं हैं और तेजी से आकार में बढ़ती हैं. शुरुआती दौर में ये दर्द नहीं करतीं, जिससे लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. 

किन गांठ को लेकर कितनी चिंता करनी चाहिए?

गांठ की जगह भी यह समझने में मदद करती है कि मामला कितना गंभीर हो सकता है. गर्दन में गांठ , थायरॉयड या लार ग्लैंड्स से जुड़ी समस्या या कैंसर का संकेत हो सकती है. ब्रेस्ट में किसी भी तरह की गांठ को गंभीरता से लेना चाहिए, खासकर अगर वह सख्त हो, हिलती न हो, त्वचा या निप्पल में बदलाव के साथ दिखे या तेजी से बढ़ रही हो. बगल या जांघ के पास गांठ लिम्फ नोड्स की सूजन या लिम्फोमा जैसे कैंसर से जुड़ी हो सकती है. पट में गांठ हर्निया, अंगों के बढ़ने या ट्यूमर का संकेत भी हो सकती है.

किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए इग्नोर?

कुछ लक्षण ऐसे होते हैं, जिन पर खास ध्यान देना जरूरी है. अगर गांठ का आकार या बनावट तेजी से बदल रही हो, बिना वजह वजन घट रहा हो, लगातार बुखार या रात में पसीना आता हो, या गांठ के ऊपर की त्वचा में लालिमा, गड्ढे या रंग बदलने जैसे संकेत दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए.

ये भी पढ़ें: नाखूनों से पहचानें सेहत का हाल, ये संकेत हो सकते हैं खतरनाक, तुरंत लें मेडिकल सलाह

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