क्या व्रत रखने से आप चुराते हैं दिल? पाचन तंत्र से लेकर नई कोशिकाएं बनाने की दवा होता है उपवास

क्या व्रत रखने से आप चुराते हैं दिल? पाचन तंत्र से लेकर नई कोशिकाएं बनाने की दवा होता है उपवास


पेट शरीर का अहम और जरूरी हिस्सा होता है. माना जाता है कि अगर पेट सही है तो आधी से ज्यादा बीमारियां अपने आप ठीक हो जाती हैं, लेकिन आज की आरामदायक लाइफस्टाइल की वजह से पेट से जुड़ी बीमारियां हर उम्र के लोगों की परेशानी बन चुके हैं. भूख न लगना, गैस बनना, एसिडिटी, अपच और पेट में भारीपन की समस्या साधारण बन गई है. क्या आप जानते हैं कि एक तरीके से सारी बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है? आइए इसके बारे में जानते हैं.

कितना फायदेमंद होता है उपवास करना?

हम बात कर रहे हैं व्रत यानी उपवास की. भले ही उपवास में खुद को भूखा रखना होता है, लेकिन यह सजा नहीं, बल्कि एक दवा है. पेट से जुड़ी बीमारियों रोगों को एक सीमित समय तक दवा के सहारे चलाया जा सकता है, लेकिन एक समय के बाद दवाओं का असर भी कम हो जाता है. ऐसे में उपवास सजा नहीं, बल्कि शरीर को अंदर से साफ करने का तरीका है, जो कोई दवा भी नहीं कर सकती. उपवास पेट को गहराई से सफाई करता है. इसके अलावा पाचन तंत्र को ठीक करने में मदद करता है और खुद को रिपेयर करने का मौका देने की प्रक्रिया है.

कैसे करना चाहिए व्रत?

अब सवाल है कि उपवास को कैसे किया जा सकता है. सबसे पहले 15 दिन में एक बार उपवास करने से शुरू कर सकते हैं. इसके लिए एकादशी उपयुक्त रहेगी, क्योंकि ये महीने में दो बार पड़ती है. उपवास की शुरुआत में फलाहार लें और उतने ही फल खाएं, जिससे शरीर को एनर्जी मिल सके. पेट भरने के लिए फलों का सेवन न करें. इसके अलावा जितना हो सके, शहद वाला पानी, नारियल पानी, और सादे पानी का सेवन करें. पानी शरीर की सारी गंदगी को बाहर निकालने में मदद करेगा.

क्या व्रत रखने से आती है कमजोरी?

कुछ लोगों को लगता है कि व्रत रखने से कमजोरी महसूस होगी, लेकिन ऐसा नहीं है. यह सिर्फ हमारे मन का वहम होता है, क्योंकि भोजन से शरीर को 30-40 फीसदी ही एनर्जी मिलती है, बाकी एनर्जी पानी, हवा, और आराम करने से मिलती है. ऐसे में यह सोचना गलत है कि उपवास करने से कमजोरी महसूस होगी. जापान के वैज्ञानिक उपवास पर रिसर्च भी कर चुके हैं. साल 2018 में हुए शोध के मुताबिक, व्रत रखने से शरीर खराब कोशिकाओं को हटाकर नई और हेल्दी कोशिकाएं बनाता है. इस प्रक्रिया को ऑटोफैगी कहा जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल की सेहत के लिए एंजियोग्राफी कितनी जरूरी, जानें इसे कराते वक्त क्या सावधानियां जरूरी?

दिल की सेहत के लिए एंजियोग्राफी कितनी जरूरी, जानें इसे कराते वक्त क्या सावधानियां जरूरी?


हमारा दिल लगातार काम करता रहता है. यह हमारे पूरे शरीर में खून पंप करता है और हमें जिंदा रखता है. जब दिल ठीक से काम करता है तो हम हेल्दी महसूस करते हैं. अगर इसमें कोई परेशानी आ जाए तो यह सीधे हमारे पूरे शरीर को प्रभावित कर सकती है, इसलिए दिल की बीमारियों का समय पर पता लगाना बेहद जरूरी है. आजकल डॉक्टर एंजियोग्राफी की सलाह देते हैं, लेकिन कई लोग इस टेस्ट के बारे में नहीं जानते कि यह क्या है, कैसे होता है और इसके बाद क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

क्या होता है एंजियोग्राफी टेस्ट?

एंजियोग्राफी एक टेस्ट है जो हमें बताता है कि हमारे शरीर की नसें और धमनियां कितनी ठीक हैं. अगर दिल, दिमाग या हाथ-पैर की नसों में कोई ब्लॉकेज हो रही हो तो यह टेस्ट उसे पकड़ने में मदद करता है. जब किसी को सीने में दर्द, सांस लेने में दिक्कत या बेचैनी महसूस होती है. डॉक्टर अक्सर यही टेस्ट कराने की सलाह देते हैं. एंजियोग्राफी यह देखने का सरल तरीका है कि खून शरीर में सही तरीके से बह रहा है या नहीं.

एंजियोप्लास्टी से कितनी अलग है एंजियोग्राफी?

एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी अक्सर एक साथ सुने जाते हैं, लेकिन दोनों अलग चीजें हैं. एंजियोग्राफी सिर्फ एक जांच है, जो यह बताती है कि नसों या आर्टरी में कोई रुकावट है या नहीं, जबकि एंजियोप्लास्टी उस रुकावट को दूर करने का तरीका है. इसका मतलब यह है कि एंजियोग्राफी से पता लगाया जाता है कि समस्या कहां है? वहीं, जरूरत पड़ने पर एंजियोप्लास्टी से उसका इलाज किया जाता है.

कैसे होता है एंजियोग्राफी टेस्ट?

इस टेस्ट में सबसे पहले डॉक्टर जिस हिस्से की नसों की जांच करना चाहते हैं, वहां कैथेटर नाम की छोटी ट्यूब घुसाई जाती है. यह ट्यूब पैर या हाथ में डाली जाती है. इसके जरिए एक खास तरह का रंगीन द्रव्य (डाई) नसों में भेजा जाता है. जब यह लिक्विड नसों में चलता है तो एक्स-रे मशीन उसके रास्ते को कैप्चर कर लेती है. इससे डॉक्टर साफ देख सकते हैं कि खून सही तरह से बह रहा है या कहीं कोई ब्लॉकेज है. यह प्रक्रिया लगभग एक घंटे की होती है और इसके बाद मरीज को आराम करना पड़ता है. टेस्ट खत्म होने के बाद कैथेटर हटा दिया जाता है और जिस जगह से उसे डाला गया था, वह पॉइंट बंद कर दिया जाता है.

ब्लॉकेज मिलने पर क्या होता है?

अगर एंजियोग्राफी में ब्लॉकेज पाया जाता है तो अक्सर एंजियोप्लास्टी या स्टेंट लगाना पड़ता है. इसके बाद मरीज को कुछ खास सावधानियां बरतनी होती हैं, जैसे कि भारी वजन उठाने से बचना, शराब और धूम्रपान से दूर रहना, दवाइयां नियमित लेना, और अपने खान-पान में सुधार करना. हल्की एक्सरसाइज करना, फल-सब्जियों और हेल्दी तेल का सेवन करना, और नमक और चीनी कम करना भी जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गर्दन चटकाने की आदत कहीं स्ट्रोक का खतरा तो नहीं, फिजिशियन ने बताया- कब बढ़ जाती है यह परेशानी?

गर्दन चटकाने की आदत कहीं स्ट्रोक का खतरा तो नहीं, फिजिशियन ने बताया- कब बढ़ जाती है यह परेशानी?


गर्दन में अकड़न या तनाव महसूस होते ही कई लोग बिना सोचे-समझे उसे चटका लेते हैं. वहीं उस क्लिक की आवाज के साथ तुरंत राहत भी मिलती है, लेकिन कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि यह आदत आगे चलकर खतरा बन सकती है. इसी सवाल को लेकर कई एक्सपर्ट्स जरूरी जानकारी देते हैं. दरअसल एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बार-बार गर्दन चटकाने से शरीर के अंदर क्या होता है और किन हालात में यह स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकता है.

गर्दन चटकाने पर असल में होता क्या है?

एक्सपर्ट्स के अनुसार गर्दन चटकाने पर जो आवाज आती है, वह अपने आप में खतरनाक नहीं होती है. यह आवाज जोड़ों के अंदर मौजूद साइनोवियल फ्लूइड में गैस बबल्स के तेजी से रिलीज होने की वजह से आती है. यही वजह है कि गर्दन चटकाने के बाद थोड़ी देर के लिए हल्कापन या राहत महसूस होती है. हालांकि डॉक्टर यह भी साफ कहते हैं कि दिक्कत आवाज से नहीं, बल्कि आदत से शुरू होती है. जब कोई व्यक्ति बार-बार और जोर लगाकर अपनी गर्दन को उसकी नॉर्मल सीमा से ज्यादा झटका देता है तभी समस्या पैदा होती है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि लगातार ऐसा करने से गर्दन को सपोर्ट करने वाले लिगामेंट्स ढीले पड़ सकते हैं. इससे सर्वाइकल स्पाइन की स्थिरता कम हो जाती है और गर्दन अचानक मुड़ने या झटके लगने पर ज्यादा अनियंत्रित हो जाती है.वहीं जब गर्दन की स्थिरता घटती है तो उसके अंदर मौजूद नाजुक संरचनाएं ज्यादा संवेदनशील हो जाती है. खासकर वो ब्लड सेल्स जो दिमाग तक खून पहुंचाती है.

कैसे बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा?

डॉक्टरों के अनुसार जोरदार गर्दन के मूवमेंट से वर्टिब्रल और कैरोटिड आर्टरी पर दबाव पड़ सकता है. वहीं दुर्लभ मामलों में इससे आर्टरी की अंदरूनी परत फट सकती है, जिसे सर्वाइकल आर्टरी डिसेक्शन कहा जाता है. ऐसी कंडीश में उस जगह खून जमा होकर थक्का बना सकता है. वहीं अगर यह थक्का दिमाग तक पहुंच जाए और ब्लड फ्लो को रोक दे तो स्ट्रोक का खतरा हो सकता है. डॉक्टर्स यह भी साफ कहते हैं कि स्ट्रोक के गंभीर मामले बहुत कम होते हैं. वहीं ज्यादातर लोग जो कभी-कभार गर्दन चटकाते हैं उनको स्ट्रोक जैसी समस्या नहीं होती है. लेकिन यह भी सच है कि मेडिकल साइंस में इस तरह के खतरों के बारे में बताया गया है. इसलिए बार-बार और खुद से जोरदार गर्दन चटकाने की सलाह नहीं दी जाती है.

गर्दन की जकड़न से राहत के तरीके

अगर गर्दन में जकड़न या दर्द बना रहता है, तो डॉक्टर बताते हैं कि हल्की स्ट्रेचिंग और मोबिलिटी एक्सरसाइज पर ध्यान देना चाहिए. इसके अलावा सही पोस्चर पर ध्यान देना गर्दन और कंधों की मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज करना भी जरूरी होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस बीमारी में होती है एक दिन में 10 से 12 बार फिजिकल होने की इच्छा, जानें कितनी अजीब है डिजीज

इस बीमारी में होती है एक दिन में 10 से 12 बार फिजिकल होने की इच्छा, जानें कितनी अजीब है डिजीज


हर व्यक्ति की फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा अलग-अलग होती है. कोई व्यक्ति ज्यादा फिजिकल रिलेशन बनाने वाला हो सकता है, तो कोई कम. लेकिन क्या होगा अगर किसी व्यक्ति में यह इच्छा इतनी बढ़ जाए कि वह खुद पर कंट्रोल नहीं रख पाए. ऐसी स्थिति को निम्फोमेनिया कहा जाता है. यह एक मानसिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को शारीरिक संबंध बनाने की ज्यादा और अन कंट्रोल इच्छा होती है.

निम्फोमेनिया सिर्फ एक सामान्य फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा नहीं है. इसमें दिन में कई बार यौन संबंध बनाने की इच्छा इतनी जबरदस्त होती है कि व्यक्ति का डेली रूटीन, रिश्ते, करियर और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होने लगता है. कुछ मामलों में, व्यक्ति को एक दिन में 10 से 12 बार शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा हो सकती है. यह सिर्फ एक इच्छा नहीं रहती, बल्कि एक बाध्यकारी व्यवहार (Compulsive Behavior) बन जाती है, जिसे रोक पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. 

निम्फोमेनिया के लक्षण

1. अन कंट्रोल फिजिकल रिलेशन-  व्यक्ति चाहकर भी अपनी फिजिकल रिलेशन इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता. यह स्थिति कभी-कभी इतनी तेज हो जाती है कि रोजमर्रा के कामों पर इसका असर पड़ता है. 

2. लगातार फिजिकल रिलेशन विचार –  दिनभर लगातार फिजिकल रिलेशन कल्पनाएं और विचार दिमाग में घूमते रहते हैं, जिससे अन्य कामों पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है. 

3. नकारात्मक परिणाम – फिजिकल रिलेशन एक्टिवीटीज के कारण रिश्तों, काम और सामाजिक जीवन में समस्याएं आती हैं, जैसे झगड़े या नौकरी में असफलता. 

4. जोखिम भरा व्यवहार – व्यक्ति कई पार्टनर्स के साथ असुरक्षित फिजिकल रिलेशन बनाता है और इसके परिणामों की परवाह नहीं करता है. 

क्यों होता है निम्फोमेनिया?

किसी व्यक्ति में यह स्थिति अचानक नहीं आती है. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे  दिमाग में हार्मोन और न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन होने पर यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है. कभी-कभी जीवन में हुई कुछ परेशानियां या तनाव, जैसे यौन उत्पीड़न या मानसिक आघात, व्यक्ति को इस स्थिति में ला सकते हैं. लगातार तनाव में रहने वाले व्यक्ति के दिमाग में हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है. 

पुरुष और महिलाओं में निम्फोमेनिया

महिलाओं में यह स्थिति अधिक देखने को मिलती है और इसे निम्फोमेनिया कहा जाता है. पुरुषों में इसी तरह की स्थिति को सैटेराइसिस (Satyriasis) कहा जाता है. दोनों में इसका प्रभाव समान होता है. फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा पर नियंत्रण खोना और लगातार संबंध बनाने की आदत. 

निम्फोमेनिया का इलाज

निम्फोमेनिया को पूरी तरह से एक बीमारी के रूप में पूरी दुनिया में मान्यता नहीं मिली है, लेकिन इसे हाइपरसेक्सुअलिटी डिसऑर्डर (Hypersexuality Disorder) या सेक्सुअल एडिक्शन (Sexual Addiction) के रूप में देखा जाता है.  इस विशेषकर CBT (Cognitive Behavioral Therapy) जैसी साइकोथेरपी मददगार होती है. डॉक्टर कुछ दवाइयां लिख सकते हैं, जो फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा और compulsive behavior को नियंत्रित करने में मदद करती हैं. ऐसे लोगों के लिए सहायता समूह भी होते हैं, जहां एक्सपीरियंस शेयर करने और समस्या को समझने में मदद मिलती है. 

इसे भी पढ़ें- Diabetes Treatment Cost: डायबिटीज की दवाओं पर कौन-सा देश सबसे ज्यादा पैसा करता है खर्च, किस पायदान पर भारत?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर अपने आप करने लगेगा खुद को डिटॉक्स, बस करना होगा ये काम

शरीर अपने आप करने लगेगा खुद को डिटॉक्स, बस करना होगा ये काम


How To Detox Body Naturally At: आजकल लोग शरीर को डिटॉक्स करने के लिए तरह-तरह के ट्रेंड्स और महंगे प्रोडक्ट्स अपनाते हैं. लेकिन सच यह है कि हमारा शरीर खुद ही टॉक्सिन्स बाहर निकालने की क्षमता रखता है. जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम उसे सही सपोर्ट दें. कुछ आसान आदतें और घरेलू डिटॉक्स ड्रिंक्स इस नेचुरल प्रक्रिया को तेज करने में मदद कर सकती हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आप इसके लिए क्या अपना सकते हैं. 

कैसे कर सकते हैं बॉडी डिटॉक्स

पटना स्थित ऑरो सुपर स्पेशलिटी क्लीनिक की डॉक्टर अंजली सौरभ बताती हैं कि “शरीर में टॉक्सिन्स का जमा होना कई बीमारियों की जड़ माना जाता है. इसलिए शरीर को समय-समय पर डिटॉक्स करना जरूरी है. यह डिटॉक्स सिर्फ डाइट से नहीं, बल्कि तेल मालिश, पसीना निकालने वाली एक्सरसाइज और सही तरल पदार्थों के सेवन से भी होता है. इनमें डिटॉक्स ड्रिंक्स सबसे आसान और असरदार तरीका मानी जाती हैं.”

कौन सा ड्रिंक्स फायदेमंद

डिटॉक्स ड्रिंक्स इसलिए फायदेमंद होती हैं क्योंकि तरल रूप में ये जल्दी शरीर में घुल जाती हैं और ब्लड व अंगों की गहराई से सफाई में मदद करती हैं. इससे लिवर, किडनी और पाचन तंत्र बेहतर तरीके से काम करने लगते हैं और शरीर अपने आप टॉक्सिन्स बाहर निकालने लगता है. ऐसी ही एक असरदार ड्रिंक है ऑलस्पाइस इन्फ्यूजन. इसमें दालचीनी, लौंग, अदरक, काली मिर्च, करी पत्ता, गुड़हल, तुलसी, इलायची, शहद और नींबू जैसे तत्व शामिल होते हैं. इसे रातभर पानी में भिगोकर सुबह पिया जाता है. यह ड्रिंक एंटी-इंफ्लेमेटरी होती है और मेटाबॉलिज्म को संतुलन में रखने में मदद करती है.

एलोवेरा जूस भी शरीर की नेचुरल डिटॉक्स प्रक्रिया को सपोर्ट करता है. पानी, एलो जेल, नींबू और थोड़ी सी काली मिर्च से बना यह ड्रिंक शरीर में पानी की कमी को रोकता है. इससे टॉक्सिन्स का जमाव कम होता है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस घटता है, जिससे शरीर खुद को हील करने लगता है. सेब और दालचीनी से बनी डिटॉक्स ड्रिंक दिन की शुरुआत के लिए बेहतर मानी जाती है. सेब में मौजूद विटामिन और मिनरल्स शरीर को पोषण देते हैं, जबकि दालचीनी ब्लड शुगर और वजन को कंट्रोल करने में मदद करती है. इसे रातभर भिगोकर सुबह पीने से शरीर में ताजगी महसूस होती है.

इन समस्याओं से मिलती है राहत

इन डिटॉक्स ड्रिंक्स को नियमित रूप से अपनाने से शरीर का होमियोस्टैसिस बना रहता है. शरीर की सफाई के साथ-साथ इनमें मौजूद मसाले सूजन कम करते हैं, इम्युन सिस्टम मजबूत करते हैं, दिल की सेहत सुधारते हैं और मतली जैसी समस्याओं में भी राहत देते हैं. यह आपके ओवरऑल सेहत के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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