बच्चे को कैसे जन्म देंगी अनाया बांगड़, मां बनेंगी या पिता? जानें यह कैसे होगा पॉसिबल

बच्चे को कैसे जन्म देंगी अनाया बांगड़, मां बनेंगी या पिता? जानें यह कैसे होगा पॉसिबल



Anaya Bangar Gender Transition: रियलिटी शो Rise and Fall में एक बेहद भावनात्मक पल देखने को मिला, जब कंटेस्टेंट अनाया बांगड़ ने अपनी जिंदगी से जुड़ा एक गहरा और साहसिक सच सबके सामने रखा. बातचीत के दौरान अनाया ने बताया कि उन्होंने अपनी जेंडर ट्रांजिशन सर्जरी से पहले अपने स्पर्म को फ्रीज कराया था, ताकि भविष्य में वे भी मां बनने का सपना पूरा कर सकें भले ही सरोगेसी के जरिए. अनाया ने कहा, मेरे पास दो रास्ते थे या तो मैं अडॉप्शन चुनती, या फिर हार्मोनल ट्रीटमेंट से पहले स्पर्म फ्रीज कराती. मैंने दूसरा रास्ता चुना, क्योंकि मैं चाहती थी कि कभी भविष्य में अगर चाहूं तो मां बन सकूं. मैं बच्चा खुद नहीं जन्म दे सकती, लेकिन सरोगेसी के जरिए अपना बच्चा जरूर पा सकती हूं. चलिए आपको बताते हैं कि क्या यह संभव है. 

क्या यह संभव है?

अनाया बांगड़ का फैसला पूरी तरह साइंटफिक रूप से सही और संभव है. जब कोई व्यक्ति ट्रांजिशन से पहले अपनी प्रजनन क्षमता  को सुरक्षित रखना चाहता है, तो वह स्पर्म फ्रीजिंग या एग फ्रीजिंग का विकल्प चुन सकता है. यह प्रक्रिया भविष्य में IVF या सरोगेसी के जरिए जैविक संतान पाने का रास्ता खोल देती है. यानी अनाया खुद गर्भधारण नहीं कर सकतीं, लेकिन उनके फ्रीज किए गए स्पर्म से किसी डोनर एग और सरोगेट मदर की मदद से उनका बच्चा जन्म ले सकता है.

फिलहाल, ट्रांसजेंडर महिला के लिए गर्भधारण संभव नहीं है. पुरुष शरीर में गर्भाशय, फैलोपियन ट्यूब और गर्भधारण के लिए आवश्यक हार्मोनल सिस्टम मौजूद नहीं होता. कुछ देशों में वैज्ञानिक यूट्रेस ट्रांसप्लांट पर प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक किसी ट्रांसजेंडर महिला में सफल गर्भधारण का मामला सामने नहीं आया है. इसका मतलब है कि फिलहाल सरोगेसी ही एक सुरक्षित विकल्प है.

ट्रांसजेंडर उठा रहे हैं यह कदम

अनाया के मामले में, उन्होंने ट्रांजिशन सर्जरी से पहले स्पर्म फ्रीज कराके एक बेहद समझदारी भरा कदम उठाया. यह उन्हें भविष्य में सरोगेसी के जरिए अपनी जैविक संतान पाने की संभावना देता है. आज के दौर में बहुत से ट्रांसजेंडर लोग, चाहे वे पुरुष हों या महिलाएं, हार्मोनल ट्रीटमेंट से पहले फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन  का यही रास्ता चुन रहे हैं. American Society for Reproductive Medicine (ASRM) की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, जेंडर ट्रांजिशन से पहले स्पर्म या एग फ्रीजिंग कराना सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है जिससे ट्रांसजेंडर व्यक्ति भविष्य में पैरेंटहुड का सपना पूरा कर सकते हैं. वहीं, WHO की 2023 की टेक्निकल ब्रीफ में भी यह स्पष्ट किया गया है कि फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के प्रजनन अधिकारों का अहम हिस्सा है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या ब्रेस्ट कैंसर की जांच के लिए सिर्फ मैमोग्राफी काफी नहीं, जानें क्या है डॉक्टर्स की राय?

क्या ब्रेस्ट कैंसर की जांच के लिए सिर्फ मैमोग्राफी काफी नहीं, जानें क्या है डॉक्टर्स की राय?


दुनिया भर में महिलाएं ब्रेस्ट चेकअप के लिए यही टेस्ट कराती हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि ब्रेस्ट टेस्ट के लिए सभी महिलाओं को मैमोग्राम पर डिपेंड नहीं रहना चाहिए क्योंकि ये कई महिलाओं पर असरदार नहीं है, खासकर भारत जैसे देश में.

दरअसल, भारत में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पैटर्न वेस्ट के देशों से काफी अलग है. यहां कम उम्र से ही ये बीमारी शुरू हो जाती है और महिलाओं में ब्रेस्ट टिश्यू ज्यादा डेंस होते हैं. साथ ही, यहां इसके ट्रीटमेंट और डिटेक्शन की सुविधाएं काफी कम हैं. भारत में ये परेशानी 45 की उम्र से ही शुरू हो जाती है जबकि वेस्ट में ये 55 से शुरू होती है.

दरअसल, भारत में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पैटर्न वेस्ट के देशों से काफी अलग है. यहां कम उम्र से ही ये बीमारी शुरू हो जाती है और महिलाओं में ब्रेस्ट टिश्यू ज्यादा डेंस होते हैं. साथ ही, यहां इसके ट्रीटमेंट और डिटेक्शन की सुविधाएं काफी कम हैं. भारत में ये परेशानी 45 की उम्र से ही शुरू हो जाती है जबकि वेस्ट में ये 55 से शुरू होती है.

डॉक्टर्स बताते हैं कि मैमोग्राम फैटी ब्रेस्ट टिश्यू में बेहतर काम करता है. लेकिन भारतीय महिलाओं में ब्रेस्ट ज्यादा डेंस होने के कारण इस टेस्ट के दौरान कैंसर के शुरुआती लक्षण छूट जाते हैं या गलत रिपोर्ट आ जाती है. इसलिए ये फायदेमंद नहीं है.

डॉक्टर्स बताते हैं कि मैमोग्राम फैटी ब्रेस्ट टिश्यू में बेहतर काम करता है. लेकिन भारतीय महिलाओं में ब्रेस्ट ज्यादा डेंस होने के कारण इस टेस्ट के दौरान कैंसर के शुरुआती लक्षण छूट जाते हैं या गलत रिपोर्ट आ जाती है. इसलिए ये फायदेमंद नहीं है.

ऐसे में डॉक्टर्स का कहना है कि भारत जैसे देश में इसके लिए अल्ट्रासाउंड का ऑप्शन ज्यादा बेहतर है. साथ ही, महिलाओं को सेल्फ ब्रेस्ट एग्जामिनेशन भी करनी चाहिए.

ऐसे में डॉक्टर्स का कहना है कि भारत जैसे देश में इसके लिए अल्ट्रासाउंड का ऑप्शन ज्यादा बेहतर है. साथ ही, महिलाओं को सेल्फ ब्रेस्ट एग्जामिनेशन भी करनी चाहिए.

भारत में आज ब्रेस्ट कैंसर सबसे कॉमन बन गया है और वेस्ट की कंपैरिजन में तेजी से फैल रहा है. ऐसे में इस बीमारी का पता न चलने या देरी से पता चलने की वजह से 40 से 50 प्रतिशत महिलाएं मर जाती हैं.

भारत में आज ब्रेस्ट कैंसर सबसे कॉमन बन गया है और वेस्ट की कंपैरिजन में तेजी से फैल रहा है. ऐसे में इस बीमारी का पता न चलने या देरी से पता चलने की वजह से 40 से 50 प्रतिशत महिलाएं मर जाती हैं.

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की एक रिसर्च में पाया गया कि क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जामिनेशन के साथ मैमोग्राम को जोड़ने पर भी सही डिटेक्शन नहीं किया जा सका और मौतें होती रहीं. वहीं संजय गांधी पीजीआई की स्टडी बताती है कि महिलाएं अगर हर महीने सेल्फ ब्रेस्ट एग्जामिनेशन करें तो वह बदलाव को जल्दी पहचानकर उसका तुरंत इलाज करा सकती हैं.

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की एक रिसर्च में पाया गया कि क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जामिनेशन के साथ मैमोग्राम को जोड़ने पर भी सही डिटेक्शन नहीं किया जा सका और मौतें होती रहीं. वहीं संजय गांधी पीजीआई की स्टडी बताती है कि महिलाएं अगर हर महीने सेल्फ ब्रेस्ट एग्जामिनेशन करें तो वह बदलाव को जल्दी पहचानकर उसका तुरंत इलाज करा सकती हैं.

साथ ही, डॉक्टर्स का कहना है कि हर महीने महिलाओं को खुद ब्रेस्ट की जांच करनी चाहिए और किसी गांठ, निप्पल में चेंजेस की तरफ ध्यान देना जरूरी है. इसके अलावा परेशानी आने पर टारगेटेड इमेजिंग जरूर करवाएं.

साथ ही, डॉक्टर्स का कहना है कि हर महीने महिलाओं को खुद ब्रेस्ट की जांच करनी चाहिए और किसी गांठ, निप्पल में चेंजेस की तरफ ध्यान देना जरूरी है. इसके अलावा परेशानी आने पर टारगेटेड इमेजिंग जरूर करवाएं.

Published at : 12 Nov 2025 09:09 AM (IST)

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किस बीमारी की वजह से अचानक बेहोश होकर गिरे गोविंदा, यह कितनी खतरनाक?

किस बीमारी की वजह से अचानक बेहोश होकर गिरे गोविंदा, यह कितनी खतरनाक?



Govinda in Hospital: बॉलीवुड के हीरो नंबर वन गोविंदा की तबीयत अचानक बिगड़ गई. 12 नवंबर (मंगलवार/बुधवार) की रात वह अपने ही घर में बेहोश होकर गिर पड़े. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. ऐसे में सवाल उठता है कि किस बीमारी की वजह से गोविंदा अचानक बेहोश हो गए? यह बीमारी कितनी खतरनाक है और इसके क्या लक्षण हैं?

कब बिगड़ी गोविंदा की तबीयत?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंगलवार रात करीब 8 बजे से गोविंदा को चक्कर आने शुरू हो गए. वह असहज महसूस करने लगे तो घरवालों ने डॉक्टर से फोन पर बात की. इसके बाद कुछ दवाइयां दी गईं, लेकिन रात करीब एक बजे हालत ज्यादा बिगड़ गई. वह अचानक बेहोश होकर गिर पड़े. उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनके सभी टेस्ट हो रहे हैं और  अहम पैरामीटर्स पर नजर रखी जा रही है.

किस वजह से बेहोश हुए गोविंदा?

गाजियाबाद स्थित यशोदा हॉस्पिटल में मेडिसिन एंड जनरल फिजिशियन डॉ. एपी सिंह ने बताया कि गोविंदा को क्या हुआ है, यह कहना मुश्किल है. अगर लक्षणों पर गौर किया जाए तो इसे डिसओरिएंटेशन की शिकायत माना जा सकता है. इसका मतलब है कि उन्हें अचानक चक्कर आए और वह होश खो बैठे. फिलहाल वह अस्पताल में हैं और डॉक्टर हर मिनट उनकी निगरानी कर रहे हैं. उनकी हालत स्थिर है और वह खतरे से बाहर हैं.

क्या है यह बीमारी?

अब सवाल यह है कि किस बीमारी की वजह से गोविंदा को अचानक चक्कर आए? अगर चक्कर की मुख्य वजह डिसओरिएंटेशन है तो यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक लक्षण है. मतलब दिमाग को अचानक ऑक्सीजन कम पहुंची और होश नहीं रहा. डॉक्टर कहते हैं कि गोविंदा को पहले गोली लगने से काफी खून बहा था, जिससे बॉडी कमजोर हुई. अब उनकी उम्र 61 साल से ज्यादा है. वहीं, कुछ दिन पहले महाराष्ट्र चुनाव में प्रचार करते वक्त भी उनके सीने में दर्द हुआ था, जिसके बाद वह रोड शो बीच में छोड़कर मुंबई लौट आए थे. शायद यह सब मिलकर असर कर रहा है.

दिक्कत की असली वजह क्या?

डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे केस में लो ब्लड प्रेशर, डिहाइड्रेशन, दिल की धड़कन अनियमित होना या दवाइयों का साइड इफेक्ट भी वजह बन सकता है. गोविंदा को ब्लड प्रेशर की दिक्कत पहले से है. डॉक्टरों का कहना है कि अभी ईसीजी, ब्लड टेस्ट और ब्रेन स्कैन सब कर रहे हैं. अगर ब्लड प्रेशर ड्रॉप की वजह से ऐसा हुआ तो दवाई से कंट्रोल हो जाएगा. अगर दिल या दिमाग की कोई पुरानी प्रॉब्लम निकली तो इलाज लंबा चलेगा.

यह दिक्कत कितनी खतरनाक?

आम बोलचाल में कहें तो ज्यादातर बार बेहोशी आना कोई बड़ी बात नहीं. गर्मी, भूख और तनाव की वजह से ऐसा हो सकता है. अगर बार-बार ऐसा हो या 60 साल से ज्यादा उम्र वाले को हो तो डॉक्टर अलर्ट हो जाते हैं. यह दिल का दौरा, ब्रेन स्ट्रोक या शुगर लो होने का संकेत हो सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, सिंकोप (बेहोशी का मेडिकल नाम) से हर साल लाखों लोग प्रभावित होते हैं. ज्यादातर ठीक हो जाते हैं, लेकिन 10-20 पर्सेंट केस में गंभीर वजह निकलती है. अगर अचानक कोई बेहोश होकर गिर रहा है तो तुरंत जांच करानी चाहिए.

ये भी पढ़ें: Heart Attack: घर में अकेले हैं और आ गया हार्ट अटैक? सबसे पहले करें ये काम

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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वजन कम करने के साथ चाहिए लंबी उम्र, तुरंत लाइफस्टाइल में शामिल करें ये एक्टिविटीज

वजन कम करने के साथ चाहिए लंबी उम्र, तुरंत लाइफस्टाइल में शामिल करें ये एक्टिविटीज



वजन कम करना आजकल कई लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. हम अक्सर सोचते हैं कि अगर हम सिर्फ कम खाएं, ज्यादा एक्सरसाइज करें और फिटनेस रूटीन का पालन करें, तो वजन अपने आप घट जाएगा. इसके लिए लोग कैलोरी गिनने से लेकर नियमित एक्सरसाइज और वजन उठाने तक सभी कोशिशें करते हैं. हफ्ते में तीन से चार बार वजन उठाना, रोजाना 10,000 कदम चलना, और जंक फूड से बचें ये सभी आदतें मदद करती हैं. लेकिन इसके बावजूद आपका वजन कम नहीं हो रहा, या आप थकान और कमजोरी महसूस कर रहे हैं. अमेरिका के प्रसिद्ध इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट और फंक्शनल मेडिसिन डॉक्टर डॉ. संजय भोजराज ने इसका कारण बताया है तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि लंबी उम्र और वजन कम करने के लिए कौन सा काम तुरंत बंद करें. 

हार्ट डिजीज एक्सपर्ट ने क्या बताया?

हाल ही में अमेरिका के हार्ड डिजीज एक्सपर्ट ने 6 नवंबर को इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट शेयर किया, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे नींद की कमी ने उनके और उनके मरीजों के वजन घटाने के प्रयासों को प्रभावित किया. हार्ड डिजीज एक्सपर्ट ने अपने पोस्ट में लिखा कि वह पिछले 20 सालो से हार्ड डिजीज एक्सपर्ट हैं और हमेशा यही मानते थे कि कम खाना और ज्यादा एक्सरसाइज करना वजन घटाने के लिए फायदेमंद है. वह अपने मरीजों को भी यही सलाह देते थे कि लीन प्रोटीन खाएं, कार्डियो एक्सरसाइज करें और कैलोरी गिनें. लेकिन इसके बाद भी उन्होंने देखा कि उनके कई मरीजों का वजन घटने के बजाय बढ़ता रहा. लोग थकान महसूस करते रहे, और उम्र के लक्षण  जल्दी दिखने लगे. 

कौन सा काम तुरंत बंद करें?

कुछ नए शोधों से यह साफ हुआ कि खराब नींद, प्रोसेस्ड फूड और रोजाना तनाव चुपचाप शरीर में कोर्टिसोल और इंसुलिन हार्मोन को बढ़ा रहे हैं. ये हार्मोन शरीर को फैटे स्टोरेज मोड में फंसा देते हैं. इसका मतलब यह है कि चाहे आप कितना भी साफ डाइट लें या कितनी भी एक्सरसाइज करें, आपका शरीर अभी भी फैट जमा करता रहेगा. ऐसे में हार्ट डिजीज एक्सपर्ट तीन जरूरी चीजों पर ध्यान देने की सलाह दी. जिसमें पहला सूजन कम करना है. यह मेटाबॉलिज्म को ठीक करने का पहला कदम है. इसके बाद दूसरा गहरी नींद और सुबह की एक्टिविटी को प्राथमिकता देना. नींद पूरी न होने से शरीर के हार्मोन असंतुलित होते हैं और तीसरा मजबूत हार्ट, जो न सिर्फ लंबी उम्र देता है, बल्कि मेटाबॉलिज्म को तेज करता है. 

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 खराब अंडा खा लिया तो अंदर से सड़ने लगेगा पेट, जानें कितना कर सकता है नुकसान?

 खराब अंडा खा लिया तो अंदर से सड़ने लगेगा पेट, जानें कितना कर सकता है नुकसान?



अंडा हमारे रोजाना के खाने का अहम हिस्सा होता है. सुबह के नाश्ते से लेकर डाइट प्लान तक अंडे को हेल्दी प्रोटीन का सबसे अच्छा सोर्स माना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर अंडा खराब हो जाए और आप उसे गलती से भी खा ले तो यह हेल्दी फूड आपके लिए कितना खतरनाक बन सकता है. दरअसल खराब अंडा खाने से पेट में इन्फेक्शन, उल्टी, दस्त और यहां तक कि फूड प्वाइजनिंग तक हो सकती है. वहीं खराब अंडा खाने से आपका पेट अंदर से सड़ने तक लग जाता है. इसलिए जरूरी है कि अंडा खाने से पहले उसकी ताजगी जरूर चेक करनी चाहिए. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि खराब अंडा खाने से अंदर से पेट कैसे सड़ने लगता है और यह खराब अंडे कितना नुकसान कर सकते हैं.

खराब अंडा खाने से क्या होता है असर?

खराब अंडे में साल्मोनेला बैक्टीरिया पनप सकता है जो शरीर में जाकर संक्रमण फैलता है. इसे साल्मोनेला बैक्टीरिया कहा जाता है. यह बैक्टीरिया पेट की आंतों में सूजन पैदा करता है, जिससे खाने का पाचन रुक जाता है और पेट में गैस, जलन और दर्द बढ़ने लगता है. ऐसे में अगर समय पर इलाज न किया जाए तो यह इन्फेक्शन खून तक पहुंच सकता है. वहीं कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों, बच्चों और बुजुर्गों में यह संक्रमण सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.

ऐसे पहचानें अंडा खराब है या नहीं

  • गंध से पहचानें- अगर अंडा फोड़ते ही उसमें सड़ी या बदबूदार महक आए तो समझ जाए कि वह अंडा खराब है ‌.
  • पानी टेस्ट करें- आप अंडे की पहचान का टेस्ट पानी से भी कर सकते हैं. इसके लिए कटोरे में पानी भरें और उसमें अंडा डालें. अगर अंडा नीचे बैठ जाए तो वह ताजा है और अगर ऊपर तैरने लगे तो समझ जाए कि वह खराब हो चुका है.
  • रंग और बनावट चेक करें- अगर अंडे की सफेदी बहुत पतली हो या पीला दाग लगा हुआ हो और वह टेस्ट में भी फिका लगे तो उसे तुरंत फेंक दें. क्योंकि ऐसे अंडे खराब हो जाते हैं.
  • छिलका चेक करें- अंडा खराब है या नहीं यह जांचने के लिए आप अंडे के छिलके को भी चेक कर सकते हैं. दरअसल फटा हुआ, चिपचिपा या फफूंदीदार अंडा खाने लायक नहीं होता है. वह खराब होता है.

अंडे को खराब होने से कैसे बचाएं?

अंडे को खराब होने से रोकने का सबसे अच्छा उपाय माना जाता है कि खरीदते वक्त अंडे का कार्टन खोलकर चेक करें. अगर उसमें कोई दरार या गंदगी नजर आए तो वह अंडा न खरीदें. वहीं घर पर भी अंडों को तुरंत रेफ्रिजरेटर में रखें. आप अंडों की एक्सपायरी डेट देखकर ही उनका इस्तेमाल करें.

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वेट लॉस या फैट लॉस… ब्लड शुगर मरीजों के लिए क्या है सही तरीका?

वेट लॉस या फैट लॉस… ब्लड शुगर मरीजों के लिए क्या है सही तरीका?



आजकल लोग हेल्दी रहने और ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखने के लिए सबसे पहले वजन घटाने की सलाह देते हैं.  हर कोई यही सोचता है कि अगर वजन कम हो गया तो डायबिटीज का खतरा भी कम हो जाएगा. लेकिन सच यह होता है कि वेट लॉस और फैट लॉस दोनों एक जैसी चीज नहीं होती है. कई बार वजन तो घट जाता है लेकिन शरीर के अंदर मौजूद फैट नहीं घटता और यही कारण है कि ब्लड शुगर और इंसुलिन सेंसिटिविटी पर असर नहीं पड़ता है.

दरअसल वजन घटाने से शरीर का नंबर यानी स्केल पर दिखने वाला आंकड़ा तो कम हो सकता है, लेकिन असली सुधार तब होता है जब शरीर में मौजूद एक्स्ट्रा फैट खासकर पेट और लिवर के आसपास जमा विसरल फैट घटता है. यही फैट इन्सुलिन रेजिस्टेंस की बड़ी वजह बनता है. जिसका मतलब है कि अगर आप ब्लड शुगर की समस्या से जूझ रहे हैं तो सिर्फ वजन घटाने की बजाई फैट लॉस पर ध्यान देना ज्यादा फायदेमंद होता है.

वेट लॉस का मतलब फैट लॉस नहीं

जब लोग डाइटिंग शुरू करते हैं या एक्सरसाइज करते हैं तो जल्दी वजन घटने लगता है. लेकिन शुरुआती दिनों में जो वजन कम होता है, वह ज्यादातर पानी ग्लाइकोजन और कभी-कभी मसल्स लॉस की वजह से होता है. रिसर्च के अनुसार अगर वजन कम करते समय मसल्स भी घट जाए तो इसका ब्लड शुगर कंट्रोल पर नेगेटिव असर पड़ सकता है. क्योंकि मसल्स ही ग्लूकोज को एनर्जी में बदलने का सबसे अहम जरिया मानी जाती है. जिसका मतलब है कि वजन घटने के बावजूद मेटाबॉलिक हेल्थ नहीं सुधर पाती है.

फैट लॉस से कैसे सुधरती है इंसुलिन सेंसिटिविटी?

फैट लॉस का मतलब शरीर में मौजूद फैट टिश्यू खासकर पेट और लिवर के आसपास जमा विसरल फैट को घटना होता है. यही फैट इन्सुलिन रेजिस्टेंस की जड़ में होता है. जब यह फैट कम होता है तो शरीर में सूजन घटती है और इंसुलिन पर असर करने वाले फैटी एसिड्स भी कम हो जाते हैं. एक रिसर्च में यह सामने आया है कि शरीर की कुल फैट मात्रा में सिर्फ 10 प्रतिशत की कमी से इन्सुलिन सेंसटिविटी करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, भले ही कुल वजन में बहुत बदलाव न आए. वहीं शरीर में जमा हर फैट एक जैसा नहीं होता है. स्किन के नीचे जमा सबक्यूटेनियस फैट कम नुकसानदायक होता है. लेकिन अंगों के आसपास जमा विसरल फैट सबसे ज्यादा खतरनाक होता है. यही फैट लिवर पैंक्रियाज और आंतों के आसपास जमा होकर ब्लड शुगर को बढ़ाता है. लिवर में जमा फैट इतना खतरनाक होता है कि यह शरीर में ग्लूकोज रिलीज करता है. भले ही ब्लड शुगर पहले से हाई हो. यही वजह है कि कई बार लोग जिन लोगों का वजन सामान्य दिखता है वह भी डायबिटीज का शिकार हो जाते हैं. इसे मेटाबॉलिकली ओबेस नॉर्मल वेट कहा जाता है.

क्या बिना ज्यादा वजन घटाएं फैट घटाना मुमकिन है?

दरअसल बिना ज्यादा वजन घटाएं फैट घटाना मुमकिन है और यही तरीका हेल्दी भी माना जाता है. कई लोग फैट घटाते हुए मसल्स को बनाए रखते हैं. इससे इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार आता है और मेटाबॉलिक हेल्थ बेहतर होती है. भले ही स्केल पर ज्यादा वजन ना बदले. एक रिसर्च के अनुसार जो लोग रेजिस्टेंस ट्रेनिंग को डाइटिंग के साथ जोड़ते हैं उनका ब्लड शुगर कंट्रोल सिर्फ डाइटिंग करने वालों की तुलना में ज्यादा अच्छा होता है. इसकी वजह यह मानी जाती है कि मसल्स ग्लूकोज को अवशोषित कर उसे एनर्जी में बदलने का काम करते हैं.

फैट लॉस के लिए असरदार तरीके

  • फैट लॉस करने के लिए रेजिस्टेंस और एरोबिक ट्रेनिंग करें, जिससे मसल्स भी बने रहेंगे और फैट बर्न होगा.
  • इसके अलावा फैट लॉस के लिए प्रोटीन युक्त भोजन लें, ताकि मसल्स लॉस न हो.
  • वहीं फाइबर हेल्दी फैट और साबुत अनाज को डाइट में शामिल करें.
  • फैट लॉस के लिए पूरी नींद लें, क्योंकि नींद की कमी इन्सुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाती है.
  • फैट लॉस के लिए फास्ट डाइट या एक्सट्रीम डिटॉक्स प्लान से बचना भी ज्यादा सही माना जाता है. ‌

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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