मां बनने का सपना तोड़ सकता है तेजी से बढ़ रहा बेली फैट, जानें इस पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

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किस उम्र कितने घंटे की नींद होती है जरूरी? न्यूरोलॉजिस्ट ने बता दिया बॉडी की सेहत बनाने वाला राज

किस उम्र कितने घंटे की नींद होती है जरूरी? न्यूरोलॉजिस्ट ने बता दिया बॉडी की सेहत बनाने वाला राज


पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. जगदीश हिरेमठ के अनुसार, यह आंकड़े अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन और नेशनल स्लीप फाउंडेशन की गाइडलाइनों से मेल खाते हैं. व्यक्ति-व्यक्ति की नींद की जरूरत थोड़ी अलग हो सकती है, लेकिन ये औसतन सही माने जाते हैं.

बच्चों को ज्यादा नींद इसलिए चाहिए क्योंकि उनका दिमाग और शरीर तेजी से बढ़ता है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, दिमाग मेच्योर होता जाता है और नींद की जरूरत घटती जाती है. वयस्कों के लिए नींद का काम होता है दिमाग को रीचार्ज करना, थकान मिटाना और इमोश्नल संतुलन बनाए रखना.

बच्चों को ज्यादा नींद इसलिए चाहिए क्योंकि उनका दिमाग और शरीर तेजी से बढ़ता है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, दिमाग मेच्योर होता जाता है और नींद की जरूरत घटती जाती है. वयस्कों के लिए नींद का काम होता है दिमाग को रीचार्ज करना, थकान मिटाना और इमोश्नल संतुलन बनाए रखना.

माता-पिता और केयरगिवर्स बच्चों की नींद पूरी कराने में मदद कर सकते हैं. इसके लिए सोने का तय समय रखें, स्क्रीन टाइम घटाएं और कमरे का माहौल शांत  रखें. खासकर किशोरों को यह समझाना जरूरी है कि नींद भी पढ़ाई जितनी ही जरूरी है.

माता-पिता और केयरगिवर्स बच्चों की नींद पूरी कराने में मदद कर सकते हैं. इसके लिए सोने का तय समय रखें, स्क्रीन टाइम घटाएं और कमरे का माहौल शांत रखें. खासकर किशोरों को यह समझाना जरूरी है कि नींद भी पढ़ाई जितनी ही जरूरी है.

कम नींद के असर तुरंत दिखते हैं. इसमें ध्यान भटकना, मूड खराब रहना, इम्यूनिटी कमजोर होना शामिल है. लंबे समय में इससे हार्ट रोग, मोटापा, डायबिटीज और डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है.

कम नींद के असर तुरंत दिखते हैं. इसमें ध्यान भटकना, मूड खराब रहना, इम्यूनिटी कमजोर होना शामिल है. लंबे समय में इससे हार्ट रोग, मोटापा, डायबिटीज और डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है.

अगर आप अपनी नींद को बेहतर बनाना चाहते हैं तो कुछ आसान तरीके मदद कर सकते हैं. हर दिन एक तय समय पर सोने और उठने की आदत डालें, कमरे को हल्का अंधेरा और ठंडा रखें, और सोने से पहले मोबाइल या टीवी स्क्रीन से दूरी बना लें.

अगर आप अपनी नींद को बेहतर बनाना चाहते हैं तो कुछ आसान तरीके मदद कर सकते हैं. हर दिन एक तय समय पर सोने और उठने की आदत डालें, कमरे को हल्का अंधेरा और ठंडा रखें, और सोने से पहले मोबाइल या टीवी स्क्रीन से दूरी बना लें.

इसके साथ ही कैफीन या हैवी मील रात में लेने से बचें. थोड़ी-सी लाइफस्टाइल में बदलाव आपकी नींद की गुणवत्ता को बहुत हद तक सुधार सकती है. दिन में थोड़ी फिजिकल एक्टिविटी भी जरूरी है ताकि रात में नींद जल्दी आए.

इसके साथ ही कैफीन या हैवी मील रात में लेने से बचें. थोड़ी-सी लाइफस्टाइल में बदलाव आपकी नींद की गुणवत्ता को बहुत हद तक सुधार सकती है. दिन में थोड़ी फिजिकल एक्टिविटी भी जरूरी है ताकि रात में नींद जल्दी आए.

Published at : 07 Nov 2025 08:02 AM (IST)

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हाथ से खाना खाने को लेकर ट्रोल हो चुके हैं जोहरान ममदानी, जानें सेहत के लिए कितनी फायदेमंद है यह प्रक्रिया?

हाथ से खाना खाने को लेकर ट्रोल हो चुके हैं जोहरान ममदानी, जानें सेहत के लिए कितनी फायदेमंद है यह प्रक्रिया?


जब हम हाथों से खाते हैं, तो खाना उठाने, तोड़ने और मिलाने में थोड़ा समय लगता है. इससे हम धीरे-धीरे खाते हैं, ज्यादा चबाते हैं और हमारी लार अच्छे से बनती है. इससे पेट में एंजाइम और एसिड सही मात्रा में बनते हैं, जिससे खाना अच्छी तरह पचता है.धीरे खाने की वजह से कब्ज जैसी दिक्कतें भी कम होती हैं.

हाथ से खाने में हमारी कई इंद्रियां जैसे touch, smell, sight शामिल होती हैं. खाने को छूने, उसकी गर्माहट और बनावट महसूस करने से हमारा दिमाग जल्दी संकेत देता है कि पेट भर गया है. इससे ज्यादा खाने की आदत पर काबू पाया जा सकता है और वजन कंट्रोल रखने में मदद मिलती है.

हाथ से खाने में हमारी कई इंद्रियां जैसे touch, smell, sight शामिल होती हैं. खाने को छूने, उसकी गर्माहट और बनावट महसूस करने से हमारा दिमाग जल्दी संकेत देता है कि पेट भर गया है. इससे ज्यादा खाने की आदत पर काबू पाया जा सकता है और वजन कंट्रोल रखने में मदद मिलती है.

साफ हाथों से खाना खाने का एक बड़ा फायदा यह है कि हमारे शरीर को अपने वातावरण के हल्के, खराब और खतरनाक जीवाणुओं का पता चलता है.ये हमारे इम्यून सिस्टम को सिखाते हैं कि कौन-से बैक्टीरिया हानिकारक हैं और कौन-से नहीं.इस तरह शरीर नेचुरल रूप से रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ा लेता है.

साफ हाथों से खाना खाने का एक बड़ा फायदा यह है कि हमारे शरीर को अपने वातावरण के हल्के, खराब और खतरनाक जीवाणुओं का पता चलता है.ये हमारे इम्यून सिस्टम को सिखाते हैं कि कौन-से बैक्टीरिया हानिकारक हैं और कौन-से नहीं.इस तरह शरीर नेचुरल रूप से रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ा लेता है.

हाथ से खाना खाने से हम अपने खाने के साथ ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं.हम उसकी गर्माहट, बनावट, नमी और टेस्ट को महसूस करते हैं, जिससे हम और अच्छे खाना खाते हैं. इसे ही माइंडफुल ईटिंग कहा जाता है जो आजकल मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए बेहद जरूरी माना जाता है.

हाथ से खाना खाने से हम अपने खाने के साथ ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं.हम उसकी गर्माहट, बनावट, नमी और टेस्ट को महसूस करते हैं, जिससे हम और अच्छे खाना खाते हैं. इसे ही माइंडफुल ईटिंग कहा जाता है जो आजकल मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए बेहद जरूरी माना जाता है.

हमारी उंगलियों की स्किन थोड़ी मोटी होती है, इसलिए वे एक तरह से नेचुरल थर्मामीटर की तरह काम करती हैं.जब हम खाने को हाथ से छूते हैं, तो हमें तुरंत पता चल जाता है कि खाना बहुत गर्म तो नहीं है.इससे मुंह जलने या ज्यादा गर्म खाने से होने वाली तकलीफें नहीं होती है.

हमारी उंगलियों की स्किन थोड़ी मोटी होती है, इसलिए वे एक तरह से नेचुरल थर्मामीटर की तरह काम करती हैं.जब हम खाने को हाथ से छूते हैं, तो हमें तुरंत पता चल जाता है कि खाना बहुत गर्म तो नहीं है.इससे मुंह जलने या ज्यादा गर्म खाने से होने वाली तकलीफें नहीं होती है.

भारत में हाथ से खाना सिर्फ आदत नहीं, बल्कि सम्मान और अपनापन दिखाने का तरीका भी है. यह खाने को एक संस्कार की तरह देखने की परंपरा से जुड़ा है. जहां खाना सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि जुड़ाव का प्रतीक होता है.

भारत में हाथ से खाना सिर्फ आदत नहीं, बल्कि सम्मान और अपनापन दिखाने का तरीका भी है. यह खाने को एक संस्कार की तरह देखने की परंपरा से जुड़ा है. जहां खाना सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि जुड़ाव का प्रतीक होता है.

हाथ से खाना तभी फायदेमंद है जब आप खाने से पहले हाथ अच्छी तरह धोएं साबुन और पानी से उंगलियां, हथेलियां और नाखूनों के नीचे की सफाई करना जरूरी है. साफ हाथों से खाने पर न कोई संक्रमण का डर रहता है, न कोई नुकसान, बस टेस्ट और हेल्थ दोनों मिलते हैं.

हाथ से खाना तभी फायदेमंद है जब आप खाने से पहले हाथ अच्छी तरह धोएं साबुन और पानी से उंगलियां, हथेलियां और नाखूनों के नीचे की सफाई करना जरूरी है. साफ हाथों से खाने पर न कोई संक्रमण का डर रहता है, न कोई नुकसान, बस टेस्ट और हेल्थ दोनों मिलते हैं.

Published at : 07 Nov 2025 07:01 AM (IST)

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‎फैटी लिवर और इंसुलिन रेसिस्टेंस के बीच क्या कनेक्शन, बिना ब्लड टेस्ट कराए कैसे पहचानें लक्षण?

‎फैटी लिवर और इंसुलिन रेसिस्टेंस के बीच क्या कनेक्शन, बिना ब्लड टेस्ट कराए कैसे पहचानें लक्षण?


फैटी लिवर का मतलब है कि लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो गया है. लिवर हमारे शरीर का एक अहम अंग है, जो खाने को पचाने, एनर्जी बनाने और शरीर से टॉक्सिन्स निकालने का काम करता है. जब इसमें फैट बढ़ जाता है, तो यह काम धीमा हो जाता है. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह स्थिति नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज, फिर सूजन और आगे चलकर फाइब्रोसिस या सिरोसिस तक पहुंच सकती है.

इंसुलिन एक हार्मोन है जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है. जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन को ठीक से नहीं पहचानती, तो इसे इंसुलिन रेसिस्टेंस कहते हैं. इस स्थिति में शरीर को ज्यादा इंसुलिन बनाना पड़ता है, जिससे धीरे-धीरे ब्लड शुगर और लिवर फैट दोनों बढ़ने लगते हैं. लिवर में फैट बढ़े तो इंसुलिन रेसिस्टेंस बढ़ता है, और इंसुलिन रेसिस्टेंस बढ़े तो फैट और बढ़ता है. ये दोनों एक-दूसरे को खराब करते रहते हैं.

इंसुलिन एक हार्मोन है जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है. जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन को ठीक से नहीं पहचानती, तो इसे इंसुलिन रेसिस्टेंस कहते हैं. इस स्थिति में शरीर को ज्यादा इंसुलिन बनाना पड़ता है, जिससे धीरे-धीरे ब्लड शुगर और लिवर फैट दोनों बढ़ने लगते हैं. लिवर में फैट बढ़े तो इंसुलिन रेसिस्टेंस बढ़ता है, और इंसुलिन रेसिस्टेंस बढ़े तो फैट और बढ़ता है. ये दोनों एक-दूसरे को खराब करते रहते हैं.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि शरीर खुद संकेत देता है कि अंदर क्या गड़बड़ चल रही है. अगर हम इन संकेतों को समय पर समझ लें, तो ब्लड टेस्ट कराने से पहले ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमें फैटी लिवर या प्री-डायबिटीज का खतरा है या नहीं,  कुछ लक्षण बहुत अहम हैं जो लिवर और इंसुलिन से जुड़ी समस्या का शुरुआती संकेत हो सकते हैं.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि शरीर खुद संकेत देता है कि अंदर क्या गड़बड़ चल रही है. अगर हम इन संकेतों को समय पर समझ लें, तो ब्लड टेस्ट कराने से पहले ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमें फैटी लिवर या प्री-डायबिटीज का खतरा है या नहीं, कुछ लक्षण बहुत अहम हैं जो लिवर और इंसुलिन से जुड़ी समस्या का शुरुआती संकेत हो सकते हैं.

अगर आपका पेट बहुत ज्यादा उभरा हुआ और सख्त महसूस होता है, तो यह सिर्फ मोटापा नहीं हो सकता, यह संकेत है कि अंदरूनी अंगों के आसपास चर्बी जमा हो रही है, खासकर लिवर के पास, यह फैट बहुत एक्टिव होता है और शरीर में इंसुलिन रेसिस्टेंस बढ़ाता है. इसलिए अगर आपका पेट बढ़ा है पर बाकी शरीर नॉर्मल है, तो यह फैटी लिवर का शुरुआती चेतावनी संकेत हो सकता है.

अगर आपका पेट बहुत ज्यादा उभरा हुआ और सख्त महसूस होता है, तो यह सिर्फ मोटापा नहीं हो सकता, यह संकेत है कि अंदरूनी अंगों के आसपास चर्बी जमा हो रही है, खासकर लिवर के पास, यह फैट बहुत एक्टिव होता है और शरीर में इंसुलिन रेसिस्टेंस बढ़ाता है. इसलिए अगर आपका पेट बढ़ा है पर बाकी शरीर नॉर्मल है, तो यह फैटी लिवर का शुरुआती चेतावनी संकेत हो सकता है.

अगर आपकी गर्दन या बगल में सॉफ्ट टाइनी बंप्स या सफेद पिंपल्स दिखाई दे रहे हैं, तो इसे हल्के में न लें. यह इंसुलिन के लंबे समय तक ज्यादा मात्रा में बने रहने के कारण होता है. यह शरीर का तरीका है बताने का कि आपकी कोशिकाएं इंसुलिन को सही से नहीं पहचान रही यानी इंसुलिन रेसिस्टेंस शुरू हो चुका है.

अगर आपकी गर्दन या बगल में सॉफ्ट टाइनी बंप्स या सफेद पिंपल्स दिखाई दे रहे हैं, तो इसे हल्के में न लें. यह इंसुलिन के लंबे समय तक ज्यादा मात्रा में बने रहने के कारण होता है. यह शरीर का तरीका है बताने का कि आपकी कोशिकाएं इंसुलिन को सही से नहीं पहचान रही यानी इंसुलिन रेसिस्टेंस शुरू हो चुका है.

कुछ लोगों के टखनों या पैरों पर लाल या बैंगनी रेखाएं दिखती हैं.ये शरीर में खराब ब्लड सर्कुलेशन और मेटाबोलिज्म के असंतुलन का संकेत हो सकता है, जो अक्सर इंसुलिन रेसिस्टेंस से जुड़ा होता है.इसके अलावा अगर चेहरा फूला हुआ, गाल भारी और चीकबोन्स कम दिखें, तो यह भी लिवर में फैट जमा होने का संकेत है.

कुछ लोगों के टखनों या पैरों पर लाल या बैंगनी रेखाएं दिखती हैं.ये शरीर में खराब ब्लड सर्कुलेशन और मेटाबोलिज्म के असंतुलन का संकेत हो सकता है, जो अक्सर इंसुलिन रेसिस्टेंस से जुड़ा होता है.इसके अलावा अगर चेहरा फूला हुआ, गाल भारी और चीकबोन्स कम दिखें, तो यह भी लिवर में फैट जमा होने का संकेत है.

अगर आपका ब्लड प्रेशर बार-बार 140/90 mmHg से ऊपर जा रहा है, तो यह भी एक चेतावनी संकेत है. इंसुलिन रेसिस्टेंस के कारण ब्लड वेसेल्स सख्त होने लगती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है. यह स्थिति न सिर्फ दिल बल्कि लिवर पर भी अतिरिक्त दबाव डालती है. ऐसे में इससे बचने के लिए अपनी डाइट में तेल, चीनी और प्रोसेस्ड फूड कम करें, रोजाना कम से कम 30 मिनट चलना या एक्सरसाइज करना शुरू करें, नींद पूरी लें और तनाव कम करें.

अगर आपका ब्लड प्रेशर बार-बार 140/90 mmHg से ऊपर जा रहा है, तो यह भी एक चेतावनी संकेत है. इंसुलिन रेसिस्टेंस के कारण ब्लड वेसेल्स सख्त होने लगती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है. यह स्थिति न सिर्फ दिल बल्कि लिवर पर भी अतिरिक्त दबाव डालती है. ऐसे में इससे बचने के लिए अपनी डाइट में तेल, चीनी और प्रोसेस्ड फूड कम करें, रोजाना कम से कम 30 मिनट चलना या एक्सरसाइज करना शुरू करें, नींद पूरी लें और तनाव कम करें.

Published at : 06 Nov 2025 07:24 PM (IST)

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भारत में इन 4 वजहों से 99 पर्सेंट लोगों को पड़ता है हार्ट अटैक, जानें खतरा पहचानने के तरीके

भारत में इन 4 वजहों से 99 पर्सेंट लोगों को पड़ता है हार्ट अटैक, जानें खतरा पहचानने के तरीके



Rising Heart Attack Trends: भारत में दिल से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और तनाव से भरी लाइफस्टाइल ने लोगों के दिल की सेहत को सबसे बड़ा खतरा बना दिया है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर अब भी लोग अपने खानपान और लाइफस्टाइल पर ध्यान नहीं देंगे, तो आने वाले सालों में हार्ट अटैक के मामले और बढ़ सकते हैं. समय रहते शरीर के संकेतों को पहचानना और नियमित जांच कराना जरूरी है ताकि इस खामोश खतरे से बचा जा सके.

भारत में क्यों बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले?

भारत में हार्ट डिजीज मौत का सबसे बड़ा कारण बन चुका है. 2014 से 2019 के बीच देश में हार्ट अटैक के मामलों में करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है. शहरीकरण, बदलती लाइफस्टाइल, खराब खानपान, तनाव, धूम्रपान और डायबिटीज जैसी बीमारियां इसके मुख्य कारण हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह समस्या केवल सेहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर देश की अर्थव्यवस्था, परिवारों की स्थिरता और कामकाजी जीवन पर भी पड़ रहा है.

हार्ट अटैक क्यों होता है?

हार्ट अटैक तब होता है जब दिल तक जाने वाली रक्त आर्टरीज में खून का प्रवाह किसी थक्के या ब्लॉकेज से रुक जाता है. इससे दिल की मांसपेशियों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और कुछ ही देर में कोशिकाएं मरने लगती हैं. अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है. विजयवाड़ा स्थित श्रीमाथा हर्ट क्लिनिक में हृदय रोग विशेषज्ञ टी. सुमन कुमार के अनुसार, “ज्यादातर हार्ट अटैक, स्ट्रोक और हार्ट फेल्योर अचानक नहीं होते, बल्कि उनके रिस्क फैक्टर पहले से हमारे शरीर में मौजूद होते हैं, जैसे कि हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, मोटापा और धूम्रपान.”

शरीर में छिपे चार बड़े खतरे

डॉक्टरों के मुताबिक, ज्यादातर लोगों को पहला हार्ट अटैक अचानक नहीं होता, बल्कि उसके पीछे कुछ साइलेंट रिस्क फैक्टर्स छिपे रहते हैं, जैसे कि  

हाई ब्लड प्रेशर – लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर धमनियों की दीवारों को नुकसान पहुंचाता है.

कोलेस्ट्रॉल – खून में बढ़ा हुआ LDL कोलेस्ट्रॉल आर्टरीज में फैटी डिपॉजिट बना देता है, जिससे रक्त प्रवाह बाधित होता है.

ब्लड शुगर या डायबिटीज– बढ़ी हुई शुगर ब्लड सेल्स को कमजोर करती है और हार्ट डिजीज का खतरा कई गुना बढ़ाती है.

स्मोकिंग – तंबाकू हार्ट और आर्टरीज दोनों को नुकसान पहुंचाता है.

ये सभी फैक्टर धीरे-धीरे असर करते हैं, लेकिन लक्षण तब दिखते हैं जब खतरा बढ़ चुका होता है. इसलिए नियमित जांच जरूरी है.

कैसे कम करें हार्ट अटैक का खतरा?

अच्छी बात यह है कि इन ज्यादातर जोखिमों को नियंत्रित किया जा सकता है. सही खानपान, नियमित व्यायाम और मेडिकल जांच से हार्ट अटैक का खतरा काफी घटाया जा सकता है. इसके लिए आपको अपनी डाइट में कुछ सुधार करने की जरूरत होती है, जैसे कि इसमें फलों, हरी सब्जियों, साबुत अनाज और हेल्दी फैट्स को शामिल करें. इसके अलावा व्यायाम करें, जिसमें रोजाना कम से कम 30 मिनट की वॉक या योग करें. जहां तक हो सके, स्मोकिंग छोड़ें. तंबाकू का सेवन बंद करने से हार्ट डिजीज का खतरा तुरंत घटता है. ज्यादातर स्ट्रोक और हार्ट अटैक इसलिए होते हैं क्योंकि लोग अपने स्वास्थ्य की निगरानी नहीं करते. अगर समय पर जांच की जाए, तो डॉक्टर शुरुआती चरण में ही इलाज शुरू कर सकते हैं. विशेष रूप से 30 साल से ऊपर के लोगों या परिवार में हार्ट डिजीज का हिस्ट्री वालों को नियमित जांच करवानी चाहिए.

इसे भी पढ़ें: Women Sleep Needs: क्या सच में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को होती है नींद की जरूरत, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या होगा अगर एक बार में पी लेंगे ढेर सारा पानी, ऐसा करना हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक?

क्या होगा अगर एक बार में पी लेंगे ढेर सारा पानी, ऐसा करना हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक?



पानी हमारी लाइफ के लिए बेहद जरूरी है. यह न सिर्फ हमारे शरीर को हाइड्रेटेड रखता है, बल्कि पाचन, ब्लड फ्लो, शरीर का तापमान कंट्रोल करने और दिमाग के सही कामकाज के लिए भी जरूरी है. हम अक्सर सुनते हैं कि दिन में आठ गिलास पानी पियो या पानी जरूरी है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बहुत ज्यादा पानी पीना भी खतरनाक हो सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अगर एक बार में ढेर सारा पानी पी लेंगे तो क्या होगा और ऐसा करना हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक है. 

अगर एक बार में ढेर सारा पानी पी लेंगे तो क्या होगा

अगर एक बार में ढेर सारा पीना, खासकर थोड़े समय में बहुत ज्यादा मात्रा में पी लेना, शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे सोडियम को पतला कर सकता है. जब सोडियम का लेवल इंबैलेंस हो जाता है, तो यह जल विषाक्तता आनी Water Intoxication या हाइपोनेट्रेमिया जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है. इस स्थिति में शरीर के सेल्स पानी से सूजने लगती हैं और दिमाग पर दबाव बढ़ जाता है, जो कभी-कभी लाइफ के लिए भी खतरे का कारण बन सकता है. हालांकि यह स्थिति आम लोगों में बहुत कम होती है, लेकिन यह उन लोगों में ज्यादा दिखाई देती है जो एथलीट हैं और लंबे समय तक खेल या एक्सरसाइज करते हैं, कुछ विशेष बीमारियों से पीड़ित हैं और बिना प्यास के लगातार बहुत सारा पानी पीते हैं.

ऐसा करना हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक है

1.  लगातार साफ यूरिन आना – अगर आपका यूरिन लगातार रंगहीन और साफ है, तो यह संकेत है कि शरीर को जरूरत से ज्यादा पानी मिल रहा है. हल्का पीला यूरिन आम तौर पर सही हाइड्रेशन का संकेत होता है, लेकिन लगातार साफ यूरिन यह बता सकता है कि इलेक्ट्रोलाइट्स इंबैलेंस  हो रहे हैं. 

2. जल्दी यूरिन आना – दिन में 8 से 10 बार से ज्यादा यूरिन आना यह संकेत हो सकता है कि गुर्दे एक्स्ट्रा पानी निकालने के लिए ज्यादा मेहनत कर रहे हैं. इससे शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी भी हो सकती है. 

3. मतली, उल्टी और चक्कर आना – ज्यादा पानी पीने से शरीर में सोडियम की कमी होती है, जिससे मतली, कभी-कभी उल्टी और चक्कर आने लगते हैं. इसे अक्सर डिहाइड्रेशन समझ लिया जाता है, जबकि यह पानी के ज्यादा सेवन के कारण होता है. 

4. दिमाग की सूजन से सिरदर्द – जब शरीर में सोडियम कम हो जाता है, तो पानी दिमाग की कोशिकाओं में चला जाता है. इससे दिमाग में सूजन आ जाती है और तेज सिरदर्द शुरू हो जाता है. 

5. भ्रम और ब्रेन फॉग – ज्यादा पानी दिमाग के नॉर्मल काम करने को असर कर सकता है. ऐसे लोग भ्रमित, फोकस में दिक्कत, चिड़चिड़ा या थका हुआ महसूस कर सकते हैं. 

6. सूजन और स्किन का रंग बदलना – शरीर के हाथ, पैर, होंठ और चेहरे में सूजन दिखाई दे सकती है. स्किन फीकी या खींची हुई लग सकती है क्योंकि ज्यादा पानी सेल्स और टिशू में जमा हो जाता है. 

7. थकान और शारीरिक कमजोरी – गुर्दे एक्स्ट्रा पानी को निकालने के लिए एक्स्ट्रा मेहनत करते हैं, जिससे शरीर थका हुआ और कमजोर महसूस करता है. 

8. मांसपेशियों में ऐंठन – इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी के कारण मांसपेशियों में ऐंठन, मरोड़ या झटके महसूस हो सकते हैं. 

9. दौरे पड़ने का खतरा – गंभीर मामलों में, सोडियम का स्तर तेजी से गिर सकता है, जिससे दौरे, बेहोशी या चेतना का अचानक खोना हो सकता है. 

10. सांस लेने में मुश्किल – दिमाग की सूजन श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकती है. इससे सांस लेने में मुश्किल हो सकती है और यह जल्दी जानलेवा हो सकता है. 

कितना पानी पिएं 

इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन (IOM) के अनुसार, हर व्यक्ति की पानी की जरूरत अलग होती है. यह उम्र, शरीर का आकार, गतिविधि और मौसम पर निर्भर करता है. सामान्य रूप से वयस्क महिलाओं को  प्रतिदिन लगभग 2.7 लीटर पानी पीना चाहिए और वयस्क पुरुषों को प्रतिदिन लगभग 3.7 लीटर पानी पीना चाहिए. पानी की मात्रा को प्यास के अनुसार लेना चाहिए. 

यह भी पढ़ें: कम नींद और हेयर फॉल के बीच क्या है कनेक्शन? जानें एक्सपर्ट्स की राय

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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