अचानक दुनिया क्यों छोड़ गए दुबई के ट्रैवल इंफ्लुएंसर अनुनय सूद? जान लें उनकी मौत का असली कारण

अचानक दुनिया क्यों छोड़ गए दुबई के ट्रैवल इंफ्लुएंसर अनुनय सूद? जान लें उनकी मौत का असली कारण



Anunay Sood Death: 32 साल के मशहूर ट्रैवल क्रिएटर अनुनय सूद का लास वेगास में निधन हो गया है. इस खबर ने उनके फैंस और इंफ्लुएंसर कम्यूनिटी को झकझोर कर रख दिया है. शानदार ट्रैवल फोटोग्राफी, एडवेंचरस लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया पर जबरदस्त फॉलोइंग के लिए जाने जाने वाले अनुनय ने डिजिटल ट्रैवल दुनिया में एक खास पहचान बनाई थी. दुबई में रहने वाले और भारत से ताल्लुक रखने वाले अनुनय सूद का काम लोगों को दूर-दराज के इलाकों की खूबसूरती दिखाने और ट्रैवल को एक नए नजरिए से समझने के लिए प्रेरित करता था. उनके परिवार की तरफ से सोशल मीडिया पर पोस्ट करके उनके निधन की खबर दी गई. चलिए आपको बताते हैं कि उनकी मौत कैसे हो गई?

कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं

हालांकि अनुनय सूद की मौत की वजह को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कुछ रेडिट रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उनका निधन हार्ट अटैक से हुआ. हालांकि, उनके परिवार की ओर से अभी तक इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी साझा नहीं की गई है. परिवार ने उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक पोस्ट शेयर करते हुए सभी से प्राइवेसी की अपील की है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स हार्ट अटैक का जिक्र करती हैं, लेकिन सच्चाई क्या है, ये फिलहाल साफ नहीं है. हालांकि जब तक इसको लेकर कोई ऑफिशियल जानकारी नहीं आती, तब तक कुछ साफ नहीं कहा जा सकता. 

अनुनय सूद दुबई में रहने वाले एक लोकप्रिय ट्रैवल कंटेंट क्रिएटर थे. उनके इंस्टाग्राम पर 1.4 मिलियन फॉलोअर्स और यूट्यूब पर करीब 3.8 लाख सब्सक्राइबर्स थे. उन्होंने लगातार तीन साल तक फोर्ब्स इंडिया की टॉप 100 डिजिटल स्टार्स लिस्ट में जगह बनाई थी. स्विट्जरलैंड, सऊदी अरब और न्यूजीलैंड जैसे देशों के टूरिज्म बोर्ड्स के साथ उन्होंने कई प्रोजेक्ट किए थे. उनकी कहानियां और तस्वीरें लोगों को नई जगहों पर जाने का हौसला देती थीं.

30 साल की उम्र में हार्ट अटैक क्यों?

पिछले कुछ सालों में हार्ट अटैक के मामले काफी तेजी के साथ बढ़े हैं. इतनी कम उम्र में हार्ट अटैक जैसी घटना हैरान करती है. आमतौर पर 30 के दशक में हार्ट अटैक के मामले कम देखे जाते हैं, लेकिन हाल के स्टडी में यह बात सामने आई है कि अब युवा वर्ग में भी हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ रहा है. मायोकार्डियल इंफार्क्शन इन यंग इंडिविजुअल्स नामक एक स्टडी में बताया गया है कि लाइफस्टाइल से जुड़ी आदतें जैसे धूम्रपान, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और खराब कोलेस्ट्रॉल लेवल, युवा उम्र में भी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पतंजलि का स्वदेशी मंत्र: भारतीय परंपराओं का हुआ पुनरुद्धार, सुरक्षित हुई सांस्कृतिक धरोहर!

पतंजलि का स्वदेशी मंत्र: भारतीय परंपराओं का हुआ पुनरुद्धार, सुरक्षित हुई सांस्कृतिक धरोहर!



आज के वैश्वीकरण के दौर में, जहां पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, भारतीय परंपराओं का संरक्षण एक चुनौती बन गया है. पतंजलि ने बताया है कि कंपनी ने न केवल स्वास्थ्य उत्पादों के माध्यम से बल्कि सांस्कृतिक जागरूकता अभियानों के जरिए भारतीय विरासत को पुनर्जीवित करने का अभियान चलाया है. पतंजलि का कहना है कि संस्था आयुर्वेद, योग और प्राचीन ज्ञान को आधुनिक जीवनशैली से जोड़कर सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा कर रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रयास न केवल स्वास्थ्य को मजबूत कर रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रखने का माध्यम भी बन रहा है.

पतंजलि का कहना है, ”कंपनी 5000 से ज्यादा उत्पादों के साथ बाजार में है, जिनमें हर्बल साबुन से लेकर योगिक चाय तक सब कुछ शामिल है. लेकिन पतंजलि का योगदान केवल व्यावसायिक नहीं है; यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रतीक है. कंपनी के ‘स्वदेशी आंदोलन’ के तहत लाखों लोगों को आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया गया. योग शिविरों के माध्यम से प्राचीन ग्रंथों जैसे ‘योगसूत्र’ और ‘चरक संहिता’ का प्रचार हो रहा है, जो भारतीय दर्शन की नींव हैं.”

संस्कृति का बीज बोता है पतंजलि- बाबा रामदेव

बाबा रामदेव कहते हैं, “पतंजलि केवल उत्पाद नहीं बेचता, बल्कि वह संस्कृति का बीज बोता है. हमारी परंपराएं स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता का खजाना हैं, जिन्हें आधुनिक विज्ञान से जोड़कर हम वैश्विक पटल पर मजबूत कर रहे हैं.”

पतंजलि ने बताया, ”हर्बल उत्पादों ने स्थानीय किसानों को जड़ी-बूटियों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया. इससे न केवल आर्थिक सशक्तिकरण हुआ, बल्कि प्राचीन कृषि परंपराओं का संरक्षण भी. पतंजलि का जैविक खेती मॉडल वेदों में वर्णित ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को जीवंत करता है. यह सांस्कृतिक धरोहर को पर्यावरण से जोड़कर स्थायी विकास सुनिश्चित करता है.”

धरोहर की रक्षा है परंपराओं का पुनरुद्धार- पतंजलि

पतंजलि का दावा है, ”हमारे योग कार्यक्रमों में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों ने भाग लिया, जो भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार का प्रमाण है. पतंजलि का मॉडल सांस्कृतिक संरक्षण को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाता है. भविष्य में जब जलवायु परिवर्तन और सांस्कृतिक क्षय की चुनौतियां बढ़ेंगी, ऐसे प्रयास भारतीय पहचान को मजबूत करेंगे. अंततः, पतंजलि साबित कर रहा है कि परंपराओं का पुनरुद्धार न केवल धरोहर की रक्षा है, बल्कि एक स्वस्थ, समृद्ध राष्ट्र का निर्माण भी.”

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कम नींद और हेयर फॉल के बीच क्या है कनेक्शन? जानें एक्सपर्ट्स की राय

कम नींद और हेयर फॉल के बीच क्या है कनेक्शन? जानें एक्सपर्ट्स की राय



आज की खराब और बिजी लाइफस्टाइल में लोग अक्सर काम, तनाव और सोशल मीडिया के कारण अपनी नींद को नजरअंदाज कर देते हैं. कभी देर रात तक मोबाइल चलाना, तो कभी काम का प्रेशर, ये सब बातें हमारी नींद को बुरी तरह से प्रभावित करती हैं. बहुत से लोग सोचते हैं कि नींद पूरी न होने से बस थोड़ा-सा सिर भारी लगेगा या थकावट महसूस होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका असर आपके बालों पर भी सीधा पड़ता है. अगर आप समय पर नहीं सोते या नींद पूरी नहीं करते, तो आपके बाल धीरे-धीरे कमजोर होकर झड़ने लगते हैं. एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि अच्छी नींद सिर्फ शरीर को नहीं, बल्कि आपके बालों को भी रिपेयर और हेल्दी रखने में मदद करती है. तो आइए जानते हैं कि नींद की कमी की वजह से कैसे बाल झड़ने की समस्या हो सकती है. 

बाल झड़ने की समस्या? हो सकती है नींद की कमी की वजह

हमारे बाल भी हमारे शरीर का ही हिस्सा हैं, जिन्हें भी पोषण और आराम की जरूरत होती है. जब हम रात को गहरी और पूरी नींद लेते हैं, तो हमारा शरीर रिपेयर मोड में चला जाता है. इस दौरान बालों की जड़ें भी मजबूत होती हैं और बालों की ग्रोथ अच्छी होती है. लेकिन अगर नींद पूरी नहीं होती, तो यह रिपेयर सिस्टम अधूरा रह जाता है. जिसके कारण बालों की जड़ें कमजोर होने लगती हैं और धीरे-धीरे बाल टूटने और झड़ने लगते हैं. 

नींद की कमी से होने वाली दिक्कतें 
 
नींद की कमी से हमारे शरीर में कॉर्टिसोल नाम का स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाता है. ये हार्मोन हमारे शरीर को स्ट्रेस में डाल देता है. और जब तनाव बढ़ता है, तो उसका सीधा असर बालों की सेहत पर होता है. कॉर्टिसोल की अधिकता से बालों की जड़ों तक पहुंचने वाला ब्लड सर्कुलेशन कम हो जाता है, जिससे पोषण नहीं मिल पाता और बाल गिरने लगते हैं. वहीं  अधूरी नींद सिर्फ बालों को कमजोर नहीं करती, बल्कि आपकी स्कैल्प यानी सिर की स्किन को भी नुकसान पहुंचाती है. नींद न पूरी होने से स्कैल्प कभी बहुत ड्राई हो जाती है, तो कभी बहुत ऑयली, इससे डैंड्रफ, खुजली और जलन जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं, स्कैल्प में बैलेंस न रहने से बालों की जड़ें भी कमजोर हो जाती हैं और हेयर फॉल की समस्या तेज हो जाती है. 
 
हेयर फॉल कम करने के लिए कितनी नींद होनी चाहिए?
 
एक्सपर्ट्स की मानें तो रोजाना कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद लेना बहुत जरूरी है. अगर आप सोने का समय तय कर लें और रोज एक रूटीन बना लें, तो आपकी नींद भी और बालों की सेहत भी सुधरेगी . नींद पूरी करने से न सिर्फ बालों की ग्रोथ बेहतर होती है, बल्कि आपके चेहरे पर भी फ्रेशनेस और शरीर में एनर्जी बनी रहती है. 
 
हेयर फॉल कम करने के लिए क्या करें?

1. सोने से कम से कम 1 घंटा पहले मोबाइल या लैपटॉप से दूरी बना लें. 
2. रात में हल्का खाना खाएं, ताकि नींद में कोई रुकावट न आए. 
3. स्ट्रेस कम करने के लिए ध्यान, योग या मेडिटेशन करें. 
4. इसके साथ ही कोशिश करें कि रोजाना एक तय समय पर सोएं और उठें.
5. अगर नींद की समस्या लगातार बनी रहे, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें. 
 
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क्या आपने कराई कैंसर की जांच? एक्सपर्ट्स कह रहे हैं देर न करें, लापरवाही पड़ सकती है भारी

क्या आपने कराई कैंसर की जांच? एक्सपर्ट्स कह रहे हैं देर न करें, लापरवाही पड़ सकती है भारी



आज के समय में कैंसर सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी बन चुकी है. लेकिन अच्छी बात यह है कि अगर इसका पता शुरुआती दौर में चल जाए, तो इसका इलाज आसान और असरदार हो सकता है फिर भी भारत में सिर्फ लगभग 29 प्रतिशत लोग ही समय पर जांच करवाते हैं, यानी ज्यादातर मामलों में बीमारी तब पता चलती है जब वो बढ़ चुकी होती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि नियमित स्क्रीनिंग से कैंसर को जड़ से खत्म किया जा सकता है और जान बचाई जा सकती है. तो आइए जानते हैं  क्यों जरूरी है कैंसर की जांच और कौन-कौन सी जांचें कब करवानी चाहिए. 

कैंसर की जांच क्यों जरूरी है?

कैंसर का सबसे बड़ा खतरा यही है कि यह शुरू में लक्षण नहीं दिखता, जब तक बीमारी का असर दिखना शुरू होता है, तब तक यह अक्सर शरीर के अंदर फैल चुकी होती है.अगर कैंसर का पता पहले चरण में चल जाए, तो इलाज आसान होता है, खर्च कम आता है और ठीक होने की संभावना ज्यादा रहती है. यही वजह है कि डॉक्टर बार-बार कहते हैं समय पर जांच कराओ. 

भारत में स्थिति क्या है?

हर साल भारत में करीब 14 लाख नए कैंसर के मामले सामने आते हैं. इनमें से ज्यादातर का पता देर से चलता है. कुल मिलाकर केवल 29 प्रतिशत कैंसर का ही शुरुआती दौर में पता चल पाता है.  जिसमें स्तन कैंसर  सिर्फ 15 प्रतिशत मामलों का समय पर पता चलता है. सर्विक्स कैंसर  करीब 33 प्रतिशत का ही शुरुआती निदान होता है. वहीं 
ओरल और कोलोरेक्टल कैंसर 20 प्रतिशत से भी कम मामलों में जल्दी पकड़ में आते हैं. ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत को जागरूकता और नियमित जांच की बहुत जरूरत है.

कौन-सी जांचें कब करानी चाहिए?

सरकार और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ खास उम्र के बाद हर व्यक्ति को कुछ जरूरी कैंसर जांचें करवानी चाहिए. 

1. मुंह का कैंसर – 30 साल से ऊपर के सभी वयस्क, खासकर तंबाकू या शराब लेने वाले पुरुषों को साल में एक बार मुंह की जांच (VIA/VILI) करानी चाहिए.इसमें डॉक्टर मुंह के अंदर एसिटिक एसिड या लुगोल आयोडीन से जांच करते हैं. 

2. सर्विक्स कैंसर – 21-29 वर्ष की महिलाओं को हर तीन साल में पैप टेस्ट कराना चाहिए.30-65 वर्ष की महिलाओं को हर पांच साल में पैप, एचपीवी टेस्ट, या सिर्फ पैप टेस्ट हर तीन साल में कराना चाहिए. 

3. स्तन कैंसर – 30 वर्ष से ऊपर की महिलाओं को हर साल क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जामिनेशन  कराना चाहिए. 40 वर्ष के बाद हर 1-2 साल में मैमोग्राफी या अल्ट्रासाउंड करवाना जरूरी है. अगर परिवार में किसी को ब्रेस्ट कैंसर रहा हो तो जांच जल्दी शुरू करनी चाहिए. 

4. कोलोरेक्टल कैंसर – 45 साल से ऊपर के लोगों को कोलोनोस्कोपी या मल आधारित टेस्ट हर 5–10 साल में करवाने की सलाह दी जाती है. 

5. फेफड़ों का कैंसर – 55-80 वर्ष के भारी धूम्रपान करने वालों को साल में एक बार लो-डोज सीटी स्कैन कराने की सलाह दी जाती है. आम लोगों के लिए यह जांच जरूरी नहीं है. 

6. प्रोस्टेट कैंसर – 50 वर्ष से ऊपर के पुरुषों को PSA ब्लड टेस्ट और डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन करवाने की सलाह दी जाती है. परिवार में अगर किसी को यह कैंसर रहा हो, तो जांच पहले से शुरू करनी चाहिए. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर दिन हल्दी खाने से शरीर को मिलते हैं कमाल के ये 8 फायदे, जानें एक्सपर्ट्स क्या देते हैं राय?

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यंग डायबिटीज पेशेंट्स में सबसे पहले आंखों पर दिखता है असर, जानें क्या है डायबिटिक रेटिनोपैथी?

यंग डायबिटीज पेशेंट्स में सबसे पहले आंखों पर दिखता है असर, जानें क्या है डायबिटिक रेटिनोपैथी?



भारत में डायबिटीज की समस्या तेजी से बढ़ रही है और अब इसका असर युवाओं में भी दिखने लगा है. ICMR–India Diabetes 2024 की स्टडी के अनुसार देश में हर छठा डायबिटीज पेशेंट 40 साल से कम उम्र का है. इतनी कम उम्र में डायबिटीज होना आगे चलकर कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है. वहीं इन्हीं में से एक डायबिटिक रेटिनोपैथी है जो आंखों के रेटिना को नुकसान पहुंचती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि यंग डायबिटीज पेशेंट्स में सबसे पहले आंखों पर कैसे असर दिखाता है और डायबिटिक रेटिनोपैथी क्या है.

क्या है डायबिटीज रेटिनोपैथी?

डायबिटिक रेटिनोपैथी ऐसी कंडीशन है, जिसमें लगातार बदलते ब्लड शुगर लेवल के कारण रेटिना की छोटी ब्लड सेल्स कमजोर हो जाती है. वहीं रेटिना आंख का वह हिस्सा है जो रोशनी को पहचानता है और देखने में मदद करता है. ब्लड शुगर बढ़ने पर इन सेल्स में सूजन या ब्लीडिंग होने लगती है और धीरे-धीरे नई असामान्य सेल्स बनने लगती है जो आंखों की रोशनी पर असर डालती है. अगर समय पर इसका पता न लगे तो यह पूरी तरह अंधेपन का खतरा पैदा कर सकती हैं.

यंग पेशेंट में बढ़ रहा सबसे ज्यादा खतरा

कम उम्र में डायबिटीज होने वाले मरीजों में यह खतरा ज्यादा रहता है, क्योंकि बीमारी की अवधि लंबी होती है. ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी 2025 के आंकड़ों के अनुसार 40 साल से कम उम्र के लगभग 12 से 15 प्रतिशत भारतीय डायबिटीज मरीजों में रेटिनोपैथी के शुरुआती लक्षण दिखने लगते हैं. इसे लेकर एक्सपर्ट्स कहते हैं की रेटिना आंख का सबसे संवेदनशील हिस्सा है और डायबिटीज का सबसे पहला असर यहीं पर दिखाई देता है. शुरुआती स्टेज में इसका कोई लक्षण नहीं होता है, लेकिन अंदर ही अंदर नुकसान शुरू हो जाता है. इसलिए ब्लड शुगर कंट्रोल में रखना और साल में कम से कम एक बार आंख की जांच करना बहुत जरूरी होता है.

आधुनिक लाइफस्टाइल से बढ़ रहा खतरा

लगातार हाई ब्लड शुगर लेवल रेटिना तक ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की सप्लाई को प्रभावित करता है. इससे आंखों की कोशिकाओं में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ती है. वहीं आजकल की लाइफ स्टाइल जैसे प्रोसेस्ड फूड खाना, स्क्रीन टाइम बढ़ना, तनाव और नींद की कमी भी इस समस्या को और बढ़ा देती है.  इसके अलावा ब्लड प्रेशर हाई कोलेस्ट्रॉल और स्मोकिंग की आदत रेटिना की सेल्स को और कमजोर कर देती है.

कैसे करें आंखों की सुरक्षा?

  • आंखों को सुरक्षित रखने के लिए सबसे पहले ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखें.
  • वहीं अपनी डाइट में फाइबर, हरी सब्जियां, खट्टे फल, मछली, अलसी और अखरोट जैसे फूड शामिल करें.
  • रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की जगह साबुत अनाज और मिलेट्स का सेवन करें.
  • रोजाना 30 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी करें.
  • पर्याप्त पानी पिएं और 7 से 8 घंटे की नींद लें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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