किचन से आज की उठाकर फेंक दें ये चीजें, वरना बढ़ सकता है कैंसर का खतरा

किचन से आज की उठाकर फेंक दें ये चीजें, वरना बढ़ सकता है कैंसर का खतरा


प्लास्टिक कंटेनर और बोतलें: प्लास्टिक में रखा खाना या पानी ज़्यादा समय तक सुरक्षित नहीं रहता. प्लास्टिक से निकलने वाले हानिकारक केमिकल्स खाने में मिलकर कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं.किचन से प्लास्टिक के बर्तन और बोतलें आज ही हटा दें.

बासी तेल: खाने का तेल दोबारा इस्तेमाल करना बहुत खतरनाक होता है. इसमें ‘ट्रांस फैट’ और टॉक्सिन्स बन जाते हैं, जो दिल की बीमारियों और कैंसर का कारण बन सकते हैं.

बासी तेल: खाने का तेल दोबारा इस्तेमाल करना बहुत खतरनाक होता है. इसमें ‘ट्रांस फैट’ और टॉक्सिन्स बन जाते हैं, जो दिल की बीमारियों और कैंसर का कारण बन सकते हैं.

खुले में रखा नमक और मसाले: अगर नमक और मसाले खुले में रखे हों तो उनमें नमी और फंगस लग सकती है. फंगस से बनने वाला अफ्लाटॉक्सिन एक खतरनाक तत्व है, जो लिवर कैंसर का रिस्क बढ़ाता है.

खुले में रखा नमक और मसाले: अगर नमक और मसाले खुले में रखे हों तो उनमें नमी और फंगस लग सकती है. फंगस से बनने वाला अफ्लाटॉक्सिन एक खतरनाक तत्व है, जो लिवर कैंसर का रिस्क बढ़ाता है.

एल्यूमीनियम फॉयल में रखा खाना: कई लोग बचा हुआ खाना एल्यूमीनियम फॉयल में रख देते हैं. रिसर्च के अनुसार एल्यूमीनियम लंबे समय तक शरीर में जमा होकर कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है.

एल्यूमीनियम फॉयल में रखा खाना: कई लोग बचा हुआ खाना एल्यूमीनियम फॉयल में रख देते हैं. रिसर्च के अनुसार एल्यूमीनियम लंबे समय तक शरीर में जमा होकर कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है.

सड़े-गले फल और सब्ज़ियां: किचन में रखे खराब फल या सब्ज़ियां अगर गल चुकी हैं, तो उनमें खतरनाक बैक्टीरिया और फंगस पैदा हो जाते हैं. ऐसे फल-सब्ज़ियों का सेवन पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाने के साथ कैंसर का खतरा भी बढ़ा सकता है.

सड़े-गले फल और सब्ज़ियां: किचन में रखे खराब फल या सब्ज़ियां अगर गल चुकी हैं, तो उनमें खतरनाक बैक्टीरिया और फंगस पैदा हो जाते हैं. ऐसे फल-सब्ज़ियों का सेवन पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाने के साथ कैंसर का खतरा भी बढ़ा सकता है.

रेडीमेड पैकेज्ड स्नैक्स: चिप्स, नूडल्स, बिस्किट्स जैसे पैकेज्ड स्नैक्स में प्रिज़र्वेटिव्स और आर्टिफिशियल फ्लेवर्स होते हैं. इनका अधिक सेवन शरीर में टॉक्सिन्स जमा करता है, जो कैंसर का कारण बन सकता है.

रेडीमेड पैकेज्ड स्नैक्स: चिप्स, नूडल्स, बिस्किट्स जैसे पैकेज्ड स्नैक्स में प्रिज़र्वेटिव्स और आर्टिफिशियल फ्लेवर्स होते हैं. इनका अधिक सेवन शरीर में टॉक्सिन्स जमा करता है, जो कैंसर का कारण बन सकता है.

प्लास्टिक की पैकिंग वाली पनीर और दूध: बाजार से लाए गए पनीर या दूध अक्सर प्लास्टिक में पैक होते हैं. अगर इन्हें लंबे समय तक उसी पैकिंग में रखा जाए तो प्लास्टिक के केमिकल्स खाने में मिल सकते हैं.

प्लास्टिक की पैकिंग वाली पनीर और दूध: बाजार से लाए गए पनीर या दूध अक्सर प्लास्टिक में पैक होते हैं. अगर इन्हें लंबे समय तक उसी पैकिंग में रखा जाए तो प्लास्टिक के केमिकल्स खाने में मिल सकते हैं.

Published at : 28 Aug 2025 06:34 PM (IST)


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क्या डॉक्टरों की स्किल्स पर मंडरा रहा खतरा, अब AI के सहारे तो नहीं होगा इलाज?

क्या डॉक्टरों की स्किल्स पर मंडरा रहा खतरा, अब AI के सहारे तो नहीं होगा इलाज?


AI in Health Care: आज की मेडिकल दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को “भविष्य का डॉक्टर” कहा जा रहा है. एक्स-रे पढ़ने से लेकर कैंसर डिटेक्शन तक, AI ने हेल्थकेयर में चमत्कारी बदलाव किए हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यही टेक्नोलॉजी डॉक्टरों के हुनर को कमजोर भी बना सकती है? हाल ही में लैंसेट गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और हेपेटोलॉजी जर्नल में छपी एक स्टडी ने इस डर को सच साबित किया है.

पोलैंड में हुई अहम स्टडी

यह रिसर्च पोलैंड के चार कॉलोनोस्कोपी सेंटर्स में हुई। 2021 के अंत में यहां AI टूल्स का इस्तेमाल शुरू किया गया था, ताकि असामान्य कोशिकाओं को आसानी से पहचाना जा सके. लेकिन नतीजे चौंकाने वाले थे. पहले जहां बिना AI की मदद से एडेनोमा डिटेक्शन रेट यानी कैंसर बनने से पहले की कोशिकाओं का पता लगाना 28 प्रतिशत होता था. वहीं लगातार AI पर निर्भरता के बाद यह घटकर 22 प्रतिशत रह गया है.

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डॉक्टरों की स्किल्स पर खतरा क्यों?

शोधकर्ताओं ने बताया कि, AI पर लगातार जरूरत से ज्यादा भरोसा की आदत डाल सकती है. इससे तीन बड़े खतरे सामने आए.

  • डॉक्टर कम फोकस्ड रहते हैं।
  • जिम्मेदारी की भावना घटने लगती है
  • खुद से सोचने और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है
  • यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे हेल्थकेयर सिस्टम के लिए एक बड़ी चुनौती मान रहे हैं
  • दूसरी स्टडीज से उल्टा क्यों निकला नतीजा?

पहले कई रैंडमाइज्ड ट्रायल्स में यह सामने आया था कि AI की मदद से एडेनोमा डिटेक्शन बढ़ता है. लेकिन नए अध्ययन के लेखक डॉ. युइची मोरी का कहना है कि जो डॉक्टर AI के लगातार संपर्क में रहते हैं, वे बिना AI वाली कॉलोनोस्कोपी करते समय और भी कमजोर प्रदर्शन करने लगते हैं. यानी यह हुनर में कमी की स्थिति पैदा कर सकता है.

AI को अपनाना या सीमित करना चाहिए

CARPL.AI के संस्थापक डॉ. विदुर महाजन का मानना है कि टेक्नोलॉजी को रोकना समाधान नहीं है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि, सोचिए, गूगल मैप्स के बिना आज कोई ड्राइवर कितना भरोसेमंद लगेगा? उनका तर्क है कि AI का सही इस्तेमाल डॉक्टरों को “सर्वश्रेष्ठ” स्तर पर ले जा सकता है. असली चुनौती यह है कि डॉक्टरों और टेक्नोलॉजी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

AI ने मेडिकल दुनिया को नई ऊंचाइयां दी हैं, लेकिन पोलैंड की यह स्टडी बताती है कि जरूरत से ज्यादा भरोसा खतरनाक हो सकता है. डॉक्टरों की ट्रेनिंग और स्किल्स को लगातार मजबूत बनाना उतना ही जरूरी है जितना AI को हेल्थकेयर में अपनाना. वरना कहीं ऐसा न हो कि मशीनों पर भरोसा करते-करते इंसान अपना हुनर खो बैठे.

इसे भी पढ़ें: हल्की या भारी… किस तरह की एक्सरसाइज महिलाओं के लिए होती है बेस्ट? एक्सपर्ट से जानें

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.  

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अमेरिका में मिले इंसानी मांस खाने वाले स्क्रूवर्म, जानिए हमारे शरीर पर कैसे करते हैं अटैक

अमेरिका में मिले इंसानी मांस खाने वाले स्क्रूवर्म, जानिए हमारे शरीर पर कैसे करते हैं अटैक


अमेरिका में हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने हेल्थ एक्सपर्ट्स को सतर्क कर दिया है. यहां मैरीलैंड में रहने वाला एक शख्‍स एल साल्वाडोर से यात्रा करके लौटा था और उसके शरीर में न्यू वर्ल्ड स्क्रूवर्म नाम का परजीवी पाया गया. यह वही खतरनाक कीड़ा है जो मवेशियों और जंगली जानवरों के मांस में घुसकर गंभीर नुकसान पहुंचता है. इंसानों में इसके मामले बहुत दुर्लभ होते हैं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अमेरिका में इंसानी मांस खाने वाले स्क्रूवर्म हमारे शरीर पर कैसे अटैक करते हैं. 

क्या है स्क्रूवर्म?

स्क्रूवर्म दरअसल एक मक्‍खी का लार्वा है. मादा मक्‍खी खुले जख्‍मों या कटे-फटे हिस्‍सों पर अंडे देती है. अंडे फूटने के बाद सैकड़ों छोटे-छोटे लार्वा निकलते हैं, जो  मांस में अंदर घुस जाते हैं. यह घाव को धीरे-धीरे और गहरा करते जाते हैं. इसी वजह से इसे मांस खाने वाला परजीवी कहा जाता है. 

शरीर पर कैसे करता है अटैक? 

सबसे पहले यह लार्वा जख्म के ऊपरी हिस्से में घुसते हैं. इसके बाद धीरे-धीरे शरीर के अंदर गहराई तक पहुंच जाते हैं. फिर मरीज को घाव में तेज दर्द, जलन और असहज हलचल महसूस होती है. वहीं इसका समय रहते इलाज न होने पर घाव से बदबू आने लगती है और सेकेंडरी इंफेक्शन फैल सकता है. गंभीर मामलों में यह संक्रमण जानलेवा भी साबित हो सकता है. 

इलाज कितना मुश्‍क‍िल है

इसका उपचार बहुत कठिन और पीड़ादायक होता है. संक्रमित हिस्से से सभी लार्वा को मैनुअली निकालना पड़ता है और घाव को पूरी तरह से कीटाणु रह‍ित करना जरूरी होता है. साथ ही बैक्टीरियल इन्फेक्शन रोकने के लिए एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती है. जानवरों में कीटनाशक का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इंसानों के लिए यह तरीका संभव नहीं है. एक्सपर्ट्स  का मनना है कि इंसानों के मुकाबले मवेशी स्क्रूवर्म के लिए ज्यादा सुरक्षित है. अमेरिका का बीफ उद्योग अरबों डॉलर का है और अगर यह परजीवी फैला तो इसका भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है. टेक्सास जैसे राज्यों में तो अकेले का इसका असर 1.8 डॉलर तक पहुंच सकता है. 

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दिल्ली के आरोग्य मंदिरों में होंगी कौन-सी जांच, किन बीमारियों का होगा इलाज?

दिल्ली के आरोग्य मंदिरों में होंगी कौन-सी जांच, किन बीमारियों का होगा इलाज?


दिल्ली में बीजेपी सरकार ने शहर में आरोग्य मंदिर खोलने का काम शुरू किया है. इस योजना का उद्देश्य है कि लोगों को घर के पास ही बेहतर और जरूरत के हिसाब से जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं मिलें. इन हेल्थ सेंटर पर सिर्फ नॉर्मल बीमारियों का इलाज नहीं होगा, बल्कि यहां टेस्ट, वैक्सीनेशन, डिलवरी देखभाल और फिटनेस सुविधाएं भी उपलब्ध होंगी. चलिए आपको बताते हैं कि यहां कौन-कौन से इलाज होंगे और इनका लाभ आपको कैसे मिलेगा. 

आरोग्य मंदिर में कौन-कौन सी जांच होंगी?

आरोग्य मंदिर में लोगों को फ्री जांच और स्क्रीनिंग की सुविधा मिलेगी. इन जांचों में शामिल हैं-

  • कैंसर स्क्रीनिंग; पांच प्रकार के कैंसर का पता लगाने के लिए
  • डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर की जांच
  • 14 प्रकार की नियमित टेस्ट, जैसे ब्लड शुगर,डेंगू, मलेरिया और सिफलिस
  • 8 प्रकार की ब्लड टेस्ट
  • 79 अन्य टेस्ट आउटसोर्सिंग के जरिए, ताकि रिपोर्ट सिर्फ 30 मिनट में मिल सके

कौन-कौन सी स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी?

आरोग्य मंदिर में मरीजों को जरूरी फर्स्ट मेडिकल स्वास्थ्य सेवाएं दी जाएंगी. इनमें शामिल हैं-

  • प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए देखभाल,डिलवरी की सुविधा भी उपलब्ध होगी.
  • बच्चों के लिए 12 अलग अलग बीमारी  के टीके उपलब्ध होंगे
  • 105 प्रकार की जरूरी दवाइयां मुफ्त
  • नार्मल बीमारियों का इलाज, जैसे सर्दी, खांसी, बुखार
  • योग क्लास सप्ताह में दो बार, स्वास्थ्य और फिटनेस के लिए
  • फैमिली प्लानिंग काउंसलिंग

आरोग्य मंदिर बनाम मोहल्ला क्लिनिक्स

पहले के मोहल्ला क्लिनिक्स केवल नार्मल बीमारियों और बच्चों के टीकाकरण तक सीमित थे. इसकी शुरुआत आप सरकार ने शुरू की थी, जहां पहले कई बड़ी बीमारियों के लिए सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं. वहीं, आरोग्य मंदिर में हर उम्र के लोगों के लिए बड़ी संख्या में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होंगी.

सरकार का उद्देश्य

रेखा गुप्ता सरकार का मकसद है कि शहर के लोग बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं तक आसानी से पहुंचें. पहले चरण में 33 आरोग्य मंदिर बनेंगे और सभी सेवाएं सुबह 9:30 बजे से शाम 3:30 बजे तक उपलब्ध रहेंगी.

क्यों खास है आरोग्य मंदिर?

  • सभी टेस्ट और दवाइयां मुफ्त
  • गर्भवती महिलाओं के लिए पूरा केयर
  • बच्चों का टीकाकरण आसान और तेज
  • योग और फिटनेस पर ध्यान
  • टेस्ट रिपोर्ट तुरंत मिलने से समय की बचत

आरोग्य मंदिर दिल्ली के लोगों के लिए स्वास्थ्य की दुनिया में एक नई पहल है. सरकार के अनुसार, यहां से दिल्ली के लोगों को बेहतर इलाज उपलब्ध होंगे और लोगों को समय से स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी. हालांकि, अभी तक कई आरोग्य मंदिर मंदिर कई कारणों से अभी तक चालू नहीं हो पाए हैं. 

इसे भी पढ़ें: वेट लॉस की ये दवाई कर देगी सबकी छु्ट्टी, क्लीनिकल ट्रायल में मिले कमाल के रिजल्ट्स

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इंजेक्शन को कहें अलविदा: अब मोटापा और डायबिटीज पर असरदार साबित हो रही वेट लॉस टेबलेट

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मोटापा और टाइप टू डायबिटीज आज की तेज रफ्तार जिंदगी की सबसे बड़ी बीमारियों में गिनी जाती है. इलाज के लिए अब तक ज्यादातर मरीजों को इंजेक्शन पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब एक नई गोली ने उम्मीद की किरण दिखाई है. दवा बनाने वाली अमेरिकी कंपनी एली लिली ने अपने ताजा ट्रायल में यह दावा किया है कि उनकी नई वेट लॉस टेबलेट वजन और शुगर दोनों पर कारगर साबित हुई है. 

ट्रायल में क्या निकला नतीजा 

कंपनी ने इस दवा का तीसरा और अहम फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल पूरा किया है. ट्रायल का नाम था एटीटीएआईएन जिसमें दवा और ऑर्फोर्ग्लिप्रॉन दी गई. खास बात यह है कि यह glp-1 रिसेप्टर क्लास की पहली ऐसी दवा है जिसे गोली के रूप में पेश किया गया है. ट्रायल में शामिल मोटापा और डायबिटीज से परेशान लोगों को रोजाना दवा दी गई. इसके बाद नतीजे चौंकाने वाले रहे. 

  • इसके नतीजों में 72 हफ्तों में कई मरीजों का 10 किलो तक वजन घटा. 
  • प्लेसीबो यानी नकली दवा लेने वाले ग्रुप का वजन मुश्किल से 2 किलो कम हुआ. 
  • दवा लेने वाले मरीजों का ब्लड शुगर लेवल भी तेजी से कम हुआ.

इंजेक्शन के बराबर असरदार

एक्सपर्ट्स का कहना है कि गोली के रूप में आई यह दवा इंजेक्शन वाली जीएलपी-1 क्लास की तरह ही असरदार है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह दवा सुरक्षित भी है और असरदार भी. वहीं जिन मरीजों को इंजेक्शन लेने में परेशानी होती है उनके लिए यह एक बेहतरीन ऑप्शन हो सकती है. इस दवा ने वजन और शुगर कम करने के अलावा दिल से जुड़ी कई समस्याओं पर भी असर दिखाया. ट्रायल रिपोर्ट में सामने आया कि मरीज का ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स बेहतर हुए हैं. इसके अलावा शरीर में सूजन लगभग आधी यानी 50% तक कम हो गई. सबसे बड़ी बात ज्यादा खुराक लेने वाले 70% से ज्यादा प्रतिभागियों का a1c लेवल डायबिटीज-फ्री रेंज तक आ गया. 

आने वाले वक्त में बड़ा बदलाव 

अब तक वजन घटाने और डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए इंजेक्शन ही सबसे बड़ा विकल्प माने जाते थे, लेकिन गोली के तौर पर आया यह नया विकल्प आने वाले समय में लाखों मरीजों की जिंदगी आसान बना सकता है.

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जन्म के समय बच्चों को क्यों हो जाता है निमोनिया, हर साल इससे हो जाती हैं इतनी मौत

जन्म के समय बच्चों को क्यों हो जाता है निमोनिया, हर साल इससे हो जाती हैं इतनी मौत


Pneumonia in Newborn Babies: नवजात शिशु का जन्म किसी भी परिवार के लिए सबसे खूबसूरत पल होता है. लेकिन कई बार यही खुशी चिंता में बदल जाती है जब बच्चे को सांस लेने में तकलीफ़ होती है या बार-बार खाँसी और तेज बुखार आने लगता है. डॉक्टरों के अनुसार यह स्थिति निमोनिया की हो सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट बताती है कि, हर साल लाखों नवजात बच्चे निमोनिया से अपनी जान गंवा देते हैं. यह बीमारी बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की वजह से उन्हें जल्दी जकड़ लेती है.

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जन्म के समय क्यों होता है निमोनिया?

शिशुओं में निमोनिया होने की सबसे बड़ी वजह है उनका कमजोर इम्यून सिस्टम. जन्म के समय बच्चों के फेफड़े पूरी तरह से मजबूत नहीं होते, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.

क्या-क्या कारण हो सकते हैं

  • गर्भावस्था के दौरान माँ में संक्रमण होना
  • जन्म के समय साफ-सफाई की कमी
  • समय से पहले जन्म (प्रिमेच्योर बेबी) होने पर फेफड़े कमजोर रह जाते हैं
  • अस्पताल में अन्य संक्रमण का खतरा

बच्चों में निमोनिया के लक्षण

  • तेज बुखार रहना
  • लगातार खाँसी आना
  • सांस लेने में तेज़ी या कठिनाई होना
  • बच्चे का दूध न पीना या खाना न खाना
  • शरीर का ठंडा पड़ना या नीला पड़ना
  • इन लक्षणों को नज़रअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए

हर साल कितनी मौतें होती हैं?

WHO के अनुसार, 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मौत का सबसे बड़ा कारण निमोनिया है, आंकड़ों के मुताबिक, हर साल दुनिया भर में करीब 7 लाख से अधिक बच्चे निमोनिया की वजह से मर जाते हैं. इनमें सबसे ज्यादा संख्या नवजात और छोटे बच्चों की होती है.

बचाव कैसे संभव है?

  • गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और समय पर इलाज
  • बच्चे के जन्म के समय साफ-सफाई और सुरक्षित माहौल
  • बच्चे को जन्म के बाद तुरंत माँ का दूध (कोलोस्ट्रम) पिलाना, जिससे इम्यूनिटी बढ़े
  • समय पर टीकाकरण कराना
  • घर और आसपास साफ-सफाई बनाए रखना

नवजात शिशुओं में निमोनिया एक गंभीर बीमारी है जो सही समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकती है. हर साल लाखों मासूम इस संक्रमण का शिकार होकर अपनी जान गंवा देते हैं. इसलिए जरूरी है कि गर्भावस्था से लेकर जन्म और उसके बाद तक साफ-सफाई, पोषण और समय पर इलाज का पूरा ध्यान रखा जाए.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.  

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