लंबे समय से पेन किलर ले रहे हैं तो हो जाइए सावधान, खराब हो जाएंगे शरीर के ये अंग

लंबे समय से पेन किलर ले रहे हैं तो हो जाइए सावधान, खराब हो जाएंगे शरीर के ये अंग


आज के समय में सिर दर्द, कमर दर्द जोड़ों में दर्द या हल्की चोट लगने पर पेन किलर लेना आम बात हो गई है. बहुत से लोग बिना डॉक्टर की सलाह के ही लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करते रहते हैं. वहीं शुरुआत में तो पेन किलर राहत देती है, लेकिन लगातार इसके सेवन से यह आदत धीरे-धीरे शरीर के अंदरूनी अंगों के लिए खतरनाक बन सकती है. खासतौर पर किडनी और लिवर पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है, क्योंकि दवाओं को बाहर निकलने का कम इन्हीं अंगो के जरिए होता है. वहीं अक्सर दर्द कम होते ही लोग पेन किलर को सुरक्षित मान लेते हैं और इसके साइड इफेक्ट्स को नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही आगे चलकर गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि अगर आप भी लंबे समय से पेन किलर ले रहे हैं तो अब आपको सावधान क्यो होना चाहिए.

पेन किलर किडनी और लिवर को कैसे पहुंचती है नुकसान?

एक्सपर्ट्स के अनुसार पेन किलर शरीर में सूजन और दर्द को कम जरूर करती है, लेकिन लंबे समय तक लेने पर यह किडनी के ब्लड वेसल्स को प्रभावित कर सकती है. इससे किडनी तक खून का प्रवाह कम हो जाता है और उसकी कार्य क्षमता धीरे-धीरे घटने लगती है. वहीं लिवर का काम दवाओं को तोड़कर शरीर से बाहर निकलना होता है. लगातार पेन किलर लेने से लिवर पर एक्स्ट्रा दबाव पड़ता है, जिससे लिवर सेल्स को नुकसान पहुंच सकता है. कुछ मामलों में लिवर में सूजन फैटी लिवर या लिवर एंजाइम बढ़ने जैसी समस्याएं भी आती है. इसके अलावा पहले से किडनी या लिवर की बीमारी से जूझ रहे लोगों में इसका खतरा और ज्यादा होता है.

किडनी और लीवर खराब होने के लक्षण

अगर पेन किलर का असर किडनी और लिवर पर पड़ रहा है तो शरीर कुछ संकेत देने लगता है. किडनी से जुड़ी समस्या में बार-बार थकान महसूस होना, पैरों या चेहरे पर सूजन, पेशाब कम होना या उसके रंग में बदलाव दिखाई दे सकता है. वहीं लिवर खराब होने पर भूख न लगना, मतली, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, आंखों या त्वचा का पीला पड़ना जैसे लक्षण नजर आ सकते हैं. कई बार बिना तेज दर्द के भी अंदरूनी नुकसान होता रहता है. इसलिए हल्के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

पेन किलर की आदत क्यों बन जाती है खतरनाक?

एक्सपर्ट्स के अनुसार भारत में दर्द निवारक दवाएं आसानी से उपलब्ध है. इसलिए लोग सिर दर्द, शरीर दर्द या हल्के बुखार में भी खुद से दवा लेने लगते हैं. खासकर पेरासिटामोल और आइबुप्रोफेन जैसी दवाओं का बिना सलाह सेवन आम हो गया है. डॉक्टर बताते हैं कि पेन किलर पेट में जाकर गल जाती है और ब्लड सर्कुलेशन के जरिए पूरे शरीर में फैलती है. यह दर्द और सूजन पैदा करने वाले रसायनों को रोकते हैं, जिससे तुरंत राहत मिलती है. लेकिन यह प्रक्रिया लिवर पर एक्स्ट्रा दबाव डालती है.

ये भी पढ़ें-रोज ब्रश करने के बाद भी पीले हो रहे दांत, जानें क्या है इस दिक्कत की वजह?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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महिलाओं में थायरॉयड कैंसर का खतरा तीन गुना ज्यादा क्यों? जानिए इसके लक्षण, कारण और इलाज

महिलाओं में थायरॉयड कैंसर का खतरा तीन गुना ज्यादा क्यों? जानिए इसके लक्षण, कारण और इलाज


थायरॉइड कैंसर को अगर शुरुआती स्टेज में पकड़ लिया जाए तो यह सबसे ज्यादा इलाज योग्य कैंसर में से एक माना जाता है. बावजूद इसके इस बीमारी में एक चौंकाने वाला ट्रेंड लगातार देखा जा रहा है. दरअसल, इस बीमारी में देखा जा रहा है कि महिलाओं में इसका खतरा पुरुषों के मुकाबले लगभग तीन गुना ज्यादा है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स बताते हैं कि थायरॉइड कैंसर महिलाओं में खासतौर पर 40 से 50 वर्ष की उम्र में ज्यादा देखने को मिलता है, जबकि पुरुषों में यह बीमारी आमतौर पर 10 से 20 साल बाद सामने आती है.

 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि हार्मोनल कारण इसमें अहम भूमिका निभाते हैं. विशेष रूप से एस्ट्रोजन हार्मोन थायरॉइड कोशिकाओं की ग्रोथ को प्रभावित करता है, जिससे महिलाओं में खतरा बढ़ जाता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि महिलाओं के जीवन में बार-बार होने वाले हार्मोनल बदलाव जैसे किशोरावस्था, गर्भावस्था और मेनोपॉज थायरॉइड कोशिकाओं के असामान्य बदलावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बना सकते हैं. इसके अलावा महिलाओं में ऑटोइम्यून थायरॉइड बीमारियां भी ज्यादा पाई जाती है, वहीं लंबे समय तक थायरॉइड ग्रंथि में बनी रहने वाली सूजन आगे चलकर कैंसर के खतरे को बढ़ा सकती है.

पुरुषों में कम लेकिन ज्यादा खतरनाक होता है कैंसर

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पुरुषों में थायरॉइड कैंसर देर से पता चलता है, लेकिन जब होता है तो ज्यादा गंभीर अवस्था में सामने आता है. कई मामलों में पुरुषों में इसकी पहचान तब होती है, जब वह बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है.

थायरॉइड कैंसर के लक्षणों को न करें नजरअंदाज

थायरॉइड कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती लक्षण बहुत हल्के होते हैं और लोग उन्हें अनदेखा कर देते हैं. इसके सबसे आम संकेत गर्दन के सामने बिना दर्द की गांठ या सूजन है. इसके अलावा आवाज में लगातार बदलाव या भारीपन, निगलने में दिक्कत, गर्दन में दबाव या जकड़न महसूस होना, बिना संक्रमण के लगातार खांसी और गर्दन की लिम्फ नोड्स का बढ़ जाना इसके शुरुआती लक्षण होते हैं.

इलाज के नतीजे भी पॉजिटिव

आमतौर पर कैंसर का नाम सुनते ही लोगों में घबराहट होना स्वाभाविक होता है. लेकिन एक्सपर्ट्स बताते हैं कि थायरॉइड कैंसर के इलाज के नतीजे बहुत अच्छे होते हैं. इसमें इलाज का मुख्य तरीका सर्जरी है, जिसमें बीमारी की कंडीशन के अनुसार थायरॉइड ग्रंथि का कुछ हिस्सा या पूरी ग्रंथी निकाली जाती है. वहीं कुछ मरीजों को सर्जरी के बाद रेडियोएक्टिव, आयोडीन थेरेपी की जरूरत पड़ सकती है, जो बचे हुए कैंसर सेल्स को खत्म करने में मदद करती है. इसके अलावा ज्यादातर मरीजों को जीवन भर थायरॉइड हार्मोन की दवाई लेनी होती है, जिससे शरीर की सामान्य क्रियाएं बनी रहती है और कैंसर दोबारा होने का खतरा कम होता है. वहीं इसमें एडवांस्ड थेरेपी की जरूरत बहुत कम लोगों को पड़ती है.

क्या थायराइड कैंसर से बचाव संभव है?

थायरॉइड कैंसर को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है. लेकिन खतरे को कम जरूर किया जा सकता है. एक्सपर्ट्स अनावश्यक रेडिएशन एक्स्पोजर से बचने की सलाह देते हैं खासकर बचपन में. वहीं संतुलित आहार के जरिए पर्याप्त आयोडीन लेना भी थायरॉइड की सेहत के लिए जरूरी है, जिन लोगों को पहले थायरॉइड नोड्यूल, ऑटोइम्यून थायरॉयड बीमारी है उन्हें नियमित जांच कराते रहना चाहिए.

 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ऑफिस में हर 58 मिनट बाद करें 2 मिनट का यह काम, हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट का खतरा होगा कम

ऑफिस में हर 58 मिनट बाद करें 2 मिनट का यह काम, हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट का खतरा होगा कम


आजकल की लाइफस्टाइल में ज्यादा तर लोग ऑफिस या कॉरपोरेट जॉब में काम कर रहे हैं. ऐसे में दिन का ज्यादातर समय हम अपनी कुर्सी पर बैठे रहते हैं. कई बार तो लोग 8 से 10 घंटे तक लगातार बैठकर काम करते हैं. इस वजह से ना सिर्फ हमारी बॉडी की एक्टिविटी कम हो जाती है बल्कि दिल और ब्लड सर्कुलेशन जैसी हेल्थ संबंधी परेशानियां भी बढ़ जाती हैं.

हार्ट की बीमारियां आज के समय में दुनियाभर में मौत का सबसे बड़ा कारण बन चुकी हैं और इनमें सबसे बड़ी वजह लंबा समय लगातार बैठकर काम करना है. जब हम लंबे समय तक बिना मूवमेंट के बैठे रहते हैं, तो हमारे दिल और कार्डियोवस्कुलर सिस्टम पर नकारात्मक असर पड़ता है. ऐसे लोगों में हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में काफी ज्यादा हो जाता है. 

ऑफिस में हर 58 मिनट बाद करें 2 मिनट का यह काम

अगर आप हर घंटे सिर्फ 2 मिनट हल्की एक्सरसाइज करें, तो यह आपके दिल के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है. यह नियम खासतौर पर उन लोगों के लिए है जो डेस्क जॉब करते हैं या लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं. ऐसे में 58 मिनट काम करें और 2 मिनट हल्की एक्सरसाइज करें. इस तरीके से आप दिन के 8 घंटे के काम में करीब 8 बार अपने शरीर को एक्टिव कर सकते हैं. इससे ब्लड फ्लो बेहतर होता है, मसल्स जाम नहीं होते और दिल स्वस्थ रहता है. 

2 मिनट की एक्सरसाइज करने के आसान तरीके

1. ताई ची हॉप स्ट्रेच – इसमें सीधे खड़े हो जाएं. पैरों के पंजों के बल पर उछलते हुए हाथों को ऊपर-नीचे करें. कम से कम 50 बार दोहराएं. इसके बाद थोड़ी देर वॉक करें. 

2. सेमी पुश-अप्स – इसके लिए किसी मजबूत सोफा या कुर्सी का सहारा लें. पुश-अप्स की तरह अपने हाथों और शरीर को हल्का उठाएं और बैठें. कम से कम 10-15 रिपीटेशन करें. 

3. सिटिंग लेग रेजिस्टेंस – इसके लिए कुर्सी पर बैठ जाएं, पैरों को थोड़ा फैलाएं. एड़ियों को ऊपर उठाएं और नीचे लाएं. 10 रिपीटेशन करें. 

4. रिवर्स डिप्स – इसके लिए किसी सोफे या कुर्सी का सहारा लें. दोनों हाथों को पीछे टिकाकर पैरों को आगे फैलाएं. हाथों के बल से ऊपर उठें और बैठें. 25 रिपीटेशन करें. 

5.  वॉल सिट – इसके लिए दीवार के सहारे खड़े हो जाएं. पैरों को थोड़ा आगे रखें और नीचे झुक जाएं. 40-60 सेकेंड तक इसी पोजीशन में रहें. 

6. लेग स्विंग – किसी डेस्क या कुर्सी का सहारा लें. एक-एक पैर हवा में उठाएं और धीरे नीचे लाएं. दोनों पैरों से 15-15 रिपीटेशन करें. 

7. ताई ची स्क्वाट पोज – पैरों को फैलाकर घुटनों को हल्का मोड़ें. हाथों को जोड़कर पंजों को ऊपर उठाएं. 50 रिपीटेशन करें.

8. 100 स्किपिंग या हल्के जंप – अगर ऑफिस में रस्सी नहीं है तो हाथ फैलाकर हल्के जंप करें. 100 बार हल्का जंप करें. 

यह भी पढ़ें : बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं ये कैंसर, लक्षण दिखने तक हो जाती है देर

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रोज ब्रश करने के बाद भी पीले हो रहे दांत, जानें क्या है इस दिक्कत की वजह?

रोज ब्रश करने के बाद भी पीले हो रहे दांत, जानें क्या है इस दिक्कत की वजह?


हम सभी चाहते हैं कि हमारी स्माइल अट्रैक्टिव और कॉन्फिडेंस से भरी हो. एक चमकदार सफेद दांतों वाली स्माइल न सिर्फ खूबसूरती बढ़ाती है, बल्कि लोगों पर पॉजिटिव इंपैक्ट भी डालती है. इसके लिए लोग रोजाना ब्रश करने की आदत रखते हैं, फ्लॉस करते हैं और माउथवॉश का भी यूज करते हैं फिर भी कई लोग इस समस्या से परेशान रहते हैं कि उनके दांत पीले या फीके क्यों दिखते हैं.

यह सवाल बहुत आम है और इसका जवाब जानना जरूरी है. अक्सर लोग समझते हैं कि सिर्फ ब्रश करना ही दांतों को सफेद बनाए रखने के लिए पर्याप्त है, लेकिन असल में स्थिति इससे थोड़ी जटिल है. तो आइए जानते हैं कि  रोज ब्रश करने के बाद भी दांत क्यों पीले हो रहे और इस दिक्कत की वजह क्या है. 

रोज ब्रश करने के बाद भी दांत क्यों पीले हो रहे

हमारे दांतों की संरचना परतों में होती है. सबसे ऊपर की परत को एनामेल कहते हैं, जो सफेद और थोड़ी पारदर्शी होती है. इसके नीचे की परत डेंटिन होती है, जो प्राकृतिक रूप से पीली होती है. उम्र बढ़ने के साथ, या कभी-कभी जन्मजात रूप से, एनामेल पतली हो जाती है और डेंटिन ज्यादा दिखाई देने लगता है. इसका मतलब यह है कि कुछ लोगों के दांत स्वाभाविक रूप से थोड़े पीले दिखाई देते हैं, भले ही वे कितनी भी अच्छी तरह से ब्रश करें. दांतों का पीला होना हमेशा सिर्फ बाहरी कारणों से नहीं होता है. कई बार यह आंतरिक कारणों से भी हो सकता है. 

इस दिक्कत की वजह क्या है

1. खराब ब्रशिंग आदतें – रोजाना ब्रश करना अच्छा है, लेकिन ब्रश करने का सही तरीका और नियमितता भी उतनी ही जरूरी है. अगर दांतों की सफाई अधूरी हो, तो प्लाक जमा हो जाता है. प्लाक धीरे-धीरे टार्टर में बदल जाता है, जिसे केवल ब्रश से हटाना मुश्किल होता है. इसके लिए पेशेवर डेंटल क्लीनिंग करवाना जरूरी है. 

2. खाने-पीने की चीजें – कुछ खाद्य पदार्थ और पेय दांतों पर दाग छोड़ सकते हैं. कॉफी, चाय, रेड वाइन, गहरे रंग के सोडा और शराब दांतों को पीला कर सकते हैं. खट्टे फल और अम्लीय चीजें एनामेल को कमजोर कर सकती हैं, जिससे पीला डेंटिन और ज्यादा दिखाई देता है. खाने के बाद नमक वाले पानी से कुल्ला करने से दाग कम हो सकते हैं. 

3. धूम्रपान और तंबाकू – तंबाकू और सिगरेट में मौजूद टार और निकोटीन दांतों पर स्थायी दाग छोड़ते हैं. धूम्रपान से न सिर्फ दांत पीले होते हैं, बल्कि मसूड़ों की बीमारी का खतरा भी बढ़ जाता है. 

4. उम्र और प्राकृतिक कारण – उम्र बढ़ने के साथ दांतों की ऊपरी परत पतली होती है. कुछ लोगों में एनामेल प्राकृतिक रूप से पतला होता है, जिससे पीला डेंटिन ज्यादा दिखाई देता है. यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि प्राकृतिक संरचना है. 

5. दवाइयां और स्वास्थ्य समस्याएं – कुछ एंटीबायोटिक्स, आयरन सप्लीमेंट या मेडिकल ट्रीटमेंट जैसे कीमोथेरेपी दांतों के रंग को प्रभावित कर सकते हैं. अगर दवाइयों से दांत पीले हो रहे हैं, तो डेंटिस्ट से सलाह लेना जरूरी है. 

6. चोट और दुर्घटनाएं – दांतों पर चोट लगने से उनका आंतरिक रंग बदल सकता है, जिससे वे पीले या भूरे दिखाई देते हैं. इसके लिए सही ट्रीटमेंट जैसे वेनीर्स या व्हाइटनिंग मदद कर सकते हैं. 

दांतों को सफेद और चमकदार कैसे बनाएं?

1. पेशेवर क्लीनिंग – साल में दो बार डेंटिस्ट से स्केलिंग और क्लीनिंग करवाने से प्लाक और टार्टर हट जाते हैं. यह बाहरी दाग कम करने में मदद करता है. 

2. व्हाइटनिंग ट्रीटमेंट – अगर दांत प्राकृतिक रूप से पीले हैं या धब्बे लग गए हैं, तो डेंटिस्ट के मार्गदर्शन में व्हाइटनिंग सबसे असरदार तरीका है. 

3. सही ब्रशिंग और फ्लॉसिंग – दो बार दिन में ब्रश और रोजाना फ्लॉसिंग जरूरी है. सॉफ्ट ब्रश और फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट यूज करें. ब्रश ज्यादा कड़ा करने से एनामेल घिस सकता है, जिससे पीला डेंटिन और दिख सकता है.

4. लाइफस्टाइल में बदलाव – गहरे रंग के पेय और तंबाकू से बचें. खट्टे फल और अम्लीय चीजें खाने के बाद कुल्ला करें. पर्याप्त पानी पिएं और बैलेंस डाइट लें. 

5. . कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट – अगर दांत बहुत पीले हैं या एनामेल कमजोर है, तो वेनीर्स, बांडिंग या अन्य डेंटल रिस्टोरेशन के ऑप्शन मददगार हो सकते हैं. 

यह भी पढ़ें – Periods After Delivery: बच्चे की डिलीवरी के कितने दिन तक पीरियड्स न आना नॉर्मल, कब डॉक्टर से मिलना होता है जरूरी?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आवाज में हो रहा बदलाव तो हल्के में न लें, इन डेंजरस बीमारियों का मिलता है सिग्नल

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बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं ये कैंसर, लक्षण दिखने तक हो जाती है देर

बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं ये कैंसर, लक्षण दिखने तक हो जाती है देर


आमतौर पर हम किसी भी गंभीर बीमारी को दर्द, तेज तकलीफ या अचानक बिगड़ती हालत से जोड़कर देखते हैं. हमें लगता है कि जब शरीर में कुछ गड़बड़ होगी, तो शरीर खुद हमें चेतावनी दे देगा. लेकिन कैंसर के कई प्रकार ऐसे होते हैं जो इस सोच को पूरी तरह गलत साबित कर देते हैं. ये कैंसर सालों तक शरीर के अंदर बिलकुल खामोशी से बढ़ते रहते हैं. न तेज दर्द, न कोई बड़ा लक्षण, न ऐसा कुछ जो इंसान को तुरंत डॉक्टर के पास जाने पर मजबूर करे और जब तक इनके लक्षण साफ तौर पर सामने आते हैं, तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है.

 

कैंसर का सबसे खतरनाक रूप उसकी तेजी नहीं, बल्कि उसकी चुप्पी होती है.कई बार कैंसर शरीर में मौजूद रहता है, लेकिन मरीज और डॉक्टर दोनों को इसका अंदाजा नहीं लग पाता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि कौन से कैंसर बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं. 

 

कौन से कैंसर बहुत ही साइलेंटली अपना शिकार बनाते हैं 

 

1. डिम्बग्रंथि का कैंसर – डिम्बग्रंथि का कैंसर लंबे समय से साइलेंट किलर माना जाता है. इस कैंसर के शुरुआती लक्षण बहुत हल्के और भ्रमित करने वाले होते हैं, जैसे पेट का थोड़ा फूलना, जल्दी पेट भर जाना, नीचे पेट या श्रोणि में हल्की-सी बेचैनी. ज्यादातर महिलाएं इन लक्षणों को गैस, अपच या सामान्य पीरियड्स की समस्या समझकर नजरअंदाज कर देती हैं.इसी वजह से लगभग दो-तिहाई मामलों में ओवरी कैंसर का पता तीसरे या चौथे स्टेज में चलता है, जब बीमारी पेट में फैल चुकी होती है. 

 

2. पैंक्रियाज का कैंसर – अगर सबसे ज्यादा जानलेवा साइलेंट कैंसर की बात करें, तो पैंक्रियाज का कैंसर सबसे ऊपर आता है. सिर्फ 15 प्रतिशत से कम मामलों में ही यह कैंसर शुरुआती स्टेज में पकड़ा जाता है. ज्यादातर मरीज तब आते हैं जब कैंसर फैल चुका होता है. इसके शुरुआत में न दर्द होता है, न पीलिया, न कोई गंभीर पाचन समस्या होती है. जब लक्षण आते हैं, जैसे तेज दर्द, वजन कम होना या पीलिया तब तक सर्जरी का मौका निकल चुका होता है. इसी कारण यह कैंसर बहुत कम मामलों में ठीक हो पाता है. 

 

3.  फेफड़ों का कैंसर – फेफड़ों का कैंसर दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण है, फिर भी यह भी अक्सर चुपचाप बढ़ता है.  इसके शुरुआती लक्षण हल्की लेकिन लंबे समय तक रहने वाली खांसी, थोड़ी-सी सांस फूलना, लगातार थकान, धूम्रपान करने वाले लोग इन लक्षणों को नॉर्मल समझ लेते हैं. परिवार वाले भी ज्यादा  गंभीरता नहीं दिखाते. नतीजा यह होता है कि लगभग 70 प्रतिशत मरीज तीसरे या चौथे स्टेज में डॉक्टर के पास पहुंचते हैं. 

 

4. कोलोरेक्टल का कैंसर – आंतों का कैंसर लंबे समय तक बिना किसी परेशानी के रह सकता है. इसके शुरुआती संकेत बहुत मामूली होते हैं. जैसे मल में थोड़ा सा खून (जो दिखता नहीं), आयरन की कमी से खून की कमी, शौच की आदतों में हल्का बदलाव. लोग इन्हें बवासीर, कमजोरी या उम्र का असर मान लेते हैं. जबकि सच यह है कि समय पर जांच हो जाए तो यह कैंसर पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. 

 

5. ब्रेस्ट कैंसर – भारत में ब्रेस्ट कैंसर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके शुरुआती चरण में दर्द नहीं होता है. अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि दर्द नहीं है, तो कुछ गंभीर नहीं होगा.  लेकिन  भारत में लगभग आधे मरीज उन्नत स्टेज में आते हैं. 8–10 प्रतिशत मरीजों में तो कैंसर पहले से शरीर में फैल चुका होता है. गांठ, स्किन में बदलाव या निप्पल से डिस्चार्ज को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. 

 

6. गॉलब्लैडर का कैंसर – उत्तर भारत में गॉलब्लैडर का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है. शुरुआत में इसके लक्षण पित्त की पथरी, हल्का पेट दर्द, अपच जैसे लगते हैं. मरीज और कई बार डॉक्टर भी इसे सामान्य पथरी समझ लेते हैं. जब पीलिया या तेज दर्द होता है, तब तक 70–80 प्रतिशत मामलों में कैंसर काफी फैल चुका होता है. 

 

 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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