जन्म के समय बच्चों को क्यों हो जाता है निमोनिया, हर साल इससे हो जाती हैं इतनी मौत

जन्म के समय बच्चों को क्यों हो जाता है निमोनिया, हर साल इससे हो जाती हैं इतनी मौत


Pneumonia in Newborn Babies: नवजात शिशु का जन्म किसी भी परिवार के लिए सबसे खूबसूरत पल होता है. लेकिन कई बार यही खुशी चिंता में बदल जाती है जब बच्चे को सांस लेने में तकलीफ़ होती है या बार-बार खाँसी और तेज बुखार आने लगता है. डॉक्टरों के अनुसार यह स्थिति निमोनिया की हो सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट बताती है कि, हर साल लाखों नवजात बच्चे निमोनिया से अपनी जान गंवा देते हैं. यह बीमारी बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की वजह से उन्हें जल्दी जकड़ लेती है.

ये भी पढ़े- सुबह उठते ही गुनगुने पानी में मिलाकर पिएं ये 1 चीज, टॉयलेट जाते ही पेट हो जाएगा साफ

जन्म के समय क्यों होता है निमोनिया?

शिशुओं में निमोनिया होने की सबसे बड़ी वजह है उनका कमजोर इम्यून सिस्टम. जन्म के समय बच्चों के फेफड़े पूरी तरह से मजबूत नहीं होते, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.

क्या-क्या कारण हो सकते हैं

  • गर्भावस्था के दौरान माँ में संक्रमण होना
  • जन्म के समय साफ-सफाई की कमी
  • समय से पहले जन्म (प्रिमेच्योर बेबी) होने पर फेफड़े कमजोर रह जाते हैं
  • अस्पताल में अन्य संक्रमण का खतरा

बच्चों में निमोनिया के लक्षण

  • तेज बुखार रहना
  • लगातार खाँसी आना
  • सांस लेने में तेज़ी या कठिनाई होना
  • बच्चे का दूध न पीना या खाना न खाना
  • शरीर का ठंडा पड़ना या नीला पड़ना
  • इन लक्षणों को नज़रअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए

हर साल कितनी मौतें होती हैं?

WHO के अनुसार, 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मौत का सबसे बड़ा कारण निमोनिया है, आंकड़ों के मुताबिक, हर साल दुनिया भर में करीब 7 लाख से अधिक बच्चे निमोनिया की वजह से मर जाते हैं. इनमें सबसे ज्यादा संख्या नवजात और छोटे बच्चों की होती है.

बचाव कैसे संभव है?

  • गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और समय पर इलाज
  • बच्चे के जन्म के समय साफ-सफाई और सुरक्षित माहौल
  • बच्चे को जन्म के बाद तुरंत माँ का दूध (कोलोस्ट्रम) पिलाना, जिससे इम्यूनिटी बढ़े
  • समय पर टीकाकरण कराना
  • घर और आसपास साफ-सफाई बनाए रखना

नवजात शिशुओं में निमोनिया एक गंभीर बीमारी है जो सही समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकती है. हर साल लाखों मासूम इस संक्रमण का शिकार होकर अपनी जान गंवा देते हैं. इसलिए जरूरी है कि गर्भावस्था से लेकर जन्म और उसके बाद तक साफ-सफाई, पोषण और समय पर इलाज का पूरा ध्यान रखा जाए.

इसे भी पढ़ें: हल्की या भारी… किस तरह की एक्सरसाइज महिलाओं के लिए होती है बेस्ट? एक्सपर्ट से जानें

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.  

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

वेट लॉस की ये दवाई कर देगी सबकी छु्ट्टी, क्लीनिकल ट्रायल में मिले कमाल के रिजल्ट्स

वेट लॉस की ये दवाई कर देगी सबकी छु्ट्टी, क्लीनिकल ट्रायल में मिले कमाल के रिजल्ट्स


आजकल वजन बढ़ना और डायबिटीज की समस्या आम हो गई है. ऐसे में हर कोई ढूंढ रहा है एक असरदार और सुरक्षित तरीका. Ecnoglutide एक नया ड्रग है, जो वजन कम करने और ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद करता है. ये Ozempic और Wegovy जैसी दवाओं की तरह काम करता है, लेकिन इसके नतीजे अभी तक के सभी ड्रग्स से बेहतर दिख रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि यह कैसे आपके लिए फायदेमंद हो सकता है और अभी तक के रिसर्च में क्या निकल कर सामने आया है.

क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे

चीन में हुए Phase 3 ट्रायल में 18 से 75 साल के 621 डायबिटीज मरीजों पर टेस्ट किया गया. सभी मरीज साथ में Metformin ले रहे थे. ट्रायल में दिखा कि Ecnoglutide लेने वालों ने दुलाग्लूटाइड (Dulaglutide) वाले लोगों की तुलना में लगभग दो गुना ज्यादा वजन घटाया.

खासियत

Ecnoglutide की सबसे बड़ी बात यह है कि ये CAMP पाथवे को ही टारगेट करता है. यह बॉडी के वजन और मेटाबॉलिज़्म को सही तरीके से कंट्रोल करता है. बाकी GLP-1 ड्रग्स कई रास्तों को प्रभावित करते हैं, जिससे साइड इफेक्ट्स ज्यादा हो सकते हैं. लेकिन Ecnoglutide में ये नहीं है, इसलिए असर बेहतर और साइड इफेक्ट्स कम होते हैं.

सिर्फ वजन ही नहीं, हेल्थ भी बेहतर

Ecnoglutide लेने से Waist और Hip साइज कम हुआ, ट्राइग्लिसराइड्स भी घटे, जो हार्ट और बॉडी हेल्थ के लिए बहुत जरूरी हैं. इसका मतलब है कि ये सिर्फ वजन घटाने वाला ड्रग नहीं, बल्कि पूरे मेटाबॉलिक सिस्टम को फायदा पहुंचाने वाला ड्रग है. इस तरह यह बाकी ड्रॉग्स से बेहतर प्रभावी साबित हो रही है. 

साइड इफेक्ट्स और सेफ्टी

इस ड्रग को मरीजों ने अच्छी तरह टॉलरट किया. कुछ लोगों को मिचली और दस्त जैसे हल्के साइड इफेक्ट्स हुए, लेकिन समय के साथ ये कम हो गए. रिसर्चर्स ने बताया कि कम डोज में भी ये दुलाग्लूटाइड से ज्यादा असरदार है. इससे इसके फायदे का पता चल सका. 

रिसर्चर्स का कहना

“Ecnoglutide लेने वालों में वजन, Waist, Hip और ट्राइग्लिसराइड्स में ज्यादा कमी हुई. ये ड्रग टाइप 2 डायबिटीज और वजन कम करने का नई और असरदार ऑप्शन हो सकता है.” 

भविष्य में क्या उम्मीद है

अगर आगे के ट्रायल्स भी सफल रहे, तो Ecnoglutide वजन घटाने और डायबिटीज कंट्रोल के लिए गेम-चेंजर बन सकता है. यह न सिर्फ वजन कम करता है बल्कि हार्ट और बॉडी हेल्थ के लिए भी फायदेमंद है. हालांकि, बाजार में आने के बाद पता चलेगा कि यह कितना फायदेमंद होगा. 

इसे भी पढ़ें- यूथ में तेजी से फैल रहा ये वाला कैंसर, आज ही जान लें इसके लक्षण, खतरा और बचने का तरीका

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

प्रेग्नेंसी के दौरान खा तो नहीं ली पैरासीटामॉल? बच्चे में हो सकती हैं ये खतरनाक बीमारियां

प्रेग्नेंसी के दौरान खा तो नहीं ली पैरासीटामॉल? बच्चे में हो सकती हैं ये खतरनाक बीमारियां


Paracetamol During Pregnancy: जब भी हमें हल्का बुखार या सिरदर्द होता है, सबसे पहले जिस दवाई का नाम याद आता है, वह है पेरासिटामोल. यह दुनिया की सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली दर्द और बुखार कम करने वाली दवा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गर्भावस्था में इसका सेवन बच्चों के लिए गंभीर खतरे का कारण बन सकता है?

हाल ही में किए गए एक बड़े शोध में पाया गया है कि गर्भावस्था के दौरान पेरासिटामोल का बार-बार इस्तेमाल करने से बच्चों में ऑटिज़्म और एडीएचडी जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.

ये भी पढ़े- किस विटामिन की कमी से पीले होते हैं नाखून, जानें कैसे करें इसकी पूर्ति?

ध्ययन से क्या पता चला?

  • यह अध्ययन माउंट साइनाई और हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं ने किया
  • इसमें 46 पुराने अध्ययनों के 1 लाख से अधिक लोगों के डाटा का विश्लेषण किया गया
  • शोधकर्ताओं ने यह देखा कि पेरासिटामोल गर्भावस्था के किस चरण (पहली, दूसरी या तीसरी तिमाही) में लिया गया और इसका बच्चों पर क्या असर हुआ
  • नतीजों में पाया गया कि जिन माताओं ने गर्भावस्था में ज्यादा पेरासिटामोल लिया, उनके बच्चों में ऑटिज़्म और एडीएचडी का खतरा बढ़ा

क्यों है यह रिसर्च महत्वपूर्ण?

पेरासिटामोल को अक्सर सुरक्षित दवा माना जाता है और यह बिना डॉक्टर की पर्ची के मेडिकल स्टोर से मिल जाती है. लेकिन रिसर्च का कहना है कि इसके अधिक सेवन से भ्रूण के दिमागी विकास पर असर पड़ सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर यह दवा गर्भावस्था में अधिक ली जाए तो बच्चों में ध्यान की कमी और सामाजिक व्यवहार में कठिनाइयाजैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.

डॉक्टरों की सलाह

न्यूयॉर्क में माउंट साइनाई हॉस्पिटल के डॉक्टर डिड्डियर प्राडा का कहना है कि, गर्भवती महिलाओं को बिना डॉक्टर की सलाह के पेरासिटामोल लेना बंद नहीं करना चाहिए. अगर बुखार या दर्द का इलाज न हो तो यह भी बच्चे के लिए हानिकारक हो सकता है.

  • यह दवा पूरी तरह से छोड़ने की बजाय, डॉक्टर से परामर्श लेकर कम मात्रा में और ज़रूरत पड़ने पर ही लेनी चाहिए
  • जहां संभव हो वहां बिना दवा वाले विकल्प (जैसे घरेलू नुस्खे, रिलैक्सेशन या सही आराम) आज़माने चाहिए

पहले भी मिले थे खतरे के संकेत

  • पिछले साल यूनिवर्सिटी ऑफ नॉटिंघम के वैज्ञानिकों ने एक और रिसर्च की थी
  • उसमें पाया गया कि पेरासिटामोल का लगातार सेवन करने वालों में 24 प्रतिशत अधिक खतरा पेट में अल्सर से खून बहने और 36% अधिक खतरा आंतों से ब्लीडिंग का होता है
  • यानी पेरासिटामोल का ज़्यादा इस्तेमाल शरीर पर कई तरह से नकारात्मक असर डाल सकता है

पेरासिटामोल भले ही हर घर की आम दवा हो, लेकिन गर्भावस्था में इसका सेवन बेहद सोच-समझकर करना चाहिए. रिसर्च साफ बताती है कि इसका अधिक उपयोग बच्चों के लिए लंबे समय तक नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए सबसे अच्छा उपाय यही है कि गर्भवती महिलाएं डॉक्टर से सलाह लेकर ही दवाओं का सेवन करें और जहां संभव हो, प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्पों को अपनाएं.

इसे भी पढ़ें: हल्की या भारी… किस तरह की एक्सरसाइज महिलाओं के लिए होती है बेस्ट? एक्सपर्ट से जानें

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.  

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

चोट लगी कंधे में लेकिन दर्द होने लगी कोहनी, क्या होता है रेफर्ड पेन?

चोट लगी कंधे में लेकिन दर्द होने लगी कोहनी, क्या होता है रेफर्ड पेन?


अक्सर ऐसा होता है कि चोट एक जगह लगती है लेकिन दर्द किसी और हिस्से में महसूस होता है. जैसे कंधे में चोट लगी हो और दर्द कोहनी या बाजू तक पहुंच जाए. इस तरह की समस्या को मेडिकल भाषा में रेफर्ड पेन (Referred Pain) कहा जाता है. यह सामान्य चोट या अकड़न नहीं, बल्कि नसों (Nerves) से जुड़ी मुश्किल प्रॉब्लम हो सकती है.

क्या है रेफर्ड पेन?

जब शरीर में किसी हिस्से को चोट, सूजन या दबाव की वजह से नस प्रभावित होती है, तो दर्द सीधे उसी जगह पर महसूस नहीं होता. नसें हमारे ब्रेन तक सिग्नल भेजती हैं, लेकिन कभी-कभी ब्रेन उस सिग्नल को गलत जगह से जुड़ा समझ लेता है. नतीजा यह होता है कि दर्द किसी और हिस्से में महसूस होने लगता है. उदाहरण के लिए अगर कंधे की नस दब गई है तो दर्द बाजू, कोहनी या यहां तक कि हाथ की उंगलियों तक पहुंच सकता है. यही रेफर्ड पेन है.

रेफर्ड पेन क्यों होता है?

  • नसों पर दबाव (Nerve Compression): चोट या हड्डी खिसकने से नस दब सकती है.
  • सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस- गर्दन की हड्डियों की समस्या से भी कंधे और हाथ में दर्द महसूस हो सकता है.
  • हार्ट और लंग्स की परेशानी- कई बार हार्ट रोग या लंग्स की समस्या का दर्द भी कंधे और हाथ में महसूस होता है.
  • इंफ्लेमेशन (सूजन)- मांसपेशियों या टिश्यू में सूजन होने पर भी नसों से दर्द दूसरी जगह पहुंच सकता है.

कितनी खतरनाक है?

  • रेफर्ड पेन को हल्के में नहीं लेना चाहिए. अगर दर्द बार-बार हो या लगातार बढ़ रहा हो, तो यह शरीर के किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है.
  • हार्ट अटैक के दौरान अक्सर मरीज को बायें कंधे से लेकर बाजू तक दर्द होता है.
  • लंग्स में समस्या हो तो पीठ और कंधे में दर्द महसूस हो सकता है.
  • सर्वाइकल या नस दबने की समस्या लंबे समय तक अनदेखी करने पर हाथ सुन्न होने और कमजोरी तक ले जा सकती है.

क्या करें?

  • बार-बार होने वाले दर्द को नजरअंदाज न करें.
  • खुद से पेन किलर दवाएं लेने के बजाय डॉक्टर से जांच कराएं.
  • सही फिजियोथेरेपी और एक्सरसाइज से कई मामलों में आराम मिल सकता है.
  • हार्ट या लंग्स से जुड़ी परेशानी का शक हो तो तुरंत मेडिकल चेकअप जरूरी है.

डॉक्टर का कहना

Dr. Nabil Ebraheim अपने वीडियो में बताते हैं कि कोहनी में महसूस होने वाला दर्द अक्सर असल में कोहनी की बीमारी नहीं होता, बल्कि यह कंधे से आने वाला रेफर्ड पेन (Referred Pain) हो सकता है. उनका कहना है कि दर्द का यह पैटर्न मरीज और डॉक्टर दोनों को कंफ्यूज कर सकता है, क्योंकि प्रॉब्लम की जड़ कंधे की नसों, मसल्स या टेंडन में होती है जबकि दर्द कोहनी तक महसूस होता है. इसलिए किसी भी मरीज को कोहनी में लगातार दर्द हो तो केवल कोहनी की जांच न करके कंधे और गर्दन की भी जांच करना बेहद जरूरी है, ताकि सही कारण का पता चल सके और उचित इलाज मिल सके.

इसे भी पढ़ें- मछली के साथ नहीं खानी-पीनी चाहिए ये चीजें, बढ़ जाता है मौत तक का खतरा

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

यूथ में तेजी से फैल रहा ये वाला कैंसर, आज ही जान लें इसके लक्षण, खतरा और बचने का तरीका

यूथ में तेजी से फैल रहा ये वाला कैंसर, आज ही जान लें इसके लक्षण, खतरा और बचने का तरीका


कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, 1990 के दशक के मध्य से 20 से 39 साल की उम्र के युवाओं में कॉलन कैंसर के मामलों में हर साल लगभग 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि सैडेंटरी लाइफस्टाइल, एक्सरसाइज की कमी और प्रोसेस्ड फूड और रेड मीट का अधिक सेवन इस बढ़ोतरी के मुख्य कारण हैं.

डॉ. प्रभु नेसरगिकार, सीनियर कंसल्टेंट, GI और पेरिटोनियल कैंसर और रोबोटिक सर्जरी, HCG कैंसर सेंटर, बैंगलोर ने हिंदुस्तान टाइम्स के साथ बातचीत के दौरान बताया कि कॉलन कैंसर बड़ी आंत (Large Intestine) में छोटे ग्रोथ्स या पॉलीप्स से शुरू होता है. उन्होंने कहा कि  “अधिकांश पॉलीप्स हानिरहित होते हैं, लेकिन कुछ धीरे-धीरे 10 साल में कैंसर में बदल सकते हैं अगर समय पर पहचान और हटाया न जाए. कैंसर सबसे अंदरूनी परत से शुरू होकर गहरी परतों में फैल सकता है और ब्लड सेल्स या लिम्फ नोड्स के माध्यम से शरीर के अन्य हिस्सों में फैल सकता है.”

रिस्क फैक्टर्स

कॉलन कैंसर का खतरा बढ़ाने वाले प्रमुख फैक्टर्स में शामिल हैं;

  • जनेटिक स्थितियां जैसे लिंच सिंड्रोम
  • परिवार में कॉलन कैंसर या पॉलीप्स का हिस्ट्री एडवांस्ड पॉलीप्स का होना

डॉ. नेसरगिकार ने कहा कि “सक्रिय स्क्रीनिंग और समय पर पॉलीप्स को हटाना कॉलन कैंसर को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.”

कॉलन कैंसर बढ़ने के कारण

डॉ. ने बताया कि युवा वर्ग में इस कैंसर की बढ़ती दर का कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन धूम्रपान, मोटापा, और शारीरिक कार्य न करना प्रमुख कारण हैं. इसके अलावा, आंत की सूजन, gut बैक्टीरिया और पोषण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं. अनहेल्दी फूड्स, प्रोसेस्ड मीट का अधिक सेवन, फल और सब्जियों की कमी, और अतिरिक्त वजन कॉलन कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं. “केवल 10-20 प्रतिशत मामलों में वंशानुगत स्थितियों की भूमिका होती है. कुछ दवाएं, जैसे एंटीबायोटिक्स और जीवनशैली के चुनाव, gut फ्लोरा को प्रभावित कर कैंसर की संभावना बढ़ा सकते हैं,”.

लक्षण, स्क्रीनिंग और बचाव

शुरुआत में ज्यादातर मरीजों में कोई लक्षण नहीं दिखते, लेकिन पेट में दर्द, यूरिन में खून, यूरिन बदलना, वजन घटना, कमजोरी और थकान कुछ संकेत हो सकते हैं. स्क्रीनिंग सामान्य जोखिम वाले व्यक्तियों के लिए 45 साल की उम्र से शुरू होनी चाहिए और परिवार में इस तरह की बीमारी होने पर डॉ. ने सलाह दी कि शराब का सेवन सीमित करें, धूम्रपान छोड़ें, फलों, सब्जियों और पूरे अनाज का सेवन बढ़ाएं, नियमित व्यायाम करें और स्वस्थ वजन बनाए रखें.

इसे भी पढ़ें- यूथ में क्यों बढ़ रहे कार्डियक अरेस्ट से मौत के मामले, आखिर क्या गलती करके जान गंवा रहे युवा?

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

किस विटामिन की कमी से पीले होते हैं नाखून, जानें कैसे करें इसकी पूर्ति?

किस विटामिन की कमी से पीले होते हैं नाखून, जानें कैसे करें इसकी पूर्ति?


Yellow Nails Vitamin Deficiency: हमारा शरीर कई बार बिना कुछ कहे ही संकेत देने लगता है कि अंदर कुछ गड़बड़ है. आंखों की चमक, बालों की मजबूती और त्वचा की रंगत की तरह ही नाखून भी हमारे स्वास्थ्य का आईना होते हैं. जब नाखूनों का रंग गुलाबी और साफ हो, तो यह शरीर की अच्छी स्थिति को दर्शाता है. लेकिन अगर नाखून पीले, टूटने वाले या फीके दिखने लगें तो समझिए यह शरीर के अंदर किसी कमी की ओर इशारा कर रहा है.

डॉक्टर विजय लक्ष्मी का कहना है कि, खासकर नाखूनों का पीला पड़ना कुछ विटामिन्स और मिनरल्स की कमी का बड़ा लक्षण हो सकता है. सही समय पर इस कमी की पूर्ति कर ली जाए, तो नाखून दोबारा से चमकदार और स्वस्थ दिखने लगते हैं.

ये भी पढ़े- नाखून में नजर आ रहे हर रंग का अलग मतलब, जानें किस बीमारी का पता बताता है कौन-सा रंग?

नाखून क्यों पड़ते हैं पीले?

नाखूनों के पीलेपन का कारण सिर्फ नेलपॉलिश का अधिक इस्तेमाल या संक्रमण ही नहीं होता, बल्कि यह शरीर के अंदरूनी पोषण स्तर को भी दर्शाता है. जब शरीर को जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स नहीं मिलते, तो नाखूनों का रंग बदलने लगता है और वे भंगुर हो जाते हैं.

विटामिन B12 की कमी से होते हैं नाखून पीले

विटामिन B12 की कमी नाखूनों के पीलेपन का सबसे बड़ा कारण है. इस विटामिन की कमी से रक्त में ऑक्सीजन की सप्लाई प्रभावित होती है, जिससे नाखूनों का नेचुरल पिंक रंग फीका पड़कर पीला दिखने लगता है. लंबे समय तक इसकी कमी रहने पर नाखून कमजोर, पतले और आसानी से टूटने वाले भी हो जाते हैं.

आयरन और विटामिन D की कमी भी जिम्मेदार

  • आयरन की कमी (एनीमिया) जब शरीर में आयरन की कमी होती है तो खून में हीमोग्लोबिन का स्तर गिर जाता है. इसका असर नाखूनों पर भी दिखता है, वे पीले और सपाट दिखने लगते हैं.
  • विटामिन D की कमी यह विटामिन हड्डियों और नाखूनों को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है. इसकी कमी से नाखूनों में पीलापन, सफेद धब्बे और परतदार बनावट देखने को मिलती है.

किन खाद्य पदार्थों से पूरी होगी यह कमी?

  • विटामिन B12 दूध, दही, पनीर, अंडा, मछली और चिकन
  • आयरन पालक, चुकंदर, अनार, गुड़, हरी पत्तेदार सब्जियां और दालें
  • विटामिन D सुबह की धूप सबसे अच्छा स्रोत है। इसके अलावा दूध, दही, मशरूम और अंडे भी फायदेमंद हैं

नाखूनों की सेहत के लिए अपनाएं ये घरेलू टिप्स

  • नाखूनों पर नींबू का रस लगाकर हल्की मालिश करें, इससे उनका नेचुरल रंग वापस आ सकता है
  • नारियल तेल से नियमित मसाज करने पर नाखून मजबूत और चमकदार रहते हैं
  • ज्यादा नेल पॉलिश और केमिकल युक्त रिमूवर का इस्तेमाल कम करें
  • संतुलित आहार लें और पानी खूब पिएं

नाखूनों का पीला होना सिर्फ सौंदर्य से जुड़ी समस्या नहीं, बल्कि यह शरीर के भीतर छिपी विटामिन B12, आयरन और विटामिन D की कमी का संकेत है. यदि समय रहते सही खानपान और घरेलू उपायों को अपनाया जाए तो नाखून फिर से स्वस्थ और गुलाबी दिखने लगते हैं.

इसे भी पढ़ें: हल्की या भारी… किस तरह की एक्सरसाइज महिलाओं के लिए होती है बेस्ट? एक्सपर्ट से जानें

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.  

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp