सही समय पर खाना क्यों है जरूरी, जानिए दिन और रात में खाने का सही टाइम और सेहत पर इसका असर

सही समय पर खाना क्यों है जरूरी, जानिए दिन और रात में खाने का सही टाइम और सेहत पर इसका असर


लोग यह जानते हैं कि पोषण से भरा खाना हमारे शरीर के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद है, क्योंकि अच्छी और पोषण वाली खुराक से हमें पेट संबंधी बीमारियों के होने का खतरा काफी कम हो जाता है, जो हमारे शरीर के लिए काफी फायदेमंद है. लेकिन क्या आपको यह पता है कि हमें अपने डेली रूटीन में किस प्रकार का खाना खाना चाहिए और क्या आपको पता है कि हमें कब खाना चाहिए. बहुत से लोगों को यह नहीं पता होता कि हमें किस समय खाने का सेवन करना चाहिए, जो हमारी सेहत के लिए काफी ज्यादा असरदार होता है. अगर आप सही समय पर खाने का सेवन करते हैं, तो यह हमारी गट हेल्थ यानी पेट की सेहत के लिए काफी ज्यादा अच्छा होता है.

दिन में भारी खाना पचाना क्यों आसान होता है?

अगर आप दिन के समय भारी खाने का सेवन करते हैं, तो इससे हमारे डाइजेस्टिव सिस्टम पर ज्यादा असर नहीं पड़ता, क्योंकि दिन के समय हमारी पाचन शक्ति सबसे ज्यादा मजबूत होती है. हमारे शरीर में एक घड़ी की तरह काम करने वाली चीज होती है, जिसे सर्केडियन रिदम कहते हैं. यह हमारे शरीर में 24 घंटे का चक्र पूरा करती है. जब रोशनी होती है, तो हमारे शरीर को पता चलता है कि अब जागने, काम करने और खाने का समय है और जब अंधेरा होता है, तो हमारे शरीर को पता चलता है कि अब आराम करने और सोने का समय हो गया है.

रात में देर से खाना क्यों नुकसानदायक है?

अगर आप रात के समय खाने का सेवन करते हैं, तो यह हमारी सेहत के लिए काफी ज्यादा खतरनाक हो सकता है और हमें पेट संबंधी बीमारियां दे सकता है. जब कोई व्यक्ति देर रात को खाने का सेवन करता है, तो शरीर को मजबूरी में उस समय भी पाचन का काम करना पड़ता है, जबकि देर रात को शरीर ग्रोथ हार्मोन बनाने का काम करता है. इसकी वजह से हमें कई तरह की पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं, जैसे अपच, पेट का फूलना और पेट में भारीपन.

डिनर करने का सही समय

डॉक्टर्स के अनुसार, अगर किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ और निरोगी रहना है और अपने पेट की सेहत को स्वस्थ रखना है और उससे जुड़ी बीमारियों से बचे रहना है, तो उसे डिनर या रात को जल्दी खाने की आदत डालनी होगी, जो हमारी हेल्थ के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद होती है और हमारे पाचन तंत्र को भी मजबूत करती है. डॉक्टर्स की मानें, तो शाम 6 बजे से 8 बजे के बीच डिनर कर लेना चाहिए. जल्दी डिनर या रात का खाना खाने से डायबिटीज का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है और पेट में अच्छे बैक्टीरिया पनपने लगते हैं. रात का खाना जल्दी खाने से हमारे पाचन तंत्र को खाने को पचाने के लिए काफी ज्यादा समय मिल जाता है, जो हमारी सेहत के लिए जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

 

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प्लास्टिक में गर्म खाना पैक करवाना सेहत के लिए साइलेंट किलर? बढ़ा सकता है कैंसर का खतरा

प्लास्टिक में गर्म खाना पैक करवाना सेहत के लिए साइलेंट किलर? बढ़ा सकता है कैंसर का खतरा


आजकल की बीची लाइफ में हम सभी ज्यादातर बाहर का खाना और चाय पीना पसंद करते हैं. ऑफिस में बैठे-बैठे टपरी से अदरक वाली चाय मंगवा कर पीना या स्ट्रीट फूड पैक करवा कर खाना बहुत आम आदत बन चुकी है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस प्लास्टिक की थैली या कप में आप ये गर्म खाने के चीजें पैक करवाते हैं वो आपकी सेहत के लिए कितनी नुकसानदायक हो सकता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस आदत के साथ एक गंभीर खतरा है, जो धीरे-धीरे आपकी सेहत को अंदर से खराब कर सकता है और लंबे समय में कैंसर तक को जन्म दे सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि प्लास्टिक में गर्म खाना पैक करवाना कैसे सेहत के लिए साइलेंट किलर है और ये कैंसर का खतरा कैसे बढ़ा सकता है. 

प्लास्टिक में गर्म खाना पैक करवाना कैसे सेहत के लिए साइलेंट किलर है

जब कोई भी खाना 60°C से ऊपर के टेंपरेचर में होता है और उसे प्लास्टिक की पन्नी, पॉलीथिन या प्लास्टिक कप में डाला जाता है, तो प्लास्टिक की परत से कई खतरनाक केमिकल्स उसमें घुलने लगते हैं. इन खतरनाक केमिकल्स में थैलेट्स,,बिस्फेनॉल ए , माइक्रोप्लास्टिक और स्टाइरीन मोनोमर्स शामिल है.ये सभी केमिकल्स माइक्रोस्कोपिक होते हैं, लेकिन शरीर पर इसका असर बहुत खतरनाक हो सकता है. क्योंकि ये छोटे-छोटे केमिकल्स रोजाना आपके शरीर में जाते हैं, तो शुरुआत में आपको कोई लक्षण नहीं दिखते, लेकिन समय के साथ यह केमिकल्स आपके हार्मोन सिस्टम पर बुरा असर डालते हैं,जैसे एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन, थायरॉयड हार्मोन और इंसुलिन. इन हार्मोन में असंतुलन से आपकी पूरी बॉडी का सिस्टम खराब हो सकता है. साथ ही ये कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकता है.

कैसे  प्लास्टिक में खाना बढ़ा सकता है कैंसर का खतरा?

प्लास्टिक की पन्नी, पॉलीथिन या प्लास्टिक कप में खाना पैक करवाने से प्लास्टिक की परत से कई खतरनाक केमिकल्स उसमें घुलने लगते हैं. इन खतरनाक केमिकल्स के कारण ही हार्मोनल इंबैलेंस, महिलाओं और पुरुषों में फर्टिलिटी में कमी, वजन तेजी से बढ़ना या घटना, थकावट और नींद में परेशानी, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप 2 डायबिटीज की दिक्कत, साथ ही ब्रेस्ट, प्रोस्टेट और थायरॉयड कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ता है. कई रिसर्च में बताया गया है कि प्लास्टिक में पाए जाने वाले बीपी ए, थैलेट्स और माइक्रोप्लास्टिक्स जैसे केमिकल्स शरीर में जाने पर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, डीएनए डैमेज और हार्मोनल डिसबैलेंस का कारण बनते हैं जो कि कैंसर की शुरुआत के प्रमुख कारक माने जाते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बच्चों की सेहत पर खतरा, जानें मनोरंजन के नाम पर कैसे जहर बन रही स्क्रीन?

बच्चों की सेहत पर खतरा, जानें मनोरंजन के नाम पर कैसे जहर बन रही स्क्रीन?


आज का बच्चा जिस दुनिया में बड़ा हो रहा है, वहां स्मार्टफोन, टैबलेट और इंटरनेट उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. पहले बच्चे खाली समय में बाहर खेलते थे, किताबें पढ़ते थे या परिवार के साथ बैठकर बातें करते थे. लेकिन अब मनोरंजन का मतलब धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रीन तक सिमट गया है.खासकर छोटी वीडियो जैसे टिक-टॉक, इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स बच्चों के जीवन में इतनी गहराई से शामिल हो चुकी हैं कि वे सिर्फ समय बिताने का साधन नहीं रहीं, बल्कि बच्चों की सोच, आदतों और व्यवहार को भी बदलने लगी हैं.

ये वीडियो देखने में भले ही मजेदार और हल्के-फुल्के लगें, लेकिन इनके पीछे छिपे खतरे धीरे-धीरे बच्चों की सेहत और मानसिक विकास पर असर डाल रहे हैं. माता-पिता अक्सर यह सोचते हैं कि बच्चा बस मोबाइल पर वीडियो देख रहा है, कोई नुकसान नहीं होगा. लेकिन असली समस्या वीडियो देखने की नहीं, बल्कि लगातार देखते चले जाने की आदत की है.

क्यों बच्चों को इतना अट्रैक्ट करते हैं शॉर्ट वीडियो?

शॉर्ट वीडियो बहुत छोटे, तेज और ट्रेंड से जुड़े होते हैं. इनमें गाने, मजाक, स्टंट, चौंकाने वाले सीन और फिल्टर होते हैं, जो बच्चों का ध्यान तुरंत खींच लेते हैं. एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा अपने आप चलने लगता है.इसमें बच्चे को सोचने या रुकने का मौका ही नहीं मिलता, वह बस उंगली से स्क्रॉल करता रहता है. समस्या यह है कि ये ऐप्स बच्चों के लिए बनाए ही नहीं गए, लेकिन सबसे ज्यादा यूज वही कर रहे हैं. कई बार बच्चे इन्हें अकेले देखते हैं, बिना किसी निगरानी के, ऐसे में उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि कब मजेदार वीडियो खतरनाक या गलत कंटेंट में बदल जाता है. 

नींद पर बुरा असर

आज बहुत-से बच्चे सोने से ठीक पहले मोबाइल देखने की आदत बना चुके हैं.अंधेरे कमरे में चमकती स्क्रीन आंखों और दिमाग दोनों को थका देती है. मोबाइल की तेज रोशनी से नींद लाने वाला हार्मोन देर से काम करता है। ऊपर से वीडियो का तेज बदलाव दिमाग को शांत होने नहीं देता है. नतीजा यह होता है कि बच्चे देर से सोते हैं, नींद पूरी नहीं होती और सुबह उठने में परेशानी होती है. नींद की कमी का असर सीधा बच्चों के मूड, पढ़ाई और व्यवहार पर पड़ता है. वे चिड़चिड़े हो जाते हैं और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं. 

ध्यान लगाने और खुद पर काबू रखने की क्षमता होती है कमजोर

शॉर्ट वीडियो आमतौर पर 15 से 90 सेकंड के होते हैं. हर वीडियो में कुछ नया, तेज और चौंकाने वाला होता है. इससे बच्चों का दिमाग धीरे-धीरे लगातार नई उत्तेजना का आदी हो जाता है. जब बच्चा किताब पढ़ने, होमवर्क करने या किसी एक काम पर ध्यान लगाने की कोशिश करता है, तो उसका मन जल्दी भटकने लगता है. 2023 के एक विश्लेषण में पाया गया कि ज्यादा शॉर्ट वीडियो देखने वाले बच्चों में ध्यान लगाने की क्षमता कम हो जाती है, सेल्फ कंट्रोल की शक्ति कमजोर पड़ने लगती है, यही वजह है कि बच्चे बार-बार कहते हैं बस एक वीडियो और, लेकिन वह एक कभी खत्म नहीं होता है. 

बढ़ती चिंता और सामाजिक बेचैनी

लगातार स्क्रीन देखने से सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक सेहत पर भी असर पड़ता है. हाल के अध्ययनों में सामने आया है कि जो बच्चे और किशोर लंबे समय तक शॉर्ट वीडियो देखते हैं, उनमें चिंता (एंग्जायटी), बेचैनी, अकेलापन जैसी समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती हैं. नींद खराब होने से यह परेशानी और बढ़ जाती है. जब बच्चा ठीक से सो नहीं पाता, तो उसका मन भारी रहता है, पढ़ाई में मन नहीं लगता और दोस्तों व परिवार से बातचीत भी कम हो जाती है. असल में छोटे बच्चे ज्यादा संवेदनशील होते हैं. उनका दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है. वे जो देखते हैं, उसे जल्दी सीख लेते हैं और असर भी जल्दी होता है. ऑटोप्ले फीचर की वजह से एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा शुरू हो जाता है. ऐसे में हिंसक, डरावना, जोखिम भरा, कंटेंट अचानक सामने आ सकता है. शॉर्ट वीडियो में पूरा संदर्भ नहीं होता है. एक पल में हंसी और अगले पल डर या संवेदनशील सीन आ जाता है. बच्चों के लिए यह बदलाव बहुत उलझाने वाला हो सकता है. 

सरकार और स्कूल अब हो रहे हैं सतर्क

अच्छी बात यह है कि अब इस समस्या को गंभीरता से लिया जा रहा है. कई देशों में स्कूलों को डिजिटल सुरक्षा और ऑनलाइन समझदारी बच्चों को सिखाने की सलाह दी गई है. कुछ स्कूलों में मोबाइल के इस्तेमाल पर रोक या सीमाएं लगाई जा रही हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से यह मांग की जा रही है कि बच्चों के लिए सुरक्षित सेटिंग्स हों, उम्र की सही जांच हो और नुकसानदायक कंटेंट से बच्चों को बचाया जाए. 

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डायबिटीज और ओरल हेल्थ का गहरा कनेक्शन, जानिए कारण और इसके शुरुआती संकेत

डायबिटीज और ओरल हेल्थ का गहरा कनेक्शन, जानिए कारण और इसके शुरुआती संकेत


डायबिटीज का हमारे मुंह और दांतों पर भी गहरा असर होता है. हमारा मुंह सिर्फ खाने-पीने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक छोटी-सी, जीवंत दुनिया की तरह है. इसमें मौजूद सूक्ष्मजीव, लार और मसूड़े हमारे पूरे शरीर की इम्यून और मेटाबॉलिक सिस्टम के साथ जुड़े रहते हैं. जब ब्लड में शुगर का लेवल लंबे समय तक असंतुलित रहता है, तो यह सिर्फ शरीर की अन्य सिस्टम को प्रभावित नहीं करता, बल्कि मुंह की स्वास्थ्य स्थिति को भी बिगाड़ देता है. इस कारण से, डायबिटीज वाले लोगों में डेंटिस्ट अक्सर ऐसे रोगियों से मिलते हैं जिनके मुंह में लगातार मसूड़ों की सूजन, घावों का देर से भरना, या बार-बार संक्रमण होने जैसी समस्याएं होती हैं. 

यह समझना जरूरी है कि मुंह में दिखने वाले ये लक्षण सिर्फ दांत या मसूड़ों की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह शरीर में हो रही सिस्टेमेटिक समस्याओं का संकेत भी हो सकते हैं. इसलिए,  डायबिटीज और ओरल हेल्थ के बीच संबंध को समझना न रोग की बेहतर निगरानी में मदद करता है. तो आइए जानते हैं कि डायबिटीज और ओरल हेल्थ का गहरा कनेक्शन के कारण और इसके शुरुआती संकेत क्या हैं. 

डायबिटीज से जुड़े मुंह के लक्षण और शुरुआती संकेत

डायबिटीज के कारण मुंह में होने वाले बदलाव धीरे-धीरे सामने आते हैं. यही वजह है कि अक्सर लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. कभी-कभी ये लक्षण शरीर में अन्य गंभीर जटिलताओं से पहले ही दिखने लगते हैं, जिससे मुंह स्वास्थ्य की स्थिति डायबिटीज की गंभीरता का पहला संकेत बन सकती है. शोध बताते हैं कि ज्यादातर रोगी इन लक्षणों के प्रति जागरूक नहीं होते, जिससे वे समय पर डॉक्टर से संपर्क नहीं कर पाते, डायबिटीज के शुरुआती मौखिक लक्षण में ब्रश या फ्लॉस करते समय खून आना, मुंह से लगातार बदबू, मौखिक सूखापन और बार-बार प्यास लगना, दांतों की सेंसिटिविटी या दर्द, छोटे घाव या छाले और फंगल संक्रमण , जीभ या गालों के अंदर सफेद धब्बे बनना. 

डायबिटीज और ओरल हेल्थ के बीच कनेक्शन

डायबिटीज और ओरल हेल्थ के बीच संबंध शरीर में लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर के कारण होने वाले कई बदलावों पर आधारित है. जब ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है, तो यह इम्यूनिटी, ब्लड फ्लो और लार की संरचना को प्रभावित करता है. इसके कारण मुंह में संक्रमण के प्रति प्रतिरोध कम हो जाता है और ऊतक धीरे-धीरे खराब होने लगते हैं. इसके मुख्य कारणों मेंकमजोर इम्यूनिटी, लार में ग्लूकोज की बढ़ी मात्रा , मसूड़ों में रक्त संचार की कमी, लंबे समय तक सूजन और लार के उत्पादन में बदलाव शामिल हैं. इसलिए डायबिटीज वाले व्यक्ति में मुंह की समस्याएं जल्दी और गंभीर रूप से बढ़ सकती हैं. 

डायबिटीज में और ओरल हेल्थ को कैसे कंट्रोल करें?

डायबिटीज से जुड़ी ओरल हेल्थ समस्याओं को कंट्रोल करने का सबसे अच्छा तरीका सही चिकित्सकीय नियंत्रण, नियमित दंत देखभाल और जागरूक व्यवहार है. सही ग्लूकोज नियंत्रण से मुंह के ऊतक स्वस्थ रहते हैं और दंत जांच से समय पर जटिलताओं को रोका जा सकता है. इसलिए डायबिटीज के अनुसार निर्धारित दवा और उपचार योजना का पालन करें, दांतों में दर्द या समस्या न होने पर भी नियमित दंत जांच कराएं, सही तरीके से ब्रश और फ्लॉस करें, मसूड़ों में सूजन, संक्रमण या लगातार सूखापन होने पर तुरंत उपचार कराएं, तंबाकू से दूर रहें, ज्यादा मीठे या अम्लीय उत्पादों का सेवन न करें और मुंह सूखने पर शुगर-फ्री गम या लार के ऑप्शन का यूज करें. 

यह भी पढ़ें: क्या सच में खाना खाने के बाद करनी चाहिए फार्ट वॉक, वाकई इससे सेहत सुधरती है?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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