सर्दियों में बार-बार ड्राई हो रही स्किन, ऐसे करें हील
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आजकल सोशल मीडिया पर सेहत से जुड़े अजीब-अजीब ट्रेंड वायरल होते रहते हैं. कभी नींबू पानी, कभी खाली पेट कोई खास चीज, और अब एक नया ट्रेंड ‘फार्ट वॉक’ चर्चा में है. नाम सुनकर भले ही हंसी आए, लेकिन लोग दावा कर रहे हैं कि यह आदत पाचन सुधारती है, गैस कम करती है और यहां तक कि डायबिटीज के खतरे को भी घटा सकती है. तो आइए जानते है कि क्या सच में खाना खाने के बाद फार्ट वॉक करनी चाहिए और क्या वाकई इससे सेहत सुधरती है.
फार्ट वॉक क्या होती है?
फार्ट वॉक का मतलब खाना खाने के बाद हल्की वॉक पर जाना है, ताकि पेट में बनी गैस बाहर निकल सके और पाचन सही तरीके से हो. इस शब्द को 70 साल की कुकबुक लेखिका मैरिलिन स्मिथ ने मशहूर किया है. वह और उनके पति रात के खाने के बाद टहलने जाते थे और मजाक में इसे फार्ट वॉक कहने लगे. बाद में उन्होंने इसके वीडियो इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर डाल दिए, जो लाखों लोगों ने देखे. धीरे-धीरे लोग भी इस आइडिया को अपनाने लगे और यह एक वेलनेस ट्रेंड बन गया.
क्या सच में खाना खाने के बाद करनी चाहिए फार्ट वॉक
खाना खाने के बाद फार्ट वॉक करनी चाहिए. इससे शरीर को कई तरह के फायदे होते है. जैसे-
1. पाचन तेज होता है – जब आप बैठने या लेटने के बजाय चलते हैं, तो आपकी आंतों की हल्की मालिश होती है. इससे खाना आगे बढ़ता है, गैस बाहर निकलने में मदद मिलती है और पेट फूलना कम होता है. डॉक्टर भी मानते हैं कि हल्की एक्टिविटी पाचन को बेहतर बनाती है.
2. गैस और कब्ज में राहत – चलने से आंतों की एक्टिविटी बढ़ती है. इससे गैस पास करना आसान होता है, कब्ज की समस्या कम होती है और पेट हल्का महसूस होता है. खासकर जो लोग फाइबर वाला खाना खाते हैं, उनके लिए यह बहुत मददगार हो सकता है.
3. ब्लड शुगर कंट्रोल में मदद – खाना खाने के बाद अगर हम बिल्कुल न हिलें, तो ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है. लेकिन अगर आप 5–10 मिनट भी फार्ट वॉक कर लेते हैं तो मांसपेशियां ब्लड में मौजूद शुगर को इस्तेमाल करने लगती हैं, शुगर का लेवल धीरे-धीरे बढ़ता है, डायबिटीज का खतरा कम हो सकता है और डायबिटीज के मरीजों के लिए भी हल्की वॉक फायदेमंद मानी जाती है.
4. दिल की सेहत के लिए अच्छी – रोज खाना खाने के बाद थोड़ी फार्ट वॉक कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद कर सकती है, दिल की बीमारियों का खतरा घटा सकती है, रोज की एक्सरसाइज पूरी करने में मदद करती है, अगर आप रोज 10 मिनट भी चलते हैं, तो हफ्ते में अच्छी-खासी फिजिकल एक्टिविटी हो जाती है.
5. आंतों के अच्छे बैक्टीरिया मजबूत होते हैं – चलने से आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया बेहतर तरीके से काम करते हैं. ये बैक्टीरिया पाचन सुधारते हैं, शरीर के लिए फायदेमंद तत्व बनाते हैं, मूड और इम्यूनिटी पर भी असर डालते हैं.
6. मानसिक सेहत के लिए भी फायदेमंद – बाहर टहलने से तनाव कम होता है, मूड बेहतर होता है और नींद अच्छी आती है. कई लोग इसे अपने पार्टनर, दोस्त या परिवार के साथ करते हैं, जिससे रिश्ते भी मजबूत होते हैं.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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क्या है H3N2 सुपर फ्लू?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह वायरस इन्फ्लूएंजा ए का बदला हुआ रूप है, जिसे सबक्लेड के कहा जा रहा है. इसे सुपर फ्लू इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इसमें कुछ जेनेटिक बदलाव देखे गए हैं. डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यह कोई नया वायरस नहीं है और न ही अब तक के आंकड़े यह बताते हैं कि यह पहले के मुकाबले ज्यादा गंभीर बीमारी पैदा करता है. लेकिन इसकी खास बात यह है कि यह सामान्य फ्लू सीजन से पहले ही तेजी से फैल रहा है.
ब्रिटेन और पाकिस्तान में क्यों बढ़ रही चिंता?
पिछले कुछ समय में ब्रिटेन में इस फ्लू के मामलों में अचानक बढ़ोतरी देखी गई है. वहां हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या पिछले साल के मुकाबले काफी ज्यादा बताई जा रही है. आंकड़ों के अनुसार फ्लू के कारण हॉस्पिटल में भर्ती मरीजों की संख्या में 50 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. वहीं सबसे ज्यादा संक्रमण 5 से 14 साल के बच्चों और 15 से 24 साल की युवाओं में देखा गया है. हालात को देखते हुए ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस ने बुजुर्गों, बच्चों और ज्यादा खतरे वाले लोगों से जल्द फ्लू वैक्सीन लगवाने की अपील की है. वहीं यूरोप के बाद पाकिस्तान में भी H3N2 सुपर फ्लू के स्ट्रेन की पुष्टि हो चुकी है. हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है की इसे लेकर सतर्कता बरतने की जरूरत है. पाकिस्तान में यह वायरस कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकता है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर फ्लू आगे चलकर निमोनिया में बदल जाए तो मरीजों को वेंटिलेटर तक की जरूरत पड़ सकती है.
भारत में भी माना जा रहा खतरा
भारत और पाकिस्तान के बीच मौसम, हवा की दिशा और लोगों की आवाजाही काफी हद तक समान रहती है. इसके अलावा सर्दियों में कोहरा, प्रदूषण, भीड़-भाड़, स्कूलों में बच्चों का आपसी संपर्क और ट्रैवल वायरस के फैलने के लिए अनुकूल माहौल बनाता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर पड़ोसी देश में वायरस फैल रहा है तो भारत में इसके केस सामने आने के संभावना हो सकती है. इसके अलावा भारत में पहले भी H3N2 फ्लू के मामले देखे जा चुके हैं. इसलिए भारत का हेल्थ सिस्टम इस वायरस से पूरी तरह अनजान नहीं है. देश में फ्लू सर्विलांस सिस्टम मौजूद है, हॉस्पिटलों में जांच की सुविधा है और डॉक्टर इसके लक्षण पहचानने में सक्षम है. हालांकि एक बड़ी चिंता यह है कि भारत में फ्लू वैक्सीन लगवाने की दर काफी कम है, खासकर बुजुर्गों और हाई रिस्क ग्रुप में. इसके अलावा एक्सपर्ट के अनुसार 60 से ज्यादा उम्र के लोग डायबिटीज, दिल और फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित मरीज और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों को ज्यादा सावधानी रखने की जरूरत है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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प्रेग्नेंसी किसी भी महिला के जीवन का सबसे खास समय होता है. इस दौरान शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं और हर महिला यही चाहती है कि उसकी प्रेग्नेंसी सुरक्षित और सामान्य रहे. हालांकि, कुछ मामलों में गर्भ ठहरने की प्रक्रिया सही तरीके से नहीं हो पाती और ऐसी स्थिति बन जाती है जो महिला की जान के लिए भी खतरनाक हो सकती है. इसी गंभीर समस्या का नाम एक्टोपिक प्रेग्नेंसी है.
एक्टोपिक प्रेग्नेंसी एक मेडिकल इमरजेंसी है. कई बार इसके लक्षण सामान्य प्रेग्नेंसी जैसे ही होते हैं, इसलिए महिलाएं इसे पहचान नहीं पातीं हैं. समय पर जांच न हो पाने की वजह से फैलोपियन ट्यूब फट सकती है और जान का खतरा तक हो सकता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि फैलोपिएन ट्यूब में भ्रूण कैसे ठहर जाता है और इससे मां की जान को कितना खतरा होता है.
एक्टोपिक प्रेग्नेंसी क्या होती है?
सामान्य प्रेगनेंसी में जब अंडाणु और शुक्राणु का मिलन होता है, तो निषेचित अंडा फैलोपियन ट्यूब से होते हुए यूट्रस तक पहुंचता है. वहीं जाकर वह चिपकता है और बच्चे का विकास शुरू होता है, लेकिन एक्टोपिक प्रेग्नेंसी में यह निषेचित अंडा गर्भाशय तक नहीं पहुंच पाता और रास्ते में ही किसी गलत जगह रुक जाता है. ज्यादातर मामलों में यह फैलोपियन ट्यूब में ही फंस जाता है. इसी कारण इसे ट्यूबल प्रेग्नेंसी भी कहा जाता है. फैलोपियन ट्यूब बच्चे के विकास के लिए बनी ही नहीं होती, इसलिए यह स्थिति बहुत खतरनाक मानी जाती है.
फैलोपियन ट्यूब में भ्रूण कैसे ठहर जाता है?
महिला के अंडाशय से हर महीने एक अंडा निकलता है. यह अंडा फैलोपियन ट्यूब में पहुंचता है, जहां इसका मिलन शुक्राणु से होता है और फर्टिलाइजेशन होता है. फर्टिलाइजेशन के बाद यह अंडा धीरे-धीरे फैलोपियन ट्यूब से होते हुए यूटरस की ओर बढ़ता है. ट्यूब के अंदर मौजूद छोटे-छोटे बाल जैसे स्ट्रक्चर (सिलिया) इसमें मदद करते हैं. अगर किसी कारण से फैलोपियन ट्यूब में सूजन हो, संकुचन हो, ब्लॉकेज हो या ट्यूब खराब हो चुकी हो तो भ्रूण आगे नहीं बढ़ पाता और वहीं ट्यूब में चिपक जाता है. यहीं से एक्टोपिक प्रेग्नेंसी शुरू हो जाती है.
फैलोपियन ट्यूब में भ्रूण ठहरने के कारण
पहले हुआ कोई इंफेक्शन या पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज, पहले की गई सर्जरी, एंडोमेट्रियोसिस, पहले भी एक्टोपिक प्रेग्नेंसी का इतिहास, IVF या फर्टिलिटी ट्रीटमेंट, स्मोकिंग की आदत और हार्मोनल असंतुलन के कारण फैलोपियन ट्यूब में भ्रूण ठहर सकता है.
इससे मां की जान को कितना खतरा होता है?
1. जानलेवा स्थिति – एक्टोपिक प्रेग्नेंसी एक गंभीर और जानलेवा स्थिति हो सकती है. अगर समय पर इलाज न हो, तो यह महिला की जान ले सकती है.
2. ट्यूब का फटना – जैसे-जैसे भ्रूण बढ़ता है, फैलोपियन ट्यूब पर दबाव बढ़ता जाता है. एक समय पर ट्यूब फट सकती है.
3. इंटरनल ब्लीडिंग – ट्यूब फटने पर पेट के अंदर तेज ब्लीडिंग होती है, जो बाहर से नजर नहीं आता लेकिन बहुत खतरनाक होता है.
4. बेहोशी और शॉक- ज्यादा खून बहने से महिला बेहोश हो सकती है, ब्लड प्रेशर गिर सकता है और मेडिकल शॉक की स्थिति बन सकती है.
यह भी पढ़ें: हर महीने होने वाले पीरियड पेन को करें दूर, आजमाएं ये आसान देसी इलाज
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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कैंसर का नाम सुनते ही लोगों के मन में भी यह डर बैठ जाता है. खासतौर पर जब बात बच्चों की हो तो चिंता और बढ़ जाती है. कई बार पेरेंट्स के मन में भी यह सवाल उठता है कि क्या कैंसर भी किसी संक्रमण की तरह एक इंसान से दूसरे इंसान में फैल सकता है या फिर यह बीमारी जन्म से ही बच्चों तक पहुंच सकती है. दरअसल, एड्स जैसी गंभीर बीमारियों के मामले में संक्रमण फैलना आम बात होती है, लेकिन क्या कैंसर के साथ भी ऐसा हो सकता है?
क्या कैंसर है संक्रामक बीमारी?
एक्सपर्ट के अनुसार, कैंसर किसी भी तरह से संक्रामक बीमारी नहीं है. यानी यह बीमारी न तो छूने से फैलती है, न साथ रहने से, न साथ में खाना खाने से और न ही हवा के जरिए फैलती है. कैंसर तब होता है जब शरीर की कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव आ जाता है और वह अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती है. यह प्रक्रिया शरीर के अंदर होती है और इसका किसी दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आने से कोई लेना-देना नहीं होता है. यही वजह है कि कैंसर को फ्लू या अन्य संक्रमणों की तरह फैलने वाली बीमारी नहीं माना जाता है.
एड्स से क्यों जुड़ा होता है कैंसर?
एड्स यानी एचआईवी बीमारी सीधे तौर पर कैंसर नहीं है, लेकिन यह शरीर के इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देती है. जब शरीर का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है तो शरीर कोशिकाओं से ठीक से नहीं लड़ पता है. ऐसे में एचआईवी या एड्स से पीड़ित बच्चों में कुछ खास तरह के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. जिनमें नॉन हॉजकिन लिम्फोमा सबसे प्रमुख माना जाता है. इसे ही एड्स रिलेटेड लिम्फोमा कहा जाता है. यह कैंसर लसीका का तंत्र यानी लिम्फ सिस्टम की सफेद ब्लड सेल्स में शुरू होता है.
बच्चों में कैसे विकसित होता है एड्स रिलेटेड लिम्फोमा?
दरअसल बच्चों में यह बीमारी तब देखी जाती है, जब उनमें जन्म के समय या फीडिंग के दौरान एचआईवी संक्रमण मिल जाता है और समय पर एंटीवायरस दवाएं नहीं दी जाती है. वहीं एचआईवी वायरस शरीर की सुरक्षा प्रणाली पर हमला करता है, जिससे संक्रमण और कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. ऐसे बच्चों में लिम्फ में नोड्स, दिमाग, स्पाइनल कॉर्ड या शरीर के दूसरे अंगों में तेजी से बढ़ने वाला कैंसर विकसित हो सकता है.
एक्सपर्ट्स क्या देते हैं सलाह?
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि कैंसर को लेकर समाज में फैली गलतफहमियों को दूर करना बहुत जरूरी है. कैंसर के मरीजों से दूरी बनाना न सिर्फ गलत है, बल्कि उनके मेंटल हेल्थ पर भी बुरा असर डालता है. वहीं बच्चों के मामले में अगर एचआईवी या किसी गंभीर बीमारी का खतरा हो तो समय पर जांच और सही इलाज बहुत जरूरी होता है.
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आजकल खाना खाते समय मोबाइल फोन देखना एक आम आदत बन चुकी है. खासतौर पर छोटे बच्चों को खाना खिलाने के लिए माता-पिता मोबाइल का सहारा लेते हैं, ताकि बच्चा ध्यान भटकने के बजाय जल्दी और पूरा खाना खा लें. एक्सपर्ट्स की मानें तो यह आदत बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी की सेहत के पर धीरे-धीरे बुरा असर डाल रही है. कई एक्सपर्ट्स तो इस आदत को लेकर गंभीर चेतावनी भी देते हैं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अगर आप भी खाना खाते वक्त मोबाइल देखते हैं तो इससे क्या-क्या दिक्कतें हो सकती है.
खाना खाते समय मोबाइल देखने से बच्चों पर असर
खाना खाने का समय सिर्फ पेट भरने का नहीं बल्कि बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास का भी अहम हिस्सा होता है. इस दौरान बच्चा माता-पिता की आंखों में देखकर बात करना, आवाज सुनना और चेहरे के हाव-भाव समझना सीखता है, लेकिन जब बच्चा खाना खाते वक्त मोबाइल स्क्रीन में उलझा रहता है तो यह पूरी प्रक्रिया रुक जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे बच्चों में स्पीच डिले यानी देर से बोलने की समस्या देखी जा सकती है. क्योंकि वह शब्दों को सुनने, समझने और दोहराने की प्रैक्टिस नहीं कर पाते हैं. इसके अलावा एक्सपर्ट्स बताते हैं कि मोबाइल देखकर खाना खाने से आगे चलकर बच्चों का व्यवहार भी प्रभावित होता है. ऐसे में बच्चे धीरे-धीरे बिना स्क्रीन के खाने खाना खाने से मना करने लगते हैं या चिड़चिड़ा हो सकते हैं. वहीं किसी भी चीज पर फोकस नहीं कर पाते और खुद से खाना खाने की क्षमता भी देरी से विकसित होती है.
मोबाइल के साथ खाने का असर बड़ों की सेहत पर भी
सिर्फ बच्चे ही नहीं बल्कि बड़े लोग भी मोबाइल देखकर खाना खाने की आदत की शिकार है. एक्सपर्ट्स के अनुसार खाना खाते समय मोबाइल देखने से ध्यान भटकता है और व्यक्ति बिना सोचे समझे ज्यादा कैलोरी ले सकता है. इससे वजन बढ़ने का खतरा रहता है, साथ ही पोर्शन साइज और पेट भरने के संकेतों पर ध्यान न देने से लंबे समय में मेटाबोलिक समस्याएं भी हो सकती है.
क्या मोबाइल देखने से बढ़ता है इन्सुलिन रेजिस्टेंस का खतरा
कई एक्सपर्ट्स बताते हैं कि खाने के दौरान मोबाइल का इस्तेमाल सीधे तौर पर इन्सुलिन रेजिस्टेंस का कारण बनता है. हालांकि इसे लेकर कोई ठोस स्टडी उपलब्ध नहीं है, लेकिन ध्यान भटकने की वजह से जरूरत से ज्यादा खाना, प्रोसेस्ड फूड का चुनाव और ब्लड शुगर स्पाइक्स जैसी कंडीशन बन सकती है जो आगे चलकर इन्सुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ा सकती है. इसलिए खाना खाते समय पूरी तरह खाने पर ध्यान देना जरूरी होता है.
स्क्रीन फ्री मील क्यों है जरूरी?
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि खाने के समय बच्चों को नए शब्द सीखने और उनसे बातचीत करने का सबसे अच्छा मौका होता है. इस दौरान बच्चे खाने की चीजों को पहचानते है, उनके नाम सीखते हैं और माता-पिता से जुड़ाव महसूस करते हैं. ऐसे में जरूरी है कि खाने के समय मोबाइल, टीवी या टैबलेट पूरी तरह बंद रखा जाए. इसके अलावा बड़ों को लेकर एक्सपर्ट्स बताते हैं कि स्क्रीन फ्री मिल सेहत के लिए फायदेमंद है. जब व्यक्ति धीरे-धीरे खाना खाता है, स्वाद और मात्र पर ध्यान देता है तो ओवर ईटिंग से बचा जा सकता है. साथ ही शरीर की भूख और तृप्ति के संकेतों को समझना आसान हो जाता है. जिससे ब्लड शुगर और वजन भी कंट्रोल में रहता है.
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