जोड़ों की उम्र कम कर देती है रोजाना की ये 8 गलतियां, डॉक्टर्स ने बताया किन आदतों को छोड़ना जरूरी

जोड़ों की उम्र कम कर देती है रोजाना की ये 8 गलतियां, डॉक्टर्स ने बताया किन आदतों को छोड़ना जरूरी


एक्सपर्ट्स बताते हैं कि लगातार होने वाला घुटनों का दर्द शरीर का सिग्नल होता है. वहीं अक्सर लोग इसे नजरअंदाज करते हैं, जिससे मामूली समस्या आगे जाकर गंभीर चोट या सूजन का कारण बन सकती है.



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भारत में डायबिटीज मरीजों के लिए नई उम्मीद, निक जोनस और प्रियंका लाए बियॉन्ड टाइप 1 कैंपेन

भारत में डायबिटीज मरीजों के लिए नई उम्मीद, निक जोनस और प्रियंका लाए बियॉन्ड टाइप 1 कैंपेन


Type 1 Diabetes Awareness India: निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा अब भारत में डायबिटीज़ को लेकर एक नई पहल की शुरुआत कर रहे हैं. दुनिया भर में टाइप 1 डायबिटीज को लेकर काम करने वाला निक का गैर-लाभकारी संगठन बियॉन्ड टाइप 1 अब देश में भी जागरूकता बढ़ाने और इससे जुड़ी शर्म, हिचकिचाहट को खत्म करने के लिए अभियान चला रहा है. प्रियंका ने इंस्टाग्राम पर बताया कि वह अपने पति निक जोनस की इस मुहिम को भारत तक लाने पर खुश हैं. बियॉन्ड टाइप 1 का उद्देश्य दुनिया भर के टाइप 1 डायबिटीज मरीजों को एक प्लेटफॉर्म पर लाना है, जहां उन्हें सही जानकारी, संसाधन, समर्थन और बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा मिल सके. 

क्या कहा प्रियंका चोपड़ा ने?

प्रियंका ने लिखा कि उनकी टाइप 1 डायबिटीज़ की समझ निक की मेडिकल जर्नी से ही शुरू हुई। सिर्फ 13 साल की उम्र में निदान होने के बाद निक ने अपनी हालत को मैनेज करते हुए एक ऐसी जिंदगी बनाई जो लोगों को सीमाओं से आगे बढ़ने की ताकत देती है. प्रियंका ने कहा कि निक ने बियॉन्ड टाइप 1 की स्थापना इसलिए की ताकि डायबिटीज से जूझ रहे लोग सम्मान, जानकारी और सपोर्ट हासिल कर सकें.

 

भारत क्यों है इस पहल का बड़ा केंद्र?

दुनियाभर में डाटबिटीज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, भारत उनमें से एक है. WHO के अनुसार भारत में 18 वर्ष से ऊपर करीब 7.7 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं. दुनिया में सबसे ज़्यादा टाइप 1 डायबिटीज वाले युवाओं में भारत दूसरे नंबर पर है, कई मामलों में बीमारी देर से पकड़ में आती है और बच्चे वर्षों तक इसे अकेले झेलते रहते हैं.  इसी अंतर को भरने के लिए बियॉन्ड टाइप 1 भारत में एक  कैंपेन लॉन्च कर रहा है, जिसमें ऐसे लोगों की कहानियां शामिल होंगी जिन्होंने डायबिटीज से लड़ते हुए अपनी जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया. इस कैंपेन में शामिल लोग हैं, लेफ्टिनेंट कर्नल कुमार गौरव, मेहरिन राणा, निशांत अमीन, श्रेया जैन, इंदु थंपी और हरिचंद्रन पोनुसामी.

निक जोनस की अपनी जर्नी

निक जोनस को 2002 में, जब वह सिर्फ 13 साल के थे, टाइप 1 डायबिटीज का इलाज हुआ था. शुरुआत में वह खुद को बिल्कुल अकेला महसूस करते थे. बाद में उन्होंने महसूस किया कि उनकी तरह कई लोग हैं जो निदान के बाद आइसोलेशन में चले जाते हैं, जिन्हें किसी सहारे और समझ की जरूरत होती है. इसी अनुभव ने उन्हें बियॉन्ड टाइप 1  शुरू किया. यह एक ऐसा संस्थान है, जिसका उद्देश्य ऐसा माहौल बनाना है, जहां लोग अपनी जर्नी साझा कर सकें, खुलकर बात कर सकें और एक-दूसरे को मजबूत बना सकें.

इसे भी पढ़ें: Preterm Birth Causes: भारत में क्यों बढ़ रहे समय से पहले जन्म के केस? जानें प्रीमैच्योर डिलीवरी की असली वजह

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारत में क्यों बढ़ रहे समय से पहले जन्म के केस? जानें प्रीमैच्योर डिलीवरी की असली वजह

भारत में क्यों बढ़ रहे समय से पहले जन्म के केस? जानें प्रीमैच्योर डिलीवरी की असली वजह


Why Preterm Births Are Rising: भारत में समय से पहले होने वाली डिलीवरी यानी 37 हफ्तों से पहले बच्चा जन्म लेना एक बड़ी स्वास्थ्य चिंता बन गई है. मेडिकल सुविधाओं में सुधार हुए हैं, लेकिन प्रीमैच्योर बर्थ की संख्या लगातार बढ़ रही है. दुनिया में प्रीटर्म बर्थ की दर 4 प्रतिशत से 15 प्रतिशत के बीच रहती है, जबकि भारत में यह अक्सर 10 प्रतिशत से 15 प्रतिशत तक होती है. बड़ी जनसंख्या और सभी जगह बराबर स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने की वजह से हर साल देश में लगभग 25 से 30 लाख बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है.

क्यों बढ़ रहे प्रीमैच्योर बर्थ?

डॉक्टर बताते हैं कि प्रीमैच्योर बर्थ की एक ही वजह नहीं होती. कई कारक मिलकर जोखिम बढ़ाते हैं, जैसे मां की उम्र, न्यूट्रिशन, बीमारियां, तनाव और गर्भावस्था के बीच का अंतर. रायपुर के जननी केयर अस्पताल की डॉ. दीपा सिंह बताती हैं कि जोखिम गर्भ ठहरने से पहले ही शुरू हो सकता है. भारत में दो ट्रेंड बढ़ रहे हैं. बहुत कम उम्र में गर्भधारण और 35 साल के बाद गर्भधारण. दोनों ही स्थितियों में परेशानी ज्यादा होती है. इसके अलावा, गर्भों के बीच कम अंतर भी शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाल देता है और समय से पहले लेबर शुरू हो सकती है.

मां का न्यूट्रिशन प्रीमैच्योर डिलीवरी का सबसे बड़ा कारण है. जिन महिलाओं में एनीमिया, कम बीएमआई या विटामिन की कमी होती है, या जो नियमित प्रेग्नेंसी चेक-अप नहीं करवातीं, उनमें जोखिम काफी बढ़ जाता है. जांचें न करवाने पर कई समस्याएं समय रहते पकड़ में नहीं आतीं, जैसे इंफेक्शन, हाई बीपी, शुगर, थायरॉयड या अचानक बढ़ा वजन. बहुत बार इंफेक्शन समय से पहले लेबर शुरू कर देता है, लेकिन शर्म या जानकारी की कमी के कारण महिलाएं इसे अनदेखा कर देती हैं. इसके अलावा, डायबिटीज, मोटापा, थायरॉयड और हाई बीपी जैसी बीमारियां भी अब युवा महिलाओं में बढ़ रही हैं और जोखिम को और बढ़ाती हैं.

रोकने के लिए जरूरी कदम

प्रीमैच्योर जन्म हर बार रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय पर देखभाल से इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसकी शुरुआत लड़की के किशोरावस्था से होती है. सही पोषण, टीकाकरण और प्रजनन स्वास्थ्य की जानकारी बहुत जरूरी है. गर्भधारण से पहले जांच करवाना भी लाभदायक है, एनीमिया ठीक करना, थायरॉयड नियंत्रित करना और इंफेक्शन का इलाज. गर्भावस्था के दौरान नियमित जांचें जरूरी हैं ताकि बीपी, शुगर, बच्चे की ग्रोथ और प्लेसेंटा की स्थिति पर नजर रखी जा सके. आहार में आयरन, फोलिक एसिड, कैल्शियम, प्रोटीन और ओमेगा-3 शामिल करना बेहद जरूरी है. हल्की एक्सरसाइज, प्रीनेटल योग, सही नींद और पर्याप्त पानी शरीर की सेहत और तनाव दोनों को संभालते हैं.

इसे भी पढ़ें- Winter Health Problems: ठंड के मौसम में अपाहिज बना देती है यह बीमारी, जानें कैसे रखें अपना ख्याल?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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डायबिटीज का इलाज अब सिर्फ 2 घंटे में, AIIMS की नई सर्जरी ने दिखाया कमाल

डायबिटीज का इलाज अब सिर्फ 2 घंटे में, AIIMS की नई सर्जरी ने दिखाया कमाल


अब आप अपनी डायबिटीज (Diabetes) यानी मधुमेह की बीमारी को मात्र दो घंटे की सर्जरी करवाकर ठीक कर सकते हैं. यह दावा है AIIMS के सर्जरी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉक्टर मंजूनाथ का. उन्होंने बताया कि बीते एक साल में 35 मरीजों ने यह सर्जरी करवाई और सभी मरीजों को डायबिटीज (Diabetes) की बीमारी से छुटकारा मिला. सर्जरी कराकर ठीक होने वाले मरीजों में एक सांसद भी शामिल हैं.

मरीजों पर किए गए इस प्रयोग के नतीजे अब चर्चा का विषय बन गए हैं, क्योंकि रिकवरी तेज है और मरीज 24 घंटे के अंदर घर लौट पा रहे हैं. यह तकनीक ऐसे समय में उम्मीद बनकर सामने आई है जब देश में डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है. भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी डायबिटीज आबादी वाले देशों में शामिल है जहां करीब 10 करोड़ लोग शुगर से पीड़ित हैं. गलत खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, तनाव, नींद की कमी, मोटापा और परिवार में बीमारी का इतिहास इसके तेजी से बढ़ने की बड़ी वजहें हैं.

AIIMS की नई सर्जरी में अब तक क्या नतीजे मिले?

  • एम्स (AIIMS) के सर्जन डॉक्टर मंजूनाथ और हॉस्पिटल विभाग का कहना है कि उन्होंने 35 डायबिटीज मरीजों पर एक खास तरह की सर्जरी की जिसके नतीजे बेहद प्रभावी रहे.
  • यह पूरी सर्जरी सिर्फ 2 घंटे में हो जाती है.
  • मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल में एडमिट होने की जरूरत नहीं होती. मरीज सिर्फ 24 घंटे के अंदर घर लौट सकते हैं.

यह सर्जरी किन मरीजों के लिए है और किनके लिए नहीं?

डॉक्टरों के अनुसार, यह सर्जरी मोटापे के इलाज के लिए थी लेकिन अब इस सर्जरी से डायबिटीज की बीमारी को भी ठीक किया जा सकता है. एम्स ने स्पष्ट किया है कि यह खास सर्जरी हर डायबिटीज मरीज के लिए नहीं है.

इसे खास तौर पर उन लोगों के लिए डिजाइन किया गया है 

  • बीमारी लंबे समय से है
  • HbA1C लगातार 7.5 से ज्यादा हो
  • तीन दवाओं के बाद भी शुगर कंट्रोल न होता हो

यह सर्जरी उन मरीजों को नहीं करवानी चाहिए

  • जिन्हें डायबिटीज को 15 साल से ज्यादा हो चुके हों
  • जिन्हें 100 यूनिट तक इंसुलिन लेनी पड़ती हो

कैसे होती है सर्जरी?

डॉक्टरों के मुताबिक यह सर्जरी पैनक्रियाज पर नहीं बल्कि पेट और छोटी आंत पर की जाती है. मेटाबोलिक सर्जरी में सबसे पहले पेट का साइज कम करके उसे ट्यूब जैसी शेप दी जाती है. इसकी वजह से शरीर के जिस हिस्से में अलग तरह के हार्मोन बन रहे हैं उसे फूड पाइप में जाने से रोका जाता है. इसके बाद छोटी आंत को इस बदले हुए पेट से इस तरह जोड़ दिया जाता है कि खाना पेट में जाने के बाद डुओडेनम को पार करता हुआ सीधे आगे की आंत में पहुँच जाता है.

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ठंड के मौसम में अपाहिज बना देती है यह बीमारी, जानें कैसे रखें अपना ख्याल?

ठंड के मौसम में अपाहिज बना देती है यह बीमारी, जानें कैसे रखें अपना ख्याल?


Why Symptoms Worsen In Cold Weather: सर्दियों में तापमान में अचानक गिरावट सिर्फ रजाई ओढ़कर मस्त सोने का ही नहीं होता, यह शरीर के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है.  ठंड का मौसम कई पुरानी बीमारियों को बढ़ा देता है, जिससे दर्द, जकड़न और कमजोरी इतनी बढ़ सकती है कि सामान्य काम करना भी मुश्किल हो जाता है. कई लोगों में यह स्थिति लगभग अपाहिज जैसा असर छोड़ देती हैय  अच्छी बात यह है कि ये लक्षण अक्सर ठंड कम होने पर घट जाते हैं, लेकिन सावधान रहना जरूरी है.

कैसे बचें?

अगर सर्दी में बाहर निकलना पड़े, तो गर्म कपड़ों की कई परतें पहनें और सिर ढकें. शरीर गीला न होने दें, क्योंकि नमी से शरीर की गर्मी जल्दी खत्म होती है. साथ ही, डॉक्टर से अपनी फैमिली हिस्ट्री और हेल्थ स्क्रीनिंग पर बात करें ताकि जोखिम पहले से समझा जा सके.  एडिथ सी. मबाग्वू, एमडी, डीएबीओम, (फैमिली मेडिसिन की सीनियर लेक्चरर, यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड मेडिकल स्कूल) अपने लेख में बताती हैं कि सर्दियों के मौसम में कुछ ऐसी बीमारियां होती हैं, जिनमें सोरायसिस, जिसमें सर्दियों की सूखी हवा त्वचा की नमी छीन लेती है,  इससे त्वचा फटने, जलन और खुजली की समस्या तेज हो सकती है. दूसरे नम्बर पर आपको सीओपीडी की बीमारी हो सकती है, इसमें होता यह है कि  ठंडी हवा फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालती हैय  इससे सांस फूलना, खांसी और बलगम की समस्या बढ़ सकती है. फ्लू और अस्थमा भी सीओपीडी को और खराब कर देते हैं. इनके अलावा-

 फ्लू 

सर्दियों में फ्लू वायरस ज्यादा तेजी से फैलता है.  धूप कम मिलने से विटामिन D घटता है और इम्यूनिटी कमजोर पड़ जाती है. बंद कमरों में इंफेक्टेड लोगों के साथ रहना भी बीमारी को बढ़ाता है.

अस्थमा 

बहुत ठंडी हवा फेफड़ों की नलियों को सिकोड़ देती है, जिससे अस्थमा अटैक की संभावना बढ़ जाती है.

आर्थराइटिस 

ठंड से जोड़ों में ब्लड का फ्लो कम हो जाता है, जिससे जकड़न, दर्द और सूजन बढ़ जाती है. बारोमेट्रिक प्रेशर में कमी से शरीर के टिश्यू फैलते हैं और नसों पर दबाव बढ़ने लगता है. इसलिए जोड़ों की बीमारी वाले मरीजों को ठंड में भी हल्की एक्सरसाइज जारी रखनी चाहिए.

 रेयनॉड्स डिजीज

इस बीमारी में उंगलियों और पैर की उंगलियों की ब्लड बेसल्स सिकुड़ जाती हैं. ठंडी हवा यह असर और बढ़ा देती है, जिससे दर्द, सुन्नपन और त्वचा का रंग बदलने लगता हैय

कैसे रखें अपना ख्याल?

  • शरीर को गर्म रखें
  • गुनगुना पानी पीते रहें
  • घर के अंदर नमी और ठंड से बचें
  • हल्की-फुल्की एक्सरसाइज जारी रखें
  • पौष्टिक और गर्म भोजन लें
  • पुरानी बीमारी वाली दवाएं समय पर लें
  • लक्षण बढ़ें तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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