स्मोकिंग नहीं करता था 37 साल का यह शख्स, फिर क्यों डलवाने पड़े 2 हार्ट स्टंट? डॉक्टर ने बताई डराने वाली वजह

स्मोकिंग नहीं करता था 37 साल का यह शख्स, फिर क्यों डलवाने पड़े 2 हार्ट स्टंट? डॉक्टर ने बताई डराने वाली वजह


अगर आपके पिता, चाचा, दादा या परिवार का कोई सदस्य कम उम्र में हार्ट रोग से जूझ चुका है, तो आपका जोखिम भी 2–3 गुना बढ़ जाता है. आप एक्टिव हो या दुबले-पतले हों, फिर भी दिल की बीमारी अंदर ही अंदर बढ़ सकती है.

लिपोप्रोटीन, यह एक बेहद खतरनाक प्रकार का कोलेस्ट्रॉल है. सामान्य लिपिड प्रोफाइल में इसकी जांच नहीं होती है. यह पूरी तरह जेनेटिक होता है. आपका LDL नॉर्मल होने पर भी यह धमनियों में ब्लॉकेज जमा कर सकता है.

लिपोप्रोटीन, यह एक बेहद खतरनाक प्रकार का कोलेस्ट्रॉल है. सामान्य लिपिड प्रोफाइल में इसकी जांच नहीं होती है. यह पूरी तरह जेनेटिक होता है. आपका LDL नॉर्मल होने पर भी यह धमनियों में ब्लॉकेज जमा कर सकता है.

सिर्फ दौड़ने या जिम जाने से तनाव कम नहीं होता, ज्यादा तनाव से  एड्रेनालाईन बढ़ता है,  ब्लड प्रेशर बढ़ता है,  शरीर में सूजन बढ़ती है और दिल की धमनियां कमजोर हो जाती हैं. आजकल की तेज कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल हार्ट पर बड़ा असर डालती है.

सिर्फ दौड़ने या जिम जाने से तनाव कम नहीं होता, ज्यादा तनाव से एड्रेनालाईन बढ़ता है, ब्लड प्रेशर बढ़ता है, शरीर में सूजन बढ़ती है और दिल की धमनियां कमजोर हो जाती हैं. आजकल की तेज कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल हार्ट पर बड़ा असर डालती है.

कई लोग बाहर से बिल्कुल फिट दिखते हैं, लेकिन उनके शरीर के अंदर सूजन बनी रहती है. यह सूजन धीरे-धीरे धमनियों को नुकसान पहुंचाती है, और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ाती है. आम ब्लड टेस्ट में इसकी जांच नहीं होती है.

कई लोग बाहर से बिल्कुल फिट दिखते हैं, लेकिन उनके शरीर के अंदर सूजन बनी रहती है. यह सूजन धीरे-धीरे धमनियों को नुकसान पहुंचाती है, और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ाती है. आम ब्लड टेस्ट में इसकी जांच नहीं होती है.

रोज 6 घंटे सोना काफी नहीं है.अगर आप आधी रात तक मोबाइल देखते रहते हैं या स्क्रीन यूज करते हैं, तो शरीर में मेटाबॉलिक स्ट्रेस बढ़ता है.इससे कॉर्टिसोल बढ़ जाता है,  खून गाढ़ा हो जाता है, प्लाक ज्यादा अस्थिर हो जाता है और अचानक हार्ट अटैक की संभावना बढ़ती है.

रोज 6 घंटे सोना काफी नहीं है.अगर आप आधी रात तक मोबाइल देखते रहते हैं या स्क्रीन यूज करते हैं, तो शरीर में मेटाबॉलिक स्ट्रेस बढ़ता है.इससे कॉर्टिसोल बढ़ जाता है, खून गाढ़ा हो जाता है, प्लाक ज्यादा अस्थिर हो जाता है और अचानक हार्ट अटैक की संभावना बढ़ती है.

दौड़ना, जॉगिंग, योगा फिटनेस के लिए अच्छे हैं,लेकिन ये गारंटी नहीं है कि आपकी धमनियां साफ हैं.दिल की बीमारी सिर्फ लाइफस्टाइल से नहीं बल्कि जीन, तनाव, सूजन, नींद और लिपोप्रोटीन(A) जैसे कई फैक्टर से मिलकर बनती है.

दौड़ना, जॉगिंग, योगा फिटनेस के लिए अच्छे हैं,लेकिन ये गारंटी नहीं है कि आपकी धमनियां साफ हैं.दिल की बीमारी सिर्फ लाइफस्टाइल से नहीं बल्कि जीन, तनाव, सूजन, नींद और लिपोप्रोटीन(A) जैसे कई फैक्टर से मिलकर बनती है.

डॉक्टरों के अनुसार, हर व्यक्ति को 25 साल की उम्र के बाद कुछ जांचें जरूरी करवानी चाहिए. जैसे Lipoprotein(a), HS-CRP (सूजन टेस्ट), ApoB, HbA1c, Fasting Insulin, Vitamin D, Homocysteine, TMT (अगर लक्षण दिखाई दें) और Coronary Calcium Score (35 साल के बाद), ये टेस्ट असली खतरे को समय रहते पकड़ सकते हैं.

डॉक्टरों के अनुसार, हर व्यक्ति को 25 साल की उम्र के बाद कुछ जांचें जरूरी करवानी चाहिए. जैसे Lipoprotein(a), HS-CRP (सूजन टेस्ट), ApoB, HbA1c, Fasting Insulin, Vitamin D, Homocysteine, TMT (अगर लक्षण दिखाई दें) और Coronary Calcium Score (35 साल के बाद), ये टेस्ट असली खतरे को समय रहते पकड़ सकते हैं.

Published at : 10 Dec 2025 07:06 AM (IST)

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ड्राई या इची हो रही स्किन तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना डैमेज हो जाएगी आपकी किडनी

ड्राई या इची हो रही स्किन तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना डैमेज हो जाएगी आपकी किडनी


Chronic Kidney Disease Symptoms: हमारी किडनी शरीर को स्वस्थ रखने में बड़ी भूमिका निभाती है, खून को फिल्टर करने से लेकर मिनरल और फ्लूइड बैलेंस बनाए रखने तकय लेकिन जब किडनी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है, तो शरीर में बढ़ते टॉक्सिन कई बार सबसे पहले त्वचा पर दिखाई देते हैं. इन संकेतों को समय रहते पहचान लेना बहुत जरूरी है. ब्लड और यूरिन टेस्ट किडनी रोग की पहचान का मुख्य तरीका हैं, लेकिन त्वचा पर बदलाव क्रॉनिक किडनी डिजीज के बढ़ते स्टेज में दिखाई देते हैं. अपनी स्किन और बाकी लक्षणों पर नजर रखना बीमारी की रफ्तार धीमी करने में मदद कर सकता है. चलिए आपको इन लक्षणों के बारे में बताते हैं. 

 त्वचा का बहुत ज्यादा सूखा होना 

बहुत रूखी, खुरदरी त्वचा किडनी के कमजोर होने का एक आम संकेत है.  TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, CKD वाले करीब 72 प्रतिशत लोगों में जेरोसिस पाया गया है. किडनी हमारे पसीने और ऑयल ग्लैंड को नियंत्रित करने में मदद करती है, इसलिए इनके कमजोर पड़ने पर त्वचा सूखने लगती है।

सूखी त्वचा में दरारें पड़ सकती हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है. रिसर्च बताती है कि कई बार त्वचा का अत्यधिक सूखना पीलापन, खुजली या अन्य लक्षणों से पहले दिखाई देता है. इससे राहत पाने के लिए रोजाना हल्के मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल करें, गर्म पानी से लंबे समय तक नहाने से बचें और कॉटन जैसे सांस लेने वाले कपड़े पहनें. अगर सूखापन लगातार बना रहे, तो डॉक्टर से किडनी की जांच कराएं. 

 लगातार खुजली होना

किडनी समस्या में लगातार तेज खुजली बहुत आम है. शरीर में यूरिया जैसे अपशिष्ट बढ़ने पर त्वचा के नर्व्स प्रभावित होते हैं, जिससे खुजली बढ़ती है. करीब 56 प्रतिशत CKD मरीज इस समस्या का सामना करते हैं और यह अक्सर फॉस्फोरस और पीटीएच लेवल बढ़ने से जुड़ी होती है. लगातार खुजलाने से त्वचा पर निशान, घाव या मोटे पैच बन सकते हैं. कुछ लोगों में खुजली इतनी बढ़ जाती है कि नींद और डेली रूटीन पर असर पड़ने लगता है. इलाज के लिए डॉक्टर अक्सर टॉपिकल क्रीम, UVB थेरेपी या ओटमील बाथ की सलाह देते हैं, लेकिन किडनी समस्या को कंट्रोल करना सबसे जरूरी है.

 त्वचा पर दाने या रैशेज

किडनी के ज्यादा खराब होने पर त्वचा पर रैशेज या छोटे-छोटे उठे हुए दाने दिख सकते हैं. जब खून में कचरा बढ़ जाता है, तो त्वचा पर छोटे, खुजली वाले बम्प्स बनते हैं, जो बाद में खुरदरे पैच का रूप ले सकते हैं. इसमें रैश, बैंगनी धब्बे या अल्सर भी बन सकते हैं, जो खासकर पैरों पर दिखाई देते हैं. एक गंभीर स्थिति कैल्सिफिलैक्सिस भी किडनी फेल्योर से जुड़ी है, जिसमें त्वचा कड़ी और अल्सर जैसी हो जाती है. लगभग 43 प्रतिशत CKD मरीज त्वचा के फंगल या बैक्टीरियल इंफेक्शन से भी जूझते हैं. माइल्ड, फ्रेगरेंस-फ्री साबुन का इस्तेमाल और त्वचा को रगड़ने की बजाय हल्के हाथों से पोंछना जलन-दर्द कम कर सकता है. अगर रैश बढ़े, दर्द हो या पस आने लगे तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं.

इसे भी पढ़ें: Male Infertility: पुरुषों में तेजी से बढ़ रही इनफर्टिलिटी, देश में 40% मामलों में मर्द खुद जिम्मेदार

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आज ही खाना छोड़ दें ये 6 फूड, वरना आपकी बॉडी में घर बना लेगी डायबिटीज

आज ही खाना छोड़ दें ये 6 फूड, वरना आपकी बॉडी में घर बना लेगी डायबिटीज


Foods That Cause Diabetes: डायबिटीज सिर्फ मीठा खाने से नहीं होती, यह आपकी रोजमर्रा की खान-पान की आदतों से भी गहराई से जुड़ी है.  कई ऐसे फूड हैं, जिन्हें हम या तो कम आंके लेते हैं या नॉर्मल मानकर रोज खा लेते हैं, लेकिन लंबे समय में यही चीजें ब्लड शुगर को अंनकंट्रोल कर सकती हैं.  चलिए आपको ऐसे फूड के बारे में बताते हैं, अगर आप इनको बेवजह या ज्यादा खाने से टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है.

डीप-फ्राइड स्नैक्स

सामोसा, पकौड़ा, चिप्स ये सब हमारे रोजमर्रा के पसंदीदा स्नैक्स हैं, लेकिन लगातार तलकर बनाई गई चीजें अनहेल्दी फैट से भरी होती हैं. यह फैट धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर वजन बढ़ाता है. वजन बढ़ेगा तो इंसुलिन रेजिस्टेंस भी बढ़ेगा और यही टाइप-2 डायबिटीज की बड़ी वजह है. फास्ट फूड में इस्तेमाल होने वाला तेल कई बार बार-बार गर्म किया जाता है, जिससे उसमें ट्रांस फैट बनता है, जो ब्लड शुगर को और तेजी से बिगाड़ता है.

ग्रेनोला और हेल्दी सीरियल्स

ग्रेनोला और कई तरह के नाश्ते के सीरियल्स हेल्दी टैग के साथ बेचे जाते हैं, लेकिन इनमें छिपी शुगर की मात्रा आपको चौंका सकती है. बहुत से ग्रेनोला बार, ओट बार और सीरियल्स में एडेड शुगर इतनी होती है कि एक छोटी सर्विंग भी ब्लड शुगर को तुरंत ऊपर ले जाती है. बार-बार शुगर स्पाइक्स शरीर को इंसुलिन पर ज्यादा निर्भर बना देते हैं और यह आदत लंबे समय में डायबिटीज़ का खतरा बढ़ाती है.

प्रोसेस्ड मीट

सॉसेज, बेकन, सलामी जैसे प्रोसेस्ड मीट में सोडियम और नाइट्रेट्स काफी ज्यादा होते हैं. ये तत्व न सिर्फ हार्ट के लिए खराब हैं, बल्कि रिसर्च के मुताबिक इनका डायबिटीज से भी सीधा संबंध है. प्रोसेस्ड मीट शरीर में सूजन बढ़ाता है और मेटाबॉलिज़्म को धीमा करता है, जिसकी वजह से ब्लड शुगर नियंत्रित रखना मुश्किल होने लगता है.

सोडा और मीठे ड्रिंक्स

कोल्ड ड्रिंक्स और पैक्ड सोडा में शुगर की मात्रा बहुत अधिक होती है. एक कैन सोडा में जितनी चीनी होती है, वह कई दिनों के नेचुरल शुगर सेवन से ज्यादा होती है. ऐसे ड्रिंक्स तुरंत ब्लड ग्लूकोज बढ़ाते हैं और पैनक्रियाज़ पर लगातार दबाव डालते हैं. हर बार मीठा पेय पीने पर शरीर को अतिरिक्त इंसुलिन बनाना पड़ता है, जिससे समय के साथ इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता जाता है.

सफेद ब्रेड और मैदा वाली चीजें

मैदा से बनी चीजें, जैसे व्हाइट ब्रेड, बन, कुकीज़, नान बहुत जल्दी ग्लूकोज़ में टूट जाती हैं. मैदा में फाइबर नहीं होता, इस वजह से यह ब्लड शुगर को तुरंत बढ़ाती है. बार-बार हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स फूड खाने से शरीर को ब्लड शुगर संतुलित रखने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. यह आदत धीरे-धीरे डायबिटीज का जोखिम बढ़ा देती है.

सफेद चावल

सफेद चावल भारतीय भोजन का एक अहम हिस्सा है, लेकिन यह पूरी तरह रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट है. इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी काफी ज्यादा है, यानी यह खाने के साथ ही ग्लूकोज बनकर सीधे ब्लड शुगर बढ़ाता है रोज़ाना बड़ी मात्रा में सफेद चावल खाने से वजन बढ़ता है और शुगर कंट्रोल बिगड़ता है जिससे टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा और बड़ा हो जाता है.

इसे भी पढ़ें- Digital Drug Promotion: एंटीबायोटिक्स और प्रिस्किप्शन वाली दवाओं के प्रचार पर क्यों लग रही रोक, इससे आम लोगों को कितना खतरा?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बीमार होने पर भर-भरकर इलेक्ट्रॉल तो नहीं पीने लगते हैं आप, जानिए ओवरडोज कितनी खतरनाक?

बीमार होने पर भर-भरकर इलेक्ट्रॉल तो नहीं पीने लगते हैं आप, जानिए ओवरडोज कितनी खतरनाक?


Electrolyte Supplements Risks: जब आप बीमार पड़ते हैं, खासतौर पर उल्टी-दस्त, बुखार या लगातार पसीना आने पर, तो अक्सर लोग जल्दी ठीक होने के चक्कर में इलेक्ट्रॉल या इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक ज्यादा मात्रा में पीने लगते हैं. जबकि शरीर आमतौर पर अपने इलेक्ट्रोलाइट्स को आपके रोजमर्रा के खाने-पीने से ही संतुलित रख लेता है. लेकिन अगर आप बहुत पसीना बहा रहे हों या बार-बार उल्टी, दस्त हो रहे हों तो शरीर से सोडियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी मिनरल तेजी से बाहर निकल जाते हैं और डिहाइड्रेशन होने लगता है.  ऐसे में इलेक्ट्रॉल या स्पोर्ट्स ड्रिंक फायदेमंद होते हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा नहीं. चलिए आपको बताते हैं कि अगर आप इसका ज्यादा यूज करते हैं, तो इसका नुकसान क्या हो सकता है. 

क्या होता है नुकसान?

सबसे पहले आपको यह समझने की जरूरत है कि लेक्ट्रोलाइट्स शरीर के फ्लूइड लेवल को बैलेंस रखते हैं और मांसपेशियों, नसों और अंगों को सही तरह काम करने में मदद करते हैं. लेकिन ओवरडोज होने पर यही मिनरल्स उल्टा असंतुलन पैदा कर देते हैं. brgeneral की रिपोर्ट के अनुसार, इसका असर कमजोरी, सिरदर्द, कंपकंपी, कन्फ्यूजन, मांसपेशियों में खिंचाव, तेज धड़कन, मतली और पेट खराब जैसे लक्षणों में दिखाई दे सकता है.शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का अत्यधिक बढ़ जाना हाइपरनैट्रेमिया या हाइपरकैलिमिया जैसी स्थितिय पैदा कर सकता है, जिनसे नसों और हार्ट की काम करने के तरीकों पर असर पड़ता है. ऐसी ओवरलोड स्थिति में दिल की धड़कन अनियमित हो सकती है, ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे शरीर का फ्लूइड बैलेंस बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है.  इलेक्ट्रोलाइट पाउडर बेचने वाले कई ब्रांड एक पैकेट को तय मात्रा में पानी में घोलकर पीने की सलाह देते हैं. कुछ लोग इसे रोजाना इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कंपनियां भी यह मानती हैं कि बार-बार सेवन को लेकर डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है.

आपको क्या करना चाहिए?

अगर आपका इलेक्ट्रोलाइट लॉस बहुत ज्यादा नहीं है, जैसे भारी पसीना, एक्सरसाइज या स्टमक इंफेक्शन न हो तो इलेक्ट्रॉल बार-बार पीना ओवरडोज ही माना जाएगा. ऐसी स्थिति में पानी सबसे बेहतर है. वर्कआउट के लिए, विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि  शुरू करने से 45 से 60 मिनट पहले 8 से 16 औंस पानी, एक्सरसाइज के दौरान हर 15 से 20 मिनट में 5 से 9 औंस पानी और अगर 30 मिनट से ज्यादा की एक्टिविटी हो, तभी इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक लें, वो भी शुगर लेवल देखकर.  इलेक्ट्रॉल जरूरी है, लेकिन सिर्फ उतना जितना शरीर को जरूरत हो.  ज्यादा मात्रा में यह भी नुकसान कर सकता है. 

इसे भी पढ़ें: Prem Chopra: कितनी खतरनाक बीमारी है सीवियर ऑर्टिक स्टेनोसिस, जिससे जूझ रहे प्रेम चोपड़ा?

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एंटीबायोटिक्स और प्रिस्किप्शन वाली दवाओं के प्रचार पर रोक क्यों, इससे लोगों को कितना खतरा?

एंटीबायोटिक्स और प्रिस्किप्शन वाली दवाओं के प्रचार पर रोक क्यों, इससे लोगों को कितना खतरा?


Antimicrobial Resistance India: भारत के टॉप दवा नियामक के तहत गठित एक एक्सपर्ट कमेटी ने प्रिस्क्रिप्शन-ओनली और हाई-रिस्क दवाओं के विज्ञापनों को रोकने के लिए मौजूदा नियमों में बदलाव की सिफारिश की है. पिछले महीने हुई एक बैठक में, सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) की ड्रग कंसल्टेटिव कमेटी ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दवाओं के बढ़ते और ज्यादातर बिना नियंत्रण वाले प्रमोशन पर गंभीर चिंता जताई थी.  इन दवाओं में लाइफ-सेविंग इंजेक्टेबल्स, एंटीबायोटिक्स, हार्मोनल थेरेपी, साइकोट्रोपिक मेडिसिन, कैंसर का इलाज और नारकोटिक्स शामिल हैं.

किन दवाओं पर मंजूरी के बिना रोक?

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान ड्रग-लाइसेंस शर्तें पहले से ही शेड्यूल H, H1 और X में सूचीबद्ध दवाओं के विज्ञापन पर केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना रोक लगाती हैं. एक CDSCO अधिकारी ने बताया ने बताया कि यह नियम दवा बेचने या वितरित करने वाले लाइसेंसधारकों को स्पष्ट रूप से कवर नहीं करता और इसी कमी का मार्केटर्स फायदा उठा रहे हैं.

सोशल मीडिया पर बढ़ा रहीं विज्ञापन

मामला ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म्स पर और ज्यादा गंभीर हुआ है. राज्य के नियामकों ने बार-बार शिकायत की है कि कई प्लेटफॉर्म प्रिस्क्रिप्शन-ओनली दवाओं का तेजी प्रचार कर रहे हैं, वो भी भारी छूट के साथ, ताकि ग्राहकों को लुभाया जा सके. अधिकारियों के मुताबिक, सोशल मीडिया चैनल्स पर भी ऐसी प्रमोशन तेजी से बढ़ी हैं, जिससे एंटीबायोटिक के दुरुपयोग और खुद से दवा लेने जैसी समस्याएं और बिगड़ रही हैं, जो पहले से ही गंभीर पब्लिक-हेल्थ चुनौती हैं.

अब बिना मांगे ऐसे प्रमोशनल मैसेज भेज रहे हैं

हाल में नई GLP-1 वेट-लॉस दवाओं जैसे मौंजारो और वेगोवी के प्रमोशनल टेक्स्ट मैसेज की शिकायतें सामने आई हैं, जबकि ये दवाएं सिर्फ स्पेशलिस्ट डॉक्टर की प्रिस्क्रिप्शन पर ही दी जानी चाहिए.

 CDSCO की मंजूरी अनिवार्य 

एंटीबायोटिक के बढ़ते दुरुपयोग पर काबू पाने के लिए CDSCO हर नए एंटीबायोटिक यहां तक कि जिनकी सक्रिय सामग्री पहले से स्वीकृत है, इसको भारत में लॉन्च करने से पहले अपनी मंजूरी अनिवार्य करने पर विचार कर रहा है. यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस को लेकर देश और दुनिया दोनों जगह चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं. एक्सपर्ट पैनल ने यह भी सुझाव दिया है कि सभी एंटीमाइक्रोबियल दवाओं को न्यू ड्रग की परिभाषा में लाया जाए, जैसा कि न्यू ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल्स रूल्स, 2019 में है. इसका मतलब है कि हर एंटीबायोटिक, चाहे पहले कभी स्वीकृत ही क्यों न हो उनको निर्माण और मार्केटिंग से पहले CDSCO की मंजूरी लेनी पड़ सकती है.

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पुरुषों में तेजी से बढ़ रही इनफर्टिलिटी, देश में 40% मामलों में मर्द खुद जिम्मेदार

पुरुषों में तेजी से बढ़ रही इनफर्टिलिटी, देश में 40% मामलों में मर्द खुद जिम्मेदार


Reasons For Male Infertility: पिछले कुछ सालों में पुरुषों में इनफर्टिलिटी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और इसका सीधा असर परिवार शुरू करने की सोच  रहे युवा कपल्स पर दिख रहा है.  लोग यह मानते हैं कि कि बांझपन बस महिलाओं की समस्या है, लेकिन देश में होने वाले कुल इनफर्टिलिटी मामलों में लगभग 40 प्रतिशत जिम्मेदारी पुरुषों की पाई जा रही है. इसके साथ ही महिलाओं से जुड़े कारण भी 40 प्रतिशत के आसपास हैं, जबकि 10 प्रतिशत ऐसे मामलें देखने को मिलें हैं, जिनमें समस्या दोनों पक्षों में है और बाकी 10 प्रतिशत पूरी तरह अनएक्सप्लेंड रहती है. 

पुरुषों में क्यों बढ़ रही है इनफर्टिलिटी?

पुरुष इनफर्टिलिटी का सबसे बड़ा कारण घटता हुआ स्पर्म काउंट, उसकी मो‍टिलिटी और मॉर्फोलॉजी है.  2022 की एक वर्ल्ड मेटा-एनालिसिस में पाया गया है कि 1973 से 2018 के बीच पुरुषों के औसत स्पर्म कंसंट्रेशन में 51.6 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज हुई है.  वर्ल्ड हेल्श ऑर्गेनाइजेशन ने भी अपने पैमाने को  बदलते हुए अब 15 मिलियन स्पर्म(मिलीलीटर) को नॉर्मल सीमा की निचली हद माना है, जबकि पहले यह सीमा 40 मिलियन (मिलीलीटर) के आसपास मानी जाती थी.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

एक्सपर्ट बताते हैं कि आज सिर्फ स्पर्म काउंट नहीं, बल्कि उसकी क्वालिटी भी बड़ी चुनौती बन चुकी है. उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों में भी ‘बायोलॉजिकल क्लॉक’ असर दिखाता है, जिससे स्पर्म डीएनए की क्वालिटी गिरती है और भविष्य के बच्चे पर भी स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं. देर से बाप बनना, तनाव, अनरेगुलर लाइफस्टाइल, स्मोकिंग, अल्कोहल, खराब खान-पान और लंबे कार्य-घंटे स्पर्म को भारी नुकसान पहुंचाते हैं.

स्टडी में क्या निकला?

इसके अलावा हाल के स्टडी में पाया गया है कि एयर पॉल्यूशन, माइक्रोप्लास्टिक्स, नैनोप्लास्टिक्स और केमिकल एक्सपोजर मेल रिप्रोडक्टिव सिस्टम क्षमता पर गंभीर असर डाल रहे हैं. बीपीए, फ्थैलेट्स और कई पेस्टिसाइड्स जैसे केमिकल हॉर्मोन के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ते हैं और टेस्टोस्टेरोन कम कर देते हैं, जिससे स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित होता है. PM2.5, हेवी मेटल्स और धूम्रपान में मौजूद फ्री रेडिकल्स स्पर्म डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं. एम्स से जुड़े एक स्टडी में पुरुषों के बीच ऐजूस्पर्मिया (सैंपल में स्पर्म ही न होना) और ओएटीएस सिंड्रोम  जैसे स्पर्म की संख्या, मोबिलिटी या आकार का सामान्य से कम होना, पुरुष इंफर्टिलिटी के सबसे सामान्य कारण पाए गए हैं.

कब जांच करवानी चाहिए?

 एक्सपर्ट कपल्स को सलाह देते हैं कि अगर एक साल तक प्रयास करने के बाद भी गर्भधारण नहीं हो पा रहा है, तो पुरुषों को भी तुरंत जांच करानी चाहिएय सही आकलन के लिए 2 से 3 दिन के अंतर पर तीन अलग-अलग सीमन रिपोर्ट जरूरी मानी जाती हैं। सामान्य रिपोर्ट में 2 एमएल से अधिक वॉल्यूम, 20 मिलियन एमएल से अधिक काउंट, 50 प्रतिशत से अधिक मोटिलिटी और 30 प्रतिशत से अधिक नॉर्मल फॉर्म्स को मानक माना जाता है.

क्या है इलाज?

 रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट में ब्लॉकेज जैसी समस्याएं सर्जरी से ठीक की जा सकती हैं. कई मामलों में IUI या ICSI जैसी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी से सिर्फ एक स्पर्म के सहारे भी बाप बनना संभव है.

इसे भी पढ़ें- क्या सच में एग योक से होता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट्स ने बताया इस मिथक के पीछे का बड़ा सच

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