हर 811 नागरिक के लिए केवल एक डॉक्टर! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दिया जवाब, बताया संकट दूर करन

हर 811 नागरिक के लिए केवल एक डॉक्टर! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दिया जवाब, बताया संकट दूर करन



How Many Doctors Per Person In India: बीमारियों और मरीजों की संख्या पूरी दुनिया में तेजी के साथ बढ़ रही है. कुछ समय पहले एक रिपोर्ट आई थी कि पहले जो एंटीबायोटिक दवा आसानी से काम करती थी, अब उसने भी अपना असर कम कर दिया है. ऐसे में मरीजों की बढ़ती संख्या को रोकने के लिए पर्याप्त डॉक्टरों की जरूरत होती है. लेकिन सरकार द्वारा जारी नए आंकड़ों ने देश में डॉक्टरों की भारी कमी एक बार फिर सामने ला दी है.

मंगलवार को संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, भारत में 811 लोगों पर सिर्फ एक डॉक्टर उपलब्ध है. राज्यसभा में पूछे गए सवाल का लिखित जवाब देते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने बताया कि देश में 13,88,185 एलोपैथिक डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं, जबकि 7,51,768 AYUSH सिस्टम के डॉक्टर पंजीकृत हैं. 

क्या कहा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने?

उन्होंने कहा कि यदि माना जाए कि एलोपैथिक और आयुष दोनों तरह के 80 प्रतिशत डॉक्टर ही सक्रिय रूप से उपलब्ध हैं, तो देश में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:811 बैठता है.

नड्डा ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ है. 2014 की तुलना में आज मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 818 हो गई है. एमबीबीएस सीटें 51,348 से बढ़कर 1,28,875 और पीजी सीटें 31,185 से बढ़कर 82,059 पहुंच चुकी हैं. 

डॉक्टरों की उपलब्धता के लिए जरूरी कदम

स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि सरकार ने ग्रामीण, पिछड़े और जनजातीय इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं. केंद्रीय योजना के तहत जिला अस्पतालों से जुड़े 157 नए मेडिकल कॉलेजों में से 137 पहले से ही शुरू हो चुके हैं. इसके अलावा, फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम को एमबीबीएस कोर्स का हिस्सा बनाया गया है.

इसके तहत मेडिकल कॉलेज गांवों को गोद लेते हैं और एमबीबीएस छात्र इन गांवों में रहने वाले परिवारों की नियमित निगरानी करते हैं. इससे टीकाकरण, पोषण, पीरियड्स के लिए जरूरी कदम, आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंट, स्वस्थ जीवनशैली, मलेरिया, डेंगू नियंत्रण और दवा के नियमों का पालन जैसे मामलों में लगातार फॉलो-अप किया जाता है.नड्डा ने बताया कि इससे लोगों तक सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी भी आसानी से पहुंच पाती है.

पीजी छात्रों की तैनाती

NMC के जिला रेजीडेंसी कार्यक्रम के तहत मेडिकल कॉलेजों के दूसरे और तीसरे वर्ष के पीजी छात्रों की तैनाती जिला अस्पतालों में की जा रही है. ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाले एक्सपर्ट डॉक्टरों के लिए हार्ड-एरिया भत्ता और सरकारी आवास जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं.

मंत्री ने यह भी बताया कि NMC के नए नियम, विदेशी डॉक्टरों को भारत में अस्थायी रजिस्ट्रेशन और विशेष परिस्थितियों में जैसे ट्रेनिंग, रिसर्च, फेलोशिप, वॉलंटरी सेवा या सुपर-स्पेशियलिटी कार्यक्रम के लिए काम करने की अनुमति देता है. 

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सर्दियों में ही क्यों फटती हैं एड़ियां, क्या है इस दिक्कत से निपटने का तरीका?

सर्दियों में ही क्यों फटती हैं एड़ियां, क्या है इस दिक्कत से निपटने का तरीका?


ठंडी हवा जैसे-जैसे नमी खींचती है, पैरों की मोटी त्वचा और तेजी से डिहाइड्रेट होती है. एड़ियों की स्किन वैसे भी थोड़ी कठोर होती है, इसलिए सूखते ही तुरंत फटने लगती है. खुली चप्पल पहनना, लंबे समय तक खड़े रहना, बढ़ती उम्र या मोटापा ये सब समस्या को और बढ़ा देते हैं.

फटी एड़ियों के शुरुआती लक्षणों में रूखी और सख्त त्वचा, हल्की परतें उतरना, पतली या गहरी दरारें और चलने पर दर्द शामिल है. कई बार जगह-जगह लालपन या हल्का खून तक दिखाई देने लगता है.

फटी एड़ियों के शुरुआती लक्षणों में रूखी और सख्त त्वचा, हल्की परतें उतरना, पतली या गहरी दरारें और चलने पर दर्द शामिल है. कई बार जगह-जगह लालपन या हल्का खून तक दिखाई देने लगता है.

इस मौसम में मॉइस्चराइजिंग सबसे जरूरी कदम है. मोटे और गाढ़े फुट-क्रीम जैसे यूरिया, ग्लिसरीन, शिया बटर या पेट्रोलियम जेली वाली क्रीम एड़ियों को नरम रखने में बेहद मदद करती हैं. नहाने के तुरंत बाद क्रीम लगाने से नमी देर तक टिकती है.

इस मौसम में मॉइस्चराइजिंग सबसे जरूरी कदम है. मोटे और गाढ़े फुट-क्रीम जैसे यूरिया, ग्लिसरीन, शिया बटर या पेट्रोलियम जेली वाली क्रीम एड़ियों को नरम रखने में बेहद मदद करती हैं. नहाने के तुरंत बाद क्रीम लगाने से नमी देर तक टिकती है.

पैरों को हल्के गर्म पानी में भिगोने से त्वचा नरम होती है और एक्सफोलिएट करना आसान हो जाता है. करीब दस- पंद्रह मिनट भिगोने के बाद प्यूमिक स्टोन से धीरे-धीरे डेड त्वचा हटाई जा सकती है. ज्यादा रगड़ना ठीक नहीं, इससे दरारें और बढ़ सकती हैं.

पैरों को हल्के गर्म पानी में भिगोने से त्वचा नरम होती है और एक्सफोलिएट करना आसान हो जाता है. करीब दस- पंद्रह मिनट भिगोने के बाद प्यूमिक स्टोन से धीरे-धीरे डेड त्वचा हटाई जा सकती है. ज्यादा रगड़ना ठीक नहीं, इससे दरारें और बढ़ सकती हैं.

हील बाम साधारण क्रीम से ज्यादा असरदार होते हैं. ये दरारों को जल्दी भरने में मदद करते हैं और रात भर त्वचा को गहराई से पोषण देते हैं. सोने से पहले हील बाम लगाने से सुबह एड़ियां देखने में बेहतर लगती हैं.

हील बाम साधारण क्रीम से ज्यादा असरदार होते हैं. ये दरारों को जल्दी भरने में मदद करते हैं और रात भर त्वचा को गहराई से पोषण देते हैं. सोने से पहले हील बाम लगाने से सुबह एड़ियां देखने में बेहतर लगती हैं.

क्रीम लगाने के बाद सूती मोजे पहनना भी काफी फायदेमंद है. इससे नमी बंद रहती है, धूल नहीं चिपकती और एड़ियों पर घर्षण भी कम होता है. इस छोटे से उपाय से असर काफी तेजी से दिखता है.

क्रीम लगाने के बाद सूती मोजे पहनना भी काफी फायदेमंद है. इससे नमी बंद रहती है, धूल नहीं चिपकती और एड़ियों पर घर्षण भी कम होता है. इस छोटे से उपाय से असर काफी तेजी से दिखता है.

फुटवियर भी बड़ी भूमिका निभाता है. सर्दियों में बंद और सांस लेने वाले जूते पहनना एड़ियों को ठंडी, सूखी हवा से बचाता है. बहुत पतले या सख्त तलवे वाले जूते एड़ियों पर दबाव बढ़ाकर समस्या को और खराब कर देते हैं.

फुटवियर भी बड़ी भूमिका निभाता है. सर्दियों में बंद और सांस लेने वाले जूते पहनना एड़ियों को ठंडी, सूखी हवा से बचाता है. बहुत पतले या सख्त तलवे वाले जूते एड़ियों पर दबाव बढ़ाकर समस्या को और खराब कर देते हैं.

अगर एड़ियां बहुत गहरी फट चुकी हैं, चलने में दर्द होता है या हल्का इंफेक्शन दिख रहा है, तो घरेलू तरीकों से आराम नहीं मिलेगा. ऐसी स्थिति में स्किन एक्सपर्ट या फुट-केयर एक्सपर्ट से सही इलाज लेना जरूरी होता है.

अगर एड़ियां बहुत गहरी फट चुकी हैं, चलने में दर्द होता है या हल्का इंफेक्शन दिख रहा है, तो घरेलू तरीकों से आराम नहीं मिलेगा. ऐसी स्थिति में स्किन एक्सपर्ट या फुट-केयर एक्सपर्ट से सही इलाज लेना जरूरी होता है.

Published at : 03 Dec 2025 11:04 AM (IST)

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सिर्फ खराब खाने से ही तबाह नहीं होता लिवर, गलत बर्तन भी इस अंग के लिए बेहद खतरनाक

सिर्फ खराब खाने से ही तबाह नहीं होता लिवर, गलत बर्तन भी इस अंग के लिए बेहद खतरनाक



जब भी हम लिवर हेल्थ की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमारे दिमाग में तला-भुना खाना, ज्यादा ऑयली डाइट, शराब, या दवाइयों का जरूरत से ज्यादा खाना आता है. इन चीजों का लिवर पर सीधा असर होता है. लेकिन आपकी डेली लाइफ की कुछ छोटी-छोटी आदतें भी आपके लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं. कई बार हम अनजाने में ऐसी चीजों का रोजाना यूज करते हैं जो धीरे-धीरे हमारे लिवर पर बुरा असर डालती हैं और इनमें से कुछ चीजें तो हमारे किचन में ही मौजूद होती हैं. लिवर का काम शरीर में जमा जहर को बाहर निकालना है, लेकिन जब यह जहर बहुत ज्यादा हो जाए, तो लिवर पर बोझ बढ़ता जाता है और इसके कारण लिवर कमजोर होने लगता है. 

लिवर के लिए खाने से ज्यादा खतरनाक हैं ये बर्तन

1. नॉन-स्टिक बर्तन – नॉन-स्टिक बर्तन आजकल बहुत आम हो गए हैं क्योंकि इनमें खाना कम तेल में पक जाता है और चिपकता भी नहीं है.लेकिन इनकी यह सुविधा आपकी सेहत पर भारी पड़ सकती है. जब नॉन-स्टिक बर्तन बहुत ज्यादा गर्म हो जाते हैं या उनमें खरोंच आ जाती है, तो ये PFOA और PTFE जैसे केमिकल छोड़ते हैं. ये केमिकल धीरे-धीरे शरीर में जमा होते हैं और लिवर पर बुरा असर डालते हैं. रिसर्च के मुताबिक, लंबे समय तक इनका यूज फैटी लिवर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है. ऐसे में इनकी जगह कास्ट आयरन पैन या स्टेनलेस स्टील के बर्तन एक बेहतर और सेहतमंद ऑप्शन हैं. 

2. प्लास्टिक कंटेनर – बहुत से लोग प्लास्टिक के डिब्बों में खाना स्टोर करते हैं या माइक्रोवेव में गरम करते हैं. ये आदत आपको सुविधा देती है, लेकिन आपकी लिवर हेल्थ के लिए खतरनाक हो सकती है. प्लास्टिक जब गर्म किया जाता है, तो उसमें से BPA और Phthalates जैसे केमिकल निकल सकते हैं. ये हार्मोन को प्रभावित करते हैं और शरीर के डिटॉक्स सिस्टम यानी लिवर पर असर डालते हैं. लंबे समय तक इनका संपर्क लिवर के काम को धीमा कर सकता है. ऐसे में लिवर को हेल्दी रखने के लिए और खाने को स्टोर करने के लिए कांच या स्टील के डिब्बों का यूज करें. माइक्रोवेव में खाना गरम करना हो तो microwave-safe लेबल वाले बर्तनों का ही यूज करें. 

3. एल्युमीनियम के बर्तन – एल्युमीनियम के बर्तन लगभग हर भारतीय घर में पाए जाते हैं क्योंकि ये सस्ते, हल्के और जल्दी गर्म हो जाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब आप टमाटर, इमली, नींबू जैसी अम्लीय चीजें एल्युमीनियम बर्तनों में पकाते हैं, तो उनमें से एल्युमीनियम के माइक्रोस्कोप पार्टीक्लस खाने में घुल सकते हैं. शरीर में ज्यादा मात्रा में एल्युमीनियम जमा हो जाए तो यह लिवर पर बुरा असर डाल सकता है. इससे लिवर की सफाई करने की क्षमता कमजोर हो सकती है और समय के साथ-साथ लिवर फेल होने जैसी गंभीर स्थिति भी आ सकती है. इसके अलावा, एल्युमीनियम न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी बढ़ा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या डायपर पहनाने से खराब हो जाती है बच्चों की किडनी, जानें इस बात में कितनी हकीकत?

क्या डायपर पहनाने से खराब हो जाती है बच्चों की किडनी, जानें इस बात में कितनी हकीकत?



जब भी किसी घर में बच्चे का जन्म होता है तो उस नवजात बच्चे के लिए शॉपिंग की लिस्ट में डायपर जरूर होता है. आज के समय में छोटे बच्चों को डायपर पहनाना हर पेरेंट्स के लिए जरूरी हो गया है, खासकर तब जब घर में कामकाज ज्यादा हो या यात्रा के दौरान डायपर की जरूरत होती है. लेकिन इसी के साथ एक डर भी पेरेंट्स के बीच बढ़ा है. क्या सच में लंबे समय तक डायपर पहनाने से बच्चे की किडनी पर बुरा असर पड़ता है? ये सवाल और उससे जुड़ी गलत जानकारी सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रही है, जिसे सुनकर या पढ़कर हर माता-पिता परेशान हैं कि इस दावे की सच्चाई आखिर क्या है.

क्या सच में डायपर से बच्चे की किडनी खराब होती है?

हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हो रहे इस दावे में बताया गया है कि डायपर बच्चों को पहनाने से बच्चे की किडनी पर गलत असर पड़ता है. यह दावा बिल्कुल झूठा है. डॉक्टर्स के मुताबिक, जो किडनी होती है वो हमारे शरीर के काफी अंदर होती है, जिसके आगे मसल्स की पूरी एक लेयर होती है. अगर डायपर या कोई भी कपड़ा जब हम बच्चे को पहनाते हैं तो वो किसी भी हालत में किडनी तक नहीं पहुंच सकता. इसलिए यह दावा बिल्कुल बेबुनियाद है.

कैसे हो सकती है किडनी खराब?

डायपर रैश: लंबे समय तक गीला डायपर रहने से बच्चे की त्वचा लाल, जलनदार और त्वचा को नुकसान हो सकता है. लेकिन यह त्वचा की समस्या है, किडनी की नहीं.

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI): पेशाब के रास्ते में बैक्टीरिया के कारण होने वाला संक्रमण है, जिसमें सबसे आम रूप से मूत्राशय प्रभावित होता है. यह पूरी तरह बैक्टीरिया आधारित इंफेक्शन है और बच्चों में उम्र के अनुसार इसके लक्षण भी बदलते हैं.

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डायपर का सही इस्तेमाल कैसे करें ताकि कोई नुकसान न हो?

  • हर 3–4 घंटे में डायपर बदलें.
  • बच्चा बहुत छोटा है तो हर 2 घंटे में बदलना बेहतर है.
  • रात में सुपर-एब्जॉर्बेंट डायपर, दिन में कपड़े का नैपी.
  • इससे लगातार त्वचा को हवा मिलती रहती है.
  • हर बार डायपर पहनाने से पहले त्वचा को सूखने दें.
  • गीलापन किसी भी समस्या की सबसे बड़ी जड़ है.
  • डायपर रैश क्रीम या नारियल तेल का उपयोग.
  • यह बच्चे की त्वचा की सुरक्षा परत बनाता है.

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भारत में HIV केस रिकॉर्ड स्तर पर, 72% केस युवाओं में! एक्सपर्ट बोले- जागरूकता कैंपेन बेहद जरूरी

भारत में HIV केस रिकॉर्ड स्तर पर, 72% केस युवाओं में! एक्सपर्ट बोले- जागरूकता कैंपेन बेहद जरूरी



विश्व एड्स दिवस पर HIV/AIDS को लेकर एक बार फिर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है. देश में बदलती जीवनशैली, सुरक्षित यौन संबंधों की अनदेखी और सेक्स एजुकेशन की कमी के कारण संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर टेस्टिंग, सही जानकारी और जिम्मेदार व्यवहार अपनाकर इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है.

एक्सपर्ट ने दी यह जानकारी

भारत मे HIV/AIDS के बढ़ते संक्रमण को लेकर देश के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. विनोद रैना (MD मेडिसिन) ने गंभीर चिंता जताई है. 25 साल से HIV के उपचार में अनुभव रखने वाले डॉ. रैना ने एबीपी लाइव की टीम को जानकारी देते हुए बताया कि विश्व के कई देशों ने समय रहते जागरूकता और कम्युनिटी हेल्थ प्रोग्राम्स की मदद से इस बीमारी को काफी हद तक रोक लिया, लेकिन भारत आज भी आवश्यक जागरूकता, शिक्षा और रोकथाम के अभाव में तेजी से संक्रमित होता जा रहा है. चेतावनी भरे लहजे में उन्होंने कहा कि, अगर अभी भी समाज और सरकार सक्रिय नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.

यूरोप-अमेरिका ने जागरूकता से रोका, भारत अब भी पिछड़ रहा

70–80 के दशक में यूरोप और अमेरिका में अनप्रोटेक्टेड सेक्स से HIV तेजी से फैला, लेकिन समय रहते उन देशों ने मजबूत हेल्थ प्रोग्राम शुरू किए. डॉ. रैना बताते हैं कि कम्युनिटी मेडिसिन को बढ़ावा देने और सेक्सुअल हेल्थ पर खुले संवाद ने उन देशों में संक्रमण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके उलट भारत में सोशल नेटवर्क और बदलती जीवनशैली के कारण युवा वर्ग बिना प्रोटेक्शन के संबंध बना रहा है. गांव से शहर आने वाले या नई सेक्सुअल लाइफ शुरू करने वाले युवाओं में जानकारी की कमी के कारण संक्रमण तेजी से फैल रहा है.

सेक्स एजुकेशन की कमी सबसे बड़ी कमजोरी’

डॉ. रैना का कहना है कि देश में आज भी सेक्स को एक टैबू की तरह देखा जाता है. बच्चों, युवाओं, हेल्थ वर्कर्स, यहां तक कि डॉक्टरों तक को सेक्सुअल हेल्थ की पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं मिलती. उनके मुताबिक, “जब लोग प्रोटेक्शन ही इस्तेमाल नहीं करते, इन्फेक्शन का अंदाज़ा नहीं होता और सेक्सुअल हाइजीन की समझ नहीं होती, तो बीमारी फैलना तय है. आज हालत यह है कि 25 साल पहले महीने में गिने-चुने मरीज आते थे, और अब एक दिन में 15–20 HIV केस देखने पड़ते हैं.”

पोस्ट-एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस: गलती के बाद भी बचाव मुमकिन

डॉ. रैना ने एक अहम जानकारी देते हुए कहा कि, यदि कोई व्यक्ति असुरक्षित संबंध बना ले और अगली सुबह उसे अपनी गलती का एहसास हो, तो 72 घंटों के अंदर डॉक्टर से संपर्क कर वह पोस्ट एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस (PEP) नाम की दवा शुरू कर सकता है 30 दिन तक यह दवा लेने पर HIV संक्रमण को रोका जा सकता है. लेकिन समस्या यह है कि देश में ज्यादातर लोग इस दवा के बारे में जानते ही नहीं, क्योंकि न तो उपयोगी प्रोग्राम हैं और न ही सही जानकारी.

कंडोम: छोटी सतर्कता, बड़ी सुरक्षा

डॉ. रैना के अनुसार कंडोम केवल HIV ही नहीं बल्कि सिफिलिस, गोनोरिया, हर्पीज़, क्लेमाइडिया जैसी गंभीर बीमारियों से भी बचाता है. इसलिए हर व्यक्ति को सुरक्षित संबंध बनाना चाहिए और मल्टीपल पार्टनर्स से बचना चाहिए.

शादी से पहले HIV टेस्ट को अनिवार्य करने की अपील

डॉ. रैना बताते हैं कि उनके पास खूब ऐसे केस आते हैं जिसमें शादी के बाद पति या पत्नी को HIV हो जाता है और जांच में पता चलता है कि बीमारी शादी से पहले ही किसी एक को थी. वे कहते हैं, “लोग शादी के पहले कुंडली मिलाते हैं, लेकिन महज 400-500 रुपये का एक टेस्ट है, क्या शादी से पहले इसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता? इससे न केवल घर बचेंगे बल्कि ज़िंदगियाँ भी.”

HIV एक बार हुआ तो पूरी जिंदगी रहता है साथ

वे चेतावनी देते हैं कि HIV एक ऐसी बीमारी है जिसे शरीर से पूरी तरह निकालने का कोई तरीका नहीं है. एक बार संक्रमित होने पर व्यक्ति को जीवनभर दवाइयां, नियमित चेकअप, और विशेष डाइट एवं जिंदगीभर की सावधानियों के साथ जीना पड़ता है. दैनिक कसरत, हाई प्रोटीन डाइट और जीवनशैली में अनुशासन जरूरी हो जाता है.

युवाओं और होमोसेक्सुअल कम्युनिटी में तेज़ी से फैल रहा संक्रमण

डॉ. रैना के अनुसार कॉलेज जाने वाले युवाओं और होमोसेक्सुअल समुदाय में HIV संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े हैं, जिनमें 72% तक अधिक प्रभाव देखा जा रहा है. वे कहते हैं कि बच्चों को गुड टच-बैड टच, सुरक्षित संबंध, और शरीर की समझ के बारे में शिक्षित किए बिना समाज को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता.

भारत में खुले संवाद की कमी

कई देशों में HIV जागरूकता के लिए रैलियां, परेड और सार्वजनिक कार्यक्रम होते हैं, लेकिन भारत में यह विषय अभी भी छिपाया जाता है. डॉ. रैना का मानना है कि सिर्फ एक दिन की जागरूकता से कुछ नहीं होगा. हेल्थ एजुकेशन में STDs को उतनी ही जगह देनी होगी जितनी रेस्पिरेटरी या कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम को दी जाती है.

WHO गाइडलाइंस पर आधारित आधुनिक इलाज मौजूद

आज तकनीक इतनी बढ़ चुकी है कि अगर माता-पिता दोनों HIV पॉजिटिव हों, लेकिन दवा नियमित रूप से लें, तो भी बच्चा HIV नेगेटिव पैदा हो सकता है. एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी से वायरस को इतना कम किया जा सकता है कि वह दूसरों में संक्रमित न हो.

घर में HIV मरीज हो तो किन बातों का रखें ध्यान?

यदि किसी परिवार में HIV संक्रमित व्यक्ति है और उसकी हालत गंभीर है, तो उनके बर्तन, कपड़े और तौलिए अलग रखें, साबुन आदि अलग रखें. ना उनका झूठा खाना है और ना ही देना है. उन्हें डॉक्टर को दिखा के, एंटी-वायरल थेरेपी शुरू करवाएं. इसके अलावा उन्हें प्रोटीन डाइट देना बहुत ही ज़्यादा जरूरी है.

HIV के लक्षणों को न करें नजरअंदाज

लगातार बीमार रहना, बार-बार टाइफाइड या लूज़मोशन होना, कमजोरी, लगातार थकान, वजन कम होना, तेज़ बुखार—ये HIV के संकेत हो सकते हैं. संक्रमण बढ़ने पर टीबी, सिफिलिस, क्लेमाइडिया, हर्पीज़ या HPV जैसी अन्य बीमारियां भी होने की संभावना रहती है.

समाज जागेगा, तभी देश सुरक्षित होगा

डॉ. रैना कहते हैं, “मैं एक डॉक्टर होकर हाथ जोड़ कर लोगों से विनती करता हूं कि इस मुद्दे को उठाइए. टेस्टिंग को बढ़ावा दीजिए, सेक्स एजुकेशन को पढ़ाइए, सुरक्षित संबंध को आदत बनाइए. आज कदम उठाएंगे, तभी आने वाली पीढियां स्वस्थ रहेंगी.”

इसे भी पढ़ें: Childbirth Lifespan: क्या बच्चे को जन्म देकर घट जाती है मां की उम्र? रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मोटापे के खिलाफ WHO ने दी GLP-1 हार्मोन-आधारित दवा को इजाजत, जानें कैसे काम करेगी यह मेडिसिन?

मोटापे के खिलाफ WHO ने दी GLP-1 हार्मोन-आधारित दवा को इजाजत, जानें कैसे काम करेगी यह मेडिसिन?



How GLP-1 Medicines Help Reduce Weight: मोटापे का मामला तेजी से बढ़ रहा है, इससे तमाम तरह की बीमारियां हो रही हैं. इसीलिए दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे मोटापे की समस्या से निपटने के लिए WHO ने एक बड़ा कदम उठाया है. WHO ने पहली बार साफ कहा है कि नई पीढ़ी की वजन कम करने वाली दवाएं GLP-1 थैरेपीमोटापा कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. इन दवाओं में ओजेम्पिक और मौन्जारो जैसे मशहूर ब्रांड शामिल हैं, जो हाल के वर्षों में बेहद लोकप्रिय हुए हैं.

WHO के मुताबिक मोटापा अब सिर्फ एक लाइफस्टाइल इश्यू नहीं, बल्कि एक क्रॉनिक और री-लैप्सिंग बीमारी है, जिसे लंबे समय तक इलाज और देखभाल की जरूरत होती है. इसलिए संस्था ने सलाह दी है कि वयस्कों में मोटापे के इलाज के लिए GLP-1 दवाओं को लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर विचार किया जाना चाहिए. हालांकि इससे गर्भवती महिलाओं को बाहर रखा गया है.

मोटापे का खतरनाक स्तर

2022 में मोटापे या बढ़े हुए वजन से जुड़ी बीमारियों के कारण 37 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई. यह संख्या मलेरिया, टीबी और HIV की कुल मौतों से भी अधिक है. WHO का अनुमान है कि अगर स्थिति नहीं बदली तो 2030 तक दुनिया में मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या दोगुनी हो जाएगी. WHO प्रमुख डॉ. टेड्रोस अधानोम का कहना है कि “मोटापा एक वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती है. दवाएं अकेले इस संकट को खत्म नहीं कर सकतीं, लेकिन GLP-1 थैरेपी लाखों लोगों को मोटापा कम करने और उससे जुड़े खतरों को घटाने में मदद कर सकती है.” हालांकि WHO ने यह भी कहा कि अभी भी इन दवाओं के लंबे समय के प्रभाव और सुरक्षा पर और डेटा की जरूरत है.

 

जादुई इलाज नहीं, लेकिन अहम हथियार

 WHO का कहना है कि GLP-1 दवाओं को सिर्फ दवा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें कई चीजों के साथ जोड़ना चाहिए जिनमें-

  • बेहतर खानपान
  • नियमित शारीरिक एक्सरसाइज
  • व्यवहार में बदलाव

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

रायपुर स्थित शहीद अस्पताल में  एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. शैलेश जेना कहते हैं कि WHO की यह नई गाइडलाइन सही दिशा में उठाया गया कदम है. उनके अनुसार “GLP-1 दवाओं ने मोटापे के इलाज में उम्मीद से कहीं बेहतर नतीजे दिए हैं. ये दवाएं भूख को नियंत्रित करती हैं, मेटाबॉलिज्म बेहतर करती हैं और इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाती हैं. ऐसे में जिन मरीजों पर डाइट और वर्कआउट का असर सीमित रहता है, उनके लिए यह एक बड़ी सहायता साबित हो सकती हैं.” डॉ. शैलेश जेना के मुताबिक मोटापा एक साधारण वजन बढ़ने की समस्या नहीं, बल्कि शरीर में होने वाला मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है, जिसे लंबी अवधि की मैनेजमेंट की जरूरत होती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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