क्या मछली के स्पर्म से बना इंजेक्शन बढ़ाता है खूबसूरती? ब्यूटी मार्केट का यह ट्रेंड कर देगा हैर

क्या मछली के स्पर्म से बना इंजेक्शन बढ़ाता है खूबसूरती? ब्यूटी मार्केट का यह ट्रेंड कर देगा हैर



Skin Regeneration Therapy: लोग खूबसूरत दिखने के लिए नया-नया ट्रेंड ट्राई कर रहे हैं, उन्हीं में से एक है ट्राउट मछली का स्पर्म इंजेक्ट. इसका चलन काफी तेजी के साथ बढ़ा है, खासकर पश्चिमी देशों में. इसमें लोगों को एस्थेटिक क्लिनिक में पतली-सी कैनुला उनके गाल में धीरे से धंसाई जाती है, वह हल्की-सी दर्द भरी आवाज निकालती हैं. इनमें से बहुत से लोगों को ट्राउट स्पर्म अपनी असली अवस्था में नहीं दिया जा रहा. उनके चेहरे के निचले हिस्से में ट्राउट या साल्मन मछली के स्पर्म से निकाले गए छोटे-छोटे डीएनए फ्रैगमेंट डाले जा रहे हैं, जिन्हें ‘पॉली-न्यूक्लियोटाइड्स’ कहा जाता है.

लेकिन आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ती है?

अब आते हैं इस बात पर कि इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है. इससे पहले एक दिलचस्प बात हमारा डीएनए और मछली का डीएनए काफी हद तक एक-दूसरे से मिलता-जुलता है.
इसी वजह से माना जाता है कि एबी का शरीर इसे आसानी से स्वीकार कर लेता है. बदले में उनकी त्वचा के सेल्स सक्रिय हो जाते हैं और ज्यादा कोलेजन व इलास्टिन बनाने लगते हैं. यही दोनों प्रोटीन हमारी त्वचा को मजबूती, कसावट और यंग होने का फील देते हैं. एबी का उद्देश्य है, अपनी त्वचा को रिफ्रेश करना, हेल्दी रखना और कई सालों से परेशान कर रहे मुंहासों के निशानों को हल्का करना.

इसको लेकर क्या कहते हैं एक्सपर्ट

पॉली-न्यूक्लियोटाइड्स को स्किनकेयर की दुनिया में नया चमत्कार बताया जा रहा है. ब्रिटेन समेत कई देशों में यह उपचार तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. कई सेलिब्रिटीज तो खुलेआम अपने साल्मन स्पर्म फेशियल का जिक्र कर चुके हैं. कुछ समय पहले ब्रिटिश पॉप स्टार चार्ली XCX ने भी बताया कि उन्हें लगता है फिलर्स अब पुराने पड़ चुके हैं और वह अब पॉली-न्यूक्लियोटाइड्स पर भरोसा करती हैं कि जिन्हें वह “डीप स्किन विटामिन्स” जैसी चीज बताती हैं.

क्या वाकई यह स्किनकेयर में बदलाव ला रहा है?

डर्मा फोकस नाम की कंपनी में काम करने वाली सुजैन मैन्सफ़ील्ड कहती हैं कि  “हमें लगता है जैसे हम बेंजामिन बटन वाले पल जी रहे हों.” उनका इशारा उस फिल्म की तरफ था जिसमें ब्रैड पिट का किरदार उम्र के साथ उलटी दिशा में बढ़ता है और समय के साथ जवान होता जाता है. हालांकि वैसा चमत्कार तो संभव नहीं, लेकिन मैन्सफील्ड मानती हैं कि पॉली-न्यूक्लियोटाइड्स स्किन रीजनरेशन की नई दिशा खोल रहे हैं. कुछ शुरुआती रिसर्च बताती हैं कि ये इंजेक्शन त्वचा को नया जीवन दे सकते हैं, झुर्रियों, निशानों और फाइन लाइंस को कम कर सकते हैं.

6-9 महीने में बूस्टर जरूरी

सुज़ैन कहती हैं कि यह उपचार उन्हीं तत्वों का उपयोग करता है जिन्हें हमारा शरीर पहले से जानता है कि यही इसकी खासियत है. लेकिन इसकी कीमत भी कम नहीं. एक सीजन की लागत 200 से 500 पाउंड तक होती है और तीन सत्रों की सलाह दी जाती है. इसके बाद हर 6 से 9 महीने में एक बूस्टर.

साइड इफेक्ट्स 

कुछ रिसर्च इसे सुरक्षित बताते हैं, लेकिन कई एक्सपर्ट इसकी तेज लोकप्रियता को लेकर सतर्क हैं, उन्हें लगता है कि हाइप इसके विज्ञान से आगे निकल रही है. ऑस्ट्रेलियाई स्किन एक्सपर्ट डॉ. जॉन पाग्लियारी कहते हैं कि  “हम जानते हैं कि न्यूक्लियोटाइड्स शरीर के लिए जरूरी हैं, लेकिन क्या साल्मन डीएनए के छोटे टुकड़े इंजेक्ट करना वाकई हमारे अपने डीएनए जैसा असर देगा? हमारे पास पर्याप्त डेटा ही नहीं है.”

इसे भी पढ़ें- Childbirth Lifespan: क्या बच्चे को जन्म देकर घट जाती है मां की उम्र? रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या बच्चे को जन्म देकर घट जाती है मां की उम्र? रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

क्या बच्चे को जन्म देकर घट जाती है मां की उम्र? रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा



How Childbirth Affects Women’s Long-Term Health: क्या आने कभी कहीं ऐसा पढ़ा या सुना है कि बच्चे को जन्म देने के बाद मां की उम्र कम हो जाती है, शायद हो सकता है. हालांकि हम में से काफी लोग इसके बारे में नहीं जानते हैं. रिकॉर्ड बताते हैं कि कई बार एक-एक बच्चे को जन्म देने पर महिलाओं की उम्र करीब छह महीने तक घट सकती है.  खासकर वे महिलाएं जो कठिन या खराब हालात में जिंदगी गुजार रही हों, उनमें इसका असर और भी ज्यादा देखा गया है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं कि इस बात में कितनी सच्चाई है. 

क्या निकला रिसर्च में?

मानव विकास पर काम कर रहे शोधकर्ताओं ने 1866 से 1868 के बीच आए ग्रेट फिनलैंड अकाल के दौरान वहां की 4,684 महिलाओं के रिकॉर्ड का अध्ययन किया. नीदरलैंड्स की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रोनिंगन के शोधकर्ता डॉक्टर युआन यांग बताते हैं कि यह “यूरोप के हालिया इतिहास के सबसे भयावह अकालों में से एक” था. डॉ. यांग, प्रोफेसर हन्ना डगडेल, प्रोफेसर विर्पी लूमा और डॉक्टर एरिक पोस्टमा की टीम ने पाया कि अकाल के उन वर्षों में हर बार बच्चे के जन्म पर महिलाओं की अनुमानित उम्र लगभग छह महीने कम होती चली गई. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट  का मानना है कि ऐसे मुश्किल हालात में महिलाएं अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा गर्भधारण और बच्चे को जन्म देने में लगा देती थीं, जिसकी वजह से उनके शरीर की सेल्स को उतनी मजबूती नहीं मिल पाती थी. इससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता था.  दिलचस्प बात यह है कि अकाल से पहले या बाद में बच्चे पैदा करने वाली महिलाओं में उम्र पर ऐसा असर नहीं दिखाय  डॉ. यांग कहते हैं, “यह बदलाव हमें सिर्फ उन्हीं महिलाओं में दिखा, जो अकाल आने के समय प्रजनन वाली उम्र में थीं.” उनके अनुसार यह साफ संकेत देता है कि बच्चे पैदा करने वाले वर्षों में वातावरण महिला की सेहत पर गहरा असर डालता है. 

क्या मां बनने का असर उम्र पर पड़ता है?

एक वजह यह हो सकती है कि कठिन परिस्थितियों में बच्चे पैदा करने का दबाव महिलाओं की लंबी-अवधि वाली सेहत को ज्यादा प्रभावित करता है. यह पहले से जाना हुआ तथ्य है कि माताओं में दिल की बीमारियों और मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, जिसका संबंध वजन बढ़ने और शारीरिक तनाव से है.

बच्चों की संख्या और उम्र की ‘तुलना’

इस रिसर्च में देखा गया कि ज्यादा बच्चों वाली महिलाओं में यह प्रभाव और स्पष्ट था. हालांकि हर महिला एक-जैसी प्रभावित नहीं हुई. शोधकर्ताओं के मुताबिक यह स्थिति तब ज्यादा दिखती है जब महिलाएं लगातार कई बच्चों को जन्म दे रही हों या हालात बेहद कठिन हों, जैसे अकाल.  अब सवाल यह है कि क्या दो सौ साल पहले की महिलाओं पर आधारित निष्कर्ष आज की महिलाओं पर लागू हो सकते हैं?

डॉ. यांग का कहना है कि इन परिणामों को उस दौर के हिसाब से समझना होगा. 2023 में औसतन एक महिला दो से थोड़े अधिक बच्चों को जन्म दे रही थी. यह बदलाव शिक्षा, नौकरी के अवसर, गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता और बच्चों की मौत की कम दर के कारण आया. डॉ. यांग का कहना है कि इस विषय पर और रिसर्च की जरूरत है, लेकिन यह परिणाम बताते हैं कि दुनिया के कुछ इलाकों में ये बातें आज भी लागू हो सकती हैं.

इसे भी पढ़ें: Patient Rights in Hospital: अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीज के ये होते हैं अधिकार, जान लें अपने काम की बात

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दियों में फटाफट कम हो जाएगा वजन, ये देसी नुस्खे आजमाएं तो तुरंत मिलेगा फायदा

सर्दियों में फटाफट कम हो जाएगा वजन, ये देसी नुस्खे आजमाएं तो तुरंत मिलेगा फायदा



सर्दियां आते ही हमारी लाइफस्टाइल काफी बदल जाती है. मौसम ठंडा होता है, शरीर सुस्त पड़ जाता है और ज्यादातर समय रजाई-कंबल में बिताने का मन करता है.ऐसे में लोग गर्म-गर्म और टेस्टी चीजें जैसे परांठे, हलवा, पकौड़े, समोसे, चाय-कुकीज और तली-भुनी चीजें ज्यादा खाने लगते हैं. कम एक्टिविटी और ज्यादा कैलोरी वाला खाना मिलकर वजन को तेजी से बढ़ा देता है.

बहुत से लोग इस मौसम में वजन बढ़ने की वजह से परेशान रहते हैं और बाद में इसे कम करना मुश्किल लगने लगता है. लेकिन अच्छी बात यह है कि सर्दियों में जिस तरह वजन बढ़ना आसान है, उसी तरह वजन कम करना भी आसान हो जाता है. ऐसे में सही खान-पान, थोड़ी सी सावधानी और कुछ देसी घरेलू नुस्खों की जरूरत है. अगर आप ठंड के मौसम में अपनी डाइट में कुछ खास चीजें शामिल कर लें, तो पेट की चर्बी और बढ़ते वजन को आसानी से काबू में किया जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि कौन से देसी नुस्खे आजमाएं, जिससे सर्दियों में फटाफट वजन कम हो जाएगा और तुरंत फायदा मिलेगा. 

सर्दियों में वजन क्यों बढ़ता है?

ठंड के कारण शरीर आलसी हो जाता है और लोग कम चल-फिरते हैं. ज्यादातर समय रजाई में बिताने से कैलोरी बर्न बहुत कम होती है. रात में भारी खाना, तला-भुना और अधिक तेल-घी का सेवन वजन बढ़ाता है. सर्दियों में चाय-कुकीज और मीठा ज्यादा खाया जाता है, जिससे फैट जमने लगता है. लेकिन ठंड में शरीर खुद को गर्म रखने के लिए ज्यादा एनर्जी खर्च करता है. इसका मतलब आपकी बॉडी नैचुरली कैलोरी ज्यादा बर्न करती है.अगर इस समय सही खान-पान और घरेलू नुस्खे अपनाए जाएं, तो वजन बहुत जल्दी घटने लगता है. 

वजन कम करने के आसान और देसी नुस्खे

1. सुबह धूप जरूर लें: सुबह 10 से 15 मिनट धूप लेने से विटामिन D मिलता है, जिससे मेटाबॉलिज्म अच्छा रहता है. शरीर की एनर्जी बढ़ती है और वजन घटाने में मदद मिलती है. 

2. खाली पेट गुनगुना पानी पिएं: गर्म पानी शरीर में जमा टॉक्सिन निकालता है और पाचन को सही रखता है. रोज सुबह 1 से 2 गिलास गुनगुना पानी वजन घटाने में मददगार होता है. 

3. डाइट में फल, सब्जियां और दालें शामिल करें: फाइबर से भरपूर चीजें खाने से पेट देर तक भरा रहता है और ओवरईटिंग नहीं होती है. गेहूं, दाल, सलाद, सूप सर्दियों में वजन घटाने के लिए बहुत असरदार हैं. 

4. ग्रीन टी: तेजी से वजन घटाने वाले के लिए दिन में 2 से 3  बार ग्रीन टी पिएं. ग्रीन टी में मौजूद कैटेचिन फैट को जल्दी तोड़ते हैं और मेटाबॉलिज्म बढ़ाते हैं. 

5. एलोवेरा जूस: वजन कम करने के लिए सुबह खाली पेट आधा कप एलोवेरा जूस पिएं.  एलोवेरा जूस मेटाबॉलिक रेट बढ़ाता है और पाचन प्रक्रिया को सुधारता है. इससे फैट तेजी से बर्न होता है. 

6. शहद और नींबू:  तेजी से वजन घटाने वाले के लिए एक गिलास गर्म पानी में आधा नींबू और 1 से 2 चम्मच शहद मिलाकर दिन में 2 से 3 बार पिएं. नींबू का विटामिन C फैट ऑक्सीडेशन तेज करता है और शहद शरीर की चर्बी कम करने में मदद करता है. 

7. काली मिर्च: काली मिर्च में पाइपरिन नाम का तत्व होता है, जो फैट को कम करने में मदद करता है. वजन घटाने वाले के लिए अपने खाने में रोज एक चुटकी काली मिर्च डालें. 

8. सेब का सिरका:  वजन कम करने के लिए 1 गिलास पानी में 1 चम्मच सेब का सिरका मिलाकर सुबह पिएं. इसमें मौजूद एसिटिक एसिड सूजन कम करता है और फैट बर्निंग बढ़ाता है. 

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किन तरीकों से रख सकते हैं अपने दिल को सुरक्षित? आप भी जान लें ये बेहद काम के टिप्स

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सर्दियों में नहीं होगी इम्युनिटी कम होने की प्रॉब्लम, घर में ऐसे बनाएं आयुर्वेदिक काढ़ा

सर्दियों में नहीं होगी इम्युनिटी कम होने की प्रॉब्लम, घर में ऐसे बनाएं आयुर्वेदिक काढ़ा



Winter Health Tips: सर्दियों के शुरू होते ही कई लोगों को ठंड से होने वाली बीमारियां शुरू हो जाती हैं, जैसे खांसी, जुकाम, गले की बीमारी आदि. तापमान कम होते ही इसका असर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता या इम्युनिटी पर पड़ता है, जिससे हमें कई और बीमारियां होने का खतरा बना रहता है. और एक बात यह भी है कि लोग सर्दियों में ज़रा सी तबीयत खराब होने पर, जैसे खांसी, जुकाम, गले में बलगम जमना आदि, सीधे डॉक्टरों के पास दवाइयों के लिए भागते हैं, जो कि गलत है. ज्यादा दवाइयों का सेवन करना हमारी सेहत के लिए हानिकारक होता है. अगर आपको नॉर्मल सर्दियों वाली बीमारी है तो आप आयुर्वेदिक काढ़े का सेवन कर सकते हैं, जो आपकी इम्युनिटी बढ़ाने और शरीर को तंदुरुस्त तथा बीमारियों से मुक्त करने में मदद करता है.

आयुर्वेदिक काढ़ा कैसे बनाएं?

आयुर्वेदिक काढ़े का सेवन हमारे भारत में प्राचीन समय से बीमारियों को खत्म करने के लिए किया जा रहा है, जिसे आप अपने घर में भी आसानी से बना सकते हैं. घर में ही आयुर्वेदिक काढ़ा बनाने के लिए हमारी रसोई में आसानी से मौजूद चीजें जैसे हल्दी, दालचीनी, तुलसी के कुछ पत्ते, लौंग और काली मिर्च जैसी रोजमर्रा की मसालों की जरूरत पड़ेगी. इसे बनाने के लिए एक बर्तन में जितना आपको काढ़ा बनाना है उतना पानी डालें. आसान तरीके से समझने के लिए बर्तन में 2-3 गिलास पानी डालकर उसे उबालें. फिर 3-4 तुलसी के पत्ते डालें और आधी कटी हुई अदरक को भी उबलते पानी में डालें. फिर दो-तीन लौंग, थोड़ी दालचीनी और चुटकी भर हल्दी डालकर धीमी आंच पर उबालें. इसे तब तक पकाएं जब तक बर्तन में पानी आधा न रह जाए. तैयार हुए काढ़े को छानकर थोड़ा गुड़ या शहद मिलाकर गर्म-गर्म पिएं, जिससे आपकी इम्युनिटी मजबूत रहेगी. आयुर्वेदिक काढ़े में उपयोग होने वाली सभी चीजें हमारी रसोई में ही मिल जाती हैं.

आयुर्वेद के अनुसार सर्दियों के मौसम में काढ़ा पीने से हमारी पाचन शक्ति भी मजबूत होती है, जिससे हमारा खाना पेट में आसानी से पच जाता है. इसके सेवन से ठंड से होने वाली बीमारियां छूमंतर हो जाती हैं, जैसे काढ़े के सेवन से गले में जमा कफ और बलगम खत्म हो जाता है. सर्दियों में शरीर में होने वाला जोड़ों का दर्द भी काफी कम होता है. और काढ़े को सिर्फ बड़े और वृद्ध लोग ही नहीं, बच्चे भी पी सकते हैं, क्योंकि ठंड में सबसे ज्यादा बीमार बच्चे ही होते हैं. उनकी इम्युनिटी बढ़ाने के लिए माता-पिता को उन्हें काढ़ा जरूर पिलाना चाहिए.

आयुर्वेदिक काढ़ा बनाने की सामग्री

  • 8–10 तुलसी की पत्तियां
  • 1 टुकड़ा आधी पीसी हुई अदरक
  •  4–5 काली मिर्च (हल्की कुचली हुई)
  •  5–6 लौंग
  • 1 छोटा टुकड़ा दालचीनी
  • 1/4 चम्मच हल्दी
  • 2 गिलास पानी
  • 2–3 चम्मच शहद

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एड्स के मामलों में सबसे आगे है ये राज्य, HIV के केस भी बढ़े, एलर्ट पर सरकार, जानें क्या कहा?

एड्स के मामलों में सबसे आगे है ये राज्य, HIV के केस भी बढ़े, एलर्ट पर सरकार, जानें क्या कहा?



HIV cases rise in Andhra Pradesh: देश भर में आईटी कर्मचारियों में एचआईवी के मामले दर्ज होने पर आंध्र प्रदेश राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सत्यकुमार यादव ने चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि विलासितापूर्ण जीवन और नशीली दवाओं के उपयोग जैसे कारणों से यह प्रवृत्ति नई लग रही है. राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के अवलोकन में, आईटी क्षेत्र के लोगों में एचआईवी का प्रसार बढ़ रहा है, यह हाल ही में पाया गया. मंत्री ने इस मामले में राज्य एड्स नियंत्रण संगठन को भी सतर्क रहने का आदेश दिया. 

नशीली दवाओं से युवा रहे दूर- स्वास्थ्य मंत्री 

मंत्री ने युवाओं से नशीली दवाओं से दूर रहने का आग्रह किया. उन्होंने ‘सुरक्षित’ यौन प्रथाओं को अपनाने का सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि माता-पिता को बच्चों को सुरक्षित यौन संबंध और एड्स की गंभीरता के बारे में जागरूक करना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी को भी एड्स रोगियों के प्रति भेदभाव नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि एचआईवी छात्रों के मामले में ज्यादा सावधान रहना चाहिए. विजयवाड़ा के तुम्मलपल्ली कलाक्षेत्र में ‘विश्व एड्स दिवस- 2025’ कार्यक्रम आयोजित किया गया.

मुख्य अतिथि के रूप में आए मंत्री श्री सत्यकुमार ने कहा कि सरकार के संज्ञान में आया है कि डॉक्टर एचआईवी रोगियों में बीमार लोगों के लिए आवश्यक सर्जरी करने से इनकार कर रहे हैं. मंत्री ने कहा कि अगर एचआईवी रोगियों को जिलों में लोकपाल के रूप में नियुक्त डीएम एंड एचओ से शिकायत की जाती है तो पीड़ितों को न्याय मिलेगा. उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाओं को सरकार के ध्यान में भी लाया जा सकता है. 

मंत्री ने कहा कि एचआईवी रोगियों को हर महीने दवा (एआरटी) के लिए दूर-दराज के अस्पतालों में जाने में कुछ समस्याएं हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के अनुरोधों के मुताबिक, पश्चिम गोदावरी और नेल्लोर जिलों में चुनिंदा पीएचसी में एआरटी दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं. उन्होंने कहा कि सरकार पीड़ितों से प्राप्त अनुरोधों के मुताबिक अन्य स्थानों पर भी ऐसी सुविधा प्रदान करने के लिए तैयार है.

2030 तक एड्स मुक्त राज्य बनाने का प्रयास 

मंत्री सत्यकुमार ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें 2030 तक एड्स मुक्त देश और राज्य बनाने का प्रयास कर रही हैं. इस क्रम में, उन्होंने कहा कि वर्तमान में आंध्र प्रदेश एचआईवी के नए मामलों को नियंत्रित करने में पहले स्थान पर है. आगे कहा कि 2015-16 में जांच किए गए लोगों में 2.34% पॉजिटिविटी दर्ज की गई, जबकि 2024-25 तक यह 0.58% तक घट गई. उन्होंने कहा कि 2024-25 में 13,383 नए मामले सामने आए. उन्होंने कहा कि जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजन और लोगों में बदलाव के कारण मामले कम हो रहे हैं.

दवाओं के उपयोग से मौतों की संख्या भी कम हुई है. उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें हर साल एचआईवी रोगियों को 30,000 रुपये से 40,000 रुपये मूल्य की दवाएं प्रदान कर रही हैं. मंत्री ने एड्स रोग नियंत्रण संगठन के अधिकारियों और कर्मचारियों को बधाई दी, जो 2030 तक नए मामलों को रोकने के लक्ष्य के साथ काम कर रहे हैं.

उन्होंने टिप्पणी की कि एड्स पर शुरुआती डर अब मौजूद नहीं है. उन्होंने कहा कि इस लापरवाही से काम नहीं चलेगा कि एड्स होने से जान नहीं जा रही है. मंत्री सत्यकुमार ने खुलासा किया कि वर्तमान में 42,000 एचआईवी रोगियों को सरकार से पेंशन मिल रही है. उन्होंने कहा कि 95,000 नए आवेदन सरकार के विचाराधीन हैं. उन्होंने घोषणा की कि इनमें से योग्य लोगों को जल्द ही पेंशन स्वीकृत करने के लिए कदम उठाए जाएंगे.

सतर्क करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए

राज्य एड्स नियंत्रण संगठन के परियोजना निदेशक नीलकंठारेड्डी ने कहा कि समाज को सतर्क करने के लिए एड्स जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. उन्होंने युवाओं से सही रास्ते पर चलने का आग्रह किया. इस कार्यक्रम में विधायक गद्दे राममोहन राव, माध्यमिक स्वास्थ्य निदेशक चक्रधर बाबू, एनटीआर जिला कलेक्टर लक्ष्मीशा और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया. छात्रों ने एचआईवी के प्रति सावधान रहने और पीड़ितों के प्रति भेदभाव नहीं करने के बारे में ‘स्किट’ प्रस्तुत किए, जिसने दर्शकों का मनोरंजन किया. मंत्री सत्यकुमार ने एड्स मामलों को नियंत्रित करने के लिए काम करने वालों में से कई को सम्मानित किया.

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