क्या आप भी NEAT पीते हैं शराब, जानें कौन-कौन से बॉडी पार्ट्स तेजी से होते हैं खराब?

क्या आप भी NEAT पीते हैं शराब, जानें कौन-कौन से बॉडी पार्ट्स तेजी से होते हैं खराब?


अगर आप शराब पीते हैं, वो भी बिना पानी, सोडा या किसी मिक्सर के, यानी नीट, तो सावधान हो जाइए. नीट ड्रिंक का मतलब है शराब को सीधे गिलास में डालकर पीना, बिना किसी डाइल्यूशन के. ऐसा करने से शराब का असर शरीर पर ज्यादा तेज और गहरा पड़ता है. कई लोग इसे स्टाइल या टेस्ट के लिए पीते हैं, लेकिन ये आपके कई बॉडी पार्ट्स को तेजी से खराब कर सकता है. आइए जानते हैं, कौन-कौन से अंग ज्यादा प्रभावित होते हैं.

 लिवर 

लिवर शरीर का सबसे बड़ा डिटॉक्स सेंटर है, जो शराब में मौजूद टॉक्सिन को फिल्टर करता है. जब आप नीट शराब पीते हैं, तो इसमें अल्कोहल का लेवल बहुत ज्यादा होता है, जिससे लिवर पर सीधा दबाव पड़ता है. लंबे समय तक और ज्यादा मात्रा में पीने से फैटी लिवर, लिवर सिरोसिस और लिवर फेलियर का खतरा बढ़ जाता है.

पाचन सिस्टम पर प्रभाव

नीट शराब का स्ट्रॉन्ग असर पेट की लाइनिंग को नुकसान पहुंचाता है. इससे एसिडिटी, अल्सर और गैस्ट्रिक ब्लीडिंग हो सकती है. लंबे समय तक स्ट्रॉन्ग शराब पीने से पेट के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है.

हार्ट

ज्यादा अल्कोहल दिल की धड़कन को अनियमित कर सकता है और ब्लड प्रेशर को तेजी से बढ़ा सकता है. नीट शराब हार्ट की मांसपेशियों को कमजोर कर सकती है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है.

ब्रेन

अल्कोहल का सीधा असर दिमाग के न्यूरॉन्स पर पड़ता है. नीट शराब ब्रेन सेल्स को जल्दी डैमेज कर देती है, जिससे याददाश्त कमजोर होना, बैलेंस बिगड़ना और लंबे समय में डिमेंशिया जैसी बीमारियां हो सकती हैं.

 किडनी 

शराब शरीर से पानी खींच लेती है, जिससे डिहाइड्रेशन और किडनी पर ज्यादा दबाव पड़ता है. नीट शराब में अल्कोहल ज्यादा होने के कारण किडनी को टॉक्सिन फिल्टर करने में परेशानी होती है, जिससे किडनी फेलियर का खतरा बढ़ सकता है.

स्किन

नीट शराब ब्लड सर्कुलेशन और हाइड्रेशन लेवल को खराब करती है, जिससे त्वचा ड्राई, डल और समय से पहले बूढ़ी दिखने लगती है.

 इम्यून सिस्टम 

ज्यादा स्ट्रॉन्ग शराब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती है, जिससे बार-बार बीमारियां हो सकती हैं.

नीट पीने के खतरे को कैसे कम करें?

  • शराब को पानी, सोडा या जूस के साथ मिक्स करके पिएं.
  • हफ्ते में 1-2 बार से ज्यादा न पिएं.
  • पीने से पहले और बाद में खूब पानी पिएं.
  • खाली पेट कभी शराब न पिएं.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिल्लियों की मदद से होगा अल्जाइमर और डिमेंशिया का इलाज, साइंटिस्ट ने खोजा तगड़ा कनेक्शन

बिल्लियों की मदद से होगा अल्जाइमर और डिमेंशिया का इलाज, साइंटिस्ट ने खोजा तगड़ा कनेक्शन


बिल्लियां पालना काफी लोगों को पसंद होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि अल्जाइमर और डिमेंशिया के मरीजों का इलाज करने के लिए भी अब बिल्लियों की मदद ली जा सकती है. दरअसल, हाल ही में एक स्टडी हुई. इसमें सामने आया कि बिल्लियों में होने वाली डिमेंशिया की बीमारी इंसानों में होने वाले अल्जाइमर रोग से काफी हद तक मिलती-जुलती है. ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि अल्जाइमर और डिमेंशिया के इलाज में बिल्लियां काफी मददगार हो सकती हैं. आइए जानते हैं कि क्या है पूरा मामला? 

डिमेंशिया और अल्जाइमर से बिल्लियों का कनेक्शन

जानकारी के मुताबिक, यह रिसर्च यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के वैज्ञानिकों ने की है. उन्होंने देखा कि जिन बिल्लियों को डिमेंशिया होता है, उनके दिमाग में खास तरह का टॉक्सिक प्रोटीन जमा हो जाता है, जिसे एमिलॉइड-बीटा कहते हैं. यही प्रोटीन इंसानों में अल्जाइमर रोग की मुख्य वजह माना जाता है. यूरोपियन जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस में पब्लिश इस स्टडी में बताया गया कि बिल्लियों और इंसानों की इस बीमारी में कई समानताएं हैं.

बिल्लियों में दिखते हैं ऐसे लक्षण

वैज्ञानिकों ने देखा कि उम्रदराज बिल्लियों में डिमेंशिया होने पर उनके व्यवहार में भी बदलाव आ जाता है. इसकी वजह से वे बार-बार म्याऊं-म्याऊं करती हैं. भ्रम की स्थिति में नजर आती हैं. वहीं, उनकी नींद भी बार-बार टूटती है. ये सारे लक्षण इंसानों में अल्जाइमर रोग से मिलते-जुलते हैं. ऐसे में वैज्ञानिकों को लगता है कि बिल्लियों पर स्टडी करके अल्जाइमर रोग को अच्छी तरह समझा जा सकता है. 

रिसर्च में किया गया यह काम

वैज्ञानिकों ने इस स्टडी के लिए 25 मृत बिल्लियों के दिमाग पर रिसर्च की. इनमें से कुछ बिल्लियां डिमेंशिया से पीड़ित थीं. उन्होंने शक्तिशाली माइक्रोस्कोप की मदद से बिल्लियों के दिमाग की जांच की और पाया कि उम्रदराज और डिमेंशिया से ग्रस्त बिल्लियों के दिमाग में एमिलॉइड-बीटा प्रोटीन का जमाव था. यह जमाव खास तौर पर सिनैप्स में देखा गया. सिनैप्स दिमाग की कोशिकाओं के बीच संदेश भेजने का काम करते हैं, जो हेल्दी माइंड के लिए बेहद जरूरी होते हैं. जब इनमें एमिलॉइड-बीटा जमा हो जाता है तो ये ठीक से काम नहीं कर पाते हैं. इससे याददाश्त और सोचने की क्षमता कम हो जाती है. यही समस्या अल्जाइमर रोग में भी देखी जाती है.

क्या होती है सिनैप्टिक प्रूनिंग?

रिसर्च में एक और रोचक बात सामने आई. वैज्ञानिकों ने देखा कि दिमाग में कुछ खास कोशिकाएं जैसे एस्ट्रोसाइट्स और माइक्रोग्लिया होती हैं. ये कोशिकाएं दिमाग में खराब हो चुके सिनैप्स को खा जाती हैं. इस प्रक्रिया को सिनैप्टिक प्रूनिंग कहते हैं. यह प्रक्रिया दिमाग के विकास के दौरान तो फायदेमंद होती है, क्योंकि यह दिमाग को साफ और व्यवस्थित रखती है. वहीं, डिमेंशिया में यह प्रक्रिया ज्यादा हो जाती है, जिसके कारण जरूरी सिनैप्स भी नष्ट हो जाते हैं. इससे दिमाग की कार्यक्षमता और याददाश्त पर बुरा असर पड़ता है.

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लिवर से लेकर फेफड़े तक होंगे डिटॉक्स, रोज सुबह पिएं ये ड्रिंक्स

लिवर से लेकर फेफड़े तक होंगे डिटॉक्स, रोज सुबह पिएं ये ड्रिंक्स


हमारे शरीर में लिवर, किडनी और फेफड़े जैसे अहम अंग हर दिन लाखों टॉक्सिन्स को बाहर निकालने का काम करते हैं. लेकिन खराब लाइफस्टाइल प्रोसेस्ड फूड और प्रदूषण के कारण इन पर ज्यादा दबाव पड़ता है. अगर दिन की शुरुआत कुछ प्राकृतिक और पॉजिटिव ड्रिंक्स से की जाए तो इन अंगों की सफाई और बेहतर कामकाज में मदद मिल सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताएंगे ऐसी मॉर्निंग ड्रिंक्स जो लिवर से लेकर फेफड़ों तक के लिए फायदेमंद होते हैं.

लीवर और किडनी डिटॉक्स के लिए ड्रिंक्स

नींबू पानी और हल्दी- विटामिन सी से भरपूर नींबू टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करता है. वहीं हल्दी में मौजूद करक्यूमिन लिवर की सफाई और सूजन कम करने में असरदार है. 

जीरा पानी- एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपुर जीरा पानी पाचन सुधरता है और किडनी से एक्स्ट्रा सोडियम व पानी निकालने में मदद करता है. 

आंवला जूस- विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर आंवला जूस लिवर के डिटॉक्स प्रोसेस को तेज करता है और ब्लड प्रेशर व शुगर लेवल को कंट्रोल में रखता है.

नारियल पानी- इलेक्ट्रोलाइट से भरपूर नारियल पानी किडनी की सफाई में मदद करता है और लिवर हेल्थ को सपोर्ट करता है. 

अदरक पुदीना चाय- अदरक टॉक्सिन्स को तोड़ने में मदद करता है. वहीं पुदीना लिवर फंक्शन को बेहतर करता है.

मेथी पानी- मेथी पानी ब्लड शुगर को कंट्रोल करने के साथ लिवर और किडनी से टॉक्सिन्स को बाहर करता है.

तुलसी चाय- तुलसी चाय एक प्राकृतिक डिटॉक्सिफायर होती है जो हमारे शरीर  में इम्यूनिटी को बढ़ाती है.

फेफड़े डिटॉक्स के लिए ड्रिंक्स

अदरक चाय- अदरक वाली चाय शरीर में सूजन को कम करने में मदद करती है. साथ ही यह फेफड़ों से बलगम भी हटाती है और इम्यूनिटी को भी मजबूत करती है. 

हल्दी वाली चाय- हल्दी वाली चाय में पाया जाने वाला करक्यूमिन फेफड़ों के ऊतकों की मरम्मत करता है. साथ ही यह सांस लेने की क्षमता बढ़ाने में भी मदद करता है.

पुदीना चाय- पुदीना चाय में पाया जाने वाला मेंथॉल नाक के रास्ते खौलता है और सांस लेने में रहता देता है.

यूकेलिप्टस चाय- यूकेलिप्टस चाय फेफड़ों से बलगम तोड़ने और बैक्टीरिया से लड़ने में मददगार होती है.

मुलीन चाय- मुलीन चाय बलगम को साफ करती है और ब्रोंकियल सूजन को भी कम करती है.

इन बातों का रखें खास ध्यान 

शरीर में प्राकृतिक डिटॉक्स सिस्टम पहले से मौजूद है लेकिन इन ड्रिंक को रोजमर्रा में शामिल करना उसकी क्षमता को सपोर्ट करता है. साथ ही प्रर्याप्त मात्रा में पानी पीना, संतुलित आहार लेना और प्रदूषण से बचाव करना भी उतना ही जरूरी है जितना यह ड्रिंक.

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कार्डियोग्रिट गोल्ड: आयुर्वेद की हुई जीत, पतंजलि का शोध ‘Journal of Toxicology’ में छाया

कार्डियोग्रिट गोल्ड: आयुर्वेद की हुई जीत, पतंजलि का शोध ‘Journal of Toxicology’ में छाया


पतंजलि ने दावा किया है कि आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान के मेल से बड़े से बड़े रोग का इलाज संभव है. पतंजलि ने बताया है कि कंपनी के वैज्ञानिकों ने एक शोध में पाया कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी की दवा Doxorubicin से होने वाले हृदय रोग (कार्डियोटॉक्सिसिटी) को कार्डियोग्रिट गोल्ड नाम की आयुर्वेदिक दवा से ठीक किया जा सकता है. यह शोध दुनिया के सामने आयुर्वेद की ताकत को और मजबूती से पेश करता है. 

आयुर्वेद की वैज्ञानिकता को साबित करता है यह शोध- आचार्य बालकृष्ण

पतंजलि आयुर्वेद के सीईओ आचार्य बालकृष्ण ने कहा, ”यह शोध न सिर्फ आयुर्वेद की वैज्ञानिकता को साबित करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि अगर प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों को वैज्ञानिक तरीके से परखा जाए तो आधुनिक चिकित्सा की जटिल समस्याओं का हल निकाला जा सकता है. कार्डियोग्रिट गोल्ड में योगेंद्र रस, अर्जुन, मोती पिष्टी, अकीक पिष्टी जैसी जड़ी-बूटियां और भस्म शामिल हैं, जो प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में हृदय रोगों के लिए प्रभावी बताई गई हैं.”

उन्होंने आगे कहा, ”यह शोध पतंजलि के वैज्ञानिकों की मेहनत का नतीजा है और यह आयुर्वेद को फिर से स्थापित करने का एक बड़ा कदम है. जब पूरी दुनिया आयुर्वेद को अपनाने के लिए उत्सुक है, यह शोध लोगों को आयुर्वेद पर भरोसा करने का एक मजबूत कारण देता है. यह परंपरा और विज्ञान के मेल का अनमोल तोहफा है.शोध में C. elegans नाम के एक छोटे जीव पर प्रयोग किए गए.”

Journal of Toxicology में प्रकाशित हुआ शोध

पतंजलि ने दावा किया है, ”परिणामों से पता चला कि कार्डियोग्रिट गोल्ड ने इन जीवों की खाना खाने की क्षमता बढ़ाई, हृदय जैसी मांसपेशियों की स्थिति में सुधार किया और हानिकारक तत्वों (ROS) के स्तर को कम किया. साथ ही इन जीवों की लंबाई और प्रजनन क्षमता में भी बढ़ोतरी हुई. इस दवा ने Doxorubicin के स्तर को भी कम किया, जो साबित करता है कि यह हृदय रोगों को कम करने में कारगर है.यह शोध दुनिया के प्रसिद्ध रिसर्च जर्नल Journal of Toxicology में प्रकाशित हुआ है.”

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हार्ट अटैक आने वाला है या नहीं? ये टेस्ट करा लिए तो पहले ही पता चल जाएंगे ‘दिल’ के राज

हार्ट अटैक आने वाला है या नहीं? ये टेस्ट करा लिए तो पहले ही पता चल जाएंगे ‘दिल’ के राज


आज के समय में दिल से जुड़ी बीमारियां दुनिया भर में सबसे ज्यादा लोगों की जान ले रही हैं. ये बीमारी इतनी आम हो गई है कि हर साल 5 में से 1 मौत इसकी वजह से हो रही है. लेकिन सबसे बड़ी परेशानी ये है कि लोगों को तब तक पता ही नहीं चलता, जब तक कोई बड़ा हादसा जैसे हार्ट अटैक नहीं हो जाता है. अक्सर हम सुनते हैं कि कोई एकदम से गिर पड़ा और उसे हार्ट अटैक आ गया. ये देखकर लगता है कि हार्ट अटैक बिना किसी चेतावनी के आता है, लेकिन असल में ऐसा नहीं है. ये बीमारियां धीरे-धीरे बनती हैं, लेकिन हम इसके संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. हम जब डॉक्टर के पास जाते हैं, तब जाकर पता चलता है कि हमारा ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है या कोलेस्ट्रॉल हाई है. लेकिन ये बीमारियां तो बहुत पहले ही शरीर में फैल चुकी होती हैं.

ये बदलाव अंदर ही अंदर लंबे समय से चल रहे होते हैं. बैठे रहने की आदत, ज्यादा तला-भुना और फास्ट फूड खाना, स्ट्रेस और नींद की कमी, तनाव और नींद की कमी ये सब आदतें हमारे दिल के लिए बहुत ही खतरनाक हैं. ये धीरे-धीरे दिल को कमजोर बना देती हैं. लेकिन थोड़े से लाइफस्टाइल में बदलाव और समय-समय पर कुछ जरूरी टेस्ट करवाने से आप इस खतरे को बहुत पहले पहचान सकते हैं और बड़ी बीमारी से खुद को बचा सकते हैं. तो चलिए जानते हैं ​कि हार्ट अटैक आने वाला है या नहीं कौन सा टेस्ट कराने से दिल के राज पहले ही पता चल जाएंगे.

कौन से टेस्ट करवा कर जान सकते हैं कि हार्ट अटैक आने वाला है या नहीं?

1. कोलेस्ट्रॉल टेस्ट – दिल की सेहत का सबसे बड़ा दुश्मन और खतरा खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL)है .जब यह बढ़ जाता है, तो आर्टीज में जमा होकर ब्लॉकेज बना देता है.  ऐसे में लिपिड प्रोफाइल टेस्ट में LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स की मात्रा देखी जाती है. वहीं Lipoprotein (a) टेस्ट से पता चलता है कि आपकी जेनेटिक हिस्ट्री से आप दिल की बीमारी के लिए कितने रिस्क पर हैं. वहीं ApoB टेस्ट आपके शरीर में मौजूद हर हानिकारक कोलेस्ट्रॉल कण की गिनती करता है. ये टेस्ट करवा लेने से आपको यह पता चल सकता है कि दिल की नली में कोई जहर तो नहीं जमा हो रहा है. 

2. ब्लड शुगर टेस्ट – डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जो हार्ट के लिए सबसे ज्यादा खतरा मानी जाती है. ऐसे में A1C टेस्ट यह बताता है कि पिछले 3 महीनों में आपका ब्लड शुगर कैसा रहा, इसके अलावा फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज टेस्ट यह बताता है कि खाना न खाने पर आपकी शुगर कितनी रहती है क्योंकि ब्लड शुगर लगातार बढ़ा हुआ है, तो यह आपकी धमनियों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है. 

 3. किडनी और मेटाबोलिक हेल्थ टेस्ट  – आपकी किडनी का दिल से गहरा रिश्ता है. ऐसे में अगर किडनी खराब होगी तो दिल पर दबाव पड़ेगा, और यह सीधा हार्ट अटैक का खतरा बन सकता है. ऐसे में क्रिएटिनिन और eGFR टेस्ट बताते हैं कि किडनी कितना सही काम कर रही है. साथ ही सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स का बैलेंस जरूरी है ताकि हार्ट रेट नॉर्मल रहे.

4. हार्मोन और सूजन के टेस्ट – इसमें थायराइड टेस्ट (TSH, T4) से यह पता चलता है कि शरीर का मेटाबॉलिज्म और हार्ट रेट बैलेंस हैं या नहीं. CRP (C-Reactive Protein) शरीर में सूजन का सिग्नल है. दिल की बीमारियों में अक्सर CRP बढ़ जाता है. इसके अलावा विटामिन D की कमी दिल की सेहत पर सीधा असर करती है. ये सभी टेस्ट आपके शरीर के अंदर चल रही दिक्कत  को  बताते हैं, जो आगे चलकर दिल के लिए खतरा बन सकती है.

5. ब्लड टेस्ट – CBC (Complete Blood Count) टेस्ट यह बताता है कि आपके खून में क्या कमी या समस्या है. आयरन और फेरिटिन की जांच से यह पता चलता है कि खून में ऑक्सीजन को ले जाने की क्षमता कितनी हैन में आयरन की कमी है, तो दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और वह जल्दी थक सकता है. यह भी दिल की बीमारियों की शुरुआत हो सकती है.

क्या करना चाहिए?

1. हर 6 महीने या साल में एक बार इन जरूरी टेस्ट करवाएं.

2. हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं जैसे हेल्दी डाइट, वॉक, योग और स्ट्रेस कम करें.

3. धूम्रपान, ज्यादा शराब और जंक फूड से दूरी बनाए रखें. 

4. अगर परिवार में हार्ट डिजीज का इतिहास है, तो अलर्ट हो जाएं.

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ऑर्गन डोनर हो या रिसीवर, महिलाओं को क्यों नहीं मिलती प्राथमिकता? NOTTO की रिपोर्ट खुलासा

ऑर्गन डोनर हो या रिसीवर, महिलाओं को क्यों नहीं मिलती प्राथमिकता? NOTTO की रिपोर्ट खुलासा


Gender Bias Organ Donation: कभी-कभी जिंदगी और मौत के बीच की दूरी बस एक स्वस्थ अंग होती है. ऐसे में ऑर्गन डोनेशन किसी की जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा उपहार है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि, भारत में महिलाओं को चाहे वे डोनर हों या रिसीवर, अक्सर प्राथमिकता नहीं मिल पाती? हाल ही में राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) की एक रिपोर्ट ने इस चौंकाने वाली सच्चाई को सामने लाया है.

बता दे, इस रिपोर्ट ने न सिर्फ आंकड़ों से हैरान किया, बल्कि यह भी बताया कि, महिलाओं के साथ इस प्रक्रिया में किस तरह असमानता होती है. हालांकि ऐसा नहीं होना चाहिए. 

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चौंकाने वाले आंकड़े

  • NOTTO की रिपोर्ट में कहा गया है कि, महिला रोगियों और मृतक दाताओं के रिश्तेदारों को लाभार्थियों के रूप में प्राथमिकता देने की सिफारिश की गई है.
  • अंग प्राप्त करने वालों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में कहीं ज्यादा है.
  • कई मामलों में महिला डोनर्स तो अधिक हैं, लेकिन रिसीवर के तौर पर उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती.
  • सामाजिक, आर्थिक और जागरूकता की कमी इस असमानता का मुख्य कारण है. 

महिलाओं को क्यों नहीं मिलती प्राथमिकता?

  • सामाजिक मानसिकता – कई परिवारों में पुरुष की सेहत को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे महिलाओं के इलाज और अंग प्रत्यारोपण में देरी होती है.
  • आर्थिक कारण – कई बार महंगे ट्रांसप्लांट का खर्च उठाने में परिवार पहले पुरुष सदस्य को चुनता है.
  • जागरूकता की कमी – ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में महिलाएं अंगदान और इसके अधिकारों के बारे में कम जानती हैं.
  • स्वास्थ्य सुविधाओं तक कम पहुंच – महिलाएं समय पर जांच और लिस्टिंग प्रक्रिया पूरी नहीं कर पातीं।

NOTTO की रिपोर्ट में क्या कहा गया 

  • अंग प्रत्यारोपण की सूची में महिला रोगियों को प्राथमिकता दी जाए
  • मृतक दाताओं के रिश्तेदारों में महिला लाभार्थियों को प्राथमिकता मिले
  • अंगदान प्रक्रिया में पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित किए जाएं
  • जागरूकता अभियान चलाकर महिलाओं को उनके अधिकारों और प्रक्रिया की जानकारी दी जाए

अंगदान में पारदर्शिता और समानता क्यों जरूरी है?

अंगदान सिर्फ चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवता का सबसे बड़ा रूप है. अगर इसमें लिंग के आधार पर भेदभाव होगा, तो न सिर्फ नैतिकता, बल्कि जीवन बचाने की क्षमता भी प्रभावित होगी. महिलाओं को बराबरी का मौका देना जरूरी है. 

  • समाज में स्वास्थ्य संबंधी समानता आ सके
  • अंगदान के प्रति विश्वास और भागीदारी बढ़े

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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