गर्दन का ये वाला टेस्ट करा लिया तो टल जाएगा हार्ट अटैक का खतरा, लगते हैं सिर्फ 15 से 20 मिनट

गर्दन का ये वाला टेस्ट करा लिया तो टल जाएगा हार्ट अटैक का खतरा, लगते हैं सिर्फ 15 से 20 मिनट



Early Warning Signs Of Weak Heart: हार्ट की बीमारी के शुरुआती संकेत अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं, क्योंकि इनके लक्षण थकान या बढ़ती उम्र के सामान्य बदलाव जैसे लगते हैं. लेकिन एक नई स्टडी बताती है कि सिर्फ एक सरल गर्दन की स्कैनिंग से पुरुषों में हार्ट फेलियर के शुरुआती खतरे का पता लगाया जा सकता है. इस जांच को कैरेटिड अल्ट्रासाउंड कहा जाता है. यह वही तकनीक है जो गर्भावस्था में किए जाने वाले अल्ट्रासाउंड जैसी होती है. रिसर्चर का कहना है कि डॉक्टर 60 साल से ऊपर के पुरुषों को यह जांच कराने की सलाह दे सकते हैं.

एक्सपर्ट का क्या कहना

स्टडी  की प्रमुख रिसर्चर के रूप में काम कर रहीं डॉ. एटिन्यूक अकिनमोलायन (UCL) कहती हैं कि “कैरेटिड अल्ट्रासाउंड सुरक्षित, सस्ता और बिल्कुल बिना दर्द वाला टेस्ट है. हमारे नतीजे दिखाते हैं कि यह हार्ट फेलियर के शुरुआती संकेत दे सकता है.” उन्होंने कहा कि अगर किसी मरीज की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में जोखिम दिखता है तो वे डॉक्टर से जीवनशैली में बदलाव पर समय रहते बात कर सकते हैं, जिससे भविष्य में हार्ट फेलियर का खतरा कम हो सकता है. यह जांच 15 से 30 मिनट के बीच होती है. इसमें गर्दन पर एक छोटा सा हैंडहेल्ड डिवाइस घुमाकर कैरेटिड धमनियों की लोच यानी फ्लेक्सिबिलिटी देखी जाती है. यही धमनियां दिमाग, चेहरे और गर्दन तक खून पहुंचाती हैं.

बढ़ रहे हार्ट अटैक के मामले 

ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन  के मुताबिक, UK में करीब 9.2 लाख लोग हार्ट फेलियर के साथ रह रहे हैं. शरीर की बड़ी आर्टरीज सामान्य रूप से लचीली होती हैं, लेकिन उम्र और कुछ बीमारियों की वजह से ये सख्त होने लगती हैं. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है, हार्ट पर दबाव बढ़ता है और दिल कमजोर होने लगता है. इससे दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है. UCL के नेतृत्व वाले इस स्टडी में 1,631 पुरुषों ( 71 से 92 वर्ष) को शामिल किया गया. डेटा ब्रिटिश रिजनल हार्ट स्टडी से लिया गया था, जिसकी शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी. नतीजों में पाया गया कि जिन पुरुषों की कैरेटिड धमनियां सबसे कम लचीली थीं, उनमें हार्ट फेलियर का खतरा 2.5 गुना ज्यादा था.

क्या निकला निष्कर्ष

 इस पूरे स्टडी का निष्कर्ष यह निकला कि जिन पुरुषों की कैरेटिड आर्टरीज ज्यादा मोटी थीं, उनमें दिल का दौरा पड़ने का खतरा काफी ज्यादा था. हर 0.16 मिमी मोटाई बढ़ने पर हार्ट अटैक का खतरा करीब 29 प्रतिशत बढ़ जाता है. BHF के चीफ मेडिकल ऑफिसर प्रोफेसर ब्रायन विलियम्स ने कहा कि “यह स्पष्ट संकेत है कि जब कैरेटिड धमनियां सख्त हो जाती हैं, तो दिल को खून पंप करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इससे हार्ट फेलियर का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे किसी भी बदलाव को गंभीरता से लेना चाहिए.”

UCL के एक और स्टडी में बताया गया है कि सिर्फ 10 मिनट की एक स्कैनिंग से लाखों मरीजों में कठिन-से-काबू ब्लड प्रेशर के कारण का पता लगाया जा सकता है. यह स्कैन उन मरीजों के लिए है जिनकी एड्रिनल ग्लैंड्स जरूरत से ज्यादा एल्डोस्टेरोन नामक हार्मोन बनाती हैं. इससे शरीर में नमक का स्तर गड़बड़ हो जाता है और ब्लड प्रेशर बेहद बढ़ जाता है. हाई BP वाले हर चार में से एक व्यक्ति में यह समस्या देखी जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पॉटी ध्यान से देखने पर नजर आते हैं कोलोरेक्टल कैंसर के ये 4 लक्षण, 99 पर्सेंट लोग कर देते हैं इ

पॉटी ध्यान से देखने पर नजर आते हैं कोलोरेक्टल कैंसर के ये 4 लक्षण, 99 पर्सेंट लोग कर देते हैं इ



Colorectal Cancer Symptoms: कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया भर में तेजी से एक गंभीर हेल्थ चैलेंज बनता जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि अब सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि युवा उम्र के लोगों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं. शुरुआती स्टेज में यह बीमारी ज्यादातर बिना किसी खास लक्षण के आगे बढ़ती है या फिर ऐसे हल्के बदलाव दिखाती है जिन्हें लोग सामान्य पेट की समस्या समझकर नजरअंदाज़ कर देते हैं. JAMA Network की एक स्टडी बताती है कि कुछ विशेष लक्षण शुरुआती उम्र में होने वाले कोलोरेक्टल कैंसर से गहराई से जुड़े होते हैं.

क्यों जरूरी है समय पर पहचान?

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार, अगर कोलोरेक्टल कैंसर शुरुआती स्टेज में पकड़ा जाए और बीमारी शरीर के एक हिस्से तक सीमित हो, तो मरीज की 5 साल तक जीवित रहने की संभावना लगभग 90 प्रतिशत होती है. लेकिन जैसे-जैसे यह शरीर में फैलने लगता है, यह आंकड़ा तेजी से गिरता है. रीजनल स्टेज में लगभग 73 प्रतिशत और अगर कैंसर दूर तक फैल जाए तो सिर्फ 13 प्रतिशत इसलिए समय रहते पहचान बेहद जरूरी है.

शुरुआती पहचान ही इलाज 

अगर कोलोरेक्टल कैंसर सही समय पर पकड़ में आ जाए, तो इलाज के बेहतर विकल्प, कम रिकरेंस और पूरी तरह ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है. डॉक्टर बताते हैं कि कई शुरुआती संकेत आपको आपकी मल  में ही दिख सकते हैं. जानिए वे जरूरी लक्षण जिन्हें बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए:

 स्टूल का पतला या पेंसिल जैसा दिखना

अगर आपकी मल अचानक से पतली, रिबन जैसी या पेंसिल जैसी होने लगे और यह बदलाव कई दिनों तक बना रहे, तो यह चेतावनी हो सकती है. अमेरिकन कैंसर सोसाइटी कहती है कि ऐसा तब होता है जब ट्यूमर आंतों के अंदरूनी हिस्से को संकरा कर देता है. Mayo Clinic के अनुसार, ऐसी स्थिति में स्टूल को बाहर आने के लिए कम जगह मिलती है, इसलिए वह पतला दिखने लगता है.

 मल में म्यूकस का दिखना

आंतें सामान्य रूप से थोड़ी मात्रा में म्यूकस बनाती हैं, लेकिन यदि यह मात्रा बढ़ जाए और स्टूल पर स्पष्ट रूप से चिपचिपा या जेल जैसा पदार्थ दिखाई दे, तो यह किसी समस्या का संकेत हो सकता है. NCBI की मेडिकल गाइडलाइन्स भी पीछे के रास्ते से म्यूकस या खून आने को एक चेतावनी संकेत मानती हैं.

 मल में खून आना

स्टूल में खून, चाहे चमकीला लाल हो या काला, इसको कोलोरेक्टल कैंसर का सबसे आम शुरुआती संकेत माना जाता है. रिसर्च के अनुसार, शुरुआती स्टेज के लगभग 50 से 60 प्रतिशत मरीजों में किसी न किसी रूप में ब्लीडिंग देखी जाती है. हालांकि पाइल्स, फिशर या संक्रमण से भी खून आ सकता है, लेकिन बार-बार या लगातार ब्लीडिंग को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए, खासकर जब दूसरे लक्षण भी दिखें.

लगातार दस्त या कब्ज लगा रहना

बार-बार दस्त लगना, कब्ज रहना या दोनों के बीच बार-बार बदलाव दिखना भी एक चेतावनी संकेत है. Moffitt Cancer Center का कहना है कि 50 साल से ऊपर के लोगों में लगातार ऐसी समस्या दिखे तो कोलोन की जांच जरूरी हो जाती है. यदि यह परेशानी कई दिनों या हफ्तों तक बनी रहे, तो समय रहते कोलोनोस्कोपी करवाना जरूरी है.

युवा भी बढ़ते जोखिम में क्यों आ रहे हैं?

The Lancet Oncology में प्रकाशित एक बड़े एनालिसिस से पता चला है कि 25 से 49 वर्ष की उम्र में कोलोरेक्टल कैंसर तेजी से बढ़ रहा है, और 50 में से 27 देशों में इसके मामले बढ़ते दिख रहे हैं. MDPI के अनुसार, शुरुआती उम्र में एंटीबायोटिक का ज्यादा इस्तेमाल, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड, मोटापा और खराब जीवनशैली इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि अगर लोग समय रहते स्क्रीनिंग और लाइफस्टाइल में सुधार पर ध्यान दें, तो बढ़ते मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दियों में सुबह-सुबह आ रही है खांसी, हो सकती है इस बीमारी का संकेत

सर्दियों में सुबह-सुबह आ रही है खांसी, हो सकती है इस बीमारी का संकेत



Why You Cough More in Winter: सर्दी का मौसम शुरू होते ही कई लोगों को सर्दी-खांसी की समस्या शुरू हो जाती है. कई मामलों में यह मौसम का असर होता है, लेकिन कई मामलों में यह किसी बीमारी का संकेत हो सकता है. ऐसा तब होता है, जब आपको खांसी के साथ-साथ अन्य समस्या हो, जैसे सीने में दर्द या बलगम की समस्या भी देखन को मिले तब. हालांकि, अगर सर्दी वाला नॉर्मल खांसी है आपको, तो घबराने की जरूरत नहीं. थोड़ी सी देखभाल और सही उपाय अपनाकर आप अपनी सर्दियों वाली खांसी को जल्दी कंट्रोल कर सकते हैं.

सर्दियों में खांसी क्यों बढ़ती है?

ठंड के मौसम में हमारा ज्यादातर वक्त घर के अंदर ही गुजरता है, हीटर के पास बैठकर. हीटर और सूखी हवा गले और नाक के रास्तों को सुखा देती है. ऐसे में हल्की सी खुजली भी खांसी में बदल जाती है. इसके अलावा सर्दियों की हवा भी काफी ड्राई होती है, जिससे श्वसन तंत्र आसानी से इरिटेट हो जाता है.

सर्दियों में खांसी की आम वजह

अस्थमा– ठंडी हवा और धूल से आसानी से बढ़ जाता है, जिससे सीजन भर सूखी खांसी रह सकती है.

ब्रोंकाइटिस-  एयरवेज में सूजन पैदा करता है. क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस वाले लोगों को पूरे मौसम तक खांसी रह सकती है.

इन्फेक्शन- फ्लू या फिर निमोनिया, ये गंभीर इंफेक्शन खांसी को लंबे समय तक बनाए रखते हैं.

एलर्जन्स-  धूल, फफूंद, पराग आदि ठंडी और सूखी हवा के साथ आसानी से उड़ते हैं और खांसी ट्रिगर कर सकते हैं.

पोस्टनेजल ड्रिप– नाक का म्यूकस रातभर गले में आकर जमा हो जाता है और सुबह खांसी बढ़ा देता है.

सर्दियों की खांसी के आसान घरेलू उपाय

पानी ज्यादा पिएं– हाइड्रेशन म्यूकस को पतला करता है और गले की जलन कम करता है.

नमक वाले पानी से गरारे- गले को आराम मिलता है और खांसी में राहत मिलती है.

हर्बल टी- अदरक, थाइम, या मार्शमैलो रूट वाली चाय सूजन और खांसी दोनों को शांत करती है.

ह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल- कमरे में नमी बढ़ाकर सांस लेने में राहत देता है. चाहें तो यूकेलिप्टस या पुदीने के इसेंसियल ऑयल भी डाल सकते हैं.

स्टीम लें– गर्म भाप म्यूकस को ढीला करती है और खांसी कम करती है.

कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है?

Indigohealth के अनुसार, अगर आपकी खांसी कई हफ्तों तक बनी रहे या इन लक्षणों के साथ दिखाई दे, तो जल्द जांच करवानी चाहिए. लक्षणों में-

  • हरा या पीला बलगम
  • घरघराहट
  • बुखार
  • सांस लेने में दिक्कत
  • अत्यधिक थकान
  • बिना वजह वजन कम होना

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कार्बोहाइड्रेट्स खाना छोड़ देंगे तो शरीर पर कितना पड़ेगा असर? दिक्कत होने से पहले दुरुस्त कर लें यह गलती

कार्बोहाइड्रेट्स खाना छोड़ देंगे तो शरीर पर कितना पड़ेगा असर? दिक्कत होने से पहले दुरुस्त कर लें यह गलती


कार्बोहाइड्रेट शरीर का सबसे आसान और पसंदीदा ऊर्जा सोर्स हैं. यह सिर्फ चावल, रोटी और आलू में ही नहीं, बल्कि फलों, सब्जियों, दालों, दूध और अनाज में भी पाए जाते हैं. ग्लूकोज, जो कार्ब्स से बनता है वह लगभग हर सेल की प्राथमिक जरूरत है, खासकर दिमाग और रेल ब्लड सेल्स की.

जैसे ही कार्ब्स कम होते हैं, शरीर अपने स्टोर किए हुए ग्लाइकोजन को इस्तेमाल करने लगता है. ग्लाइकोजन पानी के साथ बंधा होता है, इसलिए इसके खत्म होते ही वजन तेजी से गिरता दिखाई देता है. हालांकि लंबे समय में यह अंतर कम हो जाता है, क्योंकि वॉटर लॉस रुक जाते हैं.

जैसे ही कार्ब्स कम होते हैं, शरीर अपने स्टोर किए हुए ग्लाइकोजन को इस्तेमाल करने लगता है. ग्लाइकोजन पानी के साथ बंधा होता है, इसलिए इसके खत्म होते ही वजन तेजी से गिरता दिखाई देता है. हालांकि लंबे समय में यह अंतर कम हो जाता है, क्योंकि वॉटर लॉस रुक जाते हैं.

कार्ब कम होते ही शरीर ऊर्जा के लिए फैट पर निर्भर होने लगता है और कीटोन बनने शुरू हो जाते हैं. यह प्रक्रिया तेजी से फैट जलाने में मदद करती है और भूख भी कुछ कम कर सकती है. लेकिन लंबे समय तक सख्त लो-कार्ब डाइट पर रहने से पोषक तत्वों की कमी की संभावना भी बढ़ जाती है.

कार्ब कम होते ही शरीर ऊर्जा के लिए फैट पर निर्भर होने लगता है और कीटोन बनने शुरू हो जाते हैं. यह प्रक्रिया तेजी से फैट जलाने में मदद करती है और भूख भी कुछ कम कर सकती है. लेकिन लंबे समय तक सख्त लो-कार्ब डाइट पर रहने से पोषक तत्वों की कमी की संभावना भी बढ़ जाती है.

कार्ब्स हटाने का सबसे बड़ा असर पाचन पर पड़ता है, क्योंकि फाइबर भी कम हो जाता है. फाइबर की कमी से कब्ज, पेट फूलना और आंतों के माइक्रोबायोम में गड़बड़ी हो सकती है. कुछ स्टडीज बताती हैं कि लंबे समय तक कार्ब कम रखने से अच्छी बैक्टीरिया की विविधता भी घटती है.

कार्ब्स हटाने का सबसे बड़ा असर पाचन पर पड़ता है, क्योंकि फाइबर भी कम हो जाता है. फाइबर की कमी से कब्ज, पेट फूलना और आंतों के माइक्रोबायोम में गड़बड़ी हो सकती है. कुछ स्टडीज बताती हैं कि लंबे समय तक कार्ब कम रखने से अच्छी बैक्टीरिया की विविधता भी घटती है.

कार्ब कम होने पर कई लोगों में एनर्जी लेवल गिर जाता है. शुरुआत के दिनों में थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान भटकना या ब्रेन फॉग की शिकायत आम होती है. दिमाग को ग्लूकोज चाहिए और इसकी कमी से कुछ लोगों में हल्का हाइपोग्लाइसीमिया तक हो सकता है.

कार्ब कम होने पर कई लोगों में एनर्जी लेवल गिर जाता है. शुरुआत के दिनों में थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान भटकना या ब्रेन फॉग की शिकायत आम होती है. दिमाग को ग्लूकोज चाहिए और इसकी कमी से कुछ लोगों में हल्का हाइपोग्लाइसीमिया तक हो सकता है.

हर किसी के लिए लो-कार्ब डाइट सही नहीं होती. किडनी की दिक्कत वाले लोगों में ज्यादा प्रोटीन का लोड बढ़ सकता है. वहीं, लिवर संबंधी समस्याओं या हाई-इंटेंसिटी ट्रेनिंग करने वाले एथलीटों के लिए कार्ब कम करना परफॉर्मेंस को सीधे प्रभावित कर सकता है.

हर किसी के लिए लो-कार्ब डाइट सही नहीं होती. किडनी की दिक्कत वाले लोगों में ज्यादा प्रोटीन का लोड बढ़ सकता है. वहीं, लिवर संबंधी समस्याओं या हाई-इंटेंसिटी ट्रेनिंग करने वाले एथलीटों के लिए कार्ब कम करना परफॉर्मेंस को सीधे प्रभावित कर सकता है.

कार्ब्स पूरी तरह छोड़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि शरीर की एनर्जी, डाइजेशन और दिमाग तीनों ही इससे जुड़े हुए हैं. किसी भी बड़े बदलाव से पहले अपने स्वास्थ्य, जरूरतों और मेडिकल कंडीशन को ध्यान में रखना सबसे सही तरीका है. यह जानकारी केवल जागरूकता के लिए है, किसी भी डाइट को अपनाने से पहले एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.

कार्ब्स पूरी तरह छोड़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि शरीर की एनर्जी, डाइजेशन और दिमाग तीनों ही इससे जुड़े हुए हैं. किसी भी बड़े बदलाव से पहले अपने स्वास्थ्य, जरूरतों और मेडिकल कंडीशन को ध्यान में रखना सबसे सही तरीका है. यह जानकारी केवल जागरूकता के लिए है, किसी भी डाइट को अपनाने से पहले एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.

Published at : 28 Nov 2025 07:02 AM (IST)

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अंडे से लेकर केले तक… फ्रिज में कभी नहीं रखनी चाहिए ये चीजें, बन जाती हैं जहर

अंडे से लेकर केले तक… फ्रिज में कभी नहीं रखनी चाहिए ये चीजें, बन जाती हैं जहर


दूध बहुत जल्दी खराब होने वाली चीज है और इसे लगातार ठंडा तापमान चाहिए. दरवाजे में रखने पर यह बार-बार गर्म हवा के संपर्क में आता है, जिससे यह जल्दी खराब हो सकता है और उसकी शेल्फ लाइफ कम हो जाती है.

अंडों को अक्सर लोग दरवाजे में बनी ट्रे में रख देते हैं, लेकिन यह जगह उनके लिए सुरक्षित नहीं है. यहां तापमान लगातार बदलता है, जिससे अंडों में बैक्टीरिया बढ़ सकता है और फूडबॉर्न बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

अंडों को अक्सर लोग दरवाजे में बनी ट्रे में रख देते हैं, लेकिन यह जगह उनके लिए सुरक्षित नहीं है. यहां तापमान लगातार बदलता है, जिससे अंडों में बैक्टीरिया बढ़ सकता है और फूडबॉर्न बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

बटर देखने में दरवाजे के लिए सही लगता है, लेकिन तापमान में उतार-चढ़ाव इसे जल्दी नरम कर देता है. इससे इसकी फ्रेशनैस और टेक्सचर दोनों खराब हो सकते हैं, इसलिए इसे फ्रिज के अंदर ही रखना बेहतर है.

बटर देखने में दरवाजे के लिए सही लगता है, लेकिन तापमान में उतार-चढ़ाव इसे जल्दी नरम कर देता है. इससे इसकी फ्रेशनैस और टेक्सचर दोनों खराब हो सकते हैं, इसलिए इसे फ्रिज के अंदर ही रखना बेहतर है.

सॉफ्ट चीज जैसे मोजरेला या क्रीम चीज को स्थिर ठंडक चाहिए, जो दरवाज़े में बिल्कुल नहीं मिलती. यहां रखी चीजें जल्दी खराब हो सकती हैं या उनमें फंगस बन सकती है, इसलिए इन्हें अंदर वाली शेल्फ पर रखना चाहिए.

सॉफ्ट चीज जैसे मोजरेला या क्रीम चीज को स्थिर ठंडक चाहिए, जो दरवाज़े में बिल्कुल नहीं मिलती. यहां रखी चीजें जल्दी खराब हो सकती हैं या उनमें फंगस बन सकती है, इसलिए इन्हें अंदर वाली शेल्फ पर रखना चाहिए.

फ्रेश जूस तापमान के प्रति बहुत संवेदनशील होता है और थोड़ा सा उतार-चढ़ाव भी इसे खट्टा या फर्मेंटेड बना सकता है. दरवाजे की गर्म हवा इसे जल्दी खराब कर देती है, इसलिए इसे हमेशा अंदर ही स्टोर करें.

फ्रेश जूस तापमान के प्रति बहुत संवेदनशील होता है और थोड़ा सा उतार-चढ़ाव भी इसे खट्टा या फर्मेंटेड बना सकता है. दरवाजे की गर्म हवा इसे जल्दी खराब कर देती है, इसलिए इसे हमेशा अंदर ही स्टोर करें.

कच्चा मीट बैक्टीरिया के लिए सबसे संवेदनशील होता है और इसे फ्रिज का सबसे ठंडा हिस्सा चाहिए. दरवाजे में रखने से मीट जल्दी गर्म होता है, जिससे फूड पॉइजनिंग का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

कच्चा मीट बैक्टीरिया के लिए सबसे संवेदनशील होता है और इसे फ्रिज का सबसे ठंडा हिस्सा चाहिए. दरवाजे में रखने से मीट जल्दी गर्म होता है, जिससे फूड पॉइजनिंग का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

दही भी ठंडी और स्थिर जगह पर ही ज्यादा समय तक टिकता है. दरवाज़े में तापमान बदलने से इसका टेक्सचर बिगड़ जाता है और यह जल्दी खट्टा हो सकता है, इसलिए इसे अंदर की शेल्फ में ही रखना सही है.

दही भी ठंडी और स्थिर जगह पर ही ज्यादा समय तक टिकता है. दरवाज़े में तापमान बदलने से इसका टेक्सचर बिगड़ जाता है और यह जल्दी खट्टा हो सकता है, इसलिए इसे अंदर की शेल्फ में ही रखना सही है.

केले कभी भी फ्रिज के दरवाज़े में नहीं रखने चाहिए, क्योंकि यहां का तापमान बदलने से केले की स्किन काली पड़ जाती है. अंदर का फल भी जल्दी नरम होकर खराब हो सकता है और उसका स्वाद बिगड़ जाता है.

केले कभी भी फ्रिज के दरवाज़े में नहीं रखने चाहिए, क्योंकि यहां का तापमान बदलने से केले की स्किन काली पड़ जाती है. अंदर का फल भी जल्दी नरम होकर खराब हो सकता है और उसका स्वाद बिगड़ जाता है.

Published at : 27 Nov 2025 05:35 PM (IST)

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