किडनी खराब होने से पहले आंखों में ही दिख जाते हैं बीमारी के लक्षण, जान लेंगे तो बच जाएगी जान

किडनी खराब होने से पहले आंखों में ही दिख जाते हैं बीमारी के लक्षण, जान लेंगे तो बच जाएगी जान



Kidney Disease Warning Signs: अक्सर लोग किडनी बीमारी को थकान, पैरों में सूजन या यूरिन में बदलाव से जोड़ते हैं, लेकिन कई बार शुरुआत आंखों से होती है. वजह यह है कि किडनी और आंखें दोनों ही शरीर की छोटी-छोटी नसों और फ्लूइड बैलेंस पर निर्भर होते हैं. जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो इसका असर आंखों पर भी दिखने लगता है. आंखों में लगातार सूजन, धुंधलापन, लालपन, जलन या रंग पहचानने में बदलाव. ये सभी संकेत किसी गहरी समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं. शुरू में ये बदलाव बहुत हल्के होते हैं, लेकिन समय के साथ बढ़ सकते हैं. अगर ये लक्षण थकान या सूजन के साथ दिखें, तो किडनी और आंखों दोनों की जांच कराना जरूरी है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

किडनी की बीमारी सबसे पहले आंखों में दिखाती है असर

ज्यादातर लोग मानते हैं कि किडनी बीमारी सिर्फ थकान, सूजन या यूरिन चेंज से पता चलती है, लेकिन हकीकत यह है कि इसके शुरुआती संकेत आंखों में भी दिखाई दे सकते हैं. National Kidney Foundation के अनुसार,  किडनी शरीर का फिल्टर सिस्टम है और आंखें बेहद नाजुक ब्लड वेसल्स पर टिकी होती हैं. जैसे ही किडनी फ्लूइड बैलेंस या ब्लड वेसल्स को प्रभावित करती है, आंखों में तुरंत बदलाव नजर आने लगते हैं. किडनी की समस्या बढ़ने पर विजन, आंखों की नमी, आंखों की नसों और यहां तक कि रंग पहचानने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है. कई बार ये लक्षण किसी आम आंख की बीमारी जैसे लगते हैं, जिससे असली समस्या पहचानने में देर हो जाती है. नजरअंदाज करने पर ये लक्षण बढ़ते जाते हैं. यहां जानिए वे पांच आंख-संबंधी लक्षण, जिन्हें हल्का लेने पर मामला गंभीर हो सकता है:

आंखों में लगातार सूजन 

कभी-कभी देर रात जागने या नमक ज्यादा खाने से आंखें सूज जाती हैं, लेकिन अगर सूजन दिनभर बनी रहे तो यह किडनी में प्रोटीन लीक होने का संकेत हो सकता है. जब किडनी प्रोटीन को फिल्टर नहीं कर पाती, तो वही प्रोटीन शरीर से यूरिन में निकलने लगता है और इसका असर आंखों के आसपास सूजन के रूप में दिखता है. अगर सूजन के साथ यूरिन झागदार या ज्यादा फोमी दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवाएं.

धुंधली या दोहरी दिखाई देना 

अचानक विजन का धुंधला होना या दो-दो दिखाई देना रेटिना की छोटी नसों के खराब होने की निशानी हो सकती है. हाई BP और डायबिटीज, किडनी खराब होने के दो सबसे बड़े कारण रेटिना की नसों को भी नुकसान पहुंचाते हैं. फ्लूइड जमा होना, रेटिना की सूजन या गंभीर मामलों में विजन लॉस भी हो सकता है. अगर आप डायबिटिक या BP मरीज हैं और विज़न बदला हुआ महसूस करें, तो किडनी फंक्शन की जांच भी जरूरी है.

 आंखों में सूखापन, जलन या खुरदुरापन 

बार-बार आंखें सूखना या चुभन महसूस होना सिर्फ मौसम या स्क्रीन टाइम का असर नहीं होता. किडनी बीमारी के बढ़ने या डायलिसिस लेने वाले मरीजों में ड्राई आई कॉमन शिकायत है. कैल्शियम-फॉस्फोरस असंतुलन, या शरीर में टॉक्सिन जमा होने से आंसू कम बनते हैं. अगर आंखें बिना वजह लाल, सूखी या चुभती रहें, तो किडनी जांच करवाना जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- ABHA Card: आभा कार्ड में किन-किन बीमारियों की रखी जाती है डिटेल, डॉक्टरों को किन बातों की तुरंत मिल जाती है जानकारी?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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जरूरत से ज्यादा तीखा तो नहीं खा रहे हैं आप, बन सकता है कैंसर का कारण

जरूरत से ज्यादा तीखा तो नहीं खा रहे हैं आप, बन सकता है कैंसर का कारण



Cancer Risk From Spicy Food: दुनिया भर में लोग तीखा खाने के शौकीन हैं, चाहे बात हो भारतीय करी की या मैक्सिकन साल्सा की. लाल मिर्च न सिर्फ खाने का स्वाद और गर्माहट बढ़ाती है, बल्कि मेटाबॉलिज्म को भी थोड़ा तेज करती है. लेकिन पिछले कुछ सालों में साइंटिस्ट यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या लगातार बहुत ज्यादा मिर्च खाने से डाइजेशन से जुड़े कुछ कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. Frontiers in Nutrition जर्नल में पब्लिश एक स्टडी में इस विषय को विस्तार से परखा गया है. रिसर्च के अनुसार, मिर्च में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट गुण थोड़ी मात्रा में फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन बहुत अधिक सेवन से अन्ननली, पेट और कोलन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. भारत में कोलोरेक्टल कैंसर तीसरा सबसे आम कैंसर है और समय रहते इलाज शुरू हो जाए तो इसका उपचार पूरी तरह संभव है.

कैसे ज्यादा मिर्च खाना कितना खतरनाक?

मिर्च में मौजूद कैप्सेसिन वह तत्व है जो इसे तीखापन देता है. इसे दर्द कम करने, सूजन घटाने और फैट बर्निंग जैसी खूबियों के लिए जाना जाता है. लेकिन कैंसर को इसके प्रभावों को लेकर मिक्स परिणाम सामने आए हैं. ज्यादा मात्रा में लाल मिर्च खासतौर पर कच्ची या बहुत तीखी लंबे समय तक खाने से डाइजेशन सिस्टम में जलन और सूजन बढ़ सकती है. धीरे-धीरे यही सूजन सेल्स को नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है.

वहीं कम मात्रा में मिर्च, खासकर यदि आहार में पर्याप्त सब्जियां, फल और फाइबर हों, तो नुकसान नहीं पहुंचाती. दही जैसे कूलिंग खाने के पदार्थों के साथ मिर्च खाना या पकाकर खाना पेट की जलन कम करता है.

बहुत ज्यादा मिर्च खाने से पेट के कैंसर का खतरा

Frontiers in Nutrition में पब्लिश स्टडी ने दुनिया भर के हजारों लोगों पर हुई रिसर्च को शामिल किया. निष्कर्ष ये बताते हैं कि बहुत तीखा खाना रोजाना या बड़ी मात्रा में खाने वाले लोगों में डाइजेशन सिस्टम के कैंसर का जोखिम बढ़ा पाया गया. हल्के से मध्यम स्तर पर मिर्च का सेवन नुकसान नहीं करता, और कैप्सेसिन के कारण कुछ फायदे भी दे सकता है. बहुत ज्यादा मिर्च खाने और धूम्रपान या शराब सेवन करने पर खतरा और बढ़ जाता है. किस प्रकार की मिर्च खाई जा रही है और आपकी बाकी डाइट कैसी है, यह सब जोखिम को प्रभावित करता है.

मिर्च खाने के फायदे

लाल मिर्च नुकसानदायक नहीं है, बल्कि सही मात्रा में कई फायदे देती है. इससे मेटाबॉलिज्म बढ़ाती है, कैप्सेसिन कैलोरी बर्न करने में मदद करती है. यह दिल के लिए भी अच्छा है, सीमित मात्रा में खाने से ब्लड फ्लो और कोलेस्ट्रॉल पर अच्छा असर हो सकता है. इसे एंटीऑक्सिडेंट्स का सोर्स भी माना जाता है, जिससे विटामिन C, बीटा-कैरोटीन और अन्य घटक शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं.

इसे भी पढ़ें: कौन-सी दवाएं ज्यादा बनाती है देश की फार्मा इंडस्ट्री, आपकी सेहत के लिए क्या है फ्यूचर प्लानिंग?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अचानक मुंह में बनने लगा जरूरत से ज्यादा बलगम, हो सकती है ये दिक्कत

अचानक मुंह में बनने लगा जरूरत से ज्यादा बलगम, हो सकती है ये दिक्कत



Morning Phlegm Causes: बहुत से लोग सुबह उठते ही गले में कफ या बलगम महसूस करते हैं और सोचते हैं कि “आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?” रात की नींद के बाद ऐसा होना आम बात है, लेकिन कई बार ये किसी अंदरूनी दिक्कत का संकेत भी हो सकता है. कफ ज्यादा बनने पर खांसी भी शुरू हो जाती है, क्योंकि शरीर उसी म्यूकस को बाहर निकालने की कोशिश करता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह किस वजह से होता है और इसको रोकने के लिए क्या करना चाहिए.

किस कारण से मुंह में बनने लगते हैं बलगम?

पोस्टनेजल ड्रिप

यह सबसे कॉमन कारण है. रात में नाक के अंदर बनने वाला म्यूकस धीरे-धीरे गले में जमा होने लगता है. एलर्जी, सर्दी-जुकाम या धूल-मिट्टी से यह और बढ़ जाता है. सुबह उठते ही गला भारी-भारी और कफ ज्यादा महसूस होता है.

एसिडिटी

अगर रात में पेट का एसिड ऊपर आ जाता है तो वह गले को इरिटेट करता है. इससे शरीर ज्यादा म्यूकस बनाने लगता है. लेटने पर यह समस्या और बढ़ जाती है, इसलिए सुबह उठकर गले में चिपचिपा कफ महसूस हो सकता है.

अस्थमा

अस्थमा वाले लोगों में रात के समय सूजन और कफ बनना बढ़ जाता है. सुबह उठते ही खांसी और कफ का बोलबाला इसी वजह से होता है, क्योंकि नींद के दौरान हवा के रास्ते ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं.

धूम्रपान और प्रदूषण

सिगरेट का धुआं म्यूकस को गाढ़ा बना देता है और उसकी मात्रा भी बढ़ जाती है. बाहर का प्रदूषित और सूखा हवा भी कफ को बढ़ाती है. स्मोकर्स में सुबह कफ सबसे ज्यादा देखा जाता है.

सुबह गले में बनने वाले कफ को कैसे रोकें?

अगर आपको भी सुबह बलगम बनता है, तो इसके लिए आप अलग-अलग तरह के उपाय अपना सकते हैं. mucinex के अनुसार, अगर आपको सुबह कफ बनता है, तो उसके लिए आप

पानी ज्यादा पिएं

शरीर हाइड्रेट रहेगा तो कफ पतला रहेगा और गले में जमा नहीं होगा. रात को हल्का गर्म पानी या हर्बल टी फायदेमंद होती है.

सिर ऊंचा करके सोएं

ताकि नाक का म्यूकस गले में इकट्ठा न हो और एसिडिटी भी कंट्रोल में रहे. एक अतिरिक्त तकिया भी काफी काम करता है.

अपनी एलर्जी या एसिडिटी का इलाज कराएं

अगर यह दिक्कतें बार-बार होती दिखाई दें तो डॉक्टर की मदद लें. कारण को ठीक करना सबसे जरूरी है.

कमरे में धूल, पालतू जानवरों के बाल और एलर्जन्स नियंत्रित रखें

साफ-सफाई का खास ध्यान रखने से सुबह वाला कफ काफी हद तक कम हो जाता है.

नींद का रूटीन सही रखें

अच्छी नींद शरीर की इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है, जिससे कफ बनने की दिक्कत भी कम होती है.

कब डॉक्टर से मिलना जरूरी है?

अगर आपको यह समझ नहीं आ रहा कि आपका कफ आखिर किस वजह से बढ़ रहा है, या लक्षण लंबे समय तक बने हुए हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. वे आपकी असली समस्या पहचानकर आपकी स्थिति के हिसाब से सही इलाज बता पाएंगे.

इसे भी पढ़ें- Intermittent Fasting: क्या इंटरमिटेंट फास्टिंग से ठीक हो जाता है लिवर? जानें इसके पीछे का पूरा सच

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये गलतियां करने वाली महिलाओं को जरूर होता है ओवेरियन कैंसर, ऐसा दिखता है पहला लक्षण

ये गलतियां करने वाली महिलाओं को जरूर होता है ओवेरियन कैंसर, ऐसा दिखता है पहला लक्षण



Early Signs Of Ovarian Cancer: ओवेरियन कैंसर दुनिया में तीसरा सबसे आम स्त्री रोग संबंधी कैंसर है और अमेरिका में महिलाओं की कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक. इसे अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि शुरुआती स्टेज में यह लगभग बिना शोर किए बढ़ता जाता है और जब तक पता चलता है, बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है. साल 2024 के वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में करीब 3.24 लाख नए मामले आए और लगभग 2.06 लाख महिलाओं की मौत इस बीमारी से हुई.
ज्यादातर मामलों में यह कैंसर ओवरी  में बनने वाले घातक ट्यूमर से शुरू होता है. खासकर एपिथीलियल ओवेरियन कैंसर, जो असामान्य सेल्स की तेजी से बढ़त के कारण होता है. कुल मिलाकर किसी महिला में ओवेरियन कैंसर होने का जीवनभर का जोखिम लगभग 1.3 प्रतिशत माना जाता है, लेकिन उम्र, पारिवारिक हिस्ट्री और कुछ खास जेनेटिक म्यूटेशन से यह जोखिम कई गुना बढ़ सकता है. यही वजह है कि समय रहते पहचान बेहद जरूरी हो जाती है.

क्यों शुरुआती पहचान इतनी मुश्किल होती है?

समस्या यह है कि शुरुआती स्टेज में ओवेरियन कैंसर ऐसे लक्षण देता है जिन्हें महिलाएं अक्सर नजरअंदाज़ कर देती हैं मामूली परेशानी समझकर. यही कारण है कि Mayo Clinic के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत मामले स्टेज 3 या 4 में पकड़ में आते हैं, जब कैंसर ओवरी से बाहर फैल चुका होता है. क्योंकि शुरुआती लक्षण आमतौर पर पेट फूलने, जल्दी पेट भरने, हल्के पेट दर्द या बदलती पाचन आदतों जैसे दिखते हैं जिन्हें अक्सर साधारण मानकर टाल दिया जाता है. इसलिए पहचान देर से होती है. ऊपर से, इस बीमारी के लिए कोई नियमित स्क्रीनिंग टेस्ट भी उपलब्ध नहीं है.

ओवेरियन कैंसर इतनी देर से क्यों पकड़ में आता है?

ओवरी शरीर के भीतर गहराई में होते हैं, कई अंगों के पीछे छिपे हुए. छोटे ट्यूमर आसानी से महसूस नहीं होते और शुरुआती कैंसर अक्सर कोई साफ लक्षण नहीं देता. जब तक लक्षण दिखने लगते हैं, बीमारी कई बार फैल चुकी होती है. इसी वजह से केवल 20 से 25 प्रतिशत मरीजों का कैंसर शुरुआती स्टेज में पकड़ा जाता है. जैसे-जैसे बीमारी आगे बढ़ती है, बचने की संभावना काफी कम होती जाती है. 

Mayo Clinic की नई रिसर्च क्या कहती है?

इस साल Mayo Clinic की एक महत्वपूर्ण स्टडी सामने आई, जिसमें पता चला कि फेलोपियन ट्यूब की लाइनिंग में मौजूद सेल्स, जिन्हें अब ओवेरियन कैंसर के शुरुआती स्रोत के रूप में माना जा रहा है बीमारी के बहुत शुरुआती चरण में ही सूक्ष्म बदलाव दिखाने लगती हैं. स्टडी में शामिल महिला महज 22 साल की थी, लेकिन उसमें ऐसे जेनेटिक म्यूटेशन थे जो कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं. स्कैन में सिर्फ एक साधारण सिस्ट दिखा, लेकिन गहराई से टेस्ट करने पर सेल्स में कैंसर से पहले होने वाले बदलाव मिले.

कौन-से आम लक्षण ओवेरियन कैंसर के शुरुआती संकेत हो सकते हैं?

एक्सपर्ट बताते हैं कि जिन लक्षणों को ज्यादातर महिलाएं छोटी-मोटी परेशानी समझकर टाल देती हैं, वे असल में चेतावनी हो सकते हैं. इसमें-

  • पेट में लगातार फूलना या भारीपन
  • कुछ खाने के बाद ही पेट भरने का अहसास
  • निचले पेट या पेल्विक क्षेत्र में हल्का दर्द
  • पीठ में दर्द, खासकर लोअर बैक
  • कब्ज, दस्त या यूरिन की आदतों में बदलाव
  • थकान, कमजोरी, वजन में अचानक बदलाव

क्योंकि ये लक्षण रोजमर्रा की परेशानियों जैसे भी लगते हैं, इसलिए इन्हें हल्के में लेना बहुत आसान है. लेकिन इनके दो-तीन हफ्ते लगातार बने रहने पर डॉक्टर से मिलना जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- Cancer Treatment with AI: कैंसर के इलाज में बड़ी छलांग, भारत में बना AI अब बताएगा ट्यूमर का असली खेल

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दियों में किस वक्त लें धूप, जिससे ज्यादा से ज्यादा मिले विटामिन डी? स्किन को भी नहीं होगा नुकसान

सर्दियों में किस वक्त लें धूप, जिससे ज्यादा से ज्यादा मिले विटामिन डी? स्किन को भी नहीं होगा नुकसान


हालांकि हमारी त्वचा धूप से विटामिन D बनाती है, लेकिन हर समय की धूप एक जैसी असरदार नहीं होती. ज्यादा देर तक तेज धूप में रहने से नुकसान भी हो सकता है, इसलिए यह समझना जरूरी है कि आखिर कौन-सा समय शरीर के लिए सबसे फायदेमंद है और कितना एक्सपोजर काफी है.

आम धारणा के उलट, रिसर्च बताती है कि सुबह-सुबह नहीं, बल्कि 10 बजे से 3 बजे के बीच की धूप विटामिन D बनाने के लिए सबसे असरदार होती है. इस समय सूर्य ऊपर होता है, जिससे UVB किरणें सीधे त्वचा पर पड़ती हैं और विटामिन D तेजी से बनता है, जबकि सुबह 7 बजे जैसी धूप अक्सर बहुत हल्की होती है.

आम धारणा के उलट, रिसर्च बताती है कि सुबह-सुबह नहीं, बल्कि 10 बजे से 3 बजे के बीच की धूप विटामिन D बनाने के लिए सबसे असरदार होती है. इस समय सूर्य ऊपर होता है, जिससे UVB किरणें सीधे त्वचा पर पड़ती हैं और विटामिन D तेजी से बनता है, जबकि सुबह 7 बजे जैसी धूप अक्सर बहुत हल्की होती है.

कितनी देर धूप में रहना चाहिए, इसका एक ही जवाब सभी पर लागू नहीं होता. त्वचा का रंग, मौसम, जगह, उम्र, इन सब पर निर्भर करता है. कई एक्सपर्ट के मुताबिक हफ्ते में कुछ बार 5 से 30 मिनट तक चेहरे, हाथों या पैरों पर धूप पड़ना काफी होता है, जबकि गहरी त्वचा और बुजुर्गों को ज्यादा समय की जरूरत होती है.

कितनी देर धूप में रहना चाहिए, इसका एक ही जवाब सभी पर लागू नहीं होता. त्वचा का रंग, मौसम, जगह, उम्र, इन सब पर निर्भर करता है. कई एक्सपर्ट के मुताबिक हफ्ते में कुछ बार 5 से 30 मिनट तक चेहरे, हाथों या पैरों पर धूप पड़ना काफी होता है, जबकि गहरी त्वचा और बुजुर्गों को ज्यादा समय की जरूरत होती है.

सर्दियों में और ऊंचाई वाले इलाकों में सूर्य की किरणों का एंगल बदल जाता है, जिससे दोपहर की धूप भी कई बार विटामिन D बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होती. ऐसे समय में लोगों को भोजन और सप्लीमेंट पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है, क्योंकि UVB किरणें जमीन तक पहुंच ही नहीं पातीं.

सर्दियों में और ऊंचाई वाले इलाकों में सूर्य की किरणों का एंगल बदल जाता है, जिससे दोपहर की धूप भी कई बार विटामिन D बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होती. ऐसे समय में लोगों को भोजन और सप्लीमेंट पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है, क्योंकि UVB किरणें जमीन तक पहुंच ही नहीं पातीं.

धूप का फायदा उठाने का सबसे सुरक्षित तरीका है, कम समय का एक्सपोजर, वह भी दोपहर के आसपास. लंबे समय तक सूर्य में रहने पर सनबर्न का जोखिम बढ़ता है, जो आगे चलकर स्किन कैंसर जैसे खतरे ला सकता है. अगर आपको पता है कि आपको ज्यादा देर बाहर रहना है, तो सनस्क्रीन, टोपी और कपड़ों का इस्तेमाल करना चाहिए.

धूप का फायदा उठाने का सबसे सुरक्षित तरीका है, कम समय का एक्सपोजर, वह भी दोपहर के आसपास. लंबे समय तक सूर्य में रहने पर सनबर्न का जोखिम बढ़ता है, जो आगे चलकर स्किन कैंसर जैसे खतरे ला सकता है. अगर आपको पता है कि आपको ज्यादा देर बाहर रहना है, तो सनस्क्रीन, टोपी और कपड़ों का इस्तेमाल करना चाहिए.

एक और बात याद रखें, कांच के पीछे बैठकर धूप में रहने से विटामिन D नहीं बनता, क्योंकि UVB किरणें खिड़कियों से सीधे अंदर नहीं आतीं. इसलिए धूप लेने का मकसद हो तो कुछ समय खुली जगह में रहना जरूरी है. और हां, सनस्क्रीन का इस्तेमाल विटामिन D को पूरी तरह बंद नहीं करता, यह सिर्फ सुरक्षा देता है, इसलिए धूप में लंबे समय रहना हो तो इसे लगाना ही चाहिए.

एक और बात याद रखें, कांच के पीछे बैठकर धूप में रहने से विटामिन D नहीं बनता, क्योंकि UVB किरणें खिड़कियों से सीधे अंदर नहीं आतीं. इसलिए धूप लेने का मकसद हो तो कुछ समय खुली जगह में रहना जरूरी है. और हां, सनस्क्रीन का इस्तेमाल विटामिन D को पूरी तरह बंद नहीं करता, यह सिर्फ सुरक्षा देता है, इसलिए धूप में लंबे समय रहना हो तो इसे लगाना ही चाहिए.

Published at : 27 Nov 2025 11:13 AM (IST)

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