बचपन की इन कॉमन आदतों के कारण ही जल्दी आ जाते हैं पीरियड्स, इस स्टडी ने बता दिया कनेक्शन

बचपन की इन कॉमन आदतों के कारण ही जल्दी आ जाते हैं पीरियड्स, इस स्टडी ने बता दिया कनेक्शन


Human Reproduction जर्नल में छपी रिसर्च के मुताबिक, जो लड़कियां ज्यादा प्रोसेस्ड फूड और मीट वाली डाइट लेती हैं, उनमें जल्दी पीरियड्स शुरू होने का खतरा 15 प्रतिशत ज्यादा है.

ऐसी डाइट जिसमें ज्यादा जंक फूड, मीठा और रेड मीट हो, उसे इंफ्लेमेटरी डाइट कहा जाता है. यह शरीर में सूजन बढ़ाती है और पीरियड्स जल्दी शुरू कर सकती है.

ऐसी डाइट जिसमें ज्यादा जंक फूड, मीठा और रेड मीट हो, उसे इंफ्लेमेटरी डाइट कहा जाता है. यह शरीर में सूजन बढ़ाती है और पीरियड्स जल्दी शुरू कर सकती है.

स्टडी बताती है कि प्लांट-बेस्ड डाइट (ज्यादा फल-सब्जियां, दालें, साबुत अनाज) लेने वाली लड़कियों में जल्दी पीरियड्स आने का खतरा 8 प्रतिशत कम हो जाता है.

स्टडी बताती है कि प्लांट-बेस्ड डाइट (ज्यादा फल-सब्जियां, दालें, साबुत अनाज) लेने वाली लड़कियों में जल्दी पीरियड्स आने का खतरा 8 प्रतिशत कम हो जाता है.

पहले माना जाता था कि जल्दी पीरियड्स का कारण बॉडी मास इंडेक्स (BMI) है, लेकिन स्टडी के अनुसार असली कारण डाइट क्वालिटी है, न कि सिर्फ वजन.

पहले माना जाता था कि जल्दी पीरियड्स का कारण बॉडी मास इंडेक्स (BMI) है, लेकिन स्टडी के अनुसार असली कारण डाइट क्वालिटी है, न कि सिर्फ वजन.

इसमें एयर पॉल्यूशन और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में मौजूद एंडोक्राइन डिस्टर्प्टर केमिकल्स भी जल्दी पीरियड्स आने का खतरा बढ़ाते हैं.

इसमें एयर पॉल्यूशन और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में मौजूद एंडोक्राइन डिस्टर्प्टर केमिकल्स भी जल्दी पीरियड्स आने का खतरा बढ़ाते हैं.

यह चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि जल्दी पीरियड्स सिर्फ असुविधा नहीं है, यह आगे चलकर हार्ट डिजीज, ब्रेस्ट कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है.

यह चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि जल्दी पीरियड्स सिर्फ असुविधा नहीं है, यह आगे चलकर हार्ट डिजीज, ब्रेस्ट कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है.

अगर इससे बचाव करना है तो बच्चों को ज्यादा फल-सब्जियां खिलाएं, जंक फूड और शक्कर कम करें, पॉल्यूशन वाले दिनों में घर के अंदर खेलने दें और इसके अलावा केमिकल-फ्री स्किनकेयर और हेयर प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करें

अगर इससे बचाव करना है तो बच्चों को ज्यादा फल-सब्जियां खिलाएं, जंक फूड और शक्कर कम करें, पॉल्यूशन वाले दिनों में घर के अंदर खेलने दें और इसके अलावा केमिकल-फ्री स्किनकेयर और हेयर प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करें

Published at : 11 Aug 2025 04:40 PM (IST)

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मेंटल हेल्थ भी बिगाड़ रहा डायबिटीज, जानिए कैसे बन रहा डिप्रेशन का कारण

मेंटल हेल्थ भी बिगाड़ रहा डायबिटीज, जानिए कैसे बन रहा डिप्रेशन का कारण


खराब लाइफस्टाइल और गलत खानपान के बीच डायबिटीज की समस्या आम हो गई है. कम उम्र में ही लोग इस बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं. डायबिटीज के बारे में समझा जाता है कि यह सिर्फ एक फिजिकल बीमारी समझी जाती है, लेकिन यह बीमारी लाइफस्टाइल के साथ मानसिक स्थिति पर गहरा असर डालती है, यह सिर्फ इंसुलिन या दवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ​बीमारी धीरे-धीरे मेंटल हेल्थ को भी प्रभावित करने लगती है.

भारत में आज डायबिटीज के 10 करोड़ से ज्यादा मरीज हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है. बड़ी चिंता की बात यह है कि इस बीमारी का असर मन और दिमाग पर भी दिखने लगा है. लगातार ब्लड शुगर चेक करना, खानपान पर कंट्रोल, दवाओं का दबाव और फ्यूचर स्ट्रेस ये सब मिलकर स्ट्रेस, एंजाइटी और डिप्रेशन की ओर ले जाते हैं. ऐसे में आज हम आपको बताते हैं कि कैसे डायबिटीज मेंटल हेल्थ भी बिगाड़ रहा और कैसे ये डिप्रेशन का कारण बन रहा है.

डायबिटीज और मेंटल हेल्थ

डायबिटीज से पीड़ित लोगों में डिप्रेशन होने का खतरा नॉर्मल लोगों से 2 से 3 गुना ज्यादा होता है. डायबिटीज से जूझ रहे लगभग 30 प्रतिशत लोगों को किसी न किसी रूप में मानसिक परेशानी होती है. टाइप-1 डायबिटीज वाले लोगों में खाने से जुड़ी मानसिक समस्याएं और डिसऑर्डर ज्यादा देखने को मिलते हैं. महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज होने पर बिंज ईटिंग की समस्या आम है. शुगर लेवल में उतार-चढ़ाव के कारण मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन और सोचने में परेशानी होती है.

डायबिटीज मेंटल हेल्थ को कैसे बिगाड़ता है?

1. डायबिटीज स्ट्रेस – यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें मरीज को यह महसूस होने लगता है कि वह अपनी बीमारी को संभाल नहीं पा रहा है. हर रोज ब्लड शुगर की जांच, दवाओं का टाइम, खाने का परहेज जैसे सभी चीजें व्यक्ति को मानसिक रूप से थका देती है.

2. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और हार्मोनल बदलाव – डायबिटीज में शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ जाता है और कुछ जरूरी हार्मोन जैसे सेरोटोनिन और डोपामिन ​इंबैलेंस हो जाते हैं. ये हार्मोन हमारे मूड और मेंटल हेल्थ को कंट्रोल करते हैं. जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तो एंग्जाइटी और डिप्रेशन की संभावना बढ़ जाती है. 

3. फ्यूचर को लेकर डर – कई मरीजों को यह डर सताने लगता है कि कहीं उनकी स्थिति और ना बिगड़ जाए जैसे हार्ट प्रॉब्लम, किडनी फेल होना, या आंखों की रोशनी जाना, ये डर एक समय बाद क्रॉनिक एंग्जाइटी का रूप ले लेता है. 

कैसे डायबिटीज डिप्रेशन का कारण बन रहा है?

डायबिटीज के मरीज को हर दिन ब्लड शुगर चेक करना होता है. टाइम पर दवा लेनी होती है, खाना-पीना कंट्रोल करना होता है# एक्सरसाइज करनी होती है, ये सब लगातार करने से मेंटल फैटिग्यू होती है, जिससे व्यक्ति तनाव और चिंता महसूस करता है. इसके अलावा ब्लड शुगर जब बहुत ज्यादा या बहुत कम होता है तो भी चिड़चिड़ापन, थकान, ध्यान की कमी और मूड स्विंग्स होते हैं. ये सभी लक्षण मेंटल हेल्थ पर असर डालते हैं, और व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर बना देते हैं. वहीं लाइफस्टाइल में बदलाव जैसे पसंद का खाना छोड़ना, मीठे से परहेज, बाहर घूमने-खाने में सावधानी, काम में रुकावट, इससे व्यक्ति को ऐसा लगता है कि उसे कंट्रोल किया जा रहा है जो स्ट्रेस और डिप्रेशन का कारण बन जाता है.

डायबिटीज में कैसे बचा जाए डिप्रेशन से?

1. मेंटल हेल्थ चेकअप कराएं – जिस तरह शुगर की नियमित जांच होती है, वैसे ही मेंटल हेल्थ स्क्रीनिंग भी जरूरी है. इससे समस्या का जल्दी पता लग सकता है. 

2. थेरेपी लें – CBT  डिप्रेशन और एंग्जायटी में काफी असरदार होती है. इसके अलावा परिवारिक काउंसलिंग भी मददगार होती है ताकि आपकी फैमिली को भी आपकी स्थिति की समझ हो. 

3. योग, मेडिटेशन और रिलैक्सेशन अपनाएं – इनसे शरीर और दिमाग को शांत रखने में मदद मिलती है. योग में प्राणायाम और अनुलोम-विलोम विशेष रूप से फायदेमंद हैं.

4. नियमित एक्सरसाइज और सही खानपान – एक्सरसाइज से एंडॉर्फिन रिलीज होता है जो मूड बेहतर करता है. साथ ही डाइट को लेकर बैलेंस रखें ताकि खुद पर ज्यादा दबाव न महसूस हो.

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डायबिटीज और हाई बीपी से जान गंवाने वालों के अंग भी होंगे ट्रांसप्लांट! जानें क्या प्लान बना रहे

डायबिटीज और हाई बीपी से जान गंवाने वालों के अंग भी होंगे ट्रांसप्लांट! जानें क्या प्लान बना रहे


अब तक, अंगदान (Organ Donation) के मामले में अगर मृतक व्यक्ति को डायबिटीज (मधुमेह) या हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) की बीमारी रही हो, तो आमतौर पर उसके अंग ट्रांसप्लांट के लिए कम ही स्वीकार किए जाते थे. लेकिन हाल ही में, Indian Society for Organ Transplantation (ISOT) ने पहली बार एक विस्तृत रिपोर्ट जारी कर कहा है कि ऐसे अंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है, बशर्ते वे सही हालत में हों और मेडिकल मानकों पर खरे उतरें.

रिपोर्ट में क्या कहा गया

ISOT की रिपोर्ट, जो Lancet Regional – South-East Asia में प्रकाशित हुई है, में बताया गया है कि भारत में इस तरह का पर्याप्त डेटा नहीं है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, 15-20 प्रतिशत मृतक अंगदाताओं को हाई ब्लड प्रेशर और 2-8 प्रतिशत को डायबिटीज होती है. अमेरिका के USRDS और UNOS डेटाबेस से मिले प्रमाण बताते हैं कि इन मामलों में किडनी ट्रांसप्लांट के बाद प्राथमिक नॉन-फंक्शन, तीव्र रिजेक्शन या डिलेयड ग्राफ्ट फंक्शन (DGF) का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है. हालांकि, कुल मिलाकर ग्राफ्ट सर्वाइवल पर असर मामूली होता है.

Times of India से बातचीत में वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट और ISOT रिपोर्ट के सह-लेखक डॉ. दिनेश खुल्लर ने कहा, “सिर्फ इस आधार पर कि मृतक को डायबिटीज थी, अंग को तुरंत खारिज करना गलत है. हमारी टीम ने एक स्क्रीनिंग क्राइटेरिया सुझाया है, जिससे तय किया जा सके कि डायबिटिक डोनर की किडनी इस्तेमाल के लिए सुरक्षित है या नहीं. डॉक्टरों को चाहिए कि हर केस में दाता के अंग और रिसीपिएंट की स्थिति का अलग-अलग मूल्यांकन करें और फिर निर्णय लें.”

डायबिटीज और हाई बीपी का असर

अनियंत्रित डायबिटीज समय के साथ किडनी की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती है, जिससे किडनी की फिल्टर करने की क्षमता घट सकती है. वहीं, हाई ब्लड प्रेशर भी किडनी पर दबाव बढ़ाकर इसे और कमजोर कर देता है. इसके बावजूद, सभी मामलों में अंग अनुपयोगी नहीं होते. कई बार अंग पूरी तरह स्वस्थ भी मिलते हैं.

इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलियरी साइंसेज के डायरेक्टर डॉ. शिव सारिन ने भी Times of India से कहा, “डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या यहां तक कि कैंसर का इतिहास रखने वाले मृतक दाताओं के अंग भी ट्रांसप्लांट के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं, लेकिन हर केस का अलग-अलग मूल्यांकन जरूरी है. अगर डोनर को डायबिटीज थी, तो लिवर बायोप्सी करके उसमें फाइब्रोसिस और फैट की जांच करनी चाहिए, क्योंकि एक-तिहाई मामलों में लिवर अनुपयोगी निकल सकता है. इसी तरह, हाई बीपी वाले डोनर से किडनी लेने में सावधानी बरतनी चाहिए. जहां तक कैंसर का सवाल है, अगर डोनर को इलाज के बाद दो साल से ज्यादा समय तक बीमारी नहीं लौटी है, तो उसका अंग इस्तेमाल किया जा सकता है.”

क्यों जरूरी है यह बदलाव

विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई सोच से अंगदान की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है. इससे ट्रांसप्लांट के इंतजार में बैठे हजारों मरीजों को नई जिंदगी मिल सकेगी. हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि ट्रांसप्लांट से पहले सख्त मेडिकल टेस्टिंग और व्यक्तिगत केस-बाय-केस मूल्यांकन किया जाए. 

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कैसे पता लगाएं कि आपकी किडनी में हो गया स्टोन? एक्सपर्ट्स ने बता दिए लक्षण और सारे सिग्नल

कैसे पता लगाएं कि आपकी किडनी में हो गया स्टोन? एक्सपर्ट्स ने बता दिए लक्षण और सारे सिग्नल


किडनी हमारे शरीर का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो खून को साफ करने, अतिरिक्त पानी और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है. लेकिन कई बार इसमें छोटे-छोटे ठोस टुकड़े बन जाते हैं, जिन्हें किडनी स्टोन या गुर्दे की पथरी कहा जाता है. ये आकार में रेत के दाने जितने छोटे भी हो सकते हैं और कंकड़ जैसे बड़े भी. अगर समय पर इलाज न हो, तो ये बहुत ज्यादा दर्द और गंभीर परेशानी का कारण बन सकते हैं.

किडनी स्टोन के आम लक्षण

  • तेज दर्द: पीठ, कमर या पेट के निचले हिस्से में अचानक और असहनीय दर्द होना.
  • पेशाब में दर्द: पेशाब करते समय जलन या चुभन महसूस होना.
  • पेशाब का रंग बदलना: लाल, गुलाबी या भूरा पेशाब, जो खून की वजह से हो सकता है.
  • बार-बार पेशाब आना: खासकर रात में बार-बार पेशाब की जरूरत महसूस होना.
  • पेशाब में दुर्गंध: बदबूदार या धुंधला पेशाब आना.
  • उल्टी और मतली: दर्द के साथ उल्टी या जी मिचलाना.
  • बुखार और ठंड लगना: अगर स्टोन के कारण संक्रमण हो गया है, तो बुखार आना.

विशेषज्ञ की राय

Dr. Prashant C. Dheerendra, Consultant Nephrologist at Apollo Hospitals, Bannerghatta Road, Bengaluru ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि
“किडनी स्टोन एक आम समस्या है, लेकिन यह लाइफस्टाइल और खानपान में बदलाव से काफी हद तक रोकी जा सकती है. समय पर पानी पीना, सही डाइट लेना और ज्यादा नमक व प्रोसेस्ड फूड से बचना जरूरी है. अगर लक्षण गंभीर हों, जैसे तेज दर्द, पेशाब में खून या पेशाब बंद हो जाना, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.”

डॉक्टर कब दिखाएं

यदि दर्द बहुत तेज हो, पेशाब में खून आए, बुखार हो, उल्टी के साथ पेशाब बिल्कुल बंद हो जाए, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं. कई बार छोटे स्टोन खुद ही पेशाब के साथ निकल जाते हैं, लेकिन बड़े स्टोन के लिए दवाओं या सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है.

किडनी स्टोन से बचाव के तरीके

  • पर्याप्त पानी पिएं: रोजाना कम से कम 8-10 गिलास पानी पीना जरूरी है.
  • नमक और जंक फूड कम करें: ज्यादा सोडियम और प्रोसेस्ड फूड किडनी स्टोन का खतरा बढ़ाते हैं.
  • संतुलित आहार लें: कैल्शियम, मैग्नीशियम और फाइबर से भरपूर डाइट लें.
  • पेशाब न रोकें: लंबे समय तक पेशाब रोकना हानिकारक हो सकता है.
  • नियमित स्वास्थ्य जांच: अगर पहले कभी किडनी स्टोन हो चुका है, तो नियमित जांच कराते रहें.

किडनी स्टोन एक ऐसी समस्या है, जिसे सही खानपान, पर्याप्त पानी और समय पर जांच से रोका जा सकता है. अगर लक्षण नजर आएं, तो लापरवाही न करें और तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लें. समय रहते उठाए गए कदम आपको दर्द और जटिलताओं से बचा सकते हैं.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सौंफ के पानी से पेट की बढ़ती चर्बी करें कम, रोजाना इस समय करें सेवन

सौंफ के पानी से पेट की बढ़ती चर्बी करें कम, रोजाना इस समय करें सेवन


Fennel Water for Belly Fat: पेट की बढ़ती चर्बी न केवल आपकी पर्सनैलिटी को खराब करती है, बल्कि यह कई बीमारियों की जड़ भी बन सकती है. जिम और डाइटिंग करने के बाद भी अगर पेट की चर्बी कम नहीं हो रही है, तो किचन में रखा एक छोटा-सा मसाला आपकी मदद कर सकता है, सौंफ. यह साधारण-सी दिखने वाली हरी सौंफ सिर्फ माउथ फ्रेशनर ही नहीं, बल्कि पेट की चर्बी गलाने में भी असरदार मानी जाती है. 

सौंफ क्यों है फायदेमंद?

डॉ. शालिनी सिंह के अनुसार, सौंफ में फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कई जरूरी मिनरल्स पाए जाते हैं, जो मेटाबॉलिज्म को तेज करते हैं. तेज मेटाबॉलिज्म का मतलब है कि, आपका शरीर ज्यादा कैलोरी बर्न करेगा, जिससे फैट कम करने में मदद मिलती है. सौंफ में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पेट की सूजन कम करते हैं और पाचन को मजबूत बनाते हैं, जिससे ब्लोटिंग की समस्या भी घटती है.

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सौंफ का पानी कैसे बनाएं?

  • रात को भिगोकर – एक गिलास पानी में 1 चम्मच सौंफ डालकर रातभर भिगो दें
  • सुबह छानकर पिएं – सुबह खाली पेट इस पानी को छानकर पी लें
  • गुनगुना पानी – चाहें तो हल्का गुनगुना करके भी पी सकते हैं, जिससे पाचन पर और अच्छा असर पड़ता है

कब और कैसे पिएं?

  • सुबह खाली पेट – मेटाबॉलिज्म एक्टिवेट करने के लिए यह सबसे अच्छा समय है
  • भोजन के बाद – पाचन सुधारने और गैस की समस्या कम करने के लिए
  • सोने से पहले – हल्का पाचन बढ़ाने और डिटॉक्स इफेक्ट के लिए

पेट की चर्बी कम करने में कैसे मदद करता है?

  • मेटाबॉलिज्म बढ़ाता है – जिससे शरीर ज्यादा कैलोरी जलाता है
  • पानी की कमी नहीं होने देता – जिससे शरीर का डिटॉक्स प्रोसेस बेहतर होता है
  • पाचन तंत्र मजबूत करता है – खाने से प्राप्त पोषक तत्व सही तरह से अवशोषित होते हैं और फैट स्टोरेज कम होता है
  • ब्लोटिंग घटाता है – सूजन और गैस कम होकर पेट सपाट दिखने लगता है

क्या-क्या फायदा मिल सकता है 

  • ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मददगार
  • आंखों की रोशनी के लिए अच्छा
  • गर्मियों में शरीर को ठंडक प्रदान करता है
  • मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द और सूजन को कम करता है

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सौंफ चबाना ज्यादा अच्छा या सौंफ का पानी पीना, जान लें सेहत के लिए कौन-सा ऑप्शन ज्यादा अच्छा?

सौंफ चबाना ज्यादा अच्छा या सौंफ का पानी पीना, जान लें सेहत के लिए कौन-सा ऑप्शन ज्यादा अच्छा?


सौंफ, जिसे हम सभी ‘सौंफ’ या ‘सौंफ दाना’ के नाम से जानते हैं, भारतीय रसोई का एक आम हिस्सा है. यह न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है. आयुर्वेद और घरेलू नुस्खों में सौंफ का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है. इसे पाचन सुधारने, शरीर को डिटॉक्स करने और कई छोटी-बड़ी परेशानियों में राहत देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. सौंफ को दो तरीकों से लिया जाता है. कच्ची सौंफ चबाकर या सौंफ का पानी पीकर. दोनों तरीके फायदेमंद हैं, लेकिन इनके असर थोड़े अलग होते हैं. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि किस तरह आपके लिए बेहतर है.

सौंफ चबाने के फायदे

कच्ची सौंफ चबाने से इसके ज़रूरी तेल (Essential Oils) सीधे मुंह में निकलते हैं, जिससे पाचन की प्रक्रिया तुरंत शुरू हो जाती है. यह पाचक एंजाइम्स को सक्रिय करता है, जिससे खाना जल्दी और सही तरह से पचता है. पाचन में सुधार भारी या तैलीय खाना खाने के बाद सौंफ चबाने से गैस, एसिडिटी और बदहजमी में आराम मिलता है. भूख कंट्रोल और वजन मैनेजमेंट, इसमें मौजूद फाइबर पाचन को धीमा करता है और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराता है, जिससे बार-बार खाने की आदत कम होती है.पोषक तत्वों का पूरा फायदा इस तरह हैं कि अगर आप इसको चबाते हैं तो चबाने से सौंफ का फाइबर, मिनरल्स और ऑयल्स सब शरीर को मिलते हैं, जो पानी में भिगोकर पीने पर कुछ कम हो जाते हैं. इसके अलावा बेहतरीन ब्रीथ फ्रेशनर के तौर पर यह मुंह की बदबू तुरंत दूर करता है.  दिल्ली स्थित न्यूट्रीवेलनेस क्लिनिक की डॉ. रिचा शर्मा का कहना है कि सौंफ में एंटीऑक्सिडेंट्स और फाइबर होते हैं. खाने के बाद चबाने से पाचन बेहतर होता है, सूजन कम होती है और हार्मोन संतुलन में मदद मिलती है.  उन्होंने बताया कि सौंफ के बीज चबाने से पाचन सुधारता है, गैस, अम्लता और बदबू दूर होती है और यह पेट को आराम देता है.

कब चबाएं?

  • खाने के तुरंत बाद
  • सोने से पहले
  • सफर में, तुरंत पाचन या सांस ताज़ा करने के लिए

सौंफ का पानी पीने के फायदे

सौंफ का पानी शरीर को हाइड्रेट करता है और साथ ही डिटॉक्स भी करता है. इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और डायूरेटिक गुण शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालते हैं और लीवर-किडनी को स्वस्थ रखते हैं. वजन घटाने में मदद, यह पानी मेटाबॉलिज्म बढ़ाता है, पानी रिटेंशन कम करता है और भूख पर काबू करता है. पेट की जलन और कब्ज से राहत मिलता है खासतौर पर गुनगुना सौंफ पानी पेट को आराम देता है और पाचन में मदद करता है. हार्मोन संतुलन और पीरियड्स में राहत सौंफ में मौजूद फाइटोएस्ट्रोजन मासिक धर्म के दर्द और हार्मोनल बदलाव को संतुलित करने में मदद करता है. त्वचा में निखार के तौर पर डिटॉक्स इफेक्ट से चेहरे पर ग्लो आता है और सूजन कम होती है.

कब पिएं?

  • सुबह खाली पेट
  • खाने से पहले या बाद में
  • गर्मियों में ठंडा करके, ताजगी के लिए

कौन-सा तरीका बेहतर?

  • अगर आप तुरंत पाचन और ब्रीथ फ्रेशनिंग चाहते हैं, तो सौंफ चबाना सही है.
    अगर आपका लक्ष्य डिटॉक्स, वजन कम करना, हार्मोन बैलेंस और त्वचा सुधारना है, तो सौंफ का पानी पीना ज्यादा फायदेमंद रहेगा.
    सबसे अच्छा तरीका है. दोनों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना.
  • सुबह खाली पेट एक गिलास सौंफ का पानी पिएं
  • दिन में या खाने के बाद 1-2 चम्मच सौंफ चबाएं

जरूर बरतें ये सावधानियां

  • रोज 1–2 चम्मच से ज्यादा सौंफ न लें.
  • प्रेग्नेंट महिलाएं नियमित सेवन से पहले डॉक्टर से सलाह लें.
  • अगर आपको गाजर, अजवाइन या मोगवॉर्ट से एलर्जी है तो सौंफ से भी एलर्जी हो सकती है.
  • इस तरह सौंफ चाहे चबाकर लें या पानी के रूप में, यह आपके पाचन, वजन, हार्मोन और त्वचा, सबके लिए एक छोटा सा लेकिन असरदार हेल्थ बूस्टर है.

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