कैंसर के इलाज में बड़ी छलांग, भारत में बना AI अब बताएगा ट्यूमर का असली खेल

कैंसर के इलाज में बड़ी छलांग, भारत में बना AI अब बताएगा ट्यूमर का असली खेल



कैंसर के इलाज को ज्यादा पर्सनलाइज्ड बनाने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है. भारत में एक नई रिसर्च में ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फ्रेमवर्क डिवेलप किया गया है, जो कैंसर की कोशिकाओं के भीतर होने वाली जटिल गतिविधियों को पढ़कर बता सकता है कि ट्यूमर किस वजह से बढ़ रहा है और मरीज के शरीर में कौन-सी खतरनाक प्रक्रियाएं एक्टिव हैं?

कैंसर को समझने का पुराना तरीका अब काफी नहीं!

अब तक डॉक्टर कैंसर का मूल्यांकन उसके आकार, फैलाव और स्टेज के आधार पर करते रहे हैं, लेकिन एक ही स्टेज वाले दो मरीजों का रिजल्ट कई बार अलग निकलता है, क्योंकि ट्यूमर के भीतर चलने वाली मॉलिक्यूलर प्रक्रियाओं को ये स्टेजिंग सिस्टम पहचान नहीं पाते. नई AI तकनीक इसी कमी को पूरा करती है. यह कैंसर को उसकी ‘मॉलिक्यूलर पर्सनैलिटी’ के आधार पर समझती है, न कि सिर्फ उसके आकार या फैलाव से.

कैंसर के सिग्नल्स को पढ़ने वाला पहला AI फ्रेमवर्क

SN Bose National Centre for Basic Sciences और Ashoka University की टीम ने मिलकर OncoMark नाम का AI फ्रेमवर्क बनाया है. यह पहली ऐसी तकनीक है, जो कैंसर के हॉलमार्क्स जैसे मेटास्टेसिस, इम्यून सिस्टम से बच निकलना, जीन अस्थिरता और थैरेपी रेसिस्टेंस को सटीक रूप से पहचान सकती है. इस रिसर्च टीम का नेतृत्व डॉ. शुभाशिस हलदार और डॉ. देबयान गुप्ता ने किया.

14 तरह के कैंसर पर की गई रिसर्च

शोधकर्ताओं ने 14 प्रकार के कैंसर से ली गई 31 लाख कोशिकाओं का डेटा AI में डाला. AI ने इन पर काम करके ‘प्सूडो-बायोप्सी’ तैयार कीं, जिनसे यह समझ आया कि कौन-सा ट्यूमर किन बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं से संचालित हो रहा है. यह पहली बार है, जब वैज्ञानिक मॉलिक्यूलर लेवल पर देख पाए हैं कि कैंसर स्टेज बढ़ने के साथ हॉलमार्क एक्टिविटीज कैसे बढ़ती जाती हैं.

कैसा रहा रिजल्ट?

OncoMark ने इंटरनल टेस्टिंग में 99% से ज्यादा सटीकता हासिल की. 5 स्वतंत्र समूहों में भी इसकी सटीकता 96% से ऊपर रही. 20,000 असली मरीजों के नमूनों पर वैलिडेशन के बाद शोधकर्ताओं ने इसे व्यापक रूप से उपयोग योग्य बताया है.

नई तकनीक से होंगे ये फायदे

  • पता चलेगा कि मरीज में कौन-सा हॉलमार्क सक्रिय है. इससे कैंसर की असली वजह पर सीधे निशाना साधने वाली दवा या थैरेपी चुनी जा सकेगी.
  • ऐसे ट्यूमर की पहचान होगी, जो दिखने में कम खतरनाक लेकिन अंदर से तेजी से बढ़ रहे हों. ऐसे मामलों में पहले से इंटरवेशन करके मरीज की जान बचाई जा सकती है.

क्या होगा फायदा?

विशेषज्ञों की मानें तो यह सिस्टम उन मरीजों की भी मदद करेगा, जिनका कैंसर पारंपरिक स्टेजिंग सिस्टम में हल्का दिखता है, लेकिन असल में कहीं ज्यादा आक्रामक होता है. यह रिसर्च Communications Biology (Nature Publishing Group) में प्रकाशित हुई है. भारत की इस उपलब्धि को कैंसर रिसर्च में बड़ा कदम माना जा रहा है, जो आने वाले समय में टार्गेटेड थैरेपी और पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन को नई दिशा दे सकता है.

इसे भी पढ़ें: डॉक्टर के सामने अचानक क्यों बढ़ जाता है मरीज या सही सलामत इंसान का ब्लड प्रेशर? जान लें वजह

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये चीजें तुरंत खाना छोड़ दें महिलाएं, वरना कभी नहीं बन पाएंगी मां!

ये चीजें तुरंत खाना छोड़ दें महिलाएं, वरना कभी नहीं बन पाएंगी मां!



Impact Of Junk Food On Fertility: फर्टिलिटी का मतलब है कि शरीर की नेचुरल क्षमता गर्भधारण करने और संतान पैदा करने की. उम्र, जेनेटिक्स और कई मेडिकल समस्याएं इसका असर तय करती हैं. कई कारण हमारे हाथ में नहीं होते, लेकिन कुछ आदतें और लाइफस्टाइल चॉइस ऐसी होती हैं, जिन्हें बदलकर इनफर्टिलिटी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. यह वह स्थिति है जब कोई महिला एक साल तक नियमित और बिना किसी सुरक्षा के संबंध बनाने के बावजूद गर्भधारण नहीं कर पाती. अधिकतर मामलों में कोई अलग लक्षण दिखाई नहीं देते. आज कई तरह के इलाज जैसे हार्मोन थेरेपी, IVF आदि उपलब्ध हैं, लेकिन सबसे अच्छा तरीका है कि उन कारणों को कंट्रोल किया जाए जो इनफर्टिलिटी का जोखिम बढ़ाते हैं.

महिलाओं में इनफर्टिलिटी बढ़ाने वाले जोखिम कारक

कुछ महत्वपूर्ण कारण जो गर्भधारण की क्षमता को कमजोर करते हैं, जिसमें-

उम्र- 35 वर्ष के बाद प्रजनन क्षमता तेजी से गिरने लगती है.

स्मोकिंग– धूम्रपान न सिर्फ इनफर्टिलिटी बढ़ाता है, बल्कि गर्भपात का खतरा भी दोगुना करता है.

मोटापा- अधिक वजन हार्मोन बैलेंस बिगाड़ देता है और गर्भधारण मुश्किल बना देता है.

अल्कोहल– नियमित शराब सेवन भी फर्टिलिटी को प्रभावित करता है.

डाइट– पोषक तत्वों की कमी या ईटिंग डिसऑर्डर गर्भधारण में रुकावट बनते हैं.

तनाव– बहुत अधिक मानसिक और शारीरिक तनाव से प्रजनन क्षमता कमजोर पड़ती है.

फास्ट फूड और फर्टिलिटी

इन सभी कारणों को देखकर साफ है कि फास्ट फूड महिलाओं की फर्टिलिटी पर बुरा असर डालता है. लगातार फास्ट फूड खाने से वजन बढ़ता है और शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिलते, जिससे गर्भधारण की संभावना कम हो जाती है. अडिलेड यूनिवर्सिटी की 5600 महिलाओं पर हुई स्टडी में पाया गया कि जो महिलाएं नियमित फास्ट फूड खाती थीं, उनमें इनफर्टिलिटी का जोखिम 8 प्रतिशत से बढ़कर 16 प्रतिशत हो गया. यानी गर्भधारण में समय भी ज्यादा लगता है और शरीर की सेहत भी लगातार कमजोर होती जाती है.

गर्भावस्था में फास्ट फूड खाने के खतरे

गर्भधारण के बाद भी फास्ट फूड कई तरह के जोखिम पैदा करता है:

  • बच्चे में जेनेटिक का खतरा बढ़ता है.
  • असमय प्रसव का जोखिम.
  • जन्म दोष की संभावना बढ़ जाती है.
  • मां का वजन बढ़ने से मिसकैरेज और स्टिलबर्थ का खतरा.
  • बच्चे में एलर्जी और अस्थमा का खतरा.
  • गेस्टेशनल डायबिटीज का बढ़ा हुआ जोखिम.

प्रोसेस्ड मीट

सॉसेज, बेकन, हॉट डॉग जैसे प्रोसेस्ड मांस पुरुषों और महिलाओं, दोनों की प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं. गर्भधारण की कोशिश कर रही महिलाओं के लिए ये चीजें पूरी तरह से छोड़ देना ही बेहतर है. इन मांस उत्पादों में हानिकारक फैट के साथ-साथ नाइट्रेट और नाइट्राइट जैसे प्रिजर्वेटिव होते हैं, जो शरीर के हार्मोनल संतुलन और प्रजनन क्षमता को कमजोर करते हैं.

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सुबह उठकर सूखा-सूखा लगता है गला, शरीर में हो सकती है ये दिक्कत

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Dry Throat In Morning: सुबह उठते ही गले में सूखापन या खराश महसूस होना सिर्फ एक असहज शुरुआत नहीं है. यह शरीर का संकेत भी हो सकता है कि अंदर कुछ ठीक नहीं चल रहा. इसकी वजह हमारा सोने का तरीका हो सकता है, कमरे की हवा या फिर शरीर का अंदरूनी बैलेंस. अगर असली कारण समझ आ जाए, तो लंबे समय तक चलने वाले गले के दर्द या नींद से जुड़ी दिक्कतों से बचा जा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह किन-किन कारणों के चलते होता है. 

नींद में मुंह से सांस लेना

सुबह गला सूखा होने की सबसे आम, लेकिन अनदेखी वजह है मुंह से सांस लेना. जब हम नाक की बजाय मुंह से सांस लेते हैं, तो हवा सीधे गले की नाजुक परतों पर गुजरती है और उन्हें सुखा देती है. ‘Annals’ में प्रकाशित एक स्टडी बताती है कि कई बार नाक बंद होना, टेढ़ी नाक की हड्डी या स्लीप एप्निया जैसी समस्याएं मुंह से सांस लेने की वजह बनती हैं. लंबे समय में इससे गले में जलन और बदबूदार सांस की परेशानी भी बढ़ सकती है.

रात में एसिड रिफ्लक्स का ऊपर आना

कई बार गला सूखने की वजह सांस नहीं, बल्कि पेट का एसिड होता है. नींद के दौरान एसिड ईसोफेगस से ऊपर उठकर गले तक पहुंच जाए, तो सुबह जलन और सूखापन महसूस होता है. NIH की 2024 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 20 प्रतिशत रिफ्लक्स रोगियों में लेरिंगोफैरिंजियल रिफ्लक्स होता है, जिसमें हार्टबर्न नहीं होता बल्कि गला प्रभावित होता है.

कम पानी पीना या सूखी हवा

दिनभर कम पानी पीना और रात में AC या हीटर में सोना, दोनों ही गले को सूखा बना सकते हैं. नींद में शरीर सांस के साथ नमी खोता है और अगर हवा पहले से ही सूखी हो, तो यह असर और बढ़ जाता है. ResearchGate की एक स्टडी कहती है कि हल्की-सी डिहाइड्रेशन भी लार का उत्पादन कम कर देती है, जिससे गला और ज्यादा सूखने लगता है.

नींद में खर्राटे, घुटन या दिनभर थकान

अगर सूखे गले के साथ खर्राटे, सांस रुकने जैसे झटके या 8 घंटे सोने के बाद भी थकान महसूस हो, तो यह स्लीप एप्निया का संकेत हो सकता है. रिपोर्ट्स के अनुसार स्लीप एप्निया में एयरवे आंशिक रूप से बंद होते हैं, जिससे व्यक्ति मुंह से सांस लेने लगता है और गला लगातार सूखता है.

एलर्जी और पोस्ट-नेजल ड्रिप

मौसमी एलर्जी, धूल या पालतू जानवरों से एलर्जी की वजह से रात में गले में म्यूकस जमा होकर सूखापन और जलन पैदा कर सकता है.

कुछ दवाइयों का असर

एंटीहिस्टामिन, एंटीडिप्रेसेंट या ब्लड प्रेशर की कई दवाइयां लार बनना कम कर देती हैं. लार कम होगी तो रात में गला ज्यादा सूखेगा. NIH के मुताबिक, सैकड़ों दवाइयां ड्राई माउथ और ड्राई थ्रोट का कारण बन सकती हैं.

क्या करें?

  • नई दवा शुरू होने के बाद गला सूख रहा है तो डॉक्टर से बात करें.
  • पानी ज्यादा पिएं और सोने से पहले शुगर-फ्री लॉजेंज इस्तेमाल करें.

सुबह का गला आरामदायक कैसे रखें?

छोटी-छोटी आदतें बहुत फर्क डालती हैं, जैसे नमी वाली हवा, सही मात्रा में पानी, नाक से सांस लेने की कोशिश और सोने से पहले हल्का खाना. लेकिन अगर यह दिक्कत हफ्तों तक बनी रहे या बढ़ती जाए, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें. कई बार लगातार सूखापन थायरॉइड या नींद से जुड़ी गंभीर समस्याओं का संकेत भी हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये 4 नौकरियां सड़ा देती हैं आपकी किडनी, तुरंत ढूंढना शुरू कर दें नई जॉब

ये 4 नौकरियां सड़ा देती हैं आपकी किडनी, तुरंत ढूंढना शुरू कर दें नई जॉब



High-Risk Occupations Kidney: हम रोज काम पर जाते हैं, कई घंटे मेहनत करते हैं, पसीना बहाते हैं और घर पर भी काम खत्म नहीं होता. थकान हो जाना या जॉइंट में दर्द होना तो समझ में आता है, लेकिन हममें से ज्यादातर लोग यह नहीं जानते कि यही रोज का काम धीरे-धीरे किडनी को भी नुकसान पहुंचा सकता है. और सबसे खतरनाक बात यह है कि किडनी अंदर ही अंदर खराब होती रहती है, बिना किसी बड़े लक्षण के.

किन लोगों की होती है किडनी खराब?

ज्यादातर लोगों का मानना है कि किडनी की बीमारी सिर्फ उन लोगों को होती है जिनकी डाइट खराब है, जो ज्यादा मीठा-नमक खाते हैं या जिन्हें शुगर और ब्लड प्रेशर की समस्या है. लेकिन सच्चाई यह है कि कई ऐसे कारण हैं जो चुपचाप रोज आपकी किडनी पर बोझ डालते रहते हैं और आपको पता भी नहीं चलता कि अंदर क्या नुकसान हो रहा है. किडनी खून को साफ रखती है. लेकिन जब उन पर लगातार दबाव बढ़ता है, तो शरीर में गंदगी जमा होने लगती है, जिसे क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD कहा जाता है. कई रिसर्च बताते हैं कि अलग-अलग तरह के काम करने वाले मजदूरों में किडनी फेल होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनकी काम करने की परिस्थितियां ही किडनी के लिए खतरा बन जाती हैं.

किन कामों में हो रही किडनी खराब?

सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जो बहुत ज्यादा गर्म माहौल में काम करते हैं. जैसे कंस्ट्रक्शन साइट, सड़क बनाने का काम, फैक्ट्रियों में भट्ठी के पास, खेतों में धूप में जहां लगातार पसीना निकलता है. ज्यादा पसीना मतलब ज्यादा डिहाइड्रेशन, जिससे किडनी पर सीधा दबाव पड़ता है. समय के साथ यही स्थिति किडनी को नुकसान पहुंचाती है.

इसके अलावा ऐसे काम जहां लोग केमिकल्स या जहरीली गैसों के संपर्क में रहते हैं जैसे पेंट, बैटरी, गोंद, टेनरी और कई फैक्ट्री यूनिट्स वहां मौजूद रसायन धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर किडनी की सेल्स को नष्ट करते हैं. लेड, कैडमियम और मर्करी जैसे भारी धातुएं तो किडनी के लिए सबसे खतरनाक मानी जाती हैं. बैटरी प्लांट, माइनिंग, वेल्डिंग, पेंट और केमिकल उद्योग में काम करने वालों में किडनी को नुकसान का खतरा कई गुना ज्यादा होता है.

कुछ फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट्स, जैसे ट्राइक्लोरोएथिलीन या टोलुईन भी किडनी में धीरे-धीरे ज़हर की तरह असर करते हैं. इनका नुकसान तुरंत नहीं दिखता, लेकिन समय के साथ किडनी की फिल्टरिंग क्षमता कम होने लगती है. रोजाना इन धुएं और रसायनों का संपर्क आपकी किडनी को चुपचाप खोखला करता रहता है.

गर्मी और भारी मेहनत के अलावा, लगातार तनाव वाली नौकरियां भी किडनी को प्रभावित करती हैं. लंबे घंटे काम करना, शिफ्ट बदलते रहना, कम सोना और खाना अनियमित होना, ये सब चीजें ब्लड प्रेशर बढ़ाकर और मेटाबॉलिज्म बिगाड़कर किडनी पर दबाव बढ़ाती हैं. ऑफिस में लगातार तनाव झेलने वाले लोगों में किडनी फंक्शन कम होने के मामले तेजी से देखे जा रहे हैं.

रिसर्च में क्या निकला?

कई रिसर्च तो यह भी बताते हैं कि तेज गर्मी में काम करने वाले मजदूरों में किडनी के Acute Injury के मामले सामान्य लोगों की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं. अमेरिका के खेतों में काम करने वाले मजदूरों में एक ही दिन की मेहनत के बाद किडनी पर असर देखा गया है. वहीं थाईलैंड के एक अध्ययन में पाया गया कि जो लोग गर्म वातावरण में काम करते हैं, उनकी किडनी बीमारी का खतरा 5 गुना बढ़ जाता है.

क्या किया जा सकता है?

 सबसे जरूरी है पानी की कमी ना होने देना. जो लोग धूप या गर्म जगहों पर काम करते हैं, उन्हें हर 20-30 मिनट में पानी या इलेक्ट्रोलाइट लेना चाहिए और बीच-बीच में आराम करना चाहिए. जो लोग रसायनों के बीच काम करते हैं, उन्हें मास्क, ग्लव्स और प्रोटेक्टिव कपड़ों का सही इस्तेमाल करना चाहिए, वेंटिलेशन अच्छा रखना चाहिए और समय-समय पर किडनी का टेस्ट कराना चाहिए. वहीं तनाव में काम करने वाले लोगों को नींद पूरी करना, छोटे-छोटे ब्रेक लेना और जीवनशैली को संतुलित रखना बेहद जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- White Coat Hypertension: डॉक्टर के सामने अचानक क्यों बढ़ जाता है मरीज या सही सलामत इंसान का ब्लड प्रेशर? जान लें वजह

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर में किस विटामिन की है कमी? इन संकेतों से पहचानें

शरीर में किस विटामिन की है कमी? इन संकेतों से पहचानें


कभी-कभी होंठ फटना या मुंह के कोनों में दरारें सिर्फ मौसम या बुखार की वजह से होती हैं, लेकिन कई बार यह विटामिन B की कमी का सीधा संकेत भी हो सकती हैं. ऐसे में कुछ दिनों तक B-कॉम्प्लेक्स लेने से फर्क दिखने लगता है और होंठ फिर से ठीक होने लगते हैं.

हाथों और पैरों में झनझनाहट आना भी एक आम संकेत है जो अक्सर विटामिन B12 की कमी से जुड़ा होता है. इसके साथ जीभ में सूजन, थकान, हल्का पीलापन या कमजोरी भी महसूस हो सकती है. कुछ लोगों को डाइट में B12 वाले खाद्य पदार्थ शामिल करने से आराम मिलता है, जबकि कुछ को इंजेक्शन की जरूरत पड़ जाती है. एक साधारण ब्लड टेस्ट से इसकी पुष्टि की जा सकती है.

हाथों और पैरों में झनझनाहट आना भी एक आम संकेत है जो अक्सर विटामिन B12 की कमी से जुड़ा होता है. इसके साथ जीभ में सूजन, थकान, हल्का पीलापन या कमजोरी भी महसूस हो सकती है. कुछ लोगों को डाइट में B12 वाले खाद्य पदार्थ शामिल करने से आराम मिलता है, जबकि कुछ को इंजेक्शन की जरूरत पड़ जाती है. एक साधारण ब्लड टेस्ट से इसकी पुष्टि की जा सकती है.

कभी-कभी किसी एक पैर में लगातार दर्द बना रहता है. आमतौर पर यह दर्द चोट या मांसपेशी की वजह से माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यह विटामिन B6 की कमी के कारण भी हो सकता है. जब आहार में मछली, चिकन और होल-ग्रेन जैसे B6 वाले खाद्य पदार्थ जोड़े गए, तो दर्द पूरी तरह ठीक हो गया.

कभी-कभी किसी एक पैर में लगातार दर्द बना रहता है. आमतौर पर यह दर्द चोट या मांसपेशी की वजह से माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यह विटामिन B6 की कमी के कारण भी हो सकता है. जब आहार में मछली, चिकन और होल-ग्रेन जैसे B6 वाले खाद्य पदार्थ जोड़े गए, तो दर्द पूरी तरह ठीक हो गया.

रात में साफ दिखाई न देना या रंगों में अंतर महसूस होना कई कारणों से हो सकता है, लेकिन यह विटामिन A की कमी का संकेत भी हो सकता है. ऐसे में गाजर, शकरकंद और पत्तेदार सब्जियां खाने से आंखों की रोशनी को नेचुरल रूप से सपोर्ट मिलता है.

रात में साफ दिखाई न देना या रंगों में अंतर महसूस होना कई कारणों से हो सकता है, लेकिन यह विटामिन A की कमी का संकेत भी हो सकता है. ऐसे में गाजर, शकरकंद और पत्तेदार सब्जियां खाने से आंखों की रोशनी को नेचुरल रूप से सपोर्ट मिलता है.

मांसपेशियों में बार-बार ऐंठन होना अक्सर डिहाइड्रेशन या पोटैशियम की कमी से जुड़ा होता है. तुरंत राहत के लिए इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक काम आती है, लेकिन इसे दोबारा होने से रोकने के लिए रोजाना केला या कोई साइट्रस फल खाना मददगार होता है.

मांसपेशियों में बार-बार ऐंठन होना अक्सर डिहाइड्रेशन या पोटैशियम की कमी से जुड़ा होता है. तुरंत राहत के लिए इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक काम आती है, लेकिन इसे दोबारा होने से रोकने के लिए रोजाना केला या कोई साइट्रस फल खाना मददगार होता है.

नाखूनों का पतला, कमजोर या चम्मच जैसा दिखना यानी ऊपर की ओर मुड़ना आयरन की कमी, यानी एनीमिया का शुरुआती संकेत हो सकता है. ऐसे में डॉक्टर अक्सर आयरन सप्लीमेंट और आयरन युक्त भोजन जैसे सीफूड, लीवर और हरी सब्जियां की सलाह देते हैं.

नाखूनों का पतला, कमजोर या चम्मच जैसा दिखना यानी ऊपर की ओर मुड़ना आयरन की कमी, यानी एनीमिया का शुरुआती संकेत हो सकता है. ऐसे में डॉक्टर अक्सर आयरन सप्लीमेंट और आयरन युक्त भोजन जैसे सीफूड, लीवर और हरी सब्जियां की सलाह देते हैं.

मसूड़ों से खून आना, स्किन का बार-बार सूखना या एक्जिमा जैसे लक्षण कई बार विटामिन C और ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी से जुड़े होते हैं. इन्हें ठीक करने के लिए आहार में मछली, अंडे की जर्दी, अखरोट, चिया सीड्स और अधिक फल-सब्जियां जोड़ना बहुत फायदेमंद है.

मसूड़ों से खून आना, स्किन का बार-बार सूखना या एक्जिमा जैसे लक्षण कई बार विटामिन C और ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी से जुड़े होते हैं. इन्हें ठीक करने के लिए आहार में मछली, अंडे की जर्दी, अखरोट, चिया सीड्स और अधिक फल-सब्जियां जोड़ना बहुत फायदेमंद है.

आखिर में सबसे जरूरी बात यह है कि मल्टीविटामिन से ज्यादा असर असली, प्राकृतिक भोजन करता है. संतुलित और ताजा आहार अपनाने से शरीर को अपनी जरूरत के पोषक तत्व खुद ही मिलने लगते हैं, और इस तरह की कमियां लंबे समय तक टिक नहीं पातीं.

आखिर में सबसे जरूरी बात यह है कि मल्टीविटामिन से ज्यादा असर असली, प्राकृतिक भोजन करता है. संतुलित और ताजा आहार अपनाने से शरीर को अपनी जरूरत के पोषक तत्व खुद ही मिलने लगते हैं, और इस तरह की कमियां लंबे समय तक टिक नहीं पातीं.

Published at : 26 Nov 2025 09:58 AM (IST)

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