शरीर में कितने साल रहने पर HIV वायरस बन जाता है AIDS, जानें कब हो जाता है खतरनाक?

शरीर में कितने साल रहने पर HIV वायरस बन जाता है AIDS, जानें कब हो जाता है खतरनाक?



When HIV Symptoms Start To Appear: HIV यानी ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस एक ऐसा वायरस है जो हमारे शरीर की इम्क्षयून सिस्टम पर हमला करता है. यह खास तौर पर CD4 टी-सेल्स और मैक्रोफेज को निशाना बनाता है, जो शरीर को इंफेक्शन से बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वायरस धीरे-धीरे इन सेल्स को कमजोर करता जाता है, जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटती चली जाती है. जब इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाता है, तो शरीर सामान्य इंफेक्शन से भी लड़ नहीं पाता. ऐसे में कई तरह के रेयर इंफेक्शन और कैंसर आसानी से हमला कर सकते हैं. इन्हें ऑपर्च्युनिस्टिक इंफेक्शंस कहा जाता है, यानी ऐसे इंफेक्शन जो मौके का फायदा उठाते हैं.

AIDS क्या है?

AIDS का मतलब है एक्वायर्ड इम्युनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम. यह HIV इंफेक्शन का सबसे गंभीर स्टेप होता है, जब शरीर का इम्यून सिस्टम काफी हद तक नष्ट हो चुका होता है.  HIV ही AIDS का कारण है, और डॉक्टर इसकी पहचान विशेष तरह के इंफेक्शन और शरीर में आई इम्यून कमी के आधार पर करते हैं.

HIV के शुरुआती लक्षण

अधिकतर लोग HIV होने पर शुरुआत में समझ ही नहीं पाते कि वे इंफेक्टेड हो चुके हैं. कुछ लोगों में शुरुआती दिनों में फ्लू जैसे लक्षण दिख सकते हैं जैसे बुखार, रैश, जोड़ों में दर्द, लिम्फ नोड्स का सूजना. यह दौर सीरो-कन्वर्जन कहलाता है, यानी जब शरीर वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनाना शुरू करता है। यह आमतौर पर संक्रमण के 1से 2 महीने के भीतर होता है.  भले ही लक्षण न दिखें, HIV से इंफेक्टेड व्यक्ति उस समय भी दूसरों को वायरस दे सकता है. HIV का पता केवल HIV टेस्ट से ही चलता है. समय के साथ HIV इम्यून सिस्टम को कमजोर करता रहता है. जब प्रतिरोधक क्षमता बहुत गिर जाती है, तो शरीर बार-बार इंफेक्शन्स का शिकार होता है, और यही स्थिति आगे चलकर AIDS में बदल जाती है

HIV कब AIDS बन जाता है?

Unaids के अनुसार, AIDS, HIV इंफेक्शन का सबसे एडवांस्ड स्टेज है. अगर इलाज न किया जाए, तो अधिकतर मरीज 8 से 10 साल के भीतर AIDS के लक्षण दिखाने लगते हैं. AIDS की पहचान कुछ विशेष इंफेक्शन और लक्षणों के आधार पर होती है-

  • स्टेज 1: बिना लक्षण- इसे AIDS नहीं माना जाता
  • स्टेज 2: त्वचा या म्यूकस की समस्याएं, बार-बार सर्दी-खांसी जैसी इंफेक्शन
  • स्टेज 3: एक महीने से ज्यादा चलने वाला दस्त, गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन, फेफड़ों का टीबी
  • स्टेज 4: गंभीर स्थितियां जैसे ब्रेन का टॉक्सोप्लाजमोसिस, खाने की नली या फेफड़ों में कैंडिडा, कपोसी सारकोमा आदि

ये सभी बीमारियां सामान्य इंसानों में आसानी से ठीक हो जाती हैं, लेकिन कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दियों का सुपरफूड: बथुआ खाने से किडनी और लिवर को मिलेगी नई जान, आचार्य बालकृष्ण ने बताए फायदे

सर्दियों का सुपरफूड: बथुआ खाने से किडनी और लिवर को मिलेगी नई जान, आचार्य बालकृष्ण ने बताए फायदे



Benefits of Eating Bathua in Winter: सर्दियों का मौसम अपने साथ स्वाद और सेहत का खजाना लेकर आता है. इस मौसम में बाजारों में हरी पत्तेदार सब्जियों की बहार आ जाती है. सरसों, मेथी और पालक के अलावा एक और साग है जो गुणों की खान है और वह है ‘बथुआ’. आयुर्वेद विशेषज्ञ आचार्य बालकृष्ण ने सर्दियों में बथुआ खाने के ऐसे चमत्कारी फायदे बताए हैं, जिन्हें जानकर आप आज ही इसे अपनी डाइट का हिस्सा बना लेंगे.

पोषक तत्वों का पावरहाउस 

बथुआ को सर्दियों का ‘सुपरफूड’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. यह छोटा सा दिखने वाला हरा साग अमीनो एसिड, फाइबर और विटामिन्स का भंडार है. इसमें विटामिन A, B और C प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. इसके अलावा, बथुआ आयरन, पोटैशियम, कैल्शियम और फॉस्फोरस जैसे जरूरी मिनरल्स से भी भरपूर होता है. यही कारण है कि भारतीय रसोई में ठंड के दिनों में बथुए का विशेष महत्व है.


आयुर्वेद की नजर में बथुआ 

आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, बथुआ केवल एक सब्जी नहीं बल्कि औषधि है. यह शरीर में वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को संतुलित रखने में मदद करता है. आयुर्वेद में इसे पेट और पाचन तंत्र के लिए अमृत समान माना गया है.

किडनी और लिवर के लिए वरदान 

बथुआ का सबसे बड़ा फायदा हमारे शरीर के ‘फिल्टर’ यानी किडनी और लिवर को मिलता है. यह साग लिवर को डिटॉक्स करने में मदद करता है, जिससे शरीर से विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं. किडनी से जुड़ी समस्याओं में भी बथुआ राहत प्रदान करता है. इसका नियमित सेवन खून को साफ करता है, जिसका सीधा असर हमारी त्वचा पर दिखाई देता है. कील-मुंहासों से छुटकारा मिलता है और चेहरा प्राकृतिक रूप से चमकने लगता है.

पाचन और हड्डियों को मजबूती 

जिन लोगों को पेट की समस्या रहती है, उनके लिए बथुआ रामबाण है. इसमें मौजूद फाइबर और पानी की अधिक मात्रा कब्ज को दूर कर पेट साफ करती है और पाचन क्रिया को सुधारती है. साथ ही, इसमें मौजूद विटामिन C और कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाते हैं. इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी होते हैं जो शरीर में सूजन और चोट को जल्दी ठीक करने में सहायक हैं. आंखों की रोशनी बढ़ाने में भी बथुआ काफी कारगर है, खासकर उन लोगों के लिए जो ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताते हैं.

कैसे करें सेवन? 

बथुए को आप कई तरीकों से खा सकते हैं. इसका जूस खाली पेट पीना सबसे ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. इसके अलावा आप इसे दाल में मिलाकर, इसका रायता बनाकर या फिर इसके स्वादिष्ट पराठे बनाकर भी खा सकते हैं.

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Garlic Benefits: सर्दी में लहसुन है ‘सेहत का खजाना’, आचार्य बालकृष्ण ने बताए गजब के फायदे

Garlic Benefits: सर्दी में लहसुन है ‘सेहत का खजाना’, आचार्य बालकृष्ण ने बताए गजब के फायदे



Benefits of Garlic: सर्दियों का मौसम आते ही खाने-पीने की आदतों में बदलाव जरूरी हो जाता है. इस मौसम में शरीर को गर्म रखने और बीमारियों से बचाने के लिए रसोई में मौजूद चीजें ही औषधि का काम करती हैं. पतंजलि योगपीठ के आचार्य बालकृष्ण ने हाल ही में लहसुन (Garlic) को लेकर कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं. उन्होंने बताया कि लहसुन केवल खाने का जायका बढ़ाने वाला मसाला नहीं है, बल्कि यह सर्दियों में शरीर के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.

दिल और जोड़ों के लिए रामबाण 

आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, अगर लहसुन का सही तरीके से सेवन किया जाए, तो यह दिल की सेहत (Heart Health) के लिए बेहद फायदेमंद है. यह खून में जमा खराब कोलेस्ट्रॉल (Bad Cholesterol) को कम करने में मदद करता है, जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और हार्ट संबंधी बीमारियों का खतरा कम होता है. इसके अलावा, सर्दियों में अक्सर लोगों को जोड़ों के दर्द और जकड़न की शिकायत रहती है. लहसुन का सेवन इन समस्याओं में भी राहत दिलाता है.

इम्यूनिटी बूस्टर और डिटॉक्स 

सर्दियों में इम्यूनिटी कमजोर होने लगती है, जिससे सर्दी-जुकाम जल्दी पकड़ लेता है. लहसुन शरीर की गर्मी को बरकरार रखता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. आचार्य जी बताते हैं कि यह शरीर से विषैले पदार्थों (Toxins) को बाहर निकालने और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में भी मददगार है.

सेवन का सही तरीका लहसुन के फायदों को अधिकतम करने के लिए आचार्य बालकृष्ण ने इसे खाने का एक खास तरीका बताया है:

  • रात में भिगोकर: रात को लहसुन की 1-2 कलियों को छीलकर पानी में भिगो दें. सुबह खाली पेट इस पानी को पी लें या लहसुन की कलियों को चबाकर खाएं. यह तरीका कोलेस्ट्रॉल और बीपी को कंट्रोल करने में सबसे ज्यादा असरदार है.
  • गुनगुने पानी के साथ: आप सुबह खाली पेट 1-2 कच्ची कलियां गुनगुने पानी के साथ भी ले सकते हैं.

दर्द के लिए लहसुन का तेल जोड़ों के दर्द, सूजन या मांसपेशियों की जकड़न के लिए आचार्य जी ने लहसुन के तेल की मालिश की सलाह दी है. इसे बनाने की विधि बहुत सरल है:

  • लगभग 50 ग्राम लहसुन को कूट लें.
  • इसे 100 से 200 ग्राम सरसों, नारियल या जैतून के तेल में पकाएं.
  • जब लहसुन काला पड़ जाए, तो तेल को छानकर रख लें. इस तेल से दर्द वाले हिस्से पर मालिश करने से काफी आराम मिलता है. यह नर्वस सिस्टम को भी मजबूत बनाता है और वात दोष को शांत करता है.

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30 साल उम्र के बाद नजर आएं ये 4 साइन तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना कोलन कैंसर बना लेगा शिकार

30 साल उम्र के बाद नजर आएं ये 4 साइन तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना कोलन कैंसर बना लेगा शिकार


साल 2025 में करीब 1,07,320 नए कोलन कैंसर केस आने का अनुमान था. सबसे बड़ी चिंता यह है कि कोलन कैंसर अब युवाओं में भी तेजी से बढ़ रहा है. आमतौर पर यह 50 साल के बाद देखा जाता है, लेकिन अब कम उम्र के लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं और इसका कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है.

ऐसे में सबसे जरूरी है इसके शुरुआती संकेतों को पहचानना. समय पर लक्षण दिख जाएं तो ठीक जल्दी होता है और इलाज आसान बन जाता है. डॉक्टर लगातार सलाह दे रहे हैं कि छोटी-छोटी चेतावनियों को भी हल्के में न लें.

ऐसे में सबसे जरूरी है इसके शुरुआती संकेतों को पहचानना. समय पर लक्षण दिख जाएं तो ठीक जल्दी होता है और इलाज आसान बन जाता है. डॉक्टर लगातार सलाह दे रहे हैं कि छोटी-छोटी चेतावनियों को भी हल्के में न लें.

एक वायरल इंस्टाग्राम वीडियो में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ सलहाब ने 30 की उम्र में दिखने वाले चार संभावित लक्षण बताए हैं. इन लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरा बढ़ा सकता है, लेकिन इन्हें समय पर पहचानने से जीवन बच सकता है.

एक वायरल इंस्टाग्राम वीडियो में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ सलहाब ने 30 की उम्र में दिखने वाले चार संभावित लक्षण बताए हैं. इन लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरा बढ़ा सकता है, लेकिन इन्हें समय पर पहचानने से जीवन बच सकता है.

पहला संकेत है बेहद थकान. डॉक्टर के अनुसार, कोलन कैंसर धीरे-धीरे खून में कमी ला सकता है, जिससे कमजोरी और ज्यादा नींद आने लगती है. रिसर्च का भी मानता है कि कैंसर से जुड़ी थकान की एक बड़ी वजह एनीमिया ही है.

पहला संकेत है बेहद थकान. डॉक्टर के अनुसार, कोलन कैंसर धीरे-धीरे खून में कमी ला सकता है, जिससे कमजोरी और ज्यादा नींद आने लगती है. रिसर्च का भी मानता है कि कैंसर से जुड़ी थकान की एक बड़ी वजह एनीमिया ही है.

दूसरा संकेत है रात में पसीना. डॉक्टर बताते हैं कि कैंसर सेल्स इंफ्लेमेटरी प्रोटीन छोड़ते हैं, जिससे शरीर में हल्का बुखार और रात में पसीना आने लगता है. कई रिपोर्टों में यह बताया गया है कि कैंसर से जुड़े नाइट स्वेट्स अक्सर बहुत तेज और असामान्य होते हैं.

दूसरा संकेत है रात में पसीना. डॉक्टर बताते हैं कि कैंसर सेल्स इंफ्लेमेटरी प्रोटीन छोड़ते हैं, जिससे शरीर में हल्का बुखार और रात में पसीना आने लगता है. कई रिपोर्टों में यह बताया गया है कि कैंसर से जुड़े नाइट स्वेट्स अक्सर बहुत तेज और असामान्य होते हैं.

तीसरा बड़ा संकेत है बॉवेल हैबिट में बदलाव, जैसे अचानक कब्ज या दस्त बढ़ जाना. यह आमतौर पर कैंसर से बनने वाले ब्लॉकेज के कारण होता है. मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, पेट दर्द, दस्त, कब्ज ये सभी कोलोरेक्टल कैंसर के संकेत हो सकते हैं.

तीसरा बड़ा संकेत है बॉवेल हैबिट में बदलाव, जैसे अचानक कब्ज या दस्त बढ़ जाना. यह आमतौर पर कैंसर से बनने वाले ब्लॉकेज के कारण होता है. मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, पेट दर्द, दस्त, कब्ज ये सभी कोलोरेक्टल कैंसर के संकेत हो सकते हैं.

चौथा और सबसे अहम संकेत है स्टूल में खून. डॉक्टर इसे  कोलन कैंसर का क्लासिक निशान बताते हैं. जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के अनुसार, मल में खून आना अक्सर कोलन या रेक्टम में कहीं से ब्लीडिंग का संकेत होता है. अगर यह बार-बार हो, तो इसे हल्के में बिल्कुल नहीं लेना चाहिए.

चौथा और सबसे अहम संकेत है स्टूल में खून. डॉक्टर इसे कोलन कैंसर का क्लासिक निशान बताते हैं. जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के अनुसार, मल में खून आना अक्सर कोलन या रेक्टम में कहीं से ब्लीडिंग का संकेत होता है. अगर यह बार-बार हो, तो इसे हल्के में बिल्कुल नहीं लेना चाहिए.

युवाओं में बढ़ते मामलों को देखते हुए, इन छोटे लेकिन गंभीर संकेतों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. समय पर पहचान न सिर्फ कैंसर पकड़ने में मदद करती है, बल्कि इलाज के नतीजों को भी बेहतर बनाती है.

युवाओं में बढ़ते मामलों को देखते हुए, इन छोटे लेकिन गंभीर संकेतों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. समय पर पहचान न सिर्फ कैंसर पकड़ने में मदद करती है, बल्कि इलाज के नतीजों को भी बेहतर बनाती है.

Published at : 05 Dec 2025 12:41 PM (IST)

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गलती से भी मत पी लेना ये 4 ड्रिंक, वरना खराब हो जाएगी आपकी किडनी

गलती से भी मत पी लेना ये 4 ड्रिंक, वरना खराब हो जाएगी आपकी किडनी


रिसर्च भी यही बताती है कि ज्यादा कोला पीने से पेशाब की रसायनिक संरचना बदलती है और स्टोन बनने का खतरा बढ़ता है. इसलिए डार्क सोडा कम करना या छोड़ देना किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकता है. पानी और हाइड्रेशन यहां सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

बेहतर विकल्प के तौर पर नींबू या लाइम वाले स्पार्कलिंग वॉटर की सलाह दी जाती है. इससे फिज भी मिलता है और मिनरल बैलेंस या ज्यादा चीनी जैसी परेशानियों से भी बचा जा सकता है.

बेहतर विकल्प के तौर पर नींबू या लाइम वाले स्पार्कलिंग वॉटर की सलाह दी जाती है. इससे फिज भी मिलता है और मिनरल बैलेंस या ज्यादा चीनी जैसी परेशानियों से भी बचा जा सकता है.

एनर्जी ड्रिंक्स में कैफीन, चीनी और स्टिमुलेंट्स इतनी मात्रा में होते हैं कि किडनी पर तेज दबाव पड़ता है. ज्यादा कैफीन पेशाब बढ़ाकर डिहाइड्रेशन करता है, जिससे किडनी को गाढ़ा खून फिल्टर करने में परेशानी होती है.

एनर्जी ड्रिंक्स में कैफीन, चीनी और स्टिमुलेंट्स इतनी मात्रा में होते हैं कि किडनी पर तेज दबाव पड़ता है. ज्यादा कैफीन पेशाब बढ़ाकर डिहाइड्रेशन करता है, जिससे किडनी को गाढ़ा खून फिल्टर करने में परेशानी होती है.

ज्यादा शुगर वाले एनर्जी ड्रिंक्स BP बढ़ाते हैं और किडनी का मेटाबॉलिक बोझ तेज कर देते हैं. सामान्य कॉफी नुकसान नहीं करती, लेकिन ज्यादा कैफीन या शुगर मिलाने से किडनी पर दबाव कई गुना बढ़ जाता है.

ज्यादा शुगर वाले एनर्जी ड्रिंक्स BP बढ़ाते हैं और किडनी का मेटाबॉलिक बोझ तेज कर देते हैं. सामान्य कॉफी नुकसान नहीं करती, लेकिन ज्यादा कैफीन या शुगर मिलाने से किडनी पर दबाव कई गुना बढ़ जाता है.

ऐसे ड्रिंक्स इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बिगाड़ते हैं, क्रिएटिनिन बढ़ा सकते हैं और लंबे समय में स्टोन तथा किडनी फंक्शन कम करने का खतरा पैदा करते हैं. अच्छी क्वालिटी की कॉफी सीमित मात्रा में और बिना शुगर पीना सुरक्षित माना जाता है.

ऐसे ड्रिंक्स इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बिगाड़ते हैं, क्रिएटिनिन बढ़ा सकते हैं और लंबे समय में स्टोन तथा किडनी फंक्शन कम करने का खतरा पैदा करते हैं. अच्छी क्वालिटी की कॉफी सीमित मात्रा में और बिना शुगर पीना सुरक्षित माना जाता है.

स्पोर्ट्स ड्रिंक्स असली तौर पर भारी वर्कआउट के लिए बनाए गए थे, लेकिन इन्हें रोजाना पीने से किडनी पर अनावश्यक बोझ पड़ता है. इनमें चीनी, आर्टिफिशियल स्वीटनर और डाई होते हैं, जिनकी फिल्टरिंग किडनी के लिए मुश्किल होती है.

स्पोर्ट्स ड्रिंक्स असली तौर पर भारी वर्कआउट के लिए बनाए गए थे, लेकिन इन्हें रोजाना पीने से किडनी पर अनावश्यक बोझ पड़ता है. इनमें चीनी, आर्टिफिशियल स्वीटनर और डाई होते हैं, जिनकी फिल्टरिंग किडनी के लिए मुश्किल होती है.

स्मूदी को लोग हेल्दी समझते हैं, लेकिन ज्यादा पालक, केल और नट्स से ऑक्सालेट की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. इससे कैल्शियम ऑक्सालेट स्टोन बनने का खतरा बढ़ता है और नेचुरल शुगर भी किडनी पर लोड बढ़ाती है.

स्मूदी को लोग हेल्दी समझते हैं, लेकिन ज्यादा पालक, केल और नट्स से ऑक्सालेट की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. इससे कैल्शियम ऑक्सालेट स्टोन बनने का खतरा बढ़ता है और नेचुरल शुगर भी किडनी पर लोड बढ़ाती है.

किडनी की दिक्कतें धीरे-धीरे बनती हैं और शुरू में पता नहीं चलतीं. छोटे बदलाव जैसे सोडा छोड़ना, एनर्जी ड्रिंक सीमित करना और सही हाइड्रेशन किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं और शरीर में इलेक्ट्रोलाइट तथा फिल्ट्रेशन को बेहतर बनाते हैं.

किडनी की दिक्कतें धीरे-धीरे बनती हैं और शुरू में पता नहीं चलतीं. छोटे बदलाव जैसे सोडा छोड़ना, एनर्जी ड्रिंक सीमित करना और सही हाइड्रेशन किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं और शरीर में इलेक्ट्रोलाइट तथा फिल्ट्रेशन को बेहतर बनाते हैं.

Published at : 05 Dec 2025 12:06 PM (IST)

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सर्दियों में आने वाली इन सब्जियों को खाने से हो रहा कैंसर, इस देश ने जारी कर दी चेतावनी

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Multiple Pesticides In Produce: ब्रिटेन में बेचे जाने वाले आम फल और सब्ज़ियों में ऐसे कीटनाशक मिले हैं जिनका संबंध कैंसर जैसे गंभीर रोगों से जोड़ा गया है. इससे लोगों की सेहत को लेकर बड़ी चिंता पैदा हो गई है. सरकार ने पिछले साल खाने-पीने की चीजों के 3,482 सैंपल की जांच की, जिनमें अंगूर सबसे ज्यादा संदिग्ध पाए गए. Pesticide Action Network UK (PAN UK) ने इन सैंपल्स का एनालिसिस किया और 17 तरह के फल-सब्ज़ियों में कुल 123 अलग-अलग रसायन पाए गए. इनमें से 42 कीटनाशक ऐसे थे जिनका संबंध कैंसर से बताया जाता है, और 21 ऐसे रसायन मिले जो शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं.

टर्की से आए सुल्ताना अंगूर के एक सैंपल में 16 अलग-अलग कीटनाशक मिले, जिनमें PFA यानि वो फॉरएवर केमिकल्स भी शामिल थे. ये केमिकल्स पर्यावरण में सदियों तक टूटते नहीं और शरीर में जमा होकर सेहत को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं. कुल 108 अंगूर सैंपल की जांच में पाया गया कि 90 प्रतिशत में एक से ज्यादा कीटनाशक मौजूद थे.
ग्रेपफ्रूट की जांच में भी यही ट्रेंड दिखा 121 सैंपल्स में से 99 प्रतिशत में मल्टीपल कीटनाशक मिले. एक किलो के ग्रेपफ्रूट सैंपल में 10 तरह के रसायन तक पाए गए.

इनमें भी मिले केमिकल्स

लाइम के 24 सैंपल्स में से 79 प्रतिशत में कई कीटनाशक मिले. इसके अलावा केला, शिमला मिर्च, खरबूज़ा, और मिर्च में भी ऊंचे स्तर पर रसायन पाए गए. एक मिर्च के सैंपल में 11 कीटनाशक और एक ब्रोकोली सैंपल में आठ रसायन मिले. सरकारी एनवायरमेंट कमेटी के मुताबिक 2024 में टेस्ट किए गए 46.67 प्रतिशत सैंपल्स में कीटनाशक के बचे हुए अपशिष्ट मिले. इनमें से ज्यादातर कानूनी सीमा के भीतर थे, लेकिन 2.07 प्रतिशत सैंपल्स सीमा से ऊपर पाए गए. हालांकि समिति का कहना है कि सीमा से ऊपर होना जरूरी नहीं कि तुरंत खतरनाक हो.

MRL कैसे तय होते हैं?

 PAN UK का तर्क है कि MRL सिर्फ एक रसायन के हिसाब से तय किया जाता है जबकि असलियत यह है कि हमारे खाने में एक साथ कई रसायन मौजूद होते हैं. वे कहते हैं कि हम ये नहीं जानते कि इतने सारे केमिकल्स आपस में मिलकर शरीर पर क्या असर डालते हैं. कई बार इनका असर मिलकर और भी ज्यादा जहरीला हो सकता है इसे ‘कॉकटेल इफेक्ट’ कहा जाता है. PAN UK ने एक और चौंकाने वाली बात बताई, जांच में मिले 29 प्रतिशत कीटनाशक ऐसे थे जिन्हें ब्रिटेन में इस्तेमाल करने की अनुमति ही नहीं. लेकिन ये रसायन बाहर से आने वाले फलों-सब्जियों के जरिए UK की मार्केट में पहुंच जाते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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