स्टील के बर्तन में कभी न रखें ये फूड आइटम्स, हो सकता है फूड पॉइजनिंग का खतरा

स्टील के बर्तन में कभी न रखें ये फूड आइटम्स, हो सकता है फूड पॉइजनिंग का खतरा



आज के समय में खाना स्टोर करने के लिए स्टील के बर्तन और टिफिन सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि स्टील के बर्तन टिकाऊ होते हैं, इन्हें साफ करना आसान होता है, और ये लंबे समय तक चलते भी हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ खाने की चीजें ऐसी भी होती हैं जिन्हें स्टील के बर्तन में रखना खतरनाक हो सकता है. अगर आप उन्हें स्टोर करते हैं तो न सिर्फ उनका टेस्ट खराब हो सकता है, बल्कि इससे आपकी सेहत को भी खतरा हो सकता है.

दरअसल, कुछ फूड आइटम्स में ऐसे तत्व होते हैं जो स्टील के साथ रिएक्शन कर सकते हैं. इन फूड्स और स्टील के बर्तन के बीच केमिकल रिएक्शन हो सकता है, जिससे खाने का टेस्ट खराब हो सकता है और साथ ही यह फूड पोषण भी खो सकता है और इससे फूड पॉइजनिंग या पेट से जुड़ी अन्य परेशानियां भी हो सकती हैं. तो आइए जानते हैं कि कौन-कौन सी फूड आइटम्स हैं जिन्हें आपको स्टील के बर्तन में कभी भी स्टोर नहीं करना चाहिए. 

स्टील के बर्तन में ये चीजें रखने से बढ़ सकता है फूड पॉइजनिंग का खतरा

1. फल स्टील के बर्तन में न रखें – फल विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होते हैं और इन्हें सही तरीके से स्टोर करना बहुत जरूरी होता है. स्टील के बर्तन में फलों को रखने से वे जल्दी खराब हो सकते हैं और उनका टेस्ट भी बिगड़ सकता है. इसके अलावा, स्टील के बर्तन फलों की नमी को बढ़ा सकता है, जिससे फल जल्दी सड़ जाते हैं. फलों को स्टोर करने के लिए एयर टाइट ग्लास कंटेनर सबसे अच्छे ऑप्शन हैं. अगर आप चाहें तो अच्छी क्वालिटी वाले प्लास्टिक कंटेनर का भी यूज कर सकते हैं. इससे फल ज्यादा समय तक ताजा और सुरक्षित रहते हैं. 

2. अचार को स्टील के बर्तन में न रखें – अचार हर घर की रसोई का एक अहम हिस्सा होता है और इसे अक्सर लंबे समय तक स्टोर किया जाता है. अचार में नेचुरल एसिड होता है, जो स्टील के साथ केमिकल रिएक्शन कर सकता है. इससे न सिर्फ स्टील के बर्तन में जंग लगने का खतरा रहता है, बल्कि अचार का टेस्ट भी खराब हो सकता है. कुछ मामलों में तो यह रिएक्शन खाने को नुकसान भी पहुंचा सकता है. इसलिए अचार को हमेशा कांच या प्लास्टिक के कंटेनर में ही स्टोर करना चाहिए ताकि उसकी क्वालिटी बनी रहे और सेहत पर कोई बुरा असर न पड़े. 

3. दही को स्टील के बर्तन में न रखें – दही हमारे हेल्थ के लिए बहुत फायदेमंद होती है, लेकिन दही को स्टील के बर्तन में रखना सही नहीं है. दही में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो स्टील के साथ मिलकर खराब रिएक्शन कर सकते हैं. इससे दही का टेस्ट खराब हो सकता है और दही जल्दी खराब भी हो जाती है. इसके अलावा, स्टील के बर्तन में रखने से दही में फर्मेंटेशन की प्रक्रिया तेज हो सकती है, जिससे यह खाने योग्य नहीं रह जाती, इसलिए दही को हमेशा कांच या मिट्टी के बर्तन में स्टोर करना चाहिए. मिट्टी के बर्तन न सिर्फ दही को ताजा रखते हैं, बल्कि यह दही का टेस्ट भी बनाए रखते हैं. 

यह भी पढ़ें Alcohol Side Effects: लिवर को कब सड़ा देती है शराब? एक्सपर्ट्स ने बताया कि कभी नहीं करनी चाहिए ये गलतियां

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40 के बाद ये 5 आदतें आपको पहुंचा सकती हैं नुकसान, डॉक्टर्स ने जारी की चेतावनी

40 के बाद ये 5 आदतें आपको पहुंचा सकती हैं नुकसान, डॉक्टर्स ने जारी की चेतावनी


एक्सपर्ट्स के अनुसार, 40 से 60 साल के लोगों को हर दिन अच्छे से 9 घंटे की नींद जरूरी होती है. क्योंकि इससे शरीर की रिपेयर प्रक्रिया और हार्मोन बैलेंस बना रहता है. 7 घंटे से कम सोने पर टाइप टू डायबिटीज का खतरा 9 प्रतिशत बढ़ जाता है. वहीं नींद की कमी पेट में फैट जमा करती है. इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है और शरीर जल्दी थक जाता है. ऐसे में उम्र बढ़ाने के साथ नींद को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

40 की उम्र पार करने के बाद स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को इग्नोर करना बंद कर देना चाहिए. 40 की उम्र के बाद शरीर हर दशक में 3 से 5 प्रतिशत मसल्स खोने लगता है. जिसे रोकने के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जरूरी होती है. वहीं हफ्ते में दो बार की गई स्ट्रेंथ ट्रेनिंग बोन डेंसिटी बढ़ाती है, मेटाबॉलिज्म बेहतर करती है और हार्ट डिजीज का खतरा 17 प्रतिशत तक कम करती है.

40 की उम्र पार करने के बाद स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को इग्नोर करना बंद कर देना चाहिए. 40 की उम्र के बाद शरीर हर दशक में 3 से 5 प्रतिशत मसल्स खोने लगता है. जिसे रोकने के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जरूरी होती है. वहीं हफ्ते में दो बार की गई स्ट्रेंथ ट्रेनिंग बोन डेंसिटी बढ़ाती है, मेटाबॉलिज्म बेहतर करती है और हार्ट डिजीज का खतरा 17 प्रतिशत तक कम करती है.

40 की उम्र के बाद प्रोसेस्ड फूड खाना भी बंद करना चाहिए. चिप्स और सोडा जैसे हाईली प्रोसेस्ड फूड 40 के बाद मोटापे का बड़ा कारण बनते हैं. यह ब्लड शुगर स्पाइक करते हैं, इन्फ्लेमेशन बढ़ाते हैं और दिल की बीमारी का खतरा दोगुना कर देते हैं. इन स्नैक्स में फाइबर की कमी पेट और आंतों की सेहत खराब करती है और कोलन कैंसर का खतरा 20 प्रतिशत तक बढ़ा देती है.

40 की उम्र के बाद प्रोसेस्ड फूड खाना भी बंद करना चाहिए. चिप्स और सोडा जैसे हाईली प्रोसेस्ड फूड 40 के बाद मोटापे का बड़ा कारण बनते हैं. यह ब्लड शुगर स्पाइक करते हैं, इन्फ्लेमेशन बढ़ाते हैं और दिल की बीमारी का खतरा दोगुना कर देते हैं. इन स्नैक्स में फाइबर की कमी पेट और आंतों की सेहत खराब करती है और कोलन कैंसर का खतरा 20 प्रतिशत तक बढ़ा देती है.

40 के बाद बिना लक्षणों के भी नियमित ब्लड टेस्ट जरूरी होते हैं. क्योंकि शरीर कई छिपी समस्याएं इन्हीं टेस्ट से पकड़ता है. इन टेस्ट में हाई कोलेस्ट्रॉल, प्री डायबिटीज और थायराइड शामिल होते हैं. वहीं हर साल किए गए टेस्ट 30 प्रतिशत तक क्रॉनिक डिजीज को रोकने में मदद करते हैं.

40 के बाद बिना लक्षणों के भी नियमित ब्लड टेस्ट जरूरी होते हैं. क्योंकि शरीर कई छिपी समस्याएं इन्हीं टेस्ट से पकड़ता है. इन टेस्ट में हाई कोलेस्ट्रॉल, प्री डायबिटीज और थायराइड शामिल होते हैं. वहीं हर साल किए गए टेस्ट 30 प्रतिशत तक क्रॉनिक डिजीज को रोकने में मदद करते हैं.

इसके अलावा 40 की उम्र के बाद स्ट्रेस को जमा करना बंद करना चाहिए. लगातार स्ट्रेस शरीर में कॉर्टिसोल बढ़ता है, जिससे ब्लड प्रेशर और टाइप टू डायबिटीज का खतरा 45 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. क्रोनिक स्ट्रेस दिमाग के उन हिस्सों को छोटा कर देता है जो मेमोरी संभालते हैं, जिससे एंग्जायटी दोगुनी हो सकती है और लाइफ स्पैन भी घट सकता है.

इसके अलावा 40 की उम्र के बाद स्ट्रेस को जमा करना बंद करना चाहिए. लगातार स्ट्रेस शरीर में कॉर्टिसोल बढ़ता है, जिससे ब्लड प्रेशर और टाइप टू डायबिटीज का खतरा 45 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. क्रोनिक स्ट्रेस दिमाग के उन हिस्सों को छोटा कर देता है जो मेमोरी संभालते हैं, जिससे एंग्जायटी दोगुनी हो सकती है और लाइफ स्पैन भी घट सकता है.

Published at : 04 Dec 2025 11:04 AM (IST)

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अब वजन घटाने डाइट के लिए प्लान बनाना आसान, फिजियोथेरेपिस्ट ने बताया ChatGPT का स्मार्ट तरीका

अब वजन घटाने डाइट के लिए प्लान बनाना आसान, फिजियोथेरेपिस्ट ने बताया ChatGPT का स्मार्ट तरीका



आजकल हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से जगह बना रही है. चाहे ईमेल लिखना हो, ऑफिस का शेड्यूल संभालना हो या घर के छोटे-मोटे काम, हर जगह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हमारी मदद कर रहा है. इसी बीच, अब लोग अपनी फिटनेस और हेल्थ को भी तकनीक की मदद से बेहतर बनाने लगे हैं. पहले जहां वजन घटाने के लिए डाइट चार्ट बनवाने में कई डॉक्टरों या न्यूट्रिशनिस्ट के पास जाना पड़ता था, अब वही काम आप अपने फोन से कुछ ही मिनटों में कर सकते हैं. वह भी ChatGPT की मदद से, फिजियोथेरेपिस्ट, न्यूट्रिशनिस्ट और Dr. Rebecca  Physiotherapy की संस्थापक रेबेका पिंटो ने एक आसान और समझने योग्य तरीका बताया है.

उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने ChatGPT की मदद से कुछ ही मिनटों में पर्सनलाइज्ड वजन घटाने की योजना बनाने का तरीका समझाया.रेबेका बताती हैं कि अगर आपको अपने BMR (Basal Metabolic Rate), TDEE (Total Daily Energy Expenditure) और सही माइक्रो ब्रेकडाउन जानना हो, यानी आपको दिन में कितनी कैलोरी और किस अनुपात में प्रोटीन, कार्ब और फैट लेना चाहिए तो ChatGPT यह सब तुरंत बता सकता है. बस आपको सही जानकारी और सही प्रॉम्प्ट डालने की जरूरत है. 
 
1. अपने BMR, TDEE और मैक्रोज की कैल्क्युलेशन करवाएं – रेबेका का कहना है कि ChatGPT आपके शरीर, उम्र और जीवनशैली से जुड़ी जानकारी लेकर आपके लिए एक सटीक कैलोरी लक्ष्य तैयार कर सकता है. इसके लिए आपको ChatGPT से लिखकर पूछना है कि फैट कम करने के लिए मेरे बीएमआर, टीडीईई, और आदर्श कैलोरी प्लस मैक्रो लक्ष्यों की कैल्क्युलेशन करें. मैं [उम्र], वर्षीय [पुरुष/महिला], [ऊंचाई सेमी में], [वजन किलोग्राम में], [ एक्टिविटी लेवल , हल्का, मिडीयम और एक्टिव] हूं. मैं [वसा कम करना] चाहता/चाहती हूं. 

इसमें आप अपनी उम्र, लिंग, वजन, ऊंचाई और अपनी एक्टिविटी लेवल जैसी जानकारी भर देंगे. ChatGPT इन आंकड़ों के आधार पर बताता है कि आपका शरीर आराम की अवस्था में कितनी कैलोरी जलाता है, आप पूरे दिन में कुल कितनी कैलोरी खर्च करते हैं , वजन कम करने के लिए आपको दिन में कितनी कैलोरी खानी चाहिए, प्रोटीन, कार्ब्स और फैट का सही प्लान क्या होना चाहिए. इस तरह आपको एकदम पर्सनलाइज्ड कैलोरी और मैक्रो गाइड मिल जाती है. 

2. अपने लिए एक भारतीय डाइट प्लान बनवाएं – जब आपको अपनी कैलोरी और मैक्रोज मिल जाएं, तब अगला कदम है ChatGPT से एक डाइट प्लान तैयार करवाना. यह प्लान आपकी पसंद के खाने, आपके भोजन के समय और आपकी लाइफस्टाइल के अनुसार बनाया जा सकता है. रेबेका कहती हैं कि इसके लिए ChatGPT को जानकारी दें कि आप दिन में कितनी बार खाना खाते हैं. आपको सबसे ज्यादा भूख किस समय लगती है, कौन-से खाने आपको पसंद और नापसंद हैं, आप शाकाहारी हैं, मांसाहारी, एगिटेरियन या मिक्स डाइट लेते हैं. आप चाहते हैं कि डाइट प्लान भारतीय हो और इसमें आसानी से अवेलेबल जानकारी का यूज हो. इन जानकारियों के आधार पर ChatGPT आपको एक ऐसा डाइट प्लान देता है, जिसे आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में बिना किसी परेशानी के अपना कर वजन घटा सकते हैं. अगर आपको और ऑप्शन चाहिए हों, तो आप ChatGPT से अलग-अलग प्रकार के भारतीय, हेल्दी और कम-कैलोरी वाले खाने भी सुझाने के लिए कह सकते हैं. 

यह भी पढ़ें: लंबे समय से बना हुआ है पीठ दर्द तो न मान बैठना थकान, हो सकता इस खतरनाक कैंसर का इशारा

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डाइटिशियन का अलर्ट, रोज पीने वाले ये 7 ड्रिंक्स आपके पेट को कर रहे खराब

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कार्बोनेटेड ड्रिंक्स आपके पेट को खराब कर सकती है. दरअसल सोडा, स्पार्कलिंग वॉटर और एनर्जी फिज ड्रिंक्स में कार्बन डाइऑक्साइड गैस भरी होती है. यह गैस पेट में फंस जाती है और कई लोगों में ब्लोटिंग, डकार और पेट फूलने की समस्या बढ़ाती है. जीरो शुगर या हेल्दी सोडा भी इसी परेशानी का कारण बन सकते हैं क्योंकि समस्या गैस की होती है न कि सिर्फ सामग्री की.

प्रोटीन शेक्स भी पेट की समस्याओं को बढ़ा सकते हैं. प्रोटीन शेक खासकर डेयरी बेस्ड प्रोडक्ट में मौजूद लैक्टोज कई लोगों को सूट नहीं करता. इससे गैस पेट दर्द और ब्लोटिंग हो सकती है. वहीं प्लांट बेस्ड शेक्स में भी स्वीटनर और गम्स के कारण पाचन बिगाड़ सकता है. एक बार में ज्यादा प्रोटीन पीना भी पेट पर दबाव डालता है.

प्रोटीन शेक्स भी पेट की समस्याओं को बढ़ा सकते हैं. प्रोटीन शेक खासकर डेयरी बेस्ड प्रोडक्ट में मौजूद लैक्टोज कई लोगों को सूट नहीं करता. इससे गैस पेट दर्द और ब्लोटिंग हो सकती है. वहीं प्लांट बेस्ड शेक्स में भी स्वीटनर और गम्स के कारण पाचन बिगाड़ सकता है. एक बार में ज्यादा प्रोटीन पीना भी पेट पर दबाव डालता है.

वहीं बीयर में नेचुरल कार्बोनेशन और फर्मेंटेशन दोनों मौजूद होते हैं जो पेट में गैस बढ़ाते हैं. बीयर में मौजूद यीस्ट और कार्ब्स आंतों में फर्मेंट होकर गैस बनाते हैं. ऐसे में बीयर, वाइन या कोम्बुचा कुछ लोगों में ब्लोटिंग और भारीपन बढ़ा सकते हैं.

वहीं बीयर में नेचुरल कार्बोनेशन और फर्मेंटेशन दोनों मौजूद होते हैं जो पेट में गैस बढ़ाते हैं. बीयर में मौजूद यीस्ट और कार्ब्स आंतों में फर्मेंट होकर गैस बनाते हैं. ऐसे में बीयर, वाइन या कोम्बुचा कुछ लोगों में ब्लोटिंग और भारीपन बढ़ा सकते हैं.

इसके अलावा कॉफी पेट में एसिड बढ़ाती है. कैफीन संवेदनशील लोगों में गैस, एसिडिटी या दस्त जैसी समस्या दे सकती है. यह आंतों को स्टिमुलेट करते हैं. जिससे कुछ लोगों को राहत मिलती है लेकिन कई लोगों में गैस और चुभन जैसे समस्याएं बढ़ती है.

इसके अलावा कॉफी पेट में एसिड बढ़ाती है. कैफीन संवेदनशील लोगों में गैस, एसिडिटी या दस्त जैसी समस्या दे सकती है. यह आंतों को स्टिमुलेट करते हैं. जिससे कुछ लोगों को राहत मिलती है लेकिन कई लोगों में गैस और चुभन जैसे समस्याएं बढ़ती है.

वहीं दूध में मौजूद लैक्टोज बहुत लोगों को पचता नहीं है. चाय या कॉफी में थोड़ा सा दूध भी गैस, पेट दर्द और ब्लोटिंग का कारण बन सकता है. यही वजह है कि कई लोगों में डेयरी लेने के बाद पेट भारी महसूस होता है.

वहीं दूध में मौजूद लैक्टोज बहुत लोगों को पचता नहीं है. चाय या कॉफी में थोड़ा सा दूध भी गैस, पेट दर्द और ब्लोटिंग का कारण बन सकता है. यही वजह है कि कई लोगों में डेयरी लेने के बाद पेट भारी महसूस होता है.

पैकेज्ड जूस, सॉफ्ट ड्रिंक्स और स्पोर्ट्स ड्रिंक्स में ज्यादा शुगर होती है जो तेजी से पचकर आंतों में फर्मेंट होती है. इससे गैस बनती है, खासतौर पर हाई प्रोटीन वाले ड्रिंक पेट को और खराब कर देते हैं.

पैकेज्ड जूस, सॉफ्ट ड्रिंक्स और स्पोर्ट्स ड्रिंक्स में ज्यादा शुगर होती है जो तेजी से पचकर आंतों में फर्मेंट होती है. इससे गैस बनती है, खासतौर पर हाई प्रोटीन वाले ड्रिंक पेट को और खराब कर देते हैं.

संतरा, मौसंबी या नींबू का जूस भी ज्यादा एसिडिक होते हैं. खाली पेट इन्हें पीने से पेट की लाइनिंग में जलन होती है और गैस और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं बढ़ जाती है.

संतरा, मौसंबी या नींबू का जूस भी ज्यादा एसिडिक होते हैं. खाली पेट इन्हें पीने से पेट की लाइनिंग में जलन होती है और गैस और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं बढ़ जाती है.

Published at : 04 Dec 2025 08:24 AM (IST)

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थकान से लेकर रात में पसीना आने तक ये 7 संकेत बताते हैं कि इंफेक्शन से लड़ रहा है आपका शरीर

थकान से लेकर रात में पसीना आने तक ये 7 संकेत बताते हैं कि इंफेक्शन से लड़ रहा है आपका शरीर


इंफेक्शन शुरुआत में इसलिए शांत रहते हैं क्योंकि इम्यून सिस्टम उन्हें दबाए रखता है और केवल हल्के लक्षण सामने आते हैं. अक्सर लोग हल्की परेशानी को थकान, तनाव या कोई पुरानी आदत मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. जिससे असली समस्या छुप जाती है.

वहीं पर्याप्त आराम के बावजूद दिनभर थकान, कमजोरी या ऊर्जा की कमी महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि इम्यून सिस्टम किसी इंफेक्शन से लड़ने में ऊर्जा खर्च कर रहा है. यह कंडीशन कई दिनों या हफ्तों तक भी रह सकती है.

वहीं पर्याप्त आराम के बावजूद दिनभर थकान, कमजोरी या ऊर्जा की कमी महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि इम्यून सिस्टम किसी इंफेक्शन से लड़ने में ऊर्जा खर्च कर रहा है. यह कंडीशन कई दिनों या हफ्तों तक भी रह सकती है.

हल्का, लगातार या बदलता हुआ बुखार शरीर में छुपे हुए कई इंफेक्शन का संकेत हो सकता है. इसके साथ ठंड लगना या नाइट स्वेट्स होने जैसी हल्की परेशानी भी दिखाई दे सकती है, जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.

हल्का, लगातार या बदलता हुआ बुखार शरीर में छुपे हुए कई इंफेक्शन का संकेत हो सकता है. इसके साथ ठंड लगना या नाइट स्वेट्स होने जैसी हल्की परेशानी भी दिखाई दे सकती है, जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.

अगर बिना किसी मेहनत या थकावट के शरीर में दर्द, जकड़न या सुस्ती महसूस होती है तो यह इंफेक्शन के कारण बनने वाली सूजन का संकेत हो सकता है.

अगर बिना किसी मेहनत या थकावट के शरीर में दर्द, जकड़न या सुस्ती महसूस होती है तो यह इंफेक्शन के कारण बनने वाली सूजन का संकेत हो सकता है.

इंफेक्शन कई बार पाचन तंत्र को भी प्रभावित करता है. पेट में असहजता, ऐंठन, दस्त या अचानक भूख कम लगना इस बात की ओर इशारा कर सकता है कि शरीर किसी आंतरिक समस्या से लड़ रहा है.

इंफेक्शन कई बार पाचन तंत्र को भी प्रभावित करता है. पेट में असहजता, ऐंठन, दस्त या अचानक भूख कम लगना इस बात की ओर इशारा कर सकता है कि शरीर किसी आंतरिक समस्या से लड़ रहा है.

वहीं सूखी खांसी, गले में दर्द, बलगम बढ़ना या नाक बंद रहना जैसी समस्याएं लंबे समय तक बनी रहे तो यह भी एक छुपे हुए इंफेक्शन का शुरुआती संकेत हो सकता है.

वहीं सूखी खांसी, गले में दर्द, बलगम बढ़ना या नाक बंद रहना जैसी समस्याएं लंबे समय तक बनी रहे तो यह भी एक छुपे हुए इंफेक्शन का शुरुआती संकेत हो सकता है.

गर्दन, बगल या जांघ के पास लिंफ नोड्स का सूजना भी बताता है कि शरीर इम्यून सेल्स बना रहा है. इसके अलावा किसी हिस्से में लाली, गर्माहट या सूजन भी छुपे इन्फेक्शन का संकेत हो सकते हैं.

गर्दन, बगल या जांघ के पास लिंफ नोड्स का सूजना भी बताता है कि शरीर इम्यून सेल्स बना रहा है. इसके अलावा किसी हिस्से में लाली, गर्माहट या सूजन भी छुपे इन्फेक्शन का संकेत हो सकते हैं.

वहीं इन्फेक्शन शरीर के साथ दिमाग को भी प्रभावित करता है. लगातार चिड़चिड़ापन, दिमाग का सुस्त होना, ध्यान न लगना या मेंटल थकान महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर अंदर से इंफेक्शन से लड़ रहा है.

वहीं इन्फेक्शन शरीर के साथ दिमाग को भी प्रभावित करता है. लगातार चिड़चिड़ापन, दिमाग का सुस्त होना, ध्यान न लगना या मेंटल थकान महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर अंदर से इंफेक्शन से लड़ रहा है.

Published at : 04 Dec 2025 08:22 AM (IST)

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इंसान के शरीर में कैसे बनता है खून, इसमें हड्डियां कैसे करती हैं मदद?

इंसान के शरीर में कैसे बनता है खून, इसमें हड्डियां कैसे करती हैं मदद?



How Blood Is Formed In The Body: हमारे शरीर में ब्लड होता है, यह सबको पता है. लेकिन ये ब्लड हमारे शरीर में कहां बनते हैं या कहां से आते हैं, इसको लेकर काफी लोगों को जानकारी नहीं होती है. हमारे शरीर में खून बनने की शुरुआत हड्डियों के भीतर मौजूद बोन मैरो से होती है. यह बोन मैरो एक तरह का नरम, स्पंजी पदार्थ होता है, जो हड्डियों के बीचों–बीच भरा रहता है. यही वह जगह है जहां शरीर के लगभग 95 प्रतिशत ब्लड के सेल तैयार होते हैं.  बड़े होने के बाद अधिकतर बोन मैरो हमारी कूल्हे की हड्डियों, सीने की हड्डी और रीढ़ की हड्डियों में पाया जाता है.  शरीर के कुछ और अंग भी खून के सेल को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाते हैंय  इनमें लिंफ नोड्स, प्लीहा (स्प्लीन) और लीवर शामिल हैं.  ये अंग मिलकर तय करते हैं कि किस समय खून के सेल कितने बनेंगे, कब टूटेंगे और कब किसी खास प्रकार के सेल में बदलेंगे. 

बोन मैरो में बनने वाले सभी  ब्लड सेल्स शुरुआत में एक स्टेम सेल के रूप में होती हैं. यही स्टेम सेल धीरे-धीरे बदलकर अलग-अलग तरह के सेल में विकसित होती हैं.  इनमें रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स शामिल हैं.  जब ये अधूरे रूप में होते हैं, तो इन्हें ‘ब्लास्ट’ कहा जाता है. कुछ ब्लास्ट बोन मैरो में ही रहकर आगे विकसित होते हैं, जबकि कुछ शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जाकर पूरे विकसित सेल बन जाते हैं.

खून की हर सेल्स का क्या काम होता है?

रेड ब्लड सेल्स : इनका मुख्य काम है फेफड़ों से ऑक्सीजन पूरे शरीर तक पहुंचाना और शरीर में बनने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक लाना. इन सेल्स में मौजूद हीमोग्लोबिन नाम का प्रोटीन इसी प्रक्रिया को आसान बनाता है. 

व्हाइट ब्लड सेल्स: इनका काम है शरीर को इंफेक्शन से बचाना. इनमें कई तरह की सेल्स शामिल होती हैं, जैसे न्यूट्रोफिल्स, ईओसिनोफिल्स, लिम्फोसाइट्स, मोनोसाइट्स और बेसोफिल्स.  हर एक प्रकार की कोशिका किसी न किसी खास तरह के इंफेक्शन से लड़ने में माहिर होती है.

इसके अलावा प्लेटलेट्स शरीर में खून जमाने का काम करती हैं, ताकि चोट लगने पर खून बहना रुक सके. शरीर में इन तीनों में से अगर किसी की भी कमी हो जाती है, तो शरीर में इसके लक्षण दिखने लगते हैं. 

ब्लड क्या है?
खून वह जीवन को बनाए रखने वाला तरल है जो पूरे शरीर की ब्लड- वेसल्स में लगातार बहता रहता है. ये वेसल्स तीन तरह की होती हैं आर्टरी वेनिस और  लिरिक्स खून इन्हीं रास्तों से पूरे शरीर में घूमकर ऑक्सीजन, पोषक तत्व और जरूरी तत्व पहुंचाता है और बेकार पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है.

इसे भी पढ़ें- Xeroderma Pigmentosum:किस बीमारी की वजह से सिर्फ सूरज की रोशनी में चलता है शरीर, क्या है इस दिक्कत का कारण?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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