स्किन पर दिखने वाले ये संकेत हो सकते हैं कोलन कैंसर के इशारे, नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

स्किन पर दिखने वाले ये संकेत हो सकते हैं कोलन कैंसर के इशारे, नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी



कोलन कैंसर यानी कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया में तेजी से बढ़ने वाले कैंसरों में से एक है. आमतौर पर लोग इसके लक्षणों को पेट के दर्द, मल त्याग की आदतों में बदलाव और खून आने जैसे पाचन संबंधी संकेतों से जोड़ते हैं. हालांकि, एक्सपर्ट्स कहते हैं कि कई बार यह बीमारी शरीर के सबसे बड़े अंग यानी स्किन पर भी अपने शुरुआती संकेत दिखा सकती है.

अगर स्किन पर रैशेज, गांठ, रंग बदलना या घाव जैसे बदलाव दिखाई दे तो इन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि स्किन पर दिखने वाले कौन से संकेत कोलन कैंसर की तरफ इशारा करते हैं और इन्हें नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है.

स्किन पर कैसे असर डालता है कोलन कैंसर

स्किन अक्सर शरीर के अंदर चल रही कई समस्याओं को बाहर से दिखा देती है. कोलन कैंसर में स्किन पर बदलाव कई कारणों से हो सकते हैं, जिनमें कैंसर कोशिकाओं का फैलाव, शरीर की प्रतिरोधक क्रिया या कैंसर के उपचारों के असर शामिल होते हैं. यह बदलाव शरीर के धड़, हाथ या पैरों पर दिखाई दे सकते हैं और कभी हल्की लाली तो कभी-कड़ी गांठ है या खुले घाव की तरह दिख सकते हैं. एक्सपर्ट मानते हैं कि परिवार में कोलन कैंसर की हिस्ट्री होने पर या लाइफस्टाइल से जुड़े खतरों में आने पर लोगों को इन संकेतों पर और ध्यान देना चाहिए. वहीं समय रहते हैं लक्षणों को पहचान लेना इलाज को आसान बनाता है.

कोलन कैंसर से जुड़े सबसे आम स्किन लक्षण

  • कटेनियस नोड्यूल्स- कई बार कोलन कैंसर की कोशिकाएं स्किन पर फैलकर सख्त गांठें बना देती है. यह आकार में अलग-अलग हो सकती है और कभी-कभी दर्द भी कर सकती है. यह संकेत बताता है कि कैंसर अपनी मूल जगह से आगे फेल रहा है.

  • एरिथेमा और इन्फ्लेमेटरी रैशेज- एरिथेमा यानी स्किन पर लालिमा और सूजन कोलन कैंसर में शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया के कारण दिख सकता है. यह पैच थोड़ा उभरे हुए, गर्माहट वाले या खुजली जैसे लग सकते हैं और आम रैश की तरह दिखने पर भी लंबे समय तक बने रहते हैं.

  • स्किन अल्सर- कुछ लोगों में स्किन पर ऐसे घाव दिख सकते हैं जो आसानी से नहीं भरते हैं. यह शरीर में चल रही कैंसर संबंधी प्रक्रियाओं का परिणाम हो सकता है. वहीं इनका धीरे-धीरे बढ़ना या लगातार बना रहना चेतावनी भी हो सकती है.

  • हाइपरपिगमेंटेशन और डिस्कलरेशन- कुछ मामलों में स्किन का रंग गहरा हो सकता है. यह शरीर में मेटाबॉलिक बदलाव या कैंसर उपचारों का असर हो सकता है. यह बदलाव धीरे-धीरे धड़, हाथों या चेहरे पर दिखने लगते हैं.

  • एक्ने जैसे दाने या लगातार रहने वाले रैश- कुछ लोगों में मुंहासे जैसे दाने या फैलाव वाले रैश दिख सकते हैं जो सामान्य स्किनकेयर से ठीक नहीं होते हैं. यह भी कैंसर की बीमारी की ओर इशारा कर सकते हैं.

कोलन कैंसर के संभावित कारण जो स्किन पर डालते असर

  • कैंसर कोशिकाओं का स्किन तक फैलना- कई बार कैंसर ब्लड या लिंफ सिस्टम के जरिए स्किन तक पहुंचता है और वहां गांठें बना देता है. यह स्थिति कम होती है लेकिन गंभीर होती है.

  • कैंसर ट्रीटमेंट के साइडइफेक्ट- कीमोथेरेपी या टारगेटेड थेरेपी स्किन में सूखापन, लालिमा, दाने या एक्ने जैसे लक्षण पैदा कर सकते हैं.

  • इम्यून रिएक्शन और पैरानेओप्लास्टिक सिंड्रोम- कैंसर शरीर की प्रतिरोधक क्रिया को बदल देता है, जिससे स्किन पर मोटापा, लाल पैच या असामान्य रैश दिखाई दे सकते हैं. यह लक्षण कई बार पाचन संबंधी लक्षणों से पहले भी दिख जाते हैं.

  • मेटाबॉलिज्म और हार्मोनल बदलाव- कैंसर शरीर के रासायनिक संतुलन को प्रभावित करता है, जिससे स्किन का रंग और टेक्सचर बदल सकता है.

इसे भी पढ़ें- Xeroderma Pigmentosum:किस बीमारी की वजह से सिर्फ सूरज की रोशनी में चलता है शरीर, क्या है इस दिक्कत का कारण?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लंबे समय से बना हुआ है पीठ दर्द तो न मान बैठना थकान, हो सकता इस खतरनाक कैंसर का इशारा

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किस बीमारी की वजह से सिर्फ सूरज की रोशनी में चलता है शरीर, क्या है इस दिक्कत का कारण?

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Xeroderma Pigmentosum Causes: सूरज की रोशनी हमारे लिए काफी फायदेमंद होता है, यह विटामिन-D बनाने में मदद करती है और शरीर की कई जरूरी प्रक्रियाओं के लिए बेहद अहम है. लेकिन सोचिए, अगर किसी की सेहत ही उसे सूरज की रोशनी से दूर रहने पर मजबूर कर दे, तो जिंदगी कैसी होगी?. रिपोर्ट के अनुसार, स्पेन का 11 साल का लड़का, पोल डोमिंगुएज, यही झेल रहा है. उसके लिए गर्मियों की छुट्टियां बाहर खेलने का मौका नहीं, बल्कि घर के अंदर बंद रहने का समय होती हैं, क्योंकि सूरज की रोशनी उसके लिए जानलेवा साबित हो सकती है. पोल को जेरोडर्मा पिगमेंटोसुम नाम की एक दुर्लभ बीमारी है, जो उसकी स्किन और आंखों को सीधा असर पहुंचाती है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर यह बीमारी क्या होती है और इससे पीड़ित लोगों को क्या दिक्कत झेलनी पड़ती है. 

क्या है जेरोडर्मा पिगमेंटोसुम

जेरोडर्मा पिगमेंटोसुम एक बहुत ही रेयर जेनेटिक समस्या है. इस बीमारी में शरीर में मौजूद वो सिस्टम ही काम करना बंद कर देता है, जो अल्ट्रावॉयलेट किरणों से हुए नुकसान की मरम्मत करता है. यानी अगर इस बीमारी से पीड़ित वाले व्यक्ति पर सूरज की रोशनी पड़ जाए, तो स्किन को हुआ नुकसान ठीक ही नहीं होता. यह समस्या तभी होती है जब बच्चे को माता-पिता दोनों से खराब जीन मिलें. इसलिए एक्सपी को ऑटोसोमल रिसेसिव बीमारी माना जाता है. इस बीमारी के साथ जीना आसान नहीं है. दिन का उजाला इनके लिए खतरा बन जाता है. सिर्फ कुछ मिनट की धूप भी इनकी त्वचा पर गंभीर जलन, फफोले या तेज दर्द दे सकती है. यूवी किरणें सिर्फ सूर्य से नहीं, बल्कि कुछ ट्यूबलाइट, लैम्प और टैनिंग बेड से भी निकलती हैं, इसलिए एक्सपी वाले लोगों को आर्टिफिशियल रोशनी से भी बचना पड़ता है.

कैसे दिखते हैं इसके शुरुआती असर?

धूप के हल्के संपर्क से भी एक्सपी के मरीजों की त्वचा पर जल्दी झाइयां, काले-सफेद धब्बे और अनियमित पिगमेंटेशन होने लगता है. समय के साथ ये निशान और गहरे या हल्के हो जाते हैं. सबसे बड़ा खतरा यह है कि यूवी नुकसान की मरम्मत नहीं होने के कारण उन्हें कम उम्र में ही स्किन कैंसर हो सकता है. बेसल सेल कार्सिनोमा, स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा और मेलेनोमा तीनों तरह के कैंसर XP वाले लोगों में कई गुना ज़्यादा देखे जाते हैं.

कैसे होती है इस बीमारी में रूटीन?

XP वाले लोग दिन में बाहर नहीं निकल सकते. उन्हें पूरी सुरक्षा तैयार करनी पड़ती है-

  • सिर से पैर तक ढके कपड़े
  • चौड़ी टोपी
  • UV प्रूफ चश्मा
  • हाई SPF और ब्रॉड स्पेक्ट्रम वाला सनस्क्रीन
  • UV फिल्टर लगी खिड़कियां

और यह सब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है. कई परिवार रोशनी कम होने वाले समय में घूमने-फिरने या जरूरी काम करने की कोशिश करते हैं, ताकि बीमारी का खतरा कम रहे. 

इसे भी पढ़ें- Liver Health: सिर्फ खराब खाने से ही तबाह नहीं होता लिवर, गलत बर्तन भी इस अंग के लिए बेहद खतरनाक

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर 811 नागरिक के लिए केवल एक डॉक्टर! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दिया जवाब, बताया संकट दूर करन

हर 811 नागरिक के लिए केवल एक डॉक्टर! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दिया जवाब, बताया संकट दूर करन



How Many Doctors Per Person In India: बीमारियों और मरीजों की संख्या पूरी दुनिया में तेजी के साथ बढ़ रही है. कुछ समय पहले एक रिपोर्ट आई थी कि पहले जो एंटीबायोटिक दवा आसानी से काम करती थी, अब उसने भी अपना असर कम कर दिया है. ऐसे में मरीजों की बढ़ती संख्या को रोकने के लिए पर्याप्त डॉक्टरों की जरूरत होती है. लेकिन सरकार द्वारा जारी नए आंकड़ों ने देश में डॉक्टरों की भारी कमी एक बार फिर सामने ला दी है.

मंगलवार को संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, भारत में 811 लोगों पर सिर्फ एक डॉक्टर उपलब्ध है. राज्यसभा में पूछे गए सवाल का लिखित जवाब देते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने बताया कि देश में 13,88,185 एलोपैथिक डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं, जबकि 7,51,768 AYUSH सिस्टम के डॉक्टर पंजीकृत हैं. 

क्या कहा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने?

उन्होंने कहा कि यदि माना जाए कि एलोपैथिक और आयुष दोनों तरह के 80 प्रतिशत डॉक्टर ही सक्रिय रूप से उपलब्ध हैं, तो देश में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:811 बैठता है.

नड्डा ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ है. 2014 की तुलना में आज मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 818 हो गई है. एमबीबीएस सीटें 51,348 से बढ़कर 1,28,875 और पीजी सीटें 31,185 से बढ़कर 82,059 पहुंच चुकी हैं. 

डॉक्टरों की उपलब्धता के लिए जरूरी कदम

स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि सरकार ने ग्रामीण, पिछड़े और जनजातीय इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं. केंद्रीय योजना के तहत जिला अस्पतालों से जुड़े 157 नए मेडिकल कॉलेजों में से 137 पहले से ही शुरू हो चुके हैं. इसके अलावा, फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम को एमबीबीएस कोर्स का हिस्सा बनाया गया है.

इसके तहत मेडिकल कॉलेज गांवों को गोद लेते हैं और एमबीबीएस छात्र इन गांवों में रहने वाले परिवारों की नियमित निगरानी करते हैं. इससे टीकाकरण, पोषण, पीरियड्स के लिए जरूरी कदम, आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंट, स्वस्थ जीवनशैली, मलेरिया, डेंगू नियंत्रण और दवा के नियमों का पालन जैसे मामलों में लगातार फॉलो-अप किया जाता है.नड्डा ने बताया कि इससे लोगों तक सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी भी आसानी से पहुंच पाती है.

पीजी छात्रों की तैनाती

NMC के जिला रेजीडेंसी कार्यक्रम के तहत मेडिकल कॉलेजों के दूसरे और तीसरे वर्ष के पीजी छात्रों की तैनाती जिला अस्पतालों में की जा रही है. ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाले एक्सपर्ट डॉक्टरों के लिए हार्ड-एरिया भत्ता और सरकारी आवास जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं.

मंत्री ने यह भी बताया कि NMC के नए नियम, विदेशी डॉक्टरों को भारत में अस्थायी रजिस्ट्रेशन और विशेष परिस्थितियों में जैसे ट्रेनिंग, रिसर्च, फेलोशिप, वॉलंटरी सेवा या सुपर-स्पेशियलिटी कार्यक्रम के लिए काम करने की अनुमति देता है. 

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सर्दियों में ही क्यों फटती हैं एड़ियां, क्या है इस दिक्कत से निपटने का तरीका?

सर्दियों में ही क्यों फटती हैं एड़ियां, क्या है इस दिक्कत से निपटने का तरीका?


ठंडी हवा जैसे-जैसे नमी खींचती है, पैरों की मोटी त्वचा और तेजी से डिहाइड्रेट होती है. एड़ियों की स्किन वैसे भी थोड़ी कठोर होती है, इसलिए सूखते ही तुरंत फटने लगती है. खुली चप्पल पहनना, लंबे समय तक खड़े रहना, बढ़ती उम्र या मोटापा ये सब समस्या को और बढ़ा देते हैं.

फटी एड़ियों के शुरुआती लक्षणों में रूखी और सख्त त्वचा, हल्की परतें उतरना, पतली या गहरी दरारें और चलने पर दर्द शामिल है. कई बार जगह-जगह लालपन या हल्का खून तक दिखाई देने लगता है.

फटी एड़ियों के शुरुआती लक्षणों में रूखी और सख्त त्वचा, हल्की परतें उतरना, पतली या गहरी दरारें और चलने पर दर्द शामिल है. कई बार जगह-जगह लालपन या हल्का खून तक दिखाई देने लगता है.

इस मौसम में मॉइस्चराइजिंग सबसे जरूरी कदम है. मोटे और गाढ़े फुट-क्रीम जैसे यूरिया, ग्लिसरीन, शिया बटर या पेट्रोलियम जेली वाली क्रीम एड़ियों को नरम रखने में बेहद मदद करती हैं. नहाने के तुरंत बाद क्रीम लगाने से नमी देर तक टिकती है.

इस मौसम में मॉइस्चराइजिंग सबसे जरूरी कदम है. मोटे और गाढ़े फुट-क्रीम जैसे यूरिया, ग्लिसरीन, शिया बटर या पेट्रोलियम जेली वाली क्रीम एड़ियों को नरम रखने में बेहद मदद करती हैं. नहाने के तुरंत बाद क्रीम लगाने से नमी देर तक टिकती है.

पैरों को हल्के गर्म पानी में भिगोने से त्वचा नरम होती है और एक्सफोलिएट करना आसान हो जाता है. करीब दस- पंद्रह मिनट भिगोने के बाद प्यूमिक स्टोन से धीरे-धीरे डेड त्वचा हटाई जा सकती है. ज्यादा रगड़ना ठीक नहीं, इससे दरारें और बढ़ सकती हैं.

पैरों को हल्के गर्म पानी में भिगोने से त्वचा नरम होती है और एक्सफोलिएट करना आसान हो जाता है. करीब दस- पंद्रह मिनट भिगोने के बाद प्यूमिक स्टोन से धीरे-धीरे डेड त्वचा हटाई जा सकती है. ज्यादा रगड़ना ठीक नहीं, इससे दरारें और बढ़ सकती हैं.

हील बाम साधारण क्रीम से ज्यादा असरदार होते हैं. ये दरारों को जल्दी भरने में मदद करते हैं और रात भर त्वचा को गहराई से पोषण देते हैं. सोने से पहले हील बाम लगाने से सुबह एड़ियां देखने में बेहतर लगती हैं.

हील बाम साधारण क्रीम से ज्यादा असरदार होते हैं. ये दरारों को जल्दी भरने में मदद करते हैं और रात भर त्वचा को गहराई से पोषण देते हैं. सोने से पहले हील बाम लगाने से सुबह एड़ियां देखने में बेहतर लगती हैं.

क्रीम लगाने के बाद सूती मोजे पहनना भी काफी फायदेमंद है. इससे नमी बंद रहती है, धूल नहीं चिपकती और एड़ियों पर घर्षण भी कम होता है. इस छोटे से उपाय से असर काफी तेजी से दिखता है.

क्रीम लगाने के बाद सूती मोजे पहनना भी काफी फायदेमंद है. इससे नमी बंद रहती है, धूल नहीं चिपकती और एड़ियों पर घर्षण भी कम होता है. इस छोटे से उपाय से असर काफी तेजी से दिखता है.

फुटवियर भी बड़ी भूमिका निभाता है. सर्दियों में बंद और सांस लेने वाले जूते पहनना एड़ियों को ठंडी, सूखी हवा से बचाता है. बहुत पतले या सख्त तलवे वाले जूते एड़ियों पर दबाव बढ़ाकर समस्या को और खराब कर देते हैं.

फुटवियर भी बड़ी भूमिका निभाता है. सर्दियों में बंद और सांस लेने वाले जूते पहनना एड़ियों को ठंडी, सूखी हवा से बचाता है. बहुत पतले या सख्त तलवे वाले जूते एड़ियों पर दबाव बढ़ाकर समस्या को और खराब कर देते हैं.

अगर एड़ियां बहुत गहरी फट चुकी हैं, चलने में दर्द होता है या हल्का इंफेक्शन दिख रहा है, तो घरेलू तरीकों से आराम नहीं मिलेगा. ऐसी स्थिति में स्किन एक्सपर्ट या फुट-केयर एक्सपर्ट से सही इलाज लेना जरूरी होता है.

अगर एड़ियां बहुत गहरी फट चुकी हैं, चलने में दर्द होता है या हल्का इंफेक्शन दिख रहा है, तो घरेलू तरीकों से आराम नहीं मिलेगा. ऐसी स्थिति में स्किन एक्सपर्ट या फुट-केयर एक्सपर्ट से सही इलाज लेना जरूरी होता है.

Published at : 03 Dec 2025 11:04 AM (IST)

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सिर्फ खराब खाने से ही तबाह नहीं होता लिवर, गलत बर्तन भी इस अंग के लिए बेहद खतरनाक

सिर्फ खराब खाने से ही तबाह नहीं होता लिवर, गलत बर्तन भी इस अंग के लिए बेहद खतरनाक



जब भी हम लिवर हेल्थ की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमारे दिमाग में तला-भुना खाना, ज्यादा ऑयली डाइट, शराब, या दवाइयों का जरूरत से ज्यादा खाना आता है. इन चीजों का लिवर पर सीधा असर होता है. लेकिन आपकी डेली लाइफ की कुछ छोटी-छोटी आदतें भी आपके लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं. कई बार हम अनजाने में ऐसी चीजों का रोजाना यूज करते हैं जो धीरे-धीरे हमारे लिवर पर बुरा असर डालती हैं और इनमें से कुछ चीजें तो हमारे किचन में ही मौजूद होती हैं. लिवर का काम शरीर में जमा जहर को बाहर निकालना है, लेकिन जब यह जहर बहुत ज्यादा हो जाए, तो लिवर पर बोझ बढ़ता जाता है और इसके कारण लिवर कमजोर होने लगता है. 

लिवर के लिए खाने से ज्यादा खतरनाक हैं ये बर्तन

1. नॉन-स्टिक बर्तन – नॉन-स्टिक बर्तन आजकल बहुत आम हो गए हैं क्योंकि इनमें खाना कम तेल में पक जाता है और चिपकता भी नहीं है.लेकिन इनकी यह सुविधा आपकी सेहत पर भारी पड़ सकती है. जब नॉन-स्टिक बर्तन बहुत ज्यादा गर्म हो जाते हैं या उनमें खरोंच आ जाती है, तो ये PFOA और PTFE जैसे केमिकल छोड़ते हैं. ये केमिकल धीरे-धीरे शरीर में जमा होते हैं और लिवर पर बुरा असर डालते हैं. रिसर्च के मुताबिक, लंबे समय तक इनका यूज फैटी लिवर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है. ऐसे में इनकी जगह कास्ट आयरन पैन या स्टेनलेस स्टील के बर्तन एक बेहतर और सेहतमंद ऑप्शन हैं. 

2. प्लास्टिक कंटेनर – बहुत से लोग प्लास्टिक के डिब्बों में खाना स्टोर करते हैं या माइक्रोवेव में गरम करते हैं. ये आदत आपको सुविधा देती है, लेकिन आपकी लिवर हेल्थ के लिए खतरनाक हो सकती है. प्लास्टिक जब गर्म किया जाता है, तो उसमें से BPA और Phthalates जैसे केमिकल निकल सकते हैं. ये हार्मोन को प्रभावित करते हैं और शरीर के डिटॉक्स सिस्टम यानी लिवर पर असर डालते हैं. लंबे समय तक इनका संपर्क लिवर के काम को धीमा कर सकता है. ऐसे में लिवर को हेल्दी रखने के लिए और खाने को स्टोर करने के लिए कांच या स्टील के डिब्बों का यूज करें. माइक्रोवेव में खाना गरम करना हो तो microwave-safe लेबल वाले बर्तनों का ही यूज करें. 

3. एल्युमीनियम के बर्तन – एल्युमीनियम के बर्तन लगभग हर भारतीय घर में पाए जाते हैं क्योंकि ये सस्ते, हल्के और जल्दी गर्म हो जाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब आप टमाटर, इमली, नींबू जैसी अम्लीय चीजें एल्युमीनियम बर्तनों में पकाते हैं, तो उनमें से एल्युमीनियम के माइक्रोस्कोप पार्टीक्लस खाने में घुल सकते हैं. शरीर में ज्यादा मात्रा में एल्युमीनियम जमा हो जाए तो यह लिवर पर बुरा असर डाल सकता है. इससे लिवर की सफाई करने की क्षमता कमजोर हो सकती है और समय के साथ-साथ लिवर फेल होने जैसी गंभीर स्थिति भी आ सकती है. इसके अलावा, एल्युमीनियम न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी बढ़ा सकता है.

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