अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीज के ये होते हैं अधिकार, जान लें अपने काम की बात

अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीज के ये होते हैं अधिकार, जान लें अपने काम की बात



Patient Rights During Medical Treatment: अस्पताल और डॉक्टर अपनी ओर से पूरी कोशिश करते हैं कि हर मरीज को बेहतरीन इलाज मिले. लेकिन इलाज के दौरान कुछ जिम्मेदारियां मरीज की भी होती हैं, और साथ ही कुछ अधिकार भी, जिनके बारे में जानना बेहद जरूरी है. ज्यादातर अस्पताल इन अधिकारों और जिम्मेदारियों की सूची उपलब्ध कराते हैं ताकि मरीज और उनके परिजन इलाज का पूरा लाभ उठा सकें. चलिए आपको बताते हैं कि अगर आप अस्पताल में इलाज करवाते हैं, तो आपका अधिकार क्या-क्या है और इसके साथ वहां पर आपकी जिम्मेदारी क्या-क्या है. 

मरीज के अधिकार

मरीज को अस्पताल में रहते हुए निम्नलिखित अधिकार दिए जाते हैं.

  • इलाज की लागत जानने का अधिकार- किस प्रक्रिया या जांच का कितना खर्च आएगा  यह जानकारी मरीज को पहले से दी जानी चाहिए.
  •  इलाज करने वाले डॉक्टर और स्टाफ की पहचान जानने का अधिकार- इसका मतलब है कि मरीज को यह बताया जाना चाहिए कि उसका इलाज कौन-कौन कर रहा है.
  •  परामर्श और उपचार के दौरान प्राइवेसी का अधिकार- चाहे डॉक्टर से बातचीत हो, जांच या कोई प्रक्रिया, हर स्थिति में गोपनीयता बनाए रखी जानी चाहिए.
  • बिना भेदभाव सेवाएं पाने का अधिकार- धर्म, जाति, उम्र, रंग, लिंग, आर्थिक स्थिति या शारीरिक या मानसिक क्षमता के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.
  •  सुरक्षा का अधिकार- इसका मतलब यह है कि मरीज की सुरक्षा सर्वोपरि है.
  • स्वास्थ्य संबंधी सभी जानकारी पाने का अधिकार- इलाज क्या है, क्यों किया जा रहा है, जोखिम क्या हैं यह सब स्पष्ट बताया जाए.
  •  उपचार लेने या मना करने का अधिकार- मरीज अपनी इच्छा से इलाज को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है, बशर्ते जोखिम समझा दिया गया हो.
  • मेडिकल रिपोर्ट पाने का अधिकारअस्पताल की नीति के अनुसार सभी दस्तावेज मरीज को उपलब्ध कराए जाएं.
  •  जरूरत पड़ने पर दूसरे अस्पताल में रेफर करवाने का अधिकार
  •  दर्द और तकलीफ के प्रबंधन की जानकारी पाने का अधिकार
  •  सेवा की गुणवत्ता पर शिकायत दर्ज करने और उसका जवाब पाने का अधिकार
  • किसी भी प्रक्रिया, जांच, एनेस्थीसिया या रक्त चढ़ाने से पहले सहमति देने का अधिकार
  •  अपनी मेडिकल फाइल देखने की अनुमति पाने का अधिकार
  • पसंद का भोजन (डॉक्टर की सलाह के अनुसार) और अपने धर्म का पालन करने का अधिकार

मरीज की जिम्मेदारियां

जिस तरह मरीज के अधिकार हैं, उसी तरह कुछ जिम्मेदारियां भी हैं.

  • अपनी स्वास्थ्य स्थिति की सही और पूरी जानकारी देना- बीमारी, दवाओं और मेडिकल इतिहास से जुड़ी बातों को छुपाएं नहीं.
  •  पता, नाम और अन्य जरूरी विवरण सही देना- गलत जानकारी इलाज में बाधा डाल सकती है.
  •  इलाज से जुड़ी सलाह का पालन करना- दवाएं, डायट, जांच, जो भी निर्देश दिए जाएं, उनका पालन जरूरी है.
  • अस्पताल स्टाफ का सम्मान करना- डॉक्टर और स्टाफ आपकी मदद के लिए हैं, उनसे विनम्रता से पेश आएं.
  •  आपातकालीन मरीजों को प्राथमिकता मिलने की आवश्यकता समझें
  •  अस्पताल के नियम मानें- जैसे धूम्रपान निषेध, विजिटिंग आवर्स, मोबाइल फोन का उपयोग आदि.
  • इलाज से जुड़े आर्थिक दायित्वों को समय पर पूरा करना
  • किसी भी प्रक्रिया के लिए सूचित सहमति देना
  •  दवाएं दूसरों को न दें और न ही किसी की दवा खुद लें
  •  बीमा दावे के लिए सही और पूरी जानकारी उपलब्ध कराएं
  •  अपॉइंटमेंट समय पर लें और न आ पाने की स्थिति में जल्द बताएं
  •  कोई दिक्कत या हालत बिगड़ने पर तुरंत अस्पताल को सूचित करें
  •  फॉलो-अप विजिट समय पर करें
  • डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न शुरू करें
  •  अपने व्यवहार से दूसरे मरीजों और स्टाफ के लिए सुरक्षित वातावरण बनाए रखें

इसे भी पढ़ें- World AIDS Day 2025: बिहार में कितने लोग HIV पॉजिटिव? जानें इस बीमारी के लक्षण और बचाव के तरीके

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बिहार में कितने लोग HIV पॉजिटिव? जानें इस बीमारी के लक्षण और बचाव के तरीके

बिहार में कितने लोग HIV पॉजिटिव? जानें इस बीमारी के लक्षण और बचाव के तरीके



विश्व एड्स दिवस के मौके पर पूरे बिहार में जागरूकता का माहौल है. बिहार राज्य एड्स नियंत्रण समिति और स्वास्थ्य विभाग ने पटना से लेकर राज्य के हर जिले में रैली, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर-बैनर और सेमिनार का आयोजन किया गया. इसका मकसद लोगों को एचआईवी/एड्स के बारे में सही जानकारी देना, डर खत्म करना और बचाव के तरीके बताना था. 

बिहार में कितने लोग एचआईवी पॉजिटिव?

एबीपी न्यूज़ से खास बातचीत में बिहार राज्य एड्स नियंत्रण समिति के विभागाध्यक्ष एनके गुप्ता ने कई जरूरी बातें साफ-साफ बताईं. उन्होंने कहा कि बिहार में अभी करीब 97 हजार लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं. सबकी देखभाल हमारी समिति कर रही है. अच्छी बात यह है कि दवा नियमित चलती रहे तो यह बीमारी बढ़ती नहीं है और मरीज बिल्कुल सामान्य जिंदगी जी सकता है.

क्यों होता है एड्स?

एनके गुप्ता ने बताया कि एचआईवी वायरस चार मुख्य रास्तों से फैलता है.

  1. असुरक्षित यौन संबंध. सबसे ज्यादा मामले इसी वजह से सामने आते हैं.
  2. इस्तेमाल की हुई सुई. इस वजह से खासकर नशा करने वालों को एचआईवी होता है.
  3. संक्रमित खून चढ़ाने से.
  4. गर्भवती मां से बच्चे तक, लेकिन अब इसका भी इलाज है.

लोगों को रहती है यह गलतफहमी

एचआईवी पॉजिटिव होने को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि मां को एड्स है तो बच्चे को भी जरूर होगा. ऐसा बिल्कुल नहीं है. अगर गर्भावस्था के दौरान मां सही दवा लेती रहे तो 99 पर्सेंट तक बच्चा पूरी तरह हेल्दी पैदा होता है. बिहार में यह प्रोग्राम काफी अच्छी तरह चल रहा है. 

कब दिखने लगते हैं एड्स के लक्षण?

एनके गुप्ता ने बताया कि शुरुआती कई साल तक एचआईवी के कोई खास लक्षण नहीं दिखते हैं. जब इम्यूनिटी बहुत कमजोर हो जाती है यानी यह बीमारी अपनी आखिरी स्टेज में पहुंच जाती है, तब इसके लक्षण दिखने शुरू होते हैं. उन्होंने कहा कि अगर कोई बीमारी बार-बार हो रही है और ठीक नहीं हो रही तो एक बार एचआईवी टेस्ट जरूर करवा लें. इससे डरने की कोई बात नहीं है.

  • बार-बार बुखार आना
  • लंबे समय तक दस्त लगना, जो ठीक न हो
  • वजन तेजी से गिरना
  • मुंह में छाले, गले में इंफेक्शन
  • स्किन पर चकत्ते या फोड़े
  • बार-बार निमोनिया या टीबी होना

बचाव के ये तरीके बेहद आसान

  • हमेशा कंडोम इस्तेमाल करें.
  • नशा करने के लिए कभी सुई शेयर न करें.
  • सैलून में नया ब्लेड और टैटू बनवाते समय नई सुई ही इस्तेमाल हो.
  • खून चढ़वाने या ऑपरेशन से पहले अस्पताल का विश्वास करें, जो स्क्रीनिंग करता हो.
  • शक हो तो तुरंत टेस्ट करवाएं. इसका टेस्ट बिलकुल फ्री है.

एचआईवी से निपटने के लिए मुस्तैद है बिहार

  • पूरे राज्य में 186 एआरटी सेंटर (दवा देने वाले केंद्र) हैं.
  • इसकी दवा पूरी तरह मुफ्त है, जो जिंदगी भर मिलती रहेगी.
  • हर जिले के बड़े अस्पताल से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक मुफ्त टेस्टिंग की सुविधा.
  • टोल फ्री हेल्पलाइन 1800 180 5544 भी है.

किन लोगों को होती है दिक्कत?

एनके गुप्ता ने बताया कि जो लोग आखिरी स्टेज तक लापरवाही करते हैं, उनकी जान चली जाती है. वहीं, जो लोग टेस्ट करवाकर तुरंत दवा शुरू कर देते हैं, वे दशकों तक हेल्दी रहते हैं. आज एड्स से डरने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरत है.

ये भी पढ़ें: फैटी लिवर पेट में क्यों देता है तकलीफ? जानें शुरुआती संकेत और बचाव के तरीके

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लिवर खराब होने से पहले शरीर के इस हिस्से में दिखते हैं 4 निशान, इन्हें कैसे पहचानें?

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Early Signs Of Liver Damage: लिवर खराब होने से पहले शरीर के इस हिस्से में दिखते हैं 4 निशान, इन्हें कैसे पहचानें?



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इन चार नौकरियों को करने से जल्दी खराब हो जाता है लिवर, आज से ही ढूंढना शुरू कर दें नई जॉब

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Signs Your Job May Be Harming Your Liver: इंसान दिन-रात ऑफिस में जी-तोड़ मेहनत करता है, ताकि वह एक अच्छी लाइफ मजे से जी सके. लेकिन क्या हो, अगर आपको पता चले कि आप जो नौकरी कर रहे हैं, उससे आपका लिवर खराब हो रहा है. दरअसल, ये नौकरियां सीधे तौर पर आपके लिवर को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं, लेकिन अगर आप इन्हें लगातार करते हैं, तो कुछ दिक्कत आपको नजर आने लगती है, जिनमें लिवर की दिक्कत भी शामिल हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि वे नौकरियां कौन-कौन सी हैं.

पूरे समय बैठकर की जाने वाली नौकरियां

इसमें पहले नम्बर पर वे नौकरियां आती हैं, जिनमें लोगों को पूरे दिन बैठकर काम करना होता है. जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी (2017) की एक बड़ी स्टडी बताती है कि जो लोग घंटों बैठे रहते हैं, उनमें फैटी लिवर का खतरा ढाई गुना बढ़ जाता है. अमेरिकन गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी जर्नल (2015) में भी पाया गया कि दफ्तर और कंप्यूटर से जुड़ी नौकरियों में लिवर के एंज़ाइम लगातार बढ़े हुए मिलते हैं. जब शरीर लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहता है, तो ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है. धीरे-धीरे वसा जमा होने लगती है और लिवर दबाव में आने लगता है.

केमिकल वाली नौकरी

बैठकर काम करने के बाद दूसरे नम्बर पर अगर कोई नौकरी सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है, तो वह है केमिकल्स के संपर्क वाली नौकरियां. फैक्ट्री, पेंट, प्लास्टिक, पेट्रोलियम, क्लीनिंग एजेंट या किसी भी तरह के रासायनिक पदार्थों के बीच काम करने वाले लोग लगातार खतरे में रहते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट कहती है कि कई केमिकल सीधे लिवर को नुकसान पहुंचाते हैं.

रात की शिफ्ट वाली नौकरियां

रात में काम करने से शरीर की नेचुरल सर्कैडियन रिदम बिगड़ जाती है. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल (2018) की रिसर्च कहती है कि रात की शिफ्ट में काम करने वालों में लिवर में चर्बी तेजी से बढ़ती है. रात में जागने से लिवर की नेचुरल मरम्मत रुक जाती है, जिससे वह समय से पहले कमजोर होने लगता है.

तनाव वाली नौकरियां

इंसान सुकून वाली नौकरी करना चाहता है, लेकिन उसको यह काफी कम नौकरियों में मिल पाती है. ड्राइवर, कॉल सेंटर, डिलीवरी, पुलिस, सुरक्षा गार्ड जैसे तमाम नौकरियों में रोज भारी तनाव रहता है. अमेरिकन लिवर फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि लगातार तनाव होने पर शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो लिवर में सूजन और फैट जमा करने लगता है. इसलिए आपको कोशिश करनी चाहिए कि अगर कोई भी काम कर रहे हैं, तो कम से कम तनाव लें, नौकरी को नौकरी की तरह करें.

Fatty Liver: फैटी लिवर पेट में क्यों देता है तकलीफ? जानें शुरुआती संकेत और बचाव के तरीके

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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फैटी लिवर पेट में क्यों देता है तकलीफ? जानें शुरुआती संकेत और बचाव के तरीके

फैटी लिवर पेट में क्यों देता है तकलीफ? जानें शुरुआती संकेत और बचाव के तरीके



Liver Health Warning Signs: फैटी लिवर, जिसे पहले NAFLD कहा जाता था और अब MASLD के रूप में भी जाना जाता है, आज दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती बीमारियों में से एक है. इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती स्टेज में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं या फिर दिखते ही नहीं. लेकिन हाल की रिसर्च बता रही है कि इसके शुरुआती संकेत अक्सर पेट और एब्डॉमिनल एरिया में नजर आने लगते हैं, वो भी धीरे-धीरे और बिना शोर किए.

World Journal of Hepatology में छपी एक स्टडी में पाया गया कि फैटी लिवर वाले कई मरीज शुरू में ही पेट से जुड़े लक्षण बताते हैं, जैसे हल्का दर्द, पेट फूलना, मतली या दाईं तरफ भारीपन. कई बार ये लक्षण तब भी महसूस होते हैं जब ब्लड टेस्ट और स्कैन बिल्कुल सामान्य दिखते हैं. यानी शरीर अंदर से मदद के लिए इशारा कर रहा होता है.

फैटी लिवर होता क्या है?

जब लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है और उसका शराब से कोई संबंध नहीं होता, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है. जैसे-जैसे फैट बढ़ता है, लिवर बड़ा और सूजन वाला हो सकता है. इसी वजह से शुरुआती परेशानी अक्सर पेट के आसपास महसूस होती है न कि बाहर से दिखने वाले लक्षणों में.

पेट में दिखने वाले फैटी लिवर के आम संकेत

दाईं तरफ पेट में दर्द या भारीपन

लिवर आपके दाईं पसलियों के नीचे होता है. जब उसमें फैट बढ़ता है, तो अक्सर हल्का लेकिन लगातार दर्द उस तरफ लेटने में असहजता या अंदर कुछ दबाव जैसा महसूस होता है. अक्सर लोग इसे गैस या बदहजमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.

 पेट फूलना और जल्दी फुल जाने का अहसास

कई मरीज बताते हैं कि थोड़ा-सा खाने पर भी पेट भारी लगने लगता है. जिसमें पेट में सूजन, गैस और डकारें शामिल होती है.  ये सब इस वजह से होता है कि लिवर की धीमी होती क्षमता पाचन को प्रभावित करने लगती है.

मतली और अपच

फैटी लिवर की वजह से बार-बार मतली, खाना भारी लगना और हल्की अपच जैसी समस्याएं आम हैं. खासतौर पर तले-भुने या ज्यादा मसालेदार भोजन के बाद परेशानी बढ़ जाती है.

 भूख कम लगना

कई लोग देखते हैं कि धीरे-धीरे भूख कम हो रही है. भोजन छोड़ देना, ज्यादा न खा पाना या बिना कोशिश के वजन कम होना, ये संकेत बताते हैं कि लिवर और डाइजेशन सिस्टम दबाव में हैं.

फैटी लिवर पेट को ही क्यों प्रभावित करता है?

लिवर पाचन की पूरी प्रक्रिया का लगभग आधा काम अकेले संभालता है. यह भोजन से निकलने वाले पोषक तत्वों को प्रोसेस करता है, फैट को तोड़ता है और शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालता है. इसलिए जब लिवर में चर्बी जमा होने लगती है और उसका काम रुकने लगता है, तो इसका सीधा असर पेट और पाचन पर दिखना शुरू हो जाता है. फैटी लिवर की शुरुआत में ही लिवर हल्का सूजने लगता है. इससे पाचन धीरे होने लगता है, बाइल कम बनने लगती है और गैस, भारीपन, पेट फूलना और असहजता बढ़ जाती है. यही वजह है कि फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण अधिकतर पेट के आसपास महसूस होते हैं. एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर पेट से जुड़े ये संकेत समय रहते पहचान लिए जाएं, तो फैटी लिवर को गंभीर स्टेज पर जाने से रोका जा सकता है.

ध्यान देने वाली जरूरी बातें

फैटी लिवर से बचाव के लिए रोजमर्रा की कुछ आदतें बड़ा फर्क डालती हैं. प्रोसेस्ड और तैल वाले भोजन कम करना, नियमित व्यायाम करना, वजन कंट्रोल में रखना और शुगर व फ्राइड फूड सीमित करना सबसे अहम कदम हैं. अगर पेट में गैस, भारीपन या बार-बार असहजता लंबे समय तक बनी रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. समय पर जांच और लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे बदलाव फैटी लिवर को शुरुआती स्टेज में ही रोक सकते हैं और लिवर की सेहत लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पैरों में बार बार आ रही खुजली तो यह घूमने जाने का सिग्नल नहीं, इस खतरनाक बीमारी का मिलता है सं

पैरों में बार बार आ रही खुजली तो यह घूमने जाने का सिग्नल नहीं, इस खतरनाक बीमारी का मिलता है सं



Foot Itching Liver Symptoms: हाथों और पैरों में होने वाली खुजली को ज्यादातर लोग सूखी त्वचा, एलर्जी या मामूली जलन समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं. लेकिन अगर खुजली लगातार बनी रहे, कोई स्पष्ट वजह न दिखे, और त्वचा पर रैश भी न हों, तो यह शरीर के अंदर छिपी किसी बड़ी समस्या का संकेत हो सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक हथेलियों और तलवों पर होने वाली ऐसी खुजली लिवर की बीमारी का शुरुआती लक्षण हो सकती है. लिवर की काम करने की क्षमता कम होने पर शरीर में बाइल एसिड जमा होने लगते हैं, जो त्वचा की नसों को चिढ़ा देते हैं और तेज खुजली की वजह बनते हैं. अगर यह खुजली रात में बढ़ जाए, मॉइस्चराइजर से शांत न हो या साथ में थकान और पीलिया जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है.

पैरों में खुजली क्यों?

लिवर ठीक से काम न करे तो टॉक्सिन्स और बाइल एसिड खून में बढ़ने लगते हैं. ये पदार्थ त्वचा की नसों को प्रभावित करते हैं, जिससे हथेलियों और पैरों के तलवों में तेज और लगातार खुजली होती है. इस तरह की खुजली को “कोलेस्टैटिक प्र्यूरिटस” कहा जाता है और कई बार बिना रैश के भी होती है. यह स्थिति अक्सर कई बीमारियों में देखी जाती है, जिसमें प्राइमरी बिलियरी कोलैंजाइटिस, प्राइमरी स्क्लेरोजिंग कोलैंजाइटिस, और प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाला इंट्राहेपैटिक कोलेस्टेसिस. लिवर की बीमारी में खुजली क्यों होती है? वैज्ञानिकों ने बताई ये छुपी हुई वजहें

लिवर से जुड़ी बीमारियों में होने वाली खुजली  को लेकर अभी तक साइंटिस्ट कोई एक कारण तय नहीं कर पाए हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि इसके पीछे कई अलग-अलग कारण एक साथ काम करते हैं.

 बाइल सॉल्ट का जमा होना

जब लिवर कमजोर पड़ता है, तो बाइल सॉल्ट शरीर में ठीक से फिल्टर नहीं हो पाते और त्वचा के नीचे जमा होने लगते हैं. इससे नसों पर असर पड़ता है और तेज खुजली शुरू हो सकती है. हालांकि यह भी सच है कि कई लोगों में बाइल सॉल्ट बढ़ने के बावजूद खुजली नहीं होती और कुछ लोग सामान्य स्तर होने पर भी खुजली महसूस करते हैं.

 हिस्टामीन का बढ़ जाना

लिवर से जुड़ी खुजली वाले कई मरीजों में हिस्टामीन का स्तर बढ़ा हुआ पाया जाता है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि एंटीहिस्टामीन दवाएं अक्सर इससे राहत नहीं दे पातीं.

 सेरोटोनिन की भूमिका

सेरोटोनिन दिमाग में खुजली का अहसास बढ़ा सकता है. कुछ रिसर्च बताते हैं कि यह नर्वस सिस्टम के खास रिसेप्टर्स पर असर डालकर खुजली की अनुभूति को तेज कर देता है. यही वजह है कि कई बार लिवर की बीमारी में खुजली का इलाज मुश्किल हो जाता है.

प्रेग्नेंसी या हार्मोन थेरेपी

गर्भावस्था के दौरान या हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के समय हार्मोनल बदलाव खुजली को बढ़ा सकते हैं. यह भी लिवर के बाइल फ्लो में बदलाव से जुड़ा पाया गया है.

लिवर से जुड़ी खुजली कैसे पहचाने?

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, अगर खुजली छह हफ्ते से ज्यादा बनी रहे तो यह क्रॉनिक प्र्यूरिटस की श्रेणी में आती है. आम खुजली और लिवर की वजह से होने वाली खुजली में कुछ फर्क होते हैं, जैसे कि 

  •  बिना रैश के खुजली
  • रात में ज्यादा बढ़ती है
  • हाथों और पैरों से शुरू होना

खुजली कम करने के तरीके

  • त्वचा को ज्यादा न खुजलाएं इससे इंफेक्शन हो सकता है.
  • अगर रात में खुजलाने की आदत है, तो सोते समय हल्के दस्ताने पहनें.
  • गुनगुने या ठंडे पानी से स्नान करें, गर्म पानी से बचें.
  • सर्द मौसम में कमरे में ह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल करें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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