महज 30 मिनट की वॉक से हार्ट की हेल्थ कैसे हो सकती है बेहतर? तुरंत फॉलो कर लें सर्जन के बताए ये

महज 30 मिनट की वॉक से हार्ट की हेल्थ कैसे हो सकती है बेहतर? तुरंत फॉलो कर लें सर्जन के बताए ये



30 Minute Walk for Heart Health: हम अक्सर सुनते आ रहे हैं कि सैर करना हमारे लिए फायदेमंद होता है, शरीर फिट रहता है. एक जाने-माने कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि रोज़आधा से एक घंटे की साधारण वॉक दिल के लिए उतनी ही फायदेमंद है जितनी कई दवाइयां भी नहीं होतीं. यह आसान-सा कदम शरीर में कई पॉजिटिव बदलाव लाता है मूड बेहतर होता है, तनाव कम होता है, ब्लड शुगर संतुलित रहता है और मानसिक शांति भी बढ़ती है. एक्सपर्ट के मुताबिक लगातार चलना दिल की बीमारियों का खतरा घटाता है और हार्ट रिदम से जुड़ी दिक्कतों को भी कम कर सकता है.

आज हार्ट डिजीज कितनी तेजी से बढ़ रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका में हर 5 में से 1 मौत का कारण दिल की बीमारी है. कई कारणों से हार्ट प्रॉब्लम्स बढ़ती हैं, लेकिन जिस चीज को हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वह है, शारीरिक सक्रियता. डॉक्टरों का कहना है कि दिल के लिए सबसे बेहतर “प्रेस्क्रिप्शन” दवाएं नहीं, बल्कि नियमित गतिविधि है.

क्यों फायदेमंद है वॉकिंग? 

एक इंस्टाग्राम वीडियो में मशहूर हार्ट ट्रांसप्लांट एक्सपर्ट डॉ. दिमित्री यारानोव ने बताया कि वे दवाओं से ज्यादा वॉक को प्रिस्क्राइब करते हैं. उनके शब्दों में  “मैं इसे दवाइयों से ज्यादा लिखता हूं, रोज 30 से 60 मिनट की वॉक आपकी सोच, दिल और पूरी जिंदगी बदल सकती है.” वॉकिंग की खासियत उसकी सादगी में नहीं, बल्कि उन तेज बदलावों में है जो शरीर में कुछ ही मिनटों में शुरू हो जाते हैं. डॉक्टर बताते हैं कि उन्होंने कई मरीजों को सिर्फ चलते रहने से थकान से उमंग तक और चिंता से संतुलन तक पहुंचते देखा है कि बिना किसी नई दवा के.


इसको लेकर क्या कहता है रिसर्च

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की एक स्टडी के मुताबिक रोज के स्टेप्स बढ़ाने और मीडियम-इंटेंसिटी गतिविधि करने से महिलाओं में दिल की बीमारी से मौत का खतरा काफी कम हो जाता है. ‘Heart’ जर्नल में प्रकाशित एक और रिसर्च के मुताबिक तेज चाल से चलना और इस गति को थोड़ी देर बनाए रखना हार्ट रिदम की दिक्कतों जैसे एट्रियल फिब्रिलेशन, तेज धड़कन या बहुत धीमी धड़कन के खतरे को कम करता है.

 

30–60 मिनट की वॉक आपके शरीर में क्या-क्या बदलती है?

डॉ. यारानोव इसे “सबसे कम आंकी गई थेरेपी” बताते हैं. उनके अनुसार, मिनट-दर-मिनट शरीर में यह बदलाव होते हैं, जैसे कि

1 मिनट पर

ब्लड फ्लो तेज हो जाता है और शरीर एक्टिव मोड में आ जाता है.

5 मिनट पर

मूड बेहतर होता है, चिंता कम होने लगती है.

10 मिनट पर

शरीर का तनाव हार्मोन, कोर्टिसोल कम होने लगता है. मन हल्का महसूस करता है.

15 मिनट पर

ब्लड शुगर स्थिर होने लगती है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका शुगर उतार-चढ़ाव वाला हो.

30 मिनट पर

शरीर फैट-बर्निंग मोड में चला जाता है. वजन घटाने वालों के लिए यह बेहद फायदेमंद समय है.

45 मिनट पर

मेंटल थकान, ओवरथिंकिंग और उलझन कम होने लगती है. दिमाग साफ महसूस होता है.

60 मिनट पर

डोपामाइन बढ़ता है यानी हैप्पीनेस हार्मोन. वॉक खत्म होते ही मन शांत और खुश महसूस करता है.

एक हालिया स्टडी के मुताबिक, सिर्फ 30 मिनट बैठने की बजाय हल्की गतिविधि जैसे वॉकिंग करने से ऊर्जा और मूड में बड़ा सुधार होता है. इसका असर अगले दिन तक रहता है.

 किसी महंगे जिम की जरूरत नहीं

डॉ. यारानोव कहते हैं कि “आपको दिल को अच्छा रखने के लिए महंगे जिम या सप्लीमेंट की जरूरत नहीं है. बस आप, आपका दिल और हर दिन के कुछ आसान कदम.” उनका संदेश साफ है कि छोटा शुरू करें, लेकिन नियमित रहें. शरीर हर कदम को याद रखता है और उसका फायदा देता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिना लक्षण दिखे भी हो जाता है यह कैंसर, जानें कैसे इसकी पहचान करके बचा सकते हैं अपनी जिंदगी?

बिना लक्षण दिखे भी हो जाता है यह कैंसर, जानें कैसे इसकी पहचान करके बचा सकते हैं अपनी जिंदगी?



Early Detection of Prostate Cancer: दुनियाभर की तरह ब्रिटेन में भी प्रोस्टेट कैंसर तेजी से बढ़ रहा है. यह अब ब्रिटिश पुरुषों में सबसे आम कैंसर बन चुका है और हर साल 12,000 से अधिक जानें ले रहा है. इसकी सबसे खतरनाक बात यह है कि शुरुआती स्टेज में बीमारी लगभग बिना किसी लक्षण के बढ़ती है. ज्यादातर पुरुष तब तक नहीं जानते कि उन्हें कैंसर है, जब तक यह शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल नहीं जाता.

ज्यादा मामलों का देर से पकड़ में आना डॉक्टरों और कैंसर संस्थाओं के लिए चिंता का बड़ा कारण बन गया है. इसी बीच, ब्रिटेन की नेशनल स्क्रीनिंग कमेटी  ने बड़े पैमाने पर प्रोस्टेट कैंसर स्क्रीनिंग शुरू करने के प्रस्ताव को फिर ठुकरा दिया. इस फैसले ने रिषि सुनक, पियर्स मॉर्गन, सर क्रिस होय और कई कैंसर संगठनों ने इसको लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है. 

 क्यों जताई नाराजगी?

रिषि सुनक, जो प्रोस्टेस्ट कैंसर से जुड़े हैं, इस फैसले के सबसे सख्त आलोचना की है. एक लेख में उन्होंने इसे “जीवन बचाने का खोया हुआ मौका” बताया. उनका कहना है कि कमेटी ने आधुनिक स्क्रीनिंग तकनीकों और MRI आधारित डायग्नॉस्टिक में हुई प्रगति को नजरअंदाज कर दिया. सुनक का तर्क है कि क्योंकि शुरुआती स्टेज में प्रोस्टेट कैंसर बिना लक्षण के बढ़ता है, इसलिए पुरुष सिर्फ लक्षणों के आधार पर बीमारी पकड़ ही नहीं सकते, उन्हें स्क्रीनिंग की जरूरत होती है. पियर्स मॉर्गन और ओलंपिक चैंपियन सर क्रिस होय ने भी स्क्रीनिंग न बढ़ाने के फैसले को खतरनाक चूक बताया. क्रिस होय के पिता की मौत प्रोस्टेट कैंसर से हुई थी, इसलिए उनका विरोध और भी स्पष्ट है.

फर्स्ट स्क्रीनिंग मॉडल क्यों बढ़ा रहा उम्मीदें?

कई एक्सपर्ट का कहना है कि NSC की दलीलें अब पुराने डाटा पर आधारित हैं. इंपीरियल कॉलेज लंदन के प्रोफेसर हसीम अहमद और UCL के प्रोफेसर मार्क एम्बरटन ने लंबे समय से यह दिखाया है कि PSA टेस्ट और MRI स्कैन सबसे तेज कैंसर को शुरुआती स्टेज में पकड़ते हैं. अनावश्यक बायोप्सी की संख्या 25 से 40 प्रतिशत तक कम करते हैं और ओवरडायग्नोसिस का खतरा घटाते हैं.  PROMIS ट्रायल जैसे बड़े अध्ययनों और कई अस्पतालों में MRI फर्स्ट मॉडल ने इन नतीजों को लगातार मजबूत किया है.  2025 में शुरू हुआ यूरो 42 मिलियन का ट्रांसफॉर्म ट्रायल, जिसमें 3 लाख तक पुरुष शामिल होंगे, आने वाले वर्षों में इस बहस को निर्णायक मोड़ देने वाला साबित हो सकता है.

प्रोस्टेट कैंसर से बचाव कैसे संभव है?

किसी भी कैंसर को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन एक्सपर्ट के अनुसार कई कदम जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं, खासकर तेजी से फैलने वाले और देर से पकड़े जाने वाले कैंसर के मामले में. एक्सपर्ट बताते हैं कि ब्लैक पुरुषों में जोखिम औसतन दोगुना है. अगर पिता या भाई को 60 से पहले प्रोस्टेट कैंसर हुआ हो, तो जोखिम 3 से 4 गुना बढ़ जाता है.  ऐसे पुरुषों में 45 से 50 की उम्र से PSA मॉनिटरिंग शुरू करने की सलाह दी जाती है.

क्या कहते हैं रिसर्च

दुनियाभर के शोध दिखाते हैं कि अधिक फैट से  प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ता है, नियमित व्यायाम सूजन को कम करता है और हार्मोन संतुलित रखता है और प्रोसेस्ड और जली हुई मीट का सेवन घातक प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ाता है.  एक्सपर्ट टमाटर, हरी सब्जियां, हेल्दी फैट्स (जैसे नट्स, ऑलिव ऑयल, फैटी फिश) लेने की सलाह देते हैं।

 विटामिन D का लेवल सही रखना

कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड की रिसर्च बताती है कि बहुत कम विटामिन D वाले पुरुषों में तेजी से फैलने वाले प्रोस्टेट कैंसर का खतरा अधिक पाया गया।

 धूम्रपान और शराब सीमित करें

यूरोपीय शोध के अनुसार, धूम्रपान से प्रोस्टेट कैंसर से मौत का जोखिम बढ़ जाता है. ज्यादा शराब पीना ट्यूमर की संभावना बढ़ाता है. 

एक्सपर्ट क्या कहते हैं

एक्सपर्ट एक बात पर एकमत हैं: “जब तक प्रोस्टेट कैंसर लक्षण दिखाता है, अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है.” इसलिए बचाव का रास्ता है कि  अपनी जोखिम प्रोफाइल जानना, 45 से 50 के बाद नियमित PSA चेक जरूरत पड़े तो MRI, वजन, डाइट और विटामिन D का ध्यान, धूम्रपान या अल्कोहल से दूरी और परिवार में इतिहास हो तो जीन टेस्टिंग. 

इसे भी पढ़ें- Winter Hair Care: सर्दियों में बढ़ जाती है डैंड्रफ की समस्या, नहाते समय न करें ये 10 गलतियां

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपकी फूड हैबिट से आपके पार्टनर की गट हेल्थ हो जाती है खराब? रिसर्च में डराने वाला खुलासा

क्या आपकी फूड हैबिट से आपके पार्टनर की गट हेल्थ हो जाती है खराब? रिसर्च में डराने वाला खुलासा



कई बार ऐसा सोचा जाता है कि जो खाना आप रोज खाते हैं वो सिर्फ आपकी भूख या बॉडी को ही नहीं, बल्कि आपके पार्टनर के शरीर के अंदर भी कुछ बदल सकता है. सुनने में अजीब लगता है, लेकिन सच यह है कि आपके रोजमर्रा के फूड चॉइसेज आपके साथी के पेट के अंदर रहने वाले माइक्रोबायोम पर भी असर डालते हैं यानी आप सिर्फ प्यार, घर और जिम्मेदारियां ही नहीं, बल्कि माइक्रो ऑर्गेनिज्म भी शेयर कर रहे होते हैं.

वैज्ञानिकों की एक रिसर्च ने इस बात को काफी मजबूती से साबित भी किया है जो लोग एक साथ रहते हैं और साथ खाना खाते हैं, उनके आंत के माइक्रोबायोम एक-दूसरे से काफी हद तक मिल जाते हैं यानी, अगर आपका  खाना हेल्दी है, तो आपके पार्टनर को फायदा और अगर आपका खाना खराब है, तो नुकसान भी शेयर होता है. यह बात जितनी चौंकाने वाली है, उतनी ही सोचने पर मजबूर भी करती है क्योंकि हम अक्सर यह मानकर चलते हैं कि जो मैं खाता हूं वह सिर्फ मुझे प्रभावित करता है पर सच इससे कहीं आगे है. आपका खाना आपके बर्तन में खत्म नहीं होता वह आपके रिश्ते के अंदर भी अपनी जगह बना लेता है. 
 
आपकी फूड हैबिट और आपका पार्टनर कनेक्शन आखिर है क्या?

हमारे पेट में करोड़ों–अरबों छोटे-छोटे  माइक्रोबायोम रहते हैं. ये पाचन, एनर्जी, इम्यूनिटी, मूड और यहां तक कि नींद तक को प्रभावित करते हैं. इन्हें ही गट माइक्रोबायोम कहा जाता है. यह पूरा सिस्टम आपकी खाई हुई चीजों के हिसाब से बदलता रहता है.जैसे फाइबर, फल, सब्जियां और दालें माइक्रोबायोम को मजबूत और संतुलित बनाते हैं. वहीं चीनी, फास्ट फूड, प्रोसेस्ड आइटम माइक्रोबायोम को कमजोर और असंतुलित करते हैं. जब दो लोग लगातार एक जैसा खाना खाते हैं, एक जैसा किचन यूज करते हैं और एक जैसा लाइफस्टाइल जीते हैं, तो उनके माइक्रोबायोम भी धीरे-धीरे एक जैसे बनने लगते हैं. यही कारण है कि पार्टनर्स में आंत का स्वास्थ्य भी कई मामलों में आपस में मिलता है. 

साथ रहने वाले कपल्स में माइक्रोबायोम क्यों हो जाता है एक जैसा?

रिसर्च के अनुसार, इसके कई कारण हैं. जैसे साथ में खाना खाना, एक जैसी ग्रोसरी और रेसिपीज, एक ही किचन में पकाना, कभी-कभी एक ही प्लेट से टेस्ट करना, करीबी और शारीरिक संपर्क, एक जैसे पर्यावरणीय बैक्टीरिया और इन सब में सबसे बड़ा रोल डाइट का माना गया है. जिस तरह आप खाते हैं, वैसा ही बैक्टीरिया आपके अंदर बढ़ता है और जब आपका पार्टनर वही खाने की आदतें अपनाता है, तो उसके अंदर भी वही बैक्टीरिया बढ़ने लगते हैं. 

क्या खराब फूड हैबिट पार्टनर की गट हेल्थ को भी नुकसान पहुंचाती है?

बहुत हद तक खराब फूड हैबिट पार्टनर की गट हेल्थ को भी नुकसान पहुंचाती है. अगर आपकी लाइफस्टाइल में हर दूसरे दिन फास्ट फूड, मीठा ज्यादा, फाइबर वाली चीजें कम, देर रात खाना और खाना अनियमित है तो आप सिर्फ अपनी गट हेल्थ को नुकसान नहीं पहुंचा रहे, बल्कि धीरे-धीरे अपने साथी की गट हेल्थ भी बिगाड़ रहे हैं. 
 
कमजोर माइक्रोबायोम से पेट फूलना या गैस, इम्यूनिटी कम होना, सूजन बढ़ना, वजन बढ़ना, ब्लड शुगर गड़बड़ होना, मेटाबॉलिज्म कमजोर पड़ना जैसे दिक्कतें हो सकती हैं और ये आदतें घर में एक से दूसरे तक जल्दी फैलती हैं, इसलिए एक की अनहेल्दी रूटीन पूरा घर प्रभावित कर सकती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किन लोगों को गलती से भी नहीं खाना चाहिए खीरा? जानें इसके साइड इफेक्ट्स, एलर्जी और अन्य खतरे

किन लोगों को गलती से भी नहीं खाना चाहिए खीरा? जानें इसके साइड इफेक्ट्स, एलर्जी और अन्य खतरे


खीरे में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है. ज्यादा फाइबर कई लोगों के लिए भारी पड़ सकता है और इससे गैस, अपच, पेट फूलना या ऐंठन जैसी समस्या बढ़ सकती है. जिन लोगों का पाचन तंत्र कमजोर हो, जिनको पहले से एसिडिटी या ब्लोटिंग होती है उन्हें खीरा कम या बिल्कुल नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इससे उनकी समस्या और बढ़ सकती है.

खीरे की तासीर ठंडी होती है. अगर किसी को पहले से कफ, सर्दी-जुकाम या गले में दर्द हो, तो खीरे का सेवन उनके लिए ठीक नहीं माना जाता है. ठंडी तासीर होने के कारण कफ और बढ़ सकता है और सर्दी देर तक रह सकती है इसलिए इस स्थिति में खीरा खाने से बचना बेहतर है.

खीरे की तासीर ठंडी होती है. अगर किसी को पहले से कफ, सर्दी-जुकाम या गले में दर्द हो, तो खीरे का सेवन उनके लिए ठीक नहीं माना जाता है. ठंडी तासीर होने के कारण कफ और बढ़ सकता है और सर्दी देर तक रह सकती है इसलिए इस स्थिति में खीरा खाने से बचना बेहतर है.

कुछ लोगों को खीरा खाने के बाद एलर्जी होती है. इसके कई लक्षण हो सकते हैं. जैसे होंठ या गले में खुजली, सूजन, पेट दर्द और उल्टी जैसा महसूस होना. अगर कभी खीरा खाने के बाद ये लक्षण दिखें, तो जल्द से जल्द इसका सेवन बंद कर दें.

कुछ लोगों को खीरा खाने के बाद एलर्जी होती है. इसके कई लक्षण हो सकते हैं. जैसे होंठ या गले में खुजली, सूजन, पेट दर्द और उल्टी जैसा महसूस होना. अगर कभी खीरा खाने के बाद ये लक्षण दिखें, तो जल्द से जल्द इसका सेवन बंद कर दें.

खीरा प्राकृतिक रूप से ड्यूरेटिक यानी पेशाब बढ़ाने वाला होता है. अगर किसी को पहले ही बार-बार पेशाब आने की समस्या रहती है, तो खीरा उनकी दिक्कत और बढ़ा सकता है. ऐसे लोग इसे बहुत सीमित मात्रा में ही खाएं या डॉक्टर से पूछकर खाएं.

खीरा प्राकृतिक रूप से ड्यूरेटिक यानी पेशाब बढ़ाने वाला होता है. अगर किसी को पहले ही बार-बार पेशाब आने की समस्या रहती है, तो खीरा उनकी दिक्कत और बढ़ा सकता है. ऐसे लोग इसे बहुत सीमित मात्रा में ही खाएं या डॉक्टर से पूछकर खाएं.

खीरा शरीर का तापमान कम करने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर को भी थोड़ा कम कर सकता है. अगर किसी को पहले से ही लो बीपी की समस्या है, तो खीरा ज्यादा खाने पर चक्कर, कमजोरी या थकान महसूस हो सकती है. इसलिए लो बीपी वाले लोग इसे हमेशा सीमित मात्रा में ही खाएं.

खीरा शरीर का तापमान कम करने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर को भी थोड़ा कम कर सकता है. अगर किसी को पहले से ही लो बीपी की समस्या है, तो खीरा ज्यादा खाने पर चक्कर, कमजोरी या थकान महसूस हो सकती है. इसलिए लो बीपी वाले लोग इसे हमेशा सीमित मात्रा में ही खाएं.

कुछ लोगों का शरीर जल्दी ठंड पकड़ लेता है. ऐसे लोगों को ठंडी तासीर वाले खाने जल्दी नुकसान पहुंचाते हैं. अगर आपका शरीर ठंड जल्दी पकड़ता है, हाथ-पैर ठंडे रहते हैं या पेट अक्सर ठंडा हो जाता है, तो खीरा आपके लिए सही नहीं है.

कुछ लोगों का शरीर जल्दी ठंड पकड़ लेता है. ऐसे लोगों को ठंडी तासीर वाले खाने जल्दी नुकसान पहुंचाते हैं. अगर आपका शरीर ठंड जल्दी पकड़ता है, हाथ-पैर ठंडे रहते हैं या पेट अक्सर ठंडा हो जाता है, तो खीरा आपके लिए सही नहीं है.

Published at : 01 Dec 2025 06:44 AM (IST)

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Winter Hair Care: सर्दियों में बढ़ जाती है डैंड्रफ की समस्या, नहाते समय न करें ये 10 गलतियां

Winter Hair Care: सर्दियों में बढ़ जाती है डैंड्रफ की समस्या, नहाते समय न करें ये 10 गलतियां



Why Dandruff Increases in Winter: सर्दियां आते ही सिर्फ मौसम ही नहीं बदलता, आपकी स्किन और बाल भी इसका असर झेलने लगते हैं. खुजली, सफेद फलक, कंधों पर गिरती “शोल्डर स्नो” ये सब विंटर के साथ बढ़ने लगते हैं. ठंडी हवा और कमरे में चल रहे हीटर स्कैल्प को इतना सूखा बना देते हैं कि डैंड्रफ अचानक तेज हो जाती है और इससे आपको कई जगहों पर शर्मिंदा भी होना पड़ता है, क्योंकि लोग टोक देते हैं कि आपके बाल में काफी डैंड्रफ है. सर्द हवा में नमी बेहद कम होती है, जो स्कैल्प की मॉइस्चर बैरियर को धीरे-धीरे कमजोर कर देती है. यही वजह है कि खुजली, जलन और फ्लेक्स दिखाई देने लगते हैं।

सर्दियों में डैंड्रफ बढ़ने की 10 बड़ी वजहें

ठंडी हवा 

विंटर एयर में ह्यूमिडिटी बहुत कम होती है. स्कैल्प की नमी तेजी से घटती है और त्वचा की सुरक्षा परत कमजोर हो जाती है. कमजोर बैरियर पर मालासेजिया फंगस तुरंत सक्रिय हो जाता है और मोटे फ्लेक्स बनने लगते हैं।

बहुत गर्म पानी से नहाना

सर्दियों में गर्म पानी आराम देता है, लेकिन स्कैल्प के प्राकृतिक तेल को हटाकर इसे और सूखा बना देता है. इसका परिणाम खुजली, लालपन और ज्यादा फ्लेक्स होता है.

बाल कम धोना

ठंड के कारण लोग शैम्पू टाल देते हैं. इससे, ऑयल जमा होता है, डेड स्किन बढ़ती है और फंगस को तेज़ी से फैलने का मौका मिलता है.

गलत तेल लगाना

विंटर में भारी तेल लगाने से फंगस को “खुराक” मिलती है. नतीजा ज्यादा खुजली, मोटे फ्लेक्स और बार-बार डैंड्रफ लौट आना होता है. 

पूरे दिन कैप या बीनी पहनना

टोपी के अंदर गर्मी और पसीना जमा होता है, यह फंगस के पनपने के लिए बिल्कुल सही माहौल होता है. 

तेज हीटिंग वाले कमरे में रहना

हीटर स्कैल्प को रेत जैसी सूखी अवस्था में बदल देता है, जिससे फ्लेकिंग बढ़ जाती है.

 बालों पर बहुत ज्यादा स्टाइलिंग या हीट टूल्स

ब्लो ड्रायर और स्ट्रेटनर स्कैल्प की नमी खींच लेते हैं, जिससे डैंड्रफ बढ़ जाती है. 

स्कैल्प को सही कंडीशनिंग न देना

लोग सिर्फ बालों को कंडीशन करते हैं, स्कैल्प को नहीं। इससे सिर की त्वचा और ज्यादा सूख जाती है।

पानी कम पीना

सर्दियों में प्यास कम लगती है, लेकिन शरीर और स्कैल्प डिहाइड्रेट रहते हैं. इससे यह होता कि त्वचा छिलने लगती है और डैंड्रफ बढ़ती है.

Vitamin D की कमी

ठंड के मौसम में कम धूप से Vitamin D का स्तर गिरता है, जिससे स्कैल्प की इम्युनिटी कमजोर होती है और इंफेक्शन जल्दी बढ़ता है. 

सर्दियों में डैंड्रफ कैसे कंट्रोल करें?

  •  सही एंटी-डैंड्रफ शैम्पू का इस्तेमाल
  •  गुनगुने पानी से नहाएं
  •  हफ्ते में 2–3 बार बाल धोएं
  • हल्का, नॉन-हेवी ऑयल इस्तेमाल करें
  • स्कैल्प को सांस लेने दें

इसे भी पढ़ें: Frequent Cold: सुबह उठते ही बार-बार क्यों होता है जुकाम? समझ जाएं बॉडी में इस चीज की है कमी

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टॉयलेट में घंटों बैठे रहते हैं लेकिन नहीं होता पेट साफ, ये देसी नुस्खे आएंगे काम

टॉयलेट में घंटों बैठे रहते हैं लेकिन नहीं होता पेट साफ, ये देसी नुस्खे आएंगे काम



Natural Remedies for Constipation: अक्सर लोग टॉयलेट में घंटों बैठे रहते हैं, लेकिन उनका पेट नहीं साफ होता है, इसके लिए वे दवा भी खूब खाते हैं, लेकिन उनको यह समस्या बना रहती है. क्या आपको भी अक्सर कब्ज की शिकायत रहती है?. इसको लेकर गैस्ट्रोएन्टरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी जिन्होंने AIIMS, हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड जैसी संस्थानों से ट्रेनिंग ली है, उन्होंने ने 19 सितंबर को एक इंस्टाग्राम पोस्ट में कब्ज से राहत देने के चार आसान और असरदार तरीके बताए.  उन्होंने लिखा, “डाइट में रोज के छोटे-छोटे बदलाव आपकी आंतों की सेहत को काफी हद तक सुधार सकते हैं और पेट को नियमित रख सकते हैं।”

क्या कहा एक्सपर्ट ने?

अपने वीडियो में उन्होंने सबसे पहले टॉयलेट पर बैठने की पोजिशन बदलने की सलाह दी. उनका कहना है कि टॉयलेट सीट पर बैठते वक्त पैरों के नीचे एक छोटा स्टूल रखकर घुटनों को कूल्हों से ऊपर लाना चाहिए इससे एनोरैक्टल एंगल सीधा हो जाता है और मल त्याग करना काफी आसान हो जाता है. इसके बाद उनकी दूसरी सलाह थी कि पानी ज्यादा पीना. उन्होंने कहा कि रोज कम से कम आठ गिलास पानी पीने की कोशिश करें, इससे स्टूल नरम रहता है और आसानी से निकल जाता है.

 


एक्सरसाइज से सुधरती है आदत

तीसरी टिप में उन्होंने नियमित एक्सरसाइज गतिविधि बढ़ाने की बात कही. उनके मुताबिक, रोजाना चलना या हल्का-फुल्का व्यायाम करना खाने को बड़ी आंत में आगे बढ़ने में मदद करता है, जिससे कब्ज़ की परेशानी कम होती है. आखिर में उन्होंने साफ कहा कि अगर ये सभी खानपान और लाइफस्टाइल वाले उपाय काम न करें, तभी लैक्सेटिव यानी हल्के रेचक दवाओं का सहारा लें. ये दवाएं आंतों की सफाई को आसान बनाती हैं, लेकिन इन्हें सिर्फ अंतिम विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए.

मसाज की विकल्प

कई एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि अगर लंबे समय से कब्ज की परेशानी रहती है, तो पेट के निचले हिस्से की हल्की मालिश कई लोगों को राहत दे सकती है. धीरे-धीरे मसाज करने से आंतों की हरकत बढ़ती है और मल को आगे बढ़ने में मदद मिलती है। अगर आप कर पाएं, तो घुटनों को हल्का उठाकर सीने की तरफ ले आएं और 1 से 2 मिनट इसी पोजिशन में रहें. यह आसन पेट के आसपास जमी हुई कसावट को ढीला करता है, जिससे दबाव कम होता है और मल त्याग आसान हो सकता है।।

कब्ज की हालत में इन चीजों से बचें

कुछ चीजें कब्ज को और खराब कर सकती हैं. अगर आपको पेट साफ़ करने में दिक्कत हो रही है, तो इनसे दूरी रखना बेहतर है

 बहुत प्रोसेस्ड खाना
पैकेज्ड स्नैक्स, फ्राइड फूड या फास्ट फूड में फाइबर बहुत कम होता है. ये आंतों की गति को धीमा कर देते हैं और कब्ज बढ़ा सकते हैं.

 लगातार बैठकर रहना
बहुत देर तक बैठे रहने से पाचन धीमा हो जाता है और आंतों की मूवमेंट कम हो जाती है. थोड़ी-थोड़ी देर में चलना, खड़े होना या हल्की स्ट्रेचिंग करना मददगार रहता है.

 जब जरूरत महसूस हो, तब भी रोकना
मल रोककर रखना कई बार कब्ज को और जटिल बना देता है. कोशिश करें कि जैसे ही इच्छा हो, तुरंत वॉशरूम जाएं.

कुछ दवाएं या सप्लीमेंट
कुछ दवाइयां कब्ज की समस्या बढ़ा सकती हैं. ऐसे में डॉक्टर से बात करके जरूरत पड़े तो दवाओं में बदलाव किया जा सकता है.

इसे भी पढ़ें- Frequent Cold: सुबह उठते ही बार-बार क्यों होता है जुकाम? समझ जाएं बॉडी में इस चीज की है कमी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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