क्या प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से बच्चे को हो जाती है ऑटिज्म? स्टडी में सामने आया सच

क्या प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से बच्चे को हो जाती है ऑटिज्म? स्टडी में सामने आया सच


Paracetamol Pregnancy Risks : प्रेग्नेंसी के दौरान दवाइयों को लेकर अक्सर महिलाओं के मन में डर और सवाल होते हैं. खासकर जब बात दर्द या बुखार की हो तो यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि दवा लेना सही है या नहीं. पिछले कुछ समय में यह बात भी काफी फैली कि अगर प्रेग्नेंसी के दौरान पैरासीटामॉल (अमेरिका में जिसे टाइलेनॉल कहा जाता है) लिया जाए तो इससे बच्चे में ऑटिज्म होने का खतरा बढ़ सकता है. इस दावे ने दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी, लेकिन अब एक बड़ी और भरोसेमंद रिसर्च ने इस बात को साफ कर दिया है.

मेडिकल जर्नल The Lancet Obstetrics, Gynaecology & Women’s Health में प्रकाशित एक बड़ी रिसर्च अध्ययन के अनुसार, प्रेग्नेंसी के दौरान सही तरीके से पैरासीटामॉल लेने और बच्चों में ऑटिज्म, ADHD या बच्चों के मानसिक विकास के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया. ऐसे में आइए जानते हैं कि लेकर स्टडी में और क्या-क्या सामने आया. 

क्या कहती है नई स्टडी?

इस बड़ी रिसर्च में 43 अलग-अलग क्लिनिकल स्टडीज का विश्लेषण किया गया. इसके अलावा स्वीडन में लगभग 25 लाख बच्चों के डेटा का अध्ययन भी शामिल था. शोधकर्ताओं ने खासतौर पर सिबलिंग कंपेरिजन तरीका अपनाया यानी एक ही मां के उन बच्चों की तुलना की गई, जिनमें एक प्रेग्नेंसी के दौरान पैरासीटामॉल लिया गया था और दूसरे में नहीं. ऐसे में इसका रिजल्ट साफ था, दोनों बच्चों में ऑटिज्म या अन्य मानसिक समस्याओं के खतरे में कोई अंतर नहीं मिला. 

क्या प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से बच्चे को ऑटिज्म हो जाती है?

पहले की कुछ स्टडीज में प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से हल्का संबंध दिखा था, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने बताया कि यह असली कारण नहीं था. असल में, जिन महिलाओं ने पैरासीटामॉल लिया उन्हें बुखार, दर्द या संक्रमण जैसी समस्याएं थीं. ये समस्याएं खुद भी बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकती हैं. साथ ही जेनेटिक कारण भी भूमिका निभाते हैं. इन्हीं कन्फाउंडिंग फैक्टर्स की वजह से पहले गलत निष्कर्ष निकाले गए. जिसके कारण लोगों को लगा कि  प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से बच्चे को ऑटिज्म हो जाती है. 

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार, पैरासीटामॉल आज भी प्रेग्नेंसी में सबसे सुरक्षित दर्द निवारक दवा मानी जाती है. यह NSAIDs और ओपिओइड्स से ज्यादा सुरक्षित है. इसे कम मात्रा में और जरूरत पड़ने पर लेना सही है. यह दवा World Health Organization (WHO) की जरूरी दवाओं की सूची में भी शामिल है. 

यह भी पढ़ें – Summer Health Issues: क्या आजकल आप भी बुखार और पेटदर्द से हैं परेशान, जानें किस वजह से हो रहीं ये बीमारियां?

कब ये दवा न लेना खतरनाक हो सकता है?

कई बार डर के कारण महिलाएं दवा लेने से बचती हैं, लेकिन यह ज्यादा खतरनाक हो सकता है. अगर प्रेग्नेंसी में बुखार का इलाज न किया जाए या दर्द को नजरअंदाज किया जाए तो इससे अबॉर्शन का खतरा, समय से पहले डिलीवरी (Preterm Birth) या बच्चे में जन्मजात समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज लेना बेहद जरूरी है. 

प्रेग्नेंसी में महिलाओं के लिए सही क्या है?

 1. जब सच में जरूरत हो तभी पैरासीटामॉल लें.

2. दवा लेने से पहले और दौरान डॉक्टर की सलाह जरूर मानें.

3. अपने मन से ज्यादा मात्रा या लंबे समय तक दवा न लें.

4. बुखार या दर्द को नजरअंदाज न करें, समय पर इलाज कराएं. 

यह भी पढ़ें – Mouth Breathing Effects: क्या सुबह उठकर आपको भी लगती है थकान? मुंह से सांस लेने की आदत हो सकती है वजह

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गर्मी में धूप में घूमते-घूमते गायब हो जाती है एनर्जी, ये काम करेंगे तो दिनभर रहेंगे एक्टिव

गर्मी में धूप में घूमते-घूमते गायब हो जाती है एनर्जी, ये काम करेंगे तो दिनभर रहेंगे एक्टिव


Summer Health Tips: गर्मी का मौसम शुरू होते ही तेज धूप और बढ़ता तापमान हमारे डेली रूटीन और सेहत पर असर डालने लगता है. आजकल इतनी ज्यादा गर्मी पड़ रही है कि थोड़ी देर बाहर रहने पर ही शरीर थक जाता है. कई लोगों को चक्कर आना, सिर दर्द, कमजोरी या बेहोशी जैसी दिक्कतें भी होने लगती हैं, जिसका बड़ा कारण शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन और तेज गर्मी होता है. लेकिन अगर आप अपने रूटीन और खानपान में थोड़े बदलाव कर लें, तो इस समस्या से बचा जा सकता है.

सही मात्रा में पानी पीना, हल्का और ठंडक देने वाला खाना खाना, और धूप से बचाव करना आपको दिनभर एनर्जेटिक और एक्टिव बनाए रख सकता है. तो आइए जानते हैं कि  गर्मी में धूप में घूमते-घूमते एनर्जी कैसे गायब हो जाती है और एनर्जी को दिनभर एक्टिव रखने के लिए क्या करें. 

गर्मी में धूप में घूमते-घूमते एनर्जी कैसे गायब हो जाती है

गर्मी में धूप में घूमते-घूमते तेज तापमान का सीधा असर शरीर पर पड़ता है. जब आप धूप में रहते हैं, तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा पसीना निकालता है. इस प्रक्रिया में शरीर से पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर निकल जाते हैं, जिससे डिहाइड्रेशन हो जाता है. वहीं पानी की कमी होने पर ब्लड सर्कुलेशन धीमा पड़ता है और शरीर को सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता, जिससे थकान, कमजोरी और चक्कर आने लगते हैं. इसके अलावा तेज धूप में शरीर का तापमान बढ़ जाता है, जिससे दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और एनर्जी तेजी से खर्च होती है. यही कारण है कि गर्मी में थोड़ी देर धूप में रहने पर भी शरीर जल्दी थका हुआ और सुस्त महसूस करता है. 

एनर्जी को दिनभर एक्टिव रखने के लिए क्या करें

1. शरीर को हाइड्रेट रखें –  गर्मी में सबसे जरूरी है शरीर में पानी की कमी न होने देना. दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहें. प्यास लगने का इंतजार न करें. इसके अलावा आप नारियल पानी, नींबू पानी, छाछ और ओआरएस जैसे पेय भी ले सकते हैं. ये शरीर में जरूरी मिनरल्स और नमक की कमी को पूरा करते हैं. साथ ही तरबूज, खरबूजा, खीरा और संतरा जैसे फल भी खाएं क्योंकि इनमें पानी भरपूर होता है. 

2. खानपान में बदलाव करें – गर्मी के मौसम में हल्का और पाचन के लिए सही खाना खाएं. तला-भुना, मसालेदार और ज्यादा ऑयली खाना शरीर में गर्मी बढ़ाता है.  आप अपनी डाइट में दही, सलाद, मूंग दाल और हरी सब्जियां शामिल करें. साथ ही सुबह भीगे हुए बादाम और केला खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है और कमजोरी दूर होती है. 

 3. धूप से बचाव – कोशिश करें कि दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच बाहर न निकलें, क्योंकि इस समय धूप सबसे ज्यादा तेज होती है. अगर बाहर जाना जरूरी हो, तो सिर को टोपी, दुपट्टे या छाते से ढकें. हल्के रंग के ढीले और सूती कपड़े पहनें, जिससे शरीर को ठंडक मिलती है. 

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4. घर लौटने के बाद ये गलतियां न करें – धूप से आने के तुरंत बाद ठंडा पानी न पिएं. पहले थोड़ा आराम करें और फिर सामान्य तापमान का पानी पिएं. घर आते ही तुरंत नहाने या कपड़े बदलने से बचें. 5 से 10 मिनट आराम करने के बाद ही ऐसा करें. इसके अलावा प से आने के तुरंत बाद सीधे एसी में जाने के बजाय पहले पंखे के नीचे बैठें, ताकि शरीर का तापमान सामान्य हो जाए. 

5. ठंडी चीजों से भी रखें दूरी – धूप से आने के तुरंत बाद आइसक्रीम, ठंडे फल या फ्रिज का पानी लेने से बचें. इससे गले में खराश या कफ की समस्या हो सकती है. 

6. शरीर को आराम और नींद दें –  गर्मी में शरीर जल्दी थक जाता है, इसलिए पूरी नींद लेना बहुत जरूरी है. दिनभर एक्टिव रहने के लिए रात में कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लें. 

7. हल्की एक्सरसाइज और योग करें –  सुबह या शाम के समय हल्की एक्सरसाइज, योग या मेडिटेशन करने से शरीर फिट रहता है और तनाव भी कम होता है. 

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क्या सुबह उठकर आपको भी लगती है थकान? मुंह से सांस लेने की आदत हो सकती है वजह

क्या सुबह उठकर आपको भी लगती है थकान? मुंह से सांस लेने की आदत हो सकती है वजह


How Mouth Breathing Affects Sleep Quality: सांस लेना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर हम शायद ही कभी ध्यान देते हैं. लेकिन यही साधारण-सी लगने वाली आदत हमारे शरीर की ऊर्जा, नींद और लंबी अवधि की सेहत को गहराई से प्रभावित कर सकती है. खासकर तब, जब सांस नाक की बजाय मुंह से ली जा रही हो और वो भी बिना हमें पता चले. अक्सर लोग मानते हैं कि मुंह से सांस लेना सिर्फ तब होता है जब नाक बंद हो या भारी एक्सरसाइज चल रही हो. लेकिन कई मामलों में यह एक आदत बन जाती है, खासकर नींद के दौरान. सुबह उठते समय सूखे होंठ, बार-बार प्यास लगना या हल्की थकान ये सब संकेत हो सकते हैं कि सांस लेने का तरीका बदल गया है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

बेंगलुरु के SDMIAH में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सम्हिता उल्लोड बताती हैं कि “मुंह से सांस लेना यानी नाक की जगह मुंह से सांस लेना एक असामान्य स्थिति मानी जाती है, खासकर अगर यह नींद के दौरान लगातार हो। ऐसे मामलों में सही जांच और इलाज जरूरी होता है.” असल में हमारा शरीर नाक से सांस लेने के लिए ही बना है. नाक सिर्फ हवा का रास्ता नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती है. यह हवा को साफ करती है, उसमें नमी जोड़ती है और धूल व बैक्टीरिया को रोकती है. जब हम मुंह से सांस लेते हैं, तो ये पूरी प्रक्रिया छूट जाती है.

क्या होती है दिक्कत

डॉ. उल्लोड के मुताबिक “नाक से सांस लेने पर हवा फिल्टर होती है, ह्यूमिडिफाई होती है और हानिकारक कणों को शरीर में जाने से रोका जाता है.” लेकिन मुंह से सांस लेने पर ठंडी, सूखी और बिना फिल्टर की हवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है, जिससे समय के साथ सांस लेने पर असर पड़ सकता है. इसका एक और बड़ा असर एनर्जी स्तर पर पड़ता है. कई बार लोग पूरी नींद लेने के बाद भी थकान महसूस करते हैं. इसकी एक वजह मुंह से सांस लेना भी हो सकता है. इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होता है.

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डॉ. उल्लोड बताती हैं कि इससे थकान, ध्यान में कमी और धीरे-धीरे श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा, नींद की गुणवत्ता भी खराब होती है. मुंह से सांस लेने की वजह से नींद बार-बार टूट सकती है, भले ही हमें इसका एहसास न हो. नींद से जुड़ी यह समस्या आगे चलकर स्लीप एपनिया जैसी गंभीर स्थिति को भी बढ़ा सकती है. डॉ. उल्लोड कहती हैं कि यह आदत स्लीप एपनिया को और खराब कर सकती है और नींद को टुकड़ों में बांट देती है.

बच्चों पर क्या होता है असर

बच्चों में इसका असर और भी गहरा हो सकता है। लंबे समय तक मुंह से सांस लेने से चेहरे की बनावट, दांतों की स्थिति और यहां तक कि पोस्टर पर भी असर पड़ सकता है. अच्छी बात यह है कि इस आदत को बदला जा सकता है. लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है कारण को पहचानना. अगर नाक बंद रहती है, एलर्जी है या साइनस की समस्या है, तो पहले उसका इलाज जरूरी है. इसके साथ ही प्राणायाम जैसी ब्रीदिंग एक्सरसाइज,  रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना मददगार साबित हो सकता है.

यह भी पढ़ें –  ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सफेद बालों को रंगने से डैमेज हो सकता है लिवर? हेयर डाई पर सामने आया बड़ा सच

क्या सफेद बालों को रंगने से डैमेज हो सकता है लिवर? हेयर डाई पर सामने आया बड़ा सच


Can Hair Dye Cause Liver Damage: सैलून की कुर्सी पर बैठे-बैठे जब बालों का रंग बदलता दिखता है, तो मन में एक सवाल जरूर आता है कि क्या ये केमिकल्स वाकई शरीर के लिए नुकसानदेह हैं? तेज गंध और तरह-तरह की बातें सुनकर कई लोगों को लगता है कि हेयर डाई से लिवर तक खराब हो सकता है. लेकिन हकीकत थोड़ी अलग है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

सैफी हॉस्पिटल के हेपेटोलॉजिस्ट और लिवर ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. चेतन कलाल ने  TOI को बताया कि रूटीन तरीके से कॉस्मेटिक हेयर डाई इस्तेमाल करने से आम लोगों में लिवर की गंभीर बीमारी होने का कोई ठोस क्लिनिकल सबूत नहीं है.  इसकी वजह भी सीधी है मार्केट में मिलने वाली ज्यादातर डाई रेगुलेटेड होती हैं और स्कैल्प के जरिए शरीर में इनका एब्जॉर्प्शन बहुत कम होता है. यानी ये केमिकल्स इतनी मात्रा में ब्लडस्ट्रीम तक नहीं पहुंचते कि लिवर को नुकसान पहुंचा सकें.

क्या नहीं होता है नुकसान?

हालांकि, इसका मतलब ये नहीं कि जोखिम बिल्कुल शून्य है. कुछ मामलों में लिवर डैमेज की रिपोर्ट सामने आई है, खासकर जब डाई में मौजूद पैरा-फिनाइलिन डायमीन  जैसे केमिकल शामिल हों. लेकिन ये मामले बेहद रेयर और इडियोसिंक्रेटिक होते हैं, यानी हर व्यक्ति में अलग तरह से, बिना किसी तय पैटर्न के. ये डोज पर निर्भर नहीं होते, बल्कि शरीर की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया पर आधारित होते हैं.

डॉ. हर्षिल एस. शाह बताते हैं कि PPD और अमोनिया जैसे तत्व तब नुकसानदेह हो सकते हैं, जब ये शरीर में ज्यादा मात्रा में प्रवेश करें कि जैसे कि स्कैल्प पर घाव हो या एप्लिकेशन के दौरान फ्यूम्स ज्यादा इनहेल किए जाएं. आम तौर पर इससे स्किन एलर्जी होती है, जो असहज तो होती है, लेकिन खतरनाक नहीं. जिन मामलों में हेयर डाई और हेपेटाइटिस के बीच संबंध पाया गया, उनमें लंबे समय तक या बार-बार इस्तेमाल के साथ पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं भी शामिल थीं. 

कब होती है दिक्कत?

असल चिंता तब बढ़ती है, जब कई जोखिम एक साथ जुड़ जाते हैं जैसे स्मोकिंग. स्मोकिंग खुद लिवर के लिए बड़ा खतरा है. यह ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, सूजन और फाइब्रोसिस को बढ़ाता है, जिससे लिवर डिजीज का खतरा बढ़ जाता है, खासकर अगर फैटी लिवर या शराब का इतिहास हो. ऐसे में जब शरीर केमिकल्स के संपर्क में आता है, तो कुल मिलाकर टॉक्सिक असर बढ़ सकता है. लेकिन डॉ. कलाल का जोर साफ है कि लिवर हेल्थ के लिए हेयर डाई छोड़ने से ज्यादा जरूरी स्मोकिंग छोड़ना है. 

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क्या है इसका उपाय?

तो क्या किया जाए? सबसे बेहतर तरीका है सावधानी के साथ उपयोग. हमेशा भरोसेमंद और रेगुलेटेड ब्रांड की डाई चुनें. अमोनिया-फ्री या हर्बल लिखे होने का मतलब पूरी तरह सुरक्षित होना नहीं है. इनमें भी अलग तरह के केमिकल्स होते हैं. हर बार इस्तेमाल से पहले पैच टेस्ट जरूर करें, ताकि एलर्जी का पता पहले ही चल सके. कभी भी डाई को कटे-फटे या इंफ्लेम्ड स्कैल्प पर न लगाएं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या फोन दूर होते ही हो जाते हैं बेचैन, जानें स्क्रीन कैसे बना रही समय से पहले बूढ़ा?

क्या फोन दूर होते ही हो जाते हैं बेचैन, जानें स्क्रीन कैसे बना रही समय से पहले बूढ़ा?


Why You Feel Anxious Without Your Phone: अगर फोन आपसे थोड़ी देर के लिए भी दूर हो जाए और आपको बेचैनी होने लगे, तो यह सिर्फ आदत नहीं, बल्कि एक संकेत है कि स्क्रीन आपकी बॉडी और दिमाग पर असर डाल रही है. हाल की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लोग 2024 में कुल 1.1 ट्रिलियन घंटे स्मार्टफोन पर बिताते रहे यानी औसतन हर व्यक्ति करीब 5 घंटे रोज स्क्रीन पर रहता है. चलिए आपको बताते हैं कि इससे कैसे आपको दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है. 

समय से पहले बना रही आपको बूढ़ा

यही बढ़ता स्क्रीन टाइम धीरे-धीरे शरीर के अंदर एक ऐसी प्रक्रिया शुरू कर देता है, जो समय से पहले बूढ़ा होने की वजह बन सकती है. सबसे पहला असर पड़ता है नींद पर. रात में फोन चलाने से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में बनने वाले मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है, जो नींद के लिए बेहद जरूरी है. एनपीजे डिजिटल हेल्थ में पब्लिश रिसर्च भी बताती है कि जितना ज्यादा रात में स्क्रीन का इस्तेमाल होगा, नींद उतनी ही खराब होगी.

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सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित 

नींद की कमी सिर्फ थकान तक सीमित नहीं रहती. इसका सीधा असर दिमाग पर पड़ता है. रिसर्च में पाया गया है कि इससे दिमाग की मेमोरी से जुड़ी स्ट्रक्चर कमजोर होने लगती हैं और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है.  द लैंसेट कमीशन (2024) की रिपोर्ट में तो यहां तक कहा गया है कि नींद की समस्या डिमेंशिया के बड़े कारणों में शामिल हो रही है. यह असर सिर्फ दिमाग तक नहीं रुकता. फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी (2023) में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, ज्यादा स्क्रीन टाइम और खराब नींद का सीधा असर हमारे गट माइक्रोबायोम पर पड़ता है. यानी पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ने लगता है. यही कारण है कि स्क्रीन एडिक्शन से एंग्जायटी, लो मूड और स्ट्रेस बढ़ने लगता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

Dr. Aaron Hartman बताते हैं कि नींद, स्ट्रेस और गट हेल्थ, ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं, इनमें से एक भी खराब हुआ तो बाकी भी प्रभावित हो जाते हैं. इसके अलावा, जेरोसाइंस (2024) की स्टडी बताती है कि रात में आर्टिफिशियल लाइट के संपर्क में रहने से शरीर में सूजन बढ़ती है, जो दिमाग तक पहुंचकर न्यूरोइन्फ्लेमेशन पैदा कर सकती है. यही प्रक्रिया तेजी से बढ़ती उम्र का कारण बनती है. Dr. John La Puma ने इसे “डिजिटल ओबेसिटी” नाम दिया है, जहां स्क्रीन की लत शरीर और दिमाग दोनों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है. हर नोटिफिकेशन के साथ मिलने वाला डोपामिन दिमाग को उसी तरह प्रभावित करता है, जैसे किसी लत में होता है.

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क्या आजकल आप भी बुखार और पेटदर्द से हैं परेशान, जानें किस वजह से हो रहीं ये बीमारियां?

क्या आजकल आप भी बुखार और पेटदर्द से हैं परेशान, जानें किस वजह से हो रहीं ये बीमारियां?


Why Fever And Stomach Issues Increase In Summer: अगर आपको हाल ही में बुखार, तेज सिरदर्द और पेट खराब जैसी दिक्कतें एक साथ महसूस हो रही हैं, तो आप अकेले नहीं हैं. साल के इस समय में फूड और वाटर-बॉर्न बीमारियां तेजी से बढ़ती हैं. यह सिर्फ संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे मौसम की बड़ी भूमिका होती है. डॉ. सौरदीप  के अनुसार, गर्मी और नमी का मेल बैक्टीरिया और वायरस के लिए सबसे अनुकूल माहौल बना देता है. यानी जो मौसम हमें असहज लगता है, वही इन के पनपने के लिए परफेक्ट होता है. जैसे ही ये शरीर में प्रवेश करते हैं, सबसे पहले आपका डाइजेशन सिस्टम प्रभावित होता है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

शुरुआत पेट से होती है, मतली, उल्टी, पेट में ऐंठन, दस्त, गैस और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं सामने आती हैं. यह स्थिति काफी परेशान करने वाली होती है और इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है. असली समस्या तब बढ़ती है, जब उल्टी और दस्त के कारण शरीर से पानी तेजी से निकलने लगता है और डिहाइड्रेशन हो जाता है.

डिहाइड्रेशन से क्या होती है दिक्कत?

डिहाइड्रेशन सिर्फ प्यास लगने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे शरीर के संतुलन को बिगाड़ देता है. इसी वजह से बुखार और सिरदर्द भी शुरू हो जाते हैं. शरीर इंफेक्शन से लड़ने की कोशिश करता है, लेकिन जब पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है, तो रिकवरी और मुश्किल हो जाती है. सिरदर्द लंबे समय तक बना रहता है और कमजोरी बढ़ती जाती है. 

किन लोगों को इसका खतरा ज्यादा होता है?

कुछ लोग इस समय ज्यादा जोखिम में होते हैं. बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों को खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है. इसके अलावा जो लोग बाहर का खाना ज्यादा खाते हैं, बार-बार यात्रा करते हैं या साफ पानी नहीं पीते, उनमें इंफेक्शन का खतरा ज्यादा होता है. अगर शरीर पहले से ही डिहाइड्रेटेड या कमजोर है, तो बीमारी जल्दी पकड़ लेती है. 

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कैसे कर सकते हैं इससे बचाव?

बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि पानी और खाने को लेकर सख्ती. हमेशा उबला या फिल्टर किया हुआ पानी ही पिएं. बाहर का कच्चा या खुला खाना खाने से बचें, चाहे वह कितना भी अच्छा क्यों न लगे. हमेशा ताजा और गरम खाना ही खाएं, क्योंकि गर्मी से ज्यादातर बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं. हाथ धोना एक साधारण लेकिन बेहद जरूरी आदत है. खाने से पहले और टॉयलेट के बाद हाथ जरूर धोएं। यह छोटी सी आदत आपको कई बीमारियों से बचा सकती है. अगर आप बीमार हो जाते हैं, तो हाइड्रेशन सबसे जरूरी हो जाता है। सिर्फ पानी ही नहीं, बल्कि ओआरएस या नारियल पानी जैसे तरल पदार्थ लें, ताकि शरीर को जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स मिल सकें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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