सिर्फ दर्दनाक नहीं, जानलेवा भी हो सकता है किडनी स्टोन, जानें सेप्सिस कब बन जाता है असली दुश्मन?

सिर्फ दर्दनाक नहीं, जानलेवा भी हो सकता है किडनी स्टोन, जानें सेप्सिस कब बन जाता है असली दुश्मन?


When Kidney Stones Become Life Threatening: किडनी स्टोन आज के समय में एक आम समस्या बन चुकी है. नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार, हर 10 में से 1 व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी किडनी स्टोन की समस्या होती है. अधिकतर मामलों में किडनी स्टोन दर्दनाक जरूर होता है, लेकिन जानलेवा नहीं. असली खतरा तब पैदा होता है, जब यह यूरिन के रास्ते को ब्लॉक कर देता है या किडनी में इंफेक्शन फंसा देता है. 

क्या होती है दिक्कत?

2024 की एक मेडिकल रिव्यू के मुताबिक, ब्लॉक और इंफेक्शन वाले स्टोन तेजी से सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकते हैं, अगर समय पर इलाज न मिले. एक्सपर्ट किडनी स्टोन से मौत बहुत कम मामलों में होती है, लेकिन यह संभव है, खासकर जब दिक्कतें बढ़ जाती हैं.  सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब किडनी में ब्लॉकेज के साथ इंफेक्शन हो जाता है, जिसे ऑब्स्ट्रक्टिव पायलोनेफ्राइटिस या पायोनेफ्रोसिस कहा जाता है. 

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एक्सपर्ट के मुताबिक, जब स्टोन यूरेटर में फंस जाता है, तो यूरिन का प्रवाह रुक जाता है. इससे किडनी में दबाव बढ़ता है, सूजन आती है और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं. अगर इस स्थिति में इंफेक्शन हो जाए, तो एंटीबायोटिक दवाएं भी ठीक से काम नहीं कर पातीं और सेप्सिस का खतरा बढ़ जाता है. 

इ़लाज में देरी से स्थिति गंभीर 

रिपोर्ट्स बताती हैं कि अगर ऐसे मामलों में इलाज में देरी हो जाए, तो स्थिति गंभीर हो सकती है. जर्नल ऑफ नेपाल मेडिसिन एसोसिएसन के अनुसार, ऐसी स्थिति में तुरंत ड्रेनेज सर्जरी के जरिए यूरिन निकालना जरूरी होता है, क्योंकि सिर्फ दवाओं से इलाज संभव नहीं होता. किडनी स्टोन कब खतरनाक हो सकता है, इसे पहचानना बेहद जरूरी है. Mayo Clinic के अनुसार, अगर तेज दर्द के साथ बुखार, ठंड लगना, पेशाब में जलन या बदबू, उल्टी या पेशाब कम होना जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

क्या है बचाव का रास्ता?

इसके अलावा, बड़े स्टोन 7 मिमी या उससे ज्यादा यूरिन के रास्ते को ज्यादा आसानी से ब्लॉक कर सकते हैं. यूरोपियन रेडियोलॉजी के अनुसार, छोटे स्टोन खुद निकल सकते हैं, लेकिन बड़े स्टोन के लिए इलाज जरूरी हो सकता है. डॉ. विशाल का कहना है कि समय पर इलाज से किडनी स्टोन की दिक्कतों को लगभग पूरी तरह रोका जा सकता है. ज्यादा पानी पीना, लक्षणों को नजरअंदाज न करना और समय पर जांच कराना सबसे जरूरी कदम हैं. किडनी स्टोन आमतौर पर जानलेवा नहीं होता, लेकिन अगर यह यूरिन के रास्ते को ब्लॉक कर दे और इंफेक्शन हो जाए, तो स्थिति तेजी से गंभीर बन सकती है. ऐसे में समय पर इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपकी आंखों में भी नजर आते हैं धब्बे? तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना…

क्या आपकी आंखों में भी नजर आते हैं धब्बे? तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना…


When Eye Floaters Are Dangerous: क्या आपकी आंखों के सामने छोटे-छोटे धब्बे, लकीरें या तैरती हुई आकृतियां नजर आती हैं? अगर हां, तो इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है. आमतौर पर यह समस्या सामान्य मानी जाती है, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकती है. आंखों में दिखाई देने वाले इन धब्बों को मेडिकल भाषा में “आई फ्लोटर्स” कहा जाता है. ये अक्सर उम्र बढ़ने या नजर कमजोर होने के साथ दिखाई देते हैं. 

छोटी रेखाओं या धुंधले धब्बों की तरह दिखना

कई बार ये छोटी-छोटी रेखाओं या धुंधले धब्बों की तरह नजर आते हैं, जो आंखों के सामने तैरते हुए महसूस होते हैं. आमतौर पर पलक झपकाने पर ये कम हो जाते हैं और दिमाग भी इन्हें नजरअंदाज कर देता है,  लेकिन हाल ही में Radboud University Medical Center की एक स्टडी में इन फ्लोटर्स को लेकर चेतावनी दी गई है. मार्च 2026 में सामने आई इस रिसर्च के मुताबिक, अगर ये धब्बे लगातार दिखने लगें या अचानक बढ़ जाएं, तो यह आंखों की गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है. 

किस दिक्कत की चेतावनी?

यह रिसर्च Annals of Family Medicine में प्रकाशित हुई है, जिसमें करीब 42 हजार मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों को बार-बार फ्लोटर्स, रोशनी की फ्लैश या दोनों लक्षण दिखाई दिए, उनमें से कुछ मामलों में रेटिना डिटैचमेंट जैसी गंभीर समस्या सामने आई. रेटिना डिटैचमेंट एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें आंख की अंदरूनी परत अपनी जगह से अलग होने लगती है. यह आंख का बेहद अहम हिस्सा होता है, जो रोशनी को पहचानने का काम करता है. अगर समय पर इसका इलाज न हो, तो यह नजर जाने तक की स्थिति पैदा कर सकता है.

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किन लोगों में बढ़ता है जोखिम?

स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को फ्लोटर्स के साथ-साथ फ्लैश दिखाई देते हैं, उनमें जोखिम और बढ़ जाता है. हालांकि यह खतरा हर किसी में नहीं होता, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी सही नहीं माना जाता. ब्रिटेन की हेल्थ सर्विस NHS के मुताबिक, कई बार यह समस्या “पोस्टीरियर विट्रियस डिटैचमेंट” के कारण होती है, जो आमतौर पर नुकसानदेह नहीं होती. इसमें आंख के अंदर मौजूद जेल जैसी संरचना में बदलाव होता है और कोलेजन के छोटे-छोटे गुच्छे बन जाते हैं. फिर भी, अगर ये धब्बे अचानक ज्यादा दिखने लगें, लगातार बने रहें या इसके साथ रोशनी की चमक, छाया या नजर धुंधली होने जैसी दिक्कतें हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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8 घंटे से ज्यादा बैठना स्मोकिंग जितना खतरनाक! जानें वे 8 आदतें, जो समय से पहले बना रहीं बूढ़ा

8 घंटे से ज्यादा बैठना स्मोकिंग जितना खतरनाक! जानें वे 8 आदतें, जो समय से पहले बना रहीं बूढ़ा


Everyday Habits That Make You Age Faster: आजकल हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना ट्रेंड बन गया है. लोग शराब छोड़ रहे हैं, जंक फूड से दूरी बना रहे हैं और फिट रहने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद एक सच्चाई ऐसी है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वह है कि हमारी रोजमर्रा की कुछ आदतें धीरे-धीरे उम्र बढ़ाने का काम कर रही होती हैं. एजिंग सिर्फ झुर्रियों या सफेद बालों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदर, सेल्स के स्तर पर भी होती है. चलिए इनके बारे में बताते हैं. 

लंबे समय तक बैठे रहना

सबसे पहली आदत है लंबे समय तक बैठे रहना. 13 स्टडीज पर आधारित यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक मेटा-एनालिसिस, जिसमें 10 लाख से ज्यादा लोग शामिल थे, यह दिखाता है कि जो लोग रोज 8 घंटे से ज्यादा बैठते हैं और एक्सरसाइज नहीं करते, उनमें मृत्यु का खतरा मोटापे या स्मोकिंग जितना हो सकता है. हालांकि, रोज 60-75 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी इस खतरे को कम कर सकती है। लंबे समय तक बैठे रहने से मेटाबॉलिज्म धीमा होता है और शरीर के डीएनए के टेलोमीयर तेजी से छोटे होते हैं, जो एजिंग को बढ़ाते हैं. 

नींद की कमी

दूसरी बड़ी वजह है नींद की कमी. अगर आप सोचते हैं कि 5 घंटे की नींद काफी है, तो यह शरीर के साथ समझौता है. नेशनल हार्ट लंग्स एंड ब्लड इंस्टिट्यूट के अनुसार, उम्र के हिसाब से नींद की जरूरत अलग-अलग होती है और इसकी अनदेखी लंबे समय में स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ा सकती है.  नींद के दौरान शरीर खुद को रिपेयर करता है, हार्मोन बैलेंस करता है और एनर्जी को रिस्टोर करता है.  लगातार नींद पूरी न होने से स्किन, इम्यूनिटी और याददाश्त पर असर पड़ता है.

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तनाव में रहने की आदत

तीसरी आदत है लगातार तनाव में रहना, जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो त्वचा को नुकसान पहुंचाता है और झुर्रियों को जल्दी लाता है। इसके अलावा यह दिल, डाइजेशन और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है. 

स्क्रीन टाइम और कम पानी पीने की समस्या

चौथी समस्या है जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम. मोबाइल और लैपटॉप का अधिक इस्तेमाल नींद के चक्र को बिगाड़ता है और ब्लू लाइट के कारण स्किन पर भी असर डाल सकता है. देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत एजिंग को तेज कर सकती है. पांचवीं आदत है पानी कम पीना. डिहाइड्रेशन से त्वचा बेजान दिखती है और शरीर के कई जरूरी फंक्शन धीमे पड़ जाते हैं. पानी शरीर को डिटॉक्स करने और सही तरीके से काम करने में मदद करता है.

ये भी आदतें शामिल

छठी आदत है ज्यादा चीनी और प्रोसेस्ड फूड का सेवन. ज्यादा शुगर शरीर में ग्लाइकेशन प्रक्रिया को बढ़ाती है, जिससे त्वचा की इलास्टिसिटी कम हो जाती है और झुर्रियां जल्दी आती हैं. सातवीं आदत है स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को नजरअंदाज करना. उम्र के साथ मसल्स कम होते हैं और अगर एक्सरसाइज न की जाए तो यह प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे शरीर कमजोर और सुस्त हो सकता है. आठवीं और अहम आदत है सोशल कनेक्शन को नजरअंदाज करना. रिसर्च में पाया गया है कि अकेलापन और सामाजिक दूरी समय से पहले मौत के खतरे को बढ़ा सकते हैं.

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क्या आप भी अंजीर को समझते हैं मामूली मेवा? हड्डियों से दिल तक इसके फायदे उड़ा देंगे आपके होश!

क्या आप भी अंजीर को समझते हैं मामूली मेवा? हड्डियों से दिल तक इसके फायदे उड़ा देंगे आपके होश!


Benefits Of Soaked Figs In The Morning: आजकल सुपरफूड्स की चर्चा में अक्सर महंगे और विदेशी विकल्प छा जाते हैं, लेकिन एक साधारण सा फल अंजीर भी हमारी सेहत के लिए उतना ही फायदेमंद हो सकता है. डॉ.  शुभम वात्स्य ने हाल ही में इस पर ध्यान दिलाते हुए अपने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि लोग अंजीर के पोषण को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह शरीर के लिए कई तरह से लाभकारी है. चलिए आपको बताते हैं कि उन्होंने इसके बारे में क्या बताया और यह हमारे लिए कैसे फायदेमंद है. 

किस तरह हमारे लिए फायदेमंद?

फोर्ट हॉस्पिटल वसंत कुंज के सीनियर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. वात्स्य के मुताबिक, अंजीर खास तौर पर डाइजेशन के लिए बेहद फायदेमंद है। इसमें घुलनशील और अघुलनशील दोनों तरह का फाइबर पाया जाता है, जो इसे अन्य फलों से अलग बनाता है. यही वजह है कि यह कब्ज की समस्या में राहत देने में मदद करता है और मल को नरम बनाकर पाचन प्रक्रिया को आसान करता है. लेकिन अंजीर के फायदे सिर्फ पाचन तक सीमित नहीं हैं. यह शरीर को कई और जरूरी पोषक तत्व भी देता है. उदाहरण के तौर पर, इसमें कैल्शियम की अच्छी मात्रा होती है, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करती है. जिन लोगों को बोन डेंसिटी की समस्या है, उनके लिए अंजीर एक नेचुरल विकल्प बन सकता है. 

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एनर्जी का अच्छा विकल्प

इसके अलावा, अंजीर में मौजूद आयरन शरीर की एनर्जी को बढ़ाने में मदद करता है. यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करता है, जिससे दिनभर एक्टिव रहने में आसानी होती है. वहीं, इसमें मौजूद पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स दिल की सेहत के लिए फायदेमंद माने जाते हैं. ये तत्व ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करते हैं और हार्ट को स्वस्थ बनाए रखते हैं. 

 

कोलेस्ट्रॉल को करता है कंट्रोल

डॉ. वात्स्य आगे बताते हैं कि अंजीर का फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में भी मदद करता है. नियमित सेवन से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम हो सकता है, जिससे हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा घटता है. अंजीर खाने का सही तरीका भी उतना ही जरूरी है। सूखे अंजीर को सीधे खाने के बजाय रातभर पानी में भिगोकर सुबह खाने की सलाह दी जाती है. इससे यह नरम हो जाता है और पाचन में आसानी होती है। रोजाना 2 से 3 भीगे हुए अंजीर लेना पर्याप्त माना जाता है. अगर अंजीर का सही तरीके से सेवन किया जाए, तो यह रोजमर्रा की डाइट में एक उपयोगी हिस्सा बन सकता है.

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धमनियों में जमा प्लाक बढ़ा सकता है मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानें हार्ट ब्लॉकेज की वॉर्निंग

धमनियों में जमा प्लाक बढ़ा सकता है मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानें हार्ट ब्लॉकेज की वॉर्निंग


Early Symptoms Of Heart Artery Blockage: हार्ट ब्लॉकेज यानी कोरोनरी आर्टरी डिजीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिल तक खून पहुंचाने वाली आर्टरीज संकरी या ब्लॉक होने लगती हैं. ऐसा आमतौर पर आर्टरीज में प्लाक जमा होने की वजह से होता है, जिससे हार्ट तक ऑक्सीजन युक्त ब्लड फ्लो कम हो जाता है. यह स्थिति आगे चलकर हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ा सकती है. अक्सर लोग दिल की बीमारी को अचानक होने वाले तेज सीने के दर्द से जोड़कर देखते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसके कई शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं और लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

कार्डियक साइंसेज के एक्सपर्ट डॉक्टर प्रवीण रमण मिश्रा ने  TOI को बताया कि हार्ट की धमनियों में ब्लॉकेज होने पर सबसे सामान्य लक्षण सीने में दर्द या दबाव हो सकता है. कई लोग इसे सीने में भारीपन, जकड़न या जलन जैसा महसूस करते हैं. हालांकि यह दर्द हमेशा तेज नहीं होता, बल्कि कई बार आता-जाता रहता है, खासकर जब व्यक्ति फिजिकल एक्टिविटी करता है या तनाव में होता है. इसके अलावा सांस फूलना भी एक अहम संकेत हो सकता है. कुछ लोगों को सीढ़ियां चढ़ते समय, थोड़ी दूरी चलने पर या सामान्य काम करते हुए भी सांस लेने में कठिनाई महसूस होने लगती है.

क्या होते हैं लक्षण?

डॉक्टर बताते हैं कि हार्ट ब्लॉकेज होने पर असामान्य थकान भी महसूस हो सकती है. जब हार्ट तक पर्याप्त ऑक्सीजन वाला खून नहीं पहुंचता, तो शरीर में लगातार कमजोरी और थकान महसूस होती है. कई मामलों में दर्द सिर्फ सीने तक सीमित नहीं रहता बल्कि हाथों, गर्दन, जबड़े या पीठ तक फैल सकता है. लोग अक्सर इसे मसल्स के दर्द या गैस-एसिडिटी समझ लेते हैं. इसके अलावा चक्कर आना, मतली महसूस होना या बिना किसी खास वजह के ज्यादा पसीना आना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं, खासकर जब ये लक्षण फिजिकल एक्टिविटी के दौरान दिखाई दें.

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कैसे कर सकते हैं कंट्रोल?

एक्सपर्ट के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान, हाई कोलेस्ट्रॉल और किसी तरह की शारीरिक एक्टिविटी का न होना हार्ट की आर्टरीज में ब्लॉकेज का खतरा बढ़ा सकती है. इसलिए दिल की सेहत बनाए रखने के लिए रेगुलर व्यायाम, संतुलित आहार और समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना बेहद जरूरी है. अगर इसके लक्षण बार-बार दिखाई दें या बढ़ने लगें, तो तुरंत कार्डियोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर माना जाता है, ताकि समय रहते गंभीर दिक्कतों से बचा जा सके. अगर आप इन लक्षणों कोे इग्नोर करेंगे, तो हो सकता है कि आगे चलकर आपको दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

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पैरों में क्यों जमा हो जाते हैं खून के थक्के? वैज्ञानिकों ने बता दी डराने वाली वजह

पैरों में क्यों जमा हो जाते हैं खून के थक्के? वैज्ञानिकों ने बता दी डराने वाली वजह


Why Do Blood Clots Form In Legs: पैरों में अचानक दर्द, सूजन या भारीपन महसूस होना कई बार साधारण समस्या लग सकता है, लेकिन इसके पीछे खून के थक्के बनने जैसी गंभीर वजह भी हो सकती है. मेडिकल भाषा में इसे वेनस थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है, जिसमें खून गाढ़ा होकर नसों में जमने लगता है और ब्लॉकेज पैदा कर देता है. अगर यही थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा स्थिति यानी पल्मोनरी एम्बोलिज्म का कारण बन सकता है.

क्या निकली है दिक्कत?

हाल ही में लुंड विश्वविद्यालय के साइंटिस्ट की एक रिसर्च में इस समस्या को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है. इस स्टडी में पाया गया कि सिर्फ लाइफस्टाइल ही नहीं, बल्कि कुछ खास जीन भी खून के थक्के बनने के खतरे को काफी बढ़ा सकते हैं. यह रिसर्च “माल्मो डाइट एंड कैंसर स्टडी” के तहत करीब 30 हजार लोगों के डेटा पर की गई. इसमें वैज्ञानिकों ने 27 ऐसे जीन का अध्ययन किया, जो ब्लड क्लॉटिंग से जुड़े होते हैं.  एनालिसिस के बाद तीन प्रमुख जीन ABO, F8 और VWF की पहचान की गई, जो इस खतरे को बढ़ाते हैं.

रिसर्च के अनुसार, इनमें से हर एक जीन अकेले 10 से 30 प्रतिशत तक जोखिम बढ़ा सकता है. लेकिन अगर किसी व्यक्ति में ऐसे कई जेनेटिक फैक्टर एक साथ मौजूद हों, तो खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है. जिन लोगों में पांच तक ऐसे जोखिम कारक पाए गए, उनमें ब्लड क्लॉट बनने का खतरा 180 प्रतिशत तक ज्यादा देखा गया. यह खोज इस बात को समझने में मदद करती है कि कुछ लोग बिना किसी स्पष्ट वजह के भी इस समस्या का शिकार क्यों हो जाते हैं. साइंटिस्ट ने यह भी बताया कि “फैक्टर V लीडेन” नाम का एक जेनेटिक म्यूटेशन पहले से जाना जाता है, जो खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति को बढ़ाता है.

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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका

हालांकि, सिर्फ जीन ही नहीं, लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना, जैसे लंबी फ्लाइट या सर्जरी के बाद बेड रेस्ट, ब्लड फ्लो को धीमा कर देता है और थक्के बनने का खतरा बढ़ा देता है. इसके अलावा मोटापा, बढ़ती उम्र और ज्यादा लंबाई भी इस जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने गए हैं. खानपान भी इसमें भूमिका निभा सकता है. कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाने से खतरा बढ़ सकता है, जबकि फलों, सब्जियों और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर डाइट जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है.

इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है

एक्सपर्ट का मानना है कि भविष्य में इस तरह की जेनेटिक जानकारी के आधार पर इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है. इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस मरीज को कितने समय तक ब्लड थिनर दवाओं की जरूरत है.

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