30 की उम्र में ही दिल पर मंडराने लगता है खतरा, महिलाओं को जरूर रहना चाहिए अलर्ट

30 की उम्र में ही दिल पर मंडराने लगता है खतरा, महिलाओं को जरूर रहना चाहिए अलर्ट


हार्ट अटैक दिन-प्रतिदिन सामान्य होते जा रहे हैं. यह सुनने में अजीब तो लग रहा होगा, लेकिन यह डरावना सत्य हमें सतर्क करने के लिए काफी है. फिर भी लोग इस बात को काफी नजरअंदाज कर रहे हैं, जैसे कि यह कोई समस्या ही नहीं है. अगर बात करें महिलाओं की, तो 30 से 40 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को यह खतरा कुछ ज्यादा ही तेजी से घेरता जा रहा है. महिलाएं ज्यादातर शुरुआती चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे सही समय पर जांच नहीं हो पाती और जब होती है, तब तक काफी देर हो जाती है.

हाल की कहानी

साउथ मुंबई में रहने वाली 35 साल की वर्किंग प्रोफेशनल ऋचा कुमार दो बच्चों की मां हैं. उन्होंने हमेशा अपने आप को फिट समझा. वह हमेशा थोड़ी सी थकान और छाती में हल्के दर्द जैसे इशारों को काम के लोड के कारण होने वाली तकलीफ समझकर नजरअंदाज करती रहीं. जनवरी 2026 में अचानक सीने में तेज दर्द होने के कारण उन्हें हार्ट अटैक आया. आगे जांच करने पर पता चला कि यह जेनेटिकली जुड़ा हुआ है, क्योंकि उनके पापा को भी उनकी 35 की उम्र में यह दिक्कतें आई थीं. ऋचा ने समय रहते एंजियोप्लास्टी करवाई और चौथे दिन ही 80 प्रतिशत ब्लॉकेज से राहत पा ली.

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एक्सपर्ट की राय

Dr. Bipeenchandra Bhaame के अनुसार, “ऐसे बहुत मरीज हैं जो कम उम्र में ही दिल से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.” आगे बताते हुए उन्होंने कहा, “हम युवा महिलाओं, खासकर 30 से 40 के बीच की महिलाओं में ये लक्षण ज्यादा देख रहे हैं. जेनेटिक्स इसमें एक अहम भूमिका निभाता है. बहुत से लोगों को मोटापे की दिक्कत या तंबाकू की लत नहीं होती, फिर भी वे अपने पारिवारिक इतिहास के कारण इसका शिकार बन जाते हैं. महिलाएं समय के अभाव के कारण हल्के सीने के दर्द और सांस फूलने जैसी परेशानियों को नजरअंदाज कर देती हैं. इन सब से लड़ने के लिए संतुलित आहार, रोजाना व्यायाम, तनाव प्रबंधन और ध्यान काफी मददगार साबित होते हैं.”

Dr. Sonamm Tiwari के अनुसार, “महिलाओं की हृदय से जुड़ी सेहत उनकी जिम्मेदारियों के कारण नजरअंदाज कर दी जाती है, क्योंकि महिलाओं में पुरुषों जैसे लक्षण नहीं दिखते. हार्मोनल बदलाव और गर्भावस्था से जुड़ी समस्याएं उनके दिल पर असर डाल सकती हैं. महिलाओं में थकावट, पीठ का दर्द, जबड़े का दर्द जैसे संकेत देखने को मिलते हैं. समय पर जांच एक अहम भूमिका निभाती है, इसलिए इसे नजरअंदाज न करें.”

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वयस्कों में अकेलापन से दिल की बीमारी का खतरा, चौंका देगी यह स्टडी

वयस्कों में अकेलापन से दिल की बीमारी का खतरा, चौंका देगी यह स्टडी


Loneliness Heart Disease Risks : आजकल बहुत से लोग भीड़ में रहकर भी खुद को अकेला महसूस करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह अकेलापन सिर्फ मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि शरीर की गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकता है. हाल ही में एक बड़ी और चौंकाने वाली रिसर्च में यह सामने आया है कि जो लोग खुद को ज्यादा अकेला महसूस करते हैं, उनमें दिल के वाल्व (Heart Valve) की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है. यह अध्ययन Journal of the American Heart Association में प्रकाशित हुआ है. ऐसे में आइए जानते हैं कि वयस्कों में अकेलापन से दिल की बीमारी का खतरा क्यों होता है और स्टडी में क्या पाया गया. 

वयस्कों में अकेलापन से दिल की कौन सी बीमारी का खतरा होता है

वयस्कों में अकेलापन से दिल के वाल्व (Heart Valve) की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है. दिल में चार मुख्य वाल्व होते हैं, जो खून के सही बहाव को कंट्रोल करते हैं. जब इनमें से कोई भी वाल्व सही से काम नहीं करता, तो इसे वाल्वुलर हार्ट डिजीज (Valvular Heart Disease) कहा जाता है.  इस बीमारी में दिल से खून का बहाव सही तरीके से नहीं हो पाता है. दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, धीरे-धीरे दिल कमजोर हो सकता है और गंभीर स्थिति में सर्जरी तक की जरूरत पड़ सकती है. 
 
स्टडी में क्या पाया गया?

इस रिसर्च में लगभग 4.63 लाख लोगों को शामिल किया गया, जो UK Biobank से जुड़े थे. इन लोगों की सेहत को लगभग 14 साल तक ट्रैक किया गया.  जो लोग ज्यादा अकेलापन महसूस करते हैं, उनमें दिल की वाल्व बीमारी का खतरा 19 प्रतिशत ज्यादा पाया गया. वहीं जिसमें Aortic valve stenosis का खतरा 21 प्रतिशत बढ़ा और Mitral valve regurgitation का खतरा 23  प्रतिशत बढ़ा पाया गया. 

वयस्कों में अकेलापन से दिल की बीमारी का खतरा क्यों होता है

स्टडी में बहुत दिलचस्प बात सामने आई कि जब व्यक्ति अंदर से खुद को अकेला महसूस करता है तब व्यक्ति दूसरों से कम मिलता-जुलता है. रिसर्च में पाया गया कि सिर्फ अकेलापन महसूस करना दिल की बीमारी से जुड़ा है, लेकिन अकेले रहना सीधे तौर पर इतना बड़ा कारण नहीं पाया गया. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्टडी ऑब्जर्वेशनल (observational) है. इससे यह साबित नहीं होता कि अकेलापन सीधे बीमारी पैदा करता है, लेकिन दोनों के बीच एक मजबूत संबंध जरूर दिखाई देता है. 

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कौन सी आदतें बढ़ाती हैं दिल की बीमारी खतरा

स्टडी में यह भी पाया गया कि अकेलेपन से जुड़ी कुछ आदतें इस बीमारी को और बढ़ा सकती हैं, जैसे धूम्रपान करना, शराब का ज्यादा सेवन, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और खराब नींद ये सभी चीजें मिलकर दिल की सेहत को कमजोर करती हैं. 

एक्सपर्ट्स की राय क्या है?

विशेषज्ञों का कहना है कि अकेलापन सिर्फ इमोशनल समस्या नहीं है, यह शरीर को भी प्रभावित करता है. इसे गंभीरता से लेना चाहिए और मरीजों से डॉक्टरों को मानसिक स्थिति के बारे में भी बात करनी चाहिए विशेषज्ञ के अनुसार अगर अकेलेपन को कम किया जाए, तो दिल की बीमारी की गति धीमी हो सकती है और कई मामलों में सर्जरी की जरूरत भी टल सकती है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ता है. साथ ही अकेलापन भी बढ़ने लगता है. इसलिए बुजुर्ग लोगों में यह जोखिम और भी ज्यादा हो सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से बच्चे को हो जाती है ऑटिज्म? स्टडी में सामने आया सच

क्या प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से बच्चे को हो जाती है ऑटिज्म? स्टडी में सामने आया सच


Paracetamol Pregnancy Risks : प्रेग्नेंसी के दौरान दवाइयों को लेकर अक्सर महिलाओं के मन में डर और सवाल होते हैं. खासकर जब बात दर्द या बुखार की हो तो यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि दवा लेना सही है या नहीं. पिछले कुछ समय में यह बात भी काफी फैली कि अगर प्रेग्नेंसी के दौरान पैरासीटामॉल (अमेरिका में जिसे टाइलेनॉल कहा जाता है) लिया जाए तो इससे बच्चे में ऑटिज्म होने का खतरा बढ़ सकता है. इस दावे ने दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी, लेकिन अब एक बड़ी और भरोसेमंद रिसर्च ने इस बात को साफ कर दिया है.

मेडिकल जर्नल The Lancet Obstetrics, Gynaecology & Women’s Health में प्रकाशित एक बड़ी रिसर्च अध्ययन के अनुसार, प्रेग्नेंसी के दौरान सही तरीके से पैरासीटामॉल लेने और बच्चों में ऑटिज्म, ADHD या बच्चों के मानसिक विकास के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया. ऐसे में आइए जानते हैं कि लेकर स्टडी में और क्या-क्या सामने आया. 

क्या कहती है नई स्टडी?

इस बड़ी रिसर्च में 43 अलग-अलग क्लिनिकल स्टडीज का विश्लेषण किया गया. इसके अलावा स्वीडन में लगभग 25 लाख बच्चों के डेटा का अध्ययन भी शामिल था. शोधकर्ताओं ने खासतौर पर सिबलिंग कंपेरिजन तरीका अपनाया यानी एक ही मां के उन बच्चों की तुलना की गई, जिनमें एक प्रेग्नेंसी के दौरान पैरासीटामॉल लिया गया था और दूसरे में नहीं. ऐसे में इसका रिजल्ट साफ था, दोनों बच्चों में ऑटिज्म या अन्य मानसिक समस्याओं के खतरे में कोई अंतर नहीं मिला. 

क्या प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से बच्चे को ऑटिज्म हो जाती है?

पहले की कुछ स्टडीज में प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से हल्का संबंध दिखा था, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने बताया कि यह असली कारण नहीं था. असल में, जिन महिलाओं ने पैरासीटामॉल लिया उन्हें बुखार, दर्द या संक्रमण जैसी समस्याएं थीं. ये समस्याएं खुद भी बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकती हैं. साथ ही जेनेटिक कारण भी भूमिका निभाते हैं. इन्हीं कन्फाउंडिंग फैक्टर्स की वजह से पहले गलत निष्कर्ष निकाले गए. जिसके कारण लोगों को लगा कि  प्रेग्नेंसी में पैरासीटामॉल खाने से बच्चे को ऑटिज्म हो जाती है. 

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार, पैरासीटामॉल आज भी प्रेग्नेंसी में सबसे सुरक्षित दर्द निवारक दवा मानी जाती है. यह NSAIDs और ओपिओइड्स से ज्यादा सुरक्षित है. इसे कम मात्रा में और जरूरत पड़ने पर लेना सही है. यह दवा World Health Organization (WHO) की जरूरी दवाओं की सूची में भी शामिल है. 

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कब ये दवा न लेना खतरनाक हो सकता है?

कई बार डर के कारण महिलाएं दवा लेने से बचती हैं, लेकिन यह ज्यादा खतरनाक हो सकता है. अगर प्रेग्नेंसी में बुखार का इलाज न किया जाए या दर्द को नजरअंदाज किया जाए तो इससे अबॉर्शन का खतरा, समय से पहले डिलीवरी (Preterm Birth) या बच्चे में जन्मजात समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज लेना बेहद जरूरी है. 

प्रेग्नेंसी में महिलाओं के लिए सही क्या है?

 1. जब सच में जरूरत हो तभी पैरासीटामॉल लें.

2. दवा लेने से पहले और दौरान डॉक्टर की सलाह जरूर मानें.

3. अपने मन से ज्यादा मात्रा या लंबे समय तक दवा न लें.

4. बुखार या दर्द को नजरअंदाज न करें, समय पर इलाज कराएं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गर्मी में धूप में घूमते-घूमते गायब हो जाती है एनर्जी, ये काम करेंगे तो दिनभर रहेंगे एक्टिव

गर्मी में धूप में घूमते-घूमते गायब हो जाती है एनर्जी, ये काम करेंगे तो दिनभर रहेंगे एक्टिव


Summer Health Tips: गर्मी का मौसम शुरू होते ही तेज धूप और बढ़ता तापमान हमारे डेली रूटीन और सेहत पर असर डालने लगता है. आजकल इतनी ज्यादा गर्मी पड़ रही है कि थोड़ी देर बाहर रहने पर ही शरीर थक जाता है. कई लोगों को चक्कर आना, सिर दर्द, कमजोरी या बेहोशी जैसी दिक्कतें भी होने लगती हैं, जिसका बड़ा कारण शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन और तेज गर्मी होता है. लेकिन अगर आप अपने रूटीन और खानपान में थोड़े बदलाव कर लें, तो इस समस्या से बचा जा सकता है.

सही मात्रा में पानी पीना, हल्का और ठंडक देने वाला खाना खाना, और धूप से बचाव करना आपको दिनभर एनर्जेटिक और एक्टिव बनाए रख सकता है. तो आइए जानते हैं कि  गर्मी में धूप में घूमते-घूमते एनर्जी कैसे गायब हो जाती है और एनर्जी को दिनभर एक्टिव रखने के लिए क्या करें. 

गर्मी में धूप में घूमते-घूमते एनर्जी कैसे गायब हो जाती है

गर्मी में धूप में घूमते-घूमते तेज तापमान का सीधा असर शरीर पर पड़ता है. जब आप धूप में रहते हैं, तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा पसीना निकालता है. इस प्रक्रिया में शरीर से पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर निकल जाते हैं, जिससे डिहाइड्रेशन हो जाता है. वहीं पानी की कमी होने पर ब्लड सर्कुलेशन धीमा पड़ता है और शरीर को सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता, जिससे थकान, कमजोरी और चक्कर आने लगते हैं. इसके अलावा तेज धूप में शरीर का तापमान बढ़ जाता है, जिससे दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और एनर्जी तेजी से खर्च होती है. यही कारण है कि गर्मी में थोड़ी देर धूप में रहने पर भी शरीर जल्दी थका हुआ और सुस्त महसूस करता है. 

एनर्जी को दिनभर एक्टिव रखने के लिए क्या करें

1. शरीर को हाइड्रेट रखें –  गर्मी में सबसे जरूरी है शरीर में पानी की कमी न होने देना. दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहें. प्यास लगने का इंतजार न करें. इसके अलावा आप नारियल पानी, नींबू पानी, छाछ और ओआरएस जैसे पेय भी ले सकते हैं. ये शरीर में जरूरी मिनरल्स और नमक की कमी को पूरा करते हैं. साथ ही तरबूज, खरबूजा, खीरा और संतरा जैसे फल भी खाएं क्योंकि इनमें पानी भरपूर होता है. 

2. खानपान में बदलाव करें – गर्मी के मौसम में हल्का और पाचन के लिए सही खाना खाएं. तला-भुना, मसालेदार और ज्यादा ऑयली खाना शरीर में गर्मी बढ़ाता है.  आप अपनी डाइट में दही, सलाद, मूंग दाल और हरी सब्जियां शामिल करें. साथ ही सुबह भीगे हुए बादाम और केला खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है और कमजोरी दूर होती है. 

 3. धूप से बचाव – कोशिश करें कि दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच बाहर न निकलें, क्योंकि इस समय धूप सबसे ज्यादा तेज होती है. अगर बाहर जाना जरूरी हो, तो सिर को टोपी, दुपट्टे या छाते से ढकें. हल्के रंग के ढीले और सूती कपड़े पहनें, जिससे शरीर को ठंडक मिलती है. 

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4. घर लौटने के बाद ये गलतियां न करें – धूप से आने के तुरंत बाद ठंडा पानी न पिएं. पहले थोड़ा आराम करें और फिर सामान्य तापमान का पानी पिएं. घर आते ही तुरंत नहाने या कपड़े बदलने से बचें. 5 से 10 मिनट आराम करने के बाद ही ऐसा करें. इसके अलावा प से आने के तुरंत बाद सीधे एसी में जाने के बजाय पहले पंखे के नीचे बैठें, ताकि शरीर का तापमान सामान्य हो जाए. 

5. ठंडी चीजों से भी रखें दूरी – धूप से आने के तुरंत बाद आइसक्रीम, ठंडे फल या फ्रिज का पानी लेने से बचें. इससे गले में खराश या कफ की समस्या हो सकती है. 

6. शरीर को आराम और नींद दें –  गर्मी में शरीर जल्दी थक जाता है, इसलिए पूरी नींद लेना बहुत जरूरी है. दिनभर एक्टिव रहने के लिए रात में कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लें. 

7. हल्की एक्सरसाइज और योग करें –  सुबह या शाम के समय हल्की एक्सरसाइज, योग या मेडिटेशन करने से शरीर फिट रहता है और तनाव भी कम होता है. 

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क्या सुबह उठकर आपको भी लगती है थकान? मुंह से सांस लेने की आदत हो सकती है वजह

क्या सुबह उठकर आपको भी लगती है थकान? मुंह से सांस लेने की आदत हो सकती है वजह


How Mouth Breathing Affects Sleep Quality: सांस लेना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर हम शायद ही कभी ध्यान देते हैं. लेकिन यही साधारण-सी लगने वाली आदत हमारे शरीर की ऊर्जा, नींद और लंबी अवधि की सेहत को गहराई से प्रभावित कर सकती है. खासकर तब, जब सांस नाक की बजाय मुंह से ली जा रही हो और वो भी बिना हमें पता चले. अक्सर लोग मानते हैं कि मुंह से सांस लेना सिर्फ तब होता है जब नाक बंद हो या भारी एक्सरसाइज चल रही हो. लेकिन कई मामलों में यह एक आदत बन जाती है, खासकर नींद के दौरान. सुबह उठते समय सूखे होंठ, बार-बार प्यास लगना या हल्की थकान ये सब संकेत हो सकते हैं कि सांस लेने का तरीका बदल गया है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

बेंगलुरु के SDMIAH में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सम्हिता उल्लोड बताती हैं कि “मुंह से सांस लेना यानी नाक की जगह मुंह से सांस लेना एक असामान्य स्थिति मानी जाती है, खासकर अगर यह नींद के दौरान लगातार हो। ऐसे मामलों में सही जांच और इलाज जरूरी होता है.” असल में हमारा शरीर नाक से सांस लेने के लिए ही बना है. नाक सिर्फ हवा का रास्ता नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती है. यह हवा को साफ करती है, उसमें नमी जोड़ती है और धूल व बैक्टीरिया को रोकती है. जब हम मुंह से सांस लेते हैं, तो ये पूरी प्रक्रिया छूट जाती है.

क्या होती है दिक्कत

डॉ. उल्लोड के मुताबिक “नाक से सांस लेने पर हवा फिल्टर होती है, ह्यूमिडिफाई होती है और हानिकारक कणों को शरीर में जाने से रोका जाता है.” लेकिन मुंह से सांस लेने पर ठंडी, सूखी और बिना फिल्टर की हवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है, जिससे समय के साथ सांस लेने पर असर पड़ सकता है. इसका एक और बड़ा असर एनर्जी स्तर पर पड़ता है. कई बार लोग पूरी नींद लेने के बाद भी थकान महसूस करते हैं. इसकी एक वजह मुंह से सांस लेना भी हो सकता है. इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होता है.

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डॉ. उल्लोड बताती हैं कि इससे थकान, ध्यान में कमी और धीरे-धीरे श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा, नींद की गुणवत्ता भी खराब होती है. मुंह से सांस लेने की वजह से नींद बार-बार टूट सकती है, भले ही हमें इसका एहसास न हो. नींद से जुड़ी यह समस्या आगे चलकर स्लीप एपनिया जैसी गंभीर स्थिति को भी बढ़ा सकती है. डॉ. उल्लोड कहती हैं कि यह आदत स्लीप एपनिया को और खराब कर सकती है और नींद को टुकड़ों में बांट देती है.

बच्चों पर क्या होता है असर

बच्चों में इसका असर और भी गहरा हो सकता है। लंबे समय तक मुंह से सांस लेने से चेहरे की बनावट, दांतों की स्थिति और यहां तक कि पोस्टर पर भी असर पड़ सकता है. अच्छी बात यह है कि इस आदत को बदला जा सकता है. लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है कारण को पहचानना. अगर नाक बंद रहती है, एलर्जी है या साइनस की समस्या है, तो पहले उसका इलाज जरूरी है. इसके साथ ही प्राणायाम जैसी ब्रीदिंग एक्सरसाइज,  रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना मददगार साबित हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सफेद बालों को रंगने से डैमेज हो सकता है लिवर? हेयर डाई पर सामने आया बड़ा सच

क्या सफेद बालों को रंगने से डैमेज हो सकता है लिवर? हेयर डाई पर सामने आया बड़ा सच


Can Hair Dye Cause Liver Damage: सैलून की कुर्सी पर बैठे-बैठे जब बालों का रंग बदलता दिखता है, तो मन में एक सवाल जरूर आता है कि क्या ये केमिकल्स वाकई शरीर के लिए नुकसानदेह हैं? तेज गंध और तरह-तरह की बातें सुनकर कई लोगों को लगता है कि हेयर डाई से लिवर तक खराब हो सकता है. लेकिन हकीकत थोड़ी अलग है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

सैफी हॉस्पिटल के हेपेटोलॉजिस्ट और लिवर ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. चेतन कलाल ने  TOI को बताया कि रूटीन तरीके से कॉस्मेटिक हेयर डाई इस्तेमाल करने से आम लोगों में लिवर की गंभीर बीमारी होने का कोई ठोस क्लिनिकल सबूत नहीं है.  इसकी वजह भी सीधी है मार्केट में मिलने वाली ज्यादातर डाई रेगुलेटेड होती हैं और स्कैल्प के जरिए शरीर में इनका एब्जॉर्प्शन बहुत कम होता है. यानी ये केमिकल्स इतनी मात्रा में ब्लडस्ट्रीम तक नहीं पहुंचते कि लिवर को नुकसान पहुंचा सकें.

क्या नहीं होता है नुकसान?

हालांकि, इसका मतलब ये नहीं कि जोखिम बिल्कुल शून्य है. कुछ मामलों में लिवर डैमेज की रिपोर्ट सामने आई है, खासकर जब डाई में मौजूद पैरा-फिनाइलिन डायमीन  जैसे केमिकल शामिल हों. लेकिन ये मामले बेहद रेयर और इडियोसिंक्रेटिक होते हैं, यानी हर व्यक्ति में अलग तरह से, बिना किसी तय पैटर्न के. ये डोज पर निर्भर नहीं होते, बल्कि शरीर की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया पर आधारित होते हैं.

डॉ. हर्षिल एस. शाह बताते हैं कि PPD और अमोनिया जैसे तत्व तब नुकसानदेह हो सकते हैं, जब ये शरीर में ज्यादा मात्रा में प्रवेश करें कि जैसे कि स्कैल्प पर घाव हो या एप्लिकेशन के दौरान फ्यूम्स ज्यादा इनहेल किए जाएं. आम तौर पर इससे स्किन एलर्जी होती है, जो असहज तो होती है, लेकिन खतरनाक नहीं. जिन मामलों में हेयर डाई और हेपेटाइटिस के बीच संबंध पाया गया, उनमें लंबे समय तक या बार-बार इस्तेमाल के साथ पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं भी शामिल थीं. 

कब होती है दिक्कत?

असल चिंता तब बढ़ती है, जब कई जोखिम एक साथ जुड़ जाते हैं जैसे स्मोकिंग. स्मोकिंग खुद लिवर के लिए बड़ा खतरा है. यह ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, सूजन और फाइब्रोसिस को बढ़ाता है, जिससे लिवर डिजीज का खतरा बढ़ जाता है, खासकर अगर फैटी लिवर या शराब का इतिहास हो. ऐसे में जब शरीर केमिकल्स के संपर्क में आता है, तो कुल मिलाकर टॉक्सिक असर बढ़ सकता है. लेकिन डॉ. कलाल का जोर साफ है कि लिवर हेल्थ के लिए हेयर डाई छोड़ने से ज्यादा जरूरी स्मोकिंग छोड़ना है. 

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क्या है इसका उपाय?

तो क्या किया जाए? सबसे बेहतर तरीका है सावधानी के साथ उपयोग. हमेशा भरोसेमंद और रेगुलेटेड ब्रांड की डाई चुनें. अमोनिया-फ्री या हर्बल लिखे होने का मतलब पूरी तरह सुरक्षित होना नहीं है. इनमें भी अलग तरह के केमिकल्स होते हैं. हर बार इस्तेमाल से पहले पैच टेस्ट जरूर करें, ताकि एलर्जी का पता पहले ही चल सके. कभी भी डाई को कटे-फटे या इंफ्लेम्ड स्कैल्प पर न लगाएं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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