क्या फ्रूट जूस पीने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर? जानिए सच्चाई

क्या फ्रूट जूस पीने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर? जानिए सच्चाई


आजकल इंटरनेट पर हर जगह यह कहा जा रहा है कि फ्रूट जूस पीने से डायबिटीज होती है और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? इसका जवाब आपकी सोच से थोड़ा पेचीदा है. यह समझना बहुत ज़रूरी है कि बोली हुई बातों और असल बातों के बीच क्या फर्क है?

एक्सपर्ट की क्या है राय?

BDR Pharmaceuticals के टेक्निकल डायरेक्टर डॉ. अरविंद बडिगेर  के अनुसार फ्रूट जूस को अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए एक अच्छा विकल्प माना जा सकता है, क्योंकि इसमें कई तरह के पोषक तत्व होते हैं. लेकिन इसका ब्लड शुगर को कंट्रोल करने पर असर थोड़ा चिंता का विषय हो सकता है. हालांकि इसे पीना नुकसानदायक नहीं है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कितनी मात्रा में और कब पीते हैं.

एक रिसर्च से पता चलता है कि फ्रूट जूस में ग्लाइसेमिक इंडेक्स मध्यम से थोड़ा ज्यादा होता है, यानी यह जल्दी पचता है और खाने के बाद कुछ समय के लिए ब्लड शुगर बढ़ा सकता है. साथ ही यह एक सामान्य प्रक्रिया है, क्योंकि आप जूस के रूप में ज्यादा मात्रा में शुगर ले रहे होते हैं.

फ्रूट जूस और साबुत फल में फर्क

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि फ्रूट जूस और साबुत फल दोनों में काफी फर्क होता है. साबुत फल में फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जो शरीर में शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. वहीं, जब हम फल का जूस बनाते हैं, तो उसमें से ज्यादातर फाइबर निकल जाता है और केवल शुगर वाला लिक्विड बच जाता है. यही कारण है कि जूस पीने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है.

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क्या फ्रूट जूस नुकसानदायक है?

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फ्रूट जूस पूरी तरह से नुकसानदायक है. कई स्टडी और मेटा-एनालिसिस में यह पाया गया है कि अगर जूस को सीमित मात्रा में पी लिया जाए तो यह सीधे तौर पर डायबिटीज का कारण नहीं बनता. यानी समस्या जूस में नहीं, बल्कि उसकी मात्रा और सेवन के तरीके में होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि जूस पीने के बाद ब्लड शुगर का स्तर जल्दी बढ़ सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद प्राकृतिक शुगर बिना फाइबर के सीधे खून में पहुंच जाती है. यही कारण है कि डायबिटीज या प्रीडायबिटीज वाले लोगों को जूस का सेवन सोच-समझकर करना चाहिए.

फ्रूट जूस में शुगर कैसे काम करती है?

फ्रूट जूस में मौजूद नैचुरल शुगर दो तरह की होती है फ्रक्टोज और ग्लूकोज. यह प्रोसेस्ड ड्रिंक्स से अलग होती है, क्योंकि यह सीधे फलों से आती है. लेकिन फ्रूट जूस पीने के तरीके में एक बड़ा फर्क होता है. जूस बनाने के दौरान फल का ज्यादातर फाइबर निकल जाता है, जबकि फाइबर बहुत जरूरी होता है, क्योंकि यह शरीर में शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. जब फाइबर नहीं होता, तो जूस में मौजूद शुगर जल्दी शरीर में अवशोषित हो जाती है और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है.

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अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या पड़ता है असर? जान लीजिए नुकसान

अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या पड़ता है असर? जान लीजिए नुकसान


Effects of quitting gym suddenly: आजकल फिट रहने के लिए जिम जाना लोगों की लाइफस्टाइल का बहुत जरूरी हिस्सा बन चुका है. नियमित वर्कआउट न सिर्फ शरीर को मजबूत बनाता है, बल्कि मेंटल रूप से भी व्यक्ति को एक्टिव और रिलैक्स रखता है. जिम में एक्सरसाइज करने से मांसपेशियां मजबूत होती है, स्टेमिना बढ़ता है और शरीर में एनर्जी बनी रहती है. यही वजह है की बड़ी संख्या में लोग उत्साह के साथ जिम ज्वाइन करते हैं. लेकिन समय की कमी, आलस या मोटिवेशन की कमी के कारण कई लोग बीच में ही छोड़ देते हैं. ऐसे में शरीर पर इसके कई नेगेटिव असर देखने को मिल सकते हैं. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या असर पड़ता है और इसके नुकसान क्या-क्या होते हैं?

वजन बढ़ने लगता है

जिम छोड़ने के बाद सबसे पहले असर वजन पर पड़ता है. नियमित एक्सरसाइज के दौरान कैलोरीज बर्न होती है या अचानक रुक जाती है. ऐसे में शरीर में एक्स्ट्रा कैलोरी जमा होने लगती है और वजन तेजी से बढ़ सकता है. खासकर पेट की चर्बी बढ़ने का खतरा ज्यादा रहता है.

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मांसपेशियां कमजोर होने लगती है

वर्कआउट के दौरान मांसपेशियां मजबूत और एक्टिव रहती है. लेकिन जिम छोड़ने के बाद धीरे-धीरे उनकी ताकत कम होने लगती है. कुछ हफ्तों में ही मसल्स सिकुड़ने लगती है और शरीर में कमजोरी व थकान महसूस होने लगती है. छोटी-छोटी एक्टिविटी में भी पहले के मुकाबले ज्यादा थकावट महसूस हो सकती है.

सहनशक्ति और स्टैमिना में गिरावट

जिम करने से शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है, लेकिन एक्सरसाइज बंद करते ही यह धीरे-धीरे कम होने लगती है. करीब एक दो हफ्ते में ही शरीर की कार्डियो फिटनेस पर असर दिखने लगता है. वीओ2 मैक्स में गिरावट आने से शरीर की ऑक्सीजन उपयोग करने की क्षमता घटती है और थोड़ी सी मेहनत में भी सांस फूलने लगती है.

मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ता है

नियमित वर्कआउट से मेटाबॉलिज्म तेज रहता है, जिससे शरीर कैलोरी जल्दी बर्न करता है. लेकिन जिम छोड़ने के बाद मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है. इसका सीधा असर वजन और बॉडी फैट पर पड़ता है, जिससे शरीर में चर्बी बढ़ने लगती है.

मानसिक तनाव और मूड पर असर

एक्सरसाइज करने से शरीर में हैप्पी हार्मोन रिलीज होते हैं, जिससे मूड अच्छा रहता है. लेकिन वर्कआउट बंद करने के कुछ ही दिनों में मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ सकता है. कई लोगों को थकान, उदासी और मोटिवेशन की कमी महसूस होने लगती है.

ब्लड शुगर और बीमारियों का खतरा

एक्सरसाइज बंद करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है. क्योंकि शरीर ग्लूकोज का उपयोग कम करने लगता है. लंबे समय तक एक्टिविटी कम करने से इंसुलिन संवेदनशीलता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ता है. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट प्रॉब्लम जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.

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क्या सप्लीमेंट्स लेने के बावजूद नहीं मिल रहा फायदा? डॉक्टर ने बताया असली कारण

क्या सप्लीमेंट्स लेने के बावजूद नहीं मिल रहा फायदा? डॉक्टर ने बताया असली कारण


Supplements Intake Timing : आजकल बहुत से लोग अपनी सेहत सुधारने के लिए तरह-तरह के सप्लीमेंट्स लेते हैं. कोई विटामिन D खाता है, कोई आयरन, तो कोई ओमेगा-3 या प्रोटीन पाउडर, लेकिन इसके बावजूद कई लोगों को उम्मीद के अनुसार फायदा नहीं मिलता है. शरीर में एनर्जी कम ही रहती है, कमजोरी बनी रहती है या फिर कोई खास बदलाव महसूस नहीं होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सप्लीमेंट्स काम नहीं कर रहे या फिर कोई और वजह है. मुंबई की डॉक्टर विषाखा शिवदासानी ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में इस बारे में एक बहुत जरूरी बात बताई है. उनके अनुसार, समस्या अक्सर सप्लीमेंट में नहीं बल्कि उनके सही समय पर न लेने में होती है. उनका कहना है कि अगर सप्लीमेंट्स को सही समय और सही तरीके से लिया जाए, तो उनका असर कई गुना बढ़ सकता है 

क्यों सप्लीमेंट्स लेने के बावजूद नहीं मिल रहा फायदा?

डॉक्टर के अनुसार, हर सप्लीमेंट का शरीर में काम करने का एक अलग तरीका होता है. कुछ चीजें खाली पेट बेहतर अवशोषित होती हैं, तो कुछ खाने के साथ ज्यादा असर करती हैं. अगर इन्हें गलत समय पर लिया जाए, तो शरीर उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाता है. इसी वजह से कई बार लोग नियमित रूप से सप्लीमेंट लेने के बावजूद फायदा महसूस नहीं कर पाते हैं. 

रात को सप्लीमेंट्स लेने का सही समय

रात में सोने से पहले मैग्नीशियम ग्लाइसिनेट लेना सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि यह शरीर को शांत करता है और दिमाग को रिलैक्स करने में मदद करता है. इससे नींद की क्वालिटी बेहतर हो सकती है और शरीर दिनभर की थकान से जल्दी रिकवर करता है. इसलिए इसे आमतौर पर रात के समय लेने की सलाह दी जाती है. 

सुबह के समय सप्लीमेंट्स कब लें 

सुबह का समय उन सप्लीमेंट्स के लिए बेहतर माना जाता है जो शरीर को एनर्जी देते हैं. जैसे B-कॉम्प्लेक्स विटामिन्स सुबह लेने से दिनभर एनर्जी और एक्टिविटी बनी रहती है. वहीं मायो-इनोसिटोल, जो खासकर PCOS जैसी समस्याओं में लिया जाता है, उसे सुबह और शाम दो बार लेने की सलाह दी जाती है ताकि हार्मोन बैलेंस बेहतर बना रहे और शरीर पर लगातार असर हो. 

डाइट के बाद सप्लीमेंट्स कब लें

कुछ सप्लीमेंट्स खाने के बाद लेने पर ज्यादा अच्छे से काम करते हैं क्योंकि खाने के साथ उनका अवशोषण बेहतर होता है. ओमेगा-3 को खाने के बाद लेने से शरीर इसे आसानी से यूज कर पाता है. विटामिन D3 और K2 हमेशा ऐसे खाने के साथ लेने चाहिए जिसमें थोड़ा फैट हो, क्योंकि इससे इनका असर बढ़ जाता है. CoQ10 भी खाने के बाद लेना अच्छा होता है, चाहे नाश्ता हो या दोपहर का खाना, और जरूरत पड़ने पर इसे रात के खाने के बाद भी लिया जा सकता है. वहीं डाइजेस्टिव एंजाइम्स खाने के साथ लेने से पाचन तंत्र को खाना तोड़ने और पचाने में मदद मिलती है.

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कौन-से सप्लीमेंट्स साथ में नहीं लेने चाहिए 

कुछ सप्लीमेंट्स एक-दूसरे के साथ लेने पर असर कम कर सकते हैं. खासकर जिंक को कभी भी आयरन या कैल्शियम के साथ नहीं लेना चाहिए क्योंकि ये शरीर में एक-दूसरे के अवशोषण को रोकते हैं और उनका फायदा कम हो जाता है. इसलिए इन्हें अलग-अलग समय पर लेना ज्यादा सही माना जाता है. 

वर्कआउट के समय कौन-से सप्लीमेंट्स लें

वर्कआउट के दौरान शरीर को ज्यादा पानी और मिनरल्स की जरूरत होती है, इसलिए इलेक्ट्रोलाइट्स लेना फायदेमंद होता है क्योंकि यह शरीर में पानी और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखते हैं. वहीं प्रोटीन पाउडर वर्कआउट के बाद लिया जाता है ताकि मांसपेशियों की रिकवरी हो सके और शरीर को जरूरी पोषण मिल सके. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चेस्ट इंफेक्शन के बाद अस्पताल में भर्ती हुईं आशा भोसले, जानें इस उम्र में कैसे रखें अपना ख्याल?

चेस्ट इंफेक्शन के बाद अस्पताल में भर्ती हुईं आशा भोसले, जानें इस उम्र में कैसे रखें अपना ख्याल?


हाल ही में ताजा जानकारी के मुताबिक बॉलीवुड की दिग्गज गायिका आशा भोसले के चेस्ट में इंफेक्शन हुआ है और उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया है. ऐसे में दिग्गज गायिका Asha Bhosle की तबीयत बिगड़ने और चेस्ट इंफेक्शन की खबर ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बढ़ती उम्र में सेहत का ख्याल रखना कितना जरूरी हो जाता है. 91 साल की उम्र में शरीर पहले जैसा मजबूत नहीं रहता, इम्युनिटी कमजोर हो जाती है और छोटी-सी लापरवाही भी बड़ी बीमारी का रूप ले सकती है. खासकर छाती और सांस से जुड़ी समस्याएं बुजुर्गों के लिए गंभीर हो सकती हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि चेस्ट इंफेक्शन आखिर होता कैसे है, कितना खतरनाक हो सकता है और इस उम्र में इससे बचाव कैसे किया जा सकता है.

कैसे होता है चेस्ट इंफेक्शन

चेस्ट इंफेक्शन आमतौर पर वायरस, बैक्टीरिया या कभी-कभी फंगल इंफेक्शन की वजह से होता है, जो फेफड़ों और सांस की नलियों को प्रभावित करता है. सर्दी-खांसी को नजरअंदाज करना, ठंडी हवा में ज्यादा रहना, प्रदूषण, धूल या कमजोर इम्युनिटी इसके बड़े कारण होते हैं. बुजुर्गों में यह खतरा इसलिए ज्यादा होता है क्योंकि उनका शरीर संक्रमण से लड़ने में उतना सक्षम नहीं रहता. कई बार साधारण जुकाम भी धीरे-धीरे चेस्ट इंफेक्शन में बदल जाता है.

91 की उम्र में क्यों ज्यादा खतरनाक है चेस्ट इंफेक्शन

91 साल जैसी उम्र में चेस्ट इंफेक्शन को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. यह निमोनिया जैसी गंभीर बीमारी में बदल सकता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत, ऑक्सीजन लेवल गिरना और अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ सकती है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह जानलेवा भी हो सकता है. यही वजह है कि डॉक्टर बुजुर्गों में खांसी, बुखार या सीने में जकड़न जैसे लक्षण दिखते ही तुरंत जांच कराने की सलाह देते हैं.

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बढ़ती उम्र में कैसे रखें चेस्ट का ख्याल

इस उम्र में सबसे जरूरी है सावधानी और नियमित देखभाल. ठंड और धूल से बचाव करना चाहिए, जरूरत पड़ने पर मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए. हल्की एक्सरसाइज और ब्रीदिंग एक्सरसाइज फेफड़ों को मजबूत रखने में मदद करती है. गर्म पानी, सूप और भाप लेना भी फायदेमंद होता है. साथ ही, समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप और जरूरी वैक्सीनेशन करवाना बेहद जरूरी है. सबसे अहम बात—खांसी, बुखार या सांस लेने में तकलीफ को कभी नजरअंदाज न करें. ध्यान रहे कि इस उम्र में ठंडी चीजों को खाने और पीने से परहेज ही करें, जिससे गले और चेस्ट में कफ जमा ना हो.

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थोड़ा सा चलने पर भी फूलने लगती है सांस, यह किस बीमारी का संकेत

थोड़ा सा चलने पर भी फूलने लगती है सांस, यह किस बीमारी का संकेत


आजकल की भागदौड़ भरी और तेजी से बदलती दुनिया में सांस फूलना एक आम बात हो गई है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना आपकी सेहत के लिए बहुत जोखिम भरा हो सकता है. कई बार लोग इसे थकान या उम्र का हवाला देकर इग्नोर कर देते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि थोड़ी दूर चलने या सीढ़ियां चढ़ने मात्र से ही आपकी सांसें क्यों फूलने लग जाती हैं? यह किसी बीमारी का संकेत हो सकता है, जिसे समय रहते सुधार लिया जाए तो आगे आने वाली मुश्किलों से बचा जा सकता है और एक स्वस्थ जीवन जीने में मदद मिल सकती है.

सांस फूलने के पीछे छिपे संभावित कारण

Heart Problems
अगर आपका दिल ठीक से खून पंप नहीं कर पा रहा है, तो शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, जिससे सांस फूलने लगती है. हार्ट फेल्योर, कोरोनरी आर्टरी डिजीज और हार्ट वाल्व की समस्या इसके पीछे के कारण हो सकते हैं. इन स्थितियों में मरीज को चलने या लेटने पर भी सांस लेने में तकलीफ हो सकती है.

Lung Diseases
फेफड़े ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालने का काम करते हैं. इनमें किसी भी तरह की समस्या सांस फूलने का कारण बन सकती है, जैसे अस्थमा (Asthma), क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) और फेफड़ों में इन्फेक्शन या निमोनिया इसके पीछे के कारण हो सकते हैं. अगर सांस फूलने के साथ खांसी, सीने में जकड़न या घरघराहट भी हो, तो यह फेफड़ों की बीमारी का संकेत हो सकता है.

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Anaemia (खून की कमी)
जब शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है, तो ऑक्सीजन सही तरीके से शरीर के अंगों तक नहीं पहुंच पाती. इसका सीधा असर सांस पर पड़ता है, जिसमें जल्दी थकान, चक्कर आना और हल्का काम करने पर भी सांस फूलने जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

Obesity (मोटापा)
अधिक वजन होने पर शरीर को ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है. साथ ही, छाती और फेफड़ों पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है.

Thyroid
थायरॉयड हार्मोन मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है, जिससे दिल की धड़कन तेज हो सकती है और सांस फूलने लगती है.

कब समझें कि मामला गंभीर है?

  • आराम करने पर भी सांस फूलना.
  • सीने में दर्द या दबाव महसूस होना.
  • होंठ या उंगलियों का नीला पड़ना.
  • लगातार खांसी या खून आना.
  • अचानक बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होना.

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