क्या सिर में भी चढ़ जाती है गैस, जानें कितनी खतरनाक होती है यह बीमारी?

क्या सिर में भी चढ़ जाती है गैस, जानें कितनी खतरनाक होती है यह बीमारी?


Can Gas Cause Headache: आपके साथ कितनी बार ऐसा हुआ है कि सिर में धड़कता दर्द हुआ और आपने उसे बस तनाव समझकर नजरअंदाज कर दिया? ऑफिस का दबाव, अनरेगुलर दिनचर्या और जल्दबाजी में खाया गया खाना, इन सबके बीच सिरदर्द आम बात लगने लगता है. लेकिन हर सिरदर्द का कारण तनाव नहीं होता. कई बार इसकी जड़ पेट में छिपी होती है. इसे ही आम भाषा में गैस से होने वाला सिरदर्द या गैस्ट्रिक हेडेक कहा जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि गैस सर पर कब चढ़ जाती है. 

गैस्ट्रिक सिरदर्द कोई सामान्य टेंशन या साइनस हेडेक नहीं है. यह तब होता है जब डाइजेशन सिस्टम  में गड़बड़ी, जैसे अपच, एसिडिटी या गैस होती है. पेट और दिमाग के बीच गहरा संबंध है. जब पेट में असंतुलन होता है तो शरीर रिएक्शन देता है, और कई लोगों में यह दर्द सिर तक पहुंच जाता है. मसालेदार खाना, अनियमित भोजन, ज्यादा चाय-कॉफी और लगातार तनाव इस समस्या को बढ़ा सकते हैं.

कब होती है दिक्कत?

Bangaloregastrocentre की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य गैस्ट्रिक सिरदर्द और गैस्ट्रिक माइग्रेन में फर्क समझना भी जरूरी है. गैस्ट्रिक सिरदर्द हल्का या लगातार रहने वाला दर्द हो सकता है, जबकि गैस्ट्रिक माइग्रेन ज्यादा तीव्र, धड़कन जैसा दर्द देता है. इसमें रोशनी और आवाज से परेशानी, मितली या उल्टी भी हो सकती है. दोनों ही स्थितियों में मूल कारण डाइजेशन की गड़बड़ी ही होती है. अगर यह समस्या कभी-कभार हो तो चिंता की बात नहीं, लेकिन बार-बार होने लगे तो इसे नजरअंदाज न करें. लगातार गैस्ट्रिक सिरदर्द क्रॉनिक गैस्ट्राइटिस, पेप्टिक अल्सर, गालब्लैडर की बीमारी, इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम या गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज जैसी गंभीर स्थितियों का संकेत हो सकता है.

डॉक्टर से कब मिलें? 

अगर सिरदर्द हफ्ते में दो बार से ज्यादा हो रहा है, वजन बिना कारण कम हो रहा है, लगातार उल्टी या तेज पेट दर्द हो रहा है या घरेलू उपायों से आराम नहीं मिल रहा, तो गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह लें. जरूरत पड़ने पर एंडोस्कोपी जैसी जांच से डाइजेशन सिस्टम की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है. इलाज का आधार केवल दर्दनिवारक दवा नहीं, बल्कि पाचन सुधारना है. समय पर खाना, हल्का और संतुलित आहार, पर्याप्त पानी और डिप्रेशन कंट्रोल से काफी राहत मिल सकती है. आप इसको सिर्फ यह कहकर नहीं टाल सकते कि सिर में गैस चढ़ गई है और खासकर तब जब आपको यह समस्या बार-बार हो रही हो. अगर आप समय पर इसपर ध्यान नहीं देते हैं, तो आगे चलकर यह आपके लिए काफी दिक्कत का कारण बन सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ऑफिस के बाहर प्लास्टिक के कप में पीते हैं चाय, हो सकती है यह जानलेवा बीमारी

ऑफिस के बाहर प्लास्टिक के कप में पीते हैं चाय, हो सकती है यह जानलेवा बीमारी


Is Drinking Tea In Plastic Cups Safe: ऑफिस के बाहर ठेले से आई गरमा-गरम चाय, जो पॉलिथीन की थैली या पतले प्लास्टिक कप में सीधे आपकी टेबल तक पहुंचती है, यह रोज की आदत भले सुकून देती हो, लेकिन सेहत के लिहाज से खतरे की घंटी भी हो सकती है. एक्सपर्ट का कहना है कि गरम चाय जब कम क्वालिटी वाले प्लास्टिक या पॉलिथीन में डाली जाती है, तो उसमें मौजूद रसायन पेय में घुल सकते हैं.

एनएमसीएच हॉस्पिटल पटना के इंटरनल मेडिसिन और एंडोक्रिनोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. धर्मेन्द्र कुमार के मुताबिक,  60 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर फ्थैलेट्स, बिस्फेनॉल ए और स्टाइरीन जैसे हानिकारक तत्व चाय में मिल सकते हैं. ये पदार्थ शरीर के हार्मोन तंत्र को प्रभावित करते हैं और लंबे समय में गंभीर बीमारियों की आशंका बढ़ा सकते हैं.

डॉक्टर बताते हैं कि ये केमिकल एंडोक्राइन डिसरप्टर्स की तरह काम करते हैं, यानी एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन, इंसुलिन और थायरॉइड जैसे हार्मोन के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं. अगर कोई व्यक्ति दिन में दो से चार बार ऐसी चाय पीता है, तो कम मात्रा में भी लगातार संपर्क शरीर पर जमा असर डाल सकता है. इसके रिजल्ट के तौर पर हार्मोन असंतुलन, बांझपन की समस्या, वजन बढ़ना, थकान, नींद की गड़बड़ी, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं. कुछ एक्सपर्ट तो ब्रेस्ट, प्रोस्टेट और थायरॉइड कैंसर के जोखिम में भी वृद्धि की आशंका जताते हैं.

क्या कहते हैं रिसर्च

एक्सपर्ट का कहना है कि भले ही बड़े स्तर पर मानव अध्ययन सीमित हों, लेकिन लैब और पशु स्टडी में यह संकेत मिले हैं कि ये रसायन ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाकर डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जो कैंसर का कारण बन सकता है. हालिया शोध भी चिंता बढ़ाते हैं. कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि डिस्पोजेबल कप में परोसे गए गरम पेय में हजारों माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद हो सकते हैं. आईआईटी खड़गपुर के साइंटिस्ट का अनुमान है कि लंबे समय तक सिंगल-यूज़ कप के इस्तेमाल से व्यक्ति के शरीर में ग्रामों के हिसाब से प्लास्टिक जमा हो सकता है. वहीं, विदेश में हुए रिसर्च में ह्यूमन ब्रेन टिश्यू में भी माइक्रोप्लास्टिक के अंश पाए गए हैं.

देश में क्या हैं नियम

Business Standard की एक रिपोर्ट के अनुसार,  भारत में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी  ने फूड-ग्रेड प्लास्टिक के उपयोग की अनुमति दी है, लेकिन जमीनी स्तर पर सस्ता और रिसाइकिल्ड प्लास्टिक अब भी धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि गरम चाय हमेशा कांच, स्टील या सिरेमिक के बर्तन में ही लें. कुल्हड़ या मिट्टी के कप भी तुलना सुरक्षित विकल्प माने जाते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिरदर्द, नींद में कमी और बार-बार आ रहे क्रैम्प? शरीर में इस चीज की हो सकती है कमी

सिरदर्द, नींद में कमी और बार-बार आ रहे क्रैम्प? शरीर में इस चीज की हो सकती है कमी


How To Identify Magnesium Deficiency Naturally: बार-बार होने वाला सिरदर्द, नींद का पूरा न होना और अचानक मांसपेशियों में ऐंठन, इन लक्षणों को अक्सर हम डेली की थकान या तनाव का नतीजा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन कई बार इन सबके पीछे एक ही पोषक तत्व की कमी छिपी होती है, मैग्नीशियम. यह एक ऐसा आवश्यक खनिज है जो शरीर में 300 से अधिक जैव- केमिकल तरीकों में भूमिका निभाता है. नसों के संदेशों के आदान-प्रदान से लेकर मांसपेशियों के सिकुडन और बेहतर नींद तक, मैग्नीशियम की बड़ी भूमिका होती है. 

आधुनिक लाइफस्टाइल में मैग्नीशियम की कमी चुपचाप बढ़ रही है. एक्सपर्ट के अनुसार, यह खनिज न्यूरोमस्क्युलर स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है. यह नसों की काम करने के तरीके को संतुलित रखता है, मांसपेशियों को रिलैक्स करने में मदद करता है और दिल की धड़कन को सामान्य बनाए रखने में भी भूमिका निभाता है. जब शरीर में इसकी कमी हो जाती है तो नसें अधिक संवेदनशील हो सकती हैं, जिससे सिरदर्द, मांसपेशियों में फड़कन, ऐंठन और यहां तक कि घबराहट जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

रोहिणी स्थित एक निजी क्लीनिक के सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. सौरभ स्वराज बताते हैं कि मैग्नीशियम मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करता है और पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को कंट्रोल करता है, जो शरीर को शांत अवस्था में लाने में मदद करता है. यही वजह है कि इसकी कमी अक्सर खराब और अधूरी नींद के रूप में दिखती है. लंबे समय तक रहने वाले सिरदर्द, खासकर माइग्रेन, भी कम मैग्नीशियम स्तर से जुड़े पाए गए हैं. यह ब्लड बेसल्स और न्यूरोट्रांसमीटर को स्थिर रखने में मदद करता है, इसलिए कमी होने पर सिरदर्द की संभावना बढ़ सकती है.

क्या होते हैं संकेत?

मांसपेशियों में खिंचाव और रात के समय पैरों में ऐंठन भी शुरुआती संकेत हो सकते हैं. मांसपेशियों की सेल्स में कैल्शियम संकुचन को बढ़ाता है, जबकि मैग्नीशियम उन्हें ढीला करने में मदद करता है. संतुलन बिगड़ने पर ऐंठन और स्पाज्म की समस्या बढ़ सकती है. लगातार तनाव भी स्थिति को खराब करता है, क्योंकि इससे शरीर से मैग्नीशियम का उत्सर्जन बढ़ जाता है.

इन लोगों को रखना चाहिए ध्यान

डायबिटीज से जूझ रहे लोग, अत्यधिक कैफीन या शराब का सेवन करने वाले और डाइजेशन संबंधी समस्याओं से ग्रस्त लोग अधिक जोखिम में हो सकते हैं. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि सप्लीमेंट लेने से पहले आहार में सुधार पर ध्यान दें. कद्दू के बीज, बादाम, पालक, दालें और साबुत अनाज मैग्नीशियम के अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर ही डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना बेहतर रहता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आप भी 110 फास्टिंग शुगर को मान रहे हैं ‘नॉर्मल’? एक्सपर्ट ने इसको लेकर दी बड़ी चेतावनी

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Is Borderline Blood Sugar Dangerous: हममें से कई लोग यह मान लेते हैं कि अगर फास्टिंग शुगर ‘लगभग नॉर्मल’ है या HbA1c डायबिटीज की सीमा से थोड़ा कम है, तो सब ठीक है. लेकिन यही सबसे बड़ी भूल हो सकती है. बॉर्डरलाइन शुगर लेवल यह संकेत है कि शरीर अंदर ही अंदर संघर्ष कर रहा है. ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ती, यह धीरे-धीरे सालों में ऊपर जाती है और इस दौरान ब्लड़ बेसल्स, नसों और अंगों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

सीनियर एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. स्वाति पंडित ने TOI हेल्थ को बताया कि भारत में प्री-डायबिटीज के मामले डायबिटीज से भी ज्यादा हैं. आईसीएमआर के एक स्टडी में पाया गया कि देश में डायबिटीज की दर लगभग 11.4 प्रतिशत है, जबकि प्री-डायबिटीज करीब 15.3 प्रतिशत लोगों में मौजूद है. फास्टिंग शुगर 110 से अधिक, खाने के बाद 160 से ऊपर और HbA1c 5.7 से 6.4 के बीच हो तो इसे बॉर्डरलाइन या प्री-डायबिटीज माना जाता है. इसे नजरअंदाज करना सुरक्षित नहीं है, क्योंकि यही वह चरण है जहां से बीमारी पूरी तरह विकसित हो सकती है. 

कब करनी चाहिए चिंता?

अक्सर लोग सोचते हैं कि जब तक कोई लक्षण नहीं, तब तक चिंता की जरूरत नहीं. लेकिन इंसुलिन रेजिस्टेंस, खाने के बाद हल्के शुगर स्पाइक्स या अचानक थकान जैसे संकेत बताते हैं कि शरीर संतुलन खो रहा है. यही समय है जब सतर्क होकर बदलाव किए जाएं तो स्थिति को पलटा जा सकता है. डॉ. पंडित कहती हैं कि सबसे बड़ी गलती है बढ़े हुए शुगर लेवल को हल्के में लेना. बैठकर लंबे समय तक काम करना, अनियमित खान-पान, देर से नाश्ता या रात का खाना, दिन में ज्यादा सोना और रात में जागना, ये सभी आदतें शुगर को डायबिटीज की ओर धकेल सकती हैं. इसके अलावा अत्यधिक शराब, धूम्रपान, पारिवारिक हिस्ट्री और बढ़ता वजन भी जोखिम बढ़ाते हैं.

कैसे इससे बच सकते हैं?

एक्सपर्ट बताते हैं कि अच्छी बात यह है कि प्री-डायबिटीज को कई मामलों में रिवर्स किया जा सकता है. संतुलित और समय पर भोजन, नियमित फिजिकल एक्टिविटी, पर्याप्त नींद और तनाव में कमी बेहद अहम हैं. फास्टिंग शुगर 110 से कम, पोस्ट-प्रांडियल 160 से कम और HbA1c 5.6 से नीचे रखना सुरक्षित माना जाता है, लेकिन अगर परिवार में डायबिटीज का हिस्ट्री है या लाइफस्टाइल अनहेल्दी है, तो और भी सावधानी जरूरी है. डायबिटीज सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि कई गंभीर रोगों की जमीन तैयार करती है, जैसे कि हार्ट की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी और लिवर की समस्या, स्ट्रोक और यहां तक कि कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिर्फ सिगरेट-शराब से नहीं कैंसर का खतरा, आपकी ये 5 छोटी आदतें भी जिम्मेदार; एक्सपर्ट से जानें

सिर्फ सिगरेट-शराब से नहीं कैंसर का खतरा, आपकी ये 5 छोटी आदतें भी जिम्मेदार; एक्सपर्ट से जानें


Can Daily Pollution Increase Cancer Risk: कैंसर के बारे में सोचते हैं तो दिमाग में सबसे पहले बड़े और डरावने जोखिम आते हैं. यानी वे खतरे जिन पर साफ चेतावनी लिखी होती है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि यह पूरी तस्वीर नहीं है. मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. राजीव विजयकुमार के मुताबिक, कैंसर का खतरा अक्सर धीरे-धीरे बनता है, रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों और एक्सपोजर के जरिए, जिन पर हम शायद ही ध्यान देते हैं. थोड़ा प्रदूषण, सनस्क्रीन न लगाना, नींद की कमी, प्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाना, ये सब उस समय गंभीर नहीं लगते, इसलिए अनदेखे रह जाते हैं.

माइक्रो-एक्सपोजर की चर्चा कम

डॉक्टर बताते हैं कि कैंसर के बारे में आम बातचीत में इन ‘माइक्रो-एक्सपोजर’ की चर्चा कम होती है. ये इतने दिखते नहीं होते कि डर पैदा करें, लेकिन रोजाना मौजूद रहते हैं और समय के साथ असर जमा करते रहते हैं. उदाहरण के लिए वायु प्रदूषण, गाड़ियों के धुएं, निर्माण की धूल और ईंधन के दहन से निकलने वाले सूक्ष्म कण PM2.5 लंग्स की गहराई तक पहुंच सकते हैं. लंबे समय तक इनके संपर्क में रहना, यहां तक कि नॉन-स्मोकर्स में भी, लंग्स के कैंसर के जोखिम से जुड़ा पाया गया है. एक दिन का असर मामूली लगता है, लेकिन वर्षों में यह जमा हो जाता है.

इसी तरह अल्ट्रावायलेट किरणें. समुद्र तट पर तेज धूप से सनबर्न होने पर लोग सतर्क हो जाते हैं, लेकिन रोजाना की हल्की धूप ऑफिस आना-जाना, दोपहिया चलाना, आउटडोर एक्सरसाइज अक्सर नजरअंदाज हो जाती है. लगातार हल्का यूवी नुकसान त्वचा की सेल्स में डीएनए बदलाव बढ़ा सकता है.

हमारी लाइफस्टाइल का भी होता है असर

 एक्सपर्ट बताते हैं कि खानपान भी अहम है. प्रोसेस्ड मीट, ज्यादा शराब, लगातार अधिक शुगर और उससे जुड़ी मोटापा, ये रातोंरात असर नहीं दिखाते, लेकिन शरीर में सूजन, इंसुलिन रेजिस्टेंस और हार्मोनल बदलाव ऐसा माहौल बनाते हैं जिसमें असामान्य सेल्स पनप सकती हैं. नींद और सर्कैडियन रिद्म का बिगड़ना भी अब शोध का विषय है. नाइट शिफ्ट, कम नींद और अनियमित दिनचर्या मेलाटोनिन और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है, जो कुछ कैंसर के जोखिम से जुड़ी पाई गई है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

डॉ. विजयकुमार कहते हैं कि उद्देश्य डर फैलाना नहीं, बल्कि जागरूकता बढ़ाना है. हर एक्सपोजर बीमारी में नहीं बदलता, क्योंकि शरीर में डीएनए रिपेयर और इम्यून सिस्टम जैसी मजबूत सुरक्षा व्यवस्था होती है. लेकिन जब छोटे-छोटे जोखिम परत दर परत जुड़ते हैं, तब उनका महत्व बढ़ जाता है. नियमित सनस्क्रीन, घर में बेहतर वेंटिलेशन, प्रोसेस्ड मीट कम करना, शराब सीमित रखना, पर्याप्त नींद लेना और लंबे समय तक बैठने से बचना, समय के साथ जोखिम घटा सकते हैं. कैंसर अक्सर किसी एक बड़े फैसले से नहीं, बल्कि वर्षों की आदतों से आकार लेता है. इसलिए छोटी लेकिन लगातार सही पसंदें लंबी अवधि में बड़ा फर्क ला सकती हैं.

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बार-बार फड़कती है आंख या चेहरे पर रहती है सूजन? इग्नोर न करें, शरीर दे रहा है ये बड़ी वार्निंग

बार-बार फड़कती है आंख या चेहरे पर रहती है सूजन? इग्नोर न करें, शरीर दे रहा है ये बड़ी वार्निंग


How To Know If You Have Magnesium Deficiency: मैग्नीशियम एक जरूरी मिनरल है जो मांसपेशियों की कार्यप्रणाली, नसों के सिग्नल, दिल की धड़कन और त्वचा की सेहत को संतुलित रखने में मदद करता है. जब शरीर में इसकी कमी होने लगती है, तो कुछ हल्के संकेत चेहरे और आंखों के आसपास दिखाई दे सकते हैं.

हालांकि यह समझना जरूरी है कि सिर्फ चेहरे में बदलाव दिखना हमेशा मैग्नीशियम की कमी का प्रमाण नहीं होता. नींद की कमी, तनाव, एलर्जी या दिनचर्या में बदलाव भी इसके पीछे हो सकते हैं. लेकिन जब लाइफस्टाइल सुधारने के बाद भी समस्या बनी रहे, तो आपको सावधान होने की जरूरत है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. मोहित शर्मा ने TOI को बताया कि मैग्नीशियम की कमी अक्सर जोरदार लक्षण नहीं देती. यह चुपचाप नसों और मांसपेशियों के संतुलन, नींद, ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म और सेल्स की मरम्मत में भूमिका निभाता है. कमी होने पर शरीर पहले खुद को एडजस्ट करने की कोशिश करता है, इसलिए शुरुआती संकेत हल्के हो सकते हैं. चलिए आपको इसके कुछ लक्षण बताते हैं.

आंख की पलक फड़कना

आंख की पलक फड़कना एक आम शिकायत है. अक्सर यह थकान, ज्यादा स्क्रीन टाइम, कैफीन या तनाव से जुड़ा होता है. लेकिन मैग्नीशियम नसों और मांसपेशियों के बीच संतुलन बनाए रखता है. इसकी कमी से न्यूरोमस्कुलर उत्तेजना बढ़ सकती है, जिससे पलक बार-बार फड़कने लगती है. अगर यह लंबे समय तक या दोनों आंखों में हो, तो जांच जरूरी हो सकती है.

डार्क सर्कल और सूजन

डार्क सर्कल और आंखों के नीचे सूजन भी कई कारणों से हो सकते हैं. नींद की कमी, एलर्जी या आयरन की कमी आम वजहें हैं. मगर मैग्नीशियम नींद को बेहतर बनाने और सूजन नियंत्रित करने में मदद करता है. इसकी कमी से चेहरा थका हुआ, फीका या सूजा हुआ दिख सकता है. कुछ लोगों में स्किन ड्राय या संवेदनशील भी हो जाती है, क्योंकि यह स्किन बैरियर और सेल रिपेयर में सहायक होता है.

ये भी होते हैं साइन

जबड़े में जकड़न, चेहरे में तनाव, हल्का कंपन या बार-बार सिरदर्द भी संकेत हो सकते हैं. मैग्नीशियम प्राकृतिक मसल रिलैक्सेंट है, इसलिए कमी होने पर मांसपेशियां अधिक सक्रिय हो सकती हैं. माइग्रेन और रोशनी के प्रति संवेदनशीलता भी कुछ मामलों में इससे जुड़ी पाई गई है.

क्या करना चाहिए आपको?

डॉक्टरों के अनुसार, मैग्नीशियम की जांच आसान नहीं है. सामान्य सीरम टेस्ट हमेशा सही तस्वीर नहीं दिखाता. इसलिए लक्षण, डाइट और जोखिम कारकों को साथ में देखकर ही निर्णय लिया जाता है. हरी पत्तेदार सब्जियां, नट्स, बीज, साबुत अनाज और दालें इसके अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लिया जा सकता है. यदि बार-बार मांसपेशियों में ऐंठन, थकान, नींद की समस्या या गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोग हो, तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए. सही समय पर ध्यान देने से छोटी कमी बड़ी समस्या बनने से रोकी जा सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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