सिर्फ त्वचा ही नहीं, स्कैल्प भी हो सकता है सनबर्न का शिकार, एक्सपर्ट बोले- इसे न करें नजरअंदाज
अर्चना पूरन सिंह के बेटे आयुष्मान सेठी हुए ऑनलाइन ठगी का शिकार, फ्री ट्रायल के नाम पर कंपनी ने उड़ाए 87,000 रुपये
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IVF Success Factors: मां बनने का सपना हर महिला के लिए खास होता है, लेकिन जब यह सपना आसानी से पूरा नहीं होता तो IVF जैसे इलाज उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आती है. इसी बीच एक नई स्टडी ने इस सफर से जुड़ी एक अहम सच्चाई को सामने लाया है. रिपोर्ट के अनुसार IVF ट्रीटमेंट के दौरान महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक स्वास्थ्य यानी उनका स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल, इसके परिणामों को प्रभावित कर सकता है. वही जिन महिलाओं में तनाव कम पाया गया, उनमें IVF के सफल होने की संभावना अधिक देखी गई है. इससे साफ होता है कि इलाज के साथ-साथ मानसिक संतुलन भी बेहद जरूरी है.
पुणे के एक IVF सेंटर में की गई इस स्टडी में लगभग 120 महिलाओं को शामिल किया गया. इस दौरान उनके स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल को मापा गया और फिर IVF के नतीजों से तुलना किया गया. आंकड़ों के अनुसार करीब 40 प्रतिशत महिलाओं का IVF सफल रहा. इन महिलाओं का एंग्जायटी स्कोर औसतन 5.5 था, जबकि जिनका IVF सफल नहीं हुआ उनका स्कोर 6.7 तक पाया गया. इसी तरह स्ट्रेस स्कोर में भी अंतर देखा गया, जहां सफल मामलों में यह 7.4 था और असफल मामलों में 8.7 तक पहुंच गया. यह साफ संकेत देता है कि ज्यादा तनाव ट्रीटमेंट के नतीजों को प्रभावित कर सकता है.
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फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्ट्रेस केवल मानसिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर शरीर पर भी पड़ता है. डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक रहने वाला तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन को बढ़ा देता है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है. इंडिया आईवीएफ फर्टिलिटी की डॉक्टर ऋचिका सहाय शुक्ला के अनुसार, आईवीएफ कराने वाली बहुत सी महिलाएं सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि सालों की चिंता और बार-बार नाकामयाब होने की वजह से मन से भी बहुत थक चुकी होती हैं. इसका असर एग क्वालिटी पर पड़ता है और IVF के रिजल्ट को भी प्रभावित कर सकता है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि IVF की प्रक्रिया भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि इसमें महिलाओं को अनिश्चितता और कई बार असफलता का सामना करना पड़ता है. भारत में करीब 2.8 करोड़ लोग बांझपन की समस्या से जूझ रहे हैं, और हर साल लगभग 3 से 3.5 लाख आईवीएफ उपचार किए जाते हैं.
इन्फर्टिलिटी को मेडिकल तौर पर तब माना जाता है जब 12 महीने तक नियमित और असुरक्षित संबंध के बाद भी गर्भधारण न हो. स्टडी के अनुसार लगभग 9 प्रतिशत कपल्स इस समस्या से जूझ रहे हैं. इसे जिंदगी के सबसे बड़े तनावों में से एक माना जाता है, जो लोगों को मानसिक रूप से काफी परेशान कर सकता है. इससे प्रभावित लोगों में चिंता, उदासी और ज्यादा तनाव जैसी समस्याएं अक्सर देखने को मिलती हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि IVF ट्रीटमेंट के दौरान मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना मेडिकल इलाज, क्योंकि दोनों मिलकर ही बेहतर परिणाम देने में मदद करते हैं. डॉ. शुक्ला के मुताबिक, जिन महिलाओं को सही जानकारी दी जाती है, उन्हें भरोसा दिलाया जाता है और भावनात्मक सहारा मिलता है, वे अक्सर इलाज में बेहतर परिणाम दिखाती हैं.
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Breast Cancer: ब्रेस्ट कैंसर आज के समय में महिलाओं में होने वाली सबसे आम बीमारियों में से एक है. यह तब शुरू होता है जब स्तन की कुछ कोशिकाएं जरूरत से ज्यादा तेजी से बढ़ने लग जाती हैं और एक गांठ बना लेती हैं. अगर इसे शुरुआती समय में पहचान लिया जाए, तो इसका इलाज काफी हद तक संभव होता है. लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब यह कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने लगता है. इस प्रक्रिया को मेटास्टेसिस (Metastasis) कहा जाता है. इसमें कैंसर की कोशिकाएं खून के जरिए शरीर के अन्य अंगों जैसे हड्डियों, फेफड़ों या लिवर तक पहुंच सकती हैं.
जब तक महिलाएं इसे दिखाने अस्पताल तक पहुंचती हैं, तब तक यह उनके पूरे शरीर में फैल चुका होता है, जिसे डॉक्टर’डी नोवो मेटास्टेटिक डिजीज’ (De Novo Metastatic Disease) कहते हैं. एक बड़ी हॉस्पिटल आधारित स्टडी में यह बात सामने आई है, जो न केवल हमें कैंसर के बारे में बल्कि पूरे भारतीय हेल्थकेयर सिस्टम की स्थिति के बारे में भी बताती है.
क्या है स्टडी?
नेशनल कैंसर रजिस्ट्री के हॉस्पिटल बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री के 76 हजार ब्रेस्ट कैंसर मरीजों के डेटा के आधार पर इस रिसर्च को किया गया है. इसमें यह सामने आया कि लगभग 13 प्रतिशत महिलाएं मेटास्टेटिक ब्रेस्ट कैंसर का शिकार हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा करीब 6 प्रतिशत है. इसके अलावा, स्टडी में यह भी पाया गया कि भारत में कई महिलाएं स्टेज 3 या स्टेज 4 पर जाकर ही इलाज करवाती हैं, जिससे इलाज जटिल और महंगा हो जाता है. देर से जांच, जागरूकता की कमी और नियमित स्क्रीनिंग का अभाव इसके बड़े कारण माने गए हैं.
क्या होता है कारण?
इस स्टडी से यह बात स्पष्ट हुई है कि उम्र का मेटास्टेटिक बीमारी से सीधा संबंध नहीं होता और न ही पहले से मौजूद बीमारियां जैसे डायबिटीज या हाइपरटेंशन इसके मुख्य कारण हैं. असली कारण ट्यूमर की प्रकृति होती है. ट्यूमर कितना बड़ा है, कितना आक्रामक है और शरीर में कितनी दूर तक फैल चुका है, यही सब बातें बीमारी की गंभीरता तय करती हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
अपोलो एथेना वुमन कैंसर सेंटर की लीड डॉ. गीता कडायप्रथ बताती हैं कि ब्रेस्ट कैंसर मुख्य रूप से दो तरीकों से फैलता है. पहला, लिम्फ नोड्स के जरिए, जो ब्रेस्ट से होते हुए बगल, गर्दन और छाती तक संक्रमण फैलाते हैं. दूसरा, ब्लडस्ट्रीम के जरिए. ब्रेस्ट में ब्लड वेसल्स का बड़ा नेटवर्क होता है, जो कैंसर कोशिकाओं को हड्डियों, स्पाइन और पेल्विस तक पहुंचा देता है. उन्होंने आगे बताया कि कैंसर का फैलाव उसके प्रकार पर भी निर्भर करता है. हार्मोन सेंसिटिव कैंसर आमतौर पर हड्डियों में तेजी से फैलता है, जबकि ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर ज्यादा आक्रामक होता है और अक्सर दिमाग और फेफड़ों तक फैल सकता है, साथ ही लीवर को भी प्रभावित कर सकता है.
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अस्पताल का चुनाव
स्टडी के इस पहलू ने एक गंभीर तस्वीर सामने रखी है. जिन महिलाओं का इलाज प्राइवेट NGO द्वारा संचालित अस्पतालों में हुआ, उनमें मेटास्टेसिस का खतरा अपेक्षाकृत कम पाया गया. वहीं, सरकारी या पब्लिक कैंसर सेंटर में इलाज कराने वाली महिलाओं में यह खतरा ज्यादा देखा गया. यह अंतर कई कारणों से हो सकता है, जैसे जांच में देरी, सुविधाओं की कमी, लंबी कतारें और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक समय पर पहुंच न होना. यह भारत के हेल्थकेयर सिस्टम की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, जहां समय पर इलाज और जागरूकता की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
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World Malaria Day 2026: लोग अक्सर आप हल्के बुखार, ठंड लगना या कमजोरी महसूस होने को बदलते मौसम का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह शुरुआती लक्षण मलेरिया के संकेत हो सकते हैं. 25 अप्रैल 2026 को वर्ल्ड मलेरिया डे के रूप में मनाया जाता है और आज इस खास दिवस पर मलेरिया से जुड़ी बातें, लक्षण और गंभीरता के बारे में बात करते हैं. मलेरिया एक गंभीर बीमारी है और समय पर पहचान न होने पर यह तेजी से शरीर को कमजोर कर सकती है. इसलिए कई दिनों तक हल्का-हल्का बुखार आना, थकान महसूस होना-इन लक्षणों को नजरअंदाज करने की भूल बिल्कुल भी न करें.
मलेरिया एक बीमारी है जो Anopheles मादा मच्छर के काटने से फैलती है. इस बीमारी में आमतौर पर तेज बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द, शरीर दर्द और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. कई मामलों में यह बीमारी गंभीर रूप भी ले सकती है, लेकिन इसके लक्षणों की पहचान में अक्सर लोग गलती कर लेते हैं और इन्हें सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
मलेरिया का गंभीर रूप ले लेने का सबसे बड़ा कारण उसके लक्षणों को गलत समझ लेना है. अक्सर मलेरिया की शुरुआत हल्के बुखार और ठंड लगने से होती है और लोग समझ लेते हैं कि यह सिर्फ मामूली सा बुखार है. डॉक्टर्स के अनुसार, लोग अक्सर हल्के लक्षणों को हल्का बुखार, ठंड लगना और थकान, जिसे आसानी से फ्लू या डेंगू समझ लेते हैं. मलेरिया होने का रहस्य इसी बात में छिपा है कि साधारण बुखार से अलग मलेरिया में बुखार घटता-बढ़ता रहता है, एक लय में आता है और स्थिर नहीं रहता.
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मलेरिया के सभी शुरुआती लक्षण दिखने में गंभीर नहीं होते, बल्कि वे मामूली से लगते हैं. हालांकि, ये लक्षण इतने जरूर होते हैं कि आपका ध्यान अपनी तरफ खींच सकें. मलेरिया में इंसान के पूरे शरीर में हल्का-हल्का दर्द महसूस होता है. यह खासकर हाथ-पैर और पीठ में होता है और हल्के काम भी थका देने वाले लगने लगते हैं. पेट से जुड़ी कुछ समस्याएं भी होती हैं जैसे मितली, पेट में दर्द और भूख न लगना, साथ-साथ आंखों का रंग पीला हो जाना और पेशाब भी गहरे रंग का आना. इन लक्षणों को अक्सर लोग सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
मलेरिया कोई नई बीमारी नहीं है फिर भी यह आज तक गंभीर बनी हुई है. हालांकि इसके मामलों में गिरावट जरूर देखी गई है. भारत ने इसके मामलों को कम करने में प्रगति तो की है, पर फिर भी मौसमी उछाल मरीजों और डॉक्टरों दोनों के लिए चुनौती बना हुआ है. मच्छरों को भगाने वाली दवा का इस्तेमाल करना, पूरी बाजू के कपड़े पहनना जैसे विकल्प तो काफी मायने रखते हैं, पर फिर भी आज के समय में इसके लक्षणों की पहचान करना सबसे जरूरी माना जाता है.
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