क्या सप्लीमेंट्स लेने के बावजूद नहीं मिल रहा फायदा? डॉक्टर ने बताया असली कारण

क्या सप्लीमेंट्स लेने के बावजूद नहीं मिल रहा फायदा? डॉक्टर ने बताया असली कारण


Supplements Intake Timing : आजकल बहुत से लोग अपनी सेहत सुधारने के लिए तरह-तरह के सप्लीमेंट्स लेते हैं. कोई विटामिन D खाता है, कोई आयरन, तो कोई ओमेगा-3 या प्रोटीन पाउडर, लेकिन इसके बावजूद कई लोगों को उम्मीद के अनुसार फायदा नहीं मिलता है. शरीर में एनर्जी कम ही रहती है, कमजोरी बनी रहती है या फिर कोई खास बदलाव महसूस नहीं होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सप्लीमेंट्स काम नहीं कर रहे या फिर कोई और वजह है. मुंबई की डॉक्टर विषाखा शिवदासानी ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में इस बारे में एक बहुत जरूरी बात बताई है. उनके अनुसार, समस्या अक्सर सप्लीमेंट में नहीं बल्कि उनके सही समय पर न लेने में होती है. उनका कहना है कि अगर सप्लीमेंट्स को सही समय और सही तरीके से लिया जाए, तो उनका असर कई गुना बढ़ सकता है 

क्यों सप्लीमेंट्स लेने के बावजूद नहीं मिल रहा फायदा?

डॉक्टर के अनुसार, हर सप्लीमेंट का शरीर में काम करने का एक अलग तरीका होता है. कुछ चीजें खाली पेट बेहतर अवशोषित होती हैं, तो कुछ खाने के साथ ज्यादा असर करती हैं. अगर इन्हें गलत समय पर लिया जाए, तो शरीर उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाता है. इसी वजह से कई बार लोग नियमित रूप से सप्लीमेंट लेने के बावजूद फायदा महसूस नहीं कर पाते हैं. 

रात को सप्लीमेंट्स लेने का सही समय

रात में सोने से पहले मैग्नीशियम ग्लाइसिनेट लेना सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि यह शरीर को शांत करता है और दिमाग को रिलैक्स करने में मदद करता है. इससे नींद की क्वालिटी बेहतर हो सकती है और शरीर दिनभर की थकान से जल्दी रिकवर करता है. इसलिए इसे आमतौर पर रात के समय लेने की सलाह दी जाती है. 

सुबह के समय सप्लीमेंट्स कब लें 

सुबह का समय उन सप्लीमेंट्स के लिए बेहतर माना जाता है जो शरीर को एनर्जी देते हैं. जैसे B-कॉम्प्लेक्स विटामिन्स सुबह लेने से दिनभर एनर्जी और एक्टिविटी बनी रहती है. वहीं मायो-इनोसिटोल, जो खासकर PCOS जैसी समस्याओं में लिया जाता है, उसे सुबह और शाम दो बार लेने की सलाह दी जाती है ताकि हार्मोन बैलेंस बेहतर बना रहे और शरीर पर लगातार असर हो. 

डाइट के बाद सप्लीमेंट्स कब लें

कुछ सप्लीमेंट्स खाने के बाद लेने पर ज्यादा अच्छे से काम करते हैं क्योंकि खाने के साथ उनका अवशोषण बेहतर होता है. ओमेगा-3 को खाने के बाद लेने से शरीर इसे आसानी से यूज कर पाता है. विटामिन D3 और K2 हमेशा ऐसे खाने के साथ लेने चाहिए जिसमें थोड़ा फैट हो, क्योंकि इससे इनका असर बढ़ जाता है. CoQ10 भी खाने के बाद लेना अच्छा होता है, चाहे नाश्ता हो या दोपहर का खाना, और जरूरत पड़ने पर इसे रात के खाने के बाद भी लिया जा सकता है. वहीं डाइजेस्टिव एंजाइम्स खाने के साथ लेने से पाचन तंत्र को खाना तोड़ने और पचाने में मदद मिलती है.

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कौन-से सप्लीमेंट्स साथ में नहीं लेने चाहिए 

कुछ सप्लीमेंट्स एक-दूसरे के साथ लेने पर असर कम कर सकते हैं. खासकर जिंक को कभी भी आयरन या कैल्शियम के साथ नहीं लेना चाहिए क्योंकि ये शरीर में एक-दूसरे के अवशोषण को रोकते हैं और उनका फायदा कम हो जाता है. इसलिए इन्हें अलग-अलग समय पर लेना ज्यादा सही माना जाता है. 

वर्कआउट के समय कौन-से सप्लीमेंट्स लें

वर्कआउट के दौरान शरीर को ज्यादा पानी और मिनरल्स की जरूरत होती है, इसलिए इलेक्ट्रोलाइट्स लेना फायदेमंद होता है क्योंकि यह शरीर में पानी और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखते हैं. वहीं प्रोटीन पाउडर वर्कआउट के बाद लिया जाता है ताकि मांसपेशियों की रिकवरी हो सके और शरीर को जरूरी पोषण मिल सके. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चेस्ट इंफेक्शन के बाद अस्पताल में भर्ती हुईं आशा भोसले, जानें इस उम्र में कैसे रखें अपना ख्याल?

चेस्ट इंफेक्शन के बाद अस्पताल में भर्ती हुईं आशा भोसले, जानें इस उम्र में कैसे रखें अपना ख्याल?


हाल ही में ताजा जानकारी के मुताबिक बॉलीवुड की दिग्गज गायिका आशा भोसले के चेस्ट में इंफेक्शन हुआ है और उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया है. ऐसे में दिग्गज गायिका Asha Bhosle की तबीयत बिगड़ने और चेस्ट इंफेक्शन की खबर ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बढ़ती उम्र में सेहत का ख्याल रखना कितना जरूरी हो जाता है. 91 साल की उम्र में शरीर पहले जैसा मजबूत नहीं रहता, इम्युनिटी कमजोर हो जाती है और छोटी-सी लापरवाही भी बड़ी बीमारी का रूप ले सकती है. खासकर छाती और सांस से जुड़ी समस्याएं बुजुर्गों के लिए गंभीर हो सकती हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि चेस्ट इंफेक्शन आखिर होता कैसे है, कितना खतरनाक हो सकता है और इस उम्र में इससे बचाव कैसे किया जा सकता है.

कैसे होता है चेस्ट इंफेक्शन

चेस्ट इंफेक्शन आमतौर पर वायरस, बैक्टीरिया या कभी-कभी फंगल इंफेक्शन की वजह से होता है, जो फेफड़ों और सांस की नलियों को प्रभावित करता है. सर्दी-खांसी को नजरअंदाज करना, ठंडी हवा में ज्यादा रहना, प्रदूषण, धूल या कमजोर इम्युनिटी इसके बड़े कारण होते हैं. बुजुर्गों में यह खतरा इसलिए ज्यादा होता है क्योंकि उनका शरीर संक्रमण से लड़ने में उतना सक्षम नहीं रहता. कई बार साधारण जुकाम भी धीरे-धीरे चेस्ट इंफेक्शन में बदल जाता है.

91 की उम्र में क्यों ज्यादा खतरनाक है चेस्ट इंफेक्शन

91 साल जैसी उम्र में चेस्ट इंफेक्शन को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. यह निमोनिया जैसी गंभीर बीमारी में बदल सकता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत, ऑक्सीजन लेवल गिरना और अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ सकती है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह जानलेवा भी हो सकता है. यही वजह है कि डॉक्टर बुजुर्गों में खांसी, बुखार या सीने में जकड़न जैसे लक्षण दिखते ही तुरंत जांच कराने की सलाह देते हैं.

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बढ़ती उम्र में कैसे रखें चेस्ट का ख्याल

इस उम्र में सबसे जरूरी है सावधानी और नियमित देखभाल. ठंड और धूल से बचाव करना चाहिए, जरूरत पड़ने पर मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए. हल्की एक्सरसाइज और ब्रीदिंग एक्सरसाइज फेफड़ों को मजबूत रखने में मदद करती है. गर्म पानी, सूप और भाप लेना भी फायदेमंद होता है. साथ ही, समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप और जरूरी वैक्सीनेशन करवाना बेहद जरूरी है. सबसे अहम बात—खांसी, बुखार या सांस लेने में तकलीफ को कभी नजरअंदाज न करें. ध्यान रहे कि इस उम्र में ठंडी चीजों को खाने और पीने से परहेज ही करें, जिससे गले और चेस्ट में कफ जमा ना हो.

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थोड़ा सा चलने पर भी फूलने लगती है सांस, यह किस बीमारी का संकेत

थोड़ा सा चलने पर भी फूलने लगती है सांस, यह किस बीमारी का संकेत


आजकल की भागदौड़ भरी और तेजी से बदलती दुनिया में सांस फूलना एक आम बात हो गई है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना आपकी सेहत के लिए बहुत जोखिम भरा हो सकता है. कई बार लोग इसे थकान या उम्र का हवाला देकर इग्नोर कर देते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि थोड़ी दूर चलने या सीढ़ियां चढ़ने मात्र से ही आपकी सांसें क्यों फूलने लग जाती हैं? यह किसी बीमारी का संकेत हो सकता है, जिसे समय रहते सुधार लिया जाए तो आगे आने वाली मुश्किलों से बचा जा सकता है और एक स्वस्थ जीवन जीने में मदद मिल सकती है.

सांस फूलने के पीछे छिपे संभावित कारण

Heart Problems
अगर आपका दिल ठीक से खून पंप नहीं कर पा रहा है, तो शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, जिससे सांस फूलने लगती है. हार्ट फेल्योर, कोरोनरी आर्टरी डिजीज और हार्ट वाल्व की समस्या इसके पीछे के कारण हो सकते हैं. इन स्थितियों में मरीज को चलने या लेटने पर भी सांस लेने में तकलीफ हो सकती है.

Lung Diseases
फेफड़े ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालने का काम करते हैं. इनमें किसी भी तरह की समस्या सांस फूलने का कारण बन सकती है, जैसे अस्थमा (Asthma), क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) और फेफड़ों में इन्फेक्शन या निमोनिया इसके पीछे के कारण हो सकते हैं. अगर सांस फूलने के साथ खांसी, सीने में जकड़न या घरघराहट भी हो, तो यह फेफड़ों की बीमारी का संकेत हो सकता है.

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Anaemia (खून की कमी)
जब शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है, तो ऑक्सीजन सही तरीके से शरीर के अंगों तक नहीं पहुंच पाती. इसका सीधा असर सांस पर पड़ता है, जिसमें जल्दी थकान, चक्कर आना और हल्का काम करने पर भी सांस फूलने जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

Obesity (मोटापा)
अधिक वजन होने पर शरीर को ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है. साथ ही, छाती और फेफड़ों पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है.

Thyroid
थायरॉयड हार्मोन मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है, जिससे दिल की धड़कन तेज हो सकती है और सांस फूलने लगती है.

कब समझें कि मामला गंभीर है?

  • आराम करने पर भी सांस फूलना.
  • सीने में दर्द या दबाव महसूस होना.
  • होंठ या उंगलियों का नीला पड़ना.
  • लगातार खांसी या खून आना.
  • अचानक बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होना.

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शरीर में कंपकंपी से पहले ही दिखने लगते हैं पार्किंसंस के ये लक्षण, पहचानने में न करें देरी

शरीर में कंपकंपी से पहले ही दिखने लगते हैं पार्किंसंस के ये लक्षण, पहचानने में न करें देरी


World Parkinson’s Day 2026: पार्किंसंस एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जो ब्रेन में Dopamine नामक केमिकल की कमी के कारण होती है. अधिकतर लोग शरीर में होने वाली कंपकंपी और झटकों को ही इसका पहला लक्षण मान लेते हैं, लेकिन असल में कई ऐसे छोटे-छोटे संकेत होते हैं जो बरसों पहले से ही दिखाई देने लगते हैं, जिन्हें लोग नजरअंदाज कर देते हैं. पार्किंसंस के इन शुरुआती संकेतों को पकड़ना बेहद जरूरी होता है, जिन्हें लोग आमतौर पर दरकिनार कर देते हैं.

क्या होता है पार्किंसंस

पार्किंसंस, ब्रेन से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है जो धीरे-धीरे बढ़ते रहती है. यह मुख्य रूप से शरीर के मूवमेंट को प्रभावित करती है. यह तब होता है जब ब्रेन की वे cells नष्ट होने लगती हैं जो Dopamine नामक केमिकल बनाती हैं. Dopamine शरीर के मसल्स को कंट्रोल करने और तालमेल बनाए रखने के लिए जरूरी होता है. यह सिर्फ बुजुर्गों को ही नहीं, बल्कि जवान लोगों को भी हो सकती है, जिससे इसके लक्षणों को जानना और भी जरूरी हो जाता है.

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लिखावट (Hand writing) का छोटा होना – अगर आपकी लिखावट अचानक से छोटी होने लगे या शब्द एक-दूसरे से सटे हुए दिखने लगें, तो यह पार्किंसंस के प्रबल लक्षण हो सकते हैं.

सूंघने की क्षमता कम होना – गंध महसूस न होना या इलायची जैसी तेज गंध देने वाली चीजों की महक न आना इस बीमारी के सबसे पुराने लक्षणों में से एक माना जा सकता है. इस तरह के लक्षण अक्सर कंपकंपी से पहले ही दिखाई देने लगते हैं.

चेहरे के भाव कम होना – चेहरे के मसल्स में जकड़न आने के कारण इंसान का चेहरा हमेशा गंभीर या भावहीन दिखने लगता है, भले ही वह उदास न हो. पलकें झपकने की दर में भी कमी दिखने लगती है.

नींद की दिक्कत – सोने के दौरान बहुत ज्यादा हिलना-डुलना, चिल्लाना या सपने में होने वाली हरकतों को असलियत में करना, जैसे हाथ-पैर चलाना, खतरे की घंटी साबित हो सकती है.

पाचन तंत्र – पाचन तंत्र की धीमी गति या बार-बार कब्ज जैसी समस्याएं होना भी इसके शुरुआती लक्षणों में से एक माने जा सकते हैं.

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बार-बार आ रही है खांसी तो हो जाएं सावधान, हो सकता है खाने की नली में कैंसर

बार-बार आ रही है खांसी तो हो जाएं सावधान, हो सकता है खाने की नली में कैंसर


Esophageal Cancer : आजकल की बिजी लाइफस्टाइल में हम अक्सर छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे बार-बार खांसी, सीने में जलन या निगलने में हल्की परेशानी, कई बार ये सामान्य लगने वाले लक्षण गंभीर बीमारी की शुरुआत भी हो सकते हैं. ऐसी ही एक गंभीर बीमारी खाने की नली का कैंसर है. 

खाने की नली का कैंसर (Esophageal Cancer) एक तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है. अगर इसे शुरुआती अवस्था में पहचान लिया जाए, तो इलाज के अच्छे परिणाम मिल सकते हैं, लेकिन समस्या यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं और लोग इन्हें अनदेखा कर देते हैं. तो आइए जानते हैं कि खाने की नली का कैंसर क्या होता है, इसके शुरुआती संकेत क्या हैं और किन लोगों को ज्यादा खतरा है. 

खाने की नली का कैंसर क्या होता है

खाने की नली एक लंबी नली होती है जो हमारे गले को पेट से जोड़ती है. जब हम खाना खाते हैं, तो यही नली खाने को पेट तक पहुंचाती है. जब इस नली की अंदरूनी परत की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं और कंट्रोल से बाहर हो जाती हैं, तो कैंसर बनता है. यह कैंसर धीरे-धीरे आसपास के पार्टस में भी फैल सकता है. 

किन लोगों को ज्यादा खतरा होता है?

कुछ आदतें और स्थितियां इस कैंसर का खतरा बढ़ा देती हैं. जिसमें बढ़ती उम्र में इसका खतरा ज्यादा होता है, इसके अलावा पुरुषों में ज्यादा देखा जाता है. वहीं धूम्रपान और शराब का सेवन करने वाले लोगों में ज्यादा खतरा होता है. साथ ही लगातार एसिडिटी या GERD, मोटापा, फल और सब्जियां कम खाना, बहुत ज्यादा गर्म ड्रिंक्स पीने वाले लोगों  को भी ज्यादा खतरा होता है. 

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शुरुआती संकेत जिन्हें नजरअंदाज न करें

1. निगलने में दिक्कत (डिस्फेजिया) – शुरुआत में ठोस चीजें निगलने में परेशानी होती है, बाद में पानी पीने में भी दिक्कत हो सकती है. 

2. बिना कारण वजन घटना – अगर बिना डाइटिंग या एक्सरसाइज के वजन तेजी से कम हो रहा है, तो खाने की नली में कैंसर हो सकता है. 

3. सीने में दर्द या जलन – सीने में जलन, दबाव या दर्द महसूस होना, जिसे लोग अक्सर गैस समझ लेते हैं. ये भी खाने की नली में कैंसर का संकेत हो सकता है

4. बार-बार खांसी या आवाज बैठना – अगर खांसी लंबे समय तक ठीक नहीं हो रही या आवाज भारी हो गई है, तो सावधान हो जाएं. ये खाने की नली में कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है. 

5. खाना खाते समय बार-बार रुकावट – खाना गले में अटकना या बार-बार खांसी आना भी  खाने की नली में कैंसर का संकेत हो सकता है. 

कैसे करें बचाव?

खाने की नली के कैंसर से पूरी तरह बचाव करना संभव नहीं है, लेकिन कुछ आदतें अपनाकर इसका खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. जिसमें  धूम्रपान और शराब का सेवन न करें. अपनी डाइट में ताजे फल और हरी सब्जियों को शामिल करें. साथ ही अपने वजन का बैलेंस बनाए रखना और रोजाना एक्सरसाइज करना भी जरूरी है. अगर आपको बार-बार खांसी, एसिडिटी या जलन की समस्या होती है, तो उसे नजरअंदाज न करें और समय पर डॉक्टर से सलाह लें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना रहता है सिरदर्द, जानें कहां है दिक्कत?

सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना रहता है सिरदर्द, जानें कहां है दिक्कत?


Headaches Causes : आजकल बहुत से लोग एक अजीब समस्या से गुजर रहे हैं. इस समस्या में लोग बार-बार सिरदर्द से परेशान रहते हैं, लेकिन जब डॉक्टर के पास जाते हैं तो उनकी MRI, ब्लड टेस्ट और बाकी जांचें बिल्कुल सामान्य आती हैं. ऐसे में मन में सवाल उठता है कि जब सब कुछ ठीक है, तो दर्द क्यों हो रहा है. यह समस्या न सिर्फ शारीरिक रूप से परेशान करती है, बल्कि मानसिक रूप से भी कंफ्यूजन पैदा करती है. व्यक्ति सोचने लगता है कि शायद समस्या गंभीर नहीं है, लेकिन बार-बार होने वाला सिरदर्द रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर्द शरीर का एक संकेत होता है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. तो आइए जानते हैं कि सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना सिरदर्द रहता है तो कहां दिक्कत है. 

रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना सिरदर्द रहता है तो कहां दिक्कत है

डॉक्टरों के अनुसार, ऐसे सिरदर्द का कारण कोई बड़ी बीमारी नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की आदतें होती हैं. इसे फंक्शनल समस्या कहा जाता है, इसका मतलब शरीर के काम करने के तरीके में गड़बड़ी है, न कि किसी स्ट्रक्चरल बीमारी में, इस समस्या का कारण दिमाग में कोई चोट या ट्यूमर नहीं है, बल्कि हमारी लाइफस्टाइल धीरे-धीरे शरीर पर असर डाल रही है.

सिरदर्द के छिपे कारण क्या है

1. तनाव – आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव बहुत आम हो गया है. जब हम लगातार तनाव में रहते हैं, तो सिर और गर्दन की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं. ससे हल्का लेकिन लगातार रहने वाला सिरदर्द होता है, जिसे टेंशन हेडेक कहा जाता है. 

2. गलत बैठने का तरीका  – लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप पर झुककर बैठना गर्दन और कंधों पर दबाव डालता है. यह दबाव धीरे-धीरे सिर तक पहुंचता है और दर्द का कारण बनता है. 

3. ज्यादा स्क्रीन देखना – घंटों स्क्रीन देखने से आंखों पर जोर पड़ता है. कम पलक झपकाना और लगातार फोकस करने से आंखों में थकान होती है, जो सिरदर्द में बदल जाती है. 

4. समय पर खाना न खाना – अगर आप अक्सर खाना छोड़ देते हैं या देर से खाते हैं, तो ब्लड शुगर कम हो जाती है. इससे कमजोरी, चिड़चिड़ापन और सिरदर्द शुरू हो सकता है. 

5. नींद की कमी या ज्यादा नींद – नींद का सीधा संबंध हमारे दिमाग से होता है. कम सोना, बार-बार नींद टूटना या बहुत ज्यादा सोना,ये सभी सिरदर्द को बढ़ा सकते हैं. 

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रिपोर्ट नॉर्मल होने का मतलब क्या है

ज्यादातर मेडिकल टेस्ट सिर्फ बड़ी बीमारियों का पता लगाने के लिए होते हैं, जैसे ट्यूमर, इंफेक्शन, न्यूरोलॉजिकल बीमारी. लेकिन ये टेस्ट यह नहीं बता सकते कि आप कितनी देर तक एक ही जगह बैठे रहते हैं, कितना पानी पीते हैं, कितना तनाव लेते हैं, आपकी नींद और खाने का पैटर्न कैसा है. यही वजह है कि रिपोर्ट नॉर्मल आने के बाद भी समस्या बनी रहती है.

सिरदर्द कम करने के लिए क्या करें 

ऐसे सिरदर्द को बिना भारी दवाइयों के भी काफी हद तक ठीक किया जा सकता है. इसके लिए ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं, हल्की डिहाइड्रेशन भी सिरदर्द का कारण बन सकती है. इसके अलावा सही पोस्चर रखें. सीधे बैठें, स्क्रीन आंखों के स्तर पर रखें और हर 30 से 40 मिनट में ब्रेक लें. दिन में 3 से 4 बार बैलेंस डाइट लें, खाना स्किप न करें. हर दिन एक ही समय पर सोने और उठने की आदत डालें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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