पेट की परेशानी को कहें अलविदा, रात में अपनाएं ये 10 आदतें, गट हेल्थ होगी बेहतर

पेट की परेशानी को कहें अलविदा, रात में अपनाएं ये 10 आदतें, गट हेल्थ होगी बेहतर


देर रात भारी खाना पचाने में समय लेता है और नींद को भी प्रभावित करता है. कोशिश करें कि रात का खाना सोने से 2-3 घंटे पहले खा लें. अगर फिर भी रात में भूख लगे, तो हल्के स्नैक्स जैसे नट्स, दूध या फलों का सेवन कर सकते हैं.



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धुंधली न हो आंखों की रोशनी…मोतियाबिंद के खतरे को कम करने के लिए अपनाएं ये आसान आदतें

धुंधली न हो आंखों की रोशनी…मोतियाबिंद के खतरे को कम करने के लिए अपनाएं ये आसान आदतें


How To Prevent Cataracts Naturally: आंखों की रोशनी उम्र के साथ कमजोर होना आम बात है, लेकिन अगर समय रहते ध्यान दिया जाए तो इस प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है. कैटरेक्ट भी ऐसी ही एक समस्या है, जो उम्र बढ़ने के साथ ज्यादा देखने को मिलती है. अच्छी बात यह है कि कुछ आसान आदतें अपनाकर इसके खतरे को कम किया जा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कि आखिर यह दिक्कत क्यों होती है?

उम्र बढ़ने से होती है दिक्कत

दरअसल, उम्र बढ़ने के साथ आंखों का लेंस धीरे-धीरे धुंधला होने लगता है, जिससे साफ दिखाई देना मुश्किल हो जाता है. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे धूप में ज्यादा रहना, डायबिटीज का कंट्रोल में न होना और धूम्रपान की आदत. womansworld की रिपोर्ट के अनुसार, सही लाइफस्टाइल अपनाकर इसके असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

धूप से बचाव

सबसे पहला और आसान तरीका है धूप से बचाव. बाहर निकलते समय सनग्लासेस और टोपी पहनने से आंखों को हानिकारक यूवी किरणों से बचाया जा सकता है. खासतौर पर UV 400 वाले चश्मे आंखों के लिए ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं. खानपान भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. विटामिन C से भरपूर चीजें जैसे शिमला मिर्च, संतरा, स्ट्रॉबेरी और ब्रोकोली आंखों के लिए फायदेमंद होती हैं. ये एंटीऑक्सीडेंट्स आंखों को नुकसान पहुंचाने वाले फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं.

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खाने-पीने की चीजें

इसके अलावा, रोजाना सलाद खाने की आदत भी आंखों की सेहत के लिए अच्छी मानी जाती है. पालक और केल जैसी हरी सब्जियों में मौजूद ल्यूटिन और जेक्सैंथिन जैसे पोषक तत्व नजर को मजबूत रखने में मदद करते हैं. अगर सलाद में बेरीज शामिल कर ली जाएं तो इसका फायदा और बढ़ जाता है. फिजिकल एक्टिविटी भी उतनी ही जरूरी है. रोजाना हल्की-फुल्की एक्सरसाइज, जैसे वॉक करना, आंखों की ब्लड वेसल्स को स्वस्थ बनाए रखता है और उम्र से जुड़ी समस्याओं को धीमा करता है.

मल्टीविटामिन लेना फायदेमंद

सप्लीमेंट्स की बात करें तो मल्टीविटामिन लेना फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि इसमें कई जरूरी पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं. हालांकि, केवल एक ही विटामिन पर निर्भर रहना उतना असरदार नहीं माना जाता. दिलचस्प बात यह है कि तनाव भी आंखों की सेहत को प्रभावित कर सकता है. ज्यादा तनाव से शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो ब्लड शुगर को बढ़ाकर आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है.

ऐसे में छोटे-छोटे तरीके, जैसे च्युइंग गम चबाना, तनाव कम करने में मदद कर सकते हैं. मोतियाबिंद को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन सही खानपान, नियमित एक्सरसाइज और आंखों की देखभाल से इसके खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. छोटी-छोटी आदतें लंबे समय में बड़ा फर्क डाल सकती हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या ब्लैक स्किन वाली औरतों पर कामयाब नहीं IVF? नई स्टडी ने खोले चौंकाने वाले राज

क्या ब्लैक स्किन वाली औरतों पर कामयाब नहीं IVF? नई स्टडी ने खोले चौंकाने वाले राज


Why IVF Success Rate Is Lower In Black Women: क्या ब्लैक स्किन वाली महिलाओं पर IVF उतना असरदार नहीं होता जितना बाकी महिलाओं पर? यह सवाल लंबे समय से साइंटिस्ट और डॉक्टरों के बीच चर्चा का विषय रहा है. हाल ही में आई एक नई स्टडी ने इस मुद्दे पर कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं, जो इस बहस को और गहरा कर देते हैं.

करीब दो दशकों से फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर क्यों ब्लैक महिलाओं में IVF के बाद सफल जन्म दर  कम देखी जाती है. पहले माना जाता था कि इसका कारण उनके शरीर में फाइब्रॉइड्स की ज्यादा मौजूदगी हो सकती है, जो एम्ब्रियो के इम्प्लांटेशन में बाधा डालते हैं. इसके अलावा, IVF के दौरान दिए जाने वाले हार्मोनल इंजेक्शन्स पर शरीर का अलग रिस्पॉन्स भी एक वजह माना गया.

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क्या निकला रिसर्च में?

हालांकि, हाल ही में जर्नल फर्टिलिटी एंड स्टेरिलिटी  में पब्लिश एक बड़े स्टडी ने इस धारणा को आंशिक रूप से चुनौती दी है. इस स्टडी में 2.46 लाख से ज्यादा IVF साइकिल्स का एनालिसिस किया गया, जिनमें करीब 7 प्रतिशत केस ब्लैक महिलाओं के थे. रिसर्च में पाया गया कि ओवेरियन स्टिमुलेशन दवाओं पर ब्लैक महिलाओं का रिस्पॉन्स अन्य समूहों की तुलना में थोड़ा बेहतर था. दिलचस्प बात यह रही कि इन महिलाओं के एग्स से बनने वाले एम्ब्रियो की क्वालिटी भी अच्छी पाई गई. यानी IVF की शुरुआती प्रक्रिया में कोई बड़ी कमी नहीं दिखी. रिसर्च में उम्र, बॉडी मास इंडेक्स, हार्मोन लेवल और इंफर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं जैसे फैक्टर्स को भी ध्यान में रखा गया.

रिजल्ट चौंकाने वाले

इसके बावजूद, अंतिम परिणाम यानी सफल जन्म दर में फर्क देखने को मिला. जहां व्हाइट महिलाओं में यह दर करीब 60 प्रतिशत थी, वहीं ब्लैक महिलाओं में यह लगभग 45 प्रतिशत ही रही. यही अंतर वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि कहीं न कहीं कोई ऐसा फैक्टर है, जो आखिरी स्टेज में सफलता को प्रभावित कर रहा है. यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया में  OB-GYN एक्सपर्ट Iris Tien-Lynn Lee के मुताबिक,”स्पष्ट रूप से कोई ऐसी रुकावट है, जो इस प्रक्रिया को अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने से रोक रही है.”

कई छिपे हुए कारण हो सकते हैं

रिसर्चर का यह भी कहना है कि इसके पीछे कई छिपे हुए कारण हो सकते हैं, जैसे गर्भाशय में फाइब्रॉइड्स की अधिकता या एनवायरमेंट से जुड़े ऐसे तत्व, जिनका असर ब्लैक महिलाओं पर ज्यादा पड़ता है.  नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी फीनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन में प्रोफेसर तरुन जैन का मानना है कि इस तरह के अध्ययन हेल्थकेयर सिस्टम की कमियों को समझने में भी मदद करते हैं. उनके अनुसार, ब्लैक महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं में अक्सर खराब परिणामों का सामना करना पड़ता है, चाहे बात मातृत्व की हो या इंफर्टिलिटी ट्रीटमेंट की.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. 

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भारत में जल्द आ सकती है डेंगू की वैक्सीन Qdenga, जानिए कैसे करती है काम?

भारत में जल्द आ सकती है डेंगू की वैक्सीन Qdenga, जानिए कैसे करती है काम?


How Effective Is Dengue Vaccine Qdenga: दुनियाभर में डेंगू के बढ़ते मामलों के बीच Qdenga नाम की डेंगू वैक्सीन को लेकर उम्मीदें तेज हो गई हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वैक्सीन 2026 तक भारत में लॉन्च हो सकती है, हालांकि इसके लिए सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन की मंजूरी और क्लिनिकल ट्रायल्स की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है. यह वैक्सीन जापान की कंपनी टाकेडा फार्मास्युटिकल कंपनी लिमिटेड  ने विकसित की है, जिसे भारत में ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत हैदराबाद स्थित बायोलॉजिकल ई के साथ मिलकर तैयार किया जा सकता है एक्सपर्ट मानते हैं कि देश में तेजी से बढ़ते डेंगू मामलों को देखते हुए यह एक अहम कदम साबित हो सकता है.

भारत में बढ़ रहे हैं मामले

दरअसल, भारत में डेंगू के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है. बायोइन्फॉर्मेटिक्स जर्नल में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच डेंगू के मामलों में करीब 39.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इसके क्लस्टर आउटब्रेक भी सामने आए हैं.  एगिलस डायग्नोस्टिक्स से जुड़ी डॉ. रश्मि खाडपकर ने NDTV को बताया कि भारत में डेंगू हाइपरएंडेमिक हो चुका है, यानी इसके सभी चार वायरस प्रकार एक साथ फैल रहे हैं. यही वजह है कि ऐसी वैक्सीन की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी. 

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क्या है यह वैक्सीन?

Qdenga एक लाइव एटेन्यूएटेड टेट्रावैलेंट वैक्सीन है, जिसका मतलब है कि यह डेंगू वायरस के चारों प्रमुख प्रकार- DEN1, DEN2, DEN3 और DEN4 के खिलाफ सुरक्षा देने के लिए तैयार की गई है. यशोदा हॉस्पिटल के डॉक्टर हरि किशन बूरुगु के मुताबिक, यह वैक्सीन पहले की वैक्सीन डेंगवैक्सिया से अलग है, जिसे केवल उन्हीं लोगों के लिए सुझाया जाता था जिन्हें पहले डेंगू हो चुका हो. 

इन देशों में मिल चुकी है मंजूरी

इस वैक्सीन को अब तक 40 से ज्यादा देशों में मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें यूरोप, ब्रिटेन, इंडोनेशिया और ब्राजील शामिल हैं. इसके साथ ही, इसे वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन से प्रीक्वालिफिकेशन भी मिला है, जो इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता पर वैश्विक भरोसे को दर्शाता है. क्लिनिकल ट्रायल्स की बात करें तो इस वैक्सीन का परीक्षण दुनिया भर में 60,000 से ज्यादा लोगों पर किया जा चुका है. वहीं, भारत में 4 से 60 वर्ष की उम्र के करीब 480 लोगों पर फेज-3 ट्रायल किया गया, जिसमें इसकी सुरक्षा और इम्यून रिस्पॉन्स का आकलन किया गया.

कितनी खतरनाक है डेंगू की बीमारी?

डेंगू एक मच्छरजनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से एडीस एजिप्टी मच्छर के जरिए फैलती है. इसके लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, मांसपेशियों में दर्द और त्वचा पर रैश शामिल हैं. गंभीर मामलों में यह डेंगू हेमरेजिक फीवर में बदल सकता है, जो जानलेवा भी हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस छोटे-से अंग की वजह से लंबी होती है आपकी उम्र, यह खुलासा उड़ा देगा आपके होश

इस छोटे-से अंग की वजह से लंबी होती है आपकी उम्र, यह खुलासा उड़ा देगा आपके होश


How Thymus Health Affects Lifespan: क्या आपके सीने का एक छोटा सा अंग आपकी लंबी उम्र और गंभीर बीमारियों के खतरे का संकेत दे सकता है? हाल ही में सामने आई एक नई स्टडी ने इसी ओर इशारा किया है. साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक, थाइमस  नाम का अंग हमारे इम्यून सिस्टम और लंबे समय तक स्वस्थ रहने में अहम भूमिका निभाता है. रिसर्च में बताया गया है कि थाइमस की सेहत सीधे तौर पर हार्ट डिजीज और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे से जुड़ी हो सकती है. साइंटिस्ट का कहना है कि यह अंग अब सिर्फ एक सामान्य ग्लैंड्स नहीं, बल्कि उम्र बढ़ने और बीमारियों की संभावना को कंट्रोल करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभर रहा है.

क्या है थाइमस?

थाइमस एक छोटी, दो भागों वाली ग्रंथि होती है, जो फेफड़ों के बीच ऊपरी छाती में स्थित होती है. इसका मुख्य काम टी-लिम्फोसाइट्स नामक व्हाइट ब्लड सेल्स का निर्माण करना है, जो शरीर को इंफेक्शन और बीमारियों से बचाती हैं. इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से 27,000 से ज्यादा मरीजों के स्कैन और मेडिकल रिकॉर्ड का एनालिसिस किया. इसके जरिए उन्होंने थाइमस की सेहत और मरीजों की बीमारी के जोखिम के बीच संबंध को समझने की कोशिश की.

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क्या निकला नतीजा?

नतीजों में पाया गया कि जिन लोगों का थाइमस हेल्दी था, उनमें मृत्यु दर करीब 13.4 प्रतिशत रही, जबकि जिनका थाइमस कमजोर था, उनमें यह आंकड़ा 25.5 प्रतिशत तक पहुंच गया. इसके अलावा, कमजोर थाइमस वाले लोगों में 5.3 प्रतिशत को फेफड़ों का कैंसर और 16.7 प्रतिशत को हार्ट संबंधी बीमारियां होने का खतरा ज्यादा पाया गया. रिसर्च यह भी बताता है कि उम्र बढ़ने के साथ थाइमस धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है और उसकी जगह फैटी टिश्यू ले लेते हैं. यही बदलाव शरीर की रोग इम्यून क्षमता को कमजोर कर सकता है.

रिसर्च के लिए इसका यूज

साइंटिस्ट ने आगे इस शोध को और मजबूत करने के लिए दो बड़े अध्ययन फ्रेमिंगहैम हार्ट स्टडी और नेशनल लंग स्क्रीनिंग ट्रायल के डेटा का भी उपयोग किया. इसमें AI आधारित डीप लर्निंग सिस्टम के जरिए थाइमस की स्थिति का ज्यादा सटीक आकलन किया गया. रिसर्चर का कहना है कि पारंपरिक तरीके से थाइमस की जांच उतनी सटीक नहीं होती, इसलिए AI तकनीक ने इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाई है. इस मॉडल ने अलग-अलग डेटा सेट पर भी लगातार सटीक परिणाम दिए. रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि लाइफस्टाइल में बदलाव, जैसे नियमित एक्सरसाइज, अच्छी नींद और संतुलित आहार थाइमस की सेहत पर पॉजिटिव असर डाल सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हेल्दी किड्स को शिकार बना रहा कोविड का नया वैरिएंट सिकाडा, कितने सेफ हैं भारत के बच्चे?

हेल्दी किड्स को शिकार बना रहा कोविड का नया वैरिएंट सिकाडा, कितने सेफ हैं भारत के बच्चे?


Is BA.3.2 Dangerous For Children: क्या कोविड का नया वैरिएंट बच्चों के लिए ज्यादा खतरा बन रहा है? अमेरिका में तेजी से फैल रहे “सिकाडा” नाम के कोविड वैरिएंट ने स्वास्थ्य एक्सपर्ट की चिंता बढ़ा दी है. शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वैरिएंट खासतौर पर बच्चों को ज्यादा प्रभावित कर रहा है, हालांकि फिलहाल इसके लक्षण पहले जैसे ही बताए जा रहे हैं. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.

तेजी से फैल रहा नया वैरिएंट

यह नया वैरिएंट BA.3.2 के नाम से जाना जाता है, जिसे सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने कई राज्यों में ट्रैक किया है. रिपोर्ट्स के अनुसार, यह वैरिएंट अमेरिका के 25 राज्यों और 23 देशों में फैल चुका है. लेकिन अच्छी बात यह है कि अस्पताल में भर्ती होने के मामले फिलहाल कम हो रहे हैं. साइंटिस्ट का मानना है कि यह वैरिएंट ओमिक्रॉन के BA.3 सब-वैरिएंट से जुड़ा हुआ है, जो पहले 2022 में सामने आया था. माना जा रहा है कि यह वायरस लंबे समय तक किसी कमजोर इम्यून सिस्टम वाले व्यक्ति के शरीर में मौजूद रहा और धीरे-धीरे म्यूटेशन के जरिए एक नए रूप में सामने आया. 

अंडर मॉनिटरिंग की कैटेगरी

इस वैरिएंट को वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने वैरिएंट अंडर मॉनिटरिंग की कैटेगरी में रखा है, यानी अभी इस पर नजर रखी जा रही है लेकिन इसे बेहद खतरनाक घोषित नहीं किया गया है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि BA.3.2 बच्चों को ज्यादा इंफेक्टेड करता दिख रहा है. न्यूयॉर्क के डेटा के अनुसार, 3 से 15 साल के बच्चे इस वैरिएंट से लगभग पांच गुना ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. हालांकि, कुल मामलों में इसकी हिस्सेदारी अभी भी सीमित है. 

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क्या हैं लक्षण?

लक्षणों की बात करें तो इसमें कोई नया बदलाव नहीं देखा गया है. बुखार, खांसी, गले में खराश, नाक बहना, थकान और सांस लेने में दिक्कत जैसे सामान्य कोविड लक्षण ही सामने आ रहे हैं। स्वाद और गंध का जाना अब कम मामलों में देखा जा रहा है.  एक्सपर्ट का कहना है कि मौजूदा वैक्सीन इस वैरिएंट पर पूरी तरह असरदार नहीं हो सकती, लेकिन यह गंभीर बीमारी से बचाने में अब भी मदद करती है. इसके अलावा, मौजूदा एंटीवायरल दवाएं भी प्रभावी मानी जा रही है. 

भारत के बच्चों पर असर

अब सवाल उठता है कि क्या भारत के बच्चे सुरक्षित हैं? फिलहाल भारत में इस वैरिएंट के बड़े पैमाने पर फैलने की कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ग्लोबल ट्रेंड को देखते हुए सतर्क रहना जरूरी है. डॉक्टर्स सलाह देते हैं कि बच्चों की इम्यूनिटी मजबूत रखने, साफ-सफाई का ध्यान रखने और भीड़भाड़ वाली जगहों से बचाव जैसे उपाय अपनाए जाएं. इसके साथ ही, जरूरत पड़ने पर बूस्टर डोज को लेकर डॉक्टर से सलाह लेना भी जरूरी है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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