हर घूंट पानी के बाद यूरिन क्यों आता है? जानिए क्या है इसका कारण और शरीर का पूरा साइंस

हर घूंट पानी के बाद यूरिन क्यों आता है? जानिए क्या है इसका कारण और शरीर का पूरा साइंस


हम सभी को बचपन से यही सिखाया जाता है कि दिन भर में खूब पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी सलाह देते हैं कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना 7 से 8 गिलास पानी जरूरी है. पानी पीने से शरीर डिहाइड्रेशन से बचता है, टॉक्सिन बाहर निकलते हैं और किडनी सही से काम करती है, लेकिन कई लोगों की एक आम शिकायत होती है जैसे ही पानी पीते हैं, तुरंत यूरिन लगने लगती है. कुछ लोगों को तो हर 10–15 मिनट में वॉशरूम जाना पड़ता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सामान्य है या फिर किसी बीमारी का संकेत है. अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. आइए आज हम आपको बताते हैं कि हर घूंट पानी के बाद यूरिन क्यों आता है, इसके पीछे शरीर का क्या साइंस है और इससे कैसे बचा जा सकता है. 

पानी पीने के बाद बार-बार यूरिन आने का क्या कारण है?

1. ओवर एक्टिव ब्लैडर (Overactive Bladder) – यह बार-बार यूरिन आने की सबसे आम वजह मानी जाती है. इस स्थिति में ब्लैडर की मांसपेशियां जरूरत से ज्यादा एक्टिव हो जाती हैं. ब्लैडर पूरा भरा न होने पर भी दिमाग को बार-बार यूरिन का सिग्नल भेजता है, जिससे अचानक और तेज यूरिन की इच्छा होती है. इसी कारण थोड़ी-सी मात्रा में पानी पीते ही वॉशरूम भागना पड़ता है. 

2. मूत्र मार्ग में संक्रमण (UTI) – अगर यूरिन करते समय जलन, दर्द, बदबू या बार-बार यूरिन लगे तो यह यूटीआई का संकेत हो सकता है. इसमें ब्लैडर ज्यादा सेंसिटिव हो जाता है. 

3. ज्यादा चाय, कॉफी या शराब का सेवन – चाय, कॉफी और शराब में कैफीन होता है, जो यूरिन बढ़ाने का काम करता है, ब्लैडर में जलन पैदा करता है, जिससे बार-बार यूरिन की इच्छा होती है. 

4.  शुगर (डायबिटीज) का कंट्रोल में न होना – अगर ब्लड शुगर लेवल ज्यादा रहता है तो शरीर अतिरिक्त शुगर को यूरिन के जरिए बाहर निकालने की कोशिश करता है, जिससे यूरिन ज्यादा आता है साथ में प्यास भी ज्यादा लगती है. 

5. तनाव और चिंता – मानसिक तनाव या एंग्जायटी भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. नर्वस सिस्टम ब्लैडर को गलत सिग्नल भेजने लगता है, जिससे बार-बार यूरिन लगता है. 

बार-बार यूरिन आने से बचने के लिए क्या करें?

1. पानी पीने का सही तरीका अपनाएं – एक साथ बहुत ज्यादा पानी न पिएं, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पूरे दिन पानी पिएं. बहुत तेजी से पानी पीने से बचें. 

2. कैफीन और फिजी ड्रिंक्स कम करें – चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक, एनर्जी ड्रिंक्स इनका सेवन कम करने से ब्लैडर को राहत मिलती है. 

3. बार-बार बाथरूम जाने की आदत न डालें – हर 10–15 मिनट में वॉशरूम जाने से ब्लैडर कमजोर हो सकता है. यूरिन रोकने की क्षमता कम हो जाती है. कोशिश करें कि तय समय के अंतराल में ही बाथरूम जाएं. 

4. पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज करें – पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज (जैसे केगल एक्सरसाइज), ब्लैडर की मांसपेशियों को मजबूत बनाती हैं, यूरिन को कंट्रोल करने में मदद करती हैं. 

5.  जरूरत पड़े तो डॉक्टर से सलाह लें – अगर समस्या लंबे समय तक बनी रहे. जलन या दर्द हो या नींद में बार-बार यूरिन आए तो डॉक्टर से जांच कराना बेहद जरूरी है. 

यह भी पढ़ें – ये हैं मौत से पहले के 12 संकेत जिन्हें देखकर डॉक्टर भी कर देते हैं हाथ खड़े, जानिए कैसे आखिरी सांसे गिनता है मरीज

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये हैं मौत से पहले के 12 संकेत जिन्हें देखकर डॉक्टर भी कर देते हैं हाथ खड़े, जानिए कैसे आखिर…

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मृत्यु जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है, लेकिन इसके बारे में बात करना आज भी लोगों को असहज कर देता है.  जब कोई अपना गंभीर रूप से बीमार होता है और उसका शरीर जवाब देने लगता है, तब परिवार के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि अब क्या होने वाला है. डॉक्टर, नर्स और हॉस्पिस केयर में काम करने वाले लोग अक्सर कुछ ऐसे शारीरिक और मानसिक बदलाव पहचान लेते हैं, जो बताते हैं कि इंसान अपने जीवन के अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है. ये संकेत डराने के लिए नहीं होते, बल्कि इसलिए जरूरी हैं ताकि मरीज को कम से कम दर्द, ज्यादा से ज्यादा आराम के साथ ध्यान रखा जा सके. तो आइए आज हम आपको वे 12 संकेत बताते हैं, जो आमतौर पर मौत से पहले दिखाई देते हैं. 

ये हैं मौत से पहले के 12 संकेत

1. लगातार थकान और कमजोरी – मरीज दिन का ज्यादातर समय सोते हुए बिताने लगता है. थोड़ा सा बोलना या हिलना-डुलना भी उसे थका देता है. यह आलस नहीं, बल्कि शरीर की एनर्जी खत्म होने का संकेत होता है. 

2. भूख और प्यास का कम हो जाना – अंतिम समय में शरीर को ज्यादा खाना या पानी की जरूरत नहीं रहती, मरीज खुद खाने-पीने से मना कर सकता है. यह स्वाभाविक प्रक्रिया है. 

3. सांस लेने में तकलीफ – सांस फूलना, तेज या बहुत धीमी सांसें चलना आम बात है. कभी-कभी बिना किसी मेहनत के भी सांस लेने में परेशानी होती है. इस समय ऑक्सीजन, दवाइयां और शांत वातावरण मदद करता है. 

4. दर्द का बढ़ना या बदलना – हर मरीज को दर्द एक-सा नहीं होता, कुछ को ज्यादा, कुछ को कम, कैंसर, फेफड़ों की बीमारी या मानसिक तनाव दर्द को बढ़ा सकता है. डॉक्टर अक्सर दवाइयां देकर दर्द को काबू में रखते हैं. 

5. चिंता और बेचैनी – मरीज बेचैन हो सकता है, बार-बार करवट बदलता है, पसीना आता है. नींद नहीं आती या डर महसूस होता है. यह मौत के डर या मानसिक थकान की वजह से हो सकता है. इस समय प्यार भरी बातों और दवाओं से राहत मिलती है. 

6. मतली और उल्टी – अंतिम समय में पेट ठीक से काम नहीं करता, कभी दवाओं से, कभी कब्ज से मतली हो सकती है. हल्का खाना, ताजी हवा और डॉक्टर की दवाइयां मददगार होती हैं. 

7. कब्ज  – कम खाना, कम पानी पीना और दर्द की दवाइयां कब्ज पैदा करती हैं. यह तकलीफदेह हो सकता है. डॉक्टर दवाएं या इंजेक्शन देकर राहत दिलाते हैं. 

8. अकेलापन और लोगों से दूरी – मरीज धीरे-धीरे कम बोलने लगता है, मिलना-जुलना कम कर देता है, यहां तक कि अपनों से भी, यह उदासी नहीं, बल्कि अंदर की तैयारी होती है. ऐसे में बस पास बैठकर हाथ पकड़ना भी बहुत सुकून देता है. 

9. पेशाब और मल पर नियंत्रण न रहना – शरीर की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं. मरीज को पेशाब या शौच पर नियंत्रण नहीं रहता, इस समय साफ-सफाई बहुत जरूरी होती है ताकि संक्रमण न हो. 

10. हाथ-पैर ठंडे पड़ना और त्वचा का रंग बदलना – खून का बहाव कम होने लगता है. हाथ-पैर ठंडे, त्वचा पर नीले या बैंगनी धब्बे दिख सकते हैं. होंठ और नाखून नीले पड़ सकते हैं. यह साफ संकेत है कि शरीर धीरे-धीरे बंद हो रहा है. 

11. भ्रम और प्रलाप (Delirium) –  मरीज ऐसी बातें कर सकता है जो समझ में न आएं. कभी किसी को देखना या सुनना जो मौजूद न हो. यह ऑक्सीजन की कमी, दवाओं या किडनी फेल होने की वजह से होता है. 

12. डेथ रेटल यानी मौत की घरघराहट – यह आखिरी और सबसे साफ संकेत होता है. सांस लेते समय घरघराहट या घड़घड़ाहट की आवाज आती है. असल में मरीज को दर्द नहीं होता, लेकिन आवाज सुनकर घबरा जाता है. ऐसे में करवट बदलना और सिर ऊंचा रखना मदद करता है. 

यह भी पढ़ें – Brain Hemorrhage: क्यों होता है ब्रेन हैमरेज? एक्सपर्ट्स से जानें इसके कारण, प्रकार और बचाव के सबसे जरूरी तरीके

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा पीएम2.5, जानें इनडोर पॉल्यूशन कितना खतरनाक?

घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा पीएम2.5, जानें इनडोर पॉल्यूशन कितना खतरनाक?


हम अक्सर यह सोचते हैं कि घर हमारे लिए सबसे सुरक्षित जगह है. दरवाजे बंद कर के, खिड़कियां बंद कर के हम यह मान लेते हैं कि हमारे परिवार को कोई नुकसान नहीं होगा. लेकिन सच यह है कि हमारे घर के अंदर हवा कई बार बाहरी हवा से भी ज्यादा दूषित हो सकती है. धूल, धुएं, फर्नीचर से निकलने वाले रसायन, खाना पकाने के दौरान बनने वाले छोटे कण, सफाई से निकलने वाले हानिकारक गैस ये सब धीरे-धीरे हमारी हेल्थ को नुकसान पहुंचाते हैं. 

भारत जैसे देश में, जहां अक्सर घरों में वेंटिलेशन यानी हवा का अच्छा प्रवाह नहीं होता, इन प्रदूषकों का असर और भी गंभीर हो जाता है. साथ ही पीएम 2.5 घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा है. लंबे समय तक इनसे संपर्क में रहने से बच्चों में एलर्जी और अस्थमा, वयस्कों में फेफड़ों की बीमारियां और यहां तक कि हार्ट डिजीज और मस्तिष्क संबंधी समस्याएं भी विकसित हो सकती हैं. 

घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा पीएम 2.5

1. खाना पकाने से धुएं और कण की वजह से – जब हम तलते या ग्रिल करते हैं, तब छोटे छोटे धूल और धुएं के कण (PM2.5) हवा में फैलते हैं. ये कण इतने छोटे होते हैं कि वे फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं और रक्त में भी प्रवेश कर सकते हैं. 
 
2. फर्नीचर और निर्माण सामग्री से निकलने वाले रसायन – पार्टिकल बोर्ड, प्लाईवुड और कुछ पेंट्स से फॉर्मेल्डिहाइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती रहती हैं. ये रसायन गंधहीन होने के कारण हम अक्सर इसका एहसास नहीं कर पाते है.

3. सफाई उत्पाद और एअर फ्रेशनर – सामान्य घरेलू क्लीनर, एयर फ्रेशनर और सौंदर्य प्रसाधन वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) छोड़ते हैं. लंबे समय तक संपर्क में रहने से सिरदर्द, आंखों में जलन, एलर्जी और यहां तक कि कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है. 

4. नमी और फफूंद – घर के अंदर ज्यादा नमी होने पर फफूंद पनप जाती है. फफूंद और इसके माइकोटॉक्सिन आपके श्वसन तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं. 

5. पालतू जानवर और धूल – पालतू जानवरों के बाल, रूसी और मूत्र में मौजूद प्रोटीन हवा में एलर्जी कारक बन जाते हैं. सूक्ष्म धूल और मृत त्वचा कोशिकाओं से भी एलर्जी और अस्थमा का खतरा बढ़ता है. 

6. कार्बन मोनोऑक्साइड और रेडॉन – ये दोनों रंगहीन, गंधहीन और बेहद खतरनाक गैसें हैं. कम मात्रा में भी सिरदर्द, थकान और चक्कर ला सकती हैं. ज्यादा मात्रा में ये जानलेवा हो सकती हैं. 

इनडोर पॉल्यूशन कितना खतरनाक?

घर के अंदर की खराब हवा धीरे-धीरे हमारे शरीर पर असर डालती है. इससे लगातार सिरदर्द, थकान और नींद में कमी, आंखों, नाक और गले में जलन, बार-बार खांसी, छींक या एलर्जी, त्वचा पर चकत्ते या जलन, बच्चों में नई एलर्जी या अस्थमा का बढ़ना, मानसिक थकान, याददाश्त में कमी और एकाग्रता में कमी, अगर ये लक्षण केवल घर के अंदर होते हैं और बाहर जाने पर कम हो जाते हैं, तो यह सिक बिल्डिंग सिंड्रोम यानी घर के अंदर की हवा से जुड़ी बीमारी का संकेत हो सकता है. 

घर की हवा को सुरक्षित बनाने के उपाय

1. रोजाना 15–20 मिनट के लिए खिड़कियां खोलें.

2. खाना बनाते समय एग्जॉस्ट फैन का यूज करें.

3. HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर लगाएं.

4. घर की नमी 50 प्रतिशत से कम रखें. 

5. फर्नीचर और पेंट में से निकलने वाले रसायनों से बचें. 

6. सुगंधित क्लीनर और एयर फ्रेशनर के बजाय नेचुरल ऑप्शन अपनाएं, पौधों का यूज करें, कुछ पौधे हवा से प्रदूषक सोख सकते हैं. 

7. एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग ऐप्स से हवा की क्वालिटी पर नजर रखें. 

यह भी पढ़ें – सिर्फ सुबह-सुबह टहलने से नहीं सुधरेगी हार्ट हेल्थ, जानें क्या-क्या है जरूरी?

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सिर्फ सुबह-सुबह टहलने से नहीं सुधरेगी हार्ट हेल्थ, जानें क्या-क्या है जरूरी?

सिर्फ सुबह-सुबह टहलने से नहीं सुधरेगी हार्ट हेल्थ, जानें क्या-क्या है जरूरी?


आजकल ज्यादातर लोग मानते हैं कि अगर रोज सुबह उठकर 20–30 मिनट टहल लें, तो उनका दिल हमेशा हेल्दी रहेगा. वॉक करना वाकई फायदेमंद है, लेकिन सिर्फ टहलना ही दिल की सेहत की गारंटी नहीं है. हार्ट को हेल्दी रखने के लिए पूरा लाइफस्टाइल सही होना जरूरी है, जिसमें खान-पान, एक्सरसाइज, नींद, तनाव, आदतें और सोच सब कुछ शामिल है. 

दिल की बीमारियां आज लाइफस्टाइल डिजीज बन चुकी हैं.गलत खान-पान, बैठे-बैठे काम करना, तनाव, धूम्रपान, शराब और नींद की कमी  ये सभी मिलकर दिल को धीरे-धीरे कमजोर बना देते हैं. अच्छी बात यह है कि अगर समय रहते कुछ सही कदम उठा लिए जाएं, तो हार्ट डिजीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि दिल को मजबूत और हेल्दी रखने के लिए वॉक के अलावा और क्या-क्या जरूरी है. 

दिल को हेल्दी रखने के लिए वॉक के अलावा क्या-क्या जरूरी है

1. दिल की सेहत के लिए सही खानपान सबसे जरूरी – एक्सपर्ट्स के अनुसार, आप क्या खाते हैं, इसका सीधा असर आपके दिल पर पड़ता है. ज्यादा तला-भुना, पैकेट वाला और मीठा खाना दिल की धमनियों में चर्बी जमा कर सकता है. इसलिए हरी सब्जियां जैसे पालक, लौकी, भिंडी, गाजर, ताजे फल जैसे सेब, संतरा, अमरूद, पपीता, साबुत अनाज जैसे दलिया, ओट्स, ब्राउन राइस, दालें, चना, राजमा, मूंग अच्छा फेट जैसे अखरोट, अलसी, जैतून का तेल जैसी चीजें डाइट में शामिल करें. 

2. सिर्फ टहलना नहीं, पूरा व्यायाम जरूरी है – सुबह की वॉक अच्छी शुरुआत है, लेकिन दिल को मजबूत रखने के लिए इतना काफी नहीं, दिल के लिए फायदेमंद एक्सरसाइज तेज  चलना या हल्की दौड़, साइकिल चलाना, रस्सी कूदना, योग और प्राणायाम, हल्की वेट ट्रेनिंग, हफ्ते में कम से कम 150 मिनट हल्की एक्सरसाइज या 75 मिनट तेज एक्सरसाइज करने की कोशिश करें.

3. वजन कंट्रोल में रखें – एक्सपर्ट्स के अनुसार, बढ़ा हुआ वजन दिल पर अतिरिक्त दबाव डालता है. मोटापा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है, जो सीधे हार्ट डिजीज से जुड़े हैं. इसलिए सही डाइट और नियमित एक्सरसाइज आपके वजन को कंट्रोल में रखती है. छोटे-छोटे बदलाव, जैसे देर रात खाना छोड़ना और मीठा कम करना, बहुत फर्क डाल सकते हैं.

4. नमक और सोडियम कम करें – ज्यादा नमक खाने से ब्लड प्रेशर बढ़ता है, जो दिल के लिए खतरनाक है. पैकेट वाले और डिब्बाबंद खाने से बचें.अचार, नमकीन, सॉस सीमित मात्रा में लें. खाने में स्वाद के लिए नींबू, धनिया, मसाले यूज करें. 

5. धूम्रपान और तंबाकू से दूरी बनाएं – धूम्रपान दिल की नसों को सख्त कर देता है और ऑक्सीजन की सप्लाई कम कर देता है. इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.अगर आप सिगरेट या तंबाकू लेते हैं, तो इसे छोड़ना दिल के लिए सबसे बड़ा तोहफा होगा. 

6. तनाव को हल्के में न लें – एक्सपर्ट्स के अनुसार, लगातार तनाव में रहने से दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ा रहता है. समय के साथ यह हृदय को नुकसान पहुंचा सकता है. तनाव कम करने के आसान तरीके गहरी सांस लेना, ध्यान और योग, प्रकृति के बीच समय बिताना, परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करना है. 

7. पूरी नींद लें – कम नींद लेने वालों में दिल की बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है. हर दिन 7–8 घंटे की अच्छी नींद दिल को आराम देती है और शरीर को रिपेयर करने का मौका देती है.सोने से पहले मोबाइल और टीवी से दूरी बनाना फायदेमंद होता है. 

8. नियमित हेल्थ चेक-अप कराएं – ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की समय-समय पर जांच बहुत जरूरी है. बीमारी का जल्दी पता लग जाए, तो इलाज आसान हो जाता है. 

यह भी पढ़ें – बच्चा ऑनलाइन गेम खेलता है, उसके दिमाग में सुसाइड के ख्याल तो नहीं आ रहे? ये संकेत दिखें तो हो जाएं अलर्ट

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बच्चा ऑनलाइन गेम खेलता है, उसके दिमाग में सुसाइड के ख्याल तो नहीं आ रहे? ये संकेत दिखें तो हो ज

बच्चा ऑनलाइन गेम खेलता है, उसके दिमाग में सुसाइड के ख्याल तो नहीं आ रहे? ये संकेत दिखें तो हो ज


उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से आई एक दर्दनाक खबर ने पूरे देश को झकझोर  कर रख दिया है. यहां तीन नाबालिग सगी बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली. शुरुआती जांच में सामने आया कि तीनों बहनें एक टास्क बेस्ड ऑनलाइन कोरियन लव गेम की आदी थी. वहीं यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं बल्कि डिजिटल दौर में बच्चों की मानसिक सुरक्षा को लेकर एक बड़ी चेतावनी मानी जा रही है.

दरअसल साहिबाबाद की भारत सिटी सोसाइटी में रहने वाली तीन बहनें, जिनकी उम्र करीब 12, 14 और 16 साल थी. लंबे समय से मोबाइल गेमिंग में डूबी हुई थी. बताया गया कि वे न स्कूल जाती थी और न ही बाहर किसी से मिलती थी. तीनों ने अपने लिए कोरियन नाम तक रख लिए थे और कोरियन कल्चर को फॉलो करने लगी थी. परिवार के अनुसार पिता ने जब उनकी गेमिंग की आदत पर आपत्ति जताई और मोबाइल फोन छीन लिया, तो तीनों गहरे मानसिक दबाव में चली गई. जिसके बाद उन्होंने फ्लैट की बालकनी से छलांग लगाकर जान दे दी. मौके से एक सुसाइड नोट भी मिला, जिसमें लिखा था मम्मी-पापा सॉरी… हम गेम नहीं छोड़ पा रही है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि बच्चा ऑनलाइन गेम खेलता है तो उसके दिमाग में सुसाइड के ख्याल तो नहीं आ रहे हैं और कौन से संकेत दिखें तो आपको अलर्ट हो जाना चाहिए. 

क्या है कोरियन लव गेम?

एक्सपर्ट्स के अनुसार कोरियन लव गेम एक ऐसा ऑनलाइन गेम है, जिसमें सोशल मीडिया के जरिए एक अनजान व्यक्ति यूजर से संपर्क करता है. वह खुद को काेरियन बताकर  दोस्ती और प्यार की बातें करता है. वहीं भरोसा जीतने के बाद वह छोटे-छोटे टास्क देना शुरू करता है. वहीं शुरुआत में टास्क आसान होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे मुश्किल और मानसिक दबाव बढ़ाने वाले हो जाते हैं. अगर यूजर टास्क पूरा करने से मना करें तो उसे डराया और धमकाया जाता है. इस तरह के गेम में करीब 50 टास्क होते हैं, जो कई दिनों तक चलते हैं. 

ऑनलाइन गेम बच्चों के दिमाग पर कैसे डालते हैं असर?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों और किशोरों का दिमाग पूरी तरह विकसित नहीं होता है. ऐसे में वे गेम के कैरेक्टर और चैलेंज को ही असली दुनिया मानने लगते हैं. टास्क पूरे करने का दबाव, डर और हार का भय उनके निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर देता है. इसके अलावा अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट जीन एम. ट्वेंग की किताब iGen के अनुसार 2011 के बाद से ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया एडिक्शन के कारण युवाओं में डिप्रेशन और आत्महत्या के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है.

कौन से संकेत दिखें तो हो जाएं अलर्ट 

अगर आपका बच्चा हर वक्त मोबाइल या गेम के बारे में ही सोचता रहता है, गेम रोकने पर गुस्सा या चिड़चिड़ापन दिखाता है, परिवार और दोस्तों से दूरी बनाने लगे,  नींद और दिनचर्या बिगड़ जाए, पढ़ाई में रुचि खत्म हो जाए, बार-बार उदासी, डर  या खालीपन महसूस करें तो ये ऑनलाइन गेमिंग एडिक्शन के संकेत हो सकते हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर ऐसे 4 से 5 संकेत लगातार दिखें तो पेरेंट्स को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए. 

पेरेंट्स क्या करें?

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बच्चों को मोबाइल देना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन निगरानी बहुत जरूरी है. पेरेंट्स को बच्चों से खुलकर बात करनी चाहिए. उनके स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए  और  स्मार्टफोन में पेरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल करना चाहिए. पेरेंटल कंट्रोल की मदद से बच्चों के गेम्स, ऐप्स और ऑनलाइन कंटेंट को सीमित किया जा सकता है. इससे वे खतरनाक गेम्स और चैलेंज से दूर रह सकते हैं. 

ये भी पढ़ें-Arrhythmia: क्या धड़कते-धड़कते अचानक रुक आता है आपका भी दिल, जानें किस बीमारी में होता है ऐसा?

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गेमिंग की वजह से कौन-सा हार्मोन हो जाता है एक्टिव, इससे बॉडी में कितने होते हैं बदलाव?

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