पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कम क्यों होते हैं हार्ट अटैक के मामले, क्या है कारण?

पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कम क्यों होते हैं हार्ट अटैक के मामले, क्या है कारण?


Why Women Have Lower Risk Of Heart Attacks Than Men: हार्ट अटैक आज के समय की सबसे खतरनाक और आम बीमारियों में से एक बन चुका है. यह तब होता है जब दिल तक जाने वाला ब्लड का फ्लो रुक जाता है. आमतौर पर यह ब्लॉकेज कोरोनरी आर्टरीज में होता है, जहां कोलेस्ट्रॉल, फैट और अन्य पदार्थ जमा हो जाते हैं. इसी स्थिति को कोरोनरी आर्टरी डिजीज कहा जाता है, जो हार्ट अटैक के बढ़ते मामलों की सबसे बड़ी वजह है.

क्या होता है कारण?

हार्ट अटैक के पीछे कई जोखिम कारक होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. हाई कोलेस्ट्रॉल, बढ़ती उम्र, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, जेनेटिक कारण, तंबाकू और शराब का सेवन, ज्यादा तनाव और हार्ट से जुड़ी पुरानी समस्याएं ये सभी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ाते हैं. 

महिलाओं में कम क्यों होता है ज्यादा खतरा?

Dr. KM Cherian Institute Of Medical Sciences की रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं में हार्ट अटैक के मामलों में अंतर देखा जाता है. दोनों के लिए यह बीमारी खतरनाक है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों में इसका खतरा ज्यादा होता है. पुरुषों में पहली बार हार्ट अटैक का औसत उम्र करीब 65 साल होती है, जबकि महिलाओं में यह लगभग 72 साल के आसपास देखा जाता है. यानी महिलाओं में यह खतरा पुरुषों के मुकाबले करीब 10 साल देर से बढ़ता है.

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अंतर के पीछे क्या है वजह?

इसके पीछे कई संभावित कारण माने जाते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि महिलाओं में मेनोपॉज से पहले हार्ट अटैक का खतरा कम होता है, जिसका एक कारण एस्ट्रोजन हार्मोन हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन माना जाता है कि यह हार्मोन दिल की सेहत को कुछ हद तक सुरक्षित रखता है. दूसरी ओर, पुरुषों में तंबाकू और शराब का सेवन ज्यादा होता है, जो दिल की बीमारियों का बड़ा कारण है. इसके अलावा, तनाव को संभालने के मामले में भी पुरुषों की क्षमता महिलाओं की तुलना में कम मानी जाती है. लगातार तनाव और मानसिक दबाव दिल पर बुरा असर डालते हैं, जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

यह समझना जरूरी है कि हार्ट अटैक पूरी तरह रोका जा सकता है, अगर समय रहते सावधानी बरती जाए. नियमित हेल्थ चेकअप कराना, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है. लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे बदलाव भी बड़ा फर्क ला सकते हैं.  हेल्दी डाइट लेना, जिसमें फल और सब्जियां ज्यादा हों और फैट, नमक व शुगर कम हो, दिल के लिए फायदेमंद होता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पेशाब में आ रहा है खून तो हो सकता है कैंसर, तुरंत करा लें ये टेस्ट

पेशाब में आ रहा है खून तो हो सकता है कैंसर, तुरंत करा लें ये टेस्ट


What Causes Blood In Urine And Is It Cancer: अगर पेशाब में खून दिखाई दे, तो यह किसी को भी घबरा सकता है. कई बार लोग इसे छोटी-मोटी समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, खासकर जब यह अपने आप ठीक हो जाए. लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसा करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि पेशाब में खून आना किसी गंभीर बीमारी, यहां तक कि कैंसर का संकेत भी हो सकता है. इसलिए इसे हल्के में लेने के बजाय तुरंत जांच कराना जरूरी है.

क्यों आता है यूरिन में खून

मेडिकल भाषा में इसे हेमैच्यूरिया कहा जाता है, जब किडनी, यूरिनरी ट्रैक्ट या ब्लैडर से रेड ब्लड सेल्स  पेशाब में आ जाती हैं. यह दो तरह का होता है, एक जिसमें खून साफ दिखाई देता है और दूसरा जो सिर्फ टेस्ट के जरिए पता चलता है. सबसे बड़ी चिंता तब होती है जब बिना किसी दर्द के पेशाब में खून दिखे. अक्सर इसे लोग यूरिन इन्फेक्शन समझकर दवा ले लेते हैं, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि अगर यह सिर्फ खून है और दर्द या जलन जैसे लक्षण नहीं हैं, तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है.

नॉर्मल बीमारियां भी हो सकती हैं

हालांकि, हर बार यह कैंसर ही हो ऐसा जरूरी नहीं है. इसके पीछे कई सामान्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे किडनी स्टोन, यूरिन इन्फेक्शन, प्रोस्टेट का बढ़ना या किडनी से जुड़ी समस्याएं. लेकिन अगर खून बार-बार दिखे या बिना दर्द के आए, तो इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है.

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कब होता है कैंसर की शुरुआत

कैंसर के बारे में जानकारी देने वाली संस्था Cancercenter के अनुसार, पेशाब में खून आना ब्लैडर कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है. कई मामलों में यह सबसे पहला लक्षण होता है, जिसमें यूरिन का रंग गुलाबी, नारंगी या गहरा लाल हो सकता है. किडनी कैंसर में भी ऐसा हो सकता है, इसके साथ ही पीठ के एक तरफ दर्द, वजन कम होना और कमजोरी जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं. प्रोस्टेट कैंसर के एडवांस स्टेज में भी यूरिन में खून आ सकता है. खासकर जो लोग स्मोकिंग करते हैं, उनमें यह खतरा और ज्यादा होता है, इसलिए उन्हें ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है. 

टेस्ट कराने की जरूरत

ऐसे में सबसे जरूरी है सही समय पर जांच कराना. डॉक्टर आमतौर पर यूरिन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड, CT स्कैन या सिस्टोस्कोपी जैसी जांच की सलाह देते हैं, ताकि असली कारण का पता चल सके. एक्सपर्ट का साफ कहना है कि अगर बिना दर्द के पेशाब में खून दिखे, तो तुरंत यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए. इसे नजरअंदाज करना आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकता है. सही समय पर जांच और इलाज से गंभीर बीमारियों को शुरुआती दौर में ही पकड़ा जा सकता है और इलाज आसान हो जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आपके नर्वस सिस्टम के लिए क्यों खतरनाक हैं आने वाली गर्मियां, जानें किन बीमारियों का खतरा?

आपके नर्वस सिस्टम के लिए क्यों खतरनाक हैं आने वाली गर्मियां, जानें किन बीमारियों का खतरा?


How Extreme Heat Affects The Nervous System: भारतीय गर्मियों में बाहर निकलते ही फर्क साफ महसूस होने लगता है. यह सिर्फ गर्मी नहीं होती, बल्कि एक तरह का भारीपन होता है, जो शरीर के साथ-साथ दिमाग पर भी असर डालता है. धीरे-धीरे थकान बढ़ती है, ध्यान भटकने लगता है और कई बार स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर हो जाती है. हम अक्सर डिहाइड्रेशन, सनबर्न या थकावट की बात करते हैं, लेकिन असल में गर्मी का सीधा असर दिमाग पर भी पड़ता है. तेज गर्मी में सिरदर्द, चक्कर आना, कन्फ्यूजन और ध्यान लगाने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखने लगते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

TOI Health से बातचीत में चेन्नई के कावेरी हॉस्पिटल की सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. शुभा सुब्रमणियन बताती हैं कि गर्मियों में ज्यादा गर्मी और उमस के कारण शरीर में पानी और सोडियम की कमी हो जाती है, जिससे दौरे तक पड़ सकते हैं. ज्यादा पसीना आने से सोडियम लेवल गिर जाता है और यह स्थिति और खतरनाक हो जाती है. कई मामलों में हीट स्ट्रोक भी हो सकता है, जिससे बेहोशी और सीजर का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में खासकर जिन लोगों को पहले से दौरे की समस्या है, उन्हें खुद को हाइड्रेट रखना चाहिए और हल्के, ढीले व हल्के रंग के कपड़े पहनने चाहिए.

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किन लोगों को होता है असर?

बच्चे, बुजुर्ग और जिन लोगों को पहले से न्यूरोलॉजिकल समस्याएं हैं, वे ज्यादा जोखिम में रहते हैं. इसके अलावा, जो लोग लंबे समय तक बाहर काम करते हैं, जैसे डिलीवरी वर्कर्स, ट्रैफिक पुलिस या रेहड़ी-पटरी वाले, उनके लिए यह समस्या रोज की बन जाती है. वहीं, घर के अंदर भी हमेशा सुरक्षित माहौल नहीं होता. खराब वेंटिलेशन, बिजली कटौती या कूलिंग की कमी से स्थिति और बिगड़ सकती है, जिससे दिमाग का संतुलन प्रभावित होता है.

किन बीमारियों का बढ़ता है खतरा?

डॉ. शुभा सुब्रमणियन के मुताबिक, गर्मी का असर कई ऐसी बीमारियों पर भी पड़ता है, जिनके बारे में हम ज्यादा बात नहीं करते. जैसे बच्चों में ड्रावेट सिंड्रोम जैसी एपिलेप्सी की स्थिति गर्मी में और खराब हो सकती है. इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी से याददाश्त कमजोर होना, ब्रेन फॉग और सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसे रोगों में लक्षण बढ़ सकते हैं, जबकि डिहाइड्रेशन के कारण स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है.

पार्किंसन और अल्जाइमर के मरीजों के लिए भी गर्मी खतरनाक हो सकती है, क्योंकि उनके शरीर की तापमान कंट्रोल करने की क्षमता कमजोर होती है. वहीं, माइग्रेन से पीड़ित लोगों में धूप में निकलना सिरदर्द को ट्रिगर कर सकता है. गर्मी थकान को भी बढ़ाती है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी और मुश्किल हो जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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एसी में ज्यादा देर रहने से क्यों भारी हो जाता है सिर, जान लीजिए कारण?

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आज के आधुनिक युग में गर्मी से राहत पाने के लिए एयर कंडीशनर (एसी) का उपयोग आम बात हो गई है. घर-ऑफिस और मॉल से लेकर गाड़ियों तक एसी का इस्तेमाल किया जाता है. अगर आप भी गर्मी से बचने के लिए अपना ज्यादातर समय एसी में गुजार रहे हैं तो आपको सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि इसके कई साइड इफेक्ट्स हैं. यह आपको बीमार कर सकती है. हेल्थ वेबसाइट्स के मुताबिक, अगर आप अपना ज्यादा वक्त AC में बिता रहे हैं तो सिक बिल्डिंग सिंड्रोम बढ़ने का खतरा रहता है.

AC बना सकता है बीमार

एसी की ठंडी हवा राहत देने का काम करती है, लेकिन कई बार ये परेशानी का कारण बन जाती है, जिसकी वजह से सिरदर्द, गला बैठना, सर्दी-खांसी और त्वचा का सूखना जैसे लक्षण एयर कंडीशनर में बैठने के बाद अक्सर देखने को मिलते हैं. लगातार शुष्क ठंडी हवा में रहने से सांस लेने में तकलीफ, साइनस में परेशानी और मस्तिष्क में ऑक्सीजन के प्रवाह में बदलाव के कारण भारीपन महसूस होता है. एसी (AC) में ज्यादा देर रहने से सिर भारी होने या दर्द होना एक आम बात है. आइए जानते हैं ऐसा क्यों होता है? 

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एसी में रहने से सिर भारी होने के मुख्य कारण

  • डिहाइड्रेशन: एसी कमरे की नमी सोख लेता है, जिससे हवा बहुत शुष्क हो जाती है. यह शुष्क हवा शरीर से नमी को खींच लेती है, जिससे पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन हो जाता है और सिरदर्द होता है.
  • खून की नलियों का सिकुड़ना: खून की नलियों का सिकुड़ना, जिसको Vasoconstriction भी बोला जाता है. शरीर बहुत ठंडी हवा के संपर्क में आने पर खुद को गर्म रखने के लिए Blood vessels को सिकोड़ने लगता है, जिससे सिर और मस्तिष्क में तनाव बढ़ता है और सिर दर्द जैसी परेशानी होती है. 
  • साइनस की समस्या: ठंडी और सूखी हवा नाक और गले के म्यूकस मेंब्रेन को सुखा देती है, जिससे साइनस में सूजन या भारीपन हो सकता है. इस कारण से भी सिर दर्द जैसी परेशानी होती है. 
  • ऑक्सीजन का स्तर और ताजगी में कमी: इसके कारण कम तापमान और बंद कमरे में रहने से मांसपेशियों में अकड़न और थकान हो जाती है, जिससे सिर भारी महसूस होने लगता है. 

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इससे बचाव के उपाय

एसी का तापमान बहुत कम न रखें. इसका तापमान 24-26°C के आसपास रखें. साथ ही, एसी में रहने के दौरान भी समय-समय पर पानी पीते रहना बहुत जरूरी है. इसके अलावा लगातार कई घंटों तक एसी में न बैठें. बीच-बीच में बाहर निकलते रहें और एसी का एयर फिल्टर नियमित रूप से साफ करते रहना भी जरूरी है.

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पीरियड शुरू होने के कितने दिन बाद प्रेग्नेंसी के सबसे ज्यादा चांस, न्यू कपल्स के लिए जरूरी बात

पीरियड शुरू होने के कितने दिन बाद प्रेग्नेंसी के सबसे ज्यादा चांस, न्यू कपल्स के लिए जरूरी बात


How Many Days After Period Can You Get Pregnant: अगर आप प्रेग्नेंसी प्लान कर रहे हैं, तो सबसे पहले अपने मेंस्ट्रुअल साइकिल को समझना बहुत जरूरी है. आमतौर पर एक महिला का साइकिल करीब 28 दिनों का होता है, लेकिन यह 21 से 35 दिनों के बीच भी हो सकता है. हर साइकिल चार मुख्य चरणों में बंटा होता है और इन्हीं के आधार पर यह तय होता है कि प्रेग्नेंसी के चांसेस कब सबसे ज्यादा होते हैं. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

पीरियड्स को समझना सबसे जरूरी

cloudninecare की रिपोर्ट के अनुसार, साइकिल की शुरुआत पीरियड्स से होती है, जो लगभग 4 से 5 दिन तक चलते हैं. इस दौरान शरीर में हार्मोन का स्तर कम रहता है.  इसके बाद फॉलिक्युलर फेज आता है, जिसमें शरीर अगली ओव्यूलेशन के लिए तैयार होने लगता है. इस समय ओवरी में एग्स विकसित होते हैं और एस्ट्रोजन बढ़ने लगता है, जिससे गर्भाशय की परत मोटी होने लगती है. साइकिल का सबसे अहम समय ओव्यूलेशन होता है, जो आमतौर पर 28 दिन के साइकिल में 14वें दिन के आसपास होता है.

 इसी दौरान ओवरी से एक मैच्योर एग रिलीज होता है, जो लगभग 12 से 24 घंटे तक ही जीवित रहता है. इसके बाद ल्यूटल फेज आता है, जिसमें प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बढ़ता है और शरीर प्रेग्नेंसी के लिए तैयार होता है. अगर इस समय फर्टिलाइजेशन नहीं होता, तो हार्मोन गिरने लगते हैं और फिर से पीरियड्स शुरू हो जाते हैं.

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सबसे ज्यादा चांस कब?

अब बात आती है फर्टाइल डेज की, यानी वो दिन जब प्रेग्नेंसी के चांसेस सबसे ज्यादा होते हैं. ओव्यूलेशन इस पूरे प्रोसेस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन सिर्फ उसी दिन ही नहीं, उससे पहले के कुछ दिन भी उतने ही अहम होते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि स्पर्म महिला के शरीर में 5 दिनों तक जीवित रह सकता है. इसलिए ओव्यूलेशन से करीब 5 से 6 दिन पहले से लेकर ओव्यूलेशन के दिन तक का समय फर्टाइल विंडो माना जाता है. अगर आपका साइकिल 28 दिन का है, तो आमतौर पर 9वें दिन से 14वें दिन के बीच प्रेग्नेंसी के चांसेस सबसे ज्यादा होते हैं. हालांकि, हर महिला का साइकिल अलग होता है, इसलिए अपने शरीर के पैटर्न को समझना जरूरी है.

शरीर भी देता है संकेत

सिर्फ कैलेंडर देखना ही काफी नहीं होता, शरीर खुद भी संकेत देता है कि ओव्यूलेशन का समय नजदीक है. इस दौरान सर्वाइकल म्यूकस में बदलाव आता है, जो ज्यादा चिकना, पारदर्शी और खिंचाव वाला हो जाता है, बिल्कुल अंडे की सफेदी जैसा. कुछ महिलाओं को निचले पेट में हल्का दर्द भी महसूस होता है, जिसे मिडलशमर्ज कहा जाता है. व्यूलेशन के बाद बेसल बॉडी टेम्परेचर में हल्की बढ़ोतरी भी देखी जा सकती है.  इसके अलावा इस समय सेक्स ड्राइव भी बढ़ सकती है, जो शरीर का एक प्राकृतिक संकेत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की हार्ट हेल्थ के लिए कितनी खतरनाक? चौंका देगी यह स्टडी

ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की हार्ट हेल्थ के लिए कितनी खतरनाक? चौंका देगी यह स्टडी


आज के डिजिटल दौर में बच्चों की लाइफस्टाइल तेजी से बदल रही है. डिजिटल दौर में बच्चे होमवर्क से ब्रेक के दौरान, सोने से पहले, ऑनलाइन क्लास, गेमिंग और स्ट्रीमिंग के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. जिससे बच्चों का स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अब एक नई स्टडी में चेतावनी दी है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम सिर्फ आंखों या दिमाग पर ही नहीं बल्कि दिल की सेहत पर भी असर डाल सकता है. स्टडी के अनुसार खाली समय में स्क्रीन पर बिताया गया हर एक्स्ट्रा घंटा चाहे वह सोशल मीडिया स्क्रोल करना हो,  वेब सीरीज देखना हो या गेम खेलना हो बच्चों में हार्ट से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ा रहा है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों में हार्ट हेल्थ का खतरा कैसे बढ़ा रहा है और स्टडी में क्या सामने आया है?

क्या कहती है स्टडी? 

जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में पब्लिश रिसर्च के अनुसार बच्चों और किशोर में हर एक्स्ट्रा घंटे का स्क्रीन टाइम उनके कार्डियो मेटाबोलिक खतरे यानी दिल और मेटाबॉलिज्म से जुड़े खतरे को बढ़ा सकता है. इस रिसर्च में 1000 से ज्यादा बच्चों और युवाओं को शामिल किया गया था. वहीं रिसर्च में पाया गया है कि 6 से 10 साल के बच्चों में हर एक्स्ट्रा घंटे स्क्रीन टाइम से खतरा बढ़ता है. वहीं किशोर में यह असर और ज्यादा देखा गया है. इसके अलावा ज्यादा स्क्रीन टाइम का सीधा  संबंध नींद की कमी से भी जुड़ा पाया गया है. 

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नींद से जुड़ा बड़ा कनेक्शन 

स्टडी में यह भी सामने आया है कि कम नींद लेने वाले बच्चों में यह खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित होती है, जिससे शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर पड़ता है. रिसर्च के अनुसार स्क्रीन टाइम और हार्ड डिस्क के बीच 12 प्रतिशत संबंध नींद की कमी के जरिए बनता है. यानी अगर बच्चों की नींद बेहतर होती है तो कुछ हद तक खतरा कम किया जा सकता है. वहीं एक्सपर्ट्स के अनुसार लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना, बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी को कम कर देता है. इससे वजन बढ़ने का खतरा, ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल प्रभावित हो सकते हैं और शरीर में फैट और कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है. यह सभी फैक्टर आगे चलकर दिल की बीमारियों का कारण बन सकते हैं. 

भारत में क्यों बढ़ रही चिंता?

भारत में भी बच्चों में स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ा है, खासकर ऑनलाइन पढ़ाई और स्मार्टफोन के इस्तेमाल के बाद में यह टाइम ज्यादा हो गया है. ऐसे में यह स्टडी भारतीय परिवारों के लिए भी बहुत जरूरी मानी जा रही है. क्योंकि यहां भी बच्चों की नींद और एक्टिविटी पर असर देखा गया है. हालांकि इसे लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों की लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव करके इस खतरे को कम किया जा सकता है. जैसे रोजाना स्क्रीन टाइम सीमित रखना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना, बच्चों को खेलकूद और फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करना और घर में कुछ समय और जगह को नो स्क्रीन बनाना बनाने जैसी चीजों से पेरेंट्स बदलाव कर सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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