खतरनाक अजगर कम करेगा आपका वजन? वैज्ञानिकों ने खून में खोजा ‘जादुई तत्व’, जो मिटा देगा आपकी भूख!

खतरनाक अजगर कम करेगा आपका वजन? वैज्ञानिकों ने खून में खोजा ‘जादुई तत्व’, जो मिटा देगा आपकी भूख!


Can Python Blood Help In Weight Loss: मोटापे को कम करने के लिए अब एक नया और दिलचस्प रास्ता सामने आया है. साइंटिस्ट ने बर्मीज अजगर के खून में एक ऐसे खास तत्व की पहचान की है, जो भविष्य में वजन घटाने की दवाओं के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है. इस खोज ने मोटापे से जूझ रही दुनिया के लिए नई उम्मीद जगाई है, क्योंकि यह भूख को कंट्रोल करने का एक अलग तरीका दिखाती है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे अजगर आपका वजन कम करने वाला है. 

अजगर को क्यों चुना गया?

नेचर मेटाबॉलिज्म में पब्लिश स्टडी में बताया गया कि अजगर अपने खाने के अनोखे तरीके के लिए जाने जाते हैं. ये अपने शरीर के बराबर बड़े शिकार को खा सकते हैं और फिर महीनों तक बिना खाए रह सकते हैं. साइंटिस्ट ने पाया कि जब अजगर खाना खाते हैं, तो उनके खून में कुछ खास तत्व अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं, जो उनके मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने में मदद करते हैं. इस स्टडी को स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक जोनाथन लॉन्ग की टीम ने किया. उन्होंने छोटे अजगरों के खून के सैंपल खाने से पहले और बाद में जांचे. इसमें 200 से ज्यादा ऐसे तत्व मिले, जिनका स्तर खाने के बाद काफी बढ़ गया. इनमें से एक खास तत्व pTOS था, जो 1000 गुना से भी ज्यादा बढ़ गया. 

क्या होता है यह?

यह खास तत्व आंत में मौजूद बैक्टीरिया द्वारा बनता है और दिलचस्प बात यह है कि यह इंसानों में भी बहुत कम मात्रा में पाया जाता है. इसके असर को समझने के लिए साइंटिस्ट ने मोटापे से ग्रसित चूहों पर इसका टेस्ट किया. रिसर्च के नतीजे काफी चौंकाने वाले थे. जिन चूहों को pTOS दिया गया, उन्होंने कम खाना शुरू कर दिया और करीब 28 दिनों में उनका वजन लगभग 9 प्रतिशत तक कम हो गया. यानी यह तत्व सीधे तौर पर भूख को कम करने में मदद करता है.

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अब तक की दवाओं से कितना अलग?

अब तक जो वजन घटाने की दवाएं इस्तेमाल होती हैं, जैसे Wegovy, वे पेट के खाली होने की प्रक्रिया को धीमा करके काम करती हैं और कई बार इससे मतली जैसे साइड इफेक्ट भी होते हैं. लेकिन pTOS का तरीका अलग है. यह सीधे दिमाग के उस हिस्से पर असर डालता है, जिसे हाइपोथैलेमस कहा जाता है और जो भूख को कंट्रोल करता है. स्टडी से जुड़े वैज्ञानिक लेस्ली लेनवैंड का कहना है कि यह खोज भूख को नियंत्रित करने का एक नया और बेहतर तरीका दिखाती है, जिसमें मौजूदा दवाओं की तरह साइड इफेक्ट्स कम हो सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कैसे हैं Cicada कोविड स्ट्रेन के लक्षण, जिसकी वजह से तेजी से बढ़ रहे कोरोना के केस?

कैसे हैं Cicada कोविड स्ट्रेन के लक्षण, जिसकी वजह से तेजी से बढ़ रहे कोरोना के केस?


Vaccine Effectiveness Against New Variant: अमेरिका में एक नया कोविड-19 वेरिएंट तेजी से चर्चा में आ गया है, जिसे ‘सिकाडा’ नाम दिया गया है. साइंटफिक भाषा में इसे BA.3.2 स्ट्रेन कहा जा रहा है, जो ओमिक्रॉन का ही एक सब-वेरिएंट है. हेल्थ एजेंसियों के मुताबिक, यह वेरिएंट अब अमेरिका के कई राज्यों में फैल चुका है और दुनियाभर के कई देशों में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कितना खतरनाक है और इसका प्रभाव कहां तक है. 

कहां मिले इसके लक्षण?

सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, इस वेरिएंट के संकेत वेस्टवॉटर सैंपल्स में भी मिले हैं, जिससे इसके फैलाव का अंदाजा लगाया जा रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, कैलिफोर्निया, फ्लोरिडा, न्यूयॉर्क और इलिनॉय जैसे राज्यों में इसके लक्षण मिले हैं. पहली बार यह केस जून 2025 में सामने आया था, जब नीदरलैंड्स से आए एक यात्री में यह इंफेक्शन पाया गया. इस नए स्ट्रेन को सिकाडा नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि यह लंबे समय तक अंडरग्राउंड रहने के बाद अचानक सामने आया, ठीक वैसे ही जैसे सिकाडा नाम के कीड़े सालों बाद जमीन से बाहर आते हैं. साइंटिस्ट का कहना है कि यह वेरिएंट काफी ज्यादा म्यूटेटेड है और इसमें 70 से 75 तक म्यूटेशन पाए गए हैं, जो इसे बाकी वेरिएंट्स से अलग बनाते हैं.

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इसके लक्षण और प्रभाव

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसके लक्षण क्या हैं और क्या यह ज्यादा खतरनाक है. फिलहाल एक्सपर्ट का कहना है कि इसके लक्षण बाकी कोविड वेरिएंट्स जैसे ही हैं. इसमें खांसी, बुखार या ठंड लगना, गले में खराश, नाक बंद होना, सांस लेने में दिक्कत, स्वाद और गंध का चले जाना, थकान, सिरदर्द और पेट से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं. Andrew Pekosz, जो जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ का कहना है कि इस वेरिएंट में इतनी ज्यादा म्यूटेशन हैं कि यह इम्यून सिस्टम के लिए अलग तरह से दिखाई दे सकता है.  वहीं, एपिडेमियोलॉजिस्ट Syra Madad के मुताबिक, अभी तक ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है कि यह वेरिएंट ज्यादा गंभीर बीमारी पैदा कर रहा है.

एंटीबॉडी से बच निकलने की क्षमता

हालांकि, शुरुआती स्टडीज में यह सामने आया है कि यह स्ट्रेन एंटीबॉडी से बच निकलने की क्षमता रखता है, जिससे यह सवाल उठता है कि वैक्सीन इसकी कितनी प्रभावी सुरक्षा दे पाएगी. इस पर अभी रिसर्च जारी है और वैज्ञानिक लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं। फिलहाल, स्वास्थ्य एजेंसियां लोगों को सतर्क रहने की सलाह दे रही हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि लक्षण भले ही सामान्य हों, लेकिन इंफेक्शन के फैलाव को देखते हुए सावधानी बरतना जरूरी है, ताकि किसी भी संभावित खतरे से समय रहते निपटा जा सके.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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देश में हेपेटाइटिस के साथ जी रहे करोड़ों, बिन लक्षण कैसे छलनी कर रहा लिवर?

देश में हेपेटाइटिस के साथ जी रहे करोड़ों, बिन लक्षण कैसे छलनी कर रहा लिवर?


How Common Is Hepatitis In India: भारत में लाखों लोग हेपेटाइटिस बी या सी के साथ जी रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका अंदाजा तक नहीं है. वे रोज काम पर जाते हैं, सामान्य जीवन जीते हैं, फिर भी एक वायरस चुपचाप उनके लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है. जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक अक्सर स्थिति गंभीर हो चुकी होती है, जैसे लिवर सिरोसिस, लिवर फेल्योर या यहां तक कि लिवर कैंसर तक का खतरा बढ़ जाता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

मेदांता अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के डॉ. सौरदीप चौधरी ने TOI को बताया कि, भारत में हेपेटाइटिस वायरस का बोझ काफी ज्यादा है. अनुमान है कि देश की लगभग 3-4 प्रतिशत आबादी हेपेटाइटिस बी से संक्रमित है, जबकि 0.5- 1 प्रतिशत लोगों में हेपेटाइटिस सी पाया जाता है. यानी करीब एक करोड़ से अधिक लोग क्रॉनिक इंफेक्शन के साथ जी रहे हैं. समस्या यह है कि दोनों वायरस वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकते हैं, इसलिए अधिकांश लोग तब तक जांच नहीं कराते जब तक लिवर को गंभीर नुकसान न हो जाए.

बड़ी संख्या में आते हैं मरीज

भारत में हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई, इन पांचों प्रकार के वायरस बड़ी संख्या में मामले दर्ज करते हैं. हेपेटाइटिस ए आमतौर पर खराब स्वच्छता वाले इलाकों में 10- 30 प्रतिशत तीव्र मामलों के लिए जिम्मेदार है, जबकि हेपेटाइटिस ई 10-40 प्रतिशत तीव्र हेपेटाइटिस और 15-45 प्रतिशत तीव्र लिवर फेल्योर से जुड़ा पाया गया है, खासकर गर्भवती महिलाओं में.  जागरूकता की कमी भी बड़ी समस्या है। कई लोग मानते हैं कि लिवर की बीमारी सिर्फ शराब पीने वालों को होती है, जबकि यह पूरी तरह सही नहीं है.  कुछ लोगों को यह भी भ्रम है कि हेपेटाइटिस सामान्य संपर्क से साथ खाना खाने, गले मिलने या खांसने से फैलता है, जो कि गलत धारणा है.

कैसे फैल सकता है?

हेपेटाइटिस बी और सी का संक्रमण अक्सर असुरक्षित इंजेक्शन, बिना जांचे गए रक्त चढ़ाने, असुरक्षित सर्जरी या डेंटल प्रक्रिया, इंफेक्टेड सुई से टैटू या पियर्सिंग और प्रसव के दौरान मां से बच्चे में फैल सकता है. अगर हेपेटाइटिस बी या सी का इलाज न कराया जाए तो यह धीरे-धीरे लिवर में फाइब्रोसिस और सिरोसिस का कारण बन सकता है, जो आगे चलकर लिवर कैंसर में बदल सकता है. अच्छी बात यह है कि हेपेटाइटिस सी का इलाज अब संभव है और 8 से 12 हफ्तों की दवा से इसे ठीक किया जा सकता है. हालांकि, हेपेटाइटिस बी के अधिकांश मामलों में लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ती है. 

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सावधान! 30 की उम्र पार करते ही ‘बूढ़ा’ होने लगा आपका दिल, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलतियां?

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How To Keep Your Heart Healthy After 30: 30 की उम्र पार करना अक्सर एक सामान्य पड़ाव लगता है, लेकिन इसी समय शरीर के अंदर, खासकर दिल में, कई छोटे बदलाव शुरू हो जाते हैं. ये बदलाव तुरंत महसूस नहीं होते, लेकिन आगे चलकर दिल की सेहत पर गहरा असर डाल सकते हैं. अगर इन्हें समय रहते समझ लिया जाए, तो भविष्य में हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिपिन कुमार दुबे ने TOI को बताया कि 30 के बाद जिंदगी की रफ्तार तेज हो जाती है, काम का दबाव बढ़ता है, जिम्मेदारियां बढ़ती हैं और लाइफस्टाइल बदलने लगती है. ऐसे में शरीर के अंदर धीरे-धीरे बदलाव शुरू होते हैं, जिनका असर दिल पर भी पड़ता है, भले ही बाहर से सब सामान्य लगे. डॉक्टर अक्सर “हार्ट एज” का जिक्र करते हैं, जो बताता है कि आपका दिल आपकी असली उम्र से कितना ज्यादा बूढ़ा हो चुका है. कई लोगों में यह उम्र 5-8 साल तक ज्यादा हो सकती है, खासकर अगर ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा या स्मोकिंग जैसे रिस्क फैक्टर मौजूद हों. इसका मतलब है कि दिल सिर्फ उम्र से नहीं, बल्कि आपकी लाइफस्टाइल से भी तेजी से प्रभावित होता है.

30 के बाद क्या होने लगती है दिक्कत?

30 के बाद मेटाबॉलिज्म धीरे-धीरे कम होने लगता है और खराब आदतों का असर ज्यादा दिखने लगता है. नींद की कमी, तनाव, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और अनहेल्दी खानपान ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और वजन को प्रभावित करने लगते हैं. ये सभी फैक्टर मिलकर दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं. इस उम्र के बाद दिल में कुछ स्ट्रक्चरल बदलाव भी होने लगते हैं. दिल की मांसपेशियां थोड़ी सख्त हो सकती हैं, जिससे उसकी काम करने की क्षमता कम होती है. इसके साथ ही शरीर में हल्की-फुल्की सूजन  बढ़ने लगती है, जो धीरे-धीरे आर्टरीज में बदलाव ला सकती है. यही बदलाव आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर और ब्लॉकेज जैसी समस्याओं की वजह बन सकते हैं.

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क्या होते हैं इसके लक्षण?

सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये बदलाव अक्सर बिना किसी लक्षण के होते हैं. हाई ब्लड प्रेशर, खराब कोलेस्ट्रॉल या प्री-डायबिटीज जैसी स्थितियां लंबे समय तक चुपचाप शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती हैं और जब तक पता चलता है, तब तक समस्या गंभीर हो चुकी होती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि 30 की उम्र दिल को स्वस्थ रखने के लिए सबसे सही समय भी होती है. रोजाना कम से कम 30 मिनट की वॉक, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव को कंट्रोस करना दिल की सेहत को बेहतर बनाए रख सकता है. इसके साथ ही कुछ जरूरी जांचों पर ध्यान देना भी जरूरी है, जैसे नियमित ब्लड प्रेशर चेक कराना, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर की जांच कराना. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पैरों में हर वक्त महसूस होती है जलन और झुनझुनी, जानें किस बीमारी का है ये संकेत

पैरों में हर वक्त महसूस होती है जलन और झुनझुनी, जानें किस बीमारी का है ये संकेत


पैरों में लगातार जलन या झुनझुनी होना एक आम समस्या लगती है, लेकिन यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी तो हो सकता है. अक्सर लोग इसे थकान या कमजोरी से होने वाली समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. हालांकि, यह शरीर के अंदर हो रही किसी गंभीर समस्या का इशारा भी हो सकता है. इसलिए जब भी आपकी ऐसी समस्या ज्यादा हो तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.

पैरों में जलन और झुनझुनी का कारण

  • इस समस्या का सबसे आम कारण Peripheral Neuropathy हो सकता है. यह एक नसों से संबंधित समस्या है, इसमें पैरों में जलन, सुन्न होना और झुनझुनाहट महसूस होती है. यह ज्यादातर शुगर (डायबिटीज) के मरीजों में होती है, क्योंकि अधिक समय तक शुगर लेवल बढ़ा रहने से नसों को नुकसान होता है और इस प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैं
  • इसके अलावा एक अन्य समस्या Sciatica हो सकती है, जो रीढ़ की हड्डी से निकलने वाली सबसे लंबी नर्व (साइटिक नर्व) पर दबाव के कारण होता है. नस दब जाती है, जिससे दर्द, जलन और झुनझुनी पैरों तक पहुंच जाती है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पोश्चर या भारी वजन उठाना इस समस्या को और अधिक बढ़ा सकता है.
  • Restless Legs Syndrome भी इस समस्या का कारण हो सकता है, ऐसे में लेटते या आराम करते वक्त पैरों में अजीब सी जलन और झुनझुनी महसूस होती है, बार-बार पैर हिलाने का मन करता है और अलग सी ही बेचैनी होने लगती है. यह समस्या ज्यादातर रात के समय होती है, जिससे सोने में भी काफी समस्या आती है
  • इस प्रकार की समस्या का एक कारण विटामिन्स की कमी भी हो सकती है, खासकर विटामिन B12 की कमी, जो नसों को नुकसान पहुंचाती है और जिसके कारण हाथों और पैरों में काफी अधिक जलन और झुनझुनी महसूस होने लगती है. यह समस्या गलत खानपान की आदत, कम पोषण वाला भोजन और जंक फूड का अधिक सेवन करने से हो सकती है, इसलिए संतुलित और पोषण वाला आहार लेना चाहिए.

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हो सकती है किडनी से जुडी बीमारी 

अगर आपको किडनी और थायरॉयड से जुड़ी समस्या है तो ऐसे में भी आपको ये लक्षण देखने को मिल सकते हैं. शरीर के टॉक्सिन्स नसों पर काफी गहरा असर डालते हैं. इस समस्या से बचाव के लिए सबसे पहले अपनी जीवनशैली में सुधार लाना जरूरी है, इसलिए नियमित व्यायाम करें, संतुलित आहार लें और जरूरत के अनुसार पानी पिएं. विटामिन और मिनरल्स से भरपूर डाइट अपनाएं. लंबे समय तक एक ही जगह बैठने से बचें और समय-समय पर स्ट्रेचिंग भी करते रहें. अगर झुनझुनी लगातार बनी रहे, दर्द असहनीय हो जाए तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें. सही समय पर जांच और इलाज से समस्या को बढ़ने से पहले ही रोका जा सकता है. कुल मिलाकर, पैरों में जलन और झुनझुनी को नजरअंदाज करना सही नहीं है, क्योंकि यह शरीर का एक चेतावनी हो सकती है.

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क्या शुगर के मरीज पी सकते हैं गन्ने का जूस, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

क्या शुगर के मरीज पी सकते हैं गन्ने का जूस, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?


आजकल की लाइफस्टाइल में डायबिटीज एक आम बीमारी बन गई है. यह बीमारी ऐसी है, जिसमें खाने-पीने को लेकर बहुत सी सावधानियां रखनी पड़ती हैं.  गर्मियां चल रही हैं और ऐसे में ठंडा-ठंडा गन्ने का जूस पर किसका दिल नहीं आता. यह न सिर्फ दिमाग और पेट को राहत देता है, बल्कि हाइड्रेट रखने का काम भी करता है. 

हालांकि, शुगर के मरीजों के मन में अक्सर यह सवाल आता है कि क्या वे इसे पी सकते हैं या नहीं? कहा जाता है कि गन्ने का जूस ज्यादा मीठा होता है और शुगर रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है, ऐसे में आइए समझते है की इस पर एक्सपर्ट्स की क्या राय है. 

एक्सपर्ट की क्या राय है?

एक्सपर्ट्स की बात मानें तो कुछ डायबिटीज पेशेंट के लिए गन्ने के रस का सेवन करना संभव हो सकता है, लेकिन उन्हें नियंत्रित मात्रा में ही इसका सेवन करना चाहिए. एक्सपर्ट कहते हैं कि शुगर के मरीजों के लिए अच्छा यह है कि वह गन्ने के रस की जगह गन्ना खा सकते हैं, क्योंकि इसमें ज्यादा फाइबर और प्रोटीन पाया जाता है, जो आपके ब्लड शुगर लेवल को बढ़ने नहीं देता. 

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गन्ने के रस में कितनी शुगर होती है

फार्माकोग्नॉसी रिव्यूज में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक, गन्ने के रस में 70-75% पानी, 13-15% सुक्रोज और 10-15% फाइबर होता है. इसके अलावा भारत में पीलिया, रक्तस्राव, पेशाब में जलन, पेशाब में जलन और टॉयलेट संबंधी बीमारी के इलाज में गन्ने का रस बेहद कारगर है. वैसे तो गन्ने का जूस प्राकृतिक होता है, लेकिन इसमें शुगर की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो शरीर में जल्दी घुलता है और ब्लड में शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकता है. आपको बता दें कि एक छोटा गिलास गन्ने के रस यानी 240 एमएल गन्ने के रस में करीब 50 ग्राम चीनी होती है यानी 10 चम्मच चीनी. 

कुछ  बातों का रखें ध्यान

चाहे डाइबीटीज पेशेंट हो या आम आदमी सबको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कभी भी खाली पेट गन्ने का जूस बिल्कुल न पिएं. ध्यान रखें कि एक बार में ज्यादा मात्रा में गन्ने का जूस ना लें, इससे शरीर में सुगर लेवल तेजी से बढ़ता है. साथ ही डाइबीटीज पेशेंट को डॉक्टर की सलाह के बिना इसे डाइट में शामिल नहीं करना चाहिए. शुगर के मरीजों के लिए गन्ने के जूस के अलावा कुछ हेल्दी ऑप्शनस भी हैं जैसे नारियल पानी, बिना चीनी के नींबू पानी, छाछ और ग्रीन टी.

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