किडनी का ‘साइलेंट किलर’, सिर्फ शुगर-बीपी नहीं, ये छिपी हुई आदतें भी कर रहीं किडनी को डैमेज

किडनी का ‘साइलेंट किलर’, सिर्फ शुगर-बीपी नहीं, ये छिपी हुई आदतें भी कर रहीं किडनी को डैमेज


How Does Obesity Affect Kidney Function: किडनी की बीमारी अब दुनिया की करीब 10  प्रतिशत आबादी को प्रभावित कर रही है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जोड़कर देखते हैं, जबकि हकीकत इससे कहीं बड़ी है. मोटापा, स्मोकिं, एनवायरमेंट कारण, बिना सलाह के दर्दनाशक दवाओं का सेवन और यहां तक कि कुछ सप्लीमेंट्स भी चुपचाप किडनी को नुकसान पहुंचा सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि इसके कारण क्या होते हैं.

क्या होते हैं कारण?

किडनी की बीमारी अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ती है. दर्द या तेज संकेत नहीं मिलते, लेकिन अंदर ही अंदर किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम होती जाती है. डॉ. मोहम्मद एस खान ने TOI को बताया कि, क्रॉनिक किडनी डिजीज केवल बिग टू यानी डायबिटीज और ब्लड प्रेशर तक सीमित नहीं है. अब लाइफस्टाइल, एनवायरमेंट और जेनेटिक कारण भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. मोटापा सिर्फ डायबिटीज का खतरा नहीं बढ़ाता, बल्कि सीधे किडनी पर दबाव डालता है. शरीर का वजन बढ़ने पर किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे समय के सा टिश्यू में स्कारिंग हो सकती है. आजकल कम उम्र के लोगों में भी मोटापे से जुड़ा किडनी स्ट्रेस देखने को मिल रहा है. रेगुलर एक्सरसाइज, संतुलित आहार और वजन कंट्रोल रखना बेहद जरूरी है.

स्मोकिंग एक बड़ा फैक्टर

धूम्रपान भी किडनी के लिए खामोश खतरा है. सिगरेट में मौजूद निकोटिन और विषैले तत्व किडनी की ब्लड़ वेस्ल को नुकसान पहुंचाते हैं. जिन लोगों को पहले से किडनी की समस्या है, उनमें स्मोकिंग बीमारी की रफ्तार और तेज कर देती है. एक और चिंता का विषय है क्रॉनिक किडनी डिजीज ऑफ अननोन एटियोलॉजी की. यह बीमारी बिना डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर के भी देखी जा रही है, खासकर ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों में इसकी दिक्कत बार-बार देखने को मिलती है. बार-बार डिहाइड्रेशन, गर्मी में काम, रसायनों का संपर्क और पानी में भारी धातुओं की मौजूदगी इसके संभावित कारण माने जा रहे हैं. ऐसे क्षेत्रों में नियमित जांच बेहद जरूरी है.

किन चीजों को रखना चाहिए ध्यान?

बिना डॉक्टर की सलाह के दर्दनाशक दवाएं, खासकर NSAIDs, लंबे समय तक लेने से किडनी को स्थायी नुकसान हो सकता है. इसी तरह नेचुरल या पारंपरिक दवाओं के नाम पर बिकने वाले कुछ उत्पादों में भारी धातुएं या असुरक्षित मात्रा में तत्व पाए गए हैं. बॉडीबिल्डिंग या वजन घटाने के लिए लिए जाने वाले सप्लीमेंट्स भी जोखिम बढ़ा सकते हैं, खासकर अगर पहले से किडनी कमजोर हो. इसके अलावा बार-बार होने वाले यूरिन इंफेक्शन, किडनी स्टोन, पारिवारिक इतिहास और ऑटोइम्यून बीमारियां भी CKD के खतरे को बढ़ाती हैं. एक्सपर्ट बताते हैं कि रेगुलर ब्लड और यूरिन टेस्ट करवाए, समय रहते पहचान ही किडनी को गंभीर नुकसान से बचाने का सबसे असरदार तरीका है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या मछली और दही एक साथ खाने से हो जाती है सफेद दाग की समस्या, कितनी सच है ये बात?

क्या मछली और दही एक साथ खाने से हो जाती है सफेद दाग की समस्या, कितनी सच है ये बात?


Can Eating Fish And Curd Together Cause Skin Problems: बचपन से हममें से कई लोगों ने यह बात सुनी है कि मछली खाने के बाद दूध या कोई भी डेयरी उत्पाद नहीं लेना चाहिए, वरना त्वचा पर सफेद दाग हो सकते हैं. घर के बड़े-बुजुर्ग अक्सर इस कॉम्बिनेशन से बचने की सलाह देते रहे हैंय लेकिन क्या सच में इसका कोई वैज्ञानिक आधार है या यह सिर्फ एक पुरानी मान्यता है?. चलिए आपको बताते हैं कि क्या है इसके पीछे की सच्चाई. 

क्या है धारणा?

लोक मान्यता के अनुसार, मछली और दही साथ लेने से त्वचा पर असमान सफेद धब्बे पड़ सकते हैं, जिन्हें विटिलिगो या ल्यूकोडर्मा कहा जाता है. एक और तर्क यह दिया जाता है कि दही की तासीर ठंडी होती है और मछली की गर्म होती है और इन्हें पचाने के लिए अलग-अलग एंजाइम की जरूरत होती है. ऐसे में शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे गैस, ब्लोटिंग या अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं. 

आयुर्वेद में भी इसको वर्जित माना गया है. मछली को तामसिक और दूध को सात्विक आहार की कैटेगरी में रखा जाता है. माना जाता है कि दोनों का एक साथ सेवन शरीर में तामस गुण बढ़ाकर असंतुलन पैदा कर सकता है. हालांकि यह दृष्टिकोण पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

साइंटफिक नजरिए से देखें तो मछली के साथ दही पीना हानिकारक है, ऐसा साबित करने वाला कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है. डॉ. सौरोजीत गुप्ता, बेबी एंड चाइल्ड स्पेशलिस्ट ने अपने वीडियो में बताया कि ऐसा नहीं है.  जहां तक सफेद दाग की बात है, विटिलिगो आमतौर पर त्वचा की रंग बनाने वाली सेल्स मेलानोसाइट्स के नष्ट होने या किसी फंगल इंफेक्शन के कारण होता है. केवल मछली और दही का साथ सेवन इस स्थिति का कारण नहीं बनता.

 

कब होती है दिक्कत?

आम तौर पर थोड़ी मात्रा में दोनों साथ खाना सुरक्षित माना जाता है, मगर कुछ लोगों को दिक्कत हो सकती है. मछली और दही दोनों ही प्रोटीन से भरपूर होते हैं और इन्हें पचाने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है. ऐसे में जिनका डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिव  है, उन्हें गैस, पेट फूलना या अपच महसूस हो सकती है. लैक्टोज इनटोलरेंस या दूध प्रोटीन से एलर्जी वाले लोगों में त्वचा पर खुजली, रैशेज या एक्जिमा जैसे लक्षण उभर सकते हैं. कुछ मामलों में मछली में मौजूद हिस्टामिन और डेयरी का लैक्टोज सेंसिटिव लोगों में मुंहासों या स्किन फ्लेयर-अप को बढ़ा सकते हैं. हालांकि, हर व्यक्ति की सहनशक्ति अलग होती है. अगर कोई एलर्जी या डाइजेशन समस्या नहीं है, तो सीमित मात्रा में यह कॉम्बिनेशन आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण

पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण


कई महिलाओं के लिए पीरियड्स का पहला दिन सबसे मुश्किल होता है. अचानक पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द शुरू हो जाता है. शरीर भारी-भारी लगता है, कमर में दर्द होता है, कभी जी मिचलाता है तो कभी दस्त भी लग सकते हैं. ऐसे में रोज के साधारण काम जैसे ऑफिस जाना, पढ़ाई करना या घर का काम भी बहुत कठिन लगने लगते हैं. लेकिन आपने शायद नोटिस किया होगा कि यह दर्द तीसरे या चौथे दिन तक धीरे-धीरे कम हो जाता है. तब तक ऐंठन सहने लायक हो जाती है और शरीर थोड़ा सामान्य महसूस करने लगता है. ऐसे में कई बार मन में सवाल आता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है क्यों पीरियड्स का पहला दिन सबसे ज्यादा दर्दनाक होता है और फिर आराम मिलने लगता है. तो आइए जानते हैं कि पीरियड्स पेन पहले दिन ज्यादा और बाद में कम होने की वजह क्या है. 

पहले दिन दर्द इतना ज्यादा क्यों होता है?

दिल्ली के सीके बिरला अस्पताल में प्रसूति एवं स्त्रीरोग विभाग की निदेशक डॉ. कीर्ति खेतान और रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में वरिष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. साक्षी गोयल के अनुसार, इसका सीधा संबंध शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव और प्रोस्टाग्लैंडिन नामक रसायन से है. पीरियड्स के पहले दिन शरीर में प्रोस्टाग्लैंडिन नामक रसायन का स्तर सबसे ज्यादा होता है. यह रसायन यूट्रस को सिकुड़ने में मदद करता है, ताकि वह अपनी परत बाहर निकाल सके. जब प्रोस्टाग्लैंडिन ज्यादा मात्रा में बनता है, तो यूट्रस तेजी और जोर से सिकुड़ता है, जितने ज्यादा और तेज ऐंठन होगी,दर्द उतना ज्यादा महसूस होगा. पहले 24 से 48 घंटों में यूट्रस की ज्यादातर परत बाहर निकल जाती है. इसके बाद प्रोस्टाग्लैंडिन का स्तर कम होने लगता है. इसलिए तीसरे-चौथे दिन तक दर्द भी कम हो जाता है. 

यूट्रस में ऑक्सीजन की कमी से बढ़ता है दर्द

जब यूट्रस बार-बार और जोर से सिकुड़ता है, तो आसपास की ब्लड वेसल्स थोड़ी देर के लिए दब जाती हैं. इससे यूट्रस की मांसपेशियों तक खून और ऑक्सीजन कम पहुंचती है. जब किसी हिस्से को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो वहां तेज और ऐंठन जैसा दर्द होता है.इसी वजह से पहले दिन का दर्द धड़कन जैसा या बहुत तीखा महसूस हो सकता है. जैसे-जैसे ऐंठन कम होते हैं, खून का प्रवाह सामान्य होने लगता है और दर्द घट जाता है. 

ज्यादा ब्लीडिंग मतलब ज्यादा ऐंठन

आमतौर पर पीरियड्स के पहले और दूसरे दिन ब्लीडिंग सबसे ज्यादा होती है. जब ज्यादा मात्रा में खून और ऊतक बाहर निकालने होते हैं, तो यूट्रस को ज्यादा ताकत लगानी पड़ती है. चौथे दिन तक ब्लीडिंग कम हो जाती है. जब निकालने के लिए ज्यादा परत नहीं बचती, तो यूट्रस को उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती, इससे आराम मिलता है.कम उम्र की लड़कियों में सर्विक्स का छिद्र थोड़ा संकरा हो सकता है. जब खून इस छोटे रास्ते से बाहर निकलता है, तो पहले एक-दो दिन दबाव ज्यादा महसूस हो सकता है. जैसे-जैसे फ्लो कम होता है, यह दबाव भी कम हो जाता है और दर्द घटने लगता है.

कब समझें कि दर्द सामान्य नहीं है?

हल्का या मध्यम दर्द आम बात है,लेकिन अगर दर्द बहुत ज्यादा हो, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डॉक्टर से सलाह लें. अगर दर्द इतना तेज हो कि उल्टी या बेहोशी होने लगे, हर साल दर्द बढ़ता जा रहा हो, बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो, दर्द निवारक दवा से भी आराम न मिले या पीरियड्स के बीच में भी दर्द होता हो. ऐसे मामलों में एंडोमेट्रियोसिस, एडिनोमायोसिस या फाइब्रॉएड जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जिनका इलाज जरूरी होता है. 

पहले दिन के दर्द से राहत कैसे पाएं?

अगर आपको पता है कि पहले दिन दर्द ज्यादा होगा, तो पहले से तैयारी करना मददगार हो सकता है. पेट के निचले हिस्से पर हीटिंग पैड रखें, डॉक्टर की बताई गई दर्द निवारक दवा समय पर लें, हल्की स्ट्रेचिंग या धीमी वॉक करें, खूब पानी पिएं और अपने पीरियड्स का कैलेंडर बनाए रखें. तनाव, नींद की कमी और खराब खानपान से दर्द और बढ़ सकता है. इसलिए बैलेंस डाइट और स्वस्थ लाइफस्टाइल अपनाना भी जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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होली पर स्किन को रखना है सुरक्षित, एक्सपर्ट्स ने बताए प्री और पोस्ट होली के जरूरी टिप्स

होली पर स्किन को रखना है सुरक्षित, एक्सपर्ट्स ने बताए प्री और पोस्ट होली के जरूरी टिप्स


अगले सप्ताह होली 3 और 4 मार्च को मनाई जाएगी. वहीं होली का त्योहार शुरू आते ही रंग, मस्ती और फोटो खिंचवाने की तैयारी शुरू हो जाती है. कई लोग होली पर बलम पिचकारी जैसे मोमेंट्स को रिक्रिएट करने के लिए एक्साइटेड रहते हैं. लेकिन अक्सर रंगों का यह उत्साह बाद में स्किन प्रॉब्लम में बदल जाता है. रैशेज, पिंपल्स, जलन, और जिद्दी दाग-धब्बे कई लोगों को होली के बाद परेशान करते हैं. डर्मेलॉजिस्ट्स का कहना है कि असली समस्या सिर्फ रंग नहीं होते, बल्कि यह भी जरूरी है कि स्किन को पहले कैसे तैयार किया गया और बाद में उसकी देखभाल कैसे की गई. अगर प्री केयर और पोस्ट केयर सही तरीके से की जाए तो स्किन को काफी हद तक नुकसान से बचाया जा सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं प्री और पोस्ट होली के 12 जरूरी टिप्स. 

होली से पहले अपनाएं ये जरूरी टिप्स 

  • होली से पहले स्किन ट्रीटमेंट न कराएं

होली से कम से कम पांच से सात दिन पहले केमिकल पीलिंग, लेजर, ट्रीटमेंट, वैक्सिंग, थ्रेडिंग या ज्यादा एक्सफोलिएशन कराने से बचें. इन प्रक्रियाओं से स्किन की सुरक्षात्मक लेयर अस्थायी रूप से कमजोर हो जाती है, जिससे यह जलन, खुजली और सूजन के बाद होने वाले हाइपरपिगमेंटेशन के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाती है.

  • लिप्स, कान और गर्दन को नजरअंदाज न करें 

ज्यादातर लोग होली के समय लिप्स, कान और गर्दन पर ध्यान नहीं देते हैं. जबकि शरीर के इन्हीं हिस्सों में जल्दी ड्राइनेस और दाग होते हैं. ऐसे में एसपीएफ वाला लिप बाम लगाएं और हल्का मॉइस्चराइजर इन हिस्सों पर भी जरूर लगाएं. वहीं होली खेलने से पहले अपने नाखून काट लें और साफ नेल पॉलिश लगा लें, क्योंकि नाखून कई दिनों तक रंग को सोख सकते हैं.

  • हर्बल रंगों पर भरोसा न करें

होली के समय कई लोग मानते हैं कि हर्बल या ऑर्गेनिक रंग पूरी तरह से सुरक्षित होते हैं. लेकिन ऑर्गेनिक या हर्बल कहे जाने वाले रंग भी कुछ लोगों में एलर्जी कर सकते हैं. ऐसे में होली से पहले हाथ की अंदरूनी तरफ थोड़ा रंग लगाकर पैच टेस्ट कर लें.

  • पहले से हैं स्किन प्रॉब्लम तो सावधान रहें

अगर आपने एक्जिमा, रोसेसिया, फंगल इन्फेक्शन या हाल में स्किन ट्रीटमेंट लिया हो तो रंगों दूरी बनाए रखें. पहले से स्किन प्रॉब्लम होने पर कोशिश करें कि आप  सूखे रंग से होली खेलें, धूप में कम समय बिताएं और तुरंत चेहरा साफ करें.

  • ऑयल लगाएं

रंग खेलने से 30 से 60 मिनट पहले चेहरे, गर्दन, हाथ-पैर पर नारियल, बादाम या तिल का तेल अच्छी तरह लगा लें. इससे स्किन पर एक लेयर बनती है और रंग अंदर तक नहीं घुसता है. 

होली के बाद अपनाएं ये जरूरी टिप्स 

  • रंगों को धीरे से हटाएं

होली खेलने के बाद पहले गुनगुने पानी में तेल  डालकर नहाएं. वहीं ज्यादा गर्म पानी से नहाने या स्किन को जोर से रगड़ने से बचें, क्योंकि इससे फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है. स्किन पर हल्के सल्फेट- फ्री क्लींजर का प्रयोग करें और उसके बाद तुरंत आराम पाने के लिए एलोवेरा जेल लगाएं.

  • स्किन को मॉइस्चराइज करें

नहाने के तुरंत बाद फ्रेगरेंस-फ्री मॉइस्चराइजर या सेरामाइड वाली क्रीम लगाएं. जरूरत हो तो रात में भी दोबारा लगाएं.

  • जलन और रेडनेस कंट्रोल करें

स्किन पर एलोवेरा जेल या  गुलाब जल लगाने से आराम मिलता है. इसके अलावा स्किन से रेडनेस कम करने के लिए मुल्तानी मिट्टी या दही-शहद का हल्का पैक भी भी आप लगा सकते हैं. 

  • ज्यादा दिक्कत हो तो डॉक्टर को दिखाएं

होली खेलने के बाद कलर की वजह से अगर स्किन पर लगातार खुजली, छाले या पानी निकलने जैसी समस्या हो तो देर न करें और डॉक्टर को चेक कराएं. 

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