प्रेग्नेंसी डायबिटीज को न करें नजरअंदाज, बच्चे की सेहत पर पड़ सकता है असर

प्रेग्नेंसी डायबिटीज को न करें नजरअंदाज, बच्चे की सेहत पर पड़ सकता है असर


प्रेग्नेंसी डायबिटीज, जिसे मेडिकल भाषा में गर्भकालीन मधुमेह कहा जाता है. अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि यह सिर्फ प्रेग्नेंसी तक सीमित समस्या है और बच्चे के जन्म के बाद खत्म हो जाती है, लेकिन हाल के शोध बताते हैं कि यह स्थिति सिर्फ मां के लिए ही नहीं बल्कि बच्चे के भविष्य के स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का कारण बन सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर प्रेग्नेंसी के दौरान मां का ब्लड शुगर स्तर लंबे समय तक ज्यादा बना रहता है, तो इसका असर बच्चे के मस्तिष्क, शरीर की ग्रोथ और भविष्य की सेहत पर पड़ सकता है, इसलिए इसे समय रहते पहचानना और सही तरीके से नियंत्रित करना बेहद जरूरी है. 
 
भारत में तेजी से बढ़ रही है प्रेग्नेंसी डायबिटीज के कारण

पिछले कुछ वर्षों में भारत में प्रेग्नेंसी डायबिटीज के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है. अब लगभग हर चार में से एक प्रेग्नेंसी में यह समस्या सामने आ रही है. इसके पीछे कई कारण माने जा रहे हैं, जैसे बढ़ता मोटापा फिजिकल एक्टिविटी की कमी, देर से कंसीव करना, परिवार में पहले से डायबिटीज का इतिहास और भारतीय लोगों में डायबिटीज के जेनेटिक. डॉक्टरों के अनुसार, कई महिलाएं प्रेग्नेंसी से पहले ही प्रीडायबिटीज या बिना पता चले टाइप-2 डायबिटीज से प्रभावित हो सकती हैं, ऐसे में प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज होने का खतरा और बढ़ जाता है. 
 
प्रेग्नेंसी डायबिटीज क्या होती है?
 
जब किसी महिला को पहले से डायबिटीज नहीं होती, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान उसका ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है, तो उसे प्रेग्नेंसी डायबिटीज कहा जाता है. यह समस्या आमतौर पर प्रेग्नेंसी के 24 से 28 सप्ताह के बीच सामने आती है. इसी समय बच्चे का मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम तेजी से विकसित हो रहा होता है, इसलिए इस दौरान ब्लड शुगर का संतुलन बहुत जरूरी होता है. प्रेग्नेंसी में हार्मोनल बदलाव के कारण शरीर में इंसुलिन का असर कम हो सकता है. अगर पैंक्रियाज पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता, तो ब्लड में शुगर की मात्रा बढ़ने लगती है और यही स्थिति प्रेग्नेंसी डायबिटीज बन जाती है, समस्या यह है कि ज्यादातर मामलों में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते. इसलिए नियमित जांच के बिना इसका पता लगाना मुश्किल हो सकता है. 

इसे भी पढ़ें- Heart Disease Risk: कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक का खतरा? सावधान! ये कारण हो सकता है असली विलेन
 
बच्चे पर कैसे पड़ता है असर

मां के ब्लड शुगर का असर सीधे बच्चे पर पड़ता है. गर्भ में मौजूद प्लेसेंटा के जरिए ग्लूकोज बच्चे तक पहुंचता है. अगर मां का ब्लड शुगर ज्यादा रहता है, तो बच्चे के शरीर में भी शुगर की मात्रा बढ़ जाती है. ऐसे में बच्चे का पैंक्रियाज अतिरिक्त इंसुलिन बनाना शुरू कर देता है. यह स्थिति बच्चे के शरीर और अंगों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती है. कुछ शोध बताते हैं कि ऐसे बच्चों में आगे चलकर ध्यान की कमी की समस्या, व्यवहार संबंधी चुनौतियां, मोटर स्किल्स में देरी, कुछ मामलों में मिर्गी जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है.  हालांकि हर बच्चे में ऐसा होना जरूरी नहीं है, लेकिन ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने से इन जोखिमों को काफी कम किया जा सकता है. 

जन्म के बाद भी हो सकती हैं समस्याएं

गर्भ में रहते हुए बच्चा ज्यादा शुगर को नियंत्रित करने के लिए ज्यादा इंसुलिन बनाता है, लेकिन जन्म के बाद जैसे ही गर्भनाल कटती है, शुगर की अतिरिक्त आपूर्ति अचानक बंद हो जाती है. इससे नवजात शिशु में ब्लड शुगर अचानक कम हो सकता है, जिसे नवजात हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है. इसके कारण बच्चे में कमजोरी, घबराहट, दूध पीने में परेशानी, गंभीर मामलों में दौरे जैसी समस्याएं हो सकती हैं, ऐसे बच्चों में बड़े होकर मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, टाइप-2 डायबिटीज का खतरा ज्यादा हो सकता है. वैज्ञानिक इसे फीटल प्रोग्रामिंग कहते हैं, जिसमें गर्भ में मौजूद वातावरण भविष्य में शरीर के मेटाबॉलिज्म और जीन के काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकता है. 

कैसे करें प्रेग्नेंसी डायबिटीज को कंट्रोल

प्रेग्नेंसी डायबिटीज को सही तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है. डॉक्टर आमतौर पर सलाह देते हैं कि फाइबर से भरपूर डाइट करें और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम लें. नियमित हल्की एक्सरसाइज जैसे रोजाना 20–30 मिनट टहलना. डॉक्टर की सलाह के अनुसार शुगर लेवल मॉनिटर करें, कुछ मामलों में इंसुलिन थेरेपी दी जाती है, जो प्रेग्नेंसी में सुरक्षित मानी जाती है.

इसे भी पढ़ें- Benefits Of Drinking Water: चाय-कॉफी से नहीं मिटेगी शरीर की प्यास, डिहाइड्रेशन से बचने के लिए अपनाएं ये आदतें

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

खाने से साथ जरूर खानी चाहिए हरी मिर्च, जानें इसके फायदे

खाने से साथ जरूर खानी चाहिए हरी मिर्च, जानें इसके फायदे


Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

दूध पीने के बाद बनती है गैस, जानें किन लोगों को नहीं पीना चाहिए?

दूध पीने के बाद बनती है गैस, जानें किन लोगों को नहीं पीना चाहिए?


Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

शरीर में किस वजह से बढ़ने लगता है यूरिक एसिड, इसमें कैसी होनी चाहिए डाइट

शरीर में किस वजह से बढ़ने लगता है यूरिक एसिड, इसमें कैसी होनी चाहिए डाइट


यूरिक एसिड हमारे शरीर में बनने वाला एक तरह का नेचुरल तत्व है. जब शरीर कुछ खाने की चीजों को पचाता है, खासकर मांस, मछली जैसी चीजें जिनमें प्यूरिन नाम का तत्व होता है, तो उससे यूरिक एसिड बनता है. आमतौर पर यह खून के जरिए किडनी तक पहुंचता है और फिर पेशाब के साथ बाहर निकल जाता है. अगर यही यूरिक एसिड अधिक मात्रा में बनने लगे तो उस समस्या को हाइपरयूरिसीमिया (Hyperuricemia) कहते हैं. यूरिक एसिड बढ़ने से हमें अर्थराइटिस (Arthritis), जोड़ों में दर्द, किडनी स्टोन या आगे चलकर हार्ट की समस्या हो सकती है.  

यूरिक एसिड बढ़ने के कारण 

यूरिक एसिड बढ़ने का मुख्य कारण शरीर में प्यूरीन (Purine) नामक प्रोटीन का अधिक टूटना और किडनी द्वारा उसे ठीक से फ़िल्टर न कर पाना माना जाता है. यह मुख्य रूप से रेड मीट, सी-फूड, शराब, कम पानी पीने, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर ,शरीर मे आयरन अधिक होना, खून में ग्लूकोज की मात्रा अधिक होना या डाइबिटीज के कारण होता है. शराब और बियर के अधिक सेवन से यूरिक एसिड तेजी से बढ़ता है और कभी कभी कुछ खास तरह की दवाएं (जैसे मूत्रवर्धक या डाययुरेटिक्स) भी इसका कारण हो सकता है.

यह भी पढ़ेंः Liver Cancer Symptoms:आंखों में दिखें ये लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना लिवर में हो जाएगा कैंसर

यूरिक एसिड बढ़ने के लक्षण

यूरिक एसिड बढ़ने से जोड़ों में अचानक तेज दर्द, पैर के अंगूठे में सूजन और लालिमा (गाउट), चलने-फिरने में अकड़न और बार-बार किडनी में पथरी होती है. इसके अलावा, जोड़ों में गांठें (टोफी), पेशाब में जलन होना और मांसपेशियों में लगातार कमजोरी महसूस होना भी इसके लक्षणों में है. थकान, कमजोरी, बुखार महसूस होना और बार-बार प्यास लगना भी यूरिक एसिड बढ़ने का कारण हो सकता है. 

कैसी होनी चाहिए डाइट

यूरिक एसिड बढ़ने पर कम प्यूरीन (purine) वाली डाइट अपनाएं. रेड मीट, ऑर्गन मीट, समुद्री भोजन, शराब, मीठे और कुछ दालों (अरहर, मसूर, उड़द) से बचें जिसमें प्यूरीन की मात्रा अधिक होती है. इसकी जगह Vitamin C युक्त फल (चेरी, नींबू, संतरा), कम फैट वाले डेयरी उत्पाद, खूब सारा पानी और फाइबर युक्त सब्जियां शामिल करें, जो यूरिक एसिड को कम करने में मदद करता है. साथ ही साबुत अनाज जैसे oats, ब्राउन राइस, जौ का सेवन करें. सीमित मात्रा में कॉफी/ग्रीन टी भी फायदेमंद हो सकता है.

यह भी पढ़ेंः Radiation Exposure Treatment: क्या परमाणु हमले से होने वाले रेडिएशन से बचा सकती है कोई दवा, जानें यह कितनी कारगर?

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक का खतरा? सावधान! ये कारण हो सकता है असली विलेन

कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक का खतरा? सावधान! ये कारण हो सकता है असली विलेन


Hidden Cholesterol Risk For Heart Attack: हार्ट की सेहत की बात होती है तो आमतौर पर लोग एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड जैसे कोलेस्ट्रॉल के आंकड़ों पर ध्यान देते हैं. ज्यादातर हेल्थ चेकअप में भी इन्हीं पैरामीटर्स की जांच की जाती है. लेकिन कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि कई बार एक अहम फैक्टर नजरअंदाज रह जाता है, जिसे लाइपोप्रोटीन (a) या Lp(a) कहा जाता है. यह एक ऐसा कोलेस्ट्रॉल कण है जो सामान्य लिपिड प्रोफाइल में अक्सर शामिल नहीं होता, लेकिन दिल की बीमारी का जोखिम बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है.

बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले

भारत में डॉक्टरों को एक चिंताजनक ट्रेंड दिखाई दे रहा है. कई लोग जिनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य होती है, वे भी 30–40 की उम्र में हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ का मानना है कि इसके पीछे जेनेटिक कारणों से बढ़ा हुआ Lp(a) लेवल एक अहम वजह हो सकता है. यह फैक्टर ज्यादातर जेनेटिक्स से प्रभावित होता है, इसलिए डाइट या एक्सरसाइज का इस पर सीमित असर पड़ता है.

इसे भी पढ़ें- पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण

क्या होता है Lp(a)?

Lp(a) दरअसल एलडीएल कोलेस्ट्रॉल जैसा ही एक कण होता है, लेकिन इसमें एक अतिरिक्त प्रोटीन जुड़ा होता है. यही प्रोटीन इसे शरीर में अलग तरह से व्यवहार करने के लिए जिम्मेदार बनाता है. अधिक मात्रा में मौजूद होने पर यह आर्टरीज में प्लाक बनने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है, ब्लड वेस्ल्स में सूजन बढ़ा सकता है और खून के थक्के बनने की संभावना भी बढ़ा देता है. यही कारण है कि यह दिल का दौरा और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा सकता है.

भारत में तेजी से बढ़ रहा है मामला

एक्सपर्ट के अनुसार भारत में समय से पहले दिल की बीमारी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. कई रिपोर्टों में बताया गया है कि देश में होने वाली कुल मौतों का बड़ा हिस्सा हार्ट रोगों से जुड़ा है. चिंता की बात यह है कि कई मरीजों में हार्ट अटैक पश्चिमी देशों की तुलना में 10 से 15 साल पहले हो रहा है. जेनेटिक प्रवृत्ति, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, अनएक्टिव लाइफस्टाइल और छिपे हुए लिपिड मार्कर जैसे Lp(a) इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं.

दिलचस्प बात यह है कि सामान्य कोलेस्ट्रॉल टेस्ट में Lp(a) की जांच नहीं की जाती. इसलिए कई लोगों की रिपोर्ट सामान्य दिखाई देती है, लेकिन उनके शरीर में यह जोखिम मौजूद रहता है. डॉक्टरों का कहना है कि जिन लोगों के परिवार में कम उम्र में हार्ट अटैक या स्ट्रोक के मामले रहे हों, उन्हें यह टेस्ट जरूर करवाना चाहिए.

इसे भी पढ़ें – 20s में भी कपल्स में क्यों हो रही फर्टिलिटी की प्रॉब्लम, एक्सपर्ट्स से जानें

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp