टॉयलेट सीट पर बैठकर चलाते हैं फोन, डॉक्टर से जानें यह आदत आपको कैसे कर रही बीमार?

टॉयलेट सीट पर बैठकर चलाते हैं फोन, डॉक्टर से जानें यह आदत आपको कैसे कर रही बीमार?


Is It Bad To Use Phone On Toilet: हम में से ज्यादातर लोग ये आदत अपना चुके हैं कि टॉयलेट पर बैठते ही फोन निकाल लेना और फिर कब 10 से 15 मिनट निकल जाते हैं, पता ही नहीं चलता. यह आदत देखने में बिल्कुल सामान्य और हार्मलेस  लगती है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह आपकी पेल्विक हेल्थ को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रही है. चलिए आपको बताते हैं कि इससे क्या नुकसान होते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. प्रमोद कदम ने TOI को बताया कि  टॉयलेट का एक खास मकसद होता है और जितना ज्यादा समय आप वहां बिताते हैं, उतना ही शरीर पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है. जब आप टॉयलेट सीट पर बैठते हैं, तो आपके रेक्टम को वैसा सपोर्ट नहीं मिलता जैसा एक सामान्य कुर्सी पर मिलता है. ऐसे में ग्रैविटी के कारण खून नीचे की तरफ जमा होने लगता है और समय बढ़ने के साथ प्रेशर भी बढ़ता जाता है.

अगर आप 10 मिनट से ज्यादा बैठते हैं, तो यह दबाव आपके ब्लड वेसल्स पर असर डालने लगता है. इसका सबसे आम नतीजा होता है पाइल्स. यह दरअसल एनल कैनाल की सूजी हुई नसें होती हैं, जिनमें दर्द और ब्लीडिंग हो सकती है.

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बॉडी की नैचुरल सिस्टम भी प्रभावित

लेकिन समस्या सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती एक्सपर्ट बताते हैं कि फोन चलाते समय हमारी बॉडी की नैचुरल सिस्टम भी प्रभावित होती है. जब आप स्क्रीन में खो जाते हैं, तो शरीर के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. इससे मल ज्यादा देर तक कोलन में रहता है, सूख जाता है और बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. यही कारण है कि कब्ज, पाइल्स और एनल फिशर जैसी समस्याएं बढ़ती हैं.

क्या है बचने का तरीका?

डॉक्टर इसे स्ट्रेनिंग पैराडॉक्स भी कहते हैं. यानी आप जानबूझकर जोर नहीं लगा रहे होते, फिर भी लंबे समय तक बैठने से पेल्विक फ्लोर पर लगातार हल्का दबाव बना रहता है. इससे एनल कैनाल की नाजुक परत में दरार आ सकती है, जिसे फिशर कहा जाता है और यह काफी दर्दनाक होता है. इससे बचने का सबसे आसान तरीका है कि 5 मिनट का नियम. डॉ कदम के अनुसार, अगर 5 मिनट में काम पूरा नहीं होता, तो उठ जाना चाहिए और बाद में फिर कोशिश करनी चाहिए. टॉयलेट को लाइब्रेरी या ऑफिस की तरह इस्तेमाल करना सही नहीं है.

फोन को टॉयलेट से दूर रखा जाए

इस नियम को अपनाने के लिए सबसे जरूरी है कि फोन को टॉयलेट से दूर रखा जाए. बिना किसी डिस्ट्रैक्शन के आप अपने शरीर के संकेतों को बेहतर समझ पाएंगे और जरूरत से ज्यादा समय भी नहीं बिताएंगे. इसके अलावा, बैठने का तरीका भी मायने रखता है. पैरों के नीचे छोटा स्टूल रखने से शरीर का एंगल सही हो जाता है, जिससे प्रक्रिया आसान और जल्दी पूरी होती है. डॉक्टर्स यह भी सलाह देते हैं कि शरीर के संकेतों को कभी नजरअंदाज न करें, पर्याप्त पानी पिएं और फाइबर युक्त खाना खाएं. ये छोटी-छोटी आदतें मिलकर बड़ी समस्याओं से बचाती हैं. टॉयलेट पर फोन चलाना भले ही मामूली लगे, लेकिन इसका असर धीरे-धीरे शरीर पर पड़ता है. इसलिए अगली बार जब आप टॉयलेट जाएं, तो फोन बाहर ही छोड़ दें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर के इन छोटे संकेतों को न करें इग्नोर, वरना डैमेज हो सकते हैं लिवर और किडनी

शरीर के इन छोटे संकेतों को न करें इग्नोर, वरना डैमेज हो सकते हैं लिवर और किडनी


Early Signs Your Body Is In Trouble: हमारा शरीर कभी अचानक से बीमार नहीं पड़ता, बल्कि वह पहले छोटे-छोटे संकेत देता है. थकान, दिमाग का भारी लगना, त्वचा में बदलाव या हल्की-फुल्की असहजता, ये सब यूं ही नहीं होते. ये संकेत बताते हैं कि शरीर के अंदर कहीं न कहीं दबाव बन रहा है. समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इन संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं और तब ध्यान देते हैं जब दर्द शुरू हो जाता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. भानु मिश्रा ने TOI को बताया कि “ज्यादातर अंगों को होने वाला नुकसान बिना किसी स्पष्ट लक्षण के ही होता है. लोग इन संकेतों को इसलिए नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि ये साफ नजर नहीं आते.” यही सबसे बड़ा खतरा है कि जब तक लक्षण गंभीर बनते हैं, तब तक नुकसान गहरा हो चुका होता है. 

थकान सबसे आम समस्या

थकान एक आम समस्या है, लेकिन अगर सही नींद लेने के बाद भी थकावट बनी रहती है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह सिर्फ व्यस्त दिनचर्या की वजह से नहीं होता, बल्कि यह लिवर या किडनी पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है.  डॉ. भानु  के अनुसार, “क्रॉनिक थकान का मतलब सिर्फ नींद की कमी नहीं, बल्कि लिवर या किडनी में समस्या भी हो सकती है.” ऐसी थकान धीरे-धीरे आपकी सोच और ऊर्जा दोनों को प्रभावित करती है. 

ब्रेन के इन सिग्नल को न करें नजरअंदाज

दिमाग भी अपने तरीके से संकेत देता है। बार-बार सिरदर्द होना, ध्यान लगाने में दिक्कत या दिमाग का धुंधला लगना अक्सर लोग तनाव या स्क्रीन टाइम का असर मान लेते हैं. लेकिन  एक्सपर्ट बताते हैं कि यह डिहाइड्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर या शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ने का संकेत हो सकता है. याददाश्त में कमी या फोकस में गिरावट दिमाग पर पड़ रहे दबाव का संकेत है.

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इन संकेतों को भी न करें नजरअंदाज

शरीर के कुछ और संकेत भी बहुत कुछ बताते हैं. जैसे पेशाब का रंग बदलना, पैरों में सूजन या आंखों के आसपास फुलाव, ये सब किडनी स्ट्रेस की ओर इशारा कर सकते हैं. इसी तरह बार-बार पेट फूलना, भूख कम लगना या खाने के बाद असहजता महसूस होना लिवर या पैंक्रियाज की परेशानी का संकेत हो सकता है. त्वचा, बाल और नाखून भी शरीर के अंदर की स्थिति को दिखाते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, त्वचा का फीका पड़ना, खुजली या हल्का पीलापन इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर के अंदर कुछ ठीक नहीं है. इसके अलावा बालों का पतला होना या नाखूनों का कमजोर होना भी पोषण की कमी या आंतरिक असंतुलन दर्शाता है. कई बार हल्की-फुल्की समस्याएं जैसे पीठ में जकड़न, पैरों में सुन्नता या खड़े होने पर चक्कर आना भी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं.

इससे बचने के लिए क्या कर सकते हैं?

इन सभी संकेतों से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कि रोजमर्रा की अच्छी आदतें अपनाना. पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना, प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा नमक-चीनी से दूरी बनाना, नियमित व्यायाम और पूरी नींद, ये सब शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. इसके साथ ही, बिना लक्षण के भी समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना जरूरी है. यही नहीं, एक अहम स्टडी जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में पब्लिश हुई है, बताती है कि आजकल लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां चुपचाप बढ़ रही हैं और अक्सर इनका पता तब चलता है जब लोग रूटीन चेकअप करवाते हैं. यानी शरीर पहले संकेत देता है, लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पाते. इसलिए समय से चेकअप करवाना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्रैश डाइट नहीं, बैलेंस्ड लाइफस्टाइल से घटेगा वजन, चेन्नई की इंफ्लुएंसर ने बताया फिटनेस सीक्रेट

क्रैश डाइट नहीं, बैलेंस्ड लाइफस्टाइल से घटेगा वजन, चेन्नई की इंफ्लुएंसर ने बताया फिटनेस सीक्रेट


इनफ्लुएंसर ने अपनी वेट लॉस जर्नी शेयर करते हुए बताया कि यह किसी शॉर्टकट का नतीजा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतों से जुड़े छोटे-छोटे सुधार से संभव हो पाया है. उन्होंने अपनी लाइफस्टाइल में कुछ अहम बदलाव किए, जिसकी वजह से उन्हें बेहतर रिजल्ट मिला.



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भोपाल में फैला ‘ब्लड किक’ का जानलेवा नशा, सुकून के लिए अपना ही खून निकाल रहे युवा

भोपाल में फैला ‘ब्लड किक’ का जानलेवा नशा, सुकून के लिए अपना ही खून निकाल रहे युवा


Is Injecting Your Own Blood Dangerous: भोपाल में एक बेहद खतरनाक और चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है, जिसे डॉक्टर ब्लड किक के नाम से पहचान रहे हैं. यह कोई सामान्य नशा नहीं है, न इसमें शराब है, न ड्रग्स. लेकिन इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर उतने ही गंभीर और जानलेवा हो सकते हैं. इस अजीब आदत में कुछ युवा अपने ही शरीर से खून निकालकर उसे दोबारा इंजेक्ट करते हैं, ताकि उन्हें कुछ पलों के लिए ऊर्जा, सुकून या कंट्रोल का एहसास हो सके.

जनवरी 2026 से अब तक गांधी मेडिकल कॉलेज में ऐसे कम से कम पांच मामले सामने आ चुके हैं. सभी मरीज 18 से 25 साल के हैं. शुरुआत में परिवार को सिर्फ व्यवहार में बदलाव दिखता है, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेले रहना. लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि उन्हें साइकेट्रिक के पास ले जाना पड़ता है.

 पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग

हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि यह पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग मामला है. इन युवाओं में न शराब के लक्षण मिलते हैं, न ड्रग्स के. लेकिन शरीर पर सुई के निशान साफ दिखाई देते हैं. उनका मानना होता है कि अपने ही खून को दोबारा शरीर में डालने से उन्हें तुरंत राहत मिलती है, जबकि असल में यह एक खतरनाक मानसिक और शारीरिक जाल है.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, साइकेट्रिस्ट डॉ जेपी अग्रवाल के अनुसार, यह व्यवहारिक लत है, कोई इलाज नहीं. दिमाग इस प्रक्रिया को एक इनाम की तरह लेने लगता है. खून निकालने का दर्द और उसके बाद मिलने वाला एहसास धीरे-धीरे आदत बन जाता है. वे बताते हैं यह खून के बारे में नहीं, बल्कि उस झूठे सुकून के बारे में है, जिसे व्यक्ति महसूस करता है.

बेहद गंभीर मामले

एक्सपर्ट के अनुसार, इसके खतरे बेहद गंभीर हैं. बार-बार खुद को इंजेक्शन लगाने से शरीर में इंफेक्शन फैल सकता है. सेप्सिस, एचआईवी, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा नसों को नुकसान, खून के थक्के, एनीमिया और यहां तक कि अंग फेल होने का जोखिम भी रहता है. शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया इस तरह के दबाव को झेल नहीं पाती और कुछ मामलों में यह अचानक मौत का कारण बन सकता है.

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मेंटल हेल्थ पर असर

डॉक्टर यह भी बताते हैं कि यह समस्या सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी है. इसके पीछे अक्सर डिप्रेशन, आत्म-नुकसान की प्रवृत्ति या ध्यान पाने की इच्छा छिपी होती है. यानी यह एक तरह से अंदर के दर्द का संकेत है, जो बाहर सुकून के रूप में दिखाई देता है. सोशल मीडिया भी इस खतरनाक ट्रेंड को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. अजीब और जोखिम भरे कंटेंट युवाओं को एक्सपेरिमेंट करने के लिए उकसाते हैं, जो धीरे-धीरे लत में बदल जाता है.

डॉ. जेपी अग्रवाल साफ चेतावनी देते हैं, जो खून आपको जिंदा रखता है, वही गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर जान भी ले सकता है. यह कोई थ्रिल नहीं, बल्कि क्लिनिकल डेथ की ओर बढ़ता कदम है.

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गर्मियों में धूप में बाइक खड़ी करने से पहले 100 बार सोचना, वरना नहीं बन पाओगे पापा

गर्मियों में धूप में बाइक खड़ी करने से पहले 100 बार सोचना, वरना नहीं बन पाओगे पापा


Can Heat Damage Sperm Quality In Men: गर्मियों में तेज धूप में बाइक खड़ी करना कई लोगों के लिए रोज की बात है. जल्दी में हम अक्सर इस बात पर ध्यान ही नहीं देते कि कुछ घंटों तक धूप में खड़ी रही बाइक कितनी ज्यादा गर्म हो जाती है. लेकिन शायद ही कोई यह सोचता हो कि इसका असर सिर्फ बाइक पर नहीं, बल्कि आपकी सेहत खासतौर पर पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर भी पड़ सकता है. 

क्या होता है असर?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट cloudninecare शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में स्पर्म सेल्स तापमान के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं. यही वजह है कि टेस्टिकल्स शरीर के बाहर होते हैं, ताकि उनका तापमान शरीर से 2–4 डिग्री कम बना रहे. यह संतुलन स्पर्म के सही विकास के लिए बेहद जरूरी होता है. लेकिन जब आप धूप से गर्म चीजों के संपर्क में आते हैं, तो गर्मी सीधे इस हिस्से का तापमान बढ़ा देती है.

एक्सपर्ट्स के अनुसार, लंबे समय तक ज्यादा गर्मी के संपर्क में रहने से स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या दोनों पर असर पड़ सकता है. हाई टेम्परेचर स्पर्म की मूवमेंट  को धीमा कर देता है, जिससे उनकी स्टिकल्स तक पहुंचने की क्षमता कम हो जाती है. इतना ही नहीं, ज्यादा गर्मी स्पर्म के डीएनए को भी नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे उनकी संरचना असामान्य हो जाती है.

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हार्मोनल बैलेंस पर भी असर

गर्मी का असर सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. लगातार शरीर के उस हिस्से का तापमान बढ़ने से हार्मोनल बैलेंस भी बिगड़ सकता है. टेस्टोस्टेरोन जैसे जरूरी हार्मोन, जो स्पर्म प्रोडक्शन को नियंत्रित करते हैं, उनका स्तर प्रभावित हो सकता है. इसके साथ ही, ज्यादा गर्मी से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है, जो टेस्टिकल्स को नुकसान पहुंचा सकता है. गर्मियों में डिहाइड्रेशन भी एक बड़ी समस्या बन जाता है. शरीर में पानी की कमी होने पर ब्लड फ्लो और हार्मोन का ट्रांसपोर्ट प्रभावित होता है. इससे स्पर्म बनने की प्रक्रिया और भी कमजोर हो सकती है. याद रखें, सीमन का बड़ा हिस्सा पानी से बना होता है, इसलिए शरीर का हाइड्रेटेड रहना बहुत जरूरी है.

इन चीजों का भी होता है असर

इसके अलावा टाइट कपड़े पहनना, लंबे समय तक गर्म सीट पर बैठना और लगातार धूप में रहना ये सभी चीजें मिलकर स्थिति को और खराब कर सकती हैं. यही कारण है कि एक्सपर्ट्स गर्मियों में शरीर को ठंडा रखने और ज्यादा हीट एक्सपोजर से बचने की सलाह देते हैं. अगर आप रोजाना बाइक इस्तेमाल करते हैं, तो कोशिश करें कि उसे सीधी धूप में लंबे समय तक खड़ा न रखें. कवर का इस्तेमाल करें या छांव में पार्क करें. बाइक चलाने से पहले सीट को थोड़ा ठंडा होने दें. इसके साथ ही, ढीले और आरामदायक कपड़े पहनें और शरीर को हाइड्रेट रखें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिना डायबिटीज वाले और युवा लोगों का तेजी से घटता है वजन, चौंका देगी GLP-1 दवाओं पर नई स्टडी

बिना डायबिटीज वाले और युवा लोगों का तेजी से घटता है वजन, चौंका देगी GLP-1 दवाओं पर नई स्टडी


हमारे देश में नई पीढ़ी की वजन घटाने वाली दवाओं पर हुई एक स्टडी में सामने आया है कि बिना डायबिटीज वाले लोग को और कम उम्र के मरीजों में वजन तेजी से कम होता है. यह स्टडी देश में पहली बार वास्तविक परिस्थितियों में की गई है, जिसमें ओवरवेट और मोटापे से जूझ रहे लोगों पर इन दवाओं के असर को देखा गया है. यह रिसर्च 150 ऐसे लोगों पर आधारित है, जिन्हें 6 महीने तक इंजेक्शन के जरिए सेमाग्लूटाइड और टिरजेपेटाइड जैसी दवाएं दी गई. यह दोनों दवाएं जीएलपी-1 थेरेपी से जुड़ी है, जो पहले टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए विकसित की गई थी. लेकिन अब मोटापे के इलाज में भी इस्तेमाल हो रही है. इस स्टडी के नतीजे इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित हुए हैं.

कितने लोगों का वजन कितना घटा?

स्टडी के अनुसार करीब 41 प्रतिशत प्रतिभागियों का वजन 10 प्रतिशत से ज्यादा काम हुआ. कुल मिलाकर औसत वजन घटने की दर 8.2 प्रतिशत रही. इस स्टडी में डायबिटीज से ग्रस्त और बिना डायबिटीज वाले लोगों के बीच अंतर भी साफ दिखा. जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उनका वजन औसतन 11.21 प्रतिशत तक घटा, जबकि डायबिटीज वाले मरीजों में यह कमी करीब 5.48 प्रतिशत रही.

कौन सी दवाएं रही ज्यादा असरदार?

इस स्टडी में यह भी पाया गया है कि टिरजेपेटाइड लेने वाले मरीजों में वजन घटने की दर ज्यादा रही. इस दवा के साथ औसत वजन में 8.60 प्रतिशत की कमी देखी गई. जबकि सेमाग्लूटाइड लेने वालों में यह 5.62 प्रतिशत रही. इसके अलावा जो मरीज पहले कभी जीएलपी-1 थेरेपी नहीं ले चुके थे उनमें वजन तेजी से घटता देखा गया.

स्टडी में उम्र का भी दिखा असर

रिसर्च में यह सामने आया कि युवाओं में वजन कम होने की प्रक्रिया तेज होती है. खासतौर पर 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने का लक्ष्य युवा और नए मरीजों में जल्दी हासिल हुआ. हालांकि 10 प्रतिशत से कम वजन घटाने की रफ्तार पर डायबिटीज का असर खास असर नहीं देखा गया है. इसके अलावा स्टडी के अनुसार 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने में औसतन 9.5 महीने का समय लगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन दवाओं का पूरा असर आमतौर पर 12 से 18 महीना के बीच दिखाई देता है.

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डायबिटीज और मोटापे के बीच का कनेक्शन

स्टडी में यह भी सामने आया है कि जिन मरीजों को डायबिटीज के साथ मोटापा भी है, उनमें वजन कम होना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है. एक्सपर्ट के अनुसार भारतीय मरीजों में मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्या ज्यादा खतरनाक होती है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस भी ज्यादा पाया जाता है. इसके अलावा डायबिटीज के मरीज अक्सर पहले से कई दवाएं ले रहे होते हैं, जिनमें इंसुलिन भी शामिल हो सकता है. इससे वजन घटाने की प्रक्रिया धीमी में हो जाती है. वहीं बताया जा रहा है कि यह नतीजा ऐसे समय सामने आए हैं, जब सेमाग्लूटाइड का पेटेंट खत्म हो गया है, जिससे भारत के तेजी से बढ़ते एंटी ओबेसिटी मार्केट में कई जेनेरिक वर्शन का रास्ता साफ हो गया है. जिससे देश में हिंदी दवाओं की बिक्री और बढ़ गई है. वहीं एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज पीड़ित है. 25.4 करोड़ लोग जनरलाइज्ड ओबेसिटी से पीड़ित है और 35.1 प्रतिशत लोग पेट के मोटापे से पीड़ित है. डॉक्टरों के अनुसार यह सब बदलते खान-पान और बढ़ती हुई सेडेंटरी लाइफस्टाइल की वजह से हो रहा है.

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