60 साल के बाद कैसे रखें दिल-किडनी और लिवर का ख्याल? इस डाइट से 100 साल होगी उम्र

60 साल के बाद कैसे रखें दिल-किडनी और लिवर का ख्याल? इस डाइट से 100 साल होगी उम्र


Healthy Diet After 60: जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर की जरूरतें बदलने लगती हैं. 60 साल के बाद शरीर पहले जितनी तेजी से काम नहीं करता, पाचन धीमा हो जाता है, मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और दिल, किडनी और लिवर पर ज्यादा दबाव पड़ने लगता है. इस उम्र में सही खानपान और अच्छी लाइफस्टाइल अपनाना बहुत जरूरी हो जाता है. अगर आप बैलेंस डाइट लेते हैं और थोड़ी-बहुत नियमित एक्सरसाइज करते हैं, तो न सिर्फ बीमारियों से बच सकते हैं बल्कि लंबी और हेल्दी लाइफ भी जी सकते हैं. यहां तक कि 90 या 100 साल तक भी, तो आइए जानते हैं कि 60 साल के बाद दिल-किडनी और लिवर का ख्याल कैसे रखें और कौन सी डाइट सबसे बेहतर होती है?

60 के बाद शरीर में क्या बदलाव आते हैं

उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई बदलाव होते हैं. जैसे मेटाबॉलिज्म धीमी हो जाती है. भूख कम लग सकती है. मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं. शरीर में पानी की कमी जल्दी हो सकती है. दिल और ब्लड प्रेशर की समस्याएं बढ़ सकती हैं. कोलेस्ट्रॉल और शुगर बढ़ने का खतरा रहता है. इसी वजह से बुजुर्गों को कम लेकिन पोषण से भरपूर खाना खाने की सलाह दी जाती है. 

60 साल के बाद दिल का ख्याल कैसे रखें?

दिल को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी सही खानपान और नियमित एक्टिविटी है.वहीं दिल को हेल्दी रखने के लिए तला-भुना और बाहर का खाना कम करें. नमक कम खाएं. एक्सट्रा फैट जैसे घी, बटर, फास्ट फूड कम करें. साथ ही ओमेगा-3 फैटी एसिड वाला खाना खाएं. जैसे मछली, अखरोट, अलसी के बीज, ओलिव ऑयल, फल और सब्जियां, साबुत अनाज. इसके अलावा रोज 20-30 मिनट टहलना दिल के लिए बहुत फायदेमंद है और धूम्रपान पूरी तरह छोड़ दें. 

60 साल के बाद किडनी को कैसे सुरक्षित रखें?

 किडनी को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी है कि आप अपने खानपान और लाइफस्टाइल का ध्यान रखें. किडनी शरीर से गंदगी और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने का काम करती है. ऐसे में ज्यादा नमक और प्रोसेस्ड फूड जैसे पैकेट वाले या बाहर के खाने से बचना चाहिए. रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है, लगभग 7-10 गिलास. साथ ही बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि कुछ दवाएं किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं. साथ ही डायबिटीज और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी. इसके अलावा अच्छी डाइट में ताजे फल जैसे सेब और नाशपाती, हरी सब्जियां, हल्का और घर का बना खाना शामिल करना चाहिए. 

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लिवर को कैसे स्वस्थ रखें?

लिवर शरीर का फिल्टर है, जो टॉक्सिन्स को साफ करता है. लिवर को हेल्दी रखने के लिए शराब से पूरी तरह दूरी रखें. बहुत ज्यादा मीठा और फैटी खाना कम करें और वजन कंट्रोल में रखें. लिवर के लिए अच्छे फूड्स जैसे हरी सब्जियां (पालक, मेथी), हल्दी वाला दूध, नींबू पानी, दालें और बीन्स, पर्याप्त पानी अपने रूटीन में शामिल करें. 

60 के बाद कैसा होना चाहिए डेली डाइट प्लान?

1. 60 साल के बाद डेली डाइट प्लान में सुबह की शुरुआत गुनगुने पानी या नींबू पानी से करनी चाहिए, इसके बाद हल्का नाश्ता जैसे दलिया, ओट्स या ताजे फल लेना अच्छा रहता है जिससे दिन की एनर्जी सही तरीके से मिल सके.

2. दोपहर के खाने में 2-3 रोटी , दाल या पनीर, हरी सब्जियां और सलाद शामिल करना चाहिए. जिससे प्रोटीन, फाइबर और विटामिन का संतुलन बना रहे.

3. शाम के समय हल्का नाश्ता जैसे फल, भुना चना या थोड़े नट्स लेना बेहतर होता है जिससे भूख भी कंट्रोल रहे और तला-भुना खाने का मन कम हो.

4. रात का खाना हल्का रखना चाहिए, जिसमें कम तेल और कम मसाले वाला खाना हो, जिससे पाचन आसानी से हो सके और नींद भी अच्छी आए. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या एक फेफड़े से भी जिंदा रह सकता है इंसान, जानें भयंकर निमोनिया में कैसे बचाई जाती है जान?

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क्या प्याज खाने से सच में नहीं लगती लू, जानिए कितना सच्चा है यह दावा?

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Onion For Heatstroke Prevention : गर्मी का मौसम आते ही देश के कई हिस्सों में तापमान तेजी से बढ़ने लगता है. तेज धूप, गर्म हवाएं, लू और उमस भरा मौसम लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन जाता है. ऐसे में हर कोई खुद को ठंडा और सुरक्षित रखने के लिए तरह-तरह के उपाय अपनाता है. कुछ लोग ठंडे पेय पदार्थों का सहारा लेते हैं, तो कुछ घरेलू नुस्खों पर भरोसा करते हैं.

इन्हीं घरेलू उपायों में एक बहुत पुराना और आम नुस्खा जेब में प्याज रखना या कच्चा प्याज खाना लू से बचाता है. आपने भी अक्सर अपने घर के बड़े-बुजुर्गों को यह कहते सुना होगा. हाल ही में इस बात को लेकर फिर चर्चा शुरू हो गई जब एक वायरल वीडियो में एक नेता भी प्याज को लू से बचाव का तरीका बताते नजर आए.लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सच में प्याज लू से बचा सकता है, या यह सिर्फ एक पारंपरिक मान्यता है. तो आइए जानते हैं कि क्या प्याज खाने से सच में लू नहीं लगती है और यह दावा कितना सच्चा है. 

 लू यानी हीटस्ट्रोक क्या होता है?

जब शरीर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और शरीर का कूलिंग सिस्टम (पसीना आना) सही से काम नहीं करता, तब हीटस्ट्रोक यानी लू लगती है. यह एक गंभीर स्थिति हो सकती है, जिसमें चक्कर आना, ज्यादा पसीना या बिल्कुल पसीना न आना, उल्टी या मितली, सिर दर्द, बेहोशी या कोमा तक की स्थिति जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत शरीर को ठंडा करना और पानी व इलेक्ट्रोलाइट देना बहुत जरूरी होता है. 

क्या प्याज खाने से सच में नहीं लगती लू?

प्याज को लेकर यह मान्यता कि उसे जेब में रखने या खाने से लू नहीं लगती है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से सही साबित नहीं माना जाता है. डॉक्टरों और मेडिकल साइंस के अनुसार लू तब लगती है जब शरीर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और शरीर खुद को ठंडा नहीं रख पाता, इसलिए इससे बचने के लिए पानी, इलेक्ट्रोलाइट और धूप से बचाव जरूरी है. न कि किसी चीज को जेब में रखना, हालांकि प्याज में कुछ पोषक तत्व और पानी होता है जो शरीर को थोड़ा सहारा दे सकते हैं, लेकिन यह सीधे तौर पर हीटस्ट्रोक से बचाने का भरोसेमंद तरीका नहीं है, इसलिए इसे एक पारंपरिक मान्यता ही माना जाता है. 

यह दावा कितना सही?

यह दावा पूरी तरह सच नहीं है. प्याज सीधे तौर पर लू (हीटस्ट्रोक) से बचाने का वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपाय नहीं है, इसलिए इस पर पूरी तरह निर्भर रहना सही नहीं होगा. हालांकि, लोग इसे फायदेमंद इसलिए मानते हैं क्योंकि प्याज में पानी, विटामिन C और B6, पोटेशियम, मैग्नीशियम और क्वेरसेटिन जैसे तत्व होते हैं, जो शरीर को हाइड्रेट रखने, इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखने और हल्की सूजन कम करने में मदद करते हैं.

प्याज खाने के फायदे और नुकसान

कच्चा प्याज गर्मियों में कुछ फायदे दे सकता है, जैसे शरीर को हल्की ठंडक महसूस कराना, पाचन सुधारना और इम्युनिटी को सपोर्ट करना, लेकिन इसे ज्यादा मात्रा में खाने से गैस, एसिडिटी और पेट फूलने जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं, और कुछ लोगों को यह उल्टा गरम  भी लग सकता है. इसलिए इसे संतुलित मात्रा में खाना बेहतर है, और अगर तीखापन ज्यादा लगे तो प्याज को पहले पानी या सिरके में भिगोकर खा सकते हैं. आयुर्वेद में भी प्याज को ठंडक देने वाला माना गया है और भुना प्याज, चटनी या रस जैसे घरेलू उपाय बताए गए हैं. 

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लू से बचने के आसान और असरदार तरीके

1. दिनभर पर्याप्त पानी पीते रहें और साथ में नारियल पानी, छाछ, लस्सी या आम पन्ना जैसे पेय लें, जिससे शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी न हो.

2. तरबूज, खीरा, मौसमी फल और हल्का खाना खाएं, जिससे शरीर ठंडा रहे और पाचन भी सही बना रहे, 

3. हमेशा ढीले, हल्के और हल्के रंग के कपड़े पहनें, जिससे शरीर को हवा मिलती रहे और गर्मी कम लगे. 

4. खासकर दोपहर 12 से 4 बजे के बीच बाहर निकलने से बचें, और अगर निकलना जरूरी हो तो सिर और चेहरे को ढक कर ही जाएं. 

5. अगर चक्कर, कमजोरी, ज्यादा पसीना या उल्टी जैसा लगे तो तुरंत ORS या नमक-चीनी का पानी लें और शरीर को ठंडा करने की कोशिश करें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किचन में रखी ये चीजें दे रही हैं कैंसर को न्योता, आज ही निकालकर फेंक दें बाहर

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Kitchen Cancer Risk: सभी लोग अपने घर और किचन को साफ-सुथरा और सुरक्षित रखने की कोशिश करते हैं. लेकिन कई बार रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कुछ चीजें ही हमारी सेहत के लिए खतरा बन जाती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि किचन में मौजूद कुछ आम सामान धीरे-धीरे शरीर में जहरीले तत्व पहुंचते हैं, जो लंबे समय में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अगर आपके भी किचन में रखी है यह चीज तो आप भी कैंसर को न्योता दे रहे हैं. ऐसे में कौन सी चीजों को आज ही किचन से निकालकर बाहर फेंक देना चाहिए.

किचन स्पंज दिखता है साफ, लेकिन खतरनाक

डॉक्टरों के अनुसार बर्तन साफ करने वाला स्पंज बैक्टीरिया का बड़ा अड्डा बन सकता है. इसके छोटे-छोटे छेद में नमी और खाने के कण फंसे रहते हैं, जहां खतरनाक बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं. यह बैक्टीरिया बर्तनों के जरिए शरीर में पहुंचकर इम्यून सिस्टम को कमजोर कर सकते हैं और लंबे समय में नुकसान पहुंचा सकते हैं.

प्लास्टिक के बर्तन और कंटेनर

किचन में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के बर्तन जैसे चोपिंग बोर्ड और स्टोरेज कंटेनर भी सेहत के लिए ठीक नहीं माने जाते हैं. खासकर जब इनमें गरम खाना रखा है या गर्म किया जाता है तो हानिकारक केमिकल्स खाने में मिल जाते हैं. माइक्रो प्लास्टिक और केमिकल्स शरीर में जाकर कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं.

एल्युमिनियम फॉयल और बर्तन

एल्युमिनियम का इस्तेमाल आम है, लेकिन इसमें खट्टा या नमकीन खाना पकाने से धातु के कण भोजन में मिल सकते हैं. लंबे समय तक इसका असर शरीर पर पड़ सकता है और यह कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा माना जाता है.

नॉन स्टिक पैन का खतरा

नॉन स्टिक पैन में मौजूद कोटिंग ज्यादा गर्म होने पर हानिकारक केमिकल छोड़ सकती है. अगर पैन की सतह खराब या खरोंच वाली हो तो यह तत्व खाने में मिल सकते हैं, जो लीवर और फेफड़ों पर असर डाल सकते हैं.

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प्रोसेस्ड और ज्यादा तला हुआ खाना

पैकेज्ड स्नेक्स, इंस्टेंट फूड और ज्यादा तला हुआ खाना भी खतरा बढ़ा सकते हैं. ऐसे खाने में मौजूद केमिकल और प्रिजर्वेटिव्स शरीर पर नेगेटिव असर डालते हैं. वहीं ज्यादा तेल में तले खाने में बनने वाले कुछ तत्व लंबे समय में हानिकारक हो सकते हैं..

ज्यादा शुगर वाली पैकेज्ड ड्रिंक्स

सोडा, जूस, पैकेज्ड ड्रिंक में हाई शुगर एडिटिव्स होते हैं. यह न केवल डायबिटीज का कारण बनते हैं, बल्कि कुछ रिसर्च के अनुसार कैंसर वाले खतरे को भी बढ़ा सकते हैं. घर में ताजे फल और हर्बल ड्रिंक को ही प्राथमिकता देनी चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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रात में शरीर थका हुआ है लेकिन दिमाग रहता है एक्टिव? जानिए क्यों बढ़ती है ओवरथिंकिंग और नींद न आने की समस्या

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पेस्टिसाइड्स के लगातार संपर्क से बढ़ सकता है 150% तक कैंसर का खतरा, नई स्टडी का दावा, जानें क्य

पेस्टिसाइड्स के लगातार संपर्क से बढ़ सकता है 150% तक कैंसर का खतरा, नई स्टडी का दावा, जानें क्य


Pesticides Exposure Cancer Risk : हम अपनी डेली लाइफ में जो खाना खाते हैं, जो पानी पीते हैं और जिस हवा में सांस लेते हैं, उसमें कई तरह के केमिकल मौजूद हो सकते हैं, इन्हीं में से एक जरूरी केमिकल समूह कीटनाशक यानी पेस्टिसाइड्स है, जिनका यूज खेती में फसलों को कीड़ों और बीमारियों से बचाने के लिए किया जाता है. 

हाल ही में एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च ने चिंता बढ़ा दी है. इस अध्ययन के अनुसार, जिन इलाकों में पेस्टिसाइड्स का ज्यादा यूज होता है, वहां रहने वाले लोगों में कुछ प्रकार के कैंसर होने का खतरा 150 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. यह रिपोर्ट पर्यावरणीय स्वास्थ्य और रसायनों के प्रभाव को लेकर एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है. 

नई स्टडी क्या कहती है?

यह रिसर्च जर्नल Nature Health में प्रकाशित हुई है. इसमें बताया गया है कि लोग एक साथ सिर्फ एक नहीं कई पेस्टिसाइड्स के संपर्क में रहते हैं. पहले के अध्ययन सिर्फ एक-एक केमिकल को अलग-अलग देखकर किए जाते थे, लेकिन असली लाइफ में हम मिक्सचर एक्सपोजर यानी कई रसायनों के संयुक्त प्रभाव में रहते हैं. इस अध्ययन ने इस स्थिति को ध्यान में रखकर विश्लेषण किया है, जो इसे पहले की रिसर्च से ज्यादा जरूरी बनाता है. इस अध्ययन के लिए दक्षिण अमेरिकी देश पेरू को चुना गया. 

पेरू को क्यों चुना गया?

दक्षिण अमेरिकी देश पेरू में कृषि बड़े पैमाने पर होती है. अलग-अलग तरह के पर्यावरणीय क्षेत्र मौजूद हैं. सामाजिक और आर्थिक असमानताएं ज्यादा हैं. इसलिए इस अध्ययन के लिए  पेरू को चुना गया. ऐसे में यहां रिसर्च में पाया गया कि ग्रामीण और आदिवासी समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. कई लोगों पर एक साथ लगभग 12 अलग-अलग पेस्टिसाइड्स का असर पाया गया. ये स्तर कई जगहों पर काफी ज्यादा था. 

रिसर्च में कैसे किया गया विश्लेषण?

वैज्ञानिकों ने 31 सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाले पेस्टिसाइड्स का अध्ययन किया. 2014 से 2019 तक उनके फैलाव को ट्रैक किया और 2007 से 2020 तक 1.5 लाख से ज्यादा कैंसर मरीजों के स्वास्थ्य डेटा से तुलना की, रिसर्च में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में पेस्टिसाइड्स का स्तर ज्यादा था, वहां कैंसर के मामले भी ज्यादा थे. खास बात यह है कि जिन पेस्टिसाइड्स का अध्ययन किया गया, वे अभी तक WHO के तहत कैंसर पैदा करने वाले (carcinogenic) नहीं माने गए हैं. इसके बावजूद उनके संयुक्त प्रभाव से स्वास्थ्य पर गंभीर असर देखा गया. 

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शरीर पर क्या असर होता है?

रिसर्च के अनुसार, पेस्टिसाइड्स शरीर में धीरे-धीरे असर डालते हैं. यह कोशिकाओं (cells) के सामान्य कामों में बाधा डालते हैं. लंबे समय में शरीर की इम्यूनिटी कमजोर कर सकते हैं. इससे लिवर सबसे ज्यादा प्रभावित होता है. यह बदलाव तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. आज के समय में रसायनों की सुरक्षा जांच आमतौर पर एक-एक केमिकल को अलग-अलग जांचती है और उसके लिए सुरक्षित सीमा तय करती है, लेकिन समस्या यह है कि असली जिंदगी में लोग एक साथ कई रसायनों के संपर्क में रहते हैं. 

रिसर्च में और क्या-क्या बताया गया?

रिसर्च यह भी बताती है कि एल नीनो (El Niño) जैसे जलवायु बदलाव पेस्टिसाइड्स के उपयोग और उनके फैलाव को प्रभावित कर सकते हैं. इससे पर्यावरण में इन रसायनों की मात्रा और बढ़ सकती है. हालांकि यह अध्ययन पेरू पर आधारित है, लेकिन इसके निष्कर्ष दुनिया भर पर लागू हो सकते हैं क्योंकि कई देशों में बड़े पैमाने पर खेती होती है, पेस्टिसाइड्स का उपयोग सामान्य है. नियम और निगरानी हर जगह एक जैसी नहीं है. इसलिए यह एक वैश्विक स्वास्थ्य चिंता बन सकती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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