क्या रात में सोने से ठीक पहले हल्दी वाला दूध पीना सही? जानें एक्सपर्ट्स की राय

क्या रात में सोने से ठीक पहले हल्दी वाला दूध पीना सही? जानें एक्सपर्ट्स की राय


Is It Good To Drink Turmeric Milk Before Bed: हल्दी दूध भारतीय घरों में सर्दियों का अहम हिस्सा रहा है. हमारे यहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी को रात में सोने से पहले हल्दी वाला दूध पीने की सलाह दी जाती है. दूध, हल्दी, काली मिर्च, अदरक और दालचीनी से बना यह पेय न सिर्फ स्वादिष्ट होता है बल्कि सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह आपके लिए कितना फायदेमंद है.
 
हल्दी वाला दूध कितना फायदेमंद?

हल्दी दूध में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीमाइक्रोबियल गुण शरीर की इम्यून क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं. सर्दियों में यह सर्दी-खांसी और फ्लू से बचाने में सहायक माना जाता है. खासतौर पर बुजुर्गों के लिए यह जोड़ों के दर्द, गठिया और मांसपेशियों में दर्द जैसी समस्याओं में राहत देने में मदद कर सकता है. इसके अलावा यह गले की खराश को शांत करने और बेहतर नींद लाने में भी सहायक माना जाता है.

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कब पीना चाहिए हल्दी दूध?

हालांकि हल्दी दूध पीते समय कई लोग एक आम गलती कर बैठते हैं कि इसे सोने से ठीक पहले पी लेना. हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक रात के खाने और सोने के बीच कम से कम एक से दो घंटे का अंतर होना चाहिए. हल्दी दूध कैलोरी से भरपूर होता है और इसे तुरंत पीकर सो जाने से डाइजेशन सिस्टम पर असर पड़ सकता है. डायटीशियन चारू सदाना के अनुसार हल्दी में मौजूद करक्यूमिन एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है और यह पाचन में भी मदद करता है।. लेकिन अगर इसे भारी भोजन के तुरंत बाद या सोने से ठीक पहले पिया जाए, तो यह कुछ लोगों में पित्त के उत्पादन को बढ़ा सकता है, जिससे एसिडिटी या एसिड रिफ्लक्स की समस्या हो सकती है.

इन लोगों को हो सकती है दिक्कत

Medanta की एक रिपोर्ट के अनुसार, हल्दी दूध भले ही सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता हो, लेकिन कुछ लोगों को इसे पीते समय खास सावधानी बरतनी चाहिए. जिन लोगों को गॉलब्लैडर से जुड़ी समस्या है, उन्हें हल्दी दूध से बचना चाहिए, क्योंकि हल्दी पित्त के स्राव को बढ़ा सकती है और इससे परेशानी बढ़ सकती है. अगर आप ब्लड थिनर दवाइयां लेते हैं, तो भी हल्दी का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए. हल्दी खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है, जिससे दवाओं के साथ मिलकर ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है. जिन लोगों को आयरन की कमी की समस्या है, उन्हें भी हल्दी दूध का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि हल्दी शरीर में आयरन के ऑब्जर्वेशन को प्रभावित कर सकती है. 

इसके अलावा अगर आप गर्भवती हैं, लिवर से जुड़ी बीमारी से पीड़ित हैं या किसी सर्जरी की योजना बना रहे हैं, तो हल्दी दूध को नियमित रूप से लेने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें, सही मात्रा और सही स्थिति में ही इसका सेवन करना सुरक्षित और फायदेमंद माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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जिम में मेहनत के बाद भी नहीं घट रहा वजन, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये बड़ी गलतियां?

जिम में मेहनत के बाद भी नहीं घट रहा वजन, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये बड़ी गलतियां?


Why Am I Not Losing Weight Despite Working Out: कई लोग जिम या योगा क्लास में पूरी मेहनत और अनुशासन के साथ जाते हैं. वर्कआउट खत्म होने के बाद उन्हें लगता है कि उन्होंने अपनी फिटनेस के लिए सब कुछ सही किया है. लेकिन जैसे ही वे वजन मशीन पर खड़े होते हैं और वही पुराना नंबर दिखाई देता है, तो निराशा होने लगती है. ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि जब हम नियमित एक्सरसाइज कर रहे हैं, तो वजन कम क्यों नहीं हो रहा?.

क्यों नहीं हो रहा है वजन कम?

दरअसल वजन कम होना सिर्फ जिम में पसीना बहाने से तय नहीं होता. हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं. दिनभर हम क्या खाते हैं, कितनी एक्टिविटी करते हैं, कितनी नींद लेते हैं और तनाव को कैसे संभालते हैं, ये सभी चीजें वजन पर असर डालती हैं. कई बार हम मान लेते हैं कि ज्यादा वर्कआउट करने से बहुत ज्यादा कैलोरी बर्न हो जाती है, जबकि असलियत यह है कि एक्सरसाइज से उतनी कैलोरी खर्च नहीं होती जितनी हम सोचते हैं.

इस पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

फिटनेस एक्सपर्ट डॉ. विपुल लुनावत ने India Today को बताया कि फिजिकल एक्टिविटी के दौरान खर्च हुई ऊर्जा की भरपाई दूसरे तरीकों से कर लेता है. इसका मतलब यह नहीं कि वर्कआउट छोड़ देना चाहिए, बल्कि इसे सही तरीके से करना जरूरी है. उदाहरण के लिए, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग मसल्स बनाने में मदद करती है और मसल्स बढ़ने से शरीर का मेटाबॉलिज्म तेज होता है, जिससे आराम की स्थिति में भी ज्यादा कैलोरी बर्न होती है.

खानपान और लाइफस्टाइल की अहम भूमिका

वजन कम करने में खानपान भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कई लोग हेल्दी फूड तो खाते हैं, लेकिन उसकी मात्रा पर ध्यान नहीं देते. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट एडविना राज के अनुसार, नट्स, घी, एवोकाडो, स्मूदी और सूखे मेवे जैसे कई हेल्दी फूड्स में कैलोरी ज्यादा होती है. अगर इन्हें अधिक मात्रा में खाया जाए तो वजन कम होने की गति धीमी हो सकती है. इसलिए संतुलित आहार और सही पोर्शन साइज पर ध्यान देना जरूरी है.

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इसके अलावा बार-बार स्नैकिंग करना और मीठे या कैलोरी वाले ड्रिंक्स लेना भी वजन घटाने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. प्रोटीन की कमी भी एक आम समस्या है. पर्याप्त प्रोटीन न मिलने पर शरीर मसल्स को बनाए नहीं रख पाता और मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है. इसलिए हर भोजन में प्रोटीन के सोर्स जैसे अंडे, दालें, पनीर, टोफू या मछली शामिल करना फायदेमंद होता है. 

दिनभर की एक्टिविटी का भी अहम रोल 

दिनभर की गतिविधि भी बहुत मायने रखती है. सिर्फ एक घंटे जिम करने से पूरे दिन बैठकर बिताने की भरपाई नहीं हो सकती. ज्यादा चलना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और बीच-बीच में शरीर को एक्टिव रखना वजन घटाने में मदद करता है. इसके साथ ही पर्याप्त नींद और तनाव को कंट्रोल रखना भी जरूरी है, क्योंकि कम नींद और ज्यादा तनाव हार्मोनल असंतुलन पैदा कर सकते हैं और वजन कम करना मुश्किल बना सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लगातार बढ़ रहे फैटी लिवर के मामले, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये 8 गलतियां?

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Can You Get Fatty Liver Without Drinking Alcohol: फैटी लिवर एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में लोग अक्सर गंभीरता से नहीं सोचते. नाम सुनने में यह बहुत हल्का लगता है, इसलिए कई लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. शुरुआत में इसमें कोई खास दर्द या स्पष्ट लक्षण भी दिखाई नहीं देते, जिससे यह समस्या सालों तक छिपी रह सकती है. कई बार जब तक इसके संकेत साफ तौर पर सामने आते हैं, तब तक लिवर को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है. ऐसे में जरूरी है कि फैटी लिवर से जुड़े कुछ आम मिथकों और सच्चाई को समझा जाए. चलिए आ पको बताते हैं इससे जुड़े कुछ मिथक.

क्या यह सिर्फ शराब पीने की वजह से होता है?

सबसे बड़ा भ्रम यह है कि फैटी लिवर सिर्फ शराब पीने वालों को ही होता है. जबकि सच्चाई यह है कि आज ज्यादातर मामलों में यह नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज के रूप में सामने आता है. इसका मतलब यह है कि जो लोग शराब नहीं पीते, उन्हें भी यह बीमारी हो सकती है.

इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, खराब खानपान और जेनेटिक कारण इसके पीछे अहम भूमिका निभाते हैं. गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. भास्कर नंदी ने TOI को बताया कि भारत में लगभग 30 से 40 प्रतिशत लोगों में NAFLD पाया जाता है और इनमें से अधिकतर मरीज डायबिटीज, मोटापे या हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं. 

वजन कंट्रोल रहने पर फैटी लिवर नहीं होता

एक और आम धारणा यह है कि अगर व्यक्ति का वजन सामान्य है तो उसे फैटी लिवर नहीं हो सकता. लेकिन डॉक्टर बताते हैं कि कई दुबले दिखने वाले लोगों में भी यह समस्या पाई जाती है, जिसे लीन NAFLD कहा जाता है. असल में शरीर में जमा होने वाला विसरल फैट, जो आंतरिक अंगों के आसपास जमा होता है, बाहर से हमेशा दिखाई नहीं देता.

सबकुछ ठीक मान लेना

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अगर ब्लड टेस्ट में लिवर एंजाइम सामान्य आए हैं तो सब ठीक है. लेकिन एक्सपर्ट के अनुसार शुरुआती चरण में फैटी लिवर के बावजूद ALT और AST जैसे एंजाइम सामान्य रह सकते हैं. इसलिए सिर्फ एक टेस्ट के आधार पर पूरी तरह निश्चिंत होना सही नहीं है.

क्या फैटी लिवर मामूली समस्या है और कभी भी ठीक हो सकता है?

कई लोग सोचते हैं कि फैटी लिवर एक मामूली समस्या है और इसे कभी भी ठीक किया जा सकता है. हालांकि शुरुआती चरण में इसे कंट्रोल किया जा सकता है, लेकिन अगर लंबे समय तक अनदेखा किया जाए तो यह नॉन-अल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस , फाइब्रोसिस और आगे चलकर सिरोसिस जैसी गंभीर स्थिति में बदल सकता है. यह लिवर फेलियर और लिवर कैंसर का कारण भी बन सकता है.

इनको कर देते हैं नजरअंदाज और चीनी जिम्मेदार

फैटी लिवर अक्सर तेज दर्द की बजाय हल्के संकेत देता है, जिन्हें लोग नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे लगातार थकान, पेट के दाहिने हिस्से में भारीपन, गर्दन के आसपास त्वचा का काला पड़ना या पेट के आसपास अचानक चर्बी बढ़ना, इस समस्या के पीछे सिर्फ ज्यादा चीनी खाना ही जिम्मेदार नहीं होता. रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, शारीरिक गतिविधि की कमी, तनाव, खराब नींद और अनियमित खानपान भी इसके जोखिम को बढ़ाते हैं.

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ये भी हैं मिथक

फैटी लिवर के इलाज में केवल दवाइयों पर निर्भर रहना भी सही नहीं है. एक्सपर्ट का कहना है कि सबसे प्रभावी उपाय लाइफस्टाइल में बदलाव है. वजन को 7 से 10 प्रतिशत तक कम करना, रेगुलर करना, संतुलित आहार लेना और पर्याप्त नींद लेना लिवर को स्वस्थ बनाने में मदद करता है.

डॉक्टरों के अनुसार कमर का बढ़ता घेरा, प्रीडायबिटीज, हाई ट्राइग्लिसराइड, कम HDL कोलेस्ट्रॉल और लगातार थकान जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए. समय-समय पर जांच करवाना, प्रोसेस्ड फूड कम करना, रोजाना पैदल चलना और स्वस्थ आदतें अपनाना फैटी लिवर से बचाव में बेहद मददगार हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! चीन के बाद अब भारत का नंबर, क्यों तेजी से मोटापे के शिकार हो रहे हमारे बच्चे?

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Why Childhood Obesity Is Increasing In India: वर्ल्ड ओबेसिटी डे (4 मार्च 2026) के मौके पर जारी एक नई रिपोर्ट ने भारत में बच्चों के हेल्थ को लेकर गंभीर चिंता जताई है. वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन की तरफ जारी वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 के अनुसार, मोटापे और ओवरवेट बच्चों की संख्या के मामले में भारत अब दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है. इस सूची में भारत से आगे केवल चीन है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत में बचपन में मोटापे की दर हर साल औसतन लगभग 5 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है, जो दुनिया में सबसे तेज बढ़ती दरों में से एक मानी जा रही है.

क्या निकला है रिपोर्ट में?

रिपोर्ट के अनुसार 2025 तक भारत में 5 से 19 साल की उम्र के करीब 4.13 करोड़ बच्चे और किशोर ओवरवेट या मोटापे की कैटेगरी में आ चुके हैं. इनमें लगभग 1.49 करोड़ बच्चे 5 से 9 वर्ष और 2.64 करोड़ किशोर 10 से 19 वर्ष के  शामिल हैं. यह आंकड़े बताते हैं कि मोटापे को रोकने के लिए तय किया गया वैश्विक लक्ष्य 2025 तक पूरा नहीं हो सका है और अब 2030 तक इसे कंट्रोल करना भी चुनौती बनता जा रहा है.

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भारत की स्थिति क्यों चिंताजनक?

वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन की सीईओ जोहाना रॉल्स्टन के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जहां बच्चों में मोटापा सबसे तेजी से बढ़ रहा है और हर साल इसमें करीब 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जा रही है. उनका कहना है कि यह स्थिति केवल संयोग नहीं है, बल्कि ऐसे माहौल का परिणाम है जहां बच्चों को स्वस्थ भोजन और पर्याप्त फिजिकल एक्टिविटी के अवसर नहीं मिल पाते. बड़ी जनसंख्या के कारण भारत दुनियाभर की रैंक में दूसरे स्थान पर है, जबकि WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में यह पहले स्थान पर है.  रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगर यही रफ्तार जारी रही तो 2040 तक युवाओं में कई मेटाबॉलिक बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ सकते है. उदाहरण के तौर पर फैटी लिवर रोग के मामले 8.39 मिलियन से बढ़कर लगभग 11.88 मिलियन तक पहुंच सकते हैं. इसके अलावा हाई ट्राइग्लिसराइड, हाइपरटेंशन और हाइपरग्लाइसीमिय जैसे जोखिम भी बच्चों में तेजी से बढ़ने की आशंका है.

क्यों बढ़ रहे हैं मामले?

वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन की रिपोर्ट में मोटापे के पीछे कई ऐसे कारण बताए गए हैं जिन्हें रोका जा सकता है. सबसे बड़ा कारण बच्चों और किशोरों में फिजिकल एक्टिविटी की कमी है. आंकड़ों के मुताबिक 11 से 17 वर्ष के लगभग 74 प्रतिशत किशोर रोजाना जरूरी फिजिकल एक्टिविटी नहीं कर पाते. इसके अलावा जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों का बढ़ता सेवन, स्कूलों में संतुलित भोजन की सीमित उपलब्धता और शुरुआती जीवन में सही पोषण की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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2050 तक दुनिया में 3.5 मिलियन होंगे ब्रेस्ट कैंसर के केस, बेहद डरावनी है यह स्टडी

2050 तक दुनिया में 3.5 मिलियन होंगे ब्रेस्ट कैंसर के केस, बेहद डरावनी है यह स्टडी


भारत समेत दुनियाभर में लगातार कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. इस सिलसिले में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक गंभीर चेतावनी भी सामने आई है. दरअसल मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट के अनुसार समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में ब्रेस्ट कैंसर वैश्विक स्तर की व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि 2050 तक महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के नए मामलों की संख्या 3.56 मिलियन तक पहुंच सकती है. वही अनुमानित आंकड़े 2.29 मिलियन से 4.83 मिलियन के बीच बताए गए हैं. सिर्फ मामले ही नहीं बल्कि मौतों के आंकड़े भी चिंताजनक है, रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली वैश्विक मौतें 1.37 मिलियन तक पहुंच सकती है. यह अनुमान 8.41 लाख से लेकर 20.2 लाख तक के दायरे में है. वहीं मौजूदा समय में हर साल करीब 7.64 लाख मौतें हो रही है जो आने वाले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.

अगले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं मौतें

इस रिसर्च में बताया गया है कि अगर ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, स्क्रीनिंग और इलाज की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो 2050 तक सालाना मौतों की संख्या लगभग 14 लाख तक पहुंच सकती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मेडिकल साइंस में प्रगति के बाद भी कई देश बढ़ते मामलों से निपटने के लिए तैयार नहीं है. वहीं कमजोर स्वास्थ्य ढांचे वाले देशों में स्थिति और खतरनाक हो सकती है.

भारत में 1990 के बाद बढ़े मामले

रिपोर्ट में भारत की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है. भारत में पिछले 3 दशकों में देश में ब्रेस्ट कैंसर का बोझ 5 गुना बढ़ा है. बदलती लाइफस्टाइल, शहरीकरण, देश में मातृत्व, ब्रेस्टफीडिंग में कमी, मोटापे और शुरुआती जांच की कमी को इसके प्रमुख कारणों में गिना गया है. वहीं भारत में अब यह कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसर में से एक बन चुका है, खासकर शहरी इलाकों में. इसे लेकर डॉक्टरों का कहना है कि बड़ी संख्या में महिलाओं की पहचान बीमारी के लास्ट स्टेज में होती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है और मृत्यु दर बढ़ जाती है.

अमीर और गरीब देशों के बीच भी साफ अंतर

वहीं इस रिपोर्ट में यह भी साफ बताया गया है कि हाई आय वाले देशों में नए मामलों की दर स्थिर है और मृत्यु दर में कमी आई है. इसका कारण बेहतर स्क्रीनिंग, समय पर जांच और आधुनिक उपचार व्यवस्थाएं हैं. वहीं कम और मिडिल आय वाले देशों में नए मामलों और मौतों दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. इन देशों में रेडियोथेरेपी मशीनों की कमी, कीमोथेरेपी दवाइयों तक सीमित पहुंच और इलाज का ज्यादा खर्च बड़ी समस्या है. वहीं वैश्विक स्तर पर नए मामलों में इन देशों की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है, लेकिन ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी कुल बीमारियों और समय से पहले मौतों में इनकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत से ज्यादा है.

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कितनी खतरनाक कंडीशन है प्री-डायबिटिक होना, इससे बचने के क्या हैं तरीके?

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What Is Prediabetes And Why Is It Dangerous: प्रीडायबिटीज वह स्थिति होती है जब किसी व्यक्ति का ब्लड शुगर स्तर सामान्य से ज्यादा होता है, लेकिन इतना अधिक नहीं होता कि उसे टाइप-2 डायबिटीज कहा जाए. कई लोग इसे सिर्फ एक चेतावनी या शुरुआती संकेत मानते हैं, लेकिन डॉक्टर इसे काफी गंभीरता से लेते हैं. दरअसल, यह शरीर का वह चरण है जब मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी शुरू हो चुकी होती है और अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो आगे चलकर यह डायबिटीज में बदल सकती है.

दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे हैं मामले

दुनियाभर में प्रीडायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग इस स्थिति से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका पता तक नहीं होता. लंबे समय तक ब्लड शुगर सामान्य से ऊपर रहने पर शरीर के अंदर धीरे-धीरे नुकसान शुरू हो सकता है. इससे ब्लड वेसल्स, दिल और मेटाबॉलिक सिस्टम पर असर पड़ता है. यही वजह है कि डॉक्टर इसे एक शुरुआती चेतावनी मानते हैं, ताकि समय रहते स्थिति को संभाला जा सके.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. शिवानी चौहान ने  TOI को बताया कि प्रीडायबिटीज उन लोगों में पाई जाती है जिनका ग्लूकोज या HbA1c स्तर डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंचता, लेकिन कार्बोहाइड्रेट मेटाबॉलिज्म सामान्य नहीं रहता. ऐसे लोगों में फास्टिंग ब्लड शुगर बढ़ा हुआ हो सकता है या फिर ग्लूकोज टॉलरेंस कम हो सकता है. आमतौर पर HbA1c का स्तर 5.7 से 6.4 प्रतिशत के बीच होने पर इसे प्रीडायबिटीज की कैटेगरी में रखा जाता है. 

क्यों बढ़ रही है चिंता?

डॉक्टरों की चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह स्थिति अक्सर चुपचाप आगे बढ़ती रहती है. कई बार शरीर में छोटे-छोटे बदलाव शुरू हो जाते हैं, जैसे ब्लड वेसल्स और नसों को नुकसान, जो लंबे समय बाद गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. अगर इस चरण में ध्यान न दिया जाए तो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, हार्ट डिजीज, स्ट्रोक और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है.

इसे भी पढ़ें- Paint Fumes Health Effects: घर में नया पेंट करवाने के बाद क्यों होने लगती है खांसी और घुटन? जानें कारण और बचाव के टिप्स

आज की लाइफस्टाइल भी इसके पीछे एक बड़ा कारण बन रही है. ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, मीठे पेय पदार्थ, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, लंबे समय तक बैठकर काम करना और बढ़ता मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देते हैं. इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है और शारीरिक गतिविधियां कम होने लगती हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है.

क्या इसको कंट्रोल किया जा सकता है?

अच्छी बात यह है कि प्रीडायबिटीज को सही समय पर पहचाना जाए तो इसे कंट्रोल किया जा सकता है. डॉक्टर सबसे पहले लाइफस्टाइल में बदलाव की सलाह देते हैं. संतुलित आहार लेना, नियमित एक्सरसाइज करना और वजन को कंट्रोल रखना काफी मददगार साबित होता है. एक्सपर्ट के अनुसार सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि ब्लड शुगर को संतुलित रखने में मदद कर सकती है. कई लोगों में सिर्फ इन बदलावों से ही ब्लड शुगर सामान्य स्तर पर वापस आ जाता है.

ये भी पढ़ें-3 साल में इस महिला ने घटाया 72 किलो वजन, केवल 7 आसान स्टेप्स फॉलो कर आप भी हो सकती हैं स्लिम

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