सेहतमंद समझकर रोज पी रहे हैं दूध? इस लाइलाज बीमारी का बढ़ सकता है खतरा

सेहतमंद समझकर रोज पी रहे हैं दूध? इस लाइलाज बीमारी का बढ़ सकता है खतरा


Does Drinking Milk Increase Parkinson Disease Risk: आपने शायद कहीं न कहीं यह जरूर सुना होगा या देखा होगा कि दूध और पार्किंसन बीमारी के बीच कोई संबंध हो सकता है. यह सुनकर कई लोग चौंक जाते हैं और सोचने लगते हैं कि क्या अब दूध पीना भी नुकसानदायक है. सच यह है कि इस विषय पर जो रिसर्च हुई है, वह पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है कि दूध पीना बंद कर दें, वरना बीमारी हो जाएगी. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ. सादिक पठान ने TOI को बताया कि कई स्टडीज में यह देखा गया है कि डेयरी प्रोडक्ट्स, खासकर ज्यादा मात्रा में दूध पीने वाले लोगों में पार्किंसन का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है. खासतौर पर पुरुषों में यह जोखिम 20 से 40 प्रतिशत तक ज्यादा पाया गया है. हालांकि, यह सीधा कारण नहीं बल्कि एक संबंध है, जिसे अभी पूरी तरह समझा जाना बाकी है.

क्या निकला रिसर्च में?

इस विषय पर सबसे लंबी और बड़ी रिसर्च हार्वर्ड यूनिवर्सिटीसे जुड़ी स्टडीज में नर्सेस हेल्थ स्टडी और हेल्थ प्रोफेशनल्स फॉलो-अप स्टडी में सामने आई. करीब 25 साल तक लोगों की डाइट को ट्रैक करने के बाद पाया गया कि जो लोग रोजाना लो-फैट डेयरी के तीन या उससे ज्यादा सर्विंग लेते थे, उनमें पार्किंसन का खतरा 34 प्रतिशत ज्यादा था, तुलना में उन लोगों के जो बहुत कम डेयरी लेते थे.

इसी तरह अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की कैंसर प्रिवेंशन स्टडी में भी एक दिलचस्प पैटर्न सामने आया. इसमें हजारों पुरुष और महिलाओं को शामिल किया गया और पाया गया कि डेयरी का सेवन करने वालों में यह जोखिम पुरुषों में 1.8 गुना और महिलाओं में 1.3 गुना तक बढ़ा हुआ था.

क्या दूध से ऐसा होता है?

अब सवाल यह है कि आखिर दूध में ऐसा क्या हो सकता है? कुछ रिसर्च में यह संभावना जताई गई है कि दूध में मौजूद पेस्टिसाइड के अवशेष, जैसे हेप्टाक्लोर एपॉक्साइड, दिमाग के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. इसके अलावा दूध में मौजूद गैलेक्टोज भी एक फैक्टर माना जा रहा है, जो ज्यादा मात्रा में लेने पर दिमाग पर असर डाल सकता है. एक और दिलचस्प थ्योरी गट-ब्रेन कनेक्शन से जुड़ी है. माना जाता है कि डेयरी हमारे गट माइक्रोबायोम को प्रभावित कर सकती है, जिससे कुछ ऐसे प्रोटीन बनते हैं जो आगे चलकर दिमाग तक पहुंच सकते हैं और बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं.

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हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको तुरंत दूध या डेयरी प्रोडक्ट्स छोड़ देने चाहिए. रिसर्च का संकेत सिर्फ इतना है कि संतुलन जरूरी है. अगर आप बहुत ज्यादा मात्रा में खासकर लो-फैट या स्किम मिल्क लेते हैं, तो उसे थोड़ा कम करना बेहतर हो सकता है.

क्या होता है पार्किंसन के लक्षण?

भारत में पार्किंसन के मामले भी धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं. इसके लक्षणों में हाथ कांपना, शरीर में जकड़न, धीमी मूवमेंट और पोस्टर का बिगड़ना शामिल हैं. वहीं शुरुआती संकेतों में कब्ज, सूंघने की क्षमता कम होना, नींद की समस्या और मूड स्विंग भी देखे जा सकते हैं. डॉक्टरों का मानना है कि इस बीमारी से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर जोखिम को कम जरूर किया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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यहां बच्चा पैदा होते ही चटा दिया जाता है नमक, जानें इसका सेहत पर क्या पड़ता है असर?

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1.5 लाख का ‘जादुई’ कैंसर इंजेक्शन निकला नकली, ऐसे चल रहा था खौफनाक खेल

1.5 लाख का ‘जादुई’ कैंसर इंजेक्शन निकला नकली, ऐसे चल रहा था खौफनाक खेल


How Fake Keytruda Reached Cancer Patients In India: पंजाब के एक साधारण घर से शुरू हुई यह कहानी भारत में कैंसर इलाज की एक खतरनाक सच्चाई को उजागर करती है. साल 2022 की शुरुआत में चंडीगढ़ के पास रहने वाली 56 वर्षीय महिला का लिवर कैंसर का इलाज PGIMER में चल रहा था. डॉक्टरों ने उन्हें एक महंगी इम्यूनोथेरेपी दवा कीट्रूडा  लेने की सलाह दी, जिसकी कीमत 100 mg की एक वायल के लिए 1.5 लाख रुपये से ज्यादा है. इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था, इसलिए परिवार ने सितंबर से दिसंबर के बीच 12 वायल डिस्काउंट पर करीब 16 लाख रुपये में खरीदीं। लेकिन कुछ समय बाद दिल्ली पुलिस का फोन आया और पता चला कि ये दवाएं नकली थीं, जिनमें एंटीफंगल दवा भरी गई थी.

जांच में खुलासा

यह मामला अकेला नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस औरइंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स की संयुक्त जांच में सामने आया है कि भारत में महंगी कैंसर दवाओं, खासकर कीट्रूडा, का एक बड़ा नकली बाजार सक्रिय है. इस जांच में 12,500 से ज्यादा पन्नों के रिकॉर्ड, अस्पताल डेटा और डॉक्टरों से बातचीत शामिल रही.

बेहद संगठित तरीके से काम करता है नेटवर्क

जांच में पता चला कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता है. खाली वायल इकट्ठा की जाती हैं, उनमें दूसरी दवाएं भरकर दोबारा सील किया जाता है और फिर बाजार में सस्ती कीमत पर बेचा जाता है. कई बार यह कीमत असली से 40 प्रतिशत तक कम होती है, जिससे मरीजों को यह राहत लगती है, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन जाती है.

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में अस्पतालों के अंदर के लोग भी शामिल पाए गए. दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में काम करने वाले कुछ फार्मासिस्ट कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए या आधे भरे वायल बाहर ले जाते थे और उन्हें इस रैकेट को बेचते थे. पुलिस ने छापेमारी में कई वायल, खाली बॉक्स और संदिग्ध बैच नंबर बरामद किए, जो सीधे मरीजों को दी गई दवाओं से मेल खाते थे. जांच में जब पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलनी शुरू कीं, तो एक अहम नाम सामने आया, परवेज. वह पहले एक अस्पताल में फार्मासिस्ट के तौर पर काम कर चुका था और बाद में इस रैकेट का अहम हिस्सा बन गया. पुलिस के मुताबिक, परवेज ही वह कड़ी था जो अस्पताल के अंदर से दवाओं को बाहर लाने और उन्हें आगे सप्लाई करने का काम संभाल रहा था.

अस्पताल में काम करने वाले लोग शामिल

परवेज ने यह भी बताया कि उसने अस्पताल में काम करने वाले कोमल और अभय से संपर्क किया, जो उसे खाली और भरी हुई वायल उपलब्ध कराते थे. उसने बताया कि मैं खाली  वायल के 3000 दूंगा और अगर अगर वो इंजेक्शन भरा उपलब्ध करवाते हैं, तो उसके बदले में 40 हजार से 50 हजार दिया जाएगा. इस तरह 8 से 9 महीने में 10- 12 भरा वायल और 120 वायर कोमल से उसे मिला और अभय ने उसे 10 खाली और 10-12 भरा वायर दिया. जो बाद में इस अवैध नेटवर्क के जरिए बेची गईं.

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मरीज की हो गई मौत

जांच में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में सख्त प्रोटोकॉल होने के बावजूद एक बड़ी कमी थी कि खाली वायल की गिनती का कोई ठोस सिस्टम नहीं था. इसी खामी का फायदा उठाकर यह पूरा खेल चलाया गया. बाद में अस्पतालों ने निगरानी बढ़ाई, CCTV सिस्टम मजबूत किया और दवा निपटान की प्रक्रिया को और सख्त बनाया. इस रैकेट का सबसे दर्दनाक असर मरीजों पर पड़ता है. बिहार की एक महिला, जो सस्ती दवा की तलाश में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से इंजेक्शन खरीद रही थीं, इलाज के दौरान ही हालत बिगड़ने के बाद दम तोड़ गईं. बाद में परिवार को पता चला कि दवा नकली हो सकती थी. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक गैंग तक सीमित नहीं है. यह एक बड़े सिस्टम की कमजोरी को दिखाता है, जहां महंगे इलाज और आर्थिक दबाव के बीच मरीज आसानी से ठगी का शिकार बन जाते हैं.

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उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?

उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?


Roti or Rice Health Benefits : भारत में खाने की परंपरा बहुत अलग है. उत्तर भारत में जहां रोटी मुख्य खाना है, वहीं दक्षिण और पूर्व भारत में खाने में चावल का ज्यादा यूज होता है. अक्सर लोग इस बात पर बहस करते हैं कि रोटी ज्यादा हेल्दी है या चावल? कुछ लोग कहते हैं कि चावल खाने से वजन बढ़ता है, जबकि कई लोग मानते हैं कि चावल तो सदियों से हमारा मुख्य खाना रहा है और इसे खाने से लोग हेल्दी रहते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है. 

रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है

असल में रोटी और चावल के बीच कौन बेहतर है, इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह व्यक्ति के शरीर, उसकी पाचन शक्ति, लाइफस्टाइल और खाने की आदतों पर निर्भर करता है. आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इस बात को मानते हैं कि हर इंसान के लिए एक जैसी डाइट सही नहीं होती है. जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर होती है, उनके लिए चावल हल्का और आसानी से पचने वाला ऑप्शन होता है, जबकि जिनका शरीर ज्यादा एक्टिव है और जो शारीरिक मेहनत करते हैं, उनके लिए रोटी ज्यादा एनर्जी और लंबे समय तक पेट भरा रखने वाली होती है. 

चावल और गेहूं के फायदे 

1. चावल और गेहूं दोनों को ही जरूरी अनाज माना गया है, लेकिन इनके गुण और प्रभाव अलग-अलग बताए गए हैं. आयुर्वेद के अनुसार हर खाने का असर शरीर की प्रकृति (प्रकृति), पाचन शक्ति (अग्नि) और दोषों (वात, पित्त, कफ) पर पड़ता है.

 2. चावल को आयुर्वेद में मीठे टेस्ट वाला, शरीर को ठंडक देने वाला और हल्का अनाज माना गया है, जो आसानी से पच जाता है.
 
3. इसे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ तीनों को संतुलित करने में मददगार बताया गया है. इसी कारण चावल को रोज खाने योग्य खाना माना गया है, खासकर जब इसे सही तरीके से पकाया जाए और बैलेंस डाइट के साथ लिया जाए. 
 
4. वहीं रोटी को भारी, ज्यादा पोषण देने वाला और शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला अनाज कहा गया है.
 
5. यह शरीर में ताकत और एनर्जी बढ़ाने में मदद करता है और वात- पित्त दोष को शांत करता है. इसलिए गेहूं को विशेष रूप से उन लोगों के लिए अच्छा माना गया है जो शारीरिक रूप से ज्यादा एक्टिव रहते हैं या जिन्हें ज्यादा एनर्जी और ताकत की जरूरत होती है. 

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किन लोगों के लिए क्या बेहतर है?

चावल और रोटी दोनों ही अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरह से फायदेमंद होते हैं. चावल को हल्का और आसानी से पचने वाला माना जाता है, इसलिए यह बीमार लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और कमजोर पाचन शक्ति वाले व्यक्तियों के लिए बेहतर ऑप्शन है. ऐसे लोगों के लिए खिचड़ी या दाल-चावल जैसा हल्का खाना ज्यादा यूजफुल होता है क्योंकि ये पेट पर ज्यादा बोझ नहीं डालते और आसानी से पच जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रोटी, यानी गेहूं से बना खाना, ज्यादा एनर्जी और ताकत देने वाला माना जाता है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो शारीरिक मेहनत करते हैं, जैसे किसान या भारी काम करने वाले लोग, या जिनकी पाचन शक्ति मजबूत होती है. 

विज्ञान क्या कहता है?

विज्ञान के अनुसार, रोटी और चावल दोनों के अपने अलग-अलग पोषण गुण हैं, ऐसे में यह तय करना कि कौन बेहतर है, इसके लिए पूरा डाइट पैटर्न ज्यादा जरूरी होता है. गेहूं में चावल की तुलना में ज्यादा प्रोटीन और फाइबर पाया जाता है, जिससे यह पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है और एनर्जी धीरे-धीरे रिलीज करता है. वहीं चावल हल्का होता है और जल्दी पच जाता है. लेकिन जब इन्हें दाल, सब्जी और घी जैसे संतुलित आहार के साथ खाया जाता है, तो दोनों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) लगभग समान हो जाता है, यानी ब्लड शुगर पर इनका असर काफी हद तक संतुलित हो जाता है. इसलिए विज्ञान यह बताता है कि सिर्फ रोटी या चावल पर ध्यान देने की जगह पूरे खाने की क्वालिटी और बैलेंस ज्यादा फायदेमंद रखता है. 

किस अनाज से होता है शरीर को नुकसान 

आजकल हम जो अनाज खाते हैं वह बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड और रिफाइंड हो चुका है. पॉलिश किया हुआ सफेद चावल अपने छिलके और जर्म को खो देता है, जिससे उसमें फाइबर और जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं और उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बढ़ जाता है, जिसके कारण यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता है. इसी तरह मैदा, जो गेहूं को बहुत ज्यादा रिफाइन करके बनाया जाता है, उसमें भी फाइबर और पोषण लगभग खत्म हो जाते हैं, जिससे यह पाचन के लिए भारी और शरीर के लिए कम फायदेमंद हो जाता है. 

क्या है सही और बेस्ट ऑप्शन 

सही और बेस्ट ऑप्शन के लिए आप प्राकृतिक और कम प्रोसेस किए हुए अनाज चुनें, जैसे ब्राउन राइस या अनपॉलिश चावल, और होल व्हीट यानी साबुत गेहूं का आटा, क्योंकि इनमें फाइबर और पोषक तत्व अधिक मात्रा में सुरक्षित रहते हैं. इसके साथ ही खाने को हमेशा बैलेंस में लेना जरूरी है, जिसमें दाल, सब्जी और थोड़ी मात्रा में घी शामिल हो, ताकि शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें.

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खाना खाने से पहले पानी पीने के लिए क्यों कहते हैं डॉक्टर्स, इस आदत से शरीर को कितना फायदा?

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Why Doctors Recommend Drinking Water Before Meals: अक्सर आपने सुना होगा कि खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी इस आदत को अपनाने की सलाह देते हैं. लेकिन क्या यह सच में फायदेमंद है या सिर्फ एक आम धारणा? इस सवाल का जवाब समझना जरूरी है, क्योंकि यह हमारी रोजमर्रा की हेल्थ से जुड़ा हुआ है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर डॉक्टर ऐसा क्यों कहते हैं.

क्यों खाने से पहले पानी पीना चाहिए?

Harvard Health की एक रिपोर्ट के अनुसार,  असल में, खाना खाने से पहले पानी पीने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे पेट पहले से थोड़ा भर जाता है, जिससे आप कम खाना खाते हैं. हमारे पेट में कुछ ऐसे नर्व्स होते हैं जो फैलाव को महसूस करके दिमाग को संकेत भेजते हैं कि अब खाना पर्याप्त है. माना जाता है कि अगर आप पहले पानी पी लेते हैं, तो यही सिग्नल जल्दी मिलने लगता है और ओवरईटिंग से बचाव होता है.

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क्या होता है इसका असर?

कुछ छोटे और सीमित समय वाली स्टडी में यह देखा भी गया है कि जो लोग खाने से पहले एक गिलास पानी पीते हैं, वे दूसरों के मुकाबले थोड़ा कम खाना खाते हैं. खासकर जो लोग वजन घटाने की कोशिश कर रहे होते हैं, उनमें यह आदत हल्का फायदा दे सकती है. हालांकि, लंबे समय में इसका असर कितना होता है, इस पर अभी भी पुख्ता सबूत नहीं हैं.

एक और कारण यह बताया जाता है कि कई बार हमें भूख नहीं बल्कि प्यास लगती है, लेकिन हम इसे समझ नहीं पाते और कुछ खा लेते हैं. ऐसे में अगर पहले पानी पी लिया जाए, तो अनावश्यक कैलोरी लेने से बचा जा सकता है. लेकिन इस थ्योरी को लेकर भी साइंटफिक प्रमाण बहुत मजबूत नहीं हैं.

वजन कम करने में मददगार

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पानी पीने से शरीर कैलोरी बर्न करता है, क्योंकि शरीर को पानी को अपने तापमान तक गर्म करना पड़ता है. लेकिन हाल के रिसर्च बताते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत कम कैलोरी खर्च होती है, इसलिए इसे वजन घटाने का बड़ा कारण नहीं माना जा सकता. हालांकि, एक बात साफ है कि अगर आप मीठे पेय या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीते हैं, तो यह आपकी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है और वजन कम करने में मदद कर सकता है.  तो क्या खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए? इसका जवाब पूरी तरह  हां या नहीं में नहीं है. कुछ लोगों के लिए यह आदत फायदेमंद हो सकती है, खासकर अगर इससे वे कम खाते हैं या ओवरईटिंग से बचते हैं. लेकिन इसे कोई जादुई उपाय भी नहीं माना जा सकता.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बाल झड़ने और रूखी त्वचा से परेशान? ये हैं ओमेगा-3 की कमी के सिग्नल, आज ही खाएं ये चीजें

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Symptoms Of Omega-3 Deficiency: दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी यानी करीब 76  प्रतिशत लोग ओमेगा-3 की पर्याप्त मात्रा नहीं ले रहे हैं. यह वही पोषक तत्व है जिसे हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता. हैरानी की बात यह है कि अगर आप ज्यादातर लोगों से पूछें कि वे ओमेगा-3 कितना लेते हैं, तो या तो उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं होगी या फिर वे कभी-कभार लिए गए फिश ऑयल सप्लीमेंट का जिक्र करेंगे.

क्या निकला रिसर्च में

यह कोई मामूली कमी नहीं है. साल 2025 में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन और हॉलैंड एंड बैरेट के रिसर्च के एक बड़े स्टडी में सामने आया कि दुनिया की 76 प्रतिशत आबादी EPA और DHA के रिकमंड स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है.  ये दोनों ओमेगा-3 के महत्वपूर्ण रूप हैं, जो दिल की सेहत, दिमाग के विकास, सूजन को कंट्रोल करने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

किम्स हॉस्पिटल्स, बेंगलुरु की चीफ ऑफ डाइटेटिक्स Ms. Chitra BK ने TOI Health को बताया कि ओमेगा-3 फैटी एसिड्स ऐसे जरूरी पोषक तत्व हैं, जो आधुनिक डाइट में अक्सर कम पाए जाते हैं. आजकल लोग प्रोटीन, विटामिन D और आयरन की बात तो करते हैं, लेकिन ओमेगा-3 की कमी को नजरअंदाज कर देते हैं. जबकि शरीर इन्हें खुद नहीं बना सकता, इसलिए इन्हें नियमित रूप से आहार में शामिल करना जरूरी है. 

लाइफस्टाइल में बदलाव आया

उन्होंने आगे बताया कि पिछले कुछ दशकों में खानपान के तरीके में बड़ा बदलाव आया है.  पहले लोग ज्यादा मछली, मेवे और बीज खाते थे, लेकिन अब प्रोसेस्ड फूड और रिफाइंड वेजिटेबल ऑयल का इस्तेमाल बढ़ गया है. इससे शरीर में ओमेगा-6 की मात्रा ज्यादा हो गई है, जो सूजन को बढ़ावा देती है और कई क्रॉनिक बीमारियों का कारण बन सकती है. इसके अलावा, खासकर शहरी युवाओं 18-25 साल और शाकाहारी लोगों में मछली का सेवन काफी कम हुआ है, जिससे DHA और EPA की कमी और बढ़ गई है.

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इसकी कमी से क्या दिक्कत होती है

अगर शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाए, तो इसके संकेत धीरे-धीरे नजर आते हैं. जैसे त्वचा का रूखा होना, बालों का कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत, मूड में बदलाव, थकान महसूस होना और जोड़ों में दर्द. अक्सर लोग इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.

इसकी कमी को कैसे दूर करें

इस कमी को दूर करने के लिए रोजाना के खानपान में कुछ बदलाव करना जरूरी है. हफ्ते में कम से कम दो बार फैटी फिश जैसे सैल्मन, सार्डिन, मैकेरल या टूना शामिल करें. इसके अलावा अलसी के बीज, चिया सीड्स, अखरोट, ब्राजील नट्स, एवोकाडो, सोया प्रोडक्ट्स और कैनोला ऑयल भी अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर ओमेगा-3 से भरपूर फोर्टिफाइड फूड या सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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