एवोकाडो से कीवी तक… कोलन कैंसर से बचना है तो रोज खाएं ये 5 चीजें, जानें हेल्दी सीक्रेट फूड्स

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बच्चों की मौत को लगातार कैसे मात दे रहा भारत, जानें दुनिया के मुकाबले कैसे मिली यह कामयाबी?

बच्चों की मौत को लगातार कैसे मात दे रहा भारत, जानें दुनिया के मुकाबले कैसे मिली यह कामयाबी?


How India Reduced Child Mortality Rate: पिछले एक दशक में भारत ने बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसकी चर्चा अब दुनिया भर में हो रही है. संयुक्त राष्ट्र की हाल ही में जारी यूएन इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टेलिटी एस्टिमेशन 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2014 से 2024 के बीच भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 41 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. वहीं नवजात शिशु मृत्यु दर में 37 प्रतिशत की गिरावट आई है. खास बात यह है कि यह उपलब्धि वैश्विक औसत से कहीं बेहतर है, जहां इसी अवधि में बाल मृत्यु दर में 18 प्रतिशत और नवजात मृत्यु दर में 15 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. 

क्या है इस सफलता के पीछे का कारण?

एक्सपर्ट का मानना है कि यह सफलता किसी एक योजना का परिणाम नहीं, बल्कि माताओं और बच्चों के लिए लगातार मजबूत की गई स्वास्थ्य सेवाओं का नतीजा है. भारत ने पिछले कुछ वर्षों में गर्भावस्था से लेकर बच्चे के शुरुआती वर्षों तक स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता दी है. हाल ही में जारी NFHS-6 (2023-24) रिपोर्ट के अनुसार, 76.2 प्रतिशत महिलाओं को गर्भावस्था की पहली तिमाही में ही प्रसवपूर्व देखभाल मिल गई. वहीं संस्थागत प्रसव का आंकड़ा बढ़कर 90.6 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो पहले 88.6 प्रतिशत था. इसी तरह प्रशिक्षित हेल्थकर्मियों की निगरानी में होने वाले प्रसव भी 89.4 प्रतिशत से बढ़कर 91.3 प्रतिशत हो गए हैं. 

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देखभाल में काफी सुधार दर्ज किया गया?

जन्म के तुरंत बाद का समय बच्चों के लिए सबसे सेंसिटिव माना जाता है. इसी को ध्यान में रखते हुए भारत ने नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया है. देशभर में 1,100 से अधिक स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट और नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट स्थापित की गई हैं. इनके साथ 2,868 न्यूबॉर्न स्टेबिलाइजेशन यूनिट भी काम कर रही हैं, जो हर साल 15 लाख से अधिक बीमार और कमजोर नवजातों को विशेष देखभाल प्रदान करती हैं.

टीकाकरण का भी रोल

बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार का एक बड़ा कारण टीकाकरण भी रहा है. NFHS-6 के अनुसार, 12 से 23 महीने की उम्र के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण कवरेज 76.6 प्रतिशत से बढ़कर 82.6 प्रतिशत हो गया है. वहीं रोटावायरस वैक्सीन कवरेज में जबरदस्त उछाल देखा गया है, जो 36.4 प्रतिशत से बढ़कर 85.4 प्रतिशत तक पहुंच गया. पोषण के क्षेत्र में भी भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई की समस्या 35.5 प्रतिशत से घटकर 29.3 प्रतिशत रह गई है. वहीं गंभीर कुपोषण की दर भी 7.7 प्रतिशत से घटकर 5.5 प्रतिशत हो गई है.

 लाखों बच्चों की जिंदगी बचाई जा सकती है

पूर्व सदस्य (स्वास्थ्य एवं पोषण), नीति आयोग डॉ. विनोद के. पॉल का मानना है कि भारत की यह उपलब्धि सिर्फ राष्ट्रीय सफलता नहीं है, बल्कि दुनिया के विकासशील देशों के लिए एक उदाहरण बन चुकी है. उनका कहना है कि मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था, फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका और तकनीक के बेहतर इस्तेमाल ने भारत को बाल मृत्यु दर कम करने में बड़ी सफलता दिलाई है. भारत की यह उपलब्धि दिखाती है कि सही नीतियों और निरंतर प्रयासों से लाखों बच्चों की जिंदगी बचाई जा सकती है और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर स्वास्थ्य दिया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कोरोना के बाद लोगों में तेजी से बढ़ी यह खतरनाक बीमारी, NFHS-6 के आंकड़े उड़ा देंगे होश

कोरोना के बाद लोगों में तेजी से बढ़ी यह खतरनाक बीमारी, NFHS-6 के आंकड़े उड़ा देंगे होश


Diabetes Cases Rising Rapidly In India: कोरोना महामारी के बाद भारत में लोगों की लाइफस्टाइल में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. घरों में ज्यादा समय बिताना, फिजिकल एक्टिविटी में कमी और खराब खानपान की आदतों ने स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है. अब नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 की ताजा रिपोर्ट ने एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने हेल्थ एक्सपर्ट की चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट के मुताबिक देश में मोटापा और हाई ब्लड शुगर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जो आने वाले समय में डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारी का बड़ा कारण बन सकते हैं. 

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी NFHS-6 सर्वे 2023-24 के दौरान किया गया था. इसमें मणिपुर को छोड़कर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 715 जिलों के करीब 6.79 लाख परिवारों को शामिल किया गया. रिपोर्ट स्वास्थ्य, पोषण और जनसंख्या से जुड़े कई अहम संकेतकों की जानकारी देती है. 

तेजी से बढ़ रही है डायबिटीज की दिक्कत

NFHS-6 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 15 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के बीच डायबिटीज. तेजी से बढ़ रही है. सर्वे में उन लोगों को शामिल किया गया, जिनका ब्लड शुगर लेवल 141 mg/dl से अधिक था या जो इसे नियंत्रित करने के लिए नियमित रूप से दवाएं ले रहे थे. रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में इस बीमारी के मामलों में करीब 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. पुरुषों की बात करें तो देश में 15 साल से अधिक उम्र के लगभग 56 करोड़ पुरुष हैं.  इनमें से करीब 11.7 करोड़ पुरुष डायबिटीज से प्रभावित हैं. इससे पहले 2021 में यह संख्या लगभग 8.7 करोड़ थी.  NFHS-5 में जहां 15.6 प्रतिशत पुरुष इस बीमारी से पीड़ित थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 20.9 प्रतिशत तक पहुंच गया है. महिलाओं में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. वर्तमान में देश की करीब 7.12 करोड़ महिलाएं मधुमेह से जूझ रही हैं, जबकि तीन साल पहले यह संख्या लगभग 5.4 करोड़ थी. महिलाओं में डायबिटीज की दर 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत हो गई है, जो 4.3 प्रतिशत की उल्लेखनीय बढ़ोतरी को दर्शाती है.

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मोटापे की बढ़ रही है दिक्कत

रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में मोटापा और ओवरवेट होने की समस्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वर्ष 2019-21 में जहां 24 प्रतिशत महिलाएं ओवरवेट या मोटापे की शिकार थीं, वहीं 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 30.7 प्रतिशत पहुंच गया. शहरी क्षेत्रों में स्थिति और ज्यादा चिंताजनक है, जहां 42.8 प्रतिशत महिलाएं ओवरवेट या मोटापे से जूझ रही हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 25.5 प्रतिशत है. पुरुषों में भी यही रुझान देखने को मिला. 2019-21 में 22.9 प्रतिशत पुरुष ओवरवेट या मोटापे की कैटेगरी में थे, जो 2023-24 में बढ़कर 27.3 प्रतिशत हो गए. ग्रामीण क्षेत्रों में 23 प्रतिशत पुरुष, जबकि शहरी इलाकों में 36.3 प्रतिशत पुरुष ओवरवेट या मोटापे से प्रभावित पाए गए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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Explained: IVF क्लीनिक में बच्चा बदली का खुलासा! कैसे कोख की जगह कांच की प्लेट पर बनता भ्रूण?

Explained: IVF क्लीनिक में बच्चा बदली का खुलासा! कैसे कोख की जगह कांच की प्लेट पर बनता भ्रूण?


गुरुग्राम के राहुल और मीनू राठौर के लिए 9 जनवरी 2026 की सुबह सबसे खुशी का दिन था. सालों की कोशिशों के बाद IVF की मदद से मीनू ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था. लेकिन जैसे-जैसे बच्चियां बड़ी होने लगीं तो पता चला कि बच्चियों का रंग-रूप न तो राहुल से और न ही मीनू से मिलता था. उन्होंने DNA टेस्ट कराया तो रिपोर्ट मैच नहीं हुई. यानी क्लिनिक ने उनका भ्रूण किसी और कपल के भ्रूण से बदल दिया था. जानेंगे क्या है मामला और IVF की दुनिया…

कोर्ट ने क्या कहा और आगे क्या?

राठौर दंपती ने दिल्ली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट ने पुलिस को केस दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया. राहुल ने मांग की कि क्लिनिक के IVF रिकॉर्ड, भ्रूण से जुड़े दस्तावेज, लैब डेटा, इलेक्ट्रॉनिक डेटा और CCTV फुटेज को जांच के लिए सुरक्षित रखा जाए. लेकिन अब तक पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है. राहुल का सवाल था, ‘हमारे अपने बच्चे कहां हैं? हम वहां अपने बच्चों के लिए गए थे.’ मीनू ने कहा, ‘जिस तरह मैं अपने बच्चे की तलाश कर रही हूं, उसी तरह जिस मां का बच्चा मेरे पास है, वह भी अपने बच्चे को तरस रही होगी. मैं इन बच्चियों को दूध भी नहीं पिला पाती.’

इस बीच मीनू ने खुलासा किया कि उन्हें देश-विदेश के कई कपल्स के फोन आ रहे हैं, जिनके साथ भी IVF क्लिनिकों ने इसी तरह का धोखा किया है. इससे पहले नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) ने एक दिल्ली क्लिनिक पर 1.5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था.

आखिर IVF होता क्या है और कैसे किया जाता है?

IVF का पूरा नाम है ‘इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन.’ विट्रो का मतलब होता है ‘कांच का’, यानी यह प्रोसेस शरीर के अंदर नहीं, बल्कि कांच की पेट्री डिश (एक तरह की लैब की प्लेट) में होती है. इसके लिए महिला के अंडाशय से एग्ज निकाले जाते हैं. फिर लैब में इन अंडों को पुरुष के स्पर्म के साथ मिलाया जाता है. इस मिलन के बाद जो भ्रूण बनता है, उसे कुछ दिनों तक लैब में पाला जाता है और फिर महिला के गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है. पूरी प्रोसेस में करीब 2 से 3 हफ्ते लगते हैं.

IVF क्यों कराते हैं?

इंदिरा IVF के मुताबिक, जब कोई कपल एक साल तक कोशिश करने के बावजूद बच्चा पैदा नहीं कर पाता, तो उसे बांझपन कहते हैं. IVF इस बांझपन का सबसे कारगर इलाज है. इसका इस्तेमाल तब होता है जब:

  • महिला की फैलोपियन ट्यूब (जो अंडे को गर्भाशय तक पहुंचाती है) बंद या खराब हो.
  • ओवुलेशन (अंडे निकलने की प्रक्रिया) में दिक्कत हो.
  • एंडोमेट्रियोसिस (गर्भाशय के बाहर ऊतकों का बढ़ना) हो.
  • पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या या गुणवत्ता कम हो.
  • महिला की उम्र 40 से ज्यादा हो.
    किसी जेनेटिक बीमारी को रोकना हो.

IVF सेंटर की अंदर की तस्वीर क्या है?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, IVF लैब में सुरक्षा की कई लेयर्स होती हैं. लेकिन गुरुग्राम का मामला बताता है कि अगर इन सुरक्षा उपायों को नज़रअंदाज़ किया जाए, तो कितना बड़ा नुकसान हो सकता है:

  • लैब के सख्त नियम: IVF लैब को फर्टिलिटी सेंटर का दिल कहा जाता है. यहां अंडे, शुक्राणु और भ्रूण को संभाला जाता है. इस लैब में तापमान, हवा की क्वालिटी और नमी को बहुत सटीकता से कंट्रोल किया जाता है, क्योंकि शुरुआती दौर में भ्रूण बहुत नाजुक होते हैं.
  • इलेक्ट्रॉनिक विटनेसिंग सिस्टम: यह सबसे अहम सुरक्षा उपाय है. यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है जो हर मरीज के अंडों, शुक्राणुओं और भ्रूणों को हर स्टेज पर ट्रैक करती है. अगर किसी भी स्टेज पर कोई गड़बड़ी या बेमेल होता है, तो तुरंत अलर्ट आ जाता है और एम्ब्रियोलॉजिस्ट उसकी जांच करते हैं.
  • आर्ट एक्ट 2021 कानून: भारत सरकार ने 2021 में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट पास किया था. इस कानून का मकसद ART क्लीनिकों और बैंकों को रेगुलेट करना है, ताकि सुरक्षित और बेहतर तरीके से काम किया जा सके. इसके तहत हर ART क्लिनिक रजिस्टर्ड होना चाहिए. भ्रूण ट्रांसफर से पहले इलेक्ट्रॉनिक बारकोडिंग और दो इंडिपेंडेंट एम्ब्रियोलॉजिस्ट के अनिवार्य हस्ताक्षर जरूरी हैं. मरीजों की पहचान और सैंपल ट्रैकिंग की प्रोसेस सख्त है.

IVF सेंटर में बच्चों की अदला-बदली कितना मुमकिन है?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मॉडर्न टेक्नोलॉजी और सख्त नियमों की वजह से एक अच्छी क्लिनिक में बच्चों की अदला-बदली होने की संभावना बहुत कम है. इलेक्ट्रॉनिक बारकोडिंग, डबल-वेरिफिकेशन और रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम ऐसे उपाय हैं जो गलती की गुंजाइश को लगभग खत्म कर देते हैं. लेकिन गुरुग्राम का मामला साबित करता है कि ‘लगभग नामुमकिन’ का मतलब ‘पूरी तरह असंभव’ नहीं है. जब क्लिनिक नियमों को नजरअंदाज करते हैं, जब लापरवाही होती है या जब सिस्टम में सेंध लगाई जाती है, तो ऐसी घटनाएं हो सकती हैं.

भारत में कितने लोग IVF अपनाते हैं?

अपोलो फर्टिलिटी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 1.6 करोड़ से 2.2 करोड़ कपल बांझपन से पीड़ित हैं. हर साल सिर्फ 3-4 लाख IVF साइकल होते हैं और सिर्फ 1.5-2.2% कपल ही IVF तक पहुंच पाते हैं. यानी लगभग 98% बांझ कपल IVF का सहारा नहीं ले पाते.

WHO के मुताबिक, भारत में बांझपन से पीड़ित 3.9-16.8% कपल्स में से 8% को IVF जैसी महंगी तकनीक की जरूरत होती है. IVF का सक्सेस रेट 30% से 55% के बीच है. 35 साल से कम उम्र की महिलाओं में यह 65% तक हो सकती है, जबकि 40 से ज्यादा उम्र में यह 5-10% तक गिर जाती है.

एक IVF साइकल की कीमत 1.2 लाख रुपए से 3 लाख रुपए तक होती है. अगर एक खास तकनीक ICSI की जरूरत हो, तो 15,000-40,000 रुपए एक्सट्रा लगते हैं. सरकारी अस्पतालों में भी यह 1.1 लाख रुपए से कम नहीं है.

भारत किस तबके के लोग IVF अपनाते हैं?

IVF स्पेशलिस्ट और गायनोकॉलोजिस्ट डॉ. निताशा गुप्ता के मुताबिक, 5 तरह के कपल्स यह प्रोसेस करवाते हैं:

  • हाई-क्लास ग्रुप: IVF महंगा है, इसलिए ज्यादातर अमीर लोग ही इसे अपना पाते हैं. एक कपल के लिए 1.5-3 लाख रुपए का खर्च उठाना आसान नहीं है.
  • शहरी और पढ़े-लिखे लोग: तमिलनाडु में सबसे ज्यादा IVF क्लीनिक हैं, क्योंकि वहां प्रति व्यक्ति आय ज्यादा है और महिला शिक्षा का स्तर ऊंचा है.
  • मिडिल क्लास: 90% कपल IVF के खर्च में कर्ज में डूब जाते हैं. 57% कपल IVF इसलिए नहीं कराते क्योंकि यह बहुत महंगा है.
  • 30-35 साल की उम्र के कपल: ज्यादातर IVF कराने वाले कपल की उम्र 30-35 साल के बीच होती है.
  • डिंक कपल यानी डबल इनकम, नो किड्स: जो जानबूझकर बच्चे पैदा करने में देरी करते हैं और बाद में IVF का सहारा लेते हैं.

IVF का बाजार भारत में 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का हो चुका है. अकेले इंदिरा IVF कंपनी की सालाना कमाई 1,500 करोड़ रुपए से ज्यादा है.

क्यों बढ़ रहा है IVF का चलन?

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के मुताबिक, IVF का चलन बढ़ने की 4 बड़ी वजहें हैं:

  • बांझपन: बदलती जीवनशैली, तनाव, PCOS, STDs और एंडोमेट्रियल TB जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. शहरों में रहने वाले कपल्स में यह समस्या और भी गंभीर है.
  • देर से शादी: अब लोग पढ़ाई-लिखाई और करियर पर फोकस करते हैं, इसलिए शादी और बच्चे पैदा करने की उम्र बढ़ गई है. 40 साल के बाद प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है, इसलिए लोग IVF का सहारा लेते हैं.
  • बढ़ती जागरूकता: पहले लोग बांझपन छिपाते थे, लेकिन अब इसके बारे में खुलकर बात होती है. IVF के बारे में जानकारी आसानी से मिल जाती है.
  • बेहतर टेक्नोलॉजी: IVF की सफलता दर पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है. नई-नई तकनीकें आ रही हैं जो इसे और भी कारगर बना रही हैं.

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दवा कंपनियों पर कसा शिकंजा, सरकार ने खत्म की कफ सिरप को मिलने वाली दशकों पुरानी छूट

दवा कंपनियों पर कसा शिकंजा, सरकार ने खत्म की कफ सिरप को मिलने वाली दशकों पुरानी छूट


Cough Syrup New Rules in India: जब भी बच्चे या बड़े बीमार पड़ते हैं, चाहे उन्हें खांसी हो, बुखार हो या सर्दी तो सबसे पहले सिरप (Syrup) यानी पीने वाली दवाइयों का ही इस्तेमाल होता है. ये दवाएं पीने में आसान होती हैं, इसलिए हर घर में आसानी से मिल जाती हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि जो सिरप आप अपने बच्चे को दे रहे हैं, वह पूरी तरह से सुरक्षित है या नहीं? इसी सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए और मिलावटी दवाओं पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने और अहम फैसला लिया है.

सरकार ने कफ सिरप और अन्य सभी लिक्विड दवाओं को दशकों से मिल रही खास छूट को पूरी तरह से खत्म कर दिया है. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 9 जून 2026 को सरकारी गजट में नया नोटिफिकेशन जारी किया है, जिससे दवा बनाने वाली कंपनियों पर अब पहले से कहीं ज्यादा सख्त नियम लागू होंगे.

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क्या है सरकार का नया फैसला?
सरकार ने ड्रग्स रूल्स 1945 में पांचवां संशोधन किया है. इसके तहत दवाओं की खास लिस्ट Schedule K में से सिरप शब्द को हटा दिया गया है. इस फैसले को आसान शब्दों में समझें तो अब सिरप बनाने वाली कंपनियों को मनमानी करने का मौका नहीं मिलेगा. उन्हें अपनी दवा बाजार में उतारने से पहले कई सख्त परीक्षणों और नियमों से गुजरना होगा. नए नियम के तहत अब भारत में बनने वाले हर कफ सिरप और अन्य लिक्विड दवाओं को उसी सख्त प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिससे टैबलेट्स और इंजेक्शन गुजरते हैं.

क्या था Schedule K और इससे क्या मिलती थी छूट?
Schedule K भारतीय दवा कानून की ऐसी लिस्ट थी, जिसमें शामिल दवाओं को कुछ खास सरकारी नियमों से छूट दी जाती थी.

लाइसेंस की छूट: इस सूची में होने के कारण सिरप बनाने और बेचने के लिए कंपनियों को कुछ खास तरह के कड़े लाइसेंसिंग नियमों से राहत मिली हुई थी.
लेबलिंग और पैकेजिंग: सिरप की बोतलों पर लगने वाले लेबल और उसकी पैकिंग को लेकर नियम थोड़े ढीले थे.
आसान प्रॉडक्शन: इस छूट का फायदा उठाकर कई छोटी और गैर-मानक कंपनियां भी आसानी से सिरप बनाकर बाजार में बेच रही थीं, जिनकी क्वालिटी चेकिंग उतनी सख्ती से नहीं होती थी.
सिरप शब्द के इस सूची से बाहर होने का सीधा मतलब यह है कि यह वीआईपी ट्रीटमेंट अब खत्म हो गया है.

सरकार को क्यों उठाना पड़ा यह कदम?

इस सख्त फैसले के पीछे कुछ बेहद दुखद और गंभीर घटनाएं हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय दवा उद्योग की साख पर सवाल खड़े कर दिए थे. साल 2022 और 2023 के दौरान गाम्बिया और उज्बेकिस्तान जैसे देशों में कई बच्चों की जान चली गई थी. जांच में पता चला कि इसके पीछे कथित तौर पर भारत की कंपनियों Marion Biotech और Maiden Pharmaceuticals के बनाए गए कफ सिरप जिम्मेदार थे. इन सिरप में जहरीले केमिकल पाए गए थे.

इन घटनाओं के बाद भारत सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) पूरी तरह से अलर्ट मोड में आ गए. उन्होंने दवा कंपनियों पर निगरानी बढ़ा दी और यह तय किया कि ऐसी घटना दोबारा न हो. यह नया संशोधन उसी दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है.

आम जनता और मरीजों को क्या होगा फायदा?

इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा सीधे तौर पर आम आदमी और मरीजों को होने वाला है. इस कदम के बाद बाजार से घटिया और मिलावटी कफ सिरप पूरी तरह गायब हो जाएंगे. अब हर सिरप को सख्त क्वालिटी टेस्ट से गुजरना होगा, जिससे खतरा कम होगा. दवा की बोतल पर अब ज्यादा साफ और सटीक जानकारी लिखी होगी, जिससे एक्सपायरी डेट और साइड इफेक्ट्स समझना आसान होगा.

दवा कंपनियों पर क्या पड़ेगा असर?
इस बदलाव का सीधा असर दवा बनाने वाली कंपनियों पर पड़ेगा. उन्हें अब Syrup बनाने, पैक करने और बेचने में ज्यादा नियमों का पालन करना होगा. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इससे बाजार में मिलावटी और घटिया लिक्विड दवाओं पर लगाम लगेगी और मरीजों को ज्यादा सुरक्षित दवाएं मिलेंगी.

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