सावधान! पैरों में झुनझुनी और सुन्नपन कहीं ‘डायबिटिक न्यूरोपैथी’ तो नहीं? जानें क्या कहते हैं ए

सावधान! पैरों में झुनझुनी और सुन्नपन कहीं ‘डायबिटिक न्यूरोपैथी’ तो नहीं? जानें क्या कहते हैं ए


Why Do Diabetics Feel Tingling In Feet: डायबिटीज के मरीजों में अक्सर एक समस्या धीरे-धीरे सामने आती है, जिसे लोग शुरुआत में गंभीरता से नहीं लेते. हाथों और पैरों में झुनझुनी, जलन या सुन्नपन, कई लोग इसे थकान या उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं.  लेकिन असल में यह शरीर का एक अहम संकेत होता है, जिसे अनदेखा करना खतरनाक साबित हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉ. क्या कहते हैं. 

क्या होता है डायबिटीज का नसों पर असर

डायबिटीज का असर सिर्फ शुगर लेवल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह नसों को भी नुकसान पहुंचाता है. जब लंबे समय तक ब्लड शुगर हाई रहता है, तो यह नसों तक पोषण पहुंचाने वाली छोटी ब्लड बेसल्स को प्रभावित करता है. इससे नसें ठीक से काम नहीं कर पातीं और इस स्थिति को डायबिटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी कहा जाता है. इसके शुरुआती लक्षणों में झुनझुनी, जलन, सुन्नपन या रात में अचानक दर्द महसूस होना शामिल है. कई मरीज बताते हैं कि उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे रूई पर चल रहे हों या पैरों में तेज चुभन हो रही हो. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह समस्या बढ़कर शरीर की कमजोरी, संतुलन बिगड़ने और यहां तक कि पैरों में घाव तक पहुंच सकती है. 

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किस कमी के कारण होती है दिक्कत

इस समस्या को और जटिल बनाता है विटामिन B12 की कमी. खासतौर पर वे मरीज जो लंबे समय से मेटफॉर्मिन दवा ले रहे हैं, उनमें B12 की कमी का खतरा ज्यादा होता है. यह दवा ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद करती है, लेकिन समय के साथ शरीर में B12 के अब्जॉर्व को कम कर सकती है. समस्या यह है कि विटामिन B12 की कमी के लक्षण जैसे झुनझुनी, सुन्नपन, कमजोरी और थकान, डायबिटिक न्यूरोपैथी से काफी मिलते-जुलते होते हैं. ऐसे में बिना जांच के यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि असली वजह क्या है. कई बार दोनों समस्याएं एक साथ भी होती हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

एक्सपर्ट का मानना है कि इस स्थिति में सबसे जरूरी है समय पर पहचान और इलाज. Dr. V Mohan ने TOI को बताया कि मरीजों को दर्द बढ़ने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि शुरुआती लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. इलाज की शुरुआत ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने से होती है. इसके साथ ही विटामिन B12 की जांच कराना और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लेना भी जरूरी है. कई मामलों में डॉक्टर विटामिन B कॉम्प्लेक्स दवाएं देते हैं, जो नसों को मजबूत करने और लक्षणों को कम करने में मदद करती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इन हरकतों से खराब हो जाएगा आपका बोन मैरो! जल्द कर लें सुधार वरना यमराज से होगी मुलाकात

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Bone Marrow Health tips : हमारी हड्डियों के अंदर एक खास टिशू होता है जिसे बोन मैरो या अस्थि मज्जा कहते हैं. यह मुख्य रूप से लंबी हड्डियों (जैसे जांघ की हड्डी और श्रोणि की हड्डी) और रीढ़ की हड्डियों के अंदर पाया जाता है. इसे हम सिर्फ हड्डियों के अंदर भरा हुआ स्पंजी टिशू न समझते हैं, लेकिन यह शरीर का सबसे जरूरी हिस्सा है.

बोन मैरो का सबसे बड़ा  काम ब्लड फोर्मेशन है. यह काम हेमेटोपोएटिक स्टेम कोशिकाओं से किया जाता है. यह सेल्स डिवाइड होकर लाल रेड ब्लड सेल्स,व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स पैदा करते हैं. यही वजह है कि बोन मैरो को स्वस्थ रखना हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है. लेकिन हमारी डेली की आदतों के कारण ये खराब भी हो सकती हैं, ऐसें में आइए आज हम आपको बताते हैं कि किन हरकतों से आपका बोन मैरो खराब हो सकता है. 

 बोन मैरो के जरूरी काम क्या होते हैं?

1.  रेड ब्लड सेल्स बनाना (RBCs) – इनका काम ऑक्सीजन को पूरे शरीर में पहुंचाना है. इनकी कमी होने पर थकान, कमजोरी और एनीमिया जैसी समस्याएं होती हैं. 

2. व्हाइट ब्लड सेल्स (WBCs) – ये हमारी इम्यूनिटी की रक्षा करता हैं. संक्रमण, बैक्टीरिया और वायरस से लड़ती हैं. 

3. प्लेटलेट्स (Platelets) बनाना – चोट लगने पर ब्लड को थक्का बनने में मदद करती हैं. अगर इनकी संख्या कम हो जाए तो छोटे घाव भी बहुत खून बहने लगते हैं. 

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किन हरकतों से आपका बोन मैरो खराब हो सकता है?
 
1. धूम्रपान और तंबाकू – धूम्रपान और तंबाकू में बहुत सारे खतरनाक केमिकल होते हैं. ये  केमिकल बोन मैरो में ब्लड सेल्स  के निर्माण को कम कर देते हैं, जिससे रेड ब्लड सेल्स और वाइट ब्लड सेल्स पर्याप्त नहीं बन पाती है.

2. ज्यादा शराब का सेवन – बहुत ज्यादा शराब पीने से रेड ब्लड सेल्स का निर्माण दब जाता है. इससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी, एनीमिया, और थकान जैसे समस्याएं हो जाती हैं. लंबे समय तक शराब का सेवन बोन मैरो की कोशिकाओं को सीधे प्रभावित कर सकता है. 

3. केमिकल का संपर्क – कीटनाशक, बेंजीन और अन्य औद्योगिक रसायन सीधे बोन मैरो को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इससे ब्लड सेल्स का प्रोडक्शन कम हो जाता है. विशेष रूप से अगर केमिकल लंबे समय तक शरीर में प्रवेश करें, तो गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. 

4. पोषण की कमी – विटामिन D, कैल्शियम और आयरन की कमी से हड्डियां कमजोर होती हैं और बोन मैरो सही से काम नहीं करता हैं. जिससे रेड ब्लड सेल्स की संख्या कम हो जाती है. थकान, कमजोरी और एनीमिया हो सकता है. लंबे समय तक पोषण की कमी से बोन मैरो की कार्यक्षमता इतनी कमजोर हो सकती है कि ब्लड कैंसर जैसी गंभीर समस्या भी हो सकती है. 

5. संक्रमण – कुछ संक्रमण जैसे हेपेटाइटिस और HIV सीधे बोन मैरो की कोशिकाओं पर हमला कर सकते हैं. इससे ब्लड सेल्स की संख्या कम हो जाती है और इम्यूनिटी कमजोर होती है. 

6. दवाइयां और स्टेरॉयड ज्यादा लेना – बिना डॉक्टर की सलाह के स्टेरॉयड या अन्य दवाइयां लेने से बोन मैरो की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और लंबे समय में गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है. 

बोन मैरो को हेल्दी कैसे रखें?

बोन मैरो को हेल्दी रखने के लिए बैलेंस डाइट लें, जिसमें विटामिन और प्रोटीन पर्याप्त हों, धूम्रपान और शराब से बचें, और खतरनाक केमिकल से दूर रहें. इसके साथ ही नियमित एक्सरसाइज करें, संक्रमण से बचने के लिए साफ-सफाई और टीकाकरण का ध्यान रखें, और अनियंत्रित दवाइयां न लें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कसरत ऐसी करो कि फूलने लगे सांस, इससे 60% कम हो जाता है मौत का खतरा!

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Does Intense Exercise Lower Death Risk: अगर आप रोजाना कुछ मिनट भी ऐसी कसरत करते हैं, जिसमें आपकी सांस फूलने लगे, तो यह आपके शरीर के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है. यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, ऐसी तेज फिजिकल एक्टिविटी कई गंभीर बीमारियों के खतरे को कम कर सकती है. रिसर्च में पाया गया कि जो लोग रोज कुछ मिनट भी तेज कसरत करते हैं. जैसे तेज चलना, सीढ़ियां चढ़ना या दौड़ना, उनमें आर्थराइटिस, हार्ट डिजीज और डिमेंशिया जैसी बीमारियों का खतरा काफी कम होता है. खास बात यह है कि इसके लिए घंटों जिम में पसीना बहाना जरूरी नहीं, बल्कि छोटे-छोटे एक्टिव मूवमेंट भी असर दिखाते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इस स्टडी के प्रमुख रिसर्चर  प्रोफेसर Minxue Shen के अनुसार, ऐसी कसरत शरीर में ऐसे बदलाव लाती है, जो हल्की-फुल्की एक्सरसाइज से नहीं मिलते. जब आप इतनी तेजी से एक्टिव होते हैं कि सांस फूलने लगे, तो दिल ज्यादा प्रभावी तरीके से खून पंप करता है, ब्लड वेसल्स ज्यादा लचीली बनती हैं और शरीर ऑक्सीजन का बेहतर इस्तेमाल करने लगता है.

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इन लोगों को किया गया शामिल 

रिसर्च में करीब 96 हजार लोगों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें देखा गया कि उनकी रोजमर्रा की एक्टिविटी और खासकर तेज कसरत का उनकी सेहत पर क्या असर पड़ता है. इसके लिए प्रतिभागियों को एक हफ्ते तक खास डिवाइस पहनाई गई, जिससे उनकी गतिविधियों को सटीक तरीके से रिकॉर्ड किया गया. इसके बाद लगभग सात साल तक उनकी हेल्थ को ट्रैक किया गया. इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग ज्यादा विगोरस एक्टिविटी करते थे, उनमें कई बीमारियों का खतरा कम था. खास तौर पर डिमेंशिया का खतरा 63 प्रतिशत तक कम, टाइप-2 डायबिटीज का खतरा 60 प्रतिशत तक कम और मौत का खतरा 46 प्रतिशत तक कम पाया गया.

इन बीमारियों में मायने रखती है स्पीड

रिसर्च में यह भी सामने आया कि अलग-अलग बीमारियों पर इसका असर अलग तरीके से होता है. जैसे आर्थराइटिस और सोरायसिस जैसी सूजन से जुड़ी बीमारियों में एक्सरसाइज की तीव्रता ज्यादा मायने रखती है, जबकि डायबिटीज और लिवर डिजीज में एक्सरसाइज की मात्रा और तीव्रता दोनों अहम होती हैं. यह रिसर्च बताती है कि दिन में कुछ मिनट की तेज कसरत भी आपकी सेहत में बड़ा बदलाव ला सकती है.  हालांकि, एक्सपर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि हर किसी के लिए तेज कसरत सही नहीं होती. खासकर बुजुर्गों या पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार ही एक्सरसाइज करनी चाहिए और जरूरत पड़े तो डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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रिश्ते में हो रही प्यार की कमी? ये 5 फल बॉडी में भर देंगे टेस्टोस्टेरोन

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बदलती लाइफस्टाइल और भागदौड़ भरी जिंदगी में शायद ही कोई अपनी सेहत का सही ध्यान रख पाता है, ऐसे में अगर टेस्टोस्टेरोन को मेंटेन रखने की बात करें, तो लोग इसे अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, टेस्टोस्टेरोन, पुरुष शरीर का एक प्रमुख सेक्स हार्मोन है, हालांकि इसे मुख्य रूप से मेल हार्मोन माना जाता है लेकिन यह महिलाओं में भी कुछ मात्रा में मौजूद होता है.

यह मुख्य रूप से पुरुषों के वृषण (testicles) और महिलाओं के अंडाशय (ovaries) में बनता है, जो उनके शारीरिक विकास में अहम भूमिका निभाता है, पुरुषों में यह शुक्राणु (sperm) उत्पादन, हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाने तथा यौन इच्छा को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वहीं महिलाओं में यह ओवरी के कार्यों को बनाए रखने, सेक्स ड्राइव और यौन इच्छा को नियंत्रित करने तथा ऊर्जा स्तर को संतुलित बनाए रखने में सहायक होता है.

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आइए जानें उन 5 फलों के बारे में, जो आपकी बॉडी में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ाने में मदद कर सकते हैं

1. एवोकाडो
जो एक पौष्टिक सुपरफूड है, जो बोरॉन और मैग्नीशियम से भरपूर होता है, यह शरीर में टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने में मदद कर सकता है, बोरॉन खासतौर पर सेक्स हार्मोन के स्तर को बढ़ाने के लिए जाना जाता है, हालांकि एवोकाडो खाना सुरक्षित है, लेकिन बिना डॉक्टर की सलाह के बोरॉन सप्लीमेंट लेने से बचें.

2. जामुन और चेरी 
यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं, जो शरीर में सूजन और नुकसान से बचाते हैं, ये टेस्टोस्टेरोन को बढ़ाने में भी मदद कर सकते हैं, आप इन्हें सीधे खा सकते हैं या जूस बनाकर पी सकते हैं, लेकिन पैकेट वाले जूस की जगह ताजे फल ही चुनें.

3.अनार
यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाता है, यह हार्मोन बैलेंस में मदद करता है और टेस्टोस्टेरोन लेवल को सपोर्ट कर सकता है.

4. केला
केले में मौजूद पोषक तत्व शरीर की ऊर्जा बढ़ाने के साथ हार्मोन प्रोडक्शन में मदद करते हैं, यह वर्कआउट के बाद खाने के लिए भी एक बेहतरीन ऑप्शन है.

5.अंगूर
इसमें में पाया जाने वाला रेस्वेराट्रोल शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करता है और टेस्टोस्टेरोन को सपोर्ट कर सकता है.

तो ये थे कुछ फल, जिन्हें अपनी डाइट में शामिल करके आप अपनी अंदरूनी ऊर्जा बढ़ा सकते हैं, इससे आपकी सेहत भी बेहतर होगी और रिश्तों में चल रही छोटी-मोटी अनबन भी धीरे-धीरे ठीक हो सकती है, ताकि आप एक खुशहाल और संतुलित जीवन जी सकें.

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चेकअप में सबकुछ नॉर्मल, फिर भी दिनभर रहती है सुस्ती और थकान? जानें दिक्कत की असली वजह

चेकअप में सबकुछ नॉर्मल, फिर भी दिनभर रहती है सुस्ती और थकान? जानें दिक्कत की असली वजह


अक्सर कई लोग अलग ही प्रकार की बेचैनी, थकान और सुस्ती से ग्रस्त रहते हैं. ऐसा महसूस होता है मानो शरीर में जान ही नहीं है. पूरी नींद सोने के बाद भी आलस और थकान बनी रहती है, जबकि अगर चेकअप कराओ तो रिपोर्ट्स एकदम नॉर्मल आती हैं.

KIMS अस्पताल के प्रमुख और वरिष्ठ सलाहकार डॉ. एस.एम. फयाज बताते हैं – हमेशा थकान महसूस होना, चक्कर आना, कम नींद आना, बिना किसी समस्या के शरीर में दर्द, सोचने-समझने की शक्ति कम महसूस होना, यह सब कोई सामान्य चीजें नहीं हैं, इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि यह किसी गंभीर समस्या की चेतावनी हो सकती हैं. हमारा शरीर रातोंरात किसी गंभीर समस्या से ग्रस्त नहीं होता, बल्कि यह किसी गंभीर बीमारी के आने से पहले धीरे-धीरे संकेत देता है, ये संकेत ज्यादा गंभीर तो नहीं होते, लेकिन निरंतर जरूर होते हैं.

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जब आप ठीक महसूस नहीं करते, फिर भी रिपोर्ट सामान्य क्यों आती है?

अधिकतर टेस्ट बड़ी या स्पष्ट बीमारियों को पकड़ने के लिए बनाए जाते हैं, न कि शरीर के शुरुआती लक्षणों को पहचानने के लिए. डॉ. फयाज के अनुसार, शरीर की कई समस्याएं जैसे मेटाबॉलिज्म में बदलाव, पाचन की दिक्कत, थायरॉइड की समस्या और इंसुलिन रेजिस्टेंस-ये सब शुरुआती स्तर पर नजर नहीं आतीं. इसका सीधा मतलब यह है कि थायरॉइड और ब्लड शुगर दिनभर घट-बढ़ सकते हैं, लेकिन उनके साफ लक्षण दिखाई नहीं देते. ICMR के अनुसार मेटाबॉलिक समस्याएं धीरे-धीरे और बिना शोर के बढ़ती हैं. वहीं NIH भी मानता है कि कई बार बड़ी बीमारी का पता चलने से पहले ही शरीर के अंदर बदलाव शुरू हो जाते हैं, यही कारण है कि इंसान बीमार महसूस करता है, लेकिन उसकी रिपोर्ट सामान्य आती है.

छिपी हुई वे समस्याएं जिन्हें आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है

डॉ. फयाज बताते हैं कि कुछ सामान्य समस्याएं, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जैसे विटामिन B12 और विटामिन D की कमी, थायरॉइड में बदलाव और सही से नींद न आना. ये बदलाव छोटे होते हैं, लेकिन शरीर पर काफी असर डालते हैं. जैसे विटामिन की कमी से कमजोरी और मूड पर असर पड़ता है, पानी की कमी से थकान और सिरदर्द हो सकता है, और नींद पूरी न होने से शरीर में ऊर्जा की कमी हो जाती है, जब ये समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती हैं, तब जाकर इनके लक्षण साफ तौर पर महसूस होने लगते हैं.

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बार-बार टेस्ट से बेहतर जीवनशैली सुधारें और स्वस्थ रहें

ऐसे लक्षणों में बार-बार टेस्ट कराने से बेहतर है जीवनशैली पर ध्यान दें. डॉ. फयाज के अनुसार, नींद, खान-पान, पानी, व्यायाम और तनाव का सही संतुलन रखना ज्यादा फायदेमंद होता है. साथ ही, इन लक्षणों को पहचानना भी जरूरी है. कौन से लक्षण कब होते हैं, क्यों होते हैं और कितनी देर तक रहते हैं. छोटे-छोटे सुधार जैसे अच्छी नींद, सही डाइट और नियमित व्यायाम बड़ी समस्याओं को रोक सकते हैं. अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से सलाह लें और उन्हें नजरअंदाज ना करें.

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सिर्फ दर्दनाक नहीं, जानलेवा भी हो सकता है किडनी स्टोन, जानें सेप्सिस कब बन जाता है असली दुश्मन?

सिर्फ दर्दनाक नहीं, जानलेवा भी हो सकता है किडनी स्टोन, जानें सेप्सिस कब बन जाता है असली दुश्मन?


When Kidney Stones Become Life Threatening: किडनी स्टोन आज के समय में एक आम समस्या बन चुकी है. नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार, हर 10 में से 1 व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी किडनी स्टोन की समस्या होती है. अधिकतर मामलों में किडनी स्टोन दर्दनाक जरूर होता है, लेकिन जानलेवा नहीं. असली खतरा तब पैदा होता है, जब यह यूरिन के रास्ते को ब्लॉक कर देता है या किडनी में इंफेक्शन फंसा देता है. 

क्या होती है दिक्कत?

2024 की एक मेडिकल रिव्यू के मुताबिक, ब्लॉक और इंफेक्शन वाले स्टोन तेजी से सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकते हैं, अगर समय पर इलाज न मिले. एक्सपर्ट किडनी स्टोन से मौत बहुत कम मामलों में होती है, लेकिन यह संभव है, खासकर जब दिक्कतें बढ़ जाती हैं.  सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब किडनी में ब्लॉकेज के साथ इंफेक्शन हो जाता है, जिसे ऑब्स्ट्रक्टिव पायलोनेफ्राइटिस या पायोनेफ्रोसिस कहा जाता है. 

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एक्सपर्ट के मुताबिक, जब स्टोन यूरेटर में फंस जाता है, तो यूरिन का प्रवाह रुक जाता है. इससे किडनी में दबाव बढ़ता है, सूजन आती है और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं. अगर इस स्थिति में इंफेक्शन हो जाए, तो एंटीबायोटिक दवाएं भी ठीक से काम नहीं कर पातीं और सेप्सिस का खतरा बढ़ जाता है. 

इ़लाज में देरी से स्थिति गंभीर 

रिपोर्ट्स बताती हैं कि अगर ऐसे मामलों में इलाज में देरी हो जाए, तो स्थिति गंभीर हो सकती है. जर्नल ऑफ नेपाल मेडिसिन एसोसिएसन के अनुसार, ऐसी स्थिति में तुरंत ड्रेनेज सर्जरी के जरिए यूरिन निकालना जरूरी होता है, क्योंकि सिर्फ दवाओं से इलाज संभव नहीं होता. किडनी स्टोन कब खतरनाक हो सकता है, इसे पहचानना बेहद जरूरी है. Mayo Clinic के अनुसार, अगर तेज दर्द के साथ बुखार, ठंड लगना, पेशाब में जलन या बदबू, उल्टी या पेशाब कम होना जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

क्या है बचाव का रास्ता?

इसके अलावा, बड़े स्टोन 7 मिमी या उससे ज्यादा यूरिन के रास्ते को ज्यादा आसानी से ब्लॉक कर सकते हैं. यूरोपियन रेडियोलॉजी के अनुसार, छोटे स्टोन खुद निकल सकते हैं, लेकिन बड़े स्टोन के लिए इलाज जरूरी हो सकता है. डॉ. विशाल का कहना है कि समय पर इलाज से किडनी स्टोन की दिक्कतों को लगभग पूरी तरह रोका जा सकता है. ज्यादा पानी पीना, लक्षणों को नजरअंदाज न करना और समय पर जांच कराना सबसे जरूरी कदम हैं. किडनी स्टोन आमतौर पर जानलेवा नहीं होता, लेकिन अगर यह यूरिन के रास्ते को ब्लॉक कर दे और इंफेक्शन हो जाए, तो स्थिति तेजी से गंभीर बन सकती है. ऐसे में समय पर इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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