युवाओं में अचानक क्यों बढ़ रहे कोलन कैंसर के मामले? इस स्टडी में सामने आए खतरनाक कारण

युवाओं में अचानक क्यों बढ़ रहे कोलन कैंसर के मामले? इस स्टडी में सामने आए खतरनाक कारण


Can Microplastics Cause Colon Cancer: कैंसर के मामले दुनियाभर में बढ़ रहे हैं, अब इसको लेकर एक नई स्टडी ने कैंसर के बढ़ते मामलों, खासकर कोलन कैंसर को लेकर एक नई चिंता सामने रखी है. दुनियाभर में मार्डन मेडिकल और तकनीक के कारण कई प्रकार के कैंसर के मामलों में गिरावट देखी जा रही है, लेकिन कोलोरेक्टल यानी आंत से जुड़ा कैंसर युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है. कई बार यह बीमारी उन लोगों में भी पाई जा रही है जो बाहर से पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देते हैं.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

कोलन कैंसर के सामान्य लक्षणों में पेट दर्द, मल में खून आना और लंबे समय तक पेट से जुड़ी परेशानी शामिल हो सकती है. कई लोग इन संकेतों को साधारण पेट की समस्या या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार ऐसे लक्षण दिखने पर जांच कराना बेहद जरूरी है. अब एक नई रिसर्च में यह संभावना जताई गई है कि शरीर में बढ़ती माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा भी इस बीमारी के पीछे एक कारण हो सकती है.

इक्रोप्लास्टिक का शरीर पर असर

यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया के रिसर्चर की तरफ से किए गए एक बड़े साइंटिफिक एनालिसिस में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक हमारे शरीर पर गंभीर असर डाल सकते हैं. रिसर्चर का कहना है कि ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण कोलन कैंसर, फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों और यहां तक कि प्रजनन क्षमता पर भी निगेटिव प्रभाव डाल सकते हैं. प्रोफेसर ट्रेसी जे. वुडरफ के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक आज एनवायरमेंट में हर जगह मौजूद हैं. ये हवा, पानी, समुद्र तट, मिट्टी और भोजन तक में पाए जा चुके हैं. यहां तक कि अंटार्कटिका और गहरे समुद्री इलाकों जैसे दूरस्थ स्थानों में भी इनके कण मिले हैं. इनके बेहद छोटे आकार के कारण ये आसानी से शरीर के अंदर पहुंच सकते हैं और विभिन्न अंगों में जमा हो सकते हैं. कुछ स्टडी में माइक्रोप्लास्टिक के कण मानव प्लेसेंटा, ब्रेस्ट मिल्क और लिवर में भी पाए गए हैं.

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क्या कहना है एक्सपर्ट का?

एक्सपर्ट का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं और आंतों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. यही कारण है कि साइंटिस्ट अब यह जांच कर रहे हैं कि क्या इनका संबंध कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से हो सकता है. हालांकि फिलहाल यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि माइक्रोप्लास्टिक सीधे तौर पर कैंसर का कारण बनते हैं, लेकिन कई स्टडी यह संकेत देते हैं कि ये शरीर में बैक्टीरिया और रसायनों जैसे हानिकारक तत्व पहुंचा सकते हैं, जो कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं.

ये भी हैं कारण

डॉक्टरों के अनुसार कोलेन के कैंसर के जोखिम को कई अन्य कारण भी प्रभावित करते हैं. इनमें बढ़ती उम्र, रेड और प्रोसेस्ड मीट का ज्यादा सेवन, फाइबर की कमी, सूजन से जुड़ी आंतों की बीमारियां, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी और परिवार में कैंसर का पुराना केस भी शामिल हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस बीमारी में भी राहत देती है कोलेस्ट्रॉल की यह दवा, नई स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात

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How PCSK9 Inhibitors Lower Cholesterol: कोलेस्ट्रॉल एक तरह का फैटी पदार्थ है जो हमारे खून में मौजूद रहता है. अक्सर लोग इसे सिर्फ नुकसानदायक मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि शरीर के लिए इसकी एक जरूरी भूमिका भी होती है. कोलेस्ट्रॉल सेल्स की बाहरी परत बनाने में मदद करता है और कई महत्वपूर्ण हार्मोन तथा विटामिन-डी के निर्माण में भी इसकी जरूरत पड़ती है. इसके अलावा शरीर इसका इस्तेमाल बाइल एसिड बनाने के लिए करता है, जो खाने में मौजूद फैट को पचाने में मदद करते हैं. समस्या तब शुरू होती है जब खून में कोलेस्ट्रॉल का स्तर जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है.

कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ने से क्या होता है नुकसान?

जब ब्लड में खराब कोलेस्ट्रॉल अधिक मात्रा में जमा हो जाता है, तो यह धीरे-धीरे ब्लड वेसल्स की अंदरूनी दीवारों पर चिपकने लगता है. समय के साथ यह जमा होकर एक मोटी और चिपचिपी परत बना लेता है, जिसे प्लाक कहा जाता है. इस प्रक्रिया को एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है. प्लाक बढ़ने ब्लड वेसल्स संकरी हो जाती हैं और ब्लड का फ्लो प्रभावित होने लगता है. गंभीर स्थिति में यह पूरी तरह ब्लॉकेज या खून के थक्के का कारण बन सकता है, जिससे हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसी जानलेवा स्थितियां पैदा हो सकती हैं.

क्यों दी जाती है दवा लेने की सलाह?

डॉक्टर अक्सर कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए दवाइयों की सलाह देते हैं. इन दवाओं का मकसद खून में हानिकारक कोलेस्ट्रॉल को कम करना और ब्लड बेसल्स में प्लाक बनने से रोकना होता है. सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दवाओं में स्टैटिन शामिल हैं. इसके अलावा हाल के वर्षों में एक नई दवा कैटेगरी PCSK9 inhibitors भी सामने आई है, जो उन लोगों के लिए दी जाती है जिनमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर बहुत ज्यादा होता है या जिन्हें स्टैटिन से पर्याप्त फायदा नहीं मिलता,

क्या निकला रिसर्च में?

ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया के रिसर्चर ने हाल ही में एक स्टडी किया, जिसमें यह समझने की कोशिश की गई कि ये दवाएं शरीर पर किस तरह असर डालती हैं. रिसर्च में पाया गया कि स्टैटिन और PCSK9 inhibitors दोनों ही कोलेस्ट्रॉल को कम करने में काफी प्रभावी हैं और हार्ट की बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद करते हैं.

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हालांकि रिसर्चर को कुछ दिलचस्प बातें भी पता चलीं. स्टैटिन लेने वाले कुछ लोगों में दिमाग के एक हिस्से, जिसे हिप्पोकैम्पस कहा जाता है, में हल्का बदलाव देखा गया. हिप्पोकैम्पस याद रखने और सीखने की क्षमता से जुड़ा हिस्सा होता है. कुछ मामलों में यह हिस्सा थोड़ा बड़ा पाया गया, जिससे संकेत मिलता है कि स्टैटिन का असर ब्रेन वाले पर भी पड़ सकता है. हालांकि इस संबंध को पूरी तरह समझने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है.

वजन और शरीर में फैट की मात्रा बढ़ सकती है

स्टडी में यह भी देखा गया कि कुछ लोगों में स्टैटिन लेने के बाद वजन और शरीर में फैट की मात्रा बढ़ सकती है. इसके अलावा कुछ पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर थोड़ा कम पाया गया. टेस्टोस्टेरोन ऊर्जा, मांसपेशियों की ताकत और मूड से जुड़ा महत्वपूर्ण हार्मोन है, इसलिए इसके स्तर में बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वहीं PCSK9 inhibitors से जुड़े स्टडी में फेफड़ों के कामकाज से संबंधित कुछ बदलावों के संकेत भी मिले. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी यह साफ नहीं है कि ये दवाएं सीधे तौर पर इन बदलावों की वजह हैं या नहीं, इसलिए इस पर और रिसर्च की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! सप्लीमेंट्स का गलत कॉम्बिनेशन खराब कर सकता है आपकी हेल्थ, जानें एक्सपर्ट की राय

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Which Supplements Should Not Be Taken Together: आजकल हेल्थ और वेलनेस को लेकर लोगों में जागरूकता पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है. यही वजह है कि बहुत से लोग अपने शरीर में विटामिन और पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिए सप्लीमेंट्स लेने लगे हैं. थकान महसूस हो तो आयरन की गोली, इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए जिंक और स्किन के लिए विटामिन-C जैसी गोलियां आम हो गई हैं. लेकिन कई लोग यह नहीं जानते कि कुछ सप्लीमेंट्स को एक साथ लेना शरीर के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स Amy Margulies के मुताबिक सप्लीमेंट्स लेते समय उनके सही समय और कॉम्बिनेशन का ध्यान रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि कुछ विटामिन और मिनरल एक-दूसरे के असर को कम कर सकते हैं.
 
आयरन और कैल्शियम

आयरन की गोलियां अक्सर आयरन की कमी यानी एनीमिया को दूर करने के लिए दी जाती हैं. यह शरीर में लाल ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करती हैं, जिससे ऑक्सीजन पूरे शरीर में बेहतर तरीके से पहुंचती है. वहीं कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है. लेकिन अगर इन दोनों को साथ लिया जाए तो कैल्शियम आंतों में आयरन के अब्जॉर्ब को कम कर सकता है. इससे आयरन सप्लीमेंट का असर घट सकता है और पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे कब्ज, गैस या मतली भी हो सकती है. इसलिए डॉक्टर इन्हें कम से कम दो घंटे के अंतर से लेने की सलाह देते हैं.

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आयरन और जिंक

जिंक इम्यून सिस्टम को मजबूत करने और संक्रमण से बचाने में मदद करता है. लेकिन आयरन और जिंक दोनों को एक साथ लेने से ये शरीर में एक-दूसरे के अब्जॉर्ब के लिए रेस करने लगते हैं. इससे दोनों मिनरल्स का फायदा कम हो सकता है और पेट में दर्द, मरोड़ या दस्त जैसी परेशानी भी हो सकती है. इसलिए एक्सपर्ट इन दोनों सप्लीमेंट्स के बीच भी कम से कम दो घंटे का अंतर रखने की सलाह देते हैं.

कॉपर और जिंक

कॉपर शरीर में ऊर्जा उत्पादन, नसों के स्वास्थ्य और इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी होता है. लेकिन अगर ज्यादा मात्रा में जिंक लिया जाए तो यह कॉपर के अब्जॉर्व में बाधा डाल सकता है. लंबे समय तक ऐसा होने पर कॉपर की कमी हो सकती है, जिससे एनीमिया, कमजोर इम्यूनिटी या नसों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए इन दोनों सप्लीमेंट्स को भी अलग-अलग समय पर लेना बेहतर माना जाता है.

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क्या डिब्बाबंद खाने को सेहत के लिए खराब मानते हैं आप? आपकी सोच बदल देगी यह नई रिपोर्ट

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Which Canned Foods Are Healthiest To Eat: डिब्बाबंद यानी कैन में पैक फूड को अक्सर लोग ताजा खाने की तुलना में कम हेल्दी मानते हैं, लेकिन सच यह है कि कई कैन्ड फूड्स न्यूट्रिशन के मामले में काफी अच्छे होते हैं. इनकी खासियत यह है कि ये लंबे समय तक खराब नहीं होते, कीमत में सस्ते होते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल किए जा सकते हैं. सही विकल्प चुनने पर ये आपके आहार में प्रोटीन, फाइबर और जरूरी विटामिन भी जोड़ सकते हैं.

कैन बीन्स 

कैन में मिलने वाली बीन्स जैसे राजमा, काले चने, किडनी बीन्स आदि सबसे अच्छे विकल्पों में से एक मानी जाती हैं. इनमें प्लांट बेस्ड प्रोटीन, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम और फोलेट जैसे न्यूट्रिशन तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं. साथ ही इनमें फाइबर ज्यादा और फैट बहुत कम होता है, जिससे पाचन बेहतर रहता है और कोलेस्ट्रॉल तथा ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में भी मदद मिलती है. अगर आप कैन्ड बीन्स इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें पानी से धो लेना बेहतर होता है, इससे सोडियम की मात्रा काफी हद तक कम हो जाती है.

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कैन लेंटिल्स

कैन में मिलने वाली मसूर दाल लेंटिल्स भी न्यूट्रिशन से भरपूर होती है. आधा कप कैन्ड लेंटिल्स में करीब 8 ग्राम प्रोटीन और 7 ग्राम फाइबर मिलता है. यह आयरन, जिंक और फोलेट का भी अच्छा सोर्स है. इसमें मौजूद फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है और भोजन के बाद ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने से भी रोकता है.

कैन सार्डिन मछली 

कैन में मिलने वाली सार्डिन मछली भी काफी हेल्दी मानी जाती है. लगभग 90 ग्राम सार्डिन में करीब 23 ग्राम प्रोटीन मिलता है. यह ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होती है, जो हार्ट, ब्रेन और आंखों की सेहत के लिए जरूरी है. इसके अलावा इसमें कैल्शियम, विटामिन D और आयरन भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है.

कैन पंपकिन

कैन में उपलब्ध कद्दू (पंपकिन) भी सेहत के लिए फायदेमंद होता है. एक कप कैन्ड पंपकिन में अच्छी मात्रा में फाइबर होता है और इसमें कैलोरी भी कम होती है. यह विटामिन-A का बेहतरीन सोर्स है, जो आंखों, त्वचा और इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी माना जाता है.

कैन अनानास

कैन में मिलने वाला अनानास विटामिन-C से भरपूर होता है, जो शरीर को इंफेक्शन से बचाने और घाव भरने में मदद करता है. हालांकि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा होता है, इसलिए इसे दही या दूध जैसे प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थों के साथ खाना बेहतर रहता है.

ये भी हैं विकल्प

आर्टिचोक हार्ट्स भी कैन्ड फूड के रूप में आसानी से मिल जाते हैं. इनमें फाइबर, पोटैशियम और फोलेट अच्छी मात्रा में होता है. इनमें मौजूद प्रीबायोटिक फाइबर आंतों के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करता है और डाइजेशन सिस्टम को मजबूत बनाता है.

किन बातों का रखें ध्यान?

कैन फूड खरीदते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. कम सोडियम वाले विकल्प चुनें, लेबल जरूर पढ़ें और ऐसे प्रोडक्ट लें जिनमें अतिरिक्त चीनी या सिरप न हो. इसके साथ ही कोशिश करें कि BPA-फ्री पैकेजिंग वाले डिब्बे लें और कभी भी डेंटेड या फूले हुए कैन न खरीदें, क्योंकि इनमें खराब बैक्टीरिया हो सकते हैं. सही तरीके से चुने गए कैन्ड फूड्स आपके रोजमर्रा के आहार का हेल्दी हिस्सा बन सकते हैं.

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30 साल हो गई उम्र तो जरूर कराएं ये टेस्ट, विमेंस डे पर खुद को दें ये तोहफा

30 साल हो गई उम्र तो जरूर कराएं ये टेस्ट, विमेंस डे पर खुद को दें ये तोहफा


हर साल 8 मार्च को हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं. यह दिन महिलाओं के अधिकारों, समाज में उनके योगदान और उनके स्वास्थ्य की अहमियत को याद दिलाता है. समाज में महिलाएं परिवार और कामकाज की जिम्मेदारियों को संतुलित करने में जुटी रहती हैं. अक्सर इस भागदौड़ में वे अपनी सेहत पर ध्यान देना भूल जाती हैं. खासकर जब कोई महिला 30 साल की उम्र पार कर लेती है, तो उसके शरीर में हार्मोनल और मेटाबॉलिक बदलाव शुरू हो जाते हैं. इस उम्र में महिलाओं को अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना बेहद जरूरी हो जाता है. समय पर मेडिकल चेकअप कराने से गंभीर बीमारियों का शुरुआती चरण में पता चल जाता है और उनका इलाज आसान हो जाता है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि 30 साल की उम्र के बाद हर महिला को कौन-कौन से टेस्ट  जरूर कराने चाहिए. 

30 साल हो गई उम्र तो जरूर कराएं ये टेस्ट

1. सर्वाइकल कैंसर की जांच – सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे खतरनाक कैंसर में से एक है. WHO की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में लगभग 6,60,000 नए मामले सामने आए और 3,50,000 महिलाओं की मौत इसी कारण हुई.  इसलिए 30 साल की उम्र के बाद हर महिला को तीन साल में एक बार पैप स्मीयर टेस्ट कराना चाहिए. इसके अलावा कई बार HPV टेस्ट की भी सलाह दी जाती है. इन टेस्ट्स से सर्विक्स की कोशिकाओं में बदलाव का पता चलता है और कैंसर का खतरा कम हो जाता है. 

2. ब्रेस्ट कैंसर की जांच – दुनियाभर में ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कैंसर है. WHO के अनुसार, 2022 में लगभग 6,70,000 महिलाओं की मौत ब्रेस्ट कैंसर के कारण हुई. ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती स्टेज में इलाज करना बहुत आसान होता है. इसलिए, 30 साल की उम्र से ही महिलाओं को खुद से ब्रेस्ट चेक करने की आदत डालनी चाहिए. किसी भी गांठ, सूजन या दर्द का तुरंत पता लग सके. 40 साल की उम्र के बाद नियमित मैमोग्राफी भी जरूरी है, खासकर अगर परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास हो. 

3. ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल टेस्ट – आजकल की तेज-तर्रार जिंदगी में महिलाएं घर और काम दोनों संभाल रही हैं. खराब लाइफस्टाइल, तनाव और खानपान के कारण डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या जल्दी होने लगी है.  अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, तो यह और भी जरूरी हो जाता है. इससे हार्ट डिजीज और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का समय पर पता चल जाता है. 

4. थायराइड टेस्ट – हार्मोनल बदलावों के कारण थायराइड की समस्या महिलाओं में आम है. यह पीरियड्स के चक्र को प्रभावित करता है और समय से पहले मेनोपॉज का खतरा बढ़ा सकता है. अगर वजन अचानक बढ़े या घटे, लगातार थकान महसूस हो, बाल झड़ने लगें या मूड स्विंग्स हों, तो थायराइड फंक्शन टेस्ट कराना बहुत जरूरी है. नियमित चेकअप में थायराइड की जांच से इन समस्याओं को समय रहते रोका जा सकता है.

5. हड्डियों की जांच – 35 साल की उम्र के बाद महिलाओं की हड्डियों की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है. अगर शरीर में विटामिन D और कैल्शियम की कमी हो, तो हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट से ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे का पता चलता है. जो महिलाएं लंबे समय तक एक ही पोस्चर में बैठती हैं या बार-बार फ्रैक्चर का सामना करती हैं, उन्हें यह टेस्ट 30 साल से पहले ही करवा लेना चाहिए. 

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महिला दिवस पर खुद को दें यह तोहफा

महिला दिवस सिर्फ सम्मान का दिन नहीं है, बल्कि यह दिन खुद के स्वास्थ्य और खुशहाली पर ध्यान देने का भी है. 30 साल के बाद महिलाओं के शरीर में बदलाव शुरू होते हैं और समय पर चेकअप कराना उनके जीवन को सुरक्षित बनाता है. ऐसे में पैप स्मीयर और HPV टेस्ट , ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग और ब्लड शुगर व कोलेस्ट्रॉल टेस्ट जो हर महिला को 30 साल के बाद जरूर कराना चाहिए. नियमित चेकअप और सावधानी से महिलाएं न सिर्फ अपनी सेहत बेहतर रख सकती हैं, बल्कि अपने परिवार के लिए भी मजबूत और खुशहाल आधार बन सकती हैं. इसलिए इस महिला दिवस पर खुद को स्वास्थ्य का तोहफा दें और अपनी जिंदगी में स्वास्थ्य को प्राथमिकता बनाएं. 

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क्यों समय से पहले सख्त हो रहीं युवाओं की आर्टरीज, क्या यह हार्ट अटैक का साइलेंट सिग्नल?

क्यों समय से पहले सख्त हो रहीं युवाओं की आर्टरीज, क्या यह हार्ट अटैक का साइलेंट सिग्नल?


Why Are Young People Getting Heart Attacks: भारत के कार्डियोलॉजिस्ट इन दिनों एक चिंताजनक ट्रेंड देख रहे हैं कि कम उम्र के युवाओं की आर्टरीज समय से पहले बूढ़ी हो रही हैं. जन्म प्रमाणपत्र भले 35 साल दिखाए, लेकिन जांच में आर्टरीज 50-55 साल जैसी नजर आ रही हैं. यही अंतर डॉक्टर “अर्ली वैस्कुलर एजिंग” यानी समय से पहले आर्टरीज की उम्र बढ़ना कहते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है. 

क्रोनोलॉजिकल बनाम बायोलॉजिकल एज

डॉ. विवेक कुमार ने TOI को बताया कि उम्र को अब दो नजरियों से देखा जाता है. एक है क्रोनोलॉजिकल एज, यानी आप कितने साल जिए और दूसरी है बायोलॉजिकल एज, यानी शरीर के अंग कितने स्वस्थ हैं. कई बार 35 साल का व्यक्ति अंदर से 50 साल जैसा हो सकता है, खासकर हार्ट और आर्टरीज के मामले में. हेल्दी आर्टरीज लचीली होती हैं. वे हर धड़कन के साथ फैलती-सिकुड़ती हैं और ब्लड फ्लो सहज बनाए रखती हैं. लेकिन जब वे सख्त और मोटी होने लगती हैं, तो सूक्ष्म स्तर पर नुकसान जमा होने लगता है. यह प्रक्रिया बिना लक्षणों के शुरू हो सकती है.

युवा आर्टरीज क्यों हो रहीं बूढ़ी?

डॉ. मुकेश गोयल के मुताबिक आधुनिक जीवनशैली इसका बड़ा कारण है. लंबी देर तक बैठना, हाई-स्टेस जॉब, प्रोसेस्ड फूड, नींद की कमी, धूम्रपान, अनकंट्रोल ब्लड प्रेशर और शुगर, ये सब मिलकर आर्टरीज को तेजी से नुकसान पहुंचाते हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के ICMR-INDIAB स्टडी  में कम उम्र में डायबिटीज और प्रीडायबिटीज के बढ़ते मामलों को बताया  है. वहीं वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने भी मानता है कि हार्ट रोग आज भी दुनिया में मौत का प्रमुख कारण है और अब यह खतरा सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा

इसको कैसे रोका जा सकता है?

सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग खुद को स्वस्थ मान लेते हैं क्योंकि उन्हें कोई लक्षण महसूस नहीं होता. लेकिन आर्टरीज में जमी सख्ती और प्लाक सालों तक चुपचाप बढ़ती रहती है. कई बार पहला संकेत सीधे हार्ट अटैक या स्ट्रोक के रूप में सामने आता है. अच्छी खबर यह है कि बायोलॉजिकल एज बदली जा सकती है. रेगुलर एरोबिक एक्सरसाइज, संतुलित आहार जिसमें फल, सब्जियां, साबुत अनाज, नट्स शामिल हैं, हेल्दी नींद और डिप्रेशन को सही तरीके से मैनेज करने से आर्टरीज की लचक सुधारी जा सकती है. स्मोकिंग छोड़ने से भी कुछ महीनों में सुधार दिख सकता है. असल सवाल यह नहीं कि आपकी उम्र कितनी है, बल्कि यह है कि आपकी आर्टरीज कितनी स्वस्थ हैं. अगर इस सोच में बदलाव आ जाए, तो दिल की बीमारियों से जुड़ी कई दिक्कतों को टाला जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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