सावधान! स्ट्रोक आने से हफ्तों पहले शरीर देता है ये 5 वॉर्निंग सिग्नल, न करें नजरअंदाज

सावधान! स्ट्रोक आने से हफ्तों पहले शरीर देता है ये 5 वॉर्निंग सिग्नल, न करें नजरअंदाज


How To Prevent Stroke Naturally: स्ट्रोक तब होता है, जब ब्रेन तक ऑक्सीजन और खून की सप्लाई अचानक कम या बंद हो जाती है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो कुछ ही मिनटों में जान जा सकती है या व्यक्ति हमेशा के लिए लकवे का शिकार हो सकता है. यही वजह है कि स्ट्रोक को मेडिकल इमरजेंसी माना जाता है. हालांकि कई बार स्ट्रोक अचानक आता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में शरीर पहले ही कुछ चेतावनी संकेत देने लगता है, जो स्ट्रोक से हफ्तों या महीनों पहले दिख सकते हैं.

caneandable की रिपोर्ट के अनुसार, इन शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो स्ट्रोक को रोका जा सकता है या उसके गंभीर असर से बचाव संभव है, इन लक्षणों में-

असामान्य और लगातार सिरदर्द

स्ट्रोक से पहले होने वाला सिरदर्द आम सिरदर्द से अलग होता है. यह बिना किसी कारण अचानक शुरू हो सकता है, ज्यादा तेज होता है और लंबे समय तक बना रहता है. कई बार दर्द की दवाओं से भी आराम नहीं मिलता. इसके साथ चक्कर आना, मतली या नजर धुंधली होना जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं. यह दिमाग में दबाव या ब्लीडिंग के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. अगर सिरदर्द पहले से अलग महसूस हो और लगातार बना रहे, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरूरी है.

 शरीर के एक हिस्से में कमजोरी या सुन्नपन

चेहरे, हाथ या पैर में अचानक कमजोरी या सुन्नपन महसूस होना, खासकर शरीर के एक ही तरफ, स्ट्रोक का अहम चेतावनी संकेत है. कई बार यह कमजोरी हल्की होती है और कुछ देर बाद ठीक भी हो जाती है, जिससे लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन ऐसा बार-बार होना खतरनाक हो सकता है. यह संकेत देता है कि दिमाग के उस हिस्से में खून की सप्लाई कम हो रही है.

बोलने और समझने में दिक्कत

स्ट्रोक से पहले बोलने में लड़खड़ाहट, सही शब्द न मिल पाना या सामने वाले की बात समझने में परेशानी हो सकती है. कभी-कभी व्यक्ति खुद महसूस करता है कि वह ठीक से बोल नहीं पा रहा. यह दिमाग के उस हिस्से पर असर का संकेत है, जो भाषा और समझ को नियंत्रित करता है. यह लक्षण अचानक आता है और इसे कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए.

 नजर से जुड़ी अचानक समस्याएं

PMC की रिपोर्ट के अनुसार, अचानक धुंधला दिखना, डबल दिखना, आंखों के सामने चमकती रोशनी दिखना या एक आंख से कम दिखना भी स्ट्रोक का संकेत हो सकता है. कई बार देखने का दायरा ही कम हो जाता है. ऐसे लक्षण ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक यानी मिनी स्ट्रोक से जुड़े हो सकते हैं, जो आगे चलकर बड़े स्ट्रोक में बदल सकता है.

चक्कर, संतुलन बिगड़ना और चलने में परेशानी

अगर बिना किसी वजह चक्कर आए, चलने में लड़खड़ाहट हो या शरीर का संतुलन बार-बार बिगड़े, तो यह भी चेतावनी संकेत हो सकता है. ब्रेन के संतुलन और कोऑर्डिनेशन से जुड़े हिस्सों में खून की कमी होने पर ऐसे लक्षण दिखते हैं.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

ज्यादातर मामलों में स्ट्रोक से बचाव सही लाइफस्टाइल और नियमित स्वास्थ्य देखभाल से संभव है. डॉक्टरों के अनुसार, ब्लड प्रेशर को नियंत्रण में रखना स्ट्रोक से बचाव का सबसे अहम तरीका है। इसके लिए नियमित हेल्थ चेकअप कराना और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाएं समय पर लेना जरूरी होता है. नियंत्रित ब्लड प्रेशर दिल और दिमाग दोनों को सुरक्षित रखने में मदद करता है. नियमित एक्सरसाइज भी बेहद जरूरी है. रोज कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि, जैसे तेज चलना, योग या हल्का वर्कआउट, ब्लड फ्लो बेहतर करता है और ब्लड वेसल्स को स्वस्थ रखता है. इसके साथ ही धूम्रपान छोड़ना और शराब का सेवन सीमित करना स्ट्रोक के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें 

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सुबह उठते ही सूख रहा है मुंह और आ रही है बदबू? शरीर के अंदर छिपी है यह बड़ी गड़बड़

सुबह उठते ही सूख रहा है मुंह और आ रही है बदबू? शरीर के अंदर छिपी है यह बड़ी गड़बड़


Why Do I Wake Up With Dry Mouth And Bad Breath: सुबह उठते ही मुंह सूखा-सूखा लगे और बदबू आए, तो हम अक्सर इसे सामान्य “मॉर्निंग ब्रीथ” मानकर नजरअंदाज कर देते हैं.  लेकिन कई बार यह सिर्फ रात भर की नींद का असर नहीं होता, बल्कि शरीर के अंदर चल रही कुछ गड़बड़ियों का संकेत भी हो सकता है. असल में हमारा मुंह शरीर का एक तरह का आईना होता है, जो बताता है कि रात के दौरान शरीर ने पानी, सांस और पाचन को कैसे संभाला. चलिए विस्तार से बताते हैं, 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. गर्गी सिंह ठाकुर ने TOI को बताया कि अनुसार सुबह मुंह सूखना या बदबू आना डिहाइड्रेशन, खराब नींद या मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याओं का संकेत हो सकता है. दरअसल, जब हम सोते हैं तो शरीर में लार बनना कम हो जाता है. यही लार हमारे मुंह को साफ रखती है, बैक्टीरिया को कंट्रोल करती है और खाने के कणों को हटाती है. जैसे ही इसकी मात्रा घटती है, बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं और सुबह बदबू ज्यादा महसूस होती है.

मुंह सूखने की वजह क्या है?

मुंह सूखने की एक बड़ी वजह डिहाइड्रेशन भी है. अगर शरीर में पानी की कमी होती है, तो शरीर जरूरी अंगों को प्राथमिकता देता है और मुंह में लार कम बनने लगती है. एसी में सोना, रात में कैफीन या शराब लेना इस समस्या को और बढ़ा सकता है. एक और कारण है मुंह से सांस लेना. कई लोग नाक बंद होने, एलर्जी या आदत की वजह से मुंह से सांस लेते हैं, जिससे मुंह जल्दी सूख जाता है और बैक्टीरिया बढ़ने लगते हैं. यह खराब नींद का भी संकेत हो सकता है, क्योंकि मुंह से सांस लेना अक्सर खर्राटों और नींद टूटने से जुड़ा होता है.

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नींद की क्वालिटी का असर

नींद की क्वालिटी भी यहां अहम भूमिका निभाती है. अगर नींद बार-बार टूटती है या गहरी नहीं होती, तो नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है और लार का बनना और कम हो जाता है. यही वजह है कि जो लोग ठीक से सो नहीं पाते, उन्हें सुबह यह समस्या ज्यादा होती है. कई बार बदबू का कारण पाचन से भी जुड़ा होता है. अगर खाना सही तरीके से नहीं पचता, तो शरीर में कुछ तत्व जमा होने लगते हैं, जो सांस के जरिए बाहर आते हैं और बदबू पैदा करते हैं. एसिड रिफ्लक्स या अनियमित खानपान इस समस्या को और बढ़ा सकते हैं.

तनाव और कुछ दवाइयां भी इस समस्या को बढ़ा सकती हैं.  तनाव से सांस लेने का तरीका बदल जाता है और लार कम बनने लगती है. वहीं, कुछ दवाइयां जैसे एंटीहिस्टामिन या ब्लड प्रेशर की दवाएं भी मुंह को सूखा बना सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बॉडी में पनप रहा डिमेंशिया का जीन तो तुरंत बढ़ा दें इस चीज की खुराक, स्टडी में हुआ खुलासा

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Can Eating Meat Reduce Dementia Risk: अगर आपके शरीर में अल्जाइमर से जुड़ा जीन मौजूद है, तो आपकी डाइट में एक छोटा सा बदलाव डिमेंशिया के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है. एक नई स्टडी में सामने आया है कि जो लोग नियमित रूप से मीट का सेवन करते हैं, उनमें याददाश्त कमजोर होने और डिमेंशिया का खतरा लगभग आधा तक कम हो सकता है. साइंटिस्ट के मुताबिक, APOE नाम का जीन अल्जाइमर से जुड़ा होता है और यह बीमारी के ज्यादातर मामलों में पाया जाता है.  खासतौर पर APOE4 वेरिएंट वाले लोगों में डिमेंशिया का जोखिम ज्यादा होता है. लेकिन रिसर्च में पाया गया कि अगर ऐसे लोग अपनी डाइट में मीट की मात्रा बढ़ाते हैं, तो उनके दिमाग पर इसका पॉजिटिव असर पड़ सकता है. 

क्या निकला रिसर्च में?

यह स्टडी स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने की, जिसमें 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के 2000 से अधिक लोगों को करीब 15 साल तक ट्रैक किया गया, इस दौरान उनकी खाने-पीने की आदतों पर नजर रखी गई और खासतौर पर मीट के सेवन को फोकस में रखा गया. रिसर्च के नतीजे चौंकाने वाले थे. जिन लोगों के शरीर में APOE4 जीन था और जो सबसे ज्यादा मीट खाते थे, उनमें डिमेंशिया का खतरा उन लोगों के मुकाबले करीब 45 प्रतिशत कम पाया गया, जो मीट कम खाते थे, इतना ही नहीं, इन लोगों की सोचने-समझने की क्षमता भी बेहतर बनी रही और मानसिक गिरावट की रफ्तार धीमी देखी गई. 

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किस तरह का मीट फायदेमंद?

हालांकि, यहां एक अहम बात भी सामने आई. सभी तरह का मीट फायदेमंद नहीं होता. प्रोसेस्ड मीट जैसे बेकन, सॉसेज या ज्यादा प्रोसेस किया हुआ मांस दिमाग के लिए नुकसानदायक हो सकता है और इससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है. यानी अगर फायदा चाहिए, तो अनप्रोसेस्ड मीट को प्राथमिकता देना जरूरी है. साइंटिस्ट का मानना है कि इस फायदे के पीछे विटामिन B12 की भूमिका हो सकती है. मीट में यह विटामिन अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो दिमाग की सेहत और याददाश्त के लिए बेहद जरूरी होता है. B12 की कमी होने पर याददाश्त कमजोर होना, समझने में दिक्कत और मानसिक समस्याएं तक हो सकती हैं.

ये चीजें हैं फायदेमंद

हालांकि, साइंटिस्ट यह भी मानते हैं कि यह रिसर्च अभी शुरुआती स्तर पर है और इसे पूरी तरह अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता. कुछ एक्सपर्ट का कहना है कि लाइफस्टाइल, आर्थिक स्थिति और अन्य आदतें भी इस पर असर डाल सकती हैं. फिर भी, यह साफ है कि सही खानपान, एक्टिव लाइफस्टाइल और मानसिक रूप से सक्रिय रहना दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कम क्यों होते हैं हार्ट अटैक के मामले, क्या है कारण?

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Why Women Have Lower Risk Of Heart Attacks Than Men: हार्ट अटैक आज के समय की सबसे खतरनाक और आम बीमारियों में से एक बन चुका है. यह तब होता है जब दिल तक जाने वाला ब्लड का फ्लो रुक जाता है. आमतौर पर यह ब्लॉकेज कोरोनरी आर्टरीज में होता है, जहां कोलेस्ट्रॉल, फैट और अन्य पदार्थ जमा हो जाते हैं. इसी स्थिति को कोरोनरी आर्टरी डिजीज कहा जाता है, जो हार्ट अटैक के बढ़ते मामलों की सबसे बड़ी वजह है.

क्या होता है कारण?

हार्ट अटैक के पीछे कई जोखिम कारक होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. हाई कोलेस्ट्रॉल, बढ़ती उम्र, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, जेनेटिक कारण, तंबाकू और शराब का सेवन, ज्यादा तनाव और हार्ट से जुड़ी पुरानी समस्याएं ये सभी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ाते हैं. 

महिलाओं में कम क्यों होता है ज्यादा खतरा?

Dr. KM Cherian Institute Of Medical Sciences की रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं में हार्ट अटैक के मामलों में अंतर देखा जाता है. दोनों के लिए यह बीमारी खतरनाक है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों में इसका खतरा ज्यादा होता है. पुरुषों में पहली बार हार्ट अटैक का औसत उम्र करीब 65 साल होती है, जबकि महिलाओं में यह लगभग 72 साल के आसपास देखा जाता है. यानी महिलाओं में यह खतरा पुरुषों के मुकाबले करीब 10 साल देर से बढ़ता है.

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अंतर के पीछे क्या है वजह?

इसके पीछे कई संभावित कारण माने जाते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि महिलाओं में मेनोपॉज से पहले हार्ट अटैक का खतरा कम होता है, जिसका एक कारण एस्ट्रोजन हार्मोन हो सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन माना जाता है कि यह हार्मोन दिल की सेहत को कुछ हद तक सुरक्षित रखता है. दूसरी ओर, पुरुषों में तंबाकू और शराब का सेवन ज्यादा होता है, जो दिल की बीमारियों का बड़ा कारण है. इसके अलावा, तनाव को संभालने के मामले में भी पुरुषों की क्षमता महिलाओं की तुलना में कम मानी जाती है. लगातार तनाव और मानसिक दबाव दिल पर बुरा असर डालते हैं, जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

यह समझना जरूरी है कि हार्ट अटैक पूरी तरह रोका जा सकता है, अगर समय रहते सावधानी बरती जाए. नियमित हेल्थ चेकअप कराना, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है. लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे बदलाव भी बड़ा फर्क ला सकते हैं.  हेल्दी डाइट लेना, जिसमें फल और सब्जियां ज्यादा हों और फैट, नमक व शुगर कम हो, दिल के लिए फायदेमंद होता है. 

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पेशाब में आ रहा है खून तो हो सकता है कैंसर, तुरंत करा लें ये टेस्ट

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What Causes Blood In Urine And Is It Cancer: अगर पेशाब में खून दिखाई दे, तो यह किसी को भी घबरा सकता है. कई बार लोग इसे छोटी-मोटी समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, खासकर जब यह अपने आप ठीक हो जाए. लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसा करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि पेशाब में खून आना किसी गंभीर बीमारी, यहां तक कि कैंसर का संकेत भी हो सकता है. इसलिए इसे हल्के में लेने के बजाय तुरंत जांच कराना जरूरी है.

क्यों आता है यूरिन में खून

मेडिकल भाषा में इसे हेमैच्यूरिया कहा जाता है, जब किडनी, यूरिनरी ट्रैक्ट या ब्लैडर से रेड ब्लड सेल्स  पेशाब में आ जाती हैं. यह दो तरह का होता है, एक जिसमें खून साफ दिखाई देता है और दूसरा जो सिर्फ टेस्ट के जरिए पता चलता है. सबसे बड़ी चिंता तब होती है जब बिना किसी दर्द के पेशाब में खून दिखे. अक्सर इसे लोग यूरिन इन्फेक्शन समझकर दवा ले लेते हैं, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि अगर यह सिर्फ खून है और दर्द या जलन जैसे लक्षण नहीं हैं, तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है.

नॉर्मल बीमारियां भी हो सकती हैं

हालांकि, हर बार यह कैंसर ही हो ऐसा जरूरी नहीं है. इसके पीछे कई सामान्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे किडनी स्टोन, यूरिन इन्फेक्शन, प्रोस्टेट का बढ़ना या किडनी से जुड़ी समस्याएं. लेकिन अगर खून बार-बार दिखे या बिना दर्द के आए, तो इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है.

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कब होता है कैंसर की शुरुआत

कैंसर के बारे में जानकारी देने वाली संस्था Cancercenter के अनुसार, पेशाब में खून आना ब्लैडर कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है. कई मामलों में यह सबसे पहला लक्षण होता है, जिसमें यूरिन का रंग गुलाबी, नारंगी या गहरा लाल हो सकता है. किडनी कैंसर में भी ऐसा हो सकता है, इसके साथ ही पीठ के एक तरफ दर्द, वजन कम होना और कमजोरी जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं. प्रोस्टेट कैंसर के एडवांस स्टेज में भी यूरिन में खून आ सकता है. खासकर जो लोग स्मोकिंग करते हैं, उनमें यह खतरा और ज्यादा होता है, इसलिए उन्हें ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है. 

टेस्ट कराने की जरूरत

ऐसे में सबसे जरूरी है सही समय पर जांच कराना. डॉक्टर आमतौर पर यूरिन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड, CT स्कैन या सिस्टोस्कोपी जैसी जांच की सलाह देते हैं, ताकि असली कारण का पता चल सके. एक्सपर्ट का साफ कहना है कि अगर बिना दर्द के पेशाब में खून दिखे, तो तुरंत यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए. इसे नजरअंदाज करना आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकता है. सही समय पर जांच और इलाज से गंभीर बीमारियों को शुरुआती दौर में ही पकड़ा जा सकता है और इलाज आसान हो जाता है.

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आपके नर्वस सिस्टम के लिए क्यों खतरनाक हैं आने वाली गर्मियां, जानें किन बीमारियों का खतरा?

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How Extreme Heat Affects The Nervous System: भारतीय गर्मियों में बाहर निकलते ही फर्क साफ महसूस होने लगता है. यह सिर्फ गर्मी नहीं होती, बल्कि एक तरह का भारीपन होता है, जो शरीर के साथ-साथ दिमाग पर भी असर डालता है. धीरे-धीरे थकान बढ़ती है, ध्यान भटकने लगता है और कई बार स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर हो जाती है. हम अक्सर डिहाइड्रेशन, सनबर्न या थकावट की बात करते हैं, लेकिन असल में गर्मी का सीधा असर दिमाग पर भी पड़ता है. तेज गर्मी में सिरदर्द, चक्कर आना, कन्फ्यूजन और ध्यान लगाने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखने लगते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

TOI Health से बातचीत में चेन्नई के कावेरी हॉस्पिटल की सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. शुभा सुब्रमणियन बताती हैं कि गर्मियों में ज्यादा गर्मी और उमस के कारण शरीर में पानी और सोडियम की कमी हो जाती है, जिससे दौरे तक पड़ सकते हैं. ज्यादा पसीना आने से सोडियम लेवल गिर जाता है और यह स्थिति और खतरनाक हो जाती है. कई मामलों में हीट स्ट्रोक भी हो सकता है, जिससे बेहोशी और सीजर का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में खासकर जिन लोगों को पहले से दौरे की समस्या है, उन्हें खुद को हाइड्रेट रखना चाहिए और हल्के, ढीले व हल्के रंग के कपड़े पहनने चाहिए.

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किन लोगों को होता है असर?

बच्चे, बुजुर्ग और जिन लोगों को पहले से न्यूरोलॉजिकल समस्याएं हैं, वे ज्यादा जोखिम में रहते हैं. इसके अलावा, जो लोग लंबे समय तक बाहर काम करते हैं, जैसे डिलीवरी वर्कर्स, ट्रैफिक पुलिस या रेहड़ी-पटरी वाले, उनके लिए यह समस्या रोज की बन जाती है. वहीं, घर के अंदर भी हमेशा सुरक्षित माहौल नहीं होता. खराब वेंटिलेशन, बिजली कटौती या कूलिंग की कमी से स्थिति और बिगड़ सकती है, जिससे दिमाग का संतुलन प्रभावित होता है.

किन बीमारियों का बढ़ता है खतरा?

डॉ. शुभा सुब्रमणियन के मुताबिक, गर्मी का असर कई ऐसी बीमारियों पर भी पड़ता है, जिनके बारे में हम ज्यादा बात नहीं करते. जैसे बच्चों में ड्रावेट सिंड्रोम जैसी एपिलेप्सी की स्थिति गर्मी में और खराब हो सकती है. इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी से याददाश्त कमजोर होना, ब्रेन फॉग और सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसे रोगों में लक्षण बढ़ सकते हैं, जबकि डिहाइड्रेशन के कारण स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है.

पार्किंसन और अल्जाइमर के मरीजों के लिए भी गर्मी खतरनाक हो सकती है, क्योंकि उनके शरीर की तापमान कंट्रोल करने की क्षमता कमजोर होती है. वहीं, माइग्रेन से पीड़ित लोगों में धूप में निकलना सिरदर्द को ट्रिगर कर सकता है. गर्मी थकान को भी बढ़ाती है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी और मुश्किल हो जाती है.

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