सीवियर एप्लास्टिक एनीमिया छीन लेता सांसें, जानें स्टेम सेल डोनर ने कैसे बचाई लड़के की जान?

सीवियर एप्लास्टिक एनीमिया छीन लेता सांसें, जानें स्टेम सेल डोनर ने कैसे बचाई लड़के की जान?


Symptoms And Treatment Of Aplastic Anemia: बेंगलुरु की 32 साल स्वाति की छोटी-सी पहल ने एक युवक को नई जिंदगी दे दी. उन्होंने ब्लड स्टेम सेल दान कर 19 वर्षीय आनंदू की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई. आनंदू एक गंभीर रक्त रोग सीवियर एप्लास्टिक एनीमिया से जूझ रहे थे, जो समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकता है. आनंदू को यह बीमारी तब पता चली जब वह 10वीं कक्षा में पढ़ते थे. लगातार बुखार रहने के बाद जांच में सामने आया कि उन्हें एप्लास्टिक एनीमिया है. यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें बोन मैरो पर्याप्त नए ब्लड सेल्स  बनाना बंद कर देता है. डॉक्टरों के अनुसार इस बीमारी का सबसे प्रभावी इलाज बोन मैरो या ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट माना जाता है.

डॉक्टर की सलाह पर कोशिश

कोझिकोड स्थित एमवीआर कैंसर सेंटर के पीडियाट्रिक हेमाटो-ऑन्कोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. वी.पी. कृष्णन ने आनंदू को स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सलाह दी. इसके बाद उनके लिए उपयुक्त डोनर की तलाश शुरू हुई. इस दौरान परिवार को इमोशनल और आर्थिक दोनों तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा. मरीजों की मदद के लिए चलाए जा रहे DKMS पेशेंट फंडिंग प्रोग्राम के तहत भी उन्हें थोड़ी आर्थिक सहायता मिली.

इसे भी पढ़ें- Cervical Cancer In India: हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, डॉक्टर से जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके

उधर बेंगलुरु में आईटी कंसल्टेंट के रूप में काम करने वाली स्वाति ने 2016 में अपने कंपनी के कैंपस में आयोजित एक डोनर रजिस्ट्रेशन ड्राइव में भाग लिया था. इसी रजिस्ट्रेशन के कारण 2022 में उन्हें DKMS की ओर से कॉल आया कि उनका स्टेम सेल आनंदू से मैच हो सकता है. स्वाति ने बिना हिचकिचाए दान करने के लिए हामी भर दी और उनके परिवार ने भी इस फैसले का पूरा समर्थन किया.

ट्रांसप्लांट के बाद सेहत पर सुधार

सफल ट्रांसप्लांट के बाद आनंदू की सेहत में धीरे-धीरे सुधार हुआ. अब उनकी ब्लड रिपोर्ट स्थिर है और वह सामान्य जीवन जी रहे हैं. फिलहाल वह अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के शौक को भी आगे बढ़ा रहे हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि एप्लास्टिक एनीमिया जैसे गंभीर ब्लड रोगों में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट कई बार जीवन बचाने का एकमात्र विकल्प होता है. हालांकि सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त डोनर मिलना होता है. DKMS इंडिया के अनुसार देश में योग्य आबादी का बहुत छोटा हिस्सा ही संभावित स्टेम सेल डोनर के रूप में पंजीकृत है, जिससे मरीजों के लिए मैच ढूंढना मुश्किल हो जाता है. डॉक्टरों का मानना है कि अगर अधिक लोग स्टेम सेल डोनर के रूप में रजिस्टर करें, तो ब्लड कैंसर और अन्य गंभीर रक्त रोगों से जूझ रहे कई मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती है. 

इसे भी पढ़ें- Fruit Vs Juice: जूस पीने के बजाय फल खाने को क्यों कहते हैं डॉक्टर्स, क्या है वजह?

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

क्या होती है एंडोमेट्रियोसिस, जिसकी वजह से महिलाओं में हो जाता है बांझपन?

क्या होती है एंडोमेट्रियोसिस, जिसकी वजह से महिलाओं में हो जाता है बांझपन?


What Is Endometriosis And How It Causes Infertility: एंडोमेट्रियोसिस एक मुश्किल और अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली बीमारी है, जो दुनिया भर में बड़ी संख्या में महिलाओं को प्रभावित करती है. यह समस्या आमतौर पर किशोरावस्था में पहले पीरियड से शुरू होने के बाद से लेकर मेनोपॉज तक किसी भी उम्र में हो सकती है. डॉक्टरों के अनुसार कई मामलों में यही बीमारी आगे चलकर महिलाओं में प्रेग्नेंसी में परेशानी या बांझपन का कारण बन जाती है.

क्या होता है एंडोमेट्रियोसिस?

संयुक्त राष्ट्र की स्पेशल हेल्थ एजेंसी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस में यूट्रस की अंदरूनी परत शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ने लगता है. सामान्य स्थिति में यह टिश्यू सिर्फ यूट्रस की लाइनिंग में पाया जाता है, लेकिन इस बीमारी में यह ओवरी, फैलोपियन ट्यूब या पेल्विक क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी फैलाव हो सकता है. इससे शरीर में सूजन, दर्द और स्कार टिश्यू बनने लगते हैं, जो प्रजनन प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं. यही वजह है कि कई महिलाओं को प्रेग्नेंसी में दिक्कत होती है.

इसे भी पढ़ें- पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट का कहना है कि एंडोमेट्रियोसिस का सटीक कारण अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है. हालांकि नई रिसर्च में इसे इम्यून सिस्टम से जुड़ी गड़बड़ियों से भी जोड़ा गया है. कई मामलों में यह बीमारी परिवार में पहले से मौजूद रहने पर भी देखने को मिलती है. इसके अलावा जिन महिलाओं को ल्यूपस, मल्टीपल स्क्लेरोसिस या इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी इम्यून से जुड़ी बीमारियां होती हैं, उनमें इसका खतरा थोड़ा ज्यादा हो सकता है.

कैसे होता है इनकी पहचान?

इस बीमारी की पहचान करना भी आसान नहीं होता. कई बार इसके लक्षण अलग-अलग तरह के होते हैं, इसलिए डॉक्टरों को इसे पहचानने में समय लग जाता है. रिपोर्ट्स के अनुसार कई महिलाओं में सही निदान होने में औसतन 4 से 12 साल तक का समय लग सकता है. आमतौर पर लगातार पेल्विक दर्द, भारी ब्लीडिंग, पीरियड्स के दौरान तेज दर्द या गर्भधारण में दिक्कत जैसे संकेत इसके लक्षण हो सकते हैं. जांच के लिए अल्ट्रासाउंड, एमआरआई जैसे इमेजिंग टेस्ट किए जाते हैं, जबकि कुछ मामलों में लैप्रोस्कोपी सर्जरी के जरिए भी इसकी पुष्टि की जाती है. फिलहाल एंडोमेट्रियोसिस का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों को दवाओं या सर्जरी के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है.

इससे बचाव क्या हो सकता है?

अगर एंडोमेट्रियोसिस के कारण गर्भधारण में परेशानी आती है, तो डॉक्टर फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की सलाह दे सकते हैं. इसमें ओव्यूलेशन इंडक्शन, इंट्रायूटेरिन इंसैमिनेशन या इन विट्रो फर्टिलाइजेशन जैसे विकल्प शामिल होते हैं.

इसे भी पढ़ें- Cervical Cancer In India: हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, डॉक्टर से जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

इस बीमारी में घट जाती है मरीज की लंबाई, बेहद खतरनाक होते हैं इसके लक्षण

इस बीमारी में घट जाती है मरीज की लंबाई, बेहद खतरनाक होते हैं इसके लक्षण


Show Quick Read

Key points generated by AI, verified by newsroom

What is Granulomatous Hepatitis: कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो शरीर और दिमाग दोनों पर गहरा असर डालती हैं. लेकिन कुछ रेयर बीमारियां इतनी गंभीर होती हैं कि वे इंसान की लंबाई तक को प्रभावित कर सकती हैं. इंग्लैंड के विल्टशायर काउंटी की रहने वाली 63 वर्षीय कैरोलिन किंग की कहानी इसी तरह की एक रेयर बीमारी से जुड़ी है. उन्होंने अपनी आपबीती इसलिए साझा की ताकि लोग गंभीर बीमारियों के बावजूद उम्मीद न छोड़ें और समय रहते इलाज करवाने के महत्व को समझ सकें.

क्या हुई थी दिक्कत

बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के अनुसार,  कैरोलिन को शुरुआत में आंखों में अजीब सी जलन और खरोंच जैसी परेशानी महसूस हुई थी. जब वह डॉक्टर के पास गईं तो उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह एक गंभीर लिवर बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकता है. बाद में उन्होंने बताया कि पीछे मुड़कर देखने पर आज भी उन्हें विश्वास नहीं होता कि वह इतनी बड़ी बीमारी से गुजरने के बाद भी जिंदा हैं. ‘रेयर डिजीज डे’ के मौके पर उन्होंने अपनी बीमारी ग्रेनुलोमैटस हेपेटाइटिस के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए अपनी कहानी साझा की. यह लिवर से जुड़ी एक बेहद दुर्लभ बीमारी है, जिसके मामले डॉक्टरों को कई बार वर्षों में एक-दो ही देखने को मिलते हैं.

इसे भी पढ़ें- पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण

कैसे होती इसमें दिक्कत

कैरोलिन की परेशानी की शुरुआत साल 2018 में हुई, जब वह घर पर टीवी देख रही थीं. अचानक उनकी नजर धुंधली हो गई और आंखों में खरोंच जैसा एहसास होने लगा. शुरुआत में उन्होंने इसे साधारण समस्या समझा, लेकिन बाद में आंखों के विशेषज्ञ ने आंख में सूजन से जुड़ी बीमारी का पता लगाया. समस्या तब और गंभीर हो गई जब 2019 में उनकी आंखों और त्वचा का रंग पीला पड़ने लगा. इसके बाद डॉक्टरों ने लिवर की बायोप्सी कराने की सलाह दी. जांच में सामने आया कि उन्हें ग्रेनुलोमैटस हेपेटाइटिस नाम की दुर्लभ बीमारी है.

क्या होती है इसमें दिक्कत

बीमारी बढ़ने के साथ उनकी हालत काफी कमजोर हो गई. काफी ज्यादा थकान और मेंटल उलझन की वजह से वह सामान्य जीवन जीने में भी असमर्थ हो गईं और उन्हें व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा. डॉक्टरों ने उन्हें लिवर ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी और इसके लिए उन्हें लगभग छह महीने तक इंतजार करना पड़ा. इस दौरान दवाओं के प्रभाव से उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस हो गया. यह ऐसी बीमारी है जिसमें हड्डियां कमजोर और भंगुर हो जाती हैं. इसी वजह से उनकी लंबाई में भी बड़ा बदलाव आया. पहले उनका कद करीब पांच फुट चार इंच था, जो घटकर लगभग चार फुट छह इंच रह गया. हालांकि लिवर ट्रांसप्लांट और इलाज के बाद उनकी सेहत में धीरे-धीरे सुधार हुआ. कुछ वर्षों बाद उनकी आंखों और लिवर की काम करने की क्षमता बेहतर हुई और उनकी लंबाई भी बढ़कर करीब पांच फुट तक पहुंच गई.

इसे भी पढ़ें- Why Hands Go Numb At Night: सोते वक्त हाथ सुन्न हो जाए तो इसे फटाफट कैसे करें ठीक? अधिकतर लोग करते हैं ये मिस्टेक्स

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

चाय-कॉफी से नहीं मिटेगी शरीर की प्यास, डिहाइड्रेशन से बचने के लिए अपनाएं ये आदतें

चाय-कॉफी से नहीं मिटेगी शरीर की प्यास, डिहाइड्रेशन से बचने के लिए अपनाएं ये आदतें


How Much Water Should You Drink Daily: पानी शरीर के लिए सबसे जरूरी पोषक तत्वों में से एक है, लेकिन अक्सर लोग इसकी अहमियत को नजरअंदाज कर देते हैं. सही मात्रा में पानी पीना पाचन को बेहतर बनाने, शरीर में पोषक तत्वों को पहुंचाने, शरीर का तापमान संतुलित रखने और शरीर से गंदे पदार्थों को बाहर निकालने के लिए बेहद जरूरी होता है. पानी शरीर में इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बनाए रखने में भी मदद करता है. इसके अलावा यह जोड़ों को चिकनाई देता है, जिससे शरीर की गतिविधियां आसानी से हो पाती हैं.

TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमन पुरी बताते हैं कि पर्याप्त मात्रा में पानी पीना अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है. आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति को दिनभर में करीब 2 से 3 लीटर यानी लगभग 8 गिलास पानी पीने की सलाह दी जाती है. हालांकि हर व्यक्ति के लिए पानी की जरूरत अलग हो सकती है. यह उम्र, जेंडर, शारीरिक गतिविधि, मौसम और स्वास्थ्य की स्थिति जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है.

क्या चाय-कॉफी या जूस से पानी की जरूरत पूरी हो जाती है?

कई लोग यह मान लेते हैं कि चाय, कॉफी या जूस पीने से भी शरीर में पानी की कमी पूरी हो जाती है. हालांकि ऐसा पूरी तरह सही नहीं है. चाय और कॉफी में कैफीन की मात्रा ज्यादा होती है, जो शरीर में डिहाइड्रेशन को बढ़ा सकती है. वहीं पैकेट वाले जूस या मीठे पेय पदार्थों में ज्यादा शुगर और कैलोरी होती है, जो सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है. इसी तरह कार्बोनेटेड ड्रिंक्स में भी कैफीन और शुगर की मात्रा अधिक होती है, जो शरीर को सही तरीके से हाइड्रेट करने के बजाय उल्टा असर डाल सकती है.

इसे भी पढ़ें- Cervical Cancer In India: हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, डॉक्टर से जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके

कौन सा पानी बेहतर?

अगर किसी को सादा पानी पीना पसंद नहीं है, तो उसे थोड़ा स्वाद देकर भी पिया जा सकता है. इन्फ्यूज्ड वाटर यानी स्वाद वाले पानी का विकल्प काफी अच्छा माना जाता है. इसमें नींबू, पुदीना, अदरक, दालचीनी, सौंफ या हल्दी जैसी चीजें डालकर पानी को ज्यादा ताजगी भरा बनाया जा सकता है. इससे न सिर्फ पानी का स्वाद बेहतर होता है, बल्कि शरीर को एंटीऑक्सीडेंट्स का फायदा भी मिलता है.

फलों और सब्जियों के फ्लेवर

इसके अलावा फलों और सब्जियों से बने हल्के फ्लेवर वाले पेय भी शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद कर सकते हैं. संतरा, बेरी, सेब, खीरा, चुकंदर और गाजर जैसी चीजों को पानी में डालकर पीना एक अच्छा विकल्प हो सकता है. इससे शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी मिलते हैं और मेटाबॉलिज्म को भी बढ़ावा मिलता है. कुछ फल और सब्जियां ऐसी भी होती हैं जिनमें पानी की मात्रा ज्यादा होती है. तरबूज, खरबूजा, संतरा, स्ट्रॉबेरी, टमाटर, लेट्यूस और सेलरी जैसे फूड्स शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं. इसलिए इन्हें भी डाइट में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है. 

इसे भी पढ़ें- पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

सोते वक्त हाथ सुन्न हो जाए तो इसे फटाफट कैसे करें ठीक? अधिकतर लोग करते हैं ये मिस्टेक्स

सोते वक्त हाथ सुन्न हो जाए तो इसे फटाफट कैसे करें ठीक? अधिकतर लोग करते हैं ये मिस्टेक्स


Why Do Hands Go Numb While Sleeping: क्या कभी ऐसा हुआ है कि रात में नींद खुली और महसूस हुआ कि हाथ पूरी तरह सुन्न पड़ गया है, जैसे उसमें जान ही नहीं है? कई लोगों के साथ ऐसा होता है और यह कोई बहुत रेयर समस्या नहीं है. रिसर्च के अनुसार लगभग एक-तिहाई एडल्ट को हफ्ते में कम से कम एक बार सोते समय हाथ, कलाई या बाजू में सुन्नपन और झनझनाहट महसूस होती है. इस स्थिति को मेडिकल भाषा में नॉक्टर्नल पैरास्थीसिया कहा जाता है. ज्यादातर मामलों में यह गंभीर समस्या नहीं होती, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे या उठने के बाद भी लंबे समय तक बना रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है.

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था sleepfoundation के अनुसार, सोते समय हाथ सुन्न होने का सबसे आम कारण नसों पर दबाव पड़ना होता है. जब किसी वजह से नस दब जाती है या ब्लड फ्लो थोड़ी देर के लिए कम हो जाता है, तो हाथ में झनझनाहट या पिन्स एंड नीडल्स जैसा एहसास होने लगता है. यह शरीर का एक तरह का संकेत होता है कि किसी हिस्से पर दबाव पड़ रहा है और उसे सही स्थिति में लाने की जरूरत है.

गलत पोजीशन भी जिम्मेदार

कई बार सोने की गलत पोजीशन भी इसकी वजह बन जाती है. अगर आप कलाई को मोड़कर सोते हैं, हाथ को सिर के नीचे रख लेते हैं, बाजू पर सिर टिकाकर सोते हैं या शरीर का वजन हाथ पर आ जाता है, तो नसों पर दबाव पड़ सकता है. कुछ लोगों में तकिए की गलत ऊंचाई या गर्दन और रीढ़ की गलत स्थिति भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. ऐसे में हाथ तक जाने वाला ब्लड फ्लो कुछ समय के लिए कम हो जाता है और हाथ सुन्न महसूस होने लगता है.

इसे भी पढ़ें- Cervical Cancer In India: हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, डॉक्टर से जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके

इनके कारण भी होती है दिक्कत

कभी-कभी हाथों का सुन्न होना नसों से जुड़ी दूसरी समस्याओं का संकेत भी हो सकता है. उदाहरण के लिए पेरिफेरल न्यूरोपैथी में नसें ठीक से काम नहीं कर पातीं, जिससे हाथ-पैरों में सुन्नपन या जलन महसूस हो सकती है. इसके पीछे डायबिटीज, विटामिन की कमी, इंफेक्शन, कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट या अत्यधिक शराब का सेवन भी जिम्मेदार हो सकता है.

कैसे करें बचाव?

अगर नींद खुलने पर हाथ सुन्न महसूस हो, तो घबराने की जरूरत नहीं होती. आमतौर पर शरीर की पोजीशन बदलने, हाथ-पैरों को हल्का हिलाने-डुलाने या उंगलियों को धीरे-धीरे स्ट्रेच करने से कुछ ही मिनट में यह समस्या ठीक हो जाती है. हल्की मालिश करने या हाथों को गुनगुने पानी के नीचे रखने से भी ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और झनझनाहट कम हो जाती है. हालांकि अगर यह समस्या बार-बार हो रही हो या दर्द और कमजोरी भी महसूस हो, तो डॉक्टर से जांच करवाना बेहतर होता है.

इसे भी पढ़ें- पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

सिर्फ एक कॉमन वायरस की वजह से होता है पेट का कैंसर, जानें इससे बचने के तरीके

सिर्फ एक कॉमन वायरस की वजह से होता है पेट का कैंसर, जानें इससे बचने के तरीके


How H Pylori Causes Stomach Cancer: पेट में रहने वाला एक सामान्य बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पाइलोरी दुनिया भर में होने वाले पेट के कैंसर के बड़े कारणों में से एक माना जाता है. नेचर मेडिसिन में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार, गैस्ट्रिक कैंसर के करीब 76 प्रतिशत मामलों का संबंध इसी बैक्टीरिया से हो सकता है. रिसर्चर का अनुमान है कि 2008 से 2017 के बीच जन्मे लोगों में लगभग 1.6 करोड़ लोगों को जीवन में कभी न कभी पेट का कैंसर हो सकता है, जिनमें से करीब 1.2 करोड़ मामले सीधे तौर पर हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन से जुड़े हो सकते हैं. यह बैक्टीरिया पेट की अंदरूनी परत में रहता है और अक्सर लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के मौजूद रह सकता है. हालांकि कई लोगों को इसका पता ही नहीं चलता, लेकिन कुछ मामलों में यह पेट के अल्सर और गंभीर स्थिति में गैस्ट्रिक कैंसर का कारण बन सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट के अनुसार एशिया में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी से जुड़े पेट के कैंसर के सबसे ज्यादा मामले सामने आ सकते हैं, जहां करीब 80 लाख मामलों का अनुमान लगाया गया है, जबकि उत्तर और दक्षिण अमेरिका में मिलाकर करीब 15 लाख मामलों की संभावना जताई गई है. यही वजह है कि डॉक्टर इस इंफेक्शन को पहचानना बेहद जरूरी मानते हैं, क्योंकि यह कैंसर का ऐसा जोखिम कारक है जिसे समय रहते रोका जा सकता है.

इसे भी पढ़ें- पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण

किन लोगों में रहता है इसका खतरा ज्यादा?

कुछ लोगों में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन का खतरा ज्यादा होता है. खासकर पूर्वी एशिया, पूर्वी यूरोप और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में इसका जोखिम अधिक देखा गया है. इन इलाकों से आने वाले प्रवासी भी बचपन में हुए इंफेक्शन की वजह से प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा जिन लोगों के परिवार में पेट के कैंसर का इतिहास रहा हो, धूम्रपान करने वाले, मोटापे से ग्रस्त लोग, अधिक नमक या प्रोसेस्ड फूड खाने वाले और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी ज्यादा जोखिम में माने जाते हैं.

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन कई बार वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकता है, लेकिन लगभग 30 प्रतिशत लोगों में इससे जुड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं. इसके संकेतों में पेट में जलन या दर्द, थोड़ी मात्रा में खाने पर ही पेट भरा महसूस होना, मतली, बार-बार डकार आना, अपच, पेट फूलना या बिना कारण वजन कम होना शामिल हैं. अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है. पेट के कैंसर के खतरे को कम करने के लिए कुछ लाइफस्टाइल से जुड़े कदम भी मददगार हो सकते हैं. संतुलित आहार लेना, जिसमें फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल हों, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी करना, स्मोकिंग से दूरी रखना और शराब का सेवन सीमित करना महत्वपूर्ण माना जाता है.

इसे भी पढ़ें- Cervical Cancer In India: हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, डॉक्टर से जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp