पीरियड शुरू होने के कितने दिन बाद प्रेग्नेंसी के सबसे ज्यादा चांस, न्यू कपल्स के लिए जरूरी बात

पीरियड शुरू होने के कितने दिन बाद प्रेग्नेंसी के सबसे ज्यादा चांस, न्यू कपल्स के लिए जरूरी बात


How Many Days After Period Can You Get Pregnant: अगर आप प्रेग्नेंसी प्लान कर रहे हैं, तो सबसे पहले अपने मेंस्ट्रुअल साइकिल को समझना बहुत जरूरी है. आमतौर पर एक महिला का साइकिल करीब 28 दिनों का होता है, लेकिन यह 21 से 35 दिनों के बीच भी हो सकता है. हर साइकिल चार मुख्य चरणों में बंटा होता है और इन्हीं के आधार पर यह तय होता है कि प्रेग्नेंसी के चांसेस कब सबसे ज्यादा होते हैं. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

पीरियड्स को समझना सबसे जरूरी

cloudninecare की रिपोर्ट के अनुसार, साइकिल की शुरुआत पीरियड्स से होती है, जो लगभग 4 से 5 दिन तक चलते हैं. इस दौरान शरीर में हार्मोन का स्तर कम रहता है.  इसके बाद फॉलिक्युलर फेज आता है, जिसमें शरीर अगली ओव्यूलेशन के लिए तैयार होने लगता है. इस समय ओवरी में एग्स विकसित होते हैं और एस्ट्रोजन बढ़ने लगता है, जिससे गर्भाशय की परत मोटी होने लगती है. साइकिल का सबसे अहम समय ओव्यूलेशन होता है, जो आमतौर पर 28 दिन के साइकिल में 14वें दिन के आसपास होता है.

 इसी दौरान ओवरी से एक मैच्योर एग रिलीज होता है, जो लगभग 12 से 24 घंटे तक ही जीवित रहता है. इसके बाद ल्यूटल फेज आता है, जिसमें प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बढ़ता है और शरीर प्रेग्नेंसी के लिए तैयार होता है. अगर इस समय फर्टिलाइजेशन नहीं होता, तो हार्मोन गिरने लगते हैं और फिर से पीरियड्स शुरू हो जाते हैं.

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सबसे ज्यादा चांस कब?

अब बात आती है फर्टाइल डेज की, यानी वो दिन जब प्रेग्नेंसी के चांसेस सबसे ज्यादा होते हैं. ओव्यूलेशन इस पूरे प्रोसेस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन सिर्फ उसी दिन ही नहीं, उससे पहले के कुछ दिन भी उतने ही अहम होते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि स्पर्म महिला के शरीर में 5 दिनों तक जीवित रह सकता है. इसलिए ओव्यूलेशन से करीब 5 से 6 दिन पहले से लेकर ओव्यूलेशन के दिन तक का समय फर्टाइल विंडो माना जाता है. अगर आपका साइकिल 28 दिन का है, तो आमतौर पर 9वें दिन से 14वें दिन के बीच प्रेग्नेंसी के चांसेस सबसे ज्यादा होते हैं. हालांकि, हर महिला का साइकिल अलग होता है, इसलिए अपने शरीर के पैटर्न को समझना जरूरी है.

शरीर भी देता है संकेत

सिर्फ कैलेंडर देखना ही काफी नहीं होता, शरीर खुद भी संकेत देता है कि ओव्यूलेशन का समय नजदीक है. इस दौरान सर्वाइकल म्यूकस में बदलाव आता है, जो ज्यादा चिकना, पारदर्शी और खिंचाव वाला हो जाता है, बिल्कुल अंडे की सफेदी जैसा. कुछ महिलाओं को निचले पेट में हल्का दर्द भी महसूस होता है, जिसे मिडलशमर्ज कहा जाता है. व्यूलेशन के बाद बेसल बॉडी टेम्परेचर में हल्की बढ़ोतरी भी देखी जा सकती है.  इसके अलावा इस समय सेक्स ड्राइव भी बढ़ सकती है, जो शरीर का एक प्राकृतिक संकेत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की हार्ट हेल्थ के लिए कितनी खतरनाक? चौंका देगी यह स्टडी

ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की हार्ट हेल्थ के लिए कितनी खतरनाक? चौंका देगी यह स्टडी


आज के डिजिटल दौर में बच्चों की लाइफस्टाइल तेजी से बदल रही है. डिजिटल दौर में बच्चे होमवर्क से ब्रेक के दौरान, सोने से पहले, ऑनलाइन क्लास, गेमिंग और स्ट्रीमिंग के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. जिससे बच्चों का स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अब एक नई स्टडी में चेतावनी दी है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम सिर्फ आंखों या दिमाग पर ही नहीं बल्कि दिल की सेहत पर भी असर डाल सकता है. स्टडी के अनुसार खाली समय में स्क्रीन पर बिताया गया हर एक्स्ट्रा घंटा चाहे वह सोशल मीडिया स्क्रोल करना हो,  वेब सीरीज देखना हो या गेम खेलना हो बच्चों में हार्ट से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ा रहा है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों में हार्ट हेल्थ का खतरा कैसे बढ़ा रहा है और स्टडी में क्या सामने आया है?

क्या कहती है स्टडी? 

जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में पब्लिश रिसर्च के अनुसार बच्चों और किशोर में हर एक्स्ट्रा घंटे का स्क्रीन टाइम उनके कार्डियो मेटाबोलिक खतरे यानी दिल और मेटाबॉलिज्म से जुड़े खतरे को बढ़ा सकता है. इस रिसर्च में 1000 से ज्यादा बच्चों और युवाओं को शामिल किया गया था. वहीं रिसर्च में पाया गया है कि 6 से 10 साल के बच्चों में हर एक्स्ट्रा घंटे स्क्रीन टाइम से खतरा बढ़ता है. वहीं किशोर में यह असर और ज्यादा देखा गया है. इसके अलावा ज्यादा स्क्रीन टाइम का सीधा  संबंध नींद की कमी से भी जुड़ा पाया गया है. 

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नींद से जुड़ा बड़ा कनेक्शन 

स्टडी में यह भी सामने आया है कि कम नींद लेने वाले बच्चों में यह खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित होती है, जिससे शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर पड़ता है. रिसर्च के अनुसार स्क्रीन टाइम और हार्ड डिस्क के बीच 12 प्रतिशत संबंध नींद की कमी के जरिए बनता है. यानी अगर बच्चों की नींद बेहतर होती है तो कुछ हद तक खतरा कम किया जा सकता है. वहीं एक्सपर्ट्स के अनुसार लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना, बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी को कम कर देता है. इससे वजन बढ़ने का खतरा, ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल प्रभावित हो सकते हैं और शरीर में फैट और कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है. यह सभी फैक्टर आगे चलकर दिल की बीमारियों का कारण बन सकते हैं. 

भारत में क्यों बढ़ रही चिंता?

भारत में भी बच्चों में स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ा है, खासकर ऑनलाइन पढ़ाई और स्मार्टफोन के इस्तेमाल के बाद में यह टाइम ज्यादा हो गया है. ऐसे में यह स्टडी भारतीय परिवारों के लिए भी बहुत जरूरी मानी जा रही है. क्योंकि यहां भी बच्चों की नींद और एक्टिविटी पर असर देखा गया है. हालांकि इसे लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों की लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव करके इस खतरे को कम किया जा सकता है. जैसे रोजाना स्क्रीन टाइम सीमित रखना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना, बच्चों को खेलकूद और फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करना और घर में कुछ समय और जगह को नो स्क्रीन बनाना बनाने जैसी चीजों से पेरेंट्स बदलाव कर सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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संजय बांगर की बेटी अनाया ने कराई जेंडर अफर्मिंग सर्जरी, जानिए क्या होती है यह प्रक्रिया?

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टाइप 1 डायबिटीज है तो पढ़ लें यह रिसर्च, मेमोरी लॉस होने का बड़ा खतरा

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Can Type 1 Diabetes Cause Memory Loss: जैसे-जैसे टाइप 1 डायबिटीज के मरीज अब पहले से ज्यादा उम्र तक जी रहे हैं, वैसे-वैसे इसके लंबे असर भी सामने आने लगे हैं. एक बड़ी नई रिसर्च में पाया गया है कि टाइप 1 डायबिटीज से पीड़ित लोगों में डिमेंशिया यानी याददाश्त कमजोर होना का खतरा सामान्य लोगों के मुकाबले लगभग तीन गुना ज्यादा हो सकता है. इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि यह बीमारी समय के साथ दिमाग पर कैसे असर डालती है. 

क्या निकला रिसर्च में?

न्यूरोलॉजी जर्नल में पब्लिश इस स्टडी में करीब 2.8 लाख लोगों का डेटा देखा गया. इनमें से 5,442 लोगों को टाइप 1 डायबिटीज थी. इस ग्रुप में से 144 लोगों को बाद में डिमेंशिया हुआ, यानी करीब 2.6 प्रतिशत लोगों को. वहीं जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उनमें यह आंकड़ा सिर्फ 0.6 प्रतिशत था. उम्र और पढ़ाई जैसे फैक्टर को ध्यान में रखने के बाद भी टाइप 1 डायबिटीज वालों में खतरा लगभग तीन गुना ज्यादा पाया गया. टाइप 2 डायबिटीज में भी ऐसा ही ट्रेंड दिखा, लेकिन वहां खतरा करीब दो गुना था. हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह डेटा हेल्थ रजिस्ट्री से लिया गया था, इसलिए कुछ मामलों में गलत या अधूरी जानकारी भी हो सकती है.

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क्यों होता है ऐसा खतरा?

अब सवाल यह है कि टाइप 1 डायबिटीज में ऐसा क्यों होता है? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यह बीमारी अक्सर कम उम्र में ही शुरू हो जाती है. यानी व्यक्ति लंबे समय तक इस बीमारी के साथ जीता है, जिससे दूसरी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. दूसरी अहम वजह है ब्लड शुगर का बार-बार ऊपर-नीचे होना.  टाइप 1 डायबिटीज में शुगर लेवल बहुत तेजी से गिरता और बढ़ता है. खासकर लो ब्लड शुगर ब्रेन के लिए खतरनाक होता है, क्योंकि इससे ब्रेन सेल्स पर दबाव पड़ता है. इतना ही नहीं, जब लो शुगर के बाद अचानक हाई शुगर हो जाती है, तो यह दिमाग के उस हिस्से को ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है, जो याददाश्त और सीखने से जुड़ा होता है. 

इंसुलिन की भी अहम भूमिका

इंसुलिन भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है. शरीर में एक एंजाइम होता है, जो इंसुलिन और एक खास प्रोटीन दोनों को तोड़ता है.  यही प्रोटीन अल्जाइमर से जुड़ा होता है. जब शरीर में इंसुलिन ज्यादा होता है, तो यह एंजाइम पहले इंसुलिन को तोड़ने में लग जाता है और एमाइलॉयड बीटा दिमाग में जमा होने लगता है. यह जमा हुआ प्रोटीन दिमाग में प्लाक बनाता है, जिससे ब्रेन सेल्स के बीच कम्युनिकेशन खराब होता है और धीरे-धीरे याददाश्त कमजोर होने लगती है. टाइप 1 डायबिटीज वाले लोगों में अल्जाइमर और वेस्कुलर डिमेंशिया दोनों का खतरा बढ़ जाता है. 

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परमाणु हमला हो जाए तो कैसे बचेगी जान, रेडिएशन फॉलआउट से कैसे बचा सकते हैं अपना पूरा परिवार?

परमाणु हमला हो जाए तो कैसे बचेगी जान, रेडिएशन फॉलआउट से कैसे बचा सकते हैं अपना पूरा परिवार?


What To Do During A Nuclear Attack: अगर आपके शहर पर कभी परमाणु हमला हो जाए, तो घबराने के बजाय सही जानकारी और तुरंत लिए गए फैसले आपकी और आपके परिवार की जान बचा सकते हैं. ऐसे हालात में सबसे बड़ा खतरा सिर्फ धमाका नहीं, बल्कि उसके बाद फैलने वाला रेडिएशन फॉलआउट होता है, जो हवा, पानी और जमीन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है. सबसे पहले समझना जरूरी है कि परमाणु विस्फोट के बाद छोटे-छोटे रेडियोएक्टिव कण हवा में फैल जाते हैं और धीरे-धीरे जमीन पर गिरते हैं. यही फॉलआउट सबसे ज्यादा खतरनाक होता है. इसलिए बचाव के तीन सबसे अहम तरीके हैं डिस्टेंस, शील्डिंग और टाइम . 

हमले के बाद क्या करना चाहिए?

American Red Cross की रिपोर्ट के अनुसार,  हमले की स्थिति में जितनी जल्दी हो सके किसी मजबूत इमारत के अंदर चले जाएंय अगर संभव हो तो बेसमेंट या जमीन के नीचे वाली जगह सबसे सुरक्षित मानी जाती है. अगर नीचे जाने का विकल्प न हो, तो इमारत के बीच वाले हिस्से में रहें, जहां खिड़कियां कम हों और दीवारें मोटी हों. ईंट, कंक्रीट और मोटी दीवारें रेडिएशन से बचाने में मदद करती हैं.

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किस बात का ध्यान रखना चाहिए?

ध्यान रखें कि बाहर की हवा सबसे ज्यादा खतरनाक होती है, इसलिए घर या शेल्टर में जाकर दरवाजे-खिड़कियां बंद कर लें. पंखे, एसी या ऐसी मशीनें बंद कर दें जो बाहर की हवा अंदर लाती हैं. शुरुआती समय में रेडिएशन का स्तर सबसे ज्यादा होता है, इसलिए कम से कम 24 घंटे तक अंदर रहना जरूरी होता है, हालांकि कुछ मामलों में यह समय और भी ज्यादा हो सकता है .

बाहर होने पर क्या करें?

अगर आप हमले के समय बाहर फंस जाएं, तो तुरंत जमीन पर लेट जाएं और सिर को ढक लें. किसी मजबूत चीज के पीछे छिपने की कोशिश करें. मुंह और नाक को कपड़े या मास्क से ढक लें ताकि रेडियोएक्टिव कण शरीर के अंदर न जा सकें. जैसे ही मौका मिले, तुरंत किसी सुरक्षित जगह पर पहुंच जाएं, क्योंकि ये कण हवा के साथ दूर-दूर तक फैल सकते हैं. अगर आप बाहर थे और फिर अंदर आए हैं, तो खुद को साफ करना भी बेहद जरूरी है. अपने कपड़े बदलें और उन्हें अलग करके पैक कर दें. नहाने का मौका मिले तो साबुन और पानी से शरीर और बाल अच्छी तरह साफ करें. इससे शरीर पर जमे खतरनाक कण काफी हद तक हट सकते हैं. 

निर्देशों का पालन करें

इस दौरान आधिकारिक निर्देशों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. रेडियो, टीवी या मोबाइल के जरिए मिलने वाली जानकारी को फॉलो करें और बिना निर्देश के बाहर न निकलें.

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घर में इस कॉमन दिक्कत से हर साल 40 लाख लोग गंवा रहे जान, कहीं आप भी तो नहीं करते यह गलती?

घर में इस कॉमन दिक्कत से हर साल 40 लाख लोग गंवा रहे जान, कहीं आप भी तो नहीं करते यह गलती?


Why Indoor Air Pollution Is Dangerous: घर के अंदर की हवा भी कितनी खतरनाक हो सकती है, इस पर हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने गंभीर चिंता जताई है.  इस रिसर्च से जुड़े एपिडेमियोलॉजिस्ट विक्रम निरंजन ने इसे “ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी तक बता दिया है और इस पर तुरंत कार्रवाई की जरूरत बताई है. Thecooldown में पब्लिश यह स्टडी 1990 से 2021 के बीच 204 देशों में घरेलू वायु प्रदूषण के असर को समझने के लिए किया गयाय इसमें पाया गया कि दुनिया के कई हिस्सों में आज भी लोग खाना बनाने के लिए लकड़ी, कोयला और गोबर जैसे पारंपरिक ईंधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो घर के अंदर की हवा को बेहद जहरीला बना देते हैं.

हर साल होती है इतने लाख लोगों की मौत

हालांकि समय के साथ इन ठोस ईंधनों का उपयोग कुछ हद तक कम हुआ है, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई. खासकर अफ्रीका और दक्षिण एशिया के कई क्षेत्रों में आज भी साफ और सुरक्षित ईंधन तक लोगों की पहुंच सीमित है. वहीं, विकसित देशों में बेहतर विकल्प मिलने के कारण इस समस्या में कमी आई है. यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि इनडोर एयर पॉल्यूशन कई गंभीर बीमारियों से जुड़ा हुआ है. रिसर्च के मुताबिक, बचपन में प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से सांस से जुड़ी समस्याएं, दिमागी विकास पर असर और लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य परेशानियां हो सकती हैं. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार, हर साल करीब 40 लाख लोगों की मौत समय से पहले सिर्फ घर के अंदर की प्रदूषित हवा के कारण हो जाती है.

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किन जगहों पर होती है दिक्कत?

समस्या सिर्फ गरीब देशों तक सीमित नहीं है. गैस चूल्हे भी एक बड़ा कारण बन रहे हैं, क्योंकि ये घर के अंदर बेंजीन और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें छोड़ते हैं. एक हालिया स्टडी में यह भी सामने आया कि अमेरिका में बच्चों के अस्थमा के हर आठ में से एक केस के पीछे गैस स्टोव जिम्मेदार हो सकते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए साफ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ना जरूरी है.

इंडक्शन स्टोव जैसे विकल्प बेहतर माने जा रहे हैं, क्योंकि ये न सिर्फ कम ऊर्जा खर्च करते हैं, बल्कि हानिकारक गैसें भी नहीं छोड़ते. कुछ देशों में सरकारें लोगों को ऐसे उपकरण अपनाने के लिए सब्सिडी और छूट भी दे रही हैं. विक्रम निरंजन का कहना है कि सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को मिलकर ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिससे हर व्यक्ति तक साफ ईंधन की पहुंच सुनिश्चित हो सके.

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