थकान और जोड़ों के दर्द को न लें हल्के में, आंतों से शुरू हो सकती है ये बीमारी

थकान और जोड़ों के दर्द को न लें हल्के में, आंतों से शुरू हो सकती है ये बीमारी


Can Fatigue And Bloating Be Signs Of Autoimmune Disease: अक्सर हम अपने शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. थकान को तनाव समझ लेते हैं, पेट फूलने को खाने की गड़बड़ी मान लेते हैं और जोड़ों के दर्द को उम्र या काम का असर कहकर टाल देते हैं. लेकिन कई बार ये अलग-अलग समस्याएं नहीं होतीं, बल्कि एक बड़े कारण की ओर इशारा करती हैं कि इम्यून सिस्टम का असंतुलन, जिसकी शुरुआत गट से हो सकती है. 

कैसे होते हैं इसके संकेत?

दरअसल, ऑटोइम्यून बीमारियां शुरुआत में जोर से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे संकेत देती हैं. शरीर इनको लेकर शोर नहीं मचाता, बल्कि हल्के-हल्के संकेत देता है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. कई मामलों में इसकी शुरुआत गट से होती है, जहां से इम्यून सिस्टम का बड़ा हिस्सा नियंत्रित होता है. गट सिर्फ पाचन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह शरीर का एक बड़ा इम्यून सेंटर भी है. लगभग 70 प्रतिशत इम्यून गतिविधियां गट की परत में होती हैं. यहां मौजूद माइक्रोबायोम यानि बैक्टीरिया, वायरस और फंगस का एक संतुलित समूह इम्यून सिस्टम को सही तरीके से काम करने में मदद करता है. लेकिन जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो शरीर की इम्यून सिस्टम खुद ही भ्रमित होने लगती है.

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जब गट की परत कमजोर हो जाती है, जिसे आमतौर पर लीकी गट कहा जाता है, तो हानिकारक तत्व खून में पहुंच सकते हैं. इससे इम्यून सिस्टम बार-बार सक्रिय होता है और सूजन बढ़ने लगती है. समय के साथ यही स्थिति ऑटोइम्यून समस्याओं का कारण बन सकती है.

शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

इसके शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य लगते हैं, जैसे लगातार थकान, बार-बार पेट फूलना, दिमाग में धुंधलापन, हल्का लेकिन बार-बार होने वाला जोड़ों का दर्द या त्वचा से जुड़ी समस्याएं. ये संकेत अकेले देखने पर गंभीर नहीं लगते, लेकिन अगर ये लंबे समय तक बने रहें या एक साथ दिखें, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी का एक कारण मॉलिक्यूलर मिमिक्री भी हो सकता है. इसमें कुछ बैक्टीरिया शरीर के अपने टिश्यू जैसे दिखते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम भ्रमित होकर शरीर के ही हिस्सों पर हमला करने लगता है. यही प्रक्रिया धीरे-धीरे ऑटोइम्यून बीमारियों को जन्म देती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. अनिरुद्ध मसलेकर ने TOI को बताया कि ऑटोइम्यून बीमारियां हमेशा वहीं से शुरू नहीं होतीं जहां लक्षण दिखते हैं. कई मामलों में इसकी शुरुआत गट से जुड़े इम्यून असंतुलन से हो सकती हैं.  वे बताते हैं कि शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं, इसलिए लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे जांच में देरी हो जाती है.  डॉक्टरों का मानना है कि अगर थकान, पेट की समस्या और सूजन जैसे लक्षण एक साथ और लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. समय रहते पहचान हो जाए, तो इन बीमारियों को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कमर दर्द के साथ दिखें ये बदलाव तो तुरंत कराएं जांच, हो सकती है किडनी फेल

कमर दर्द के साथ दिखें ये बदलाव तो तुरंत कराएं जांच, हो सकती है किडनी फेल


How Back Pain Can Indicate Kidney Disease: पीठ दर्द आमतौर पर एक सामान्य समस्या माना जाता है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पोश्चर या ज्यादा एक्सरसाइज, इन वजहों को अक्सर इसका कारण मान लिया जाता है. ज्यादातर मामलों में यह सही भी होता है. लेकिन कई बार शरीर ऐसे संकेत देता है, जो सिर्फ मांसपेशियों तक सीमित नहीं होते. लगातार बना रहने वाला, अलग तरह का महसूस होने वाला दर्द किडनी से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है. 

मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, हर तरह का बैक पेन एक जैसा नहीं होता. मांसपेशियों से जुड़ा दर्द आमतौर पर मूवमेंट से बढ़ता है, आराम करने पर कम होता है और गर्म सिकाई या स्ट्रेचिंग से राहत मिलती है. लेकिन किडनी से जुड़ा दर्द अलग तरह का होता है कि यह गहराई में महसूस होता है, मूवमेंट से ज्यादा प्रभावित नहीं होता और आराम करने पर भी आसानी से नहीं जाता. यही फर्क इसे पहचानने में अहम बनाता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. रतन झा ने TOI को बताया कि अक्सर बैक पेन को मसल्स की समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, खासकर जब यह धीरे-धीरे शुरू होता है. लेकिन किडनी से जुड़ा दर्द अलग व्यवहार करता है, जिसे समझना जरूरी है. 

क्या होते हैं किडनी दिक्कतें?

किडनी से जुड़ी समस्याएं शुरुआत में तेज लक्षणों के साथ नहीं आतीं। यह धीरे-धीरे बढ़ती हैं और सामान्य परेशानियों के पीछे छिप जाती हैं. पेशाब के पैटर्न में बदलाव, जलन, पेशाब का रंग गहरा होना या आंखों और पैरों के आसपास हल्की सूजन, ये सभी संकेत हो सकते हैं कि समस्या सिर्फ पीठ दर्द तक सीमित नहीं है. इसके अलावा लगातार थकान या शरीर में भारीपन महसूस होना भी एक संकेत हो सकता है.

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डॉ. हिमा दीप्ति अल्ला बताती हैं कि किडनी से जुड़ा दर्द हमेशा तेज नहीं होता. यह अक्सर कमर या साइड में हल्का लेकिन लगातार रहने वाला दर्द होता है, जिसे लोग पोश्चर या लंबे समय तक बैठने का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. 

शरीर देता है चेतावनी

कई बार शरीर छोटे-छोटे बदलावों के जरिए चेतावनी देता है.जैसे झागदार पेशाब, ऐसा महसूस होना कि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हुआ या ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव. ये लक्षण आमतौर पर लोग रोजमर्रा में नोटिस नहीं करते, लेकिन यही शुरुआती संकेत हो सकते हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के आंकड़ों के मुताबिक, क्रॉनिक किडनी डिजीज अक्सर शुरुआती स्टेज में इसलिए पकड़ में नहीं आती क्योंकि इसके लक्षण बहुत हल्के या अस्पष्ट होते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि हमारी रोज की आदतें भी किडनी हेल्थ पर बड़ा असर डालती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आप भी रहते हैं हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट को लेकर कन्फ्यूज, जानें दोनों में क्या अंतर?

क्या आप भी रहते हैं हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट को लेकर कन्फ्यूज, जानें दोनों में क्या अंतर?


Difference Between Heart Attack And Cardiac Arrest: कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिसको लेकर लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं. उन्हीं में से एक है हार्ट से जुड़ी दो गंभीर स्थितियां, हार्ट अटैक और सडन कार्डियक अरेस्ट, यह अक्सर लोगों को एक जैसी लगती हैं, लेकिन असल में दोनों बिल्कुल अलग होती हैं. आसान भाषा में समझें तो हार्ट अटैक ब्लड के फ्लो  से जुड़ी समस्या है, जबकि कार्डियक अरेस्ट दिल की इलेक्ट्रिकल सिस्टम में गड़बड़ी का नतीजा होता है. 

क्या होता है हार्ट अटैक?

हार्ट के बारे में जानकारी देने वाली संस्था अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, हार्ट अटैक तब होता है जब दिल तक खून पहुंचाने वाली किसी आर्टरीज में ब्लॉकेज हो जाता है. इस वजह से दिल के एक हिस्से तक खून और ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती. अगर समय रहते ब्लॉकेज नहीं हटाया गया, तो उस हिस्से की मांसपेशियां धीरे-धीरे डैमेज होने लगती हैंय
हार्ट अटैक के लक्षण कई बार अचानक और तेज हो सकते हैं, लेकिन कई मामलों में यह धीरे-धीरे भी शुरू होता है, जैसे सीने में हल्का दर्द, दबाव, सांस लेने में तकलीफ या थकान. खास बात यह है कि हार्ट अटैक के दौरान दिल धड़कना बंद नहीं करता. महिलाओं में इसके लक्षण पुरुषों से अलग भी हो सकते हैं, इसलिए अक्सर इसे पहचानना मुश्किल हो जाता है.

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क्या होता है सडन कार्डियक अरेस्ट?

सडन कार्डियक अरेस्ट अचानक होता है और कई बार बिना किसी चेतावनी के सामने आता है. इसमें दिल की धड़कन को नियंत्रित करने वाला इलेक्ट्रिकल सिस्टम फेल हो जाता है, जिससे दिल अनियमित तरीके से धड़कने लगता है या पूरी तरह रुक जाता है. ऐसी स्थिति में दिल शरीर के जरूरी अंगों जैसे दिमाग और फेफड़ों तक खून नहीं पहुंचा पाता. इसमें व्यक्ति तुरंत बेहोश हो जाता है, पल्स नहीं मिलती और अगर कुछ ही मिनटों में मदद न मिले, तो जान जाने का खतरा होता है.

दोनों के बीच क्या कनेक्शन है?

हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट आपस में जुड़े हो सकते हैं. कई बार हार्ट अटैक के दौरान या उसके बाद कार्डियक अरेस्ट हो सकता है. हालांकि, हर हार्ट अटैक कार्डियक अरेस्ट में नहीं बदलता.लेकिन यह जरूर है कि हार्ट अटैक से कार्डियक अरेस्ट का जोखिम बढ़ जाता है. इसके अलावा, दिल से जुड़ी अन्य समस्याएं भी हार्ट रिद्म को बिगाड़कर कार्डियक अरेस्ट का कारण बन सकती हैं.

हार्ट अटैक की स्थिति में क्या करें?

अगर हार्ट अटैक का शक हो, तो बिना समय गंवाए तुरंत इमरजेंसी नंबर पर कॉल करें. हर मिनट कीमती होता है। एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचना बेहतर होता है, क्योंकि मेडिकल टीम रास्ते में ही इलाज शुरू कर सकती है और अस्पताल में भी जल्दी उपचार मिल पाता है.

कार्डियक अरेस्ट में क्या करें?

सडन कार्डियक अरेस्ट जानलेवा स्थिति है और तुरंत कार्रवाई जरूरी होती है. ऐसे में कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन यानी सीपीआर देना जीवन बचा सकता है. समय पर सीपीआर मिलने से व्यक्ति के बचने की संभावना दोगुनी या तिगुनी तक हो सकती है. हार्ट से जुड़ी इन दोनों स्थितियों का फर्क समझना बेहद जरूरी है. सही समय पर पहचान और तुरंत मदद ही जान बचाने में सबसे अहम भूमिका निभाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सीने में इंफेक्शन से कब हो जाती है इंसान की मौत, आशा भोसले का इसी बीमारी से हुआ निधन?

सीने में इंफेक्शन से कब हो जाती है इंसान की मौत, आशा भोसले का इसी बीमारी से हुआ निधन?


Asha Bhosle Death Reason: भारतीय संगीत की सबसे महान गायिकाओं में से एक आशा भोसले का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है. उन्हें शनिवार को  ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जब उन्हें दिल और सांस से जुड़ी दिक्कतें हुईं. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. हालत बिगड़ने पर उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पताल लाया गया, जहां शनिवार रात उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया था. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे सीने में इंफेक्शन से इंसान की मौत हो जाती है. 

सीने का इंफेक्शन कई बार मामूली सर्दी-खांसी जैसा लगता है, लेकिन कुछ मामलों में यही समस्या तेजी से गंभीर रूप ले सकती है. प्न्यूमोनिया एक ऐसी ही स्थिति है, जिसमें फेफड़ों में इंफेक्शन हो जाता है. यह बैक्टीरिया, वायरस या फंगस के कारण होता है और फेफड़ों के टिश्यू में सूजन के साथ उनमें पानी या पस भर सकता है. यही वजह है कि सांस लेना मुश्किल होने लगता है और ऑक्सीजन का स्तर गिर सकता है. 

लंग्स होते हैं प्रभावित

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार,  प्न्यूमोनिया एक या दोनों फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है। जब दोनों फेफड़े इंफेक्टेड होते हैं, तो इसे डबल या बाइलेटरल प्न्यूमोनिया कहा जाता है, जो ज्यादा खतरनाक हो सकता है. खासकर बैक्टीरियल प्न्यूमोनिया वायरल की तुलना में ज्यादा गंभीर माना जाता है और कई बार अस्पताल में भर्ती की जरूरत पड़ सकती है.  रिपोर्ट में बताया गया है कि सीने का इंफेक्शन तब जानलेवा बनता है, जब यह तेजी से बढ़कर शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई को प्रभावित करने लगता है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो फेफड़ों में सूजन बढ़ती जाती है और सांस लेने में दिक्कत गंभीर रूप ले लेती है. ऐसी स्थिति में मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट तक की जरूरत पड़ सकती है.

अलग- अलग तरह के इंफेक्शन

प्न्यूमोनिया के अलग-अलग प्रकार भी होते हैं, जो इसकी गंभीरता तय करते हैं. कम्युनिटी-एक्वायर्ड प्न्यूमोनिया आमतौर पर बाहर से होने वाला इंफेक्शन है, जबकि हॉस्पिटल-एक्वायर्ड प्न्यूमोनिया ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि यह एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से होता है और इलाज मुश्किल हो सकता है। इसी तरह वेंटिलेटर पर रहने वाले मरीजों में होने वाला इंफेक्शन भी जानलेवा साबित हो सकता है.

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65 साल से ऊपर के लोगों को ज्यादा खतरा

सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जिनकी इम्यूनिटी कमजोर होती है. 65 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग, छोटे बच्चे, पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोग, स्मोकिंग करने वाले या कीमोथेरेपी जैसी ट्रीटमेंट ले रहे मरीज इस जोखिम में ज्यादा आते हैं. ऐसे लोगों में इंफेक्शन तेजी से बढ़ सकता है और हालत जल्दी बिगड़ सकती है.

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क्या फ्रूट जूस पीने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर? जानिए सच्चाई

क्या फ्रूट जूस पीने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर? जानिए सच्चाई


आजकल इंटरनेट पर हर जगह यह कहा जा रहा है कि फ्रूट जूस पीने से डायबिटीज होती है और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? इसका जवाब आपकी सोच से थोड़ा पेचीदा है. यह समझना बहुत ज़रूरी है कि बोली हुई बातों और असल बातों के बीच क्या फर्क है?

एक्सपर्ट की क्या है राय?

BDR Pharmaceuticals के टेक्निकल डायरेक्टर डॉ. अरविंद बडिगेर  के अनुसार फ्रूट जूस को अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए एक अच्छा विकल्प माना जा सकता है, क्योंकि इसमें कई तरह के पोषक तत्व होते हैं. लेकिन इसका ब्लड शुगर को कंट्रोल करने पर असर थोड़ा चिंता का विषय हो सकता है. हालांकि इसे पीना नुकसानदायक नहीं है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कितनी मात्रा में और कब पीते हैं.

एक रिसर्च से पता चलता है कि फ्रूट जूस में ग्लाइसेमिक इंडेक्स मध्यम से थोड़ा ज्यादा होता है, यानी यह जल्दी पचता है और खाने के बाद कुछ समय के लिए ब्लड शुगर बढ़ा सकता है. साथ ही यह एक सामान्य प्रक्रिया है, क्योंकि आप जूस के रूप में ज्यादा मात्रा में शुगर ले रहे होते हैं.

फ्रूट जूस और साबुत फल में फर्क

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि फ्रूट जूस और साबुत फल दोनों में काफी फर्क होता है. साबुत फल में फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जो शरीर में शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. वहीं, जब हम फल का जूस बनाते हैं, तो उसमें से ज्यादातर फाइबर निकल जाता है और केवल शुगर वाला लिक्विड बच जाता है. यही कारण है कि जूस पीने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है.

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क्या फ्रूट जूस नुकसानदायक है?

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फ्रूट जूस पूरी तरह से नुकसानदायक है. कई स्टडी और मेटा-एनालिसिस में यह पाया गया है कि अगर जूस को सीमित मात्रा में पी लिया जाए तो यह सीधे तौर पर डायबिटीज का कारण नहीं बनता. यानी समस्या जूस में नहीं, बल्कि उसकी मात्रा और सेवन के तरीके में होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि जूस पीने के बाद ब्लड शुगर का स्तर जल्दी बढ़ सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद प्राकृतिक शुगर बिना फाइबर के सीधे खून में पहुंच जाती है. यही कारण है कि डायबिटीज या प्रीडायबिटीज वाले लोगों को जूस का सेवन सोच-समझकर करना चाहिए.

फ्रूट जूस में शुगर कैसे काम करती है?

फ्रूट जूस में मौजूद नैचुरल शुगर दो तरह की होती है फ्रक्टोज और ग्लूकोज. यह प्रोसेस्ड ड्रिंक्स से अलग होती है, क्योंकि यह सीधे फलों से आती है. लेकिन फ्रूट जूस पीने के तरीके में एक बड़ा फर्क होता है. जूस बनाने के दौरान फल का ज्यादातर फाइबर निकल जाता है, जबकि फाइबर बहुत जरूरी होता है, क्योंकि यह शरीर में शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. जब फाइबर नहीं होता, तो जूस में मौजूद शुगर जल्दी शरीर में अवशोषित हो जाती है और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है.

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अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या पड़ता है असर? जान लीजिए नुकसान

अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या पड़ता है असर? जान लीजिए नुकसान


Effects of quitting gym suddenly: आजकल फिट रहने के लिए जिम जाना लोगों की लाइफस्टाइल का बहुत जरूरी हिस्सा बन चुका है. नियमित वर्कआउट न सिर्फ शरीर को मजबूत बनाता है, बल्कि मेंटल रूप से भी व्यक्ति को एक्टिव और रिलैक्स रखता है. जिम में एक्सरसाइज करने से मांसपेशियां मजबूत होती है, स्टेमिना बढ़ता है और शरीर में एनर्जी बनी रहती है. यही वजह है की बड़ी संख्या में लोग उत्साह के साथ जिम ज्वाइन करते हैं. लेकिन समय की कमी, आलस या मोटिवेशन की कमी के कारण कई लोग बीच में ही छोड़ देते हैं. ऐसे में शरीर पर इसके कई नेगेटिव असर देखने को मिल सकते हैं. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अचानक जिम छोड़ने से शरीर पर क्या असर पड़ता है और इसके नुकसान क्या-क्या होते हैं?

वजन बढ़ने लगता है

जिम छोड़ने के बाद सबसे पहले असर वजन पर पड़ता है. नियमित एक्सरसाइज के दौरान कैलोरीज बर्न होती है या अचानक रुक जाती है. ऐसे में शरीर में एक्स्ट्रा कैलोरी जमा होने लगती है और वजन तेजी से बढ़ सकता है. खासकर पेट की चर्बी बढ़ने का खतरा ज्यादा रहता है.

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मांसपेशियां कमजोर होने लगती है

वर्कआउट के दौरान मांसपेशियां मजबूत और एक्टिव रहती है. लेकिन जिम छोड़ने के बाद धीरे-धीरे उनकी ताकत कम होने लगती है. कुछ हफ्तों में ही मसल्स सिकुड़ने लगती है और शरीर में कमजोरी व थकान महसूस होने लगती है. छोटी-छोटी एक्टिविटी में भी पहले के मुकाबले ज्यादा थकावट महसूस हो सकती है.

सहनशक्ति और स्टैमिना में गिरावट

जिम करने से शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है, लेकिन एक्सरसाइज बंद करते ही यह धीरे-धीरे कम होने लगती है. करीब एक दो हफ्ते में ही शरीर की कार्डियो फिटनेस पर असर दिखने लगता है. वीओ2 मैक्स में गिरावट आने से शरीर की ऑक्सीजन उपयोग करने की क्षमता घटती है और थोड़ी सी मेहनत में भी सांस फूलने लगती है.

मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ता है

नियमित वर्कआउट से मेटाबॉलिज्म तेज रहता है, जिससे शरीर कैलोरी जल्दी बर्न करता है. लेकिन जिम छोड़ने के बाद मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है. इसका सीधा असर वजन और बॉडी फैट पर पड़ता है, जिससे शरीर में चर्बी बढ़ने लगती है.

मानसिक तनाव और मूड पर असर

एक्सरसाइज करने से शरीर में हैप्पी हार्मोन रिलीज होते हैं, जिससे मूड अच्छा रहता है. लेकिन वर्कआउट बंद करने के कुछ ही दिनों में मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ सकता है. कई लोगों को थकान, उदासी और मोटिवेशन की कमी महसूस होने लगती है.

ब्लड शुगर और बीमारियों का खतरा

एक्सरसाइज बंद करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है. क्योंकि शरीर ग्लूकोज का उपयोग कम करने लगता है. लंबे समय तक एक्टिविटी कम करने से इंसुलिन संवेदनशीलता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ता है. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट प्रॉब्लम जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है.

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