क्या नींद में सपना देखकर आप भी चलाते हैं हाथ-पैर? इसे ‘नॉर्मल’ समझकर न करें नजरअंदाज!

क्या नींद में सपना देखकर आप भी चलाते हैं हाथ-पैर? इसे ‘नॉर्मल’ समझकर न करें नजरअंदाज!



Parkinson’s Disease And Sleep Disorder: नींद का समय शरीर के आराम करने और दिमाग के पूरे दिन की जानकारी को व्यवस्थित करने का समय माना जाता है, इस दौरान सपने आना सामान्य बात है. कई बार ये सपने साफ-साफ याद रहते हैं, तो कभी अजीब और धुंधले लगते हैं. लेकिन आमतौर पर सपने सिर्फ दिमाग तक ही सीमित रहते हैं. हालांकि कुछ लोगों के साथ ऐसा नहीं होता. उनके सपनों के साथ-साथ शरीर भी हरकत करने लगता है. कई बार व्यक्ति सोते-सोते चिल्लाने लगता है, हाथ-पैर चलाने लगता है या अचानक बिस्तर से उठ बैठता है. पास में सो रहे लोग रात में अचानक होने वाली इन हरकतों से चौंक सकते हैं. सुबह उठने पर अक्सर ऐसे लोग बताते हैं कि उन्होंने कोई बहुत जीवंत या डरावना सपना देखा था.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉक्टर इस स्थिति को रैपिड स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर कहते हैं. यह एक दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण नींद से जुड़ी समस्या है, क्योंकि इसमें सोते समय व्यक्ति खुद को या अपने साथी को चोट पहुंचा सकता है. कुछ मामलों में यह दिमाग से जुड़ी अन्य बीमारियों का शुरुआती संकेत भी हो सकता है.  न्यूरोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट और हेड ऑफ एपिलेप्सी सर्विस डॉ. केनी रविश राजीव ने TOI को बताया कि “रैपिड स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर में व्यक्ति सोते समय अपने सपनों को वास्तविक हरकतों में बदल देता है. सामान्य तौर पर REM स्लीप के दौरान ब्रेन शरीर की मांसपेशियों को अस्थायी रूप से निष्क्रिय कर देता है, ताकि हम सपनों के अनुसार हरकत न करें. लेकिन RBD में यह प्रक्रिया सही तरह से काम नहीं करती.”

इसी समय आते हैं सबसे ज्यादा सपने

नींद के कई चरण होते हैं, जिनमें से एक महत्वपूर्ण चरण REM स्लीप होता है. इसी समय दिमाग सबसे ज्यादा सक्रिय होता है और अधिकतर सपने आते हैं. सामान्य स्थिति में इस दौरान शरीर की मांसपेशियां कुछ समय के लिए निष्क्रिय हो जाती हैं. लेकिन RBD में यह सिक्योरिटी पैटर्न काम नहीं करता और व्यक्ति सपने के अनुसार हाथ-पैर चलाने लगता है. ऐसे लोगों में रात के दौरान जोर से बोलना, चिल्लाना, हाथ-पैर मारना या अचानक उठ बैठना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कई बार वे सपने में खुद को किसी से बचाते या भागते हुए महसूस करते हैं.

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किस उम्र के लोगों को होती है ज्यादा दिक्कत?

रिसर्च के अनुसार यह समस्या खासतौर पर 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में ज्यादा देखी जाती है, हालांकि यह किसी भी उम्र में हो सकती है. कुछ मामलों में यह पार्किंसंस जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से भी जुड़ी हो सकती है. इसकी पहचान के लिए डॉक्टर आमतौर पर पॉलिसोमनोग्राफी नाम का स्लीप टेस्ट करते हैं, जिसमें रात भर दिमाग की गतिविधि, मांसपेशियों की हलचल और सांस लेने के पैटर्न को रिकॉर्ड किया जाता है. इलाज में आमतौर पर मेलाटोनिन या क्लोनाजेपाम जैसी दवाओं के साथ-साथ सोने की जगह को सुरक्षित बनाना भी शामिल होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या बढ़ती गर्मी कम कर रही है लड़कों का जन्म? जानें नई स्टडी में हुआ बड़ा दावा

क्या बढ़ती गर्मी कम कर रही है लड़कों का जन्म? जानें नई स्टडी में हुआ बड़ा दावा



How Heat During Pregnancy Affects Baby Gender: प्रेग्नेंसी के दौरान अत्यधिक गर्मी का असर केवल मां की सेहत पर ही नहीं, बल्कि जन्म लेने वाले बच्चों के लिंग अनुपात पर भी पड़ सकता है. हाल ही में हुई एक स्टडी में पाया गया है कि जब गर्भवती महिलाएं गर्भकाल के दौरान अधिक तापमान के संपर्क में रहती हैं, तो लड़कों के जन्म की संभावना कम हो सकती है. यह रिसर्च भारत और सब-सहारा अफ्रीका के डेमोग्राफिक एंड हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के आधार पर किया गया है.

क्या निकला रिसर्च में?

Demography जर्नल में प्रकाशित “Temperature and Sex Ratios at Birth” स्टडी में रिसर्च ने 90 से अधिक सर्वेक्षणों से जुड़े करीब 50 लाख जन्म के आंकड़ों का एनालिसिस किया. इस दौरान स्थानीय तापमान और गर्भावस्था के विभिन्न स्टेप में गर्मी के प्रभाव को समझने की कोशिश की गई. रिसर्च के अनुसार, जिन दिनों अधिकतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहता है, उन परिस्थितियों में लड़कों के जन्म की संख्या कम देखी गई. सब-सहारा अफ्रीका में यह प्रभाव प्रेग्नेंसी के पहले ट्राइमेस्टर में ज्यादा दिखाई दिया, जबकि भारत में दूसरे ट्राइमेस्टर के दौरान तापमान बढ़ने से लड़कों के जन्म की संभावना कम पाई गई. खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली अधिक उम्र की महिलाओं में यह प्रभाव अधिक देखा गया.

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लड़कों के जन्म में कब आती है कमी?

स्टडी में यह भी पाया गया कि जब तापमान 25 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है, तो लड़कों के जन्म की संभावना में लगभग 0.014 प्रतिशत अंक की कमी आ सकती है. रिसर्चर का मानना है कि अधिक गर्मी के कारण गर्भावस्था के दौरान होने वाले कुछ प्राकृतिक गर्भपात लड़कों में अधिक हो सकते हैं. चेन्नई स्थित श्री रामचंद्रा इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च की पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. विद्या वेणुगोपाल का कहना है कि यह परिणाम चौंकाने वाले नहीं हैं. उनके अनुसार जब शरीर का तापमान सामान्य से एक या दो डिग्री अधिक बढ़ जाता है, तो यह बुखार जैसी स्थिति बन जाती है. गर्भवती महिलाओं का शरीर पहले से ही अधिक संवेदनशील होता है, इसलिए अत्यधिक गर्मी कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है.

इन चीजों का बढ़ सकता है खतरा

एक्सपर्ट के मुताबिक, ज्यादा गर्मी के कारण गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर, गर्भकालीन मधुमेह, समय से पहले प्रसव और कम वजन वाले बच्चों के जन्म का खतरा बढ़ सकता है. इसी वजह से रिसर्चर ने अपील की है कि हीट वेव से प्रभावित क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं को विशेष रूप से सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किडनी को रखना है हेल्दी तो आज ही अपना लें ये 8 गोल्डन रूल्स, डॉक्टर की भी नहीं पड़ेगी जरूरत

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How To Protect Your Kidneys From Damage: अक्सर देखा जाता है कि क्रॉनिक बीमारियों के इलाज को कुछ सामान्य टिप्स तक सीमित कर दिया जाता है, जो हर व्यक्ति के लिए कारगर नहीं होते. असल में बीमारी से ज्यादा मरीज का उसके प्रति रवैया और समझ उसके परिणाम को तय करती है. अपोलो हॉस्पिटल, बैनरघट्टा रोड, बेंगलुरु के सीनियर कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. प्रशांत सी. धीरेंद्र के अनुसार किडनी से जुड़ी बीमारियों को समझने और बेहतर तरीके से मैनेज करने के लिए कुछ जरूरी नियमों का पालन करना चाहिए.

अपनी किडनी को समझें

ज्यादातर लोग किडनी के काम और उसके महत्व को सही तरह से नहीं समझते. किडनी शरीर के सबसे कम समझे जाने वाले अंगों में से एक है, जबकि यह शरीर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाती है. इसलिए हर व्यक्ति को किडनी के कार्य और उसकी देखभाल के बारे में जानकारी रखनी चाहिए.

जानकारी के सही सोर्स पर भरोसा करें

आज इंटरनेट पर स्वास्थ्य से जुड़ी बहुत सारी जानकारी उपलब्ध है, लेकिन हर जानकारी सही हो यह जरूरी नहीं. कई बार पड़ोसी, दोस्त या रिश्तेदार भी बिना एक्सपर्ट के सलाह देने लगते हैं, जो नुकसानदेह हो सकती है. इसलिए किडनी से जुड़ी समस्या होने पर केवल योग्य नेफ्रोलॉजिस्ट की सलाह ही माननी चाहिए.

किडनी फेल होने के प्रमुख कारण जानें

भारत में किडनी फेल होने के दो बड़े कारण डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर हैं. करीब 75 प्रतिशत मरीजों में इन दोनों में से एक या दोनों बीमारियां मौजूद होती हैं. इसलिए जिन लोगों को डायबिटीज या हाई बीपी है, उन्हें साल में कम से कम एक बार किडनी की जांच जरूर करानी चाहिए.

किडनी को शरीर का संतुलन बनाए रखने वाला अंग समझें

किडनी शरीर में केमिकल संतुलन बनाए रखने का काम करती है, जिससे ब्रेन, हार्ट, लंग्स और लिवर जैसे महत्वपूर्ण अंग सही तरह से काम कर पाते हैं. अगर किडनी ठीक से काम न करे तो शरीर में पानी जमा होने लगता है, जो फेफड़ों तक पहुंचकर जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है.

क्रॉनिक किडनी डिजीज का पता चले तो घबराएं नहीं

क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD का मतलब है कि किडनी तीन महीने से अधिक समय तक सामान्य से कम काम कर रही है. यह बीमारी आमतौर पर धीरे-धीरे बढ़ती है, इसलिए समय रहते इलाज और सावधानी से इसे कंट्रोल किया जा सकता है.

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रिपोर्ट्स को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित न हों

आजकल कई तरह की मेडिकल जांच उपलब्ध हैं, जिससे लोग अक्सर अपनी रिपोर्ट्स को लेकर परेशान रहने लगते हैं. जांच डॉक्टरों के लिए स्थिति समझने का एक साधन है, लेकिन मरीज के लाइफ की क्वालिटी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है.

इलाज करने वाले डॉक्टर पर भरोसा रखें

कई लोग जल्दी इलाज की उम्मीद में बार-बार डॉक्टर बदलते रहते हैं. लेकिन CKD एक लंबी अवधि की बीमारी है, जिसे सालों तक सही तरीके से मैनेज करना पड़ता है. इसलिए एक भरोसेमंद एक्सपर्ट की सलाह पर टिके रहना जरूरी है.

लाइफ क्वालिटी पर ध्यान रखें

किडनी से जुड़ी बीमारी में सबसे अहम लक्ष्य मरीज की अच्छी लाइफ की क्वालिटी बनाए रखना है. शुरुआती चरण में ब्लड शुगर और बीपी को नियंत्रित रखना, सही खानपान और नियमित जांच काफी मददगार होती है. वहीं गंभीर स्थिति में डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट जैसे उपचार की जरूरत पड़ सकती है. सही जानकारी, समय पर जांच और एक्सपर्ट की सलाह से किडनी से जुड़ी समस्याओं को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है और मरीज लंबे समय तक सामान्य जीवन जी सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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स्टेम सेल थेरेपी से होगा पार्किंसंस का इलाज, जापान ने पहली बार दी इस खास तरीके को मंजूरी

स्टेम सेल थेरेपी से होगा पार्किंसंस का इलाज, जापान ने पहली बार दी इस खास तरीके को मंजूरी


Japan Approves Stem Cell Therapy For Parkinson: जापान ने मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाते हुए स्टेम सेल आधारित नई थेरेपी को मंजूरी दे दी है. यह थेरेपी पार्किंसंस रोग और गंभीर हार्ट फेलियर के इलाज के लिए विकसित की गई है. मीडिया रिपोर्ट्स और संबंधित कंपनियों के अनुसार, इन उपचारों को मंजूरी मिलने के बाद उम्मीद है कि आने वाले कुछ महीनों में मरीजों को इसका लाभ मिलना शुरू हो सकता है.

कैसे करेगा काम?

फार्मास्युटिकल कंपनी सुमितोमो फार्मा ने बताया कि उसे अपने पार्किंसंस रोग के इलाज Amchepry के निर्माण और बिक्री की अनुमति मिल गई है. इस उपचार में स्टेम सेल्स को मरीज के दिमाग में ट्रांसप्लांट किया जाता है, जिससे मस्तिष्क में उन सेल्स को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश की जाती है जो बीमारी के कारण नष्ट हो जाती हैं. इसके अलावा जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने रीहार्ट नाम की एक और तकनीक को भी मंजूरी दी है. यह इलाज मेडिकल स्टार्टअप Cuorips ने विकसित किया है, जिसमें हार्ट की मसल्स की विशेष शीट्स तैयार की जाती हैं. ये शीट्स शरीर में नए ब्लड वेसल्स बनने में मदद करती हैं और हार्ट के कामकाज को बेहतर बना सकती हैं.

कब तक आएगा मार्केट में?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये इलाज इस साल गर्मियों तक बाजार में उपलब्ध हो सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो यह दुनिया का पहला कॉमर्शियल चिकित्सा उत्पाद होगा जिसमें सेल्स का इस्तेमाल किया जाएगा. जापान के साइंटिस्ट शिन्या यामानाका को 2012 में इसी तकनीक पर रिसर्च के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था. IPS सेल्स की खासियत यह है कि इन्हें शरीर की किसी भी प्रकार की सेल्स में बदला जा सकता है, जिससे कई बीमारियों के इलाज की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. 

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मरीजों के लिए राहत

जापान के स्वास्थ्य मंत्री केनइचिरो उएनो ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि यह उपचार न सिर्फ जापान बल्कि दुनिया भर के मरीजों के लिए राहत लेकर आएगा. उन्होंने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि सभी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी कर मरीजों तक यह इलाज जल्द पहुंचाया जाए. Sumitomo Pharma के अनुसार, Amchepry को फिलहाल कंडीशनल और समय-सीमित मंजूरी दी गई है. इसका मतलब है कि इसे एक तरह का अस्थायी लाइसेंस माना जाएगा, ताकि मरीजों तक नई तकनीक जल्दी पहुंच सके. इस मंजूरी के लिए पारंपरिक दवाओं की तरह बड़े क्लिनिकल ट्रायल के बजाय सीमित मरीजों के डेटा के आधार पर सुरक्षा और प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया है.

क्या सुरक्षित है यह? 

क्योटो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर द्वारा की गई एक स्टडी में इस थेरेपी को सुरक्षित बताया गया. इस परीक्षण में 50 से 69 वर्ष की उम्र के सात पार्किंसंस मरीजों को शामिल किया गया था. मरीजों के ब्रेन में लगभग 5 से 10 मिलियन स्टेम सेल्स ट्रांसप्लांट किए गए. दो साल तक निगरानी के दौरान किसी गंभीर साइड इफेक्ट की जानकारी नहीं मिली और चार मरीजों में लक्षणों में सुधार देखा गया. पार्किंसंस रोग एक पुरानी न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो शरीर की गति को प्रभावित करती है और अक्सर कंपकंपी व चलने-फिरने में कठिनाई का कारण बनती है. दुनिया भर में करीब एक करोड़ लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं.

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क्या 150 साल तक जिंदा रह सकता है इंसान? इस रिसर्च के बाद शुरू हुई बहस

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New Research On Human Lifespan Extension: मानव जीवन को लंबा करने का विचार लंबे समय से साइंटिस्ट को आकर्षित करता रहा है. आधुनिक मेडिकल ने इसमें काफी तरक्की की है, लेकिन साइंटिस्ट अब भी ऐसे तरीकों की तलाश में हैं जिनसे बढ़ती उम्र की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके और उम्र से जुड़ी बीमारियों को रोका जा सके. हाल ही में चीन की एक बायोटेक कंपनी ने इस विषय पर नई बहस छेड़ दी है.

 शेन्जेन स्थित स्टार्टअप Lonvi Biosciences का दावा है कि उसने एक ऐसी एक्सपेरिमेंटल गोली विकसित की है, जिसकी मदद से इंसान की उम्र भविष्य में 150 साल तक पहुंच सकती है. कंपनी के अनुसार उनकी रिसर्च शरीर में मौजूद उन हानिकारक सेल्स को हटाने पर केंद्रित है, जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज करती हैं. सोशल मीडिया और वैज्ञानिक मंचों पर सामने आई रिपोर्ट्स के मुताबिक यह दवा अंगूर के बीज से प्राप्त तत्वों का इस्तेमाल करती है, जो शरीर में मौजूद खास प्रकार की सेल्स को निशाना बनाती हैं. इन कोशिकाओं को आम भाषा में “जॉम्बी सेल्स” कहा जाता है.

जॉम्बी सेल्स किसे कहा जाता है?

साइंस के टर्म  में इन्हें senescent cells कहा जाता है. ये ऐसी सेल्स होती हैं जो क्षतिग्रस्त या बूढ़ी हो चुकी होती हैं और सेल्स विभाजित होना बंद कर देती हैं, लेकिन मरती नहीं हैं. इसके बजाय ये शरीर में बनी रहती हैं और आसपास के  में सूजन पैदा करने वाले रसायन छोड़ती रहती हैं. समय के साथ इन सेल्स का जमाव शरीर में कई समस्याओं को जन्म दे सकता है. साइंटिस्ट का मानना है कि यही सेल्स बढ़ती उम्र के साथ होने वाली बीमारियों जैसे दिल की बीमारी, गठिया और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं में भूमिका निभा सकती हैं.

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कैसे काम कर सकती है दवा?

कंपनी का दावा है कि यह गोली अंगूर के बीज से बने यौगिकों की मदद से शरीर में मौजूद इन खराब सेल्स को खत्म करने में मदद कर सकती है. अगर इन सेल्स को कम किया जा सके तो शरीर में होने वाली सूजन और टिश्यू को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है. लंबी उम्र से जुड़ी रिसर्च में साइंटिस्ट पहले से ही senolytics नाम की दवाओं पर काम कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य इन बूढ़ी सेल्स को खत्म करना है. शुरुआती प्रयोगों में जानवरों पर इसके कुछ पॉजिटिव परिणाम भी देखने को मिले हैं, जैसे बेहतर शारीरिक क्षमता और उम्र से जुड़ी गिरावट में देरी.

 

दवा आने में लगेगा वक्त

हालांकि साइंटिस्ट का कहना है कि ऐसी किसी भी दवा को इंसानों के लिए सुरक्षित और प्रभावी साबित करने में अभी लंबा समय लग सकता है. किसी भी नई थेरेपी को आम लोगों तक पहुंचने से पहले कई चरणों के क्लिनिकल ट्रायल से गुजरना पड़ता है.

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गर्मी में भारी क्यों लगती है हाई-प्रोटीन डाइट? जानिए हल्के और बेस्ट प्लांट-बेस्ड प्रोटीन ऑप्शन

गर्मी में भारी क्यों लगती है हाई-प्रोटीन डाइट? जानिए हल्के और बेस्ट प्लांट-बेस्ड प्रोटीन ऑप्शन


जैसे-जैसे गर्मी का मौसम करीब आता है, लोगों की खाने की आदतों में अपने-आप बदलाव आने लगता है. सर्दियों में जहां भूख ज्यादा लगती है और लोग भारी खाना भी आसानी से खा लेते हैं, वहीं गर्मियों में पेट जल्दी भर जाता है. बहुत से लोग हल्का खाने लगते हैं, कुछ लोग मील स्किप करने लगते हैं, तो कई लोग सिर्फ सलाद या फल पर निर्भर हो जाते हैं. लेकिन यहां एक बड़ी समस्या प्रोटीन की कमी पैदा हो जाती है. जब लोग खाने की मात्रा कम कर देते हैं, तो अक्सर प्रोटीन भी कम हो जाता है. शुरुआत में शायद इसका असर ज्यादा महसूस न हो, लेकिन कुछ दिनों बाद शरीर संकेत देने लगता है. ऐसे समय में प्लांट-बेस्ड प्रोटीन (पौधों से मिलने वाला प्रोटीन) बहुत उपयोगी साबित हो सकता है. खासकर तब, जब उसे सही तरीके से तैयार करके खाया जाए. तो आइए जानते हैं कि गर्मी में हाई-प्रोटीन डाइट भारी क्यों लगता है. साथ वही हल्के और बेस्ट प्लांट-बेस्ड प्रोटीन ऑप्शन क्या है. 

गर्मी में हाई-प्रोटीन डाइट भारी क्यों लगता है?

गर्मी का असर सिर्फ बाहर के तापमान पर ही नहीं पड़ता, बल्कि शरीर के अंदर की प्रक्रियाओं पर भी पड़ता है. ज्यादा तापमान के कारण कई बार भूख कम हो जाती है, पेट का एसिड थोड़ा कम बनता है, भारी खाना जल्दी असहज लगने लगता है. यही कारण है कि जो खाना सर्दियों में बिल्कुल ठीक लगता था, वही गर्मियों में पेट में भारीपन, गैस या सुस्ती पैदा कर सकता है. प्रोटीन ऐसा पोषक तत्व है जिसे पचाने के लिए शरीर को थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.अगर यह प्रोटीन भारी दालों या ठीक से तैयार न किए गए पौधों के स्रोतों से लिया जाए, तो आंतों पर और ज्यादा दबाव पड़ सकता है. इसका मतलब यह नहीं है कि प्लांट प्रोटीन खराब है. असल बात यह है कि मौसम और खाने के तरीके के बीच संतुलन जरूरी होता है. 

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हल्के और बेस्ट प्लांट-बेस्ड प्रोटीन ऑप्शन क्या है?

1. किण्वित दाल का घोल (Fermented batters) –  डोसा, इडली या दाल के चीले के लिए इस्तेमाल होने वाला फर्मेंटेड बेटर गर्मियों में बहुत अच्छा ऑप्शन है. ये पचाने में आसान, पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण, पेट पर हल्का रखता है. फर्मेंटेशन की प्रक्रिया दालों में मौजूद कुछ ऐसे तत्वों को कम कर देती है जो पाचन में बाधा डालते हैं.

2. टोफू – टोफू सोयाबीन से बना एक हल्का और हाई क्वालिटी वाला प्रोटीन स्रोत है. इसे आप कई तरह से खा सकते हैं. जैसे हल्का सा भूनकर, सब्जी में डालकर, सलाद में मिलाकर. यह पेट को ज्यादा भारी महसूस कराए बिना अच्छा प्रोटीन प्रदान करता है. 

3. टेम्पेह – टेम्पेह भी सोयाबीन से बना होता है, लेकिन यह फर्मेंटेड होता है. इसी वजह से इसे पचाना सामान्य सोयाबीन की तुलना में आसान होता है. भारत में अभी यह बहुत आम नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे इसका उपयोग बढ़ रहा है. 

4. सत्तू ड्रिंक – सत्तू गर्मियों का पारंपरिक सुपरफूड माना जाता है. सत्तू ठंडक देता है, प्रोटीन से भरपूर होता है और जल्दी पच जाता है. नमकीन या मीठा सत्तू का ड्रिंक गर्मियों में एक शानदार प्रोटीन ऑप्शन हो सकता है. 
 
5. मूंग दाल के विकल्प – मूंग दाल गर्मियों में सबसे हल्की दालों में से एक मानी जाती है.  इसे कई तरह से लिया जा सकता है. जैसे मूंग दाल का चीला, मूंग दाल का सूप, अंकुरित मूंग. ये सभी पेट के लिए हल्के और पोषण से भरपूर होते हैं. 

गर्मियों में प्लांट प्रोटीन लेने के आसान तरीके

भारतीय रसोई में कुछ साधारण तकनीकें हैं जो प्रोटीन को ज्यादा पचाने वाला बना सकती हैं. जिसमें दालों और बीजों को कुछ घंटों तक भिगोने से पाचन आसान हो जाता है. डोसा या इडली का घोल फॉर्मेट करने से पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर होता है. अच्छी तरह पकाई गई दालें पेट के लिए हल्की होती हैं. जीरा, हींग, अदरक और सौंफ जैसे मसाले पाचन में मदद करते हैं, एक ही समय में ज्यादा प्रोटीन लेने के बजाय इसे अलग-अलग मील में लेना ज्यादा फायदेमंद होता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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