वजन घटाने के लिए अपनाएं ये 5 बोरिंग आदतें, एक्सपर्ट बोले-यही देती हैं असली रिजल्ट

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बिना शराब छुए भी बीमार हो सकता है आपका लिवर, जानें क्या है ‘साइलेंट किलर’ फैटी लिवर

बिना शराब छुए भी बीमार हो सकता है आपका लिवर, जानें क्या है ‘साइलेंट किलर’ फैटी लिवर


Why Fatty Liver Happens Without Alcohol: सिर्फ हेल्दी दिखने भर से लिवर स्वस्थ रहेगा, ऐसा मानना अब सही नहीं रह गया है. आजकल डॉक्टर ऐसे लोगों में भी फैटी लिवर की समस्या देख रहे हैं जो न शराब पीते हैं, न धूम्रपान करते हैं और घर का खाना ही खाते हैं. यह स्थिति इसलिए उलझन भरी लगती है क्योंकि बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर लिवर पर दबाव बढ़ता रहता है. असल वजह हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें हैं, जिन पर अक्सर ध्यान ही नहीं जाता. 

लाइफस्टाइल से जुड़ी है बीमारी

डॉक्टरों के मुताबिक, नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज तेजी से बढ़ने वाली लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारी बन चुकी है. यह तब होता है जब बिना शराब के सेवन के भी लिवर में फैट जमा होने लगता है. साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक बड़ी स्टडी बताती है कि शहरी भारत में यह समस्या अब आम होती जा रही है और इसका सीधा संबंध हमारी बदलती लाइफस्टाइल से है.

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. आम्रपाली पाटिल ने TOI को बताया कि “यह एक आम गलतफहमी है कि लिवर की बीमारी सिर्फ शराब से होती है। कई नॉन-अल्कोहोलिक कारण भी लिवर के कामकाज को प्रभावित करते हैं.” दरअसल, जिस नॉर्मल डाइट को हम सही मानते हैं, वह अब पहले जैसी नहीं रही. रिफाइंड आटा, छिपी हुई शुगर, पैकेज्ड स्नैक्स और बार-बार बाहर का खाना मंगाना धीरे-धीरे लिवर में फैट जमा करने लगता है. लिवर का काम शरीर में जाने वाली हर चीज को प्रोसेस करना है, लेकिन जब यह ओवरलोड हो जाता है तो फैट जमा होने लगता है.

इसके अलावा, कम चलना-फिरना, लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना और नींद की कमी मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ देती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन  के अनुसार, शारीरिक एक्टिविटी न करने की वजह से  मेटाबॉलिक बीमारियों का बड़ा कारण है. कुछ कारण ऐसे भी हैं जिन पर लोग ध्यान नहीं देते, वह है जैसे लंबे समय तक दवाइयों का सेवन, क्रैश डाइटिंग, अनियमित खाने की आदतें और अचानक तेजी से वजन कम करना. डॉ. पाटिल के अनुसार, “ये सभी चीजें लिवर पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं और समय के साथ समस्या को बढ़ा सकती हैं.”

शुरूआत में दिखाई नहीं देते हैं लक्षण

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआत में इसके लक्षण साफ नजर नहीं आते. हल्की थकान, पेट फूलना या सामान्य असहजता को लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. डॉ. पाटिल बताती हैं कि शुरुआती चरण में मरीज बिना किसी खास लक्षण के भी हो सकते हैं, और जब तक समस्या समझ आती है, तब तक स्थिति गंभीर हो सकती है. इससे बचने के लिए बहुत बड़े बदलाव की जरूरत नहीं है, बल्कि छोटे और लगातार किए जाने वाले सुधार ज्यादा असरदार होते हैं. प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा मीठे पेय, देर रात खाना और बिना जरूरत के सप्लीमेंट्स लेने से बचना चाहिए. लिवर की सेहत के लिए रोजाना कम से कम 30 मिनट की वॉक, संतुलित आहार और अच्छी नींद बेहद जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बार-बार होने वाला सिरदर्द मामूली नहीं, शरीर दे रहा ये 5 बड़े संकेत; आप तो नहीं कर रहे नजरअंदाज

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Why Am I Getting Headaches Frequently: अगर आपको बार-बार सिरदर्द होता है, तो हो सकता है आपने इसे कई बार नजरअंदाज किया हो. कभी काम का दबाव, कभी ज्यादा स्क्रीन टाइम, तो कभी नींद की कमी और एक पेनकिलर लेकर बात खत्म लेकिन जब सिरदर्द बार-बार होने लगे, तो यह सिर्फ एक साधारण परेशानी नहीं, बल्कि शरीर का संकेत भी हो सकता है कि कुछ ठीक नहीं चल रहा. चलिए आपको बताते हैं कि सरदर्द की दिक्कत क्यों होती है और इससे शरीर में किस कमी का पता चलता है. 

क्या होता है कारण?

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक की रिपोर्ट के अनुसार, इसके कई कारण हो सकते हैं. कभी यह तनाव से जुड़ा होता है, तो कभी आपकी डेली रूटीन, पानी की कमी, नींद या खानपान से. इसलिए इसे नजरअंदाज करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि आखिर इसके पीछे वजह क्या है. इसमें सबसे आम कारणों में से एक है तनाव. यह हमेशा खुलकर महसूस नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे जमा होता रहता है, काम का दबाव, जिम्मेदारियां या दिमाग में चलती चिंताएं. यह तनाव गर्दन, कंधों और जबड़े की मांसपेशियों को टाइट कर देता है, जो धीरे-धीरे सिरदर्द में बदल जाता है. ऐसा दर्द अक्सर सिर के चारों ओर भारीपन या दबाव जैसा महसूस होता है.

पानी की कमी

दूसरा बड़ा कारण है पानी की कमी. दिनभर में कई लोग पर्याप्त पानी नहीं पीते और कॉफी या चाय को ही पर्याप्त समझ लेते हैं. लेकिन शरीर को जब पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो उसका असर सिरदर्द के रूप में दिख सकता है. ऐसे सिरदर्द में भारीपन और सुस्ती महसूस होती है, जो खासकर दोपहर के समय बढ़ जाती है. 

स्कीन का ज्यादा यूज

आज के समय में स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल भी सिरदर्द की बड़ी वजह बन गया है. लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप या टीवी देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है, जिससे आंखों के पीछे या माथे में दर्द होने लगता है. अगर थोड़ी देर आंखें बंद करने या स्क्रीन से दूर रहने पर आराम मिले, तो यह साफ संकेत है कि आंखों को आराम की जरूरत है. 

नींद की कमी भी कारण

नींद की कमी या खराब नींद भी सिरदर्द को बढ़ा सकती है. सिर्फ घंटों की नींद ही नहीं, बल्कि उसकी क्वालिटी भी मायने रखती है. अगर आप रात में बार-बार जागते हैं, देर तक मोबाइल चलाते हैं या नींद पूरी नहीं होती, तो सुबह उठते ही सिर भारी लग सकता है.

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खाना भी हो सकता है कारण

इसके अलावा, भोजन छोड़ना या देर से खाना भी सिरदर्द का कारण बन सकता है. जब लंबे समय तक खाना नहीं खाया जाता, तो ब्लड शुगर गिरने लगता है, जिससे सिरदर्द, कमजोरी और चक्कर जैसी समस्या हो सकती है.

कब ज्यादा दिक्कत?

हालांकि ज्यादातर सिरदर्द खतरनाक नहीं होते, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे या पहले से ज्यादा तेज हो जाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. बेहतर है कि आप अपनी डेली रूटीन पर ध्यान दें कि कब दर्द होता है, किस वजह से बढ़ता है और क्या करने से कम होता है. छोटे-छोटे बदलाव जैसे पर्याप्त पानी पीना, समय पर सोना, स्क्रीन से ब्रेक लेना और तनाव को संभालना, ये सब मिलकर सिरदर्द की समस्या को काफी हद तक कम कर सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिर्फ मोबाइल छोड़ना काफी नहीं, आपका लैपटॉप और ऑफिस की ‘सफेद रोशनी’ भी छीन रही है नींद

सिर्फ मोबाइल छोड़ना काफी नहीं, आपका लैपटॉप और ऑफिस की ‘सफेद रोशनी’ भी छीन रही है नींद


Why Less Phone Use Doesn’t Improve Sleep: आजकल बहुत से लोग यह सोचकर सुकून महसूस करते हैं कि उन्होंने फोन का इस्तेमाल कम कर दिया है, इसलिए उनकी नींद और मेंटल हेल्थ बेहतर हो जाएगी. लेकिन असलियत इससे थोड़ी अलग है. आधुनिक ऑफिस लाइफ में स्क्रीन से दूरी बनाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि लैपटॉप, मीटिंग्स और तेज रोशनी लगातार दिमाग को एक्टिव बनाए रखते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि मोबाइल के अलावा और क्या है कारण. 

ईमेल भी है कारण

सुबह की शुरुआत ईमेल से होती है और दिन भर स्क्रीन के सामने बैठकर काम चलता रहता है. ऊपर से ऑफिस की तेज, सफेद रोशनी भी दिन जैसी ही लगती है. ऐसे में शरीर को यह संकेत ही नहीं मिल पाता कि अब आराम का समय है. नतीजा यह होता है कि रात में नींद हल्की लगती है, दिमाग शांत नहीं होता और सुबह उठना भारी महसूस होता है.

 छिपे हुए स्क्रीन एक्सपोजर

यह समस्या सिर्फ ज्यादा फोन चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि छिपे हुए स्क्रीन एक्सपोजर से जुड़ी है. एक सामान्य ऑफिस जॉब में 6 से 10 घंटे तक स्क्रीन देखना आम बात है. फर्क सिर्फ इतना है कि यह काम का हिस्सा होता है, इसलिए लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन दिमाग के लिए स्क्रीन स्क्रीन ही होती है, चाहे वह काम की हो या मनोरंजन की. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ. नेहा कपूर बताती हैं कि लोग अक्सर सोचते हैं कि फोन कम इस्तेमाल करने से वे स्क्रीन के नुकसान से बच जाएंगे, जबकि ऑफिस में लैपटॉप और कमरे की रोशनी भी शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित करती है. इससे मेलाटोनिन हार्मोन बनने में रुकावट आती है, जो नींद के लिए बेहद जरूरी है.  जब मेलाटोनिन का स्तर प्रभावित होता है, तो सोने का समय आगे खिसक जाता है. भले ही आप समय पर बिस्तर पर चले जाएं, लेकिन दिमाग ऑफ नहीं हो पाता. यही वजह है कि कई लोग थकान के बावजूद देर तक जागते रहते हैं.

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नींद होती है प्रभावित 

इस बात को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी मान चुकी हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, शाम के समय ब्लू लाइट का एक्सपोजर मेलाटोनिन को कम कर देता है और नींद की क्वालिटी खराब करता है.  वहीं सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन भी मानता है कि सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल नींद को प्रभावित करता है. सिर्फ रोशनी ही नहीं, बल्कि लगातार मानसिक सक्रियता भी एक बड़ी वजह है. दिन भर ईमेल, मैसेज और मीटिंग्स दिमाग को पूरी तरह शांत नहीं होने देते. इसका असर धीरे-धीरे दिखता है, फोकस कम होने लगता है, याददाश्त कमजोर पड़ती है और मूड में बदलाव आने लगता है.

बचने के लिए क्या हैं उपाय

हालांकि इससे बचने के लिए कुछ छोटे बदलाव काफी मदद कर सकते हैं. हर 20 मिनट में कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन से नजर हटाना, शाम के समय स्क्रीन की ब्राइटनेस कम करना, सोने से पहले 45-60 मिनट का गैप रखना और कमरे की लाइट हल्की करना, ये सभी आदतें नींद को बेहतर बना सकती हैं.  एक्सपर्ट्स यही कहते हैं कि नींद को हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह सिर्फ आराम नहीं, बल्कि दिमाग के सही तरीके से काम करने के लिए जरूरी प्रक्रिया है. छोटी-छोटी आदतें बदलकर भी आप अपनी नींद और मेंटल सेहत को बेहतर बना सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या लैपटॉप गोद में रखकर काम करने से नामर्द हो जाते हैं पुरुष, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

क्या लैपटॉप गोद में रखकर काम करने से नामर्द हो जाते हैं पुरुष, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?


Does Laptop On Lap Reduce Sperm Count: क्या लैपटॉप गोद में रखकर काम करने से पुरुष नामर्द हो सकते हैं? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है.  एक्सपर्ट के मुताबिक, सीधे तौर पर नामर्द होने जैसी बात कहना सही नहीं है, लेकिन यह आदत पुरुषों की फर्टिलिटी यानी प्रजनन क्षमता पर असर जरूर डाल सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे और क्यों इसका असर होता है. 

क्या होता है असर?

verywellhealth की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लैपटॉप को जांघों या गोद में रखकर लंबे समय तक काम करता है, तो उससे निकलने वाली गर्मी और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड शरीर के संवेदनशील हिस्सों को प्रभावित कर सकती है. साइंटिस्ट ने खासतौर पर दो कारणों पर ध्यान दिया है हीट और रेडिएशन जैसी ऊर्जा तरंगें. इनका असर होता है. 

गर्मी का क्या होता है असर?

सबसे पहले बात गर्मी की करें तो टेस्टिकल्स को सही तरीके से काम करने के लिए शरीर के तापमान से थोड़ा ठंडा रहना जरूरी होता है. यही वजह है कि स्क्रोटम उन्हें बाहर की ओर रखकर तापमान संतुलित करता है. लेकिन लैपटॉप की गर्मी इस संतुलन को बिगाड़ देती है. 2005 की एक स्टडी में पाया गया कि लैपटॉप गोद में रखने से स्क्रोटम का तापमान करीब 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जिससे स्पर्म बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और उनकी गुणवत्ता भी गिर सकती है.

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड का क्या होता है असर?

दूसरी चिंता इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड को लेकर है. ये अदृश्य ऊर्जा तरंगें लैपटॉप, वाई-फाई और मोबाइल जैसे उपकरणों से निकलती हैं. कुछ रिसर्च में पाया गया है कि वाई-फाई के संपर्क में आने से स्पर्म के डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है और उनकी गति धीमी हो सकती है. जबकि किसी भी स्पर्म के लिए अंडे तक पहुंचने के लिए तेज और सही दिशा में मूव करना जरूरी होता है.

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कैसे पड़ता है फर्क? 

कई स्टडी में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक ऐसे एक्सपोजर से स्पर्म काउंट कम हो सकता है, उनके आकार और बनावट में बदलाव आ सकता है, और जेनेटिक स्तर पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि, एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि लैपटॉप के इस्तेमाल और पुरुष बांझपन के बीच सीधा संबंध अभी पूरी तरह साबित नहीं हुआ है और इस पर और रिसर्च की जरूरत है. इसके साथ ही ढीले कपड़े पहनना, बहुत गर्म पानी से नहाने या सॉना से बचना और हेल्दी वेट बनाए रखना भी फर्टिलिटी को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है. छोटे-छोटे ये बदलाव आपकी सेहत पर बड़ा असर डाल सकते हैं.

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सावधान! पैरों में झुनझुनी और सुन्नपन कहीं ‘डायबिटिक न्यूरोपैथी’ तो नहीं? जानें क्या कहते हैं ए

सावधान! पैरों में झुनझुनी और सुन्नपन कहीं ‘डायबिटिक न्यूरोपैथी’ तो नहीं? जानें क्या कहते हैं ए


Why Do Diabetics Feel Tingling In Feet: डायबिटीज के मरीजों में अक्सर एक समस्या धीरे-धीरे सामने आती है, जिसे लोग शुरुआत में गंभीरता से नहीं लेते. हाथों और पैरों में झुनझुनी, जलन या सुन्नपन, कई लोग इसे थकान या उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं.  लेकिन असल में यह शरीर का एक अहम संकेत होता है, जिसे अनदेखा करना खतरनाक साबित हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉ. क्या कहते हैं. 

क्या होता है डायबिटीज का नसों पर असर

डायबिटीज का असर सिर्फ शुगर लेवल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह नसों को भी नुकसान पहुंचाता है. जब लंबे समय तक ब्लड शुगर हाई रहता है, तो यह नसों तक पोषण पहुंचाने वाली छोटी ब्लड बेसल्स को प्रभावित करता है. इससे नसें ठीक से काम नहीं कर पातीं और इस स्थिति को डायबिटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी कहा जाता है. इसके शुरुआती लक्षणों में झुनझुनी, जलन, सुन्नपन या रात में अचानक दर्द महसूस होना शामिल है. कई मरीज बताते हैं कि उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे रूई पर चल रहे हों या पैरों में तेज चुभन हो रही हो. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह समस्या बढ़कर शरीर की कमजोरी, संतुलन बिगड़ने और यहां तक कि पैरों में घाव तक पहुंच सकती है. 

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किस कमी के कारण होती है दिक्कत

इस समस्या को और जटिल बनाता है विटामिन B12 की कमी. खासतौर पर वे मरीज जो लंबे समय से मेटफॉर्मिन दवा ले रहे हैं, उनमें B12 की कमी का खतरा ज्यादा होता है. यह दवा ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद करती है, लेकिन समय के साथ शरीर में B12 के अब्जॉर्व को कम कर सकती है. समस्या यह है कि विटामिन B12 की कमी के लक्षण जैसे झुनझुनी, सुन्नपन, कमजोरी और थकान, डायबिटिक न्यूरोपैथी से काफी मिलते-जुलते होते हैं. ऐसे में बिना जांच के यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि असली वजह क्या है. कई बार दोनों समस्याएं एक साथ भी होती हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

एक्सपर्ट का मानना है कि इस स्थिति में सबसे जरूरी है समय पर पहचान और इलाज. Dr. V Mohan ने TOI को बताया कि मरीजों को दर्द बढ़ने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि शुरुआती लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. इलाज की शुरुआत ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने से होती है. इसके साथ ही विटामिन B12 की जांच कराना और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लेना भी जरूरी है. कई मामलों में डॉक्टर विटामिन B कॉम्प्लेक्स दवाएं देते हैं, जो नसों को मजबूत करने और लक्षणों को कम करने में मदद करती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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