कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक-अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान

कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक-अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान


Health Checkup Routine : आज के समय में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं. जिम जाना, हेल्दी खाना, योग करना ये सब अब आम बात हो गई है, लेकिन एक जरूरी सवाल अब भी लोगों के मन में रहता है कि हेल्थ चेक-अप कितनी बार कराना चाहिए. कई लोग सोचते हैं कि साल में एक बार ब्लड टेस्ट करा लेना ही काफी है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा अलग है. डॉक्टरों के अनुसार, हेल्थ चेक-अप हर व्यक्ति के लिए अलग होता है. यह आपकी उम्र, लाइफस्टाइल, बीमारी का इतिहास और परिवार की मेडिकल हिस्ट्री पर निर्भर करता है. इसलिए जरूरी है कि हम अपनी जरूरत के हिसाब से हेल्थ चेक-अप का सही समय और तरीका समझें. ऐसे में आइए जानते हैं कि हेल्थ चेक-अप कितने समय में कराना चाहिए. 

हेल्थ चेक-अप क्यों जरूरी है?

अक्सर लोग तभी डॉक्टर के पास जाते हैं जब उन्हें कोई समस्या होती है, लेकिन कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो शुरू में कोई लक्षण नहीं दिखातीं है. रेगुलर चेक-अप से आप बीमारी को शुरुआत में ही पकड़ सकते हैं. गंभीर समस्याओं से बच सकते हैं. अपने शरीर की सही स्थिति जान सकते हैं और भविष्य के जोखिम को कम कर सकते हैं. 

क्या सिर्फ ब्लड टेस्ट ही काफी है?

बहुत से लोग मानते हैं कि ब्लड टेस्ट ही पूरा हेल्थ चेक-अप है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है. एक कंप्लीट हेल्थ चेक-अप में ब्लड टेस्ट, एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड, ECG, इको, कैंसर स्क्रीनिंग, महिलाओं के लिए मैमोग्राम, हड्डियों की जांच शामिल हो सकते हैं. ये सभी टेस्ट शरीर के अंदर छिपी समस्याओं को समय रहते पकड़ने में मदद करते हैं. 

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हेल्थ चेक-अप कितने समय में कराना चाहिए

अगर आप फिट हैं, कोई बीमारी नहीं है और अच्छी लाइफस्टाइल फॉलो करते हैं, तो  साल में 1 बार पूरा हेल्थ चेक-अप काफी होता है. वहीं अगर आपके परिवार में दिल की बीमारी, डायबिटीज या अन्य गंभीर बीमारी हैं, तो साल में 2 बार चेक-अप कराना बेहतर है, साथ में खास टेस्ट भी कराए जाते हैं.  इसके अलावा अगर आपको पहले से डायबिटीज या कोई पुरानी बीमारी है, तो  साल में 2 बार पूरा चेक-अप जरूर कराना चाहिए, साथ ही हर 3 महीने में HbA1c टेस्ट कराएं. वहीं अगर आपका वजन ज्यादा है या लाइफस्टाइल ठीक नहीं है, तो आपको अतिरिक्त जांच की जरूरत हो सकती है. जैसे लिवर टेस्ट या फैटी लिवर की जांच. बुजुर्गों के लिए ज्यादा सावधानी जरूरी है. इसके लिए साल में कम से कम 2 बार हेल्थ चेक-अप कराना चाहिए. 

बच्चों के लिए हेल्थ चेक-अप प्लान

बच्चों के लिए हेल्थ चेक-अप का प्लान उनकी उम्र के हिसाब से अलग होता है. जैसे छोटे बेबी को हर 1 से 3 महीने में डॉक्टर के पास दिखाना चाहिए.  ताकि  वेकसीनेशन समय पर हो और उनकी ग्रोथ सही हो रही है या नहीं, यह देखा जा सके. वहीं 1 से 5 साल के बच्चों यानी टॉडलर्स को हर 3 से 6 महीने में चेक-अप कराने की जरूरत होती है, जिससे उनकी लंबाई-ऊंचाई, वजन, पोषण और सामान्य ग्रोथ की निगरानी की जा सके, इसके अलावा 6 से 12 साल के स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए अगर बच्चा हेल्दी है तो साल में एक बार चेक-अप काफी होता है. वहीं टीनेज के लिए भी साल में एक बार चेक-अप जरूरी है, जिसमें उनकी खान-पान की आदतें, मानसिक स्वास्थ्य और लाइफस्टाइल पर ध्यान दिया जाता है जिससे हेल्दी लाइफस्टाइल बनी रहे और किसी भी समस्या को समय रहते पहचाना जा सके. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं पुरानी एंटीबायोटिक्स, क्या है इसका तरीका?

दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं पुरानी एंटीबायोटिक्स, क्या है इसका तरीका?


Old Antibiotics : आज दुनिया भर में वैज्ञानिक एक बहुत बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं. यह समस्या एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (AMR) है. इसका मतलब है कि बैक्टीरिया धीरे-धीरे उन दवाओं के खिलाफ खुद को मजबूत बना रहे हैं, जिनसे हम उन्हें मार सकते थे. इसका असर इतना खतरनाक हो गया है कि हल्की-सी संक्रमण भी मुश्किल से ठीक होती है और कई बार जानलेवा साबित हो सकती है.

भारत में इसका असर साफ दिखता है. 2021 में लगभग 2.6 लाख लोग सिर्फ इसलिए मरे क्योंकि उनके शरीर में संक्रमण उस एंटीबायोटिक दवा से नहीं रुके. इसका मतलब यह है कि अगर दवाएं काम कर रही होतीं, तो ये मौतें रोकी जा सकती थीं, लेकिन अब आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) के शोधकर्ताओं ने एक नया तरीका निकाला है. उन्होंने नए एंटीबायोटिक बनाने की जगह पुरानी दवाओं को फिर से असरदार बनाने का रास्ता निकाला है. ऐसे में आइए जानते हैं कि पुरानी एंटीबायोटिक्स दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं और इसका तरीका क्या है.

एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया कैसे नहीं मार पाती हैं?

मैक्रोलाइड्स (Macrolides) एंटीबायोटिक की एक आम कैटेगरी है, जिसमें एजिथ्रोमाइसिन (Azithromycin) और एरिथ्रोमाइसिन (Erythromycin) जैसी दवाएं आती हैं. ये दवाएं बैक्टीरिया की प्रोटीन बनाने की मशीन यानी राइबोसोम (ribosome) पर हमला करती हैं. राइबोसोम को रोककर, बैक्टीरिया जरूरी प्रोटीन नहीं बना पाता और मर जाता है, लेकिन बैक्टीरिया भी पीछे नहीं रहते है. वे Erm एंजाइम्स का इस्तेमाल करके राइबोसोम को बदल देते हैं. इस वजह से एंटीबायोटिक दवा बैक्टीरिया को मार नहीं पाती हैं. 

पुरानी एंटीबायोटिक्स दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं?

आईआईटी बॉम्बे की टीम ने Erm एंजाइम को इनएक्टिव करने का तरीका निकाला है. उन्होंने एप्टामर्स (Aptamers) का इस्तेमाल किया. एप्टामर्स छोटे, सिंथेटिक DNA के टुकड़े होते हैं. ये DNA टुकड़े विशेष रूप से Erm 42 एंजाइम से जुड़ते हैं.  शोधकर्ताओं ने लाखों DNA सिक्वेंस में से दो सबसे प्रभावी एप्टामर्स चुने. एप्टामर्स को और ज्यादा सटीक बनाने के लिए, बेकार हिस्सों को हटा दिया गया. इसका मतलब है कि अब यह सीधे Erm एंजाइम को निशाना बनाता है और उसे काम करने से रोक देता है. 

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इसका तरीका क्या है?

DNA एप्टामर्स अकेले बैक्टीरिया में नहीं जा सकते. ये आसानी से टूट जाते हैं और बैक्टीरिया की झिल्ली पार नहीं कर पाते. टीम ने इसका हल लिपोसोम (Liposomes) निकाला है.  यह छोटे, गोल,  फैट से बने बबल्स होते हैं. ये बैक्टीरिया की झिल्ली से आसानी से घुल-मिल जाते हैं. इन लिपोसोम्स में DNA एप्टामर्स को पैक किया गया ताकि वे सुरक्षित तरीके से बैक्टीरिया के अंदर पहुंच सकें. 

कितना असरदार है नया शोध?

शोधकर्ताओं ने Staphylococcus aureus, एक मुश्किल बैक्टीरिया पर इस तकनीक का परीक्षण किया. जब एप्टामर्स को लिपोसोम के साथ भेजा गया, तो 90 प्रतिशत से ज्यादा बैक्टीरिया ने इन्हें स्वीकार किया. एप्टामर्स और एंटीबायोटिक को मिलाकर देने से बैक्टीरिया की मृत्यु बढ़ गई, जबकि एंटीबायोटिक अकेले बहुत कम असर करता है. ऐसे में Erm एंजाइम इनएक्टिव हो गया और दवा फिर से राइबोसोम पर काम कर सकी. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पेट की परेशानी को कहें अलविदा, रात में अपनाएं ये 10 आदतें, गट हेल्थ होगी बेहतर

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देर रात भारी खाना पचाने में समय लेता है और नींद को भी प्रभावित करता है. कोशिश करें कि रात का खाना सोने से 2-3 घंटे पहले खा लें. अगर फिर भी रात में भूख लगे, तो हल्के स्नैक्स जैसे नट्स, दूध या फलों का सेवन कर सकते हैं.



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धुंधली न हो आंखों की रोशनी…मोतियाबिंद के खतरे को कम करने के लिए अपनाएं ये आसान आदतें

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How To Prevent Cataracts Naturally: आंखों की रोशनी उम्र के साथ कमजोर होना आम बात है, लेकिन अगर समय रहते ध्यान दिया जाए तो इस प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है. कैटरेक्ट भी ऐसी ही एक समस्या है, जो उम्र बढ़ने के साथ ज्यादा देखने को मिलती है. अच्छी बात यह है कि कुछ आसान आदतें अपनाकर इसके खतरे को कम किया जा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कि आखिर यह दिक्कत क्यों होती है?

उम्र बढ़ने से होती है दिक्कत

दरअसल, उम्र बढ़ने के साथ आंखों का लेंस धीरे-धीरे धुंधला होने लगता है, जिससे साफ दिखाई देना मुश्किल हो जाता है. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे धूप में ज्यादा रहना, डायबिटीज का कंट्रोल में न होना और धूम्रपान की आदत. womansworld की रिपोर्ट के अनुसार, सही लाइफस्टाइल अपनाकर इसके असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

धूप से बचाव

सबसे पहला और आसान तरीका है धूप से बचाव. बाहर निकलते समय सनग्लासेस और टोपी पहनने से आंखों को हानिकारक यूवी किरणों से बचाया जा सकता है. खासतौर पर UV 400 वाले चश्मे आंखों के लिए ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं. खानपान भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. विटामिन C से भरपूर चीजें जैसे शिमला मिर्च, संतरा, स्ट्रॉबेरी और ब्रोकोली आंखों के लिए फायदेमंद होती हैं. ये एंटीऑक्सीडेंट्स आंखों को नुकसान पहुंचाने वाले फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं.

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खाने-पीने की चीजें

इसके अलावा, रोजाना सलाद खाने की आदत भी आंखों की सेहत के लिए अच्छी मानी जाती है. पालक और केल जैसी हरी सब्जियों में मौजूद ल्यूटिन और जेक्सैंथिन जैसे पोषक तत्व नजर को मजबूत रखने में मदद करते हैं. अगर सलाद में बेरीज शामिल कर ली जाएं तो इसका फायदा और बढ़ जाता है. फिजिकल एक्टिविटी भी उतनी ही जरूरी है. रोजाना हल्की-फुल्की एक्सरसाइज, जैसे वॉक करना, आंखों की ब्लड वेसल्स को स्वस्थ बनाए रखता है और उम्र से जुड़ी समस्याओं को धीमा करता है.

मल्टीविटामिन लेना फायदेमंद

सप्लीमेंट्स की बात करें तो मल्टीविटामिन लेना फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि इसमें कई जरूरी पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं. हालांकि, केवल एक ही विटामिन पर निर्भर रहना उतना असरदार नहीं माना जाता. दिलचस्प बात यह है कि तनाव भी आंखों की सेहत को प्रभावित कर सकता है. ज्यादा तनाव से शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो ब्लड शुगर को बढ़ाकर आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है.

ऐसे में छोटे-छोटे तरीके, जैसे च्युइंग गम चबाना, तनाव कम करने में मदद कर सकते हैं. मोतियाबिंद को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन सही खानपान, नियमित एक्सरसाइज और आंखों की देखभाल से इसके खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. छोटी-छोटी आदतें लंबे समय में बड़ा फर्क डाल सकती हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या ब्लैक स्किन वाली औरतों पर कामयाब नहीं IVF? नई स्टडी ने खोले चौंकाने वाले राज

क्या ब्लैक स्किन वाली औरतों पर कामयाब नहीं IVF? नई स्टडी ने खोले चौंकाने वाले राज


Why IVF Success Rate Is Lower In Black Women: क्या ब्लैक स्किन वाली महिलाओं पर IVF उतना असरदार नहीं होता जितना बाकी महिलाओं पर? यह सवाल लंबे समय से साइंटिस्ट और डॉक्टरों के बीच चर्चा का विषय रहा है. हाल ही में आई एक नई स्टडी ने इस मुद्दे पर कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं, जो इस बहस को और गहरा कर देते हैं.

करीब दो दशकों से फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर क्यों ब्लैक महिलाओं में IVF के बाद सफल जन्म दर  कम देखी जाती है. पहले माना जाता था कि इसका कारण उनके शरीर में फाइब्रॉइड्स की ज्यादा मौजूदगी हो सकती है, जो एम्ब्रियो के इम्प्लांटेशन में बाधा डालते हैं. इसके अलावा, IVF के दौरान दिए जाने वाले हार्मोनल इंजेक्शन्स पर शरीर का अलग रिस्पॉन्स भी एक वजह माना गया.

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क्या निकला रिसर्च में?

हालांकि, हाल ही में जर्नल फर्टिलिटी एंड स्टेरिलिटी  में पब्लिश एक बड़े स्टडी ने इस धारणा को आंशिक रूप से चुनौती दी है. इस स्टडी में 2.46 लाख से ज्यादा IVF साइकिल्स का एनालिसिस किया गया, जिनमें करीब 7 प्रतिशत केस ब्लैक महिलाओं के थे. रिसर्च में पाया गया कि ओवेरियन स्टिमुलेशन दवाओं पर ब्लैक महिलाओं का रिस्पॉन्स अन्य समूहों की तुलना में थोड़ा बेहतर था. दिलचस्प बात यह रही कि इन महिलाओं के एग्स से बनने वाले एम्ब्रियो की क्वालिटी भी अच्छी पाई गई. यानी IVF की शुरुआती प्रक्रिया में कोई बड़ी कमी नहीं दिखी. रिसर्च में उम्र, बॉडी मास इंडेक्स, हार्मोन लेवल और इंफर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं जैसे फैक्टर्स को भी ध्यान में रखा गया.

रिजल्ट चौंकाने वाले

इसके बावजूद, अंतिम परिणाम यानी सफल जन्म दर में फर्क देखने को मिला. जहां व्हाइट महिलाओं में यह दर करीब 60 प्रतिशत थी, वहीं ब्लैक महिलाओं में यह लगभग 45 प्रतिशत ही रही. यही अंतर वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि कहीं न कहीं कोई ऐसा फैक्टर है, जो आखिरी स्टेज में सफलता को प्रभावित कर रहा है. यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया में  OB-GYN एक्सपर्ट Iris Tien-Lynn Lee के मुताबिक,”स्पष्ट रूप से कोई ऐसी रुकावट है, जो इस प्रक्रिया को अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने से रोक रही है.”

कई छिपे हुए कारण हो सकते हैं

रिसर्चर का यह भी कहना है कि इसके पीछे कई छिपे हुए कारण हो सकते हैं, जैसे गर्भाशय में फाइब्रॉइड्स की अधिकता या एनवायरमेंट से जुड़े ऐसे तत्व, जिनका असर ब्लैक महिलाओं पर ज्यादा पड़ता है.  नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी फीनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन में प्रोफेसर तरुन जैन का मानना है कि इस तरह के अध्ययन हेल्थकेयर सिस्टम की कमियों को समझने में भी मदद करते हैं. उनके अनुसार, ब्लैक महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं में अक्सर खराब परिणामों का सामना करना पड़ता है, चाहे बात मातृत्व की हो या इंफर्टिलिटी ट्रीटमेंट की.

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भारत में जल्द आ सकती है डेंगू की वैक्सीन Qdenga, जानिए कैसे करती है काम?

भारत में जल्द आ सकती है डेंगू की वैक्सीन Qdenga, जानिए कैसे करती है काम?


How Effective Is Dengue Vaccine Qdenga: दुनियाभर में डेंगू के बढ़ते मामलों के बीच Qdenga नाम की डेंगू वैक्सीन को लेकर उम्मीदें तेज हो गई हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वैक्सीन 2026 तक भारत में लॉन्च हो सकती है, हालांकि इसके लिए सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन की मंजूरी और क्लिनिकल ट्रायल्स की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है. यह वैक्सीन जापान की कंपनी टाकेडा फार्मास्युटिकल कंपनी लिमिटेड  ने विकसित की है, जिसे भारत में ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत हैदराबाद स्थित बायोलॉजिकल ई के साथ मिलकर तैयार किया जा सकता है एक्सपर्ट मानते हैं कि देश में तेजी से बढ़ते डेंगू मामलों को देखते हुए यह एक अहम कदम साबित हो सकता है.

भारत में बढ़ रहे हैं मामले

दरअसल, भारत में डेंगू के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है. बायोइन्फॉर्मेटिक्स जर्नल में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच डेंगू के मामलों में करीब 39.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इसके क्लस्टर आउटब्रेक भी सामने आए हैं.  एगिलस डायग्नोस्टिक्स से जुड़ी डॉ. रश्मि खाडपकर ने NDTV को बताया कि भारत में डेंगू हाइपरएंडेमिक हो चुका है, यानी इसके सभी चार वायरस प्रकार एक साथ फैल रहे हैं. यही वजह है कि ऐसी वैक्सीन की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी. 

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क्या है यह वैक्सीन?

Qdenga एक लाइव एटेन्यूएटेड टेट्रावैलेंट वैक्सीन है, जिसका मतलब है कि यह डेंगू वायरस के चारों प्रमुख प्रकार- DEN1, DEN2, DEN3 और DEN4 के खिलाफ सुरक्षा देने के लिए तैयार की गई है. यशोदा हॉस्पिटल के डॉक्टर हरि किशन बूरुगु के मुताबिक, यह वैक्सीन पहले की वैक्सीन डेंगवैक्सिया से अलग है, जिसे केवल उन्हीं लोगों के लिए सुझाया जाता था जिन्हें पहले डेंगू हो चुका हो. 

इन देशों में मिल चुकी है मंजूरी

इस वैक्सीन को अब तक 40 से ज्यादा देशों में मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें यूरोप, ब्रिटेन, इंडोनेशिया और ब्राजील शामिल हैं. इसके साथ ही, इसे वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन से प्रीक्वालिफिकेशन भी मिला है, जो इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता पर वैश्विक भरोसे को दर्शाता है. क्लिनिकल ट्रायल्स की बात करें तो इस वैक्सीन का परीक्षण दुनिया भर में 60,000 से ज्यादा लोगों पर किया जा चुका है. वहीं, भारत में 4 से 60 वर्ष की उम्र के करीब 480 लोगों पर फेज-3 ट्रायल किया गया, जिसमें इसकी सुरक्षा और इम्यून रिस्पॉन्स का आकलन किया गया.

कितनी खतरनाक है डेंगू की बीमारी?

डेंगू एक मच्छरजनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से एडीस एजिप्टी मच्छर के जरिए फैलती है. इसके लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, मांसपेशियों में दर्द और त्वचा पर रैश शामिल हैं. गंभीर मामलों में यह डेंगू हेमरेजिक फीवर में बदल सकता है, जो जानलेवा भी हो सकता है.

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