महिलाओं की आंखें मांगती हैं हर उम्र में खास देखभाल, जानें आई केयर टिप्स

महिलाओं की आंखें मांगती हैं हर उम्र में खास देखभाल, जानें आई केयर टिप्स


आमतौर पर 12 से 19 साल की उम्र के बीच लड़कियों की आंखें तेजी से बदलती हैं. जिसका मुख्य कारण स्मार्टफोन, लैपटॉप और टैबलेट पर ज्यादा समय बिताना है. ऐसे में डिजिटल आंखों का तनाव, मायोपिया, एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस जैसे संभावित समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच कराएं., धुंधली दूर दृष्टि या बार-बार सिरदर्द पर ध्यान दें.20-20-20 नियम अपनाएं यानी हर 20 मिनट में 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखें.

20 से 39 की उम्र में लाइफस्टाइल में बदलाव आंखों पर असर डालते हैं. लंबे समय तक काम, स्क्रीन का अधिक उपयोग, कॉन्टैक्ट लेंस. इनसे सूखी आंखें, संक्रमण, गर्भावस्था के दौरान अस्थायी दृष्टि बदलाव जैसे समस्याएं हो सकती है. ऐसे में हर साल आंखों की जांच करवाएं, कॉन्टैक्ट लेंस साफ रखें, स्क्रीन का समय कम करें, सूखी आंखों के लिए लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का यूज करें.

20 से 39 की उम्र में लाइफस्टाइल में बदलाव आंखों पर असर डालते हैं. लंबे समय तक काम, स्क्रीन का अधिक उपयोग, कॉन्टैक्ट लेंस. इनसे सूखी आंखें, संक्रमण, गर्भावस्था के दौरान अस्थायी दृष्टि बदलाव जैसे समस्याएं हो सकती है. ऐसे में हर साल आंखों की जांच करवाएं, कॉन्टैक्ट लेंस साफ रखें, स्क्रीन का समय कम करें, सूखी आंखों के लिए लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का यूज करें.

Published at : 07 Mar 2026 11:59 AM (IST)

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पैरों में दिखें ये 7 लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना डैमेज हो जाएगा लिवर

पैरों में दिखें ये 7 लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना डैमेज हो जाएगा लिवर


हमारे शरीर में किसी भी बीमारी की शुरुआत अचानक नहीं होती. बीमारी होने से पहले शरीर बार-बार इसके संकेत देता है. अगर समय रहते इन संकेतों को पहचान लिया जाए तो बीमारी से बचा जा सकता है. ऐसे ही लिवर भी खराब होने से पहले कई तरह के लक्षण दिखाई देते हैं. आज हम आपको आपके पैरों में दिखने वाले वे 7 लक्षण बताएंगे, जो लिवर डैमेज होने का संकेत हो सकते हैं. समय रहते डॉक्टर को दिखाने से बड़ी बीमारी से बचा जा सकता है. 

लिवर और पैरों का संबंध 

लिवर हमारे शरीर का एक बेहद महत्तवपूर्ण अंग है, लेकिन जब लिवर ठीक तरह से काम नहीं करता तो इसके कुछ संकेत पैरों में दिखाई देते है, जिसे आमतौर पर पैरों में होने वाले बदलावों को मामूली बात मानकर नजरअंदाज करना आसान है. हम सोचते है कि शायद यह खराब जूते पहनने या लंबे समय तक खड़े रहने के कारण हो सकता है, लेकिन कभी-कभी, ये बदलाव आंतरिक समस्या पैदा कर सकते हैं. विशेष रूप से लिवर स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं को, नजरअंदाज नहीं करना चाहिए बल्कि फौरन डॉक्टर के पास जाना चाहिए.

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इन लक्षणों को नजरअंदाज न करेंः-

  • पैरों में अचानक सूजन आनाः अगर आपके तलवों में अचानक सूजन दिखाई देने लगे तो यह लिवर की समस्या का संकेत हो सकता है. लिवर सही तरीके से काम न करने पर शरीर में तरल पदार्थ जमा होने लगता है जिससे पैरों में सूजन आ जाती है.
  • तलवों में ज्यादा खुजली होनाः जब लिवर ठीक से काम नहीं करता तो शरीर में कुछ पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे त्वचा में खुजली होने लगती है.
  • पैरों का रंग बदलनाः अगर पैरों की त्वचा का रंग पीला, गहरा या असामान्य दिखने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार यह शरीर में बिलीरुबिन बढ़ने का संकेत हो सकता है.
  • नसें ज्यादा उभरनाः कभी कभी पैरों की नसें ज्यादा उभरी हुई दिखाई देने लगती हैं और इसके साथ सूजन और दर्द भी हो तो एक तरह से ये भी लिवर से जुड़ी समस्याओं का एक संकेत हो सकता है.
  • लगातार दर्द या भारीपन महसूस होनाः यह भी शरीर के अंदर किसी समस्या की ओर इशारा करता है. जब पैरों में लगातार दर्द, भारीपन या थकान महसूस हो रही हो तो यह भी लिवर की बीमारी का एक संकेत हो सकता है. 
  • पैरों में हद से ज्यादा जलन होनाः जब यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे तो यह भी लिवर की खराबी का एक संकेत हो सकता है. कई लोगों को पैरों के तलवों में जलन या गर्माहट महसूस होने लगती है.
  • चमड़ी का बहुत ज्यादा सूखनाः अगर पैरों की चमड़ी बहुत ज्यादा सूखी या फटने लगे तो यह भी किसी गड़बड़ी का संकेत हो सकता है.

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लक्षण दिखाई देने पर ये उपाय करें

अगर आपको इस प्रकार के लक्षण आपको अपने पैरों में लगातार दिखाई दे रहे है या ये परेशानी बढ़ते ही जा रही है तो  इसे बिलकुल हलके में ना ले और नजरंदाज ना करें इसकी तुरंत डॉक्टर के पास जाकर अपनी परेशानी बताएं और इसका जांच कराएं, क्योंकि समय पर इलाज न मिलने पर आपके लिवर को गंभीर नुकसान हो सकता हैं.

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मर्दों को गलती से भी इग्नोर नहीं करने चाहिए ये 5 बेहद कॉमन लक्षण, वरना बढ़ जाएगा प्रोस्टेट

मर्दों को गलती से भी इग्नोर नहीं करने चाहिए ये 5 बेहद कॉमन लक्षण, वरना बढ़ जाएगा प्रोस्टेट


बढ़ती उम्र के साथ पुरुषों में कई स्वास्थ्य समस्याएं देखने को मिलती हैं, जिनमें प्रोस्टेट से जुड़ी परेशानी भी शामिल है. प्रोस्टेट पुरुषों के प्रजनन तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो मूत्राशय के नीचे स्थित होती है और मूत्रमार्ग को घेरता है. उम्र के साथ यह ग्रंथि धीरे-धीरे बड़ी हो सकती है, जिसे प्रोस्टेट का बढ़ना कहा जाता है. यह समस्या आमतौर पर 50 वर्ष से अधिक उम्र वाले पुरुषों में देखने को मिलती है, लेकिन कई मामलों में यह समस्या कम उम्र के लोगों में भी देखने को मिली है. आमतौर पर इसके लक्षण पेशाब करने में समस्या के रूप में सामने आते हैं, जिन्हें बढ़ती उम्र के लक्षण समझकर नजरअंदाज़ नहीं कर देना चाहिए और किसी भी प्रकार के लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर कि सलाह लेनी चाहिए.

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प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ने के 5 संकेत क्या हैं?

1. कमजोर यूरिन स्ट्रीम:

प्रोस्टेट बढ़ने का सबसे पहला संकेत है पेशाब की धार का कमजोर हो जाना. अगर आपको पेशाब करने में ज़्यादा समय लगता है या पेशाब की धार पहले जैसी तेज नहीं है, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि प्रोस्टेट ग्रंथि मूत्रमार्ग पर दबाव डाल रही है, जिससे पेशाब का बहाव कम हो सकता तथा रुक सकता है.

2. मूत्राशय पूरी तरह खाली न होने का एहसास:

कई बार पेशाब करने के बाद भी ऐसा लगता है कि मूत्राशय पूरी तरह खाली नहीं हुआ है और बार-बार पेशाब करने की इच्छा होती रहती है. दरअसल, प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ने से मूत्रमार्ग पर दबाव पड़ता है जिससे मूत्राशय पूरी तरह खाली नहीं हो पाता, यह प्रोस्टेट बढ़ने का एक लक्षण है. इसके कारण व्यक्ति को बार-बार पेशाब जाने की जरूरत महसूस होती रहती है.

3. पेशाब करने में कठिनाई:

कहीं आपके साथ भी ऐसा तो नहीं होता कि पेशाब करने में कुछ ज्यादा समय लगता हो, कई बार पुरुषों को पेशाब करने में परेशानी होती है या काफी समय तक इंतजार करना पडता है, यह प्रोस्टेट कि समस्या हो सकती है. यह स्थिति तब होती है जब बढ़ा हुआ प्रोस्टेट मूत्रमार्ग पर दबाव डालता है, अगर आपको बार-बार इस प्रकार कि समस्या हो रही है, तो इसे बिलकुल भी नजरअंदाज ना करें.

4. रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना (नोक्टूरिया):

अगर आप रात में बार बार उठकर पेशाब करने जाते है, तो यह भी प्रोस्टेट बढ़े हुए होने का संकेत हो सकता है. इससे लोगों की नींद भी पूरी नहीं होती और उनका स्वभाव चिड़चिड़ा रहने लगता है, कई बार लोग इसे एक सामान्य समस्या या बढ़ती हुए उम्र के साथ होने वाली समस्या समझकर समझकर टाल देते हैं.

5. पेशाब का बूंद-बूंद टपकना:

कई बार पेशाब करने के बाद भी कुछ बूंदें टपकती रहती हैं, यह भी प्रोस्टेट से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है.

प्रोस्टेट के इलाज का सबसे प्रभावी तरीका क्या है?

चिकित्सा क्षेत्र में हुई प्रगति ने प्रोस्टेट का इलाज आसान बना दिया है, अब बिना ऑपरेशन के भी सिर्फ दवाइयों से ही इसका इलाज संभव है. आपको यह ध्यान रखना जरुरी है की जैसे ही आपको कोई लक्षण दिखाई दे तो उसे नजरअंदाज़ न करें, बस जल्द से जल्द किसी यूरोलॉजिस्ट से मिले.

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युवाओं में अचानक क्यों बढ़ रहे कोलन कैंसर के मामले? इस स्टडी में सामने आए खतरनाक कारण

युवाओं में अचानक क्यों बढ़ रहे कोलन कैंसर के मामले? इस स्टडी में सामने आए खतरनाक कारण


Can Microplastics Cause Colon Cancer: कैंसर के मामले दुनियाभर में बढ़ रहे हैं, अब इसको लेकर एक नई स्टडी ने कैंसर के बढ़ते मामलों, खासकर कोलन कैंसर को लेकर एक नई चिंता सामने रखी है. दुनियाभर में मार्डन मेडिकल और तकनीक के कारण कई प्रकार के कैंसर के मामलों में गिरावट देखी जा रही है, लेकिन कोलोरेक्टल यानी आंत से जुड़ा कैंसर युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है. कई बार यह बीमारी उन लोगों में भी पाई जा रही है जो बाहर से पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देते हैं.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

कोलन कैंसर के सामान्य लक्षणों में पेट दर्द, मल में खून आना और लंबे समय तक पेट से जुड़ी परेशानी शामिल हो सकती है. कई लोग इन संकेतों को साधारण पेट की समस्या या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार ऐसे लक्षण दिखने पर जांच कराना बेहद जरूरी है. अब एक नई रिसर्च में यह संभावना जताई गई है कि शरीर में बढ़ती माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा भी इस बीमारी के पीछे एक कारण हो सकती है.

इक्रोप्लास्टिक का शरीर पर असर

यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया के रिसर्चर की तरफ से किए गए एक बड़े साइंटिफिक एनालिसिस में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक हमारे शरीर पर गंभीर असर डाल सकते हैं. रिसर्चर का कहना है कि ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण कोलन कैंसर, फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों और यहां तक कि प्रजनन क्षमता पर भी निगेटिव प्रभाव डाल सकते हैं. प्रोफेसर ट्रेसी जे. वुडरफ के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक आज एनवायरमेंट में हर जगह मौजूद हैं. ये हवा, पानी, समुद्र तट, मिट्टी और भोजन तक में पाए जा चुके हैं. यहां तक कि अंटार्कटिका और गहरे समुद्री इलाकों जैसे दूरस्थ स्थानों में भी इनके कण मिले हैं. इनके बेहद छोटे आकार के कारण ये आसानी से शरीर के अंदर पहुंच सकते हैं और विभिन्न अंगों में जमा हो सकते हैं. कुछ स्टडी में माइक्रोप्लास्टिक के कण मानव प्लेसेंटा, ब्रेस्ट मिल्क और लिवर में भी पाए गए हैं.

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क्या कहना है एक्सपर्ट का?

एक्सपर्ट का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं और आंतों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. यही कारण है कि साइंटिस्ट अब यह जांच कर रहे हैं कि क्या इनका संबंध कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से हो सकता है. हालांकि फिलहाल यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि माइक्रोप्लास्टिक सीधे तौर पर कैंसर का कारण बनते हैं, लेकिन कई स्टडी यह संकेत देते हैं कि ये शरीर में बैक्टीरिया और रसायनों जैसे हानिकारक तत्व पहुंचा सकते हैं, जो कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं.

ये भी हैं कारण

डॉक्टरों के अनुसार कोलेन के कैंसर के जोखिम को कई अन्य कारण भी प्रभावित करते हैं. इनमें बढ़ती उम्र, रेड और प्रोसेस्ड मीट का ज्यादा सेवन, फाइबर की कमी, सूजन से जुड़ी आंतों की बीमारियां, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी और परिवार में कैंसर का पुराना केस भी शामिल हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस बीमारी में भी राहत देती है कोलेस्ट्रॉल की यह दवा, नई स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात

इस बीमारी में भी राहत देती है कोलेस्ट्रॉल की यह दवा, नई स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात


How PCSK9 Inhibitors Lower Cholesterol: कोलेस्ट्रॉल एक तरह का फैटी पदार्थ है जो हमारे खून में मौजूद रहता है. अक्सर लोग इसे सिर्फ नुकसानदायक मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि शरीर के लिए इसकी एक जरूरी भूमिका भी होती है. कोलेस्ट्रॉल सेल्स की बाहरी परत बनाने में मदद करता है और कई महत्वपूर्ण हार्मोन तथा विटामिन-डी के निर्माण में भी इसकी जरूरत पड़ती है. इसके अलावा शरीर इसका इस्तेमाल बाइल एसिड बनाने के लिए करता है, जो खाने में मौजूद फैट को पचाने में मदद करते हैं. समस्या तब शुरू होती है जब खून में कोलेस्ट्रॉल का स्तर जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है.

कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ने से क्या होता है नुकसान?

जब ब्लड में खराब कोलेस्ट्रॉल अधिक मात्रा में जमा हो जाता है, तो यह धीरे-धीरे ब्लड वेसल्स की अंदरूनी दीवारों पर चिपकने लगता है. समय के साथ यह जमा होकर एक मोटी और चिपचिपी परत बना लेता है, जिसे प्लाक कहा जाता है. इस प्रक्रिया को एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है. प्लाक बढ़ने ब्लड वेसल्स संकरी हो जाती हैं और ब्लड का फ्लो प्रभावित होने लगता है. गंभीर स्थिति में यह पूरी तरह ब्लॉकेज या खून के थक्के का कारण बन सकता है, जिससे हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसी जानलेवा स्थितियां पैदा हो सकती हैं.

क्यों दी जाती है दवा लेने की सलाह?

डॉक्टर अक्सर कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए दवाइयों की सलाह देते हैं. इन दवाओं का मकसद खून में हानिकारक कोलेस्ट्रॉल को कम करना और ब्लड बेसल्स में प्लाक बनने से रोकना होता है. सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दवाओं में स्टैटिन शामिल हैं. इसके अलावा हाल के वर्षों में एक नई दवा कैटेगरी PCSK9 inhibitors भी सामने आई है, जो उन लोगों के लिए दी जाती है जिनमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर बहुत ज्यादा होता है या जिन्हें स्टैटिन से पर्याप्त फायदा नहीं मिलता,

क्या निकला रिसर्च में?

ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया के रिसर्चर ने हाल ही में एक स्टडी किया, जिसमें यह समझने की कोशिश की गई कि ये दवाएं शरीर पर किस तरह असर डालती हैं. रिसर्च में पाया गया कि स्टैटिन और PCSK9 inhibitors दोनों ही कोलेस्ट्रॉल को कम करने में काफी प्रभावी हैं और हार्ट की बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद करते हैं.

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हालांकि रिसर्चर को कुछ दिलचस्प बातें भी पता चलीं. स्टैटिन लेने वाले कुछ लोगों में दिमाग के एक हिस्से, जिसे हिप्पोकैम्पस कहा जाता है, में हल्का बदलाव देखा गया. हिप्पोकैम्पस याद रखने और सीखने की क्षमता से जुड़ा हिस्सा होता है. कुछ मामलों में यह हिस्सा थोड़ा बड़ा पाया गया, जिससे संकेत मिलता है कि स्टैटिन का असर ब्रेन वाले पर भी पड़ सकता है. हालांकि इस संबंध को पूरी तरह समझने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है.

वजन और शरीर में फैट की मात्रा बढ़ सकती है

स्टडी में यह भी देखा गया कि कुछ लोगों में स्टैटिन लेने के बाद वजन और शरीर में फैट की मात्रा बढ़ सकती है. इसके अलावा कुछ पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर थोड़ा कम पाया गया. टेस्टोस्टेरोन ऊर्जा, मांसपेशियों की ताकत और मूड से जुड़ा महत्वपूर्ण हार्मोन है, इसलिए इसके स्तर में बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वहीं PCSK9 inhibitors से जुड़े स्टडी में फेफड़ों के कामकाज से संबंधित कुछ बदलावों के संकेत भी मिले. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी यह साफ नहीं है कि ये दवाएं सीधे तौर पर इन बदलावों की वजह हैं या नहीं, इसलिए इस पर और रिसर्च की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! सप्लीमेंट्स का गलत कॉम्बिनेशन खराब कर सकता है आपकी हेल्थ, जानें एक्सपर्ट की राय

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Which Supplements Should Not Be Taken Together: आजकल हेल्थ और वेलनेस को लेकर लोगों में जागरूकता पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है. यही वजह है कि बहुत से लोग अपने शरीर में विटामिन और पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिए सप्लीमेंट्स लेने लगे हैं. थकान महसूस हो तो आयरन की गोली, इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए जिंक और स्किन के लिए विटामिन-C जैसी गोलियां आम हो गई हैं. लेकिन कई लोग यह नहीं जानते कि कुछ सप्लीमेंट्स को एक साथ लेना शरीर के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स Amy Margulies के मुताबिक सप्लीमेंट्स लेते समय उनके सही समय और कॉम्बिनेशन का ध्यान रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि कुछ विटामिन और मिनरल एक-दूसरे के असर को कम कर सकते हैं.
 
आयरन और कैल्शियम

आयरन की गोलियां अक्सर आयरन की कमी यानी एनीमिया को दूर करने के लिए दी जाती हैं. यह शरीर में लाल ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करती हैं, जिससे ऑक्सीजन पूरे शरीर में बेहतर तरीके से पहुंचती है. वहीं कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है. लेकिन अगर इन दोनों को साथ लिया जाए तो कैल्शियम आंतों में आयरन के अब्जॉर्ब को कम कर सकता है. इससे आयरन सप्लीमेंट का असर घट सकता है और पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे कब्ज, गैस या मतली भी हो सकती है. इसलिए डॉक्टर इन्हें कम से कम दो घंटे के अंतर से लेने की सलाह देते हैं.

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आयरन और जिंक

जिंक इम्यून सिस्टम को मजबूत करने और संक्रमण से बचाने में मदद करता है. लेकिन आयरन और जिंक दोनों को एक साथ लेने से ये शरीर में एक-दूसरे के अब्जॉर्ब के लिए रेस करने लगते हैं. इससे दोनों मिनरल्स का फायदा कम हो सकता है और पेट में दर्द, मरोड़ या दस्त जैसी परेशानी भी हो सकती है. इसलिए एक्सपर्ट इन दोनों सप्लीमेंट्स के बीच भी कम से कम दो घंटे का अंतर रखने की सलाह देते हैं.

कॉपर और जिंक

कॉपर शरीर में ऊर्जा उत्पादन, नसों के स्वास्थ्य और इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी होता है. लेकिन अगर ज्यादा मात्रा में जिंक लिया जाए तो यह कॉपर के अब्जॉर्व में बाधा डाल सकता है. लंबे समय तक ऐसा होने पर कॉपर की कमी हो सकती है, जिससे एनीमिया, कमजोर इम्यूनिटी या नसों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए इन दोनों सप्लीमेंट्स को भी अलग-अलग समय पर लेना बेहतर माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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