सिंथेटिक रंगों से स्किन-आंखों और फेफड़ों को कैसे हो सकता है नुकसान? जानें इनसे बचने का तरीका

सिंथेटिक रंगों से स्किन-आंखों और फेफड़ों को कैसे हो सकता है नुकसान? जानें इनसे बचने का तरीका


इस बार होली तीन और चार मार्च को मनाई जाने वाली है. वहीं होली पर देश भर में सड़कों पर रंग और गुलाल की बौछार दिखाई देती है. लेकिन इन चमकीले रंगों के पीछे छिपे खतरे अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं. दरअसल बाजार में बिकने वाले कई सिंथेटिक होली के रंगों में भारी धातुएं, इंडस्ट्रियल डाई और खतरनाक रसायन पाए जाते हैं जो स्किन, आंखों और फेफड़ों के लिए खतरनाक समस्याएं पैदा कर सकते हैं. डॉक्टरों का कहना है की होली के रंगों से होने वाले साइड इफेक्ट, मामूली खुजली से लेकर गंभीर सांस संबंधी दिक्कतों तक पहुंच सकते हैं. अस्थमा, एलर्जी या संवेदनशील स्किन वाले लोगों के लिए यह खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है. 

स्किन पर कैसे असर डालते हैं सिंथेटिक रंग?

सिंथेटिक रंगों में अक्सर सीसा, पारा, क्रोमियम और सिलिका जैसे तत्व मिलाए जाते हैं. यह रसायन स्किन पर जलन, लाल चकते, खुजली और कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस जैसी समस्या पैदा कर सकते हैं, जिन लोगों को पहले से एक्जिमा या अन्य स्किन प्रॉब्लम है उनमें रिएक्शन ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं. वहीं बार-बार संपर्क में आने से स्किन रूखी और ज्यादा संवेदनशील हो सकती है. कुछ मामलों में लंबे समय तक निशान भी रह सकते हैं. 

आंखों के लिए कितना खतरनाक रंग?

होली खेलते समय रंग आंखों में चले जाने से जलन, सूजन और लालपन हो सकता है. कई मामलों में कंजंक्टिवाइटिस या कॉर्नियल एब्रेशन की शिकायत सामने आती है. रंगों में मौजूद एसिड, क्षारीय तत्व और जहरीली डाई आंखों को नुकसान पहुंचा सकती है. अगर समय पर इलाज न मिले तो इन्फेक्शन या नजर पर असर पड़ने का खतरा भी रहता है. काॅन्टैक्ट लेंस पहनने वालों के लिए खतरा ज्यादा है, क्योंकि पाउडर लेंस के पीछे फंस सकता है. इस तरह के मामलों में पहले भी कुछ गंभीर इन्फेक्शन देखे गए हैं. 

रंगों का फेफड़ों और सांस पर असर 

होली पर सूखा लाल रंग आसानी से हवा में उड़ता है और सांस के जरिए शरीर में चला जाता है. कई रंगों में कीटनाशक, एस्बेस्टस या भारी धातुएं में पाई जाती है. इन्हें सांस के साथ अंदर लेने पर अस्थमा अटैक, ब्रोंकाइटिस, राइनाइटिस, घरघराहट और सीने में जकड़न जैसी समस्याएं हो सकती है. वहीं लगातार कांटेक्ट से श्वसन नलिका सूज सकती हैं और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज का खतरा बढ़ सकता है. ऐसे में अस्थमा या एलर्जी से पीड़ित लोगों को सूखे रंगों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है. इसके अलावा गलती से रंग निगल लेने या ज्यादा मात्रा में सांस के जरिए शरीर के अंदर जाने पर यह रसायन किडनी और लीवर को भी प्रभावित कर सकते हैं. वहीं होली पर कुछ इंडस्ट्रियल डाई वाले रंग के लंबे समय तक संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा भी हो सकता है. इसके अलावा प्रेग्नेंट महिलाओं को रंग से विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है. 

सुरक्षित तरीके से कैसे मनाएं होली?

  • सुरक्षित तरीके से होली मनाने के लिए नेचुरल या हर्बल गुलाल का यूज करें.
  • होली खेलने से पहले स्किन और बालों पर तेल या मॉइश्चराइजर लगाएं. 
  • होली पर फुल स्लीव कपड़े पहनें और आंखों की सुरक्षा का ध्यान रखें. 
  • इसके अलावा होली पर काॅन्टैक्ट लेंस न पहनें. 
  • होली का रंग लगने के बाद साफ पानी से तुरंत धो लें. 
  • वहीं होली खेलने के लिए ज्यादा धूल वाली और भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें. 

ये भी पढ़ें: Diabetes Myths and Facts: गुड़-शहद सुरक्षित और जामुन-मेथी से बीमारी छूमंतर? जानें डायबिटीज से जुड़े इन दावों का असली सच

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ सरकार का बड़ा कदम, 14 साल की लड़कियों को मुफ्त में लगेगी HPV वैक्सीन

सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ सरकार का बड़ा कदम, 14 साल की लड़कियों को मुफ्त में लगेगी HPV वैक्सीन


HPV Vaccination Campaign In India: देशभर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार लगातार बड़े कदम उठा रही है. सर्वाइकल कैंसर, जिसके मामले भारत में लगातार बढ़ रहे हैं, उसके खिलाफ सरकार वैक्सीनेशन अभियान शुरू करने जा रही है. इस पहल के तहत 14 साल की लड़कियों को मुफ्त में एचपीवी वैक्सीन दी जाएगी. इसे सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ एक सुरक्षित विकल्प माना जाता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में हर साल करीब 1.15 करोड़ लड़कियां 14 वर्ष की उम्र में पहुंचती हैं.

सर्वाइकल कैंसर के मामले

सर्वाइकल कैंसर के मामलों में भारत की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत है. आंकड़े बताते हैं कि देश में हर कुछ मिनट में एक महिला इस बीमारी के कारण जान गंवा देती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि एचपीवी टीकाकरण का विस्तार कैंसर से होने वाली रोकी जा सकने वाली मौतों को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी एक आम इंफेक्शन है, जो स्किन-टू-स्किन संपर्क से फैलता है और अक्सर शुरुआती चरण में कोई लक्षण नहीं दिखाता. यदि उच्च जोखिम वाले स्ट्रेन का इंफेक्शन लंबे समय तक बना रहे, तो यह धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले सकता है.

राष्ट्रीय कार्यक्रम में इस्तेमाल की जा रही क्वाड्रिवेलेंट वैक्सीन एचपीवी के टाइप 16 और 18 से सुरक्षा देती है, जो सर्वाइकल कैंसर के अधिकांश मामलों के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं. इसके अलावा यह टाइप 6 और 11 से भी बचाव करती है, जो आम तौर पर जननांग मस्सों का कारण बनते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, यह टीका सिर्फ सर्वाइकल कैंसर ही नहीं बल्कि गुदा, योनि, वल्वा, लिंग और गले से जुड़े कुछ प्रकार के कैंसर के खतरे को भी कम करने में मददगार है. यदि वायरस के संपर्क में आने से पहले यह वैक्सीन लगा दी जाए, तो सर्वाइकल कैंसर और उससे जुड़ी प्रारंभिक अवस्थाओं के खिलाफ लगभग 97 प्रतिशत तक सुरक्षा मिल सकती है. रिसर्च बताती हैं कि टीकाकरण के बाद कम से कम 12 से 15 वर्षों तक मजबूत इम्यून बनी रहती है.

9 साल से 14 साल की लड़कियां

यह टीका किशोरावस्था में सबसे अधिक प्रभावी होता है, इसलिए 9 से 14 वर्ष की आयु की लड़कियां प्राथमिक लक्ष्य हैं. 15 से 26 वर्ष की महिलाओं के लिए कैच-अप वैक्सीनेशन की सलाह दी जाती है, जबकि 27 से 45 वर्ष की आयु के पुरुष और महिलाएं डॉक्टर की सलाह के बाद टीका लगवा सकते हैं. 9 से 14 वर्ष के लड़कों को भी शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि इंफेक्शन के फैलाव को कम किया जा सके. कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों, जैसे एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों को टीकाकरण से पहले हेल्थ परामर्श लेना चाहिए.

सर्वाइकल कैंसर से मौत

मिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर बना हुआ है. हर साल करीब 80 हजार नए मामले सामने आते हैं और 42 हजार से ज्यादा महिलाओं की मौत इस बीमारी के कारण होती है. साइंटफिक प्रमाण बताते हैं कि सर्वाइकल कैंसर के लगभग सभी मामलों के पीछे ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी का लगातार बना रहने वाला इंफेक्शन जिम्मेदार होता है. खासतौर पर एचपीवी के टाइप 16 और 18 को उच्च जोखिम वाला माना जाता है, जो भारत में 80 प्रतिशत से अधिक मामलों के लिए जिम्मेदार हैं.

एचपीवी वैक्सीन कितनी प्रभावी है

यूएस  की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, एचपीवी वैक्सीन दुनिया में सबसे ज्यादा स्टडी की गई वैक्सीन में से एक है. रिसर्च से यह साबित हुआ है कि यह वैक्सीन उन एचपीवी प्रकारों से होने वाले सर्वाइकल कैंसर को रोकने में 90  प्रतिशत से ज्यादा तक प्रभावी है, जिन्हें यह कवर करती है. इस वैक्सीनेशन सेंटरों  को 24 घंटे संचालित सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़ा जाएगा, ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत हेल्थ सहायता उपलब्ध हो सके. इससे सुरक्षा स्टेंडर्ड को मजबूत करने के साथ-साथ पेरेंट्स का भरोसा भी बढ़ाने में मदद मिलेगी.

इसे भी पढ़ें- Can Diabetes Medication Be Stopped: क्या कभी नहीं बंद हो सकती डायबिटीज की दवा, क्या है सच?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

वर्क आउट के बाद भी बढ़ रहा है वजन, जानें कहां हो रही दिक्कत?

वर्क आउट के बाद भी बढ़ रहा है वजन, जानें कहां हो रही दिक्कत?


Why Gaining Weight Even After Exercising: हमारे शरीर की हर मांसपेशी चलने-फिरने और काम करने के लिए बनी है, इसलिए वह एनर्जी भी खर्च करती है करीब आधा किलो मांसपेशी आराम की स्थिति में भी रोजाना लगभग 7 से 10 कैलोरी तक जला सकती है, जबकि उतनी ही मात्रा में मौजूद फैट सिर्फ 2 से 3 कैलोरी ही खर्च करती है. यही वजह है कि फिटनेस एक्सपर्ट अक्सर फैट कम करने और मसल्स बढ़ाने की सलाह देते हैं.

फिर भी कई लोग शिकायत करते हैं कि महीनों से वर्कआउट करने के बाद भी उनका वजन कम नहीं हो रहा, बल्कि बढ़ गया है. नई एक्सरसाइज शुरू करने पर शुरुआती दौर में ऐसा होना सामान्य है, क्योंकि शरीर खुद को नई रूटीन के अनुसार ढाल रहा होता है. लेकिन अगर लंबे समय से नियमित एक्सरसाइज करने के बावजूद वजन बढ़ रहा है, तो इसके पीछे कुछ कारण हो सकते हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है.

क्या होता है कारण?

Lalpathlabs की रिपोर्ट के अनुसार, इसके कई कारण है, जिसमें सबसे पहला कारण मसल्स मास बढ़ना है. जब आप अनएक्टिव लाइफस्टाइल से सक्रिय दिनचर्या की ओर बढ़ते हैं, तो शरीर में बदलाव आते हैं. हो सकता है आपने कुछ फैट कम किया हो, लेकिन साथ ही मसल्स भी विकसित हुई हों. चूंकि मसल्स फैट से भारी होती हैं, इसलिए शरीर पहले से ज्यादा टोंड दिख सकता है, लेकिन वजन मशीन पर आंकड़ा बढ़ सकता है. शुरुआती हफ्तों में शरीर में पानी रुकने की प्रवृत्ति भी वजन बढ़ा सकती है. ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं है.

खानपान भी है वजह

दूसरा बड़ा कारण खानपान है. कई लोग यह सोचकर जंक फूड खा लेते हैं कि जिम में ज्यादा पसीना बहा लेंगे तो सब संतुलित हो जाएगा. लेकिन संतुलित आहार के बिना वजन घटाना मुश्किल है. वर्कआउट के बाद ली जाने वाली कुछ स्मूदी या एनर्जी ड्रिंक में भी काफी चीनी और अतिरिक्त कैलोरी होती है. कुछ लोग दिनभर कम खाते हैं और रात में ज्यादा खा लेते हैं, जिससे कैलोरी संतुलन बिगड़ जाता है. सही मात्रा और संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है.

नींद की कमी भी हो सकता है कारण

नींद की कमी भी वजन बढ़ाने का कारण बन सकती है. एक्सपर्ट मानते हैं कि रोज़ाना 7 से 9 घंटे की नींद शरीर के लिए आवश्यक है. पर्याप्त नींद न मिलने से थकान बढ़ती है, जिससे जिम की नियमितता प्रभावित होती है और अनहेल्दी खाने की इच्छा बढ़ जाती है. इसके साथ ही साथ ही, नींद की कमी से घ्रेलिन और लेप्टिन जैसे हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं, इसका रिजल्ट यह होता है कि ओवरईटिंग की संभावना बढ़ जाती है.

वर्कआउट भी समस्या

कई बार समस्या वर्कआउट के तरीके में भी होती है. जिम जाना ही काफी नहीं है, वहां सही तरीके से और पर्याप्त तीव्रता के साथ एक्सरसाइज करना जरूरी है. सिर्फ हल्की वॉक या न्यूनतम सेटिंग पर ट्रेडमिल चलाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, वजन घटाने के लिए कार्डियो, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और अन्य एक्सरसाइज को जोडना जरूरी है. 

इसे भी पढ़ें- Can Diabetes Medication Be Stopped: क्या कभी नहीं बंद हो सकती डायबिटीज की दवा, क्या है सच?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

क्या बेहतर दिमाग के लिए भैंस से अच्छा होता है गाय का दूध, राजस्थान मिनिस्टर का दावा कितना सही?

क्या बेहतर दिमाग के लिए भैंस से अच्छा होता है गाय का दूध, राजस्थान मिनिस्टर का दावा कितना सही?


Does Cow Milk Increase Intelligence In Children: राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के एक बयान ने हाल ही में विवाद खड़ा कर दिया. कोटा जिले में आयोजित ‘गो-संवर्धन और गोचारण’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दावा किया कि देसी गाय का दूध बच्चों की बुद्धि और ऊर्जा बढ़ाता है, जबकि भैंस का दूध उन्हें सुस्त और कमजोर बना देता है. अपने दावे को समझाने के लिए उन्होंने एक उदाहरण भी दिया. चलिए आपको इसकी सच्चाई बताते हैं. 

क्या कहते हैं इसको लेकर एक्सपर्ट?

मंत्री का बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई. thecsrjournal की रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट का साफ कहना है कि ऐसा कोई साइंटफिक प्रमाण नहीं है जो यह साबित करे कि गाय का दूध बच्चों की बुद्धि को भैंस के दूध से ज्यादा बढ़ाता है. एक्सपर्ट ने इन बातों पर संदेह जताया है. उनका कहना है कि अभी तक ऐसा कोई ठोस साइटफिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि गाय का दूध भैंस के दूध की तुलना में बच्चों की बुद्धि पर बेहतर असर डालता है. यह जरूर माना जाता है कि भैंस के दूध में फैट की मात्रा अधिक होती है, जो लगभग 6 से 15 प्रतिशत तक हो सकती है, इसलिए यह ज्यादा कैलोरी वाला होता है. इसके अलावा इसमें प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन B12 भी थोड़ा अधिक पाया जाता है, जो शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जरूरी न्यूट्रिशन हैं. हालांकि इन डाइजेशन संबंधी अंतरों को बच्चों की मेंटल क्षमता में किसी स्पष्ट फर्क से जोड़कर नहीं देखा गया है.

क्या होता है फर्क?

जहां तक न्यूट्रिशन के फर्क को समझने की बात है, तो कुछ लोग कम कैलोरी लेने के उद्देश्य से गाय का दूध चुनते हैं. लेकिन यह फैसला शरीर के मेटाबॉलिज्म से जुड़ा होता है, न कि दिमागी विकास से. दिल्ली स्थित नेशनल डायबिटीज, ओबेसिटी एंड कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन से जुड़ी पोषण एक्सपर्ट का कहना है कि आयोडीन जैसा तत्व, जो ब्रेन के विकास में अहम भूमिका निभाता है, वह दूध देने वाले पशु की नस्ल से ज्यादा उसके आहार पर निर्भर करता है. यानी गाय हो या भैंस, दूध में आयोडीन की मात्रा इस बात पर तय होती है कि उसे क्या खिलाया गया है.

कम उम्र में गाय के दूध की सलाह

डॉ. सुधा ने सोशल मीडिया पर शेयर एक वीडियो में बताया कि एक साल से कम उम्र में बच्चों को दोनों गाय और भैंस का दूध नहीं देना चाहिए. अगर बच्चा एक साल या उससे ज्यादा उम्र का है तो उसे गाय का दूध देना चाहिए, ऐसा इसलिए है क्योंकि उसे हल्का और आसानी से पचने वाला माना जाता था. इसके अलावा बच्चे की उम्र दो साल होने पर उसे भैंस का दूध देना सही रहता है. लेकिन हालिया साइंटफिक अध्ययनों में यह साबित नहीं हुआ है कि भैंस के दूध की जगह गाय का दूध चुनने से बच्चों की बौद्धिक क्षमता बेहतर हो जाती है.

ये भी पढ़ें-Vitamin K Deficiency: मसूड़ों से खून आना और नीले निशान पड़ना है खतरे की घंटी, शरीर में हो गई है इस खास विटामिन की कमी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator





Source link

हार्ट-शुगर और डाइजेशन का ‘ऑल-इन-वन’ इलाज, जानें मोटे अनाज को डाइट में शामिल करने के 5 बड़े कारण

हार्ट-शुगर और डाइजेशन का ‘ऑल-इन-वन’ इलाज, जानें मोटे अनाज को डाइट में शामिल करने के 5 बड़े कारण


दूर रहता तो बच जाता, गर्लफ्रेंड के चक्कर में मारा गया ड्रग लॉर्ड एल मेंचो, मैक्सिकन आर्मी का खुलासा



Source link

क्या कभी नहीं बंद हो सकती डायबिटीज की दवा, क्या है सच?

क्या कभी नहीं बंद हो सकती डायबिटीज की दवा, क्या है सच?


What Happens If You Stop Diabetes Medication: डायबिटीज संभालना आसान नहीं है. रोज़ ब्लड शुगर चेक करना, खानपान कंट्रोल रखना, एक्टिव रहना और समय पर दवा लेना, ये सब लगातार अनुशासन मांगते हैं. ऐसे में कई बार लोग अचानक दवा बंद करने का फैसला कर लेते हैं. वजह अलग-अलग हो सकती है, इसमें “शुगर नॉर्मल” दिख रही है, रोज गोली खाने से थकान हो गई है, दवा के साइड इफेक्ट का डर है या किसी ने कह दिया कि हर्बल इलाज ज्यादा बेहतर है शामिल होते हैं.

लेकिन सच यह है कि डायबिटीज की दवा अचानक बंद करना सुरक्षित नहीं है. डायबिटीज एक लंबी अवधि की बीमारी है, जो लगातार कंट्रोल मांगती है. अगर शुगर लेवल ठीक दिख रहा है, तो अक्सर इसका मतलब यह है कि दवा काम कर रही है, बीमारी खत्म नहीं हुई है. 

दवा अचानक बंद करने से क्या होती है दिक्कत?

 हेल्थ मामलों में जानकारी देने वाली फार्मा बेवसाइट healingpharma की रिपोर्ट के अनुसार,  दवा अचानक बंद करते ही ब्लड शुगर कुछ घंटों या दिनों में तेजी से बढ़ सकता है. इसे हाइपरग्लाइसीमिया कहते हैं. इसके लक्षण हो सकते हैं, बहुत ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, धुंधला दिखना, थकान, चक्कर, घाव देर से भरना और हाथ-पैरों में झनझनाहट. अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो यह गंभीर और जानलेवा दिक्कत में बदल सकता है.

किस डायबिटीज में दवा बंद करना कितना खतरनाक?

टाइप 1 डायबिटीज में अचानक इंसुलिन बंद करना और भी खतरनाक है. इससे डायबिटिक कीटोएसिडोसिस हो सकता है, जिसमें शरीर ग्लूकोज की जगह फैट जलाने लगता है और खून में कीटोन नामक एसिड बढ़ जाते हैं. तेज सांस चलना, उल्टी, पेट दर्द, सांस में मीठी गंध, भ्रम या अत्यधिक थकान इसके संकेत हैं. समय पर इलाज न मिले तो कोमा या मौत तक हो सकती है.

लंबे समय तक अनकंट्रोल शुगर किडनी फेल्योर, नसों को नुकसान, आंखों की रोशनी कम होना, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का कारण बन सकती है. कभी-कभी दवा “कभी-कभी” छोड़ना भी नुकसानदेह है, क्योंकि इससे शुगर में खतरनाक उतार-चढ़ाव होता है और डॉक्टर के लिए सही इलाज तय करना मुश्किल हो जाता है. अनरेगुलर से दवा का असर भी कम पड़ सकता है, जिससे आगे चलकर ज्यादा डोज़ की जरूरत पड़ सकती है.

तो क्या दवा कभी कम या बंद नहीं हो सकती? 

 healingpharma की रिपोर्ट बताते है कि  कुछ मामलों में, खासकर टाइप 2 डायबिटीज के शुरुआती चरण में, वजन घटाने, संतुलित भोजन और नियमित व्यायाम से दवा की जरूरत कम हो सकती है. लेकिन यह केवल डॉक्टर की निगरानी में, नियमित मॉनिटरिंग के साथ ही संभव है. अगर  HbA1c लंबे समय तक कंट्रोल में रहता है,तो डॉक्टर इसके बारे में सोचते हैं. इसलिए अगर आप दवा में बदलाव सोच रहे हैं, तो पहले डॉक्टर से बात करें, शुगर की नियमित रिकॉर्डिंग रखें, संतुलित भोजन लें, पर्याप्त पानी पिएं और दवा नियमित रूप से लेते रहें. हमेशा एक चीज याद रखें किडायबिटीज मैनेज की जा सकती है, लेकिन खुद से प्रयोग करना खतरनाक हो सकता है.

ये भी पढ़ें-Vitamin K Deficiency: मसूड़ों से खून आना और नीले निशान पड़ना है खतरे की घंटी, शरीर में हो गई है इस खास विटामिन की कमी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp