वजन कम करने के लिए सुबह-सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?

वजन कम करने के लिए सुबह-सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?


Does Drinking Hot Water Help With Weight Loss: आजकल सोशल मीडिया पर एक नया वेलनेस ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है. लोग दावा कर रहे हैं कि रोज सुबह सिर्फ एक कप गर्म पानी पीने से वजन कम होता है, स्किन साफ होती है और यहां तक कि पीरियड्स के दर्द व गले की खराश में भी राहत मिलती है. सुनने में यह तरीका काफी आसान और नेचुरल लगता है, इसलिए लोग इसे जल्दी अपनाने लगते हैं.

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सच में गर्म पानी पीने से इतने फायदे मिलते हैं, या फिर यह सिर्फ एक और वायरल ट्रेंड है? सच थोड़ा अलग है. गर्म पानी पीना सुरक्षित तो है और कई लोगों को इससे अच्छा महसूस भी होता है, लेकिन इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण साफ तौर पर साबित नहीं हुए हैं. 

क्या इससे होता है फायदा

दरअसल, इसके फायदे पानी के तापमान से ज्यादा उस आदत से जुड़े हो सकते हैं कि आप नियमित रूप से पानी पी रहे हैं. कई बार गर्माहट से मिलने वाला आराम और रिलैक्सेशन ही शरीर को बेहतर महसूस कराता है. यानी असली फायदा पानी पीने का है, न कि उसका गर्म होना. पानी हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है, चाहे वह ठंडा हो, सामान्य हो या गर्म. पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से पाचन, ब्लड सर्कुलेशन, किडनी फंक्शन और ब्लड प्रेशर जैसी कई जरूरी प्रक्रियाएं सही रहती हैं. हाल की एक स्टडी में यह भी सामने आया है कि कम पानी पीने से रोजमर्रा के तनाव को संभालना भी मुश्किल हो सकता है. 

क्या इससे वजन कम होता है

अब बात करते हैं सबसे आम दावे की कि क्या गर्म पानी वजन घटाने में मदद करता है? obesity जर्नल  में पब्लिस रिसर्च के अनुसार, अभी तक ऐसा कोई ठोस साइंटफिक प्रमाण नहीं है जो यह दिखाए कि सिर्फ गर्म पानी पीने से वजन कम होता है. हां, अगर आप मीठे या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीने लगते हैं, तो इससे वजन कंट्रोल में मदद मिल सकती है. कुछ रिसर्च में यह जरूर बताया गया है कि गर्म पानी आंतों की हलचल को थोड़ा बढ़ा सकता है, जिससे पाचन बेहतर होता है. लेकिन यह असर बहुत मामूली होता है और इसका सीधा संबंध फैट कम होने से नहीं है.

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गले की खराश में फायदेमंद

अब आते हैं गले की खराश पर. यहां गर्म पानी थोड़ा ज्यादा असरदार साबित होता है. गर्म तरल पदार्थ गले को आराम देते हैं, म्यूकस को ढीला करते हैं और सांस की नलियों में जलन को कम करते हैं. यही वजह है कि सर्दी-खांसी में गर्म चाय या काढ़ा पीने की सलाह दी जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अप्रैल में कभी धूप-कभी बारिश, बदलते मौसम में ऐसे रखें अपने बच्चों का ख्याल

अप्रैल में कभी धूप-कभी बारिश, बदलते मौसम में ऐसे रखें अपने बच्चों का ख्याल


Child Safety: अप्रैल का मौसम जितना हमारे लिए सुहाना और सुंदर होता है, बच्चों के लिए यह उतना ही खतरनाक साबित हो सकता है. बदलते मौसम में कभी खिली धूप और कभी झमाझम बारिश इसका सबसे बड़ा कारण है. इस तरह के मौसम में बच्चों का शरीर जल्दी एडजस्ट नहीं कर पाता, दिन में गर्मी और रात में ठंड जैसा माहौल बच्चों में सर्दी-जुकाम, गले में खराश और वायरल इंफेक्शन जैसी समस्या का खतरा बढ़ा देता है. हवा में नमी और धूल बढ़ने के कारण एलर्जी और स्किन प्रॉब्लम्स भी देखने को मिलते हैं. ऐसे में आइए जानें कैसे रखें इस बदलते मौसम में अपने बच्चे का ख्याल.

सही कपड़ों का चयन है जरूरी

इस मौसम में यही कोशिश रहनी चाहिए कि बच्चों को ना तो बहुत भारी या ना हल्के कपड़े पहनाएं. उन्हें हमेशा एक से अधिक कपड़े पहनाकर रखें ताकि जरूरत के हिसाब से कपड़ो को कम या ज्यादा किया जा सकें. बाहर जाते समय संग में शॉल या जैकेट रखना फायदेमंद हो सकता है, खासकर शाम में जब ठंड ज्यादा रहती है.

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खानपान का रखें खास ध्यान

बदलते मौसम में बच्चों का खान-पान भी बहुत मायने रखता है. उन्हें विटामिन से भरी ताजे फल-सब्जियां देना चाहिए, साथ ही उन्हें ठंडी चीजें जैसे आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक्स देने से बचें. यह भी सुनिश्चित करें कि वे पर्याप्त मात्रा में पानी पी रहे हैं या नहीं, ताकि शरीर हाइड्रेटेड रहे और इम्युनिटी मजबूत बनी रहे.

डॉक्टर की सलाह और सतर्कता

इस मौसम में इंफेक्शन का खतरा बहुत ज्यादा होता है, इसलिए बच्चों में साफ-सफाई की आदत डलवाना एक कारगर उपाय साबित हो सकता है, जैसे कि बाहर से आते ही हाथ-पैर धोना, टाइम से नहाना और साफ कपड़े पहनना. साथ ही जल्दी सोने की आदत डालवाने से उनकी नींद भी पूरी होती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. परहेजों के बावजूद अगर बच्चे को समस्या आ रही है तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से जाकर मिलें, ताकि समस्या बढ़ने से पहले उसका समाधान हो सके.

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क्या मोटापा ले सकता है जान? 160 किलो की महिला का सांस लेना हुआ मुश्किल, डॉक्टरों ने ऐसे बचाया

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Obesity Related Breathing Disorder: कभी- कभी कुछ मामले ऐसे आते हैं अस्पतालों में,  जिनमें अगर मरीज जिंदा बच जाए, तो वह किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता है. ऐसा ही कुछ गुरुग्राम के सीके बिड़ला अस्पताल में हुआ, जहां डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद मुश्किल और जोखिम भरे केस में 75 वर्षीय महिला की जान बचाकर उसे सुरक्षित डिस्चार्ज कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर मामला क्या है. 

किस बीमारी से जूझ रही थी महिला?

 160 किलो वजन की उस महिला कोओबेसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम नाम की गंभीर बीमारी थी, जिसमें शरीर पर्याप्त रूप से सांस नहीं ले पाता और खून में ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है. महिला को कई अन्य बीमारियां भी थीं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, एंग्जायटी और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने की वजह से बेडसोर की समस्या थी.  वह अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में गंभीर हालत में लाई गई थीं, जहां उन्हें दोनों फेफड़ों में निमोनिया और हार्ट की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा था. हालत इतनी नाजुक थी कि तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा. 

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धीरे- धीरे हुआ सुधार

ICU में पहले 24 घंटों के इलाज के दौरान उनकी स्थिति में कुछ सुधार दिखा. बुखार और इंफेक्शन कम होने लगे, छाती के एक्स-रे में भी सुधार नजर आया और दिल से जुड़े संकेतक भी बेहतर होने लगे.  इन पॉजिटिव संकेतों के आधार पर डॉक्टरों ने करीब 36 घंटे बाद वेंटिलेटर हटाने का फैसला लिया. लेकिन जैसे ही वेंटिलेटर हटाया गया, मरीज की हालत अचानक बिगड़ गई. उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरा और उन्हें फिर से तुरंत वेंटिलेटर पर रखना पड़ा.

डॉक्टरों ने क्या कहा?

इस पूरे मामले में अस्पताल में पल्मोनोलॉजी और क्रिटिकल केयर के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. कुलदीप कुमार ग्रोवर ने बताया कि यह समस्या मोटापे से जुड़ी सांस लेने की गंभीर बाधा की वजह से हुई. उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों में लंग्स की क्षमता कम हो जाती है और शरीर खुद से पर्याप्त सांस नहीं ले पाता. डॉ. ग्रोवर ने आगे बताया कि इस केस में मरीज के इंफेक्शन और दिल से जुड़े पैरामीटर तो सुधर रहे थे, लेकिन मोटापे के कारण उनकी सांस लेने की क्षमता बहुत कमजोर थी. यही वजह रही कि पहली बार वेंटिलेटर हटाने की कोशिश असफल रही.

ऐसे बची जान

इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने अपनी रणनीति बदली. मरीज को लंबे समय तक धीरे-धीरे खुद सांस लेने की ट्रेनिंग दी गई, प्रेशर सपोर्ट को धीरे-धीरे कम किया गया और ब्रोंकोस्कोपी की मदद से एयरवे को पूरी तरह तैयार किया गया. इस सावधानी और प्लानिंग के बाद दूसरी बार वेंटिलेटर हटाने की प्रक्रिया सफल रही. भारत में मोटापे के बढ़ते मामलों के साथ OHS जैसी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. कई स्टडीज के मुताबिक, स्लीप से जुड़ी सांस की समस्याओं वाले मरीजों में इसका प्रतिशत 5 से 16 फीसदी तक पाया गया है, लेकिन अक्सर यह बीमारी तब तक पहचान में नहीं आती जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए. डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते जांच, वजन नियंत्रित रखना और नियमित मेडिकल चेकअप ही ऐसी गंभीर स्थितियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या बिना शराब पिए डैमेज हो सकता है लिवर, जानें आपकी रोजाना की कौन-सी गलतियां पड़ रहीं भारी?

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Can Liver Cirrhosis Happen Without Alcohol: आजकल डॉक्टर एक ऐसे ट्रेंड को लेकर चिंता जता रहे हैं, जो चौंकाने वाला है. लीवर सिरोसिस, जिसे आमतौर पर शराब से जुड़ी बीमारी माना जाता था, अब उन लोगों में भी तेजी से सामने आ रहा है जो बहुत कम या बिल्कुल शराब नहीं पीते. इसकी असली वजह हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं, खराब खानपान, बढ़ता वजन, डायबिटीज और लंबे समय तक बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल.

साइलेंट किलर होता है यह

इस बीमारी को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि यह बिना किसी बड़े लक्षण के धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. जब तक इसके संकेत साफ दिखाई देते हैं, तब तक लीवर काफी हद तक डैमेज हो चुका होता है. डॉ. वसीम रमज़ान डार ने TOI को बताया कि पहले सिरोसिस को सिर्फ शराब से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब यह मोटापा, खराब डाइट, डायबिटीज और फैटी लीवर जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों से भी जुड़ा हुआ है.

कैसे होती है लिवर सिरोसिस की दिक्कत?

दरअसल, लीवर शरीर का एक बेहद अहम अंग है, जो खाने को पचाने, टॉक्सिन्स को फिल्टर करने और मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने का काम करता है. लेकिन जब इस पर बार-बार दबाव पड़ता है, चाहे वह फैट जमा होने से हो, इंफेक्शन से या किसी और कारण से, तो इसमें धीरे-धीरे स्कार टिश्यू बनने लगता है. यही स्थिति आगे चलकर सिरोसिस बन जाती है. शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे लगातार थकान रहना, भूख कम लगना, पेट में हल्की परेशानी या बिना वजह वजन कम होना. कई लोग इसे स्ट्रेस या नींद की कमी समझकर छोड़ देते हैं. लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, लक्षण भी गंभीर हो जाते हैं. पेट में सूजन, त्वचा या आंखों का पीला पड़ना, बार-बार इंफेक्शन होना और कमजोरी महसूस होना इसके संकेत हो सकते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. शंकर कुमार गुप्ता के मुताबिक, लीवर सिरोसिस सिर्फ एक अंग की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है. डाइजेशन, इम्युनिटी और ब्लड सर्कुलेशन सभी पर इसका असर पड़ता है. सबसे अहम बात यह है कि अगर समय रहते इसकी पहचान हो जाए, तो स्थिति को काफी हद तक संभाला जा सकता है. इसके लिए लीवर फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और फाइब्रोसिस जांच जैसे टेस्ट किए जाते हैं. शुरुआती स्टेज में लाइफस्टाइल में बदलाव करके डैमेज को धीमा या आंशिक रूप से ठीक भी किया जा सकता है.

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भारत में बढ़ रहे हैं मामले

भारत में नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लीवर डिजीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, शहरी इलाकों में हर तीन में से एक व्यक्ति इस समस्या से जूझ सकता है. यही वजह है कि इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. बचाव के लिए बहुत मुश्किल उपायों की जरूरत नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी आदतों को सुधारना ही काफी है. हेल्दी घर का खाना खाना, रोजाना थोड़ी एक्सरसाइज करना, वजन और डायबिटीज को कंट्रोल में रखना, बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयां न लेना और समय-समय पर जांच कराना, ये सभी कदम लीवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करते हैं.  डॉक्टरों का कहना है कि अगर बीमारी एडवांस स्टेज में पहुंच जाए, तो इलाज काफी मुश्किल और महंगा हो जाता है. कई मामलों में लीवर ट्रांसप्लांट ही आखिरी विकल्प बचता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या शादी करने से घट जाता है कैंसर होने का खतरा? कुंवारों को जरूर पढ़नी चाहिए यह रिसर्च

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यह अध्ययन कैंसर रिसर्च कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित हुआ. इसमें पाया गया कि जो लोग कभी शादी नहीं करते, उनके कैंसर होने का जोखिम ज्यादा होता है. पुरुषों में शादी न करने वालों में कैंसर का खतरा 68 प्रतिशत ज्यादा था, और महिलाओं में यह खतरा 83 प्रतिशत ज्यादा था. अध्ययन में यह भी देखा गया कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शादी से जुड़े स्वास्थ्य लाभ भी बढ़ते हैं.

शादीशुदा लोगों को भावनात्मक और सामाजिक समर्थन मिलता है. वे अक्सर समय पर डॉक्टर के पास जाते हैं, जिससे बीमारियों का जल्दी पता चलता है.  शादीशुदा लोग आम तौर पर स्वस्थ लाइफस्टाइल अपनाते हैं, जैसे धूम्रपान या शराब का कम सेवन करना, जोखिम भरे व्यवहार कम करने से कई प्रकार के कैंसर जैसे लंग कैंसर या सर्वाइकल कैंसर का खतरा भी घटता है.

शादीशुदा लोगों को भावनात्मक और सामाजिक समर्थन मिलता है. वे अक्सर समय पर डॉक्टर के पास जाते हैं, जिससे बीमारियों का जल्दी पता चलता है. शादीशुदा लोग आम तौर पर स्वस्थ लाइफस्टाइल अपनाते हैं, जैसे धूम्रपान या शराब का कम सेवन करना, जोखिम भरे व्यवहार कम करने से कई प्रकार के कैंसर जैसे लंग कैंसर या सर्वाइकल कैंसर का खतरा भी घटता है.

Published at : 10 Apr 2026 10:03 AM (IST)

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कब जानलेवा हो जाती है ‘लव बाइट’, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी?

कब जानलेवा हो जाती है ‘लव बाइट’, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी?


खून का थक्का (Blood Clot): गर्दन की नसें बहुत sensitive होती हैं, जब पार्टनर बहुत जोर से ‘सक’ (Suck) करता है, तो त्वचा के नीचे की नसों में खून का थक्का जम सकता है, अगर यह थक्का खून के बहाव के साथ दिमाग तक पहुंच जाए, तो यह बल्ड फ्लो को रोक सकता है, जो जानलेवा साबित होता है.

इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic Stroke) का खतरा:  ऐसे कई मामले देखें जा चुके हैं जहां लव बाइट के कारण व्यक्ति को स्ट्रोक आया. दरअसल, गर्दन की 'कैरोटिड आर्टरी' पर ज्यादा दबाव पड़ने से वह ब्लॉक हो सकती है, जिससे दिमाग को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है और व्यक्ति को अचानक स्ट्रोक आ सकता है.

इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic Stroke) का खतरा: ऐसे कई मामले देखें जा चुके हैं जहां लव बाइट के कारण व्यक्ति को स्ट्रोक आया. दरअसल, गर्दन की ‘कैरोटिड आर्टरी’ पर ज्यादा दबाव पड़ने से वह ब्लॉक हो सकती है, जिससे दिमाग को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है और व्यक्ति को अचानक स्ट्रोक आ सकता है.

Published at : 10 Apr 2026 09:21 AM (IST)

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