देश में हेपेटाइटिस के साथ जी रहे करोड़ों, बिन लक्षण कैसे छलनी कर रहा लिवर?

देश में हेपेटाइटिस के साथ जी रहे करोड़ों, बिन लक्षण कैसे छलनी कर रहा लिवर?


How Common Is Hepatitis In India: भारत में लाखों लोग हेपेटाइटिस बी या सी के साथ जी रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका अंदाजा तक नहीं है. वे रोज काम पर जाते हैं, सामान्य जीवन जीते हैं, फिर भी एक वायरस चुपचाप उनके लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है. जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक अक्सर स्थिति गंभीर हो चुकी होती है, जैसे लिवर सिरोसिस, लिवर फेल्योर या यहां तक कि लिवर कैंसर तक का खतरा बढ़ जाता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

मेदांता अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के डॉ. सौरदीप चौधरी ने TOI को बताया कि, भारत में हेपेटाइटिस वायरस का बोझ काफी ज्यादा है. अनुमान है कि देश की लगभग 3-4 प्रतिशत आबादी हेपेटाइटिस बी से संक्रमित है, जबकि 0.5- 1 प्रतिशत लोगों में हेपेटाइटिस सी पाया जाता है. यानी करीब एक करोड़ से अधिक लोग क्रॉनिक इंफेक्शन के साथ जी रहे हैं. समस्या यह है कि दोनों वायरस वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकते हैं, इसलिए अधिकांश लोग तब तक जांच नहीं कराते जब तक लिवर को गंभीर नुकसान न हो जाए.

बड़ी संख्या में आते हैं मरीज

भारत में हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई, इन पांचों प्रकार के वायरस बड़ी संख्या में मामले दर्ज करते हैं. हेपेटाइटिस ए आमतौर पर खराब स्वच्छता वाले इलाकों में 10- 30 प्रतिशत तीव्र मामलों के लिए जिम्मेदार है, जबकि हेपेटाइटिस ई 10-40 प्रतिशत तीव्र हेपेटाइटिस और 15-45 प्रतिशत तीव्र लिवर फेल्योर से जुड़ा पाया गया है, खासकर गर्भवती महिलाओं में.  जागरूकता की कमी भी बड़ी समस्या है। कई लोग मानते हैं कि लिवर की बीमारी सिर्फ शराब पीने वालों को होती है, जबकि यह पूरी तरह सही नहीं है.  कुछ लोगों को यह भी भ्रम है कि हेपेटाइटिस सामान्य संपर्क से साथ खाना खाने, गले मिलने या खांसने से फैलता है, जो कि गलत धारणा है.

कैसे फैल सकता है?

हेपेटाइटिस बी और सी का संक्रमण अक्सर असुरक्षित इंजेक्शन, बिना जांचे गए रक्त चढ़ाने, असुरक्षित सर्जरी या डेंटल प्रक्रिया, इंफेक्टेड सुई से टैटू या पियर्सिंग और प्रसव के दौरान मां से बच्चे में फैल सकता है. अगर हेपेटाइटिस बी या सी का इलाज न कराया जाए तो यह धीरे-धीरे लिवर में फाइब्रोसिस और सिरोसिस का कारण बन सकता है, जो आगे चलकर लिवर कैंसर में बदल सकता है. अच्छी बात यह है कि हेपेटाइटिस सी का इलाज अब संभव है और 8 से 12 हफ्तों की दवा से इसे ठीक किया जा सकता है. हालांकि, हेपेटाइटिस बी के अधिकांश मामलों में लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! 30 की उम्र पार करते ही ‘बूढ़ा’ होने लगा आपका दिल, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलतियां?

सावधान! 30 की उम्र पार करते ही ‘बूढ़ा’ होने लगा आपका दिल, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलतियां?


How To Keep Your Heart Healthy After 30: 30 की उम्र पार करना अक्सर एक सामान्य पड़ाव लगता है, लेकिन इसी समय शरीर के अंदर, खासकर दिल में, कई छोटे बदलाव शुरू हो जाते हैं. ये बदलाव तुरंत महसूस नहीं होते, लेकिन आगे चलकर दिल की सेहत पर गहरा असर डाल सकते हैं. अगर इन्हें समय रहते समझ लिया जाए, तो भविष्य में हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिपिन कुमार दुबे ने TOI को बताया कि 30 के बाद जिंदगी की रफ्तार तेज हो जाती है, काम का दबाव बढ़ता है, जिम्मेदारियां बढ़ती हैं और लाइफस्टाइल बदलने लगती है. ऐसे में शरीर के अंदर धीरे-धीरे बदलाव शुरू होते हैं, जिनका असर दिल पर भी पड़ता है, भले ही बाहर से सब सामान्य लगे. डॉक्टर अक्सर “हार्ट एज” का जिक्र करते हैं, जो बताता है कि आपका दिल आपकी असली उम्र से कितना ज्यादा बूढ़ा हो चुका है. कई लोगों में यह उम्र 5-8 साल तक ज्यादा हो सकती है, खासकर अगर ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा या स्मोकिंग जैसे रिस्क फैक्टर मौजूद हों. इसका मतलब है कि दिल सिर्फ उम्र से नहीं, बल्कि आपकी लाइफस्टाइल से भी तेजी से प्रभावित होता है.

30 के बाद क्या होने लगती है दिक्कत?

30 के बाद मेटाबॉलिज्म धीरे-धीरे कम होने लगता है और खराब आदतों का असर ज्यादा दिखने लगता है. नींद की कमी, तनाव, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और अनहेल्दी खानपान ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और वजन को प्रभावित करने लगते हैं. ये सभी फैक्टर मिलकर दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं. इस उम्र के बाद दिल में कुछ स्ट्रक्चरल बदलाव भी होने लगते हैं. दिल की मांसपेशियां थोड़ी सख्त हो सकती हैं, जिससे उसकी काम करने की क्षमता कम होती है. इसके साथ ही शरीर में हल्की-फुल्की सूजन  बढ़ने लगती है, जो धीरे-धीरे आर्टरीज में बदलाव ला सकती है. यही बदलाव आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर और ब्लॉकेज जैसी समस्याओं की वजह बन सकते हैं.

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क्या होते हैं इसके लक्षण?

सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये बदलाव अक्सर बिना किसी लक्षण के होते हैं. हाई ब्लड प्रेशर, खराब कोलेस्ट्रॉल या प्री-डायबिटीज जैसी स्थितियां लंबे समय तक चुपचाप शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती हैं और जब तक पता चलता है, तब तक समस्या गंभीर हो चुकी होती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि 30 की उम्र दिल को स्वस्थ रखने के लिए सबसे सही समय भी होती है. रोजाना कम से कम 30 मिनट की वॉक, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव को कंट्रोस करना दिल की सेहत को बेहतर बनाए रख सकता है. इसके साथ ही कुछ जरूरी जांचों पर ध्यान देना भी जरूरी है, जैसे नियमित ब्लड प्रेशर चेक कराना, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर की जांच कराना. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पैरों में हर वक्त महसूस होती है जलन और झुनझुनी, जानें किस बीमारी का है ये संकेत

पैरों में हर वक्त महसूस होती है जलन और झुनझुनी, जानें किस बीमारी का है ये संकेत


पैरों में लगातार जलन या झुनझुनी होना एक आम समस्या लगती है, लेकिन यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी तो हो सकता है. अक्सर लोग इसे थकान या कमजोरी से होने वाली समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. हालांकि, यह शरीर के अंदर हो रही किसी गंभीर समस्या का इशारा भी हो सकता है. इसलिए जब भी आपकी ऐसी समस्या ज्यादा हो तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.

पैरों में जलन और झुनझुनी का कारण

  • इस समस्या का सबसे आम कारण Peripheral Neuropathy हो सकता है. यह एक नसों से संबंधित समस्या है, इसमें पैरों में जलन, सुन्न होना और झुनझुनाहट महसूस होती है. यह ज्यादातर शुगर (डायबिटीज) के मरीजों में होती है, क्योंकि अधिक समय तक शुगर लेवल बढ़ा रहने से नसों को नुकसान होता है और इस प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैं
  • इसके अलावा एक अन्य समस्या Sciatica हो सकती है, जो रीढ़ की हड्डी से निकलने वाली सबसे लंबी नर्व (साइटिक नर्व) पर दबाव के कारण होता है. नस दब जाती है, जिससे दर्द, जलन और झुनझुनी पैरों तक पहुंच जाती है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पोश्चर या भारी वजन उठाना इस समस्या को और अधिक बढ़ा सकता है.
  • Restless Legs Syndrome भी इस समस्या का कारण हो सकता है, ऐसे में लेटते या आराम करते वक्त पैरों में अजीब सी जलन और झुनझुनी महसूस होती है, बार-बार पैर हिलाने का मन करता है और अलग सी ही बेचैनी होने लगती है. यह समस्या ज्यादातर रात के समय होती है, जिससे सोने में भी काफी समस्या आती है
  • इस प्रकार की समस्या का एक कारण विटामिन्स की कमी भी हो सकती है, खासकर विटामिन B12 की कमी, जो नसों को नुकसान पहुंचाती है और जिसके कारण हाथों और पैरों में काफी अधिक जलन और झुनझुनी महसूस होने लगती है. यह समस्या गलत खानपान की आदत, कम पोषण वाला भोजन और जंक फूड का अधिक सेवन करने से हो सकती है, इसलिए संतुलित और पोषण वाला आहार लेना चाहिए.

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हो सकती है किडनी से जुडी बीमारी 

अगर आपको किडनी और थायरॉयड से जुड़ी समस्या है तो ऐसे में भी आपको ये लक्षण देखने को मिल सकते हैं. शरीर के टॉक्सिन्स नसों पर काफी गहरा असर डालते हैं. इस समस्या से बचाव के लिए सबसे पहले अपनी जीवनशैली में सुधार लाना जरूरी है, इसलिए नियमित व्यायाम करें, संतुलित आहार लें और जरूरत के अनुसार पानी पिएं. विटामिन और मिनरल्स से भरपूर डाइट अपनाएं. लंबे समय तक एक ही जगह बैठने से बचें और समय-समय पर स्ट्रेचिंग भी करते रहें. अगर झुनझुनी लगातार बनी रहे, दर्द असहनीय हो जाए तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें. सही समय पर जांच और इलाज से समस्या को बढ़ने से पहले ही रोका जा सकता है. कुल मिलाकर, पैरों में जलन और झुनझुनी को नजरअंदाज करना सही नहीं है, क्योंकि यह शरीर का एक चेतावनी हो सकती है.

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क्या शुगर के मरीज पी सकते हैं गन्ने का जूस, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

क्या शुगर के मरीज पी सकते हैं गन्ने का जूस, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?


आजकल की लाइफस्टाइल में डायबिटीज एक आम बीमारी बन गई है. यह बीमारी ऐसी है, जिसमें खाने-पीने को लेकर बहुत सी सावधानियां रखनी पड़ती हैं.  गर्मियां चल रही हैं और ऐसे में ठंडा-ठंडा गन्ने का जूस पर किसका दिल नहीं आता. यह न सिर्फ दिमाग और पेट को राहत देता है, बल्कि हाइड्रेट रखने का काम भी करता है. 

हालांकि, शुगर के मरीजों के मन में अक्सर यह सवाल आता है कि क्या वे इसे पी सकते हैं या नहीं? कहा जाता है कि गन्ने का जूस ज्यादा मीठा होता है और शुगर रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है, ऐसे में आइए समझते है की इस पर एक्सपर्ट्स की क्या राय है. 

एक्सपर्ट की क्या राय है?

एक्सपर्ट्स की बात मानें तो कुछ डायबिटीज पेशेंट के लिए गन्ने के रस का सेवन करना संभव हो सकता है, लेकिन उन्हें नियंत्रित मात्रा में ही इसका सेवन करना चाहिए. एक्सपर्ट कहते हैं कि शुगर के मरीजों के लिए अच्छा यह है कि वह गन्ने के रस की जगह गन्ना खा सकते हैं, क्योंकि इसमें ज्यादा फाइबर और प्रोटीन पाया जाता है, जो आपके ब्लड शुगर लेवल को बढ़ने नहीं देता. 

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गन्ने के रस में कितनी शुगर होती है

फार्माकोग्नॉसी रिव्यूज में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक, गन्ने के रस में 70-75% पानी, 13-15% सुक्रोज और 10-15% फाइबर होता है. इसके अलावा भारत में पीलिया, रक्तस्राव, पेशाब में जलन, पेशाब में जलन और टॉयलेट संबंधी बीमारी के इलाज में गन्ने का रस बेहद कारगर है. वैसे तो गन्ने का जूस प्राकृतिक होता है, लेकिन इसमें शुगर की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो शरीर में जल्दी घुलता है और ब्लड में शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकता है. आपको बता दें कि एक छोटा गिलास गन्ने के रस यानी 240 एमएल गन्ने के रस में करीब 50 ग्राम चीनी होती है यानी 10 चम्मच चीनी. 

कुछ  बातों का रखें ध्यान

चाहे डाइबीटीज पेशेंट हो या आम आदमी सबको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कभी भी खाली पेट गन्ने का जूस बिल्कुल न पिएं. ध्यान रखें कि एक बार में ज्यादा मात्रा में गन्ने का जूस ना लें, इससे शरीर में सुगर लेवल तेजी से बढ़ता है. साथ ही डाइबीटीज पेशेंट को डॉक्टर की सलाह के बिना इसे डाइट में शामिल नहीं करना चाहिए. शुगर के मरीजों के लिए गन्ने के जूस के अलावा कुछ हेल्दी ऑप्शनस भी हैं जैसे नारियल पानी, बिना चीनी के नींबू पानी, छाछ और ग्रीन टी.

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घुटना मोड़ने पर आ रही कट-कट की आवाज, क्या आ गया रिप्लेसमेंट का टाइम?

घुटना मोड़ने पर आ रही कट-कट की आवाज, क्या आ गया रिप्लेसमेंट का टाइम?


Why Does My Knee Make Clicking Sounds When Bending: घुटना मोड़ते समय अगर कट-कट या चटकने की आवाज आने लगे, तो अक्सर लोग घबरा जाते हैं और सोचते हैं कि कहीं अब घुटना बदलवाने यानी रिप्लेसमेंट का समय तो नहीं आ गया. लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हर बार ऐसी आवाज किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती. चलिए आपको बताते हैं कि कब यह गंभीर बीमारी का संकेत होता है और कब आपको घबराने की जरूरत नहीं होती है. 

क्यों आती है आवाज?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर इस तरह की आवाज को “क्रेपिटस” कहते हैं.  यह आवाज तब सुनाई देती है जब आप घुटना मोड़ते, सीधा करते या सीढ़ियां चढ़ते-उतरते हैं.  इसमें पॉपिंग, क्लिकिंग, ग्राइंडिंग या खड़कने जैसी आवाज शामिल हो सकती है. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में यह स्थिति सामान्य होती है और किसी बड़े खतरे का संकेत नहीं होती. कई लोगों को बिना किसी दर्द के भी ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं. रिसर्च में भी पाया गया है कि केवल आवाज आने से मूवमेंट या लाइफस्टाइल पर ज्यादा असर नहीं पड़ता.

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कब होती है दिक्कत?

हालांकि, कुछ मामलों में यह ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्या से जुड़ा हो सकता है. अगर आवाज के साथ सूजन, दर्द, जकड़न, घुटने को मोड़ने-सीधा करने में दिक्कत, मांसपेशियों की कमजोरी या घुटने का अस्थिर होना जैसे लक्षण भी दिखें, तो यह संकेत हो सकता है कि अंदरूनी समस्या है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि सिर्फ आवाज आने पर आमतौर पर इलाज की जरूरत नहीं होती. लेकिन अगर इसके साथ दर्द भी हो, तो डॉक्टर जांच करके सही कारण पता लगाते हैं और उसी के अनुसार इलाज तय किया जाता है. अगर ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्या सामने आती है, तो इसके लिए कई तरह के इलाज उपलब्ध हैं. इसमें वजन कंट्रोल करना, नियमित एक्सरसाइज करना, दर्द कम करने वाली दवाओं का इस्तेमाल, फिजियोथेरेपी और जरूरत पड़ने पर इंजेक्शन जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं.

क्या बदलवाने की जरूरत होती है?

सबसे अहम सवाल यही होता है कि क्या ऐसी आवाज आने का मतलब घुटना बदलवाने की जरूरत है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, सिर्फ आवाज के आधार पर ऐसा फैसला नहीं लिया जाता. घुटना रिप्लेसमेंट तब ही जरूरी होता है जब दर्द बहुत ज्यादा हो, चलना-फिरना मुश्किल हो जाए और बाकी इलाज असर न कर रहे हों. इसलिए अगर घुटना मोड़ने पर आवाज आ रही है, लेकिन दर्द नहीं है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. वहीं, अगर इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है, ताकि समय रहते सही इलाज किया जा सके.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपकी हथेलियां भी रहती हैं लाल? डॉक्टर ने दी चेतावनी, लिवर की बीमारी का हो सकता है संकेत

क्या आपकी हथेलियां भी रहती हैं लाल? डॉक्टर ने दी चेतावनी, लिवर की बीमारी का हो सकता है संकेत


How Hands Reveal Liver Damage: लिवर हमारे शरीर में हर दिन चुपचाप सैकड़ों अहम काम करता है. खून को साफ करना, पाचन में मदद करना और हार्मोन को संतुलित रखना, ये सब जिम्मेदारियां इसी अंग पर होती हैं. लेकिन जब लिवर की सेहत बिगड़ने लगती है, तो वह हमेशा तेज लक्षणों के जरिए चेतावनी नहीं देता. कई बार इसके शुरुआती संकेत बहुत साधारण होते हैं और अक्सर लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. हैरानी की बात यह है कि लिवर से जुड़ी कुछ अहम जानकारियां आपके हाथों में भी छिपी हो सकती हैं.

हथेलियों का लाल होना, त्वचा में खुजली, नाखूनों का पीला या कमजोर होना, या उंगलियों में हल्का कंपन, ये सभी फैटी लिवर, हेपेटाइटिस या सिरोसिस जैसी बीमारियों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. अगर इन बदलावों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो गंभीर मुश्किलों से बचाव संभव है.

हाथ कैसे बताते हैं लिवर की सेहत का हाल?

डॉक्टरों के अनुसार, हाथ हमारे अंदरूनी स्वास्थ्य का आईना होते हैं. हथेलियों का रंग, नाखूनों की बनावट और उंगलियों की मूवमेंट से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि लिवर सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं. Journal of Clinical and Experimental Hepatology में पब्लिश स्टडी के मुताबिक, लाल हथेलियां और नाखूनों में बदलाव, क्रॉनिक लिवर डिजीज की प्रगति से जुड़े हो सकते हैं.  इसके लक्षण कुछ इस तरह होते हैं- 

उंगलियों का मुड़ना या अकड़ना 

अगर आपकी उंगलियां धीरे-धीरे अंदर की ओर मुड़ने लगें या हथेली में खिंचाव महसूस हो, तो यह ड्यूप्यूट्रेन कॉन्ट्रैक्चर हो सकता है. यह समस्या तब होती है, जब हथेली के नीचे की त्वचा मोटी और सख्त होने लगती है. यह सिरोसिस जैसी क्रॉनिक लिवर बीमारियों और ज्यादा शराब पीने वालों में ज्यादा देखी जाती है.

सफेद नाखून और ऊपर गुलाबी लाइन

अगर नाखून ज्यादातर सफेद दिखें और उनके सिरे पर हल्की गुलाबी या लाल पट्टी नजर आए, तो यह टेरीज नेल्स हो सकते हैं. यह बदलाव लिवर सिरोसिस में खून के प्रवाह और प्रोटीन लेवल में गड़बड़ी के कारण होता है.

नाखूनों का उभरा और गोल होना

नाखूनों और उंगलियों का गोल और फूला हुआ दिखना आमतौर पर फेफड़ों या दिल की बीमारी से जुड़ा माना जाता है, लेकिन यह लंबे समय से चली आ रही लिवर बीमारी में भी देखा जा सकता है. लगातार ऐसा दिखे तो मेडिकल जांच जरूरी है.

हाथों में फड़फड़ाहट या कंपन

अगर हाथ फैलाने पर उनमें अनियंत्रित झटके या फड़फड़ाहट हो, तो इसे एस्टेरिक्सिस कहा जाता है. यह एडवांस लिवर डिजीज की गंभीर स्थिति हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी का संकेत हो सकता है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है.

हथेलियों और तलवों में लगातार खुजली

बिना किसी रैश के हथेलियों और पैरों के तलवों में तेज खुजली होना बाइल के जमाव का संकेत हो सकता है. यह समस्या रात में या गर्म पानी से नहाने के बाद ज्यादा बढ़ सकती है.

कब डॉक्टर से मिलना जरूरी?

अगर हाथों में ऐसे बदलाव दिखें जैसे लाल हथेलियां, नाखूनों का अजीब रंग, कंपन या लगातार खुजली, तो इन्हें नजरअंदाज न करें. समय पर जांच से लिवर को होने वाले गंभीर नुकसान को रोका जा सकता है.

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