धमनियों में जमा प्लाक बढ़ा सकता है मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानें हार्ट ब्लॉकेज की वॉर्निंग

धमनियों में जमा प्लाक बढ़ा सकता है मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानें हार्ट ब्लॉकेज की वॉर्निंग


Early Symptoms Of Heart Artery Blockage: हार्ट ब्लॉकेज यानी कोरोनरी आर्टरी डिजीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिल तक खून पहुंचाने वाली आर्टरीज संकरी या ब्लॉक होने लगती हैं. ऐसा आमतौर पर आर्टरीज में प्लाक जमा होने की वजह से होता है, जिससे हार्ट तक ऑक्सीजन युक्त ब्लड फ्लो कम हो जाता है. यह स्थिति आगे चलकर हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ा सकती है. अक्सर लोग दिल की बीमारी को अचानक होने वाले तेज सीने के दर्द से जोड़कर देखते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसके कई शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं और लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

कार्डियक साइंसेज के एक्सपर्ट डॉक्टर प्रवीण रमण मिश्रा ने  TOI को बताया कि हार्ट की धमनियों में ब्लॉकेज होने पर सबसे सामान्य लक्षण सीने में दर्द या दबाव हो सकता है. कई लोग इसे सीने में भारीपन, जकड़न या जलन जैसा महसूस करते हैं. हालांकि यह दर्द हमेशा तेज नहीं होता, बल्कि कई बार आता-जाता रहता है, खासकर जब व्यक्ति फिजिकल एक्टिविटी करता है या तनाव में होता है. इसके अलावा सांस फूलना भी एक अहम संकेत हो सकता है. कुछ लोगों को सीढ़ियां चढ़ते समय, थोड़ी दूरी चलने पर या सामान्य काम करते हुए भी सांस लेने में कठिनाई महसूस होने लगती है.

क्या होते हैं लक्षण?

डॉक्टर बताते हैं कि हार्ट ब्लॉकेज होने पर असामान्य थकान भी महसूस हो सकती है. जब हार्ट तक पर्याप्त ऑक्सीजन वाला खून नहीं पहुंचता, तो शरीर में लगातार कमजोरी और थकान महसूस होती है. कई मामलों में दर्द सिर्फ सीने तक सीमित नहीं रहता बल्कि हाथों, गर्दन, जबड़े या पीठ तक फैल सकता है. लोग अक्सर इसे मसल्स के दर्द या गैस-एसिडिटी समझ लेते हैं. इसके अलावा चक्कर आना, मतली महसूस होना या बिना किसी खास वजह के ज्यादा पसीना आना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं, खासकर जब ये लक्षण फिजिकल एक्टिविटी के दौरान दिखाई दें.

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कैसे कर सकते हैं कंट्रोल?

एक्सपर्ट के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान, हाई कोलेस्ट्रॉल और किसी तरह की शारीरिक एक्टिविटी का न होना हार्ट की आर्टरीज में ब्लॉकेज का खतरा बढ़ा सकती है. इसलिए दिल की सेहत बनाए रखने के लिए रेगुलर व्यायाम, संतुलित आहार और समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना बेहद जरूरी है. अगर इसके लक्षण बार-बार दिखाई दें या बढ़ने लगें, तो तुरंत कार्डियोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर माना जाता है, ताकि समय रहते गंभीर दिक्कतों से बचा जा सके. अगर आप इन लक्षणों कोे इग्नोर करेंगे, तो हो सकता है कि आगे चलकर आपको दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पैरों में क्यों जमा हो जाते हैं खून के थक्के? वैज्ञानिकों ने बता दी डराने वाली वजह

पैरों में क्यों जमा हो जाते हैं खून के थक्के? वैज्ञानिकों ने बता दी डराने वाली वजह


Why Do Blood Clots Form In Legs: पैरों में अचानक दर्द, सूजन या भारीपन महसूस होना कई बार साधारण समस्या लग सकता है, लेकिन इसके पीछे खून के थक्के बनने जैसी गंभीर वजह भी हो सकती है. मेडिकल भाषा में इसे वेनस थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है, जिसमें खून गाढ़ा होकर नसों में जमने लगता है और ब्लॉकेज पैदा कर देता है. अगर यही थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा स्थिति यानी पल्मोनरी एम्बोलिज्म का कारण बन सकता है.

क्या निकली है दिक्कत?

हाल ही में लुंड विश्वविद्यालय के साइंटिस्ट की एक रिसर्च में इस समस्या को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है. इस स्टडी में पाया गया कि सिर्फ लाइफस्टाइल ही नहीं, बल्कि कुछ खास जीन भी खून के थक्के बनने के खतरे को काफी बढ़ा सकते हैं. यह रिसर्च “माल्मो डाइट एंड कैंसर स्टडी” के तहत करीब 30 हजार लोगों के डेटा पर की गई. इसमें वैज्ञानिकों ने 27 ऐसे जीन का अध्ययन किया, जो ब्लड क्लॉटिंग से जुड़े होते हैं.  एनालिसिस के बाद तीन प्रमुख जीन ABO, F8 और VWF की पहचान की गई, जो इस खतरे को बढ़ाते हैं.

रिसर्च के अनुसार, इनमें से हर एक जीन अकेले 10 से 30 प्रतिशत तक जोखिम बढ़ा सकता है. लेकिन अगर किसी व्यक्ति में ऐसे कई जेनेटिक फैक्टर एक साथ मौजूद हों, तो खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है. जिन लोगों में पांच तक ऐसे जोखिम कारक पाए गए, उनमें ब्लड क्लॉट बनने का खतरा 180 प्रतिशत तक ज्यादा देखा गया. यह खोज इस बात को समझने में मदद करती है कि कुछ लोग बिना किसी स्पष्ट वजह के भी इस समस्या का शिकार क्यों हो जाते हैं. साइंटिस्ट ने यह भी बताया कि “फैक्टर V लीडेन” नाम का एक जेनेटिक म्यूटेशन पहले से जाना जाता है, जो खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति को बढ़ाता है.

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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका

हालांकि, सिर्फ जीन ही नहीं, लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना, जैसे लंबी फ्लाइट या सर्जरी के बाद बेड रेस्ट, ब्लड फ्लो को धीमा कर देता है और थक्के बनने का खतरा बढ़ा देता है. इसके अलावा मोटापा, बढ़ती उम्र और ज्यादा लंबाई भी इस जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने गए हैं. खानपान भी इसमें भूमिका निभा सकता है. कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाने से खतरा बढ़ सकता है, जबकि फलों, सब्जियों और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर डाइट जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है.

इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है

एक्सपर्ट का मानना है कि भविष्य में इस तरह की जेनेटिक जानकारी के आधार पर इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है. इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस मरीज को कितने समय तक ब्लड थिनर दवाओं की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दुनिया की हर 10 में से एक मां की मौत भारत में! लैंसेट की रिपोर्ट ने उड़ाई नींद, जानें मामला

दुनिया की हर 10 में से एक मां की मौत भारत में! लैंसेट की रिपोर्ट ने उड़ाई नींद, जानें मामला


India Accounts For Maternal Deaths Globally: दुनियाभर में हर साल लाखों महिलाएं गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी वजहों से जान गंवा रही हैं, और इन आंकड़ों में भारत की हिस्सेदारी अब भी बड़ी बनी हुई है. हाल ही में द लैंसेट ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनेकोलॉजी, और महिला स्वास्थ्य में प्रकाशित एक स्टडी  ने इस चिंता को फिर सामने ला दिया है. चलिए आपको बताते हैं कि इस रिपोर्ट में क्या निकला है और भारत के लिए चिंता क्यों जाहिर की गई है. 

क्या निकला रिपोर्ट में?

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 में दुनिया भर में करीब 2.4 लाख महिलाओं की मौत गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी दिक्कतों के कारण हुई. इनमें से लगभग 24,700 मौतें भारत में दर्ज की गईं. यानी वैश्विक स्तर पर हर 10 मातृ मौतों में से लगभग एक भारत से जुड़ी है, जो स्थिति की गंभीरता को दिखाती है. हालांकि, तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है. बीते तीन दशकों में भारत ने इस दिशा में बड़ी प्रगति की है. 1990 में जहां मातृ मृत्यु का आंकड़ा करीब 1.19 लाख था, वह 2015 तक घटकर 36,900 और 2023 में 24,700 तक पहुंच गया. इसी तरह, मातृ मृत्यु दर  1990 में 508 से घटकर 2023 में 116 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गई है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सुधार अभी अधूरा है. डॉ. आभा मजूमदार ने TOI को बताया कि देश में मातृ मृत्यु दर में गिरावट जरूर आई है, लेकिन यह सभी राज्यों में समान नहीं है. केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य वर्ल्ड मानकों के करीब पहुंच चुके हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अब भी हालात चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं. स्टडी में यह भी सामने आया कि मातृ मृत्यु के प्रमुख कारण अब भी वही हैं, जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है. इनमें प्रसव के दौरान अत्यधिक ब्लड फ्लो, हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी दिक्कतों, और इंफेक्शन पहले से मौजूद बीमारियों के कारण होने वाली दिक्कतें शामिल हैं.

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कोविड का भी रोल

इसके अलावा, समय पर इलाज न मिल पाना, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में अंतर और ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों के बीच असमानता भी बड़ी वजह बन रही है. यही कारण है कि सुधार की रफ्तार 2015 के बाद धीमी पड़ गई है, जबकि इससे पहले 2000 से 2015 के बीच तेज गिरावट दर्ज की गई थी. वर्ल्ड लेवल पर भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है. 2023 में दुनिया का औसत मातृ मृत्यु दर 190 प्रति एक लाख जीवित जन्म रहा, जो संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स के 70 के लक्ष्य से काफी ज्यादा है. एक्सपर्ट का कहना है कि कोविड-19 महामारी ने भी इस समस्या को बढ़ाया, क्योंकि उस दौरान मातृ स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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खतरनाक अजगर कम करेगा आपका वजन? वैज्ञानिकों ने खून में खोजा ‘जादुई तत्व’, जो मिटा देगा आपकी भूख!

खतरनाक अजगर कम करेगा आपका वजन? वैज्ञानिकों ने खून में खोजा ‘जादुई तत्व’, जो मिटा देगा आपकी भूख!


Can Python Blood Help In Weight Loss: मोटापे को कम करने के लिए अब एक नया और दिलचस्प रास्ता सामने आया है. साइंटिस्ट ने बर्मीज अजगर के खून में एक ऐसे खास तत्व की पहचान की है, जो भविष्य में वजन घटाने की दवाओं के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है. इस खोज ने मोटापे से जूझ रही दुनिया के लिए नई उम्मीद जगाई है, क्योंकि यह भूख को कंट्रोल करने का एक अलग तरीका दिखाती है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे अजगर आपका वजन कम करने वाला है. 

अजगर को क्यों चुना गया?

नेचर मेटाबॉलिज्म में पब्लिश स्टडी में बताया गया कि अजगर अपने खाने के अनोखे तरीके के लिए जाने जाते हैं. ये अपने शरीर के बराबर बड़े शिकार को खा सकते हैं और फिर महीनों तक बिना खाए रह सकते हैं. साइंटिस्ट ने पाया कि जब अजगर खाना खाते हैं, तो उनके खून में कुछ खास तत्व अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं, जो उनके मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने में मदद करते हैं. इस स्टडी को स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक जोनाथन लॉन्ग की टीम ने किया. उन्होंने छोटे अजगरों के खून के सैंपल खाने से पहले और बाद में जांचे. इसमें 200 से ज्यादा ऐसे तत्व मिले, जिनका स्तर खाने के बाद काफी बढ़ गया. इनमें से एक खास तत्व pTOS था, जो 1000 गुना से भी ज्यादा बढ़ गया. 

क्या होता है यह?

यह खास तत्व आंत में मौजूद बैक्टीरिया द्वारा बनता है और दिलचस्प बात यह है कि यह इंसानों में भी बहुत कम मात्रा में पाया जाता है. इसके असर को समझने के लिए साइंटिस्ट ने मोटापे से ग्रसित चूहों पर इसका टेस्ट किया. रिसर्च के नतीजे काफी चौंकाने वाले थे. जिन चूहों को pTOS दिया गया, उन्होंने कम खाना शुरू कर दिया और करीब 28 दिनों में उनका वजन लगभग 9 प्रतिशत तक कम हो गया. यानी यह तत्व सीधे तौर पर भूख को कम करने में मदद करता है.

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अब तक की दवाओं से कितना अलग?

अब तक जो वजन घटाने की दवाएं इस्तेमाल होती हैं, जैसे Wegovy, वे पेट के खाली होने की प्रक्रिया को धीमा करके काम करती हैं और कई बार इससे मतली जैसे साइड इफेक्ट भी होते हैं. लेकिन pTOS का तरीका अलग है. यह सीधे दिमाग के उस हिस्से पर असर डालता है, जिसे हाइपोथैलेमस कहा जाता है और जो भूख को कंट्रोल करता है. स्टडी से जुड़े वैज्ञानिक लेस्ली लेनवैंड का कहना है कि यह खोज भूख को नियंत्रित करने का एक नया और बेहतर तरीका दिखाती है, जिसमें मौजूदा दवाओं की तरह साइड इफेक्ट्स कम हो सकते हैं.

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कैसे हैं Cicada कोविड स्ट्रेन के लक्षण, जिसकी वजह से तेजी से बढ़ रहे कोरोना के केस?

कैसे हैं Cicada कोविड स्ट्रेन के लक्षण, जिसकी वजह से तेजी से बढ़ रहे कोरोना के केस?


Vaccine Effectiveness Against New Variant: अमेरिका में एक नया कोविड-19 वेरिएंट तेजी से चर्चा में आ गया है, जिसे ‘सिकाडा’ नाम दिया गया है. साइंटफिक भाषा में इसे BA.3.2 स्ट्रेन कहा जा रहा है, जो ओमिक्रॉन का ही एक सब-वेरिएंट है. हेल्थ एजेंसियों के मुताबिक, यह वेरिएंट अब अमेरिका के कई राज्यों में फैल चुका है और दुनियाभर के कई देशों में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कितना खतरनाक है और इसका प्रभाव कहां तक है. 

कहां मिले इसके लक्षण?

सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, इस वेरिएंट के संकेत वेस्टवॉटर सैंपल्स में भी मिले हैं, जिससे इसके फैलाव का अंदाजा लगाया जा रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, कैलिफोर्निया, फ्लोरिडा, न्यूयॉर्क और इलिनॉय जैसे राज्यों में इसके लक्षण मिले हैं. पहली बार यह केस जून 2025 में सामने आया था, जब नीदरलैंड्स से आए एक यात्री में यह इंफेक्शन पाया गया. इस नए स्ट्रेन को सिकाडा नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि यह लंबे समय तक अंडरग्राउंड रहने के बाद अचानक सामने आया, ठीक वैसे ही जैसे सिकाडा नाम के कीड़े सालों बाद जमीन से बाहर आते हैं. साइंटिस्ट का कहना है कि यह वेरिएंट काफी ज्यादा म्यूटेटेड है और इसमें 70 से 75 तक म्यूटेशन पाए गए हैं, जो इसे बाकी वेरिएंट्स से अलग बनाते हैं.

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इसके लक्षण और प्रभाव

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसके लक्षण क्या हैं और क्या यह ज्यादा खतरनाक है. फिलहाल एक्सपर्ट का कहना है कि इसके लक्षण बाकी कोविड वेरिएंट्स जैसे ही हैं. इसमें खांसी, बुखार या ठंड लगना, गले में खराश, नाक बंद होना, सांस लेने में दिक्कत, स्वाद और गंध का चले जाना, थकान, सिरदर्द और पेट से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं. Andrew Pekosz, जो जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ का कहना है कि इस वेरिएंट में इतनी ज्यादा म्यूटेशन हैं कि यह इम्यून सिस्टम के लिए अलग तरह से दिखाई दे सकता है.  वहीं, एपिडेमियोलॉजिस्ट Syra Madad के मुताबिक, अभी तक ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है कि यह वेरिएंट ज्यादा गंभीर बीमारी पैदा कर रहा है.

एंटीबॉडी से बच निकलने की क्षमता

हालांकि, शुरुआती स्टडीज में यह सामने आया है कि यह स्ट्रेन एंटीबॉडी से बच निकलने की क्षमता रखता है, जिससे यह सवाल उठता है कि वैक्सीन इसकी कितनी प्रभावी सुरक्षा दे पाएगी. इस पर अभी रिसर्च जारी है और वैज्ञानिक लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं। फिलहाल, स्वास्थ्य एजेंसियां लोगों को सतर्क रहने की सलाह दे रही हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि लक्षण भले ही सामान्य हों, लेकिन इंफेक्शन के फैलाव को देखते हुए सावधानी बरतना जरूरी है, ताकि किसी भी संभावित खतरे से समय रहते निपटा जा सके.

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देश में हेपेटाइटिस के साथ जी रहे करोड़ों, बिन लक्षण कैसे छलनी कर रहा लिवर?

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How Common Is Hepatitis In India: भारत में लाखों लोग हेपेटाइटिस बी या सी के साथ जी रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका अंदाजा तक नहीं है. वे रोज काम पर जाते हैं, सामान्य जीवन जीते हैं, फिर भी एक वायरस चुपचाप उनके लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है. जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक अक्सर स्थिति गंभीर हो चुकी होती है, जैसे लिवर सिरोसिस, लिवर फेल्योर या यहां तक कि लिवर कैंसर तक का खतरा बढ़ जाता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

मेदांता अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के डॉ. सौरदीप चौधरी ने TOI को बताया कि, भारत में हेपेटाइटिस वायरस का बोझ काफी ज्यादा है. अनुमान है कि देश की लगभग 3-4 प्रतिशत आबादी हेपेटाइटिस बी से संक्रमित है, जबकि 0.5- 1 प्रतिशत लोगों में हेपेटाइटिस सी पाया जाता है. यानी करीब एक करोड़ से अधिक लोग क्रॉनिक इंफेक्शन के साथ जी रहे हैं. समस्या यह है कि दोनों वायरस वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकते हैं, इसलिए अधिकांश लोग तब तक जांच नहीं कराते जब तक लिवर को गंभीर नुकसान न हो जाए.

बड़ी संख्या में आते हैं मरीज

भारत में हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई, इन पांचों प्रकार के वायरस बड़ी संख्या में मामले दर्ज करते हैं. हेपेटाइटिस ए आमतौर पर खराब स्वच्छता वाले इलाकों में 10- 30 प्रतिशत तीव्र मामलों के लिए जिम्मेदार है, जबकि हेपेटाइटिस ई 10-40 प्रतिशत तीव्र हेपेटाइटिस और 15-45 प्रतिशत तीव्र लिवर फेल्योर से जुड़ा पाया गया है, खासकर गर्भवती महिलाओं में.  जागरूकता की कमी भी बड़ी समस्या है। कई लोग मानते हैं कि लिवर की बीमारी सिर्फ शराब पीने वालों को होती है, जबकि यह पूरी तरह सही नहीं है.  कुछ लोगों को यह भी भ्रम है कि हेपेटाइटिस सामान्य संपर्क से साथ खाना खाने, गले मिलने या खांसने से फैलता है, जो कि गलत धारणा है.

कैसे फैल सकता है?

हेपेटाइटिस बी और सी का संक्रमण अक्सर असुरक्षित इंजेक्शन, बिना जांचे गए रक्त चढ़ाने, असुरक्षित सर्जरी या डेंटल प्रक्रिया, इंफेक्टेड सुई से टैटू या पियर्सिंग और प्रसव के दौरान मां से बच्चे में फैल सकता है. अगर हेपेटाइटिस बी या सी का इलाज न कराया जाए तो यह धीरे-धीरे लिवर में फाइब्रोसिस और सिरोसिस का कारण बन सकता है, जो आगे चलकर लिवर कैंसर में बदल सकता है. अच्छी बात यह है कि हेपेटाइटिस सी का इलाज अब संभव है और 8 से 12 हफ्तों की दवा से इसे ठीक किया जा सकता है. हालांकि, हेपेटाइटिस बी के अधिकांश मामलों में लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ती है. 

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