क्या आप सही तरह से सो रहे हैं, आपका स्लीप पैटर्न तय कर रहा है आपकी शुगर! जानिए कैसे?

क्या आप सही तरह से सो रहे हैं, आपका स्लीप पैटर्न तय कर रहा है आपकी शुगर! जानिए कैसे?


Can Diabetes Cause Sleep Problems: डायबिटीज एक पुरानी और आज के समय में बेहद आम बीमारी बन चुकी है.  वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार 1990 में जहां दुनियाभर में करीब 20 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित थे, वहीं 2022 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 83 करोड़ हो गई. चिंताजनक बात यह भी है कि डायबिटीज से पीड़ित आधे से ज्यादा लोगों को सही इलाज और दवाएं तक उपलब्ध नहीं हो पातीं.

हो सकती है दिक्कत

कई लोग इस बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते, लेकिन अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो यह किडनी फेलियर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और यहां तक कि अंग कटने जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन सकती है. आमतौर पर डायबिटीज के लक्षणों में ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, धुंधला दिखना और बिना कारण वजन कम होना शामिल हैं. लेकिन ब्रिटेन की डायबिटीज यूके संस्था के अनुसार एक और आम संकेत है जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वह है नींद से जुड़ी समस्या.

डायबिटीज का नींद पर असर

डायबिटीज यूके के अनुसार, ब्लड शुगर लेवल में लगातार उतार-चढ़ाव नींद को काफी प्रभावित कर सकता है. जब शरीर में शुगर का स्तर बहुत ज्यादा या बहुत कम हो जाता है, तो इससे रात की नींद बाधित हो सकती है. इसके अलावा डायबिटीज से जुड़ी जटिलताएं जैसे नर्व डैमेज  या पैरों में दर्द भी नींद में खलल डाल सकते हैं. पर्याप्त और अच्छी नींद शरीर के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होती है, लेकिन डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए अच्छी नींद लेना कई बार मुश्किल हो जाता है.

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ब्लड शुगर का नींद पर प्रभाव

अगर ब्लड शुगर बहुत कम हो जाए, जिसे हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है, तो यह रात के समय भी हो सकता है और इससे नींद प्रभावित हो सकती है. खासकर टाइप-1 डायबिटीज वाले लोगों में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है. कुछ दवाएं भी रात में ब्लड शुगर के लेवल को ऊपर-नीचे कर सकती हैं. रात में बार-बार शुगर कम होने से दिन में ज्यादा नींद या थकान महसूस हो सकती है और धीरे-धीरे नींद का पैटर्न भी बिगड़ सकता है. वहीं अगर ब्लड शुगर बहुत ज्यादा हो जाए तो भी नींद प्रभावित होती है. हाई ब्लड शुगर के कारण बार-बार यूरिन आने की जरूरत पड़ सकती है, जिससे रात में नींद टूटती रहती है. इसके अलावा ज्यादा प्यास लगना और सिरदर्द भी नींद आने में परेशानी पैदा कर सकते हैं.

नींद की कमी से बढ़ सकता है डायबिटीज का खतरा

शोध बताते हैं कि नींद से जुड़ी समस्याएं डायबिटीज के खतरे को भी बढ़ा सकती हैं. 2022 में यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों को सोने या सोए रहने में परेशानी होती है, उनमें ब्लड शुगर का स्तर ज्यादा पाया गया. डायबिटीज यूके के अनुसार अच्छी नींद के लिए कुछ आदतें मददगार हो सकती हैं. दिन में शारीरिक रूप से सक्रिय रहें, सोने से पहले कम से कम एक घंटे तक आराम करें, बिस्तर आरामदायक रखें और सोने से पहले शराब या ज्यादा स्क्रीन टाइम से बचें. कमरे का तापमान थोड़ा ठंडा रखना भी अच्छी नींद में मदद कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बदलते मौसम में आपको भी तो नहीं हो रहा लूज मोशन, जानें कैसे रख सकते हैं पेट को ठीक

बदलते मौसम में आपको भी तो नहीं हो रहा लूज मोशन, जानें कैसे रख सकते हैं पेट को ठीक


Loose Motions In Changing Weather: मौसम बदलते ही कई लोगों को पेट से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं. खासकर लूज मोशन यानी दस्त की शिकायत इस समय काफी आम हो जाती है. इसका कारण अक्सर डाइजेशन सिस्टम पर पड़ने वाला असर होता है. दरअसल हमारा डाइजेस्टिव सिस्टम पूरे शरीर की सेहत से गहराई से जुड़ा होता है. जब मौसम बदलता है तो खान-पान, पानी और वातावरण में बदलाव के कारण पेट की सेहत भी प्रभावित हो सकती है.

हमारी आंतों में करोड़ों सूक्ष्म जीव मौजूद होते हैं, जिन्हें गट माइक्रोबायोम कहा जाता है. ये शरीर में भोजन को पचाने, जरूरी विटामिन बनाने और हानिकारक बैक्टीरिया से बचाने में मदद करते हैं. अगर इन अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाए तो पाचन से जुड़ी दिक्कतें शुरू हो सकती हैं. इसी वजह से मौसम बदलने के दौरान पेट का खास ख्याल रखना जरूरी हो जाता है. 

किन लोगों को होती है दिक्कत

लूज मोशन लगभग हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है। इसमें बार-बार पतला या पानी जैसा मल आने लगता है. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे फूड पॉइजनिंग, एलर्जी, बैक्टीरियल या वायरल इंफेक्शन, तनाव या खान-पान में अचानक बदलाव. कई बार एंटीबायोटिक दवाओं के कारण भी आंतों के अच्छे बैक्टीरिया कम हो जाते हैं, जिससे दस्त की समस्या हो सकती है. 

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क्या है इसका इलाज

maxhealthcare की रिपोर्ट के अनुसार, आमतौर पर लूज मोशन एक-दो दिन में ठीक हो जाते हैं, लेकिन इस दौरान शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो सकती है. इसलिए शरीर को हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी होता है. अगर समस्या लंबे समय तक बनी रहे या कमजोरी, चक्कर या डिहाइड्रेशन जैसे लक्षण दिखें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

कुछ घरेलू उपाय भी पेट को राहत देने में मदद कर सकते हैं. जैसे कि केला पाचन के लिए अच्छा माना जाता है. केले को मैश करके उसमें थोड़ा घी, जायफल और इलायची मिलाकर खाने से दस्त में आराम मिल सकता है. इसी तरह दही और चावल का हल्का भोजन भी पेट को शांत करने में मदद करता है. दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करते हैं. दही में थोड़ा अदरक मिलाकर लेने से भी पाचन बेहतर हो सकता है, इसके अलावा अदरक, सौंफ और गुनगुने पानी का मिक्स भी पेट को राहत देने में सहायक माना जाता है. इसके साथ-साथ एक कप काली चाय में नींबू का रस और थोड़ा जायफल या इलायची मिलाकर पीने से भी दस्त की समस्या में आराम मिल सकता है. वहीं घी में हल्का पकाया हुआ सेब भी पाचन को सुधारने में मदद करता है. 

इन चीजों का ध्यान रखना चाहिए

मौसम बदलते समय साफ-सफाई का ध्यान रखना, हल्का और ताजा भोजन करना, पर्याप्त पानी पीना और पेट के लिए फायदेमंद चीजें खाने से   को स्वस्थ रखा जा सकता है। सही खान-पान और थोड़ी सावधानी से लूज मोशन जैसी समस्याओं से काफी हद तक बचा जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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खाना खाने के तुरंत बाद बन जाता है प्रेशर, जानें शरीर में कहां है दिक्कत?

खाना खाने के तुरंत बाद बन जाता है प्रेशर, जानें शरीर में कहां है दिक्कत?


Why Do I Need To Poop Right After Eating: अगर आपको अक्सर खाना खाने के तुरंत बाद टॉयलेट जाने की इच्छा होती है, तो कई बार लगता है कि जैसे खाना सीधे पेट से बाहर निकल रहा है. लेकिन असल में ऐसा नहीं होता. इसके पीछे शरीर की एक नेचुरल प्रक्रिया काम करती है, जिसे गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स कहा जाता है. यह डाइजेशन सिस्टम का एक स्वाभाविक संकेत होता है, जो आंतों को बताता है कि नया भोजन पेट में पहुंच गया है, इसलिए पुराने वेस्ट को बाहर निकालने की तैयारी कर ली जाए. यह प्रक्रिया सामान्य होती है, लेकिन हर व्यक्ति में इसका असर अलग-अलग हो सकता है

क्या होता है गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार,  गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स पेट और बड़ी आंत के बीच होने वाला एक ऑटोमैटिक कम्युनिकेशन है. जब भोजन पेट में पहुंचता है, तो नसें बड़ी आंत की मांसपेशियों को संकेत भेजती हैं. इसके बाद आंतों में हलचल शुरू हो जाती है और मल त्याग की इच्छा महसूस हो सकती है. इसका मकसद यह होता है कि नया भोजन पचने के लिए जगह बन सके और पुराना अपशिष्ट शरीर से बाहर निकल जाए.

शरीर में कौन-कौन से हिस्से होते हैं शामिल?

इस प्रक्रिया में डाइजेशन सिस्टम के कई अंग मिलकर काम करते हैं. पेट भोजन को तोड़ने की प्रक्रिया शुरू करता है. इसके बाद बड़ी आंत धीरे-धीरे भोजन से पानी सोखते हुए उसे ठोस अपशिष्ट में बदलती है. इस पूरी प्रक्रिया को कंट्रोल करने में एंटेरिक नर्वस सिस्टम यानी आंतों का नर्वस सिस्टम अहम भूमिका निभाता है, जिसे अक्सर गट ब्रेन भी कहा जाता है. इसके अलावा डाइजेशन सिस्टम की चिकनी मांसपेशियां, गैस्ट्रिन और कोलेसिस्टोकिनिन जैसे हार्मोन भी इस प्रक्रिया को सक्रिय करते हैं.

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कब ज्यादा तेज हो जाता है यह रिफ्लेक्स?

कुछ लोगों में यह रिफ्लेक्स ज्यादा सक्रिय हो सकता है. ऐसे में खाना खाते ही तुरंत टॉयलेट जाने की जरूरत महसूस होती है. कई बार कुछ खास तरह के भोजन, दवाएं, इंफेक्शन या मानसिक तनाव भी इसका कारण बन सकते हैं. ज्यादा कैलोरी वाला खाना, तला-भुना या मसालेदार भोजन, शराब और कैफीन जैसे पेय पदार्थ भी आंतों की गतिविधि को तेज कर सकते हैं. अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह कुछ डाइजेशन संबंधी बीमारियों से भी जुड़ी हो सकती है. इनमें इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, डंपिंग सिंड्रोम, गैस्ट्रोपेरेसिस और इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी स्थितियां शामिल हैं. इन बीमारियों में आंतें सामान्य से ज्यादा संसेटिव हो जाती हैं और जल्दी प्रतिक्रिया देने लगती हैं.

क्या करें?

अगर यह समस्या कभी-कभार होती है, तो खान-पान में बदलाव काफी मददगार हो सकता है. बहुत ज्यादा मसालेदार, तैलीय या कैफीन वाले खाद्य पदार्थों से बचना फायदेमंद हो सकता है. लेकिन अगर बार-बार दस्त, पेट में ऐंठन या वजन कम होने जैसे लक्षण भी दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कॉफी में नींबू डालकर पीने से बर्न हो जाता है फैट, कितना कारगर है यह वायरल नुस्खा?

कॉफी में नींबू डालकर पीने से बर्न हो जाता है फैट, कितना कारगर है यह वायरल नुस्खा?


What Happens If You Drink Coffee With Lemon: आज का दौर सोशल मीडिया का दौर है.  स्क्रॉल करते ही आपको ऐसे वीडियो नजर आ जाते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि एक कप ब्लैक कॉफी में आधा नींबू निचोड़कर पीने से वजन तेजी से घटता है. इसे “बेली फैट मेल्ट करने” और “मेटाबॉलिज्म तुरंत बढ़ाने” वाला आसान और सस्ता नुस्खा बताया जाता है. वजन कम करने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए यह दावा काफी आकर्षक लगता है कि मानो एक ड्रिंक ही सारा काम कर दे.

कॉफी वास्तव में क्या करती है?

कॉफी में कैफीन होता है, जो एक नेचुरल स्टिमुलेंट है. कैफीन थोड़े समय के लिए मेटाबॉलिज्म को तेज कर सकता है और सतर्कता बढ़ाता है. कुछ लोगों में यह भूख को अस्थायी रूप से कम भी करता है, जिससे वे कम खाना खा सकते हैं. लेकिन यह असर स्थायी नहीं होता. शरीर धीरे-धीरे कैफीन का आदी हो जाता है, जिससे उसका प्रभाव कम होने लगता है. केवल कॉफी पीने से बिना डाइट और एक्सरसाइज में बदलाव किए खास वजन कम होना संभव नहीं है.

क्या इससे वजन कम होता है?

नींबू विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है. इसे पानी में मिलाकर पीने से हाइड्रेशन बेहतर हो सकता है और डाइजेशन में मदद मिलती है. स्वाद के लिहाज से भी यह ताजगी देता है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, इसका जवाब नहीं है. ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जो यह साबित करे कि कॉफी में नींबू मिलाने से फैट तेजी से बर्न होता है. नींबू के गुण वही रहते हैं, चाहे वह पानी में डाला जाए या किसी और पेय में.   नींबू-पानी की तरह यह भी पेट भरने का एहसास देता है. जब पेट भरा लगता है तो भूख कम लगती है, जिससे कैलोरी इनटेक घट सकता है. कॉफी भी भूख दबाने में थोड़ी मदद कर सकती है, लेकिन केवल कॉफी या नींबू के सहारे हेल्दी वजन कंट्रोल संभव नहीं.

आखिर लेमन कॉफी है क्या?

यह बस ब्लैक कॉफी में आधे नींबू का रस मिलाने भर से तैयार हो जाती है. स्वाद हर किसी को पसंद आए, यह जरूरी नहीं. यही वजह है कि यह ड्रिंक आमतौर पर कैफे के मेन्यू में नजर नहीं आती. कुछ कल्चर में ठंडी मीठी कॉफी और नींबू का मिश्रण मजाग्रान नाम से जाना जाता है, जिसकी शुरुआत अल्जीरिया में हुई और जो पुर्तगाल में लोकप्रिय है. लेकिन उसे वजन घटाने के जादुई उपाय के रूप में नहीं देखा जाता

क्या यह सुरक्षित है?

ज्यादातर हेल्दी एडल्ट के लिए सीमित मात्रा में लेमन कॉफी पीना सुरक्षित माना जा सकता है. लेकिन ध्यान रखें कि कॉफी और नींबू दोनों ही एसिडिक होते हैं. इनको साथ में लेने पर यह मिक्स और अधिक एसिडिक हो जाता है. जिन लोगों को एसिडिटी, गैस्ट्राइटिस, एसिड रिफ्लक्स या दांतों की समस्या है, उन्हें इससे असहजता, सीने में जलन या दांतों के इनेमल को नुकसान हो सकता है. खाली पेट इसे पीना लक्षणों को और बढ़ा सकता है.

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सिर्फ मर्दों में होती हैं ये बीमारियां, 40 की उम्र के बाद दोगुना हो जाता है खतरा

सिर्फ मर्दों में होती हैं ये बीमारियां, 40 की उम्र के बाद दोगुना हो जाता है खतरा


आज की तेज रफ्तार जिंदगी में पुरुष अक्सर काम, परिवार और जिम्मेदारियों के बीच अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देते हैं. युवा उम्र में शरीर मजबूत महसूस होता है, इसलिए ज्यादातर पुरुष स्वास्थ्य जांच, सही खानपान और व्यायाम पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, लेकिन जैसे-जैसे उम्र 40 साल के आसपास पहुंचती है, शरीर में कई तरह के बदलाव होने लगते हैं. इस समय हार्मोन में बदलाव, बढ़ता तनाव, अनियमित दिनचर्या और खराब खानपान कई बीमारियों के खतरे को बढ़ा देते हैं. 

डॉक्टरों के अनुसार 40 की उम्र के बाद पुरुषों में कई ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, जो धीरे-धीरे शरीर को कमजोर कर सकती हैं. कई बार ये बीमारियां शुरुआत में ज्यादा लक्षण नहीं दिखातीं, लेकिन समय के साथ गंभीर रूप ले सकती हैं. इसलिए इस उम्र के बाद पुरुषों को अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सावधान रहने की जरूरत होती है.  तो आइए जानते हैं कि मर्दों में 40 के बाद कौन सी बीमारियों का खतरा दोगुना हो जाता है. 

मर्दों में 40 के बाद कौन सी बीमारियों का खतरा दोगुना?

प्रोस्टेट से जुड़ी समस्याएं

प्रोस्टेट पुरुषों के शरीर में मौजूद एक छोटी ग्रंथि होती है, जो वीर्य बनाने में मदद करती है. उम्र बढ़ने के साथ इसका आकार धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. कई पुरुषों में प्रोस्टेट के बढ़ने से पेशाब करने में दिक्कत, बार-बार पेशाब आना या पेशाब के दौरान जलन जैसी समस्याएं होने लगती हैं, अगर समय पर इलाज न कराया जाए तो यह समस्या मूत्र संक्रमण या किडनी से जुड़ी परेशानी भी पैदा कर सकती है. 

हार्ट डिजीज का खतरा

पुरुषों में दिल से जुड़ी बीमारियां भी काफी आम होती हैं. खासकर 40 साल के बाद हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल बढ़ना, मोटापा और धूम्रपान जैसी आदतें हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा देती हैं. छाती में दर्द, सांस फूलना, ज्यादा पसीना आना और थकान इसके सामान्य लक्षण हो सकते हैं. इसलिए नियमित व्यायाम और संतुलित आहार दिल को स्वस्थ रखने में मदद करता है.

डायबिटीज

अनियमित खानपान, ज्यादा मीठा खाना और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण पुरुषों में डायबिटीज का खतरा भी बढ़ जाता है. इस बीमारी में बार-बार पेशाब आना, ज्यादा प्यास लगना, थकान और घाव का देर से भरना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. समय पर जांच और सही जीवनशैली अपनाकर इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है.

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टेस्टोस्टेरोन की कमी

उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर भी कम होने लगता है. इससे शरीर में कमजोरी, यौन इच्छा में कमी, मूड स्विंग्स और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं. पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और संतुलित भोजन इस समस्या को कम करने में मदद कर सकते हैं.

लिवर और फेफड़ों की समस्या

ज्यादा शराब पीना और धूम्रपान करना पुरुषों में लिवर और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है. लिवर की समस्या होने पर भूख कम लगना, पेट फूलना और पीलिया जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. वहीं धूम्रपान करने वाले पुरुषों में फेफड़ों के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है.

मानसिक तनाव और डिप्रेशन

अक्सर पुरुष अपनी भावनाओं को खुल कर व्यक्त नहीं करते. काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां और पारिवारिक तनाव धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. चिड़चिड़ापन, नींद न आना, निराशा और अकेलापन डिप्रेशन के संकेत हो सकते हैं.

इसे भी पढ़ें – Heart Disease Risk: कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक का खतरा? सावधान! ये कारण हो सकता है असली विलेन

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बार-बार पेनकिलर खाने से किडनी को हो सकता है नुकसान, जानें डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी?

बार-बार पेनकिलर खाने से किडनी को हो सकता है नुकसान, जानें डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी?


सिर दर्द, शरीर में दर्द, बुखार पीरियड्स के दौरान होने वाला दर्द या फिर गठिया जैसी समस्याओं में लोग अक्सर तुरंत आराम पाने के लिए पेन किलर दवाइयां ले लेते हैं. क्योंकि इनमें से कई दवाएं बिना डॉक्टर की पर्ची के मेडिकल स्टोर पर आसानी से मिल जाती है. इसलिए लोग इन्हें बिना सोचे समझे ले लेते हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि पेन किलर का बार-बार इस्तेमाल करना सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. डॉक्टर के अनुसार किडनी हमारे शरीर का बहुत जरूरी हिस्सा है यह खून से गंदगी और एक्स्ट्रा तरल पदार्थ को फिल्टर करती है, शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखती है और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में मदद करती है. वहीं कई दवाएं किडनी के जरिए शरीर से बाहर निकालती है. इसलिए ज्यादा मात्रा में दवाएं लेने पर किडनी पर एक्स्ट्रा दबाव भी पड़ सकता है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि पेन किलर खाने से किडनी को बार-बार क्या नुकसान हो सकते हैं और डॉक्टरों ने क्या चेतावनी दी है.

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NSAIDs दवाएं बढ़ा सकती है खतरा

एक्सपर्ट के अनुसार किडनी से जुड़ी समस्याओं के साथ सबसे ज्यादा जुड़ा हुआ पेनकिलर का ग्रुप नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स यानी NSAIDs है. इसमें आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाएं Ibuprofen, Diclofenac और Naproxen शामिल है. यह दवाई शरीर में दर्द और सूजन पैदा करने वाले केमिकल को कम करके राहत देती है. हालांकि यह दवाएं शरीर में मौजूद प्रोस्टाग्लैंडिन नाम के पदार्थ को कम कर देती है जो किडनी तक खून के प्रवाह को सही बनाए रखने में मदद करता है. जब प्रोस्टाग्लैंडिन का स्तर कम हो जाता है तो किडनी तक खून का प्रवाह भी घट सकता है. जिससे लंबे समय में किडनी की कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है. कुछ डॉक्टरों का कहना है कि किडनी खून से दवाओं और दूसरे अपशिष्ट पदार्थों को फिल्टर करने का काम करती है. ऐसे में जब दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है तो किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और इससे दवा से जुड़े नुकसान का खतरा बढ़ जाता है.

किन लोगों काे होता है ज्यादा खतरा?

डॉक्टर के अनुसार कुछ लोगों में पेन किलर से किडनी को नुकसान होने का खतरा ज्यादा होता है. इनमें बुजुर्ग, पहले से किडनी की बीमारी से जूझ रहे मरीज और डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग शामिल है. इसके अलावा शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन भी किडनी के लिए खतरा बढ़ा सकती है. क्योंकि किडनी को सही तरीके से काम करने के लिए पर्याप्त तरल पदार्थ और ब्लड सर्कुलेशन की जरूरत होती है. कुछ मामलों में खतरा तब और बढ़ जाता है, जब पेन किलर दवाओं को ब्लड प्रेशर या दिल से जुड़ी दवाओं के साथ लिया जाता है. जैसे एसीई inhibitors या Diuretics के साथ NSAIDs लेने से किडनी के काम पर एक्स्ट्रा असर पड़ सकता है.

क्या है सुरक्षित ऑप्शन?

डॉक्टर का कहना है कि पेन किलर दवाएं बार-बार लेने से किडनी पर असर पड़ता है, इसका मतलब यह नहीं है कि पेन किलर दवाओं को पूरी तरह छोड़ दी जाए. इसके बजाय सही मात्रा और डॉक्टर की सलाह के साथ उनका इस्तेमाल सुरक्षित माना जाता है. आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दावों में पैरासिटामोल को किडनी के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है,  हालांकि ज्यादा मात्रा में लेने से लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है. लंबे समय तक रहने वाले दर्द के मामलों में डॉक्टर Tramadol या Tapentadol जैसी दवाई भी दे सकते है,  लेकिन इनका इस्तेमाल आमतौर पर डॉक्टर की निगरानी में ही किया जाता है.

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