पानी पीते ही भागते हैं टॉयलेट, एक्सपर्ट से जानें क्या ऐसा होना नॉर्मल या किसी बीमारी का संकेत?

पानी पीते ही भागते हैं टॉयलेट, एक्सपर्ट से जानें क्या ऐसा होना नॉर्मल या किसी बीमारी का संकेत?


Is Frequent Urination After Drinking Water Normal:  मान लीजिए कि आप ऑफिस में हैं या किसी जरूरी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. इस दौरान आपने आधा या एक गिलास पानी पिया और ठीक 15 मिनट भी नहीं हुए कि आपको भागकर टॉयलेट जाना पड़ा. एक-दो बार यह स्थिति हो तो समझ में आता है, लेकिन अगर आपके साथ ऐसा बार-बार हो रहा है, तो मन में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? अगर आपके साथ भी ऐसी स्थिति बन रही है, तो घबराएं नहीं. चलिए, आपको बताते हैं कि इस स्थिति से निपटने के लिए आपको क्या करने की जरूरत है और इस पर एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं.

क्या हो सकते हैं कारण?

देवघर स्थित मधुमेह क्लिनिक के यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि बार-बार यूरिन आने का एक आम कारण ओवरएक्टिव ब्लैडर हो सकता है. इसमें ब्लैडर की मांसपेशियां जरूरत से ज्यादा सिकुड़ने लगती हैं, जिससे ब्लैडर भरा न होने पर भी तेज यूरिन की इच्छा होती है. इसके अलावा यूरिन इंफेक्शन, चाय-कॉफी या शराब से होने वाली जलन, अनियंत्रित ब्लड शुगर, तनाव के कारण ब्लैडर की संवेदनशीलता बढ़ना या बहुत कम समय में ज्यादा पानी पी लेना भी वजह हो सकता है. जब कोई व्यक्ति एक साथ बहुत ज्यादा पानी पी लेता है, तो किडनी तेजी से अतिरिक्त पानी को फिल्टर करने लगती है, जिससे पेशाब बार-बार आता है. दिनभर में पानी को थोड़े-थोड़े अंतराल पर पीने से यह समस्या अक्सर कम हो जाती है.

कब हो सकता है खतरे का संकेत?

अगर बार-बार यूरिन आने के साथ जलन, दर्द, पेशाब में खून, निचले पेट में परेशानी, बुखार, अचानक तेज पेशाब लगना या रात में बार-बार उठकर टॉयलेट जाना पड़े, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए. ये लक्षण इंफेक्शन, ब्लैडर में सूजन, पुरुषों में प्रोस्टेट की समस्या या डायबिटीज जैसी मेटाबॉलिक बीमारियों की ओर इशारा कर सकते हैं. इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ ब्लैडर की क्षमता और नियंत्रण में बदलाव आ सकता है. वहीं तनाव और चिंता भी ब्लैडर को ज्यादा संवेदनशील बना देते हैं, जिससे कम पेशाब बनने पर भी बार-बार पेशाब की तीव्र इच्छा महसूस होती है.

क्या करें जिससे राहत मिले?

सबसे पहले यह देखें कि आप कितना और कितनी तेजी से पानी पी रहे हैं. चाय, कॉफी और कोल्ड ड्रिंक्स जैसे ब्लैडर को परेशान करने वाले पेय कम करें. तय समय पर पेशाब करने की आदत डालें और “जस्ट इन केस” टॉयलेट जाने से बचें. पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज भी ब्लैडर कंट्रोल बेहतर करने में मददगार हो सकती हैं।

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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वक्त न हो या मन न करे तो कैसे रहें फिट? हेल्थ एक्सपर्ट के बताए ये टिप्स रखेंगे आपको एकदम हेल्दी

वक्त न हो या मन न करे तो कैसे रहें फिट? हेल्थ एक्सपर्ट के बताए ये टिप्स रखेंगे आपको एकदम हेल्दी


How To Stay Fit Without Exercise: अक्सर फिट रहने की बात आते ही हमें जिम जॉइन करने, पहाड़ों पर दौड़ने या किसी हाई-इंटेंसिटी वर्कआउट क्लास में नाम लिखवाने की सलाह दी जाती है. लेकिन हकीकत यह है कि हर किसी के पास न तो इतना वक्त होता है और न ही हर दिन एक्सरसाइज करने का मन, ऐसे में सवाल उठता है कि अगर समय की कमी हो या शरीर साथ न दे, तो क्या फिट रहना संभव है?. चलिए आपको इस सवाल का जवाब देते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

हेल्थ रिसर्चर जो ब्लॉजेट मानती हैं कि फिटनेस के लिए रोजाना लंबे वर्कआउट जरूरी नहीं होते.  यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट, एक्सरसाइज एंड हेल्थ में सीनियर रिसर्च फेलो हैं ब्लॉजेट के मुताबिक, दिनभर में किए गए छोटे-छोटे शारीरिक मूवमेंट भी सेहत पर बड़ा असर डाल सकते हैं. उनका कहना है कि अगर रोजमर्रा की जिंदगी में थोड़ा-सा भी अतिरिक्त प्रयास जोड़ दिया जाए, तो शरीर को उसका फायदा मिलने लगता है.

खुद को फिट रखने के मौके तलाशे जाएं

उनके अनुसार, फिट रहने का एक आसान तरीका यह है कि अपनी दिनचर्या में ऐसे मौके तलाशे जाएं, जहां बिना किसी तैयारी के हल्की-सी तेज एक्टिविटी की जा सके. जैसे लिफ्ट की जगह सीढ़ियां लें. पूरा 10 से 12 फ्लोर चढ़ने की जरूरत नहीं, दो फ्लोर चढ़िए और फिर लिफ्ट ले लीजिए. बस से एक स्टॉप पहले उतर जाएं और आखिरी स्टॉप तक तेज चाल में चलें. अगर आप पहले से वॉक करते हैं, तो दो खंभों या लाइट पोस्ट के बीच रफ्तार थोड़ी बढ़ा दें. रिसर्च बताती है कि दिन में कुछ बार एक-दो मिनट की तेज गतिविधि दिल की सेहत को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है.

जिम और खेल कूद पर ही निर्भरता नहीं

ब्लॉजेट यह भी कहती हैं कि हफ्ते में एक-दो बार जिम जाना या कभी-कभार खेलकूद करना अच्छी बात है, लेकिन सिर्फ इसी पर निर्भर रहना सही नहीं। बहुत से लोग एक्सरसाइज करने के बावजूद दिन का ज्यादातर वक्त कुर्सी या सोफे पर बैठे रहते हैं. ऐसे लोगों के लिए वह मानती हैं कि असली चुनौती पूरे दिन के मूवमेंट की है, न कि सिर्फ जिम के कुछ मिनटों की।

उनका कहना है कि लगातार लंबे समय तक बैठे रहना शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकता है, भले ही आप रोज वर्कआउट करते हों. इसलिए जरूरी है कि काम के दौरान बीच-बीच में उठें, थोड़ा चलें-फिरें और शरीर को हिलाएं. लंच ब्रेक में टहलना या फोन कॉल के दौरान चलते रहना जैसे छोटे बदलाव भी शरीर को एक्टिव रखने में मदद करते हैं.

फिटनेस के लिए नजरिया बदलने की जरूरत

ब्लॉजेट का मानना है कि फिटनेस को देखने का नजरिया बदलने की जरूरत है, सिर्फ यह गिनने के बजाय कि आपने कितनी एक्सरसाइज की, यह देखना ज्यादा जरूरी है कि आपने दिनभर कितना समय बिल्कुल बिना हिले बिताया. अगर इस समय को कम किया जाए, तो सेहत में अपने आप सुधार दिखने लगता है. उनके मुताबिक, घर के कामकाज, सामान उठाना, सफाई करना या बच्चों के साथ खेलना भी शरीर को सक्रिय रखने के अच्छे तरीके हैं. कोई एक तय नियम नहीं है कि रोज कितनी एक्टिविटी काफी है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जितना ज्यादा शरीर को हिलाया जाएगा, उतना ही बेहतर असर सेहत पर पड़ेगा.

यह भी पढ़ें – सिर्फ सुबह-सुबह टहलने से नहीं सुधरेगी हार्ट हेल्थ, जानें क्या-क्या है जरूरी?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सिर्फ स्पर्म ही बनाने का काम करते हैं टेस्टिकल्स? इनके काम जान लेंगे तो उड़ जाएंगे होश

क्या सिर्फ स्पर्म ही बनाने का काम करते हैं टेस्टिकल्स? इनके काम जान लेंगे तो उड़ जाएंगे होश


Natural Ways To Maintain Testosterone Levels: टेस्टिकल्स पुरुष शरीर का यह हिस्सा अक्सर सिर्फ एक ही काम से जोड़ा जाता है स्पर्म बनाना. लेकिन सच इससे कहीं बड़ा है. टेस्टिकल्स और उन्हें सुरक्षित रखने वाला स्क्रोटम शरीर की एक बेहद मुश्किल और जरूरी सिस्टम का हिस्सा हैं. स्क्रोटम पेनिस के नीचे स्थित त्वचा की एक थैली होती है, जिसके भीतर दोनों टेस्टिकल्स सुरक्षित रहते हैं. ये दो न केवल स्पर्म का निर्माण और स्टोर करती हैं, बल्कि पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन भी बनाती और छोड़ती हैं, जो आवाज भारी होने, मांसपेशियों के विकास, दाढ़ी-मूंछ और यौन क्षमता जैसे कई शारीरिक बदलावों के लिए जिम्मेदार होता है.

क्या होता है टेस्टोस्टेरोन?

टेस्टोस्टेरोन एक जरूरी पुरुष हार्मोन है, जो मुख्य रूप से टेस्टिकल्स में बनता है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली Mayoclinic के अनुसार, यह सिर्फ यौन क्षमता से जुड़ा हार्मोन नहीं है, बल्कि शरीर के कई जरूरी कामों में भूमिका निभाता है. हड्डियों की मजबूती बनाए रखना, शरीर में फैट का संतुलन, मांसपेशियों की ताकत और आकार, चेहरे व शरीर के बालों का विकास, रेड ब्लड सेल्स का निर्माण, फिजिकल रिलेशन ड्राइव और स्पर्म प्रोडक्शन इन सभी प्रक्रियाओं में टेस्टोस्टेरोन की अहम भागीदारी होती है. यही हार्मोन पुरुषों में शारीरिक विशेषताओं के विकास और उन्हें बनाए रखने में मदद करता है.

कब यह शरीर में सबसे ज्यादा बनता है?

आमतौर पर किशोरावस्था और शुरुआती युवावस्था में टेस्टोस्टेरोन का स्तर अपने चरम पर होता है. इसके बाद उम्र बढ़ने के साथ इसमें धीरे-धीरे कमी आने लगती है. 30 या 40 वर्ष की उम्र के बाद हर साल लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट सामान्य मानी जाती है. लेकिन हर गिरावट को सामान्य बुढ़ापे का हिस्सा नहीं माना जा सकता. कुछ मामलों में कम टेस्टोस्टेरोन किसी बीमारी का संकेत भी हो सकता है, जिसे हाइपोगोनाडिज्म कहा जाता है. यह स्थिति तब होती है जब टेस्टिकल्स या उन्हें नियंत्रित करने वाली पिट्यूटरी ग्लैंज ठीक से काम नहीं करती और पर्याप्त मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती.

इसके कारण क्या होते हैं बदलाव?

कम टेस्टोस्टेरोन के कारण पुरुषों में कई बदलाव देखे जा सकते हैं. यौन इच्छा में कमी, नींद के दौरान होने वाले स्वाभाविक इरेक्शन में गिरावट या इनफर्टिलिटी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं. शारीरिक स्तर पर शरीर में फैट बढ़ना, मांसपेशियों की ताकत कम होना, हड्डियों का कमजोर होना, ब्रेस्ट में सूजन या कोमलता और शरीर के बालों का झड़ना भी संभव है. कई लोगों को एनर्जी में कमी महसूस होती है. इमोशनल रूप से भी असर दिख सकता है,जैसे आत्मविश्वास में गिरावट, उदासी, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई या याददाश्त कमजोर होना. हालांकि ये सभी लक्षण सिर्फ कम टेस्टोस्टेरोन की वजह से ही हों, यह जरूरी नहीं. दवाओं के साइड इफेक्ट, स्लीप एपनिया, थायरॉयड की समस्या, डायबिटीज या डिप्रेशन भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकते हैं. 

इसे भी पढ़ें- Testicle Pain Causes:हल्की-सी चोट लगते ही होता है तेज दर्द, आखिर शरीर के बाहर ही क्यों लटके रहते हैं टेस्टिकल्स?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिहार के किस जिले में एड्स के सबसे ज्यादा मरीज, जानें यहां क्यों फैल रही यह महामारी?

बिहार के किस जिले में एड्स के सबसे ज्यादा मरीज, जानें यहां क्यों फैल रही यह महामारी?


Which District In Bihar Has The Highest AIDS Cases: बिहार में एचआईवी/एड्स को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है. राज्य में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या अब एक लाख के पार पहुंच चुकी है.

स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने विधान परिषद में जानकारी देते हुए बताया कि अब तक 1,00,044 लोग एचआईवी पॉजिटिव पाए गए हैं. यह खुलासा उस समय हुआ जब डॉ. राजवर्धन आजाद समेत अन्य सदस्यों ने इस मुद्दे पर प्रस्ताव के जरिए सरकार से जवाब मांगा. चलिए आपको बताते हैं कि बिहार में इसके मामले क्यों बढ़ रहे हैं. 

किन लोगों में सबसे ज्यादा मामले?

सदन में दी गई जानकारी के अनुसार, बिहार के 13 जिलों को ‘हाई रिस्क’ श्रेणी में रखा गया है, जहां इंफेक्शन की रफ्तार सामान्य से अधिक तेज है. आंकड़ों पर नजर डालें तो राजधानी पटना इस सूची में सबसे ऊपर है. यहां अब तक 8,270 एड्स के मरीजों की पुष्टि हो चुकी है. इसके बाद गया में 5,760, मुजफ्फरपुर में 5,520, सीतामढ़ी में 5,026, बेगूसराय में 4,716 और भागलपुर में 3,078 मामले दर्ज किए गए हैं. ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि शहरी और घनी आबादी वाले इलाकों में इंफेक्शन का दबाव ज्यादा है.

क्यों बढ़ रहे हैं मामले?

सवाल उठ रहा है कि आखिर कुछ जिलों में यह स्थिति इतनी गंभीर क्यों हो रही है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, जागरूकता की कमी, समय पर जांच न कराना, लोगों को एक दूसरे हिस्से में आना जाना और अनसेफ फिजिकल रिलेशन बनाना इस इंफेक्शन के फैलाव में भूमिका निभा सकते हैं. हालांकि सरकार ने जांच और परामर्श की सुविधाओं को मजबूत करने का दावा किया है. फिलहाल राज्य के विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में 196 समेकित परामर्श एवं जांच केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, जहां एचआईवी की मुफ्त जांच और काउंसलिंग उपलब्ध है.

पीड़ितों को सरकार की तरफ से सहायता

सरकार की ओर से संक्रमित लोगों के लिए आर्थिक सहायता भी दी जा रही है. ‘बिहार शताब्दी एड्स पीड़ित कल्याण योजना’ के तहत प्रत्येक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को 1,500 रुपये प्रतिमाह की मदद दी जाती है. साथ ही, 18 वर्ष से कम आयु के दो आश्रित बच्चों को 1,000 रुपये प्रतिमाह की सहायता प्रदान की जाती है.

वित्तीय वर्ष 2025-26 में दिसंबर 2025 तक 63.81 करोड़ रुपये सीधे लाभार्थियों के खातों में ट्रांसफर किए जा चुके हैं. सरकार का कहना है कि वह इंफेक्शन की रोकथाम, इलाज और जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन बढ़ते आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि खासकर पटना समेत हाई रिस्क जिलों में सतर्कता और व्यापक जागरूकता अभियान की और ज्यादा जरूरत है, ताकि इस इंफेक्शन की रफ्तार पर काबू पाया जा सके.

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‘योग सिर्फ व्यायाम नहीं, मन और श्वास का सामंजस्य है’, फेसबुक लाइव में बोले स्वामी रामदेव

‘योग सिर्फ व्यायाम नहीं, मन और श्वास का सामंजस्य है’, फेसबुक लाइव में बोले स्वामी रामदेव


Meditation Benefits: योग गुरु बाबा रामदेव ने हाल ही में पतंजलि संन्यास आश्रम से एक फेसबुक लाइव सत्र के माध्यम से देश-दुनिया को स्वास्थ्य और अनुशासन का संदेश दिया. अपनी टीम के साथ योगासन और प्राणायाम करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मानवीय ऊर्जा एक अमूल्य संसाधन है, जिसे बीमारियों से लड़ने में नष्ट करने के बजाय स्वास्थ्य को बनाए रखने और उसे सही दिशा में प्रवाहित करने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

रामदेव बाबा के अनुसार, योग तभी प्रभावी होता है जब मन और श्वास के बीच पूर्ण सामंजस्य हो. सत्र के दौरान उन्होंने प्राणायाम में एकाग्रता के महत्व को रेखांकित किया और बताया कि अनुशासन, जागरूकता और निवारक स्वास्थ्य ही आधुनिक जीवन की शारीरिक और मानसिक समस्याओं का समाधान हैं.

पारंपरिक चिकित्सा और ‘कायाकल्प’

इस सत्र में पारंपरिक योगिक और उपचारात्मक प्रथाओं पर विशेष चर्चा की गई। बाबा रामदेव ने शंख प्रक्षालन, कोलन थेरेपी, बस्ती और पंचकर्म-षट्कर्म जैसी प्राचीन शोधन विधियों का उल्लेख किया. उन्होंने इन विधियों को आंतरिक शुद्धि और ‘कायाकल्प’ (समग्र कायाकल्प) के लिए समय की कसौटी पर खरा उतरा बताया. उनके अनुसार, ये अभ्यास मार्गदर्शन में किए जाने पर पाचन स्वास्थ्य, चयापचय संतुलन और समग्र जीवन शक्ति को बढ़ाने में मदद करते हैं.

आधुनिक बीमारियों पर योग का प्रभाव

सत्र के दौरान मोटापा, टाइप 1 और टाइप 2 मधुमेह जैसी समकालीन जीवनशैली की चिंताओं को भी संबोधित किया गया. रामदेव ने इंसुलिन पर निर्भर रोगियों से संबंधित ऐतिहासिक और वर्तमान शोध का हवाला देते हुए बताया कि कैसे योग, ध्यान और एक व्यवस्थित दिनचर्या पारंपरिक चिकित्सा उपचार के साथ-साथ सहायक दृष्टिकोण के रूप में काम कर सकती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि ये अभ्यास चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं, बल्कि कल्याण के लिए पूरक उपकरण हैं.

वेलनेस क्षेत्र में अवसर और सुलभता

योग गुरु ने ध्यान के माध्यम से मानसिक स्पष्टता, तनाव प्रबंधन और भावनात्मक संतुलन पर भी प्रकाश डाला. इसके अलावा, उन्होंने वेलनेस क्षेत्र में उभरते रोजगार के अवसरों का भी जिक्र किया, जो प्रशिक्षित योग प्रशिक्षकों के लिए नए रास्ते खोल रहे हैं. अंत में, उन्होंने बताया कि पतंजलि के प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोग घर बैठे ही इन वेलनेस थेरेपी तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं, जिससे पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों को आम जनता के लिए अधिक सुलभ बनाया जा सके.

Disclaimer: This is a sponsored article. ABP Network Pvt. Ltd. and/or ABP Live does not in any manner whatsoever endorse/subscribe to the contents of this article and/or views expressed herein. Reader discretion is advised.

 

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‘सिर्फ कसरत नहीं, दैनिक अनुशासन है प्राणायाम’, पतंजलि वेलनेस सत्र में बोले बाबा रामदेव

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Pranayama Benefits: हाल ही में अपने फेसबुक चैनल पर एक लाइव इंटरेक्शन के दौरान, योग गुरु रामदेव बाबा ने शारीरिक संतुलन और मानसिक स्पष्टता बनाए रखने में प्राणायाम और केंद्रित श्वास की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की. हिमालय की तलहटी में स्थित ‘वेद लाइफ पतंजलि वेलनेस’ से प्रसारित इस सत्र में उन्होंने न केवल श्वास तकनीकों का प्रदर्शन किया, बल्कि अभ्यास के दौरान एकाग्रता के महत्व को भी रेखांकित किया.

रामदेव बाबा ने इस बात पर जोर दिया कि प्राणायाम केवल एक कभी-कभार की जाने वाली गतिविधि नहीं, बल्कि एक दैनिक अनुशासन होना चाहिए. लाइव प्रसारण के दौरान उन्होंने दर्शकों को मुद्रा (posture), श्वास की लय और जागरूकता के प्रति सचेत रहने के लिए प्रोत्साहित किया. उनके अनुसार, जब प्राणायाम को निरंतरता और फोकस के साथ किया जाता है, तभी यह सबसे प्रभावी होता है.

आधुनिक जीवन के दबावों के बीच, सचेत श्वास (conscious breathing) शरीर और मन को संरेखित करने और शांति बनाए रखने में सहायक होती है. उन्होंने साधकों को सलाह दी कि वे प्राणायाम को धैर्यपूर्वक अपनाएं और शरीर को धीरे-धीरे इसके अनुकूल होने दें. इस दौरान स्थिरता बनाए रखना और विकर्षणों से दूर रहना अनिवार्य है.

हिमालयी परंपरा से जुड़ाव

रामदेव बाबा ने अपनी चर्चा में ‘देवभूमि’ के रूप में विख्यात हिमालयी क्षेत्र से मिलने वाली प्रेरणा का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि ‘वेद लाइफ पतंजलि वेलनेस’ एक ऐसा स्थान है जहां योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और सनातन जीवन पद्धति के सिद्धांतों का एक साथ अभ्यास किया जाता है. उनके अनुसार, यह क्षेत्र आत्म-चिंतन और अनुशासित जीवन के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान करता है, जहां पारंपरिक ज्ञान को केवल वैचारिक रूप से पढ़ने के बजाय व्यावहारिक रूप से अनुभव किया जा सकता है.

परंपरा का दैनिक जीवन में एकीकरण

सत्र के अंत में, रामदेव बाबा ने दर्शकों से आग्रह किया कि वे दुनिया में कहीं भी हों, योगिक प्रथाओं को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाएं. उन्होंने दोहराया कि यदि एकाग्रता के साथ किया जाए, तो प्राणायाम कल्याण बनाए रखने का एक सरल लेकिन प्रभावी साधन है. यह न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, बल्कि भारत की प्राचीन कल्याण परंपराओं से जुड़े रहने का एक सशक्त तरीका भी है.

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