30 की उम्र में भूलने लगे हैं छोटी-छोटी बातें, कहीं आपके दिमाग पर ‘ब्रेन फॉग’ तो नहीं छा रहा?

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Why Do I Feel Mentally Slow In My 30s: तीस की उम्र में याददाश्त कम होना आम बात नहीं है.  लेकिन कई लोग एक अलग तरह की परेशानी महसूस कर रहे हैं जैसे कि दिमाग में धुंध-सा छाया रहना, सोचने की रफ्तार धीमी पड़ जाना, मीटिंग में ध्यान न टिक पाना, या बात करते-करते साधारण शब्द भूल जाना. जो काम पहले आसानी से हो जाते थे, अब बोझ जैसे लगते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि यह किन कारणों के चलते हो रहा है और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है. 

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?

न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विवेक कुमार ने TOI को बताया कि यह डिमेंशिया नहीं, बल्कि ‘ब्रेन फॉग’ है. इसमें मेंटल थकान, उलझन और एकाग्रता में कमी की दिक्कत का सामना करना पड़ता है.  एक्सपर्ट के अनुसार,  लगातार तनाव, नींद की कमी, पोषण की कमी, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और कुछ मामलों में कोविड के बाद की रिकवरी इसकी बड़ी वजहें हैं. यानी दिमाग जवाब नहीं दे रहा, वह संकेत दे रहा है कि उसे संभालने की जरूरत है.

क्या यह कोई बीमारी है?

ब्रेन फॉग कोई आधिकारिक बीमारी नहीं, बल्कि लक्षणों का मेल है जिसमें मानसिक सुस्ती, छोटी-छोटी बातें भूलना, मल्टीटास्किंग में दिक्कत और दोपहर तक थकावट शामिल होती है. दिमाग शरीर की लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा इस्तेमाल करता है. जब नींद अधूरी हो, तनाव ज्यादा हो या पोषण कम मिले, तो सबसे पहले सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है. ब्रेन बंद नहीं होता, बस लो पावर मोड में चला जाता है.

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?

तीस की उम्र बॉयोलॉजिकल रूप से मेंटल क्षमता का अच्छा दौर माना जाता है, लेकिन लाइफस्टाइल बदल चुकी है. काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां, बच्चों की परवरिश, सोशल मीडिया की तुलना और लगातार डिजिटल एक्सपोजर तनाव बढ़ाते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन बताते हैं कि लंबी कार्य अवधि और कम नींद ध्यान और वर्किंग मेमोरी को कमजोर करती है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, एक तिहाई एडल्ट पर्याप्त नींद नहीं ले पाते, जबकि नींद के दौरान ही दिमाग खुद को रिपेयर करता है.

आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

पोषक तत्वों की कमी भी अहम कारण हो सकती है. विटामिन B12, विटामिन D3 और आयरन की कमी से एकाग्रता और एनर्जी घटती है. इसके साथ में थकान, झुनझुनी, बाल झड़ना या पीली त्वचा जैसे संकेत मिलें तो ब्लड टेस्ट कराना जरूरी है. नींद, नियमित व्यायाम और पानी की पर्याप्त मात्रा, ये तीन चीजें अक्सर नजरअंदाज होती हैं. रोज 30 मिनट हल्का-फुल्का एक्सराइज ब्लड फ्लो बढ़ाता है और ध्यान सुधारता है. हल्का डिहाइड्रेशन भी फोकस बिगाड़ सकता है. संतुलित आहार और स्क्रीन से दूरी भी मददगार है. अगर भूलने की समस्या रोजमर्रा के काम या नौकरी को प्रभावित करे, या अचानक भ्रम, तेज सिरदर्द, बोलने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपकी भी पेशाब की धार हो गई है कमजोर, जानें ये किस बीमारी के संकेत?

क्या आपकी भी पेशाब की धार हो गई है कमजोर, जानें ये किस बीमारी के संकेत?


What Causes Weak Urine Flow In Men: यूरिन करने में देरी होना, धार का कमजोर पड़ जाना या बूंद-बूंद करके पेशाब आना एक सामान्य समस्या नहीं मानी जाती. मेडिकल भाषा में इस स्थिति को यूरिनरी हेजिटेंसी कहा जाता है. इसमें व्यक्ति को पेशाब शुरू करने में समय लगता है और कई बार यूरिन का फ्लो भी बहुत धीमा हो जाता है. यह परेशानी किसी भी उम्र के लोगों में हो सकती है, लेकिन बढ़ती उम्र के पुरुषों में इसके मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं. 

हो सकती है दिक्कत

अक्सर यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ती है. शुरुआत में लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन समय के साथ स्थिति गंभीर हो सकती है. अगर इसका इलाज न कराया जाए तो कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि व्यक्ति यूरिन ही न कर पाए. इस स्थिति को यूरिन रिटेंशन कहा जाता है और इसमें तुरंत इलाज की जरूरत पड़ सकती है. कई लोग कमजोर पेशाब की धार को केवल प्रोस्टेट से जुड़ी समस्या मानते हैं. दरअसल, उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों में प्रोस्टेट का आकार बढ़ सकता है, जिससे पेशाब की धार कमजोर हो जाती है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था Advancedurologyinstitute के अनुसार इसके पीछे और भी कई कारण हो सकते हैं, इसलिए सही वजह जानना जरूरी होता है.

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बढ़ा हुआ प्रोस्टेट

पुरुषों में कमजोर पेशाब की धार का सबसे आम कारण बेनाइन प्रोस्टेट हाइपरप्लासिया  होता है. इसमें प्रोस्टेट ग्लैंड सामान्य से बड़ी हो जाती है. चूंकि यह ग्लैंड यूरीथ्रा के पास होती है, इसलिए इसके बढ़ने पर यूरिन का रास्ता दब सकता है. इससे पेशाब धीरे-धीरे आता है या फ्लो कमजोर हो जाता है. 45 साल से अधिक उम्र के पुरुषों में यह समस्या अधिक देखी जाती है.

अंडरएक्टिव ब्लैडर

कुछ लोगों में मूत्राशय यानी ब्लैडर ठीक तरह से काम नहीं कर पाता. इस स्थिति को अंडरएक्टिव ब्लैडर कहा जाता है. इसमें ब्लैडर पूरी तरह सिकुड़ नहीं पाता, जिससे यूरिन पूरी तरह बाहर नहीं निकलता. मरीज को कई बार यह महसूस ही नहीं होता कि ब्लैडर पूरी तरह भर चुका है. यह समस्या नसों से जुड़ी दिक्कत, डायबिटीज, न्यूरोलॉजिकल बीमारी या रीढ़ की हड्डी से जुड़ी चोट के कारण भी हो सकती है.

ब्लैडर आउटलेट में रुकावट

कभी-कभी यूरीथ्रा के मुहाने या नीचे के हिस्से में किसी तरह की रुकावट बन जाती है. इस स्थिति को ब्लैडर आउटलेट ऑब्स्ट्रक्शन कहा जाता है. इसके कारण यूरिन का रास्ता आंशिक या पूरी तरह से बाधित हो सकता है. यह समस्या ब्लैडर स्टोन, यूरीथ्रा में दाग या ब्लैडर कैंसर जैसी स्थितियों के कारण भी हो सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गर्मी शुरू होते ही खाना शुरू कर दीजिए कच्चा प्याज, मिलते हैं गजब के फायदे

गर्मी शुरू होते ही खाना शुरू कर दीजिए कच्चा प्याज, मिलते हैं गजब के फायदे


Benefits Of Eating Raw Onion In Summer: गर्मी का मौसम आते ही तेज धूप और बढ़ता तापमान सेहत पर असर डालने लगता है. ऐसे में लोग ऐसी चीजों की तलाश करते हैं जो शरीर को ठंडा रखने में मदद करें. आमतौर पर माना जाता है कि कच्चा प्याज गर्मियों में लू से बचाव करने और शरीर को ठंडक देने में मदद कर सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि अगर आप गर्मी के मौसम में इसका सेवन करते हैं, तो आपको इससे क्या- क्या फायदा मिलता है.. 

कच्चा प्याज क्यों फायदेमंद माना जाता है

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली  metropolisindia की रिपोर्ट के अनुसार,  कच्चा प्याज कई जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें विटामिन C पाया जाता है, जो शरीर की इम्यूनिटी को मजबूत करने के साथ-साथ त्वचा के लिए भी फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि यह कोलेजन बनने की प्रक्रिया में मदद करता है. इसके अलावा इसमें फोलेट मौजूद होता है, जो सेल्स के निर्माण और डीएनए के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. प्याज में पोटैशियम भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो नसों के काम और ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करता है. साथ ही इसमें मौजूद फाइबर डाइजेशन सिस्टम को बेहतर बनाने में सहायक होता है. प्याज में क्वेरसेटिन जैसे एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं, जो सूजन को कम करने और हार्ट की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं.

क्यों खाना चाहिए कच्चा प्याज?

कच्चे प्याज में पानी की मात्रा अच्छी होती है, जिससे गर्म मौसम में शरीर को हाइड्रेट रहने में मदद मिलती है. यह शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है और डिहाइड्रेशन की समस्या से बचाव कर सकता है. इसके साथ ही इसमें कच्चा प्याज अपने कूलिंग प्रभाव के लिए जाना जाता है. इसे खाने से शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद मिलती है. यह पसीना आने की प्रक्रिया को भी बढ़ावा देता है, जिससे शरीर स्वाभाविक रूप से ठंडा रहता है. इसलिए गर्मियों में इसे सलाद या खाने के साथ साइड डिश के रूप में खाना फायदेमंद माना जाता है.

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इम्यूनिटी और डाइजेशन को बनाता है मजबूत

कच्चे प्याज में मौजूद विटामिन C और क्वेरसेटिन जैसे एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं. ये शरीर की सेल्स को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं और इंफेक्शन के खतरे को कम करने में सहायक हो सकते हैं. कच्चे प्याज में मौजूद फाइबर पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है. इससे कब्ज जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है और आंतों की काम करने का तरीका बेहतर बनी रहती है. इसके अलावा प्याज में पाए जाने वाले कुछ एंजाइम वसा को तोड़ने में भी मदद करते हैं, जिससे खाना आसानी से पच जाता है.

ब्लड शुगर को करता है कंट्रोल

कच्चे प्याज में प्राकृतिक मिठास होती है, लेकिन इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है. इसमें मौजूद कुछ तत्व ब्लड शुगर लेवल को संतुलित रखने में मदद कर सकते हैं. इसलिए डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए भी इसे सीमित मात्रा में डाइट में शामिल करना फायदेमंद माना जाता है.

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क्या मोमोज-चाप खाने से हो जाती है मौत, एक्सपर्ट्स से जानें ये कितने खतरनाक?

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Can Eating Momos Cause Choking Death: पंजाब के तरनतारन शहर में एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां संदिग्ध परिस्थितियों में दो सगे भाई-बहनों की मौत हो गई. बताया जा रहा है कि शनिवार शाम सड़क किनारे एक रेहड़ी से खाना खाने के बाद रात में उनकी तबीयत बिगड़ गई थी. रविवार सुबह जब माता-पिता उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे तो डॉक्टरों ने दोनों बच्चों को मृत घोषित कर दिया.

परिवार के अनुसार बच्चों ने शनिवार शाम को एक रेहड़ी वाले से मोमोज और चैंप खाए थे. खाना खाने के कुछ ही समय बाद दोनों को उल्टियां होने लगीं. शुरुआत में घर पर ही उल्टी रोकने की दवा दी गई, जिसके बाद वे सो गए. लेकिन रविवार सुबह जब काफी देर तक बच्चे नहीं जागे तो परिजन घबरा गए और उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि क्या मोमोज खाने से मौत भी हो सकती है.

क्या इससे मौत भी हो सकती है?

Dr. Chandril Chugh, US Trained Adult & Pediatric Neurologist ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करके बताया कि जो लोग मोमोज खाना खूब पसंद करते हैं, उन्हें इससे होने वाली 4 बीमारियों के बारे में पता होना चाहिए. उनके अनुसार इससे फैटी लिवर की दिक्कत होती है, क्योंकि सारा मैदा लिवर में जाता है और बाद में इस तरह की दिक्कत पैदा करता है. दूसरा यह ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का भी कारण बनता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो स्पाइसी चटनी हम इसके साथ खाते हैं, उसमें सोडियम पाई जाती है. वे आगे बताते हैं कि इसके चलते कैंसर की भी दिक्कत हो सकती है. चौथा सबसे बड़ा कारण हार्ट अटैक से होने वाली मौत का है. डॉ. चंद्रिल बताते हैं कि तेल के चलते हार्ट में ब्लॉकेज की समस्या होती है, जिसके चलते आज यंग लोगों में भी हार्ट अटैक से मौत की समस्या बढ़ रही है.

 

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मोमोज खाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

एम्स नई दिल्ली के एक्सपर्ट के अनुसार मोमोज खाते समय सावधानी बेहद जरूरी है. दरअसल, मोमोज की बनावट काफी मुलायम और फिसलन भरी होती है. अगर इन्हें ठीक से चबाए बिना ही निगल लिया जाए तो इनके गले में फंसने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे चोकिंग यानी सांस रुकने की स्थिति बन सकती है और गंभीर मामलों में जान का खतरा भी हो सकता है. यह चेतावनी उस घटना के बाद सामने आई थी, जब एक व्यक्ति मोमोज खाते समय अचानक दुकान पर ही गिर पड़ा था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि उसके विंडपाइप के मुहाने पर एक डंपलिंग यानी मोमो फंसा हुआ था. मेडिकल एक्सपर्ट ने माना कि उसकी मौत मोमो के कारण गला घुटने से हुई थी.

हो सकता है नुकसानदायक

एक और अहम बात यह है कि ज्यादातर मोमोज मैदा से बनाए जाते हैं. मैदा दरअसल अनाज का वह हिस्सा होता है जिसमें फाइबर नहीं के बराबर होता है. इसे मुलायम और सफेद बनाने के लिए कई बार रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है. कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसे रसायन लंबे समय तक अधिक मात्रा में सेवन करने पर शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. यह पैंक्रियास पर असर डाल सकते हैं और शरीर में इंसुलिन बनने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं.

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मर्दों के लिए खतरे की घंटी हैं 40 की उम्र के बाद ये 5 संकेत दिखना, बढ़ जाता है प्रोस्टेट

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Early Warning Signs Of Enlarged Prostate: पुरुषों के लिए प्रोस्टेट की सेहत हर उम्र में महत्वपूर्ण होती है, सिर्फ बुजुर्गों के लिए ही नहीं. खासकर 40 और 50 की उम्र पार कर चुके पुरुषों को अपने हेल्थ पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. परिवार के लोगों को भी उन्हें समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराने के लिए प्रेरित करना चाहिए. प्रोस्टेट से जुड़ी एक आम समस्या बीइंग प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (BPH) यानी प्रोस्टेट का बढ़ना है. इसके शुरुआती लक्षण अक्सर यूरिन से जुड़ी आदतों में बदलाव के रूप में दिखाई देते हैं, जिन्हें कई लोग बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन इन संकेतों को समय रहते पहचानना जरूरी है, क्योंकि जल्दी इलाज से स्थिति को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है.

प्रोस्टेट बढ़ने के 5 प्रमुख संकेत

यूरिन की धार कमजोर होना: अगर पेशाब की धार पहले की तुलना में कमजोर हो गई है या ब्लैडर खाली करने में ज्यादा समय लग रहा है, तो यह प्रोस्टेट बढ़ने का संकेत हो सकता है. यूरोलॉजिस्ट डॉ. संजय पांडे के अनुसार, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बढ़ा हुआ प्रोस्टेट यूरेथ्रा पर दबाव डालने लगता है, जिससे पेशाब का प्रवाह बाधित हो सकता है.

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पेशाब शुरू करने में दिक्कत: कई पुरुषों को वॉशरूम जाने पर पेशाब शुरू होने में समय लगता है. अक्सर इसे थकान या पानी की कमी समझ लिया जाता है, लेकिन यह भी BPH का लक्षण हो सकता है. लगातार ऐसी परेशानी होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

ब्लैडर पूरी तरह खाली न होने का एहसास: प्रोस्टेट बढ़ने पर व्यक्ति को बार-बार पेशाब जाने की इच्छा हो सकती है, क्योंकि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हो पाता. इससे रोजमर्रा की दिनचर्या और कामकाज भी प्रभावित हो सकता है. हावर्ड हेल्थ के एक रिसर्च के मुताबिक 60 साल से ज्यादा उम्र के 60 प्रतिशत लोग जो बीइंग प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया से प्रभावित हैं, उनको इस तरह की दिक्कत हो सकती है. 

रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना: अगर किसी व्यक्ति को रात में कई बार यूरिन के लिए उठना पड़ता है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. इससे नींद पूरी नहीं हो पाती और दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन या तनाव महसूस हो सकता है.

अचानक पेशाब लगना या टपकना: कभी-कभी अचानक यूरिन लगने की तेज इच्छा होती है और उसे रोकना मुश्किल हो जाता है. कुछ मामलों में यूरिन टपकने की समस्या भी हो सकती है, जो प्रोस्टेट बढ़ने का संकेत हो सकता है.

क्या प्रोस्टेट बढ़ना गंभीर समस्या है?

अगर इन संकेतों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए तो यह ब्लैडर डैमेज, यूरिन इंफेक्शन या किडनी से जुड़ी समस्याओं का कारण बन सकता है. भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लगभग आधे पुरुषों में प्रोस्टेट बढ़ने की समस्या देखी जाती है.

इलाज के विकल्प

आज के समय में प्रोस्टेट बढ़ने का इलाज पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है. शुरुआती लक्षणों में दवाइयों जैसे अल्फा-ब्लॉकर्स और 5-अल्फा रिडक्टेज इनहिबिटर्स से राहत मिल सकती है. इसके अलावा वॉटर वेपर थेरेपी जैसी आधुनिक तकनीक भी उपलब्ध है, जिसमें भाप की मदद से प्रोस्टेट के बढ़े हुए हिस्से को छोटा किया जाता है. यह प्रक्रिया बिना बड़े ऑपरेशन के की जाती है और रिकवरी भी अपेक्षाकृत जल्दी हो जाती है.

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तांबे या कांच, कौन-सी पानी की बोतल है आपकी सेहत की असली दोस्त?

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आज के समय में लोग अपनी सेहत और पर्यावरण दोनों का ख्याल रखने लगे हैं. ऐसे में प्लास्टिक की बोतलों का यूज धीरे-धीरे कम हो रहा है. लोग अब ऐसे ऑप्शन तलाश रहे हैं जो न सिर्फ सुरक्षित हों बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हों. इस दिशा में तांबे और कांच की पानी की बोतलें सबसे फेमस ऑप्शन बन चुके हैं, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कौन सी बोतल आपकी सेहत के लिए बेहतर है. तो आइए जानते हैं कि तांबे या कांच कौन सी पानी की बोतल आपकी सेहत की असली दोस्त है.
 
तांबे की बोतलें प्राचीन परंपरा और आधुनिक स्वास्थ्य

तांबे की बोतलों का यूज भारत में हजारों सालों से होता आया है. पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, तांबे की बोतल में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है. इसे पीने से पाचन बेहतर होता है, इम्यूनिटी बढ़ती है और ऑवर हेल्थ में सुधार होता है. तांबे में प्राकृतिक रूप से एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं. कई अध्ययन बताते हैं कि तांबे की सतह कुछ हानिकारक बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीवों को मार सकती है, जिससे पानी अधिक सुरक्षित बनता है. जब पानी को तांबे की बोतल में कुछ घंटों के लिए रखा जाता है, तो उसमें तांबे की हल्की मात्रा घुल सकती है. तांबा हमारे शरीर के लिए जरूरी मिनरल है, जो रेल ब्लड सेल्स के निर्माण, तंत्रिका तंत्र के स्वास्थ्य और इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी है, लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है. ज्यादा तांबे युक्त पानी पीने से पेट में तकलीफ, मतली या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. 

क्या कांच की बोतलें सुरक्षित ऑप्शन?

कांच की बोतलें पीने के पानी के लिए सबसे सुरक्षित ऑप्शन मानी जाती हैं. यह किसी भी तरह की रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करती और पानी के टेस्ट को प्रभावित नहीं करती हैं. कांच बिना छेद वाला और रासायनिक रूप से स्थिर होता है, इसलिए यह गंध, टेस्ट या दाग को अवशोषित नहीं करती, इसका मतलब है कि पानी हमेशा शुद्ध और ताजगी भरा रहेगा. इसके अलावा, कांच की बोतलें साफ करना आसान होती हैं और पर्यावरण के लिए भी बेहतर हैं, क्योंकि इन्हें कई बार यूज किया जा सकता है.

तांबे की बोतल से जुड़ी आम मिसकंसेप्शन

तांबे की बोतलों को लेकर कई मिथक हैं. जैसे कि यह सोचना कि तांबे में रखा पानी किसी भी बीमारी का इलाज कर सकता है. विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसे दावे का वैज्ञानिक समर्थन सीमित है. एक और गलत धारणा है कि पानी को हमेशा तांबे की बोतल में रखना चाहिए. विशेषज्ञों के अनुसार इसे सिर्फ कुछ घंटों या रात भर के लिए ही रखना चाहिए. इससे शरीर में तांबे की अधिकता नहीं होती और संभावित लाभ सुरक्षित रहते हैं.

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तांबे की बोतल के नुकसान

अगर तांबे की बोतल का सही तरीके से यूज न किया जाए तो स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है. ज्यादा तांबा युक्त पानी पीने से मतली, उल्टी, पेट दर्द या पाचन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं. इसके अलावा, अम्लीय पेय जैसे नींबू पानी, फलों का रस या सिरका तांबे की बोतल में नहीं रखना चाहिए. ये पेय तांबे के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं और पानी में धातु की मात्रा बढ़ा सकते हैं.   विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि तांबे की बोतल को नियमित रूप से साफ करना जरूरी है, ताकि उसमें जमा अवशेष या ऑक्सीकरण से बचा जा सके. 

तांबे या कांच कौन सी पानी की बोतल सेहत के लिए सही?

तांबे की बोतल में हल्के एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं और यह शरीर को जरूरी मिनरल भी देती है. इसका सही यूज और संतुलन के साथ यह फायदेमंद हो सकती है. वहीं कांच की बोतल पूरी तरह सुरक्षित, तटस्थ और पर्यावरण के अनुकूल ऑप्शन है. इसमें पानी का टेस्ट, गंध और क्वालिटी हमेशा बरकरार रहती है.ऐसे में रोजाना यूज के लिए ज्यादातर स्वास्थ्य विशेषज्ञ कांच की बोतलों को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं. तांबे की बोतल का यूज कभी-कभी, कुछ घंटों के लिए किया जा सकता है, बशर्ते इसे सही तरीके से साफ किया जाए और अम्लीय पेय में न यूज किया जाए. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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