कब जानलेवा हो जाती है ‘लव बाइट’, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी?

कब जानलेवा हो जाती है ‘लव बाइट’, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी?


खून का थक्का (Blood Clot): गर्दन की नसें बहुत sensitive होती हैं, जब पार्टनर बहुत जोर से ‘सक’ (Suck) करता है, तो त्वचा के नीचे की नसों में खून का थक्का जम सकता है, अगर यह थक्का खून के बहाव के साथ दिमाग तक पहुंच जाए, तो यह बल्ड फ्लो को रोक सकता है, जो जानलेवा साबित होता है.

इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic Stroke) का खतरा:  ऐसे कई मामले देखें जा चुके हैं जहां लव बाइट के कारण व्यक्ति को स्ट्रोक आया. दरअसल, गर्दन की 'कैरोटिड आर्टरी' पर ज्यादा दबाव पड़ने से वह ब्लॉक हो सकती है, जिससे दिमाग को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है और व्यक्ति को अचानक स्ट्रोक आ सकता है.

इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic Stroke) का खतरा: ऐसे कई मामले देखें जा चुके हैं जहां लव बाइट के कारण व्यक्ति को स्ट्रोक आया. दरअसल, गर्दन की ‘कैरोटिड आर्टरी’ पर ज्यादा दबाव पड़ने से वह ब्लॉक हो सकती है, जिससे दिमाग को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है और व्यक्ति को अचानक स्ट्रोक आ सकता है.

Published at : 10 Apr 2026 09:21 AM (IST)

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सिगरेट और गांजा पीने वालों का सिकुड़ रहा दिमाग, नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

सिगरेट और गांजा पीने वालों का सिकुड़ रहा दिमाग, नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा


Smoking kills: आज के समय में ड्रग यूज जैसे गांजा (वीड) और तम्बाकू, Gen-Z और Millenials के बीच काफी आम हो गए हैं. ये सोसाइटी में इस तरह normalize कर दिए गए हैं कि ये अब कल्चर का हिस्सा बनते जा रहे हैं. इसमें यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि ये न्यूरोएक्टिव ड्रग्स हमारे दिमाग पर क्या असर डालते हैं और लंबे समय तक इसका इस्तेमाल करने से क्या दिक्कतें आती हैं. हाल ही में Addiction द्वारा पब्लिश की गई रिसर्च में चौंकाने वाला सच सामने आया है, जिसमें स्मोकिंग की वजह से दिमाग में सिकुड़न जैसी गंभीर समस्याएं देखी गई हैं, जो आज के युवाओं ही नहीं बल्कि हर पीढ़ी के लिए खतरे की घंटी है.

गांजा और तम्बाकू उपयोग के पैटर्न

गांजा का कंजम्पशन दिन प्रतिदिन बढता जा रहा है. 2022 के डेटा के अनुसार लगभग 23 करोड लोग इसका सालाना सेवन कर रहे थे, जो दुनिया की कुल आबादी का 4.4 प्रतिशत था.
तंबाकू का इस्तेमाल इससे भी कहीं ज्यादा होता है. 2020 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की लगभग 30 प्रतिशत आबादी इसका सेवन करती है, और यह हर साल करीब 80 लाख मौतों का कारण बनता है. इसके अधिक सेवन से गरीब वर्ग के लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं.

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रिसर्च में क्या खुलासे हुए?

इस स्टडी में (Cross sectional, Longitudinal, MR) जैसे तरीकों को देखकर यह पाया गया कि गांजा और सिगरेट के दिमाग पर असर को लेकर रिसर्च अभी सीमित है. कई स्टडीज में डेटा संतुलित नहीं था. जैसे गांजे के लिए पुरुषों के सैंपल ज्यादा थे, जबकि तंबाकू में महिलाओं के सैंपल ज्यादा थे. फिर भी, जितना डेटा उपलब्ध है, उसके आधार पर कुछ चिंताजनक नतीजे सामने आए हैं:

  • कुछ मामलों में गांजा से दिमाग के एक हिस्से (अमिगडाला) का साइज छोटा पाया गया, लेकिन हर उम्र में ऐसा असर नहीं दिखा.
  • तम्बाकू यूजर्स में दिमाग के कई हिस्सों का साइज छोटा दिखा, खासकर ग्रे मैटर. 
  • तम्बाकू से सूजन और नुकसान बढ़ सकता है, जबकि गांजा में मौजूद सीबीडी थोड़ा बचाव कर सकता है.
  • दोनों को साथ लेने पर अभी बहुत कम रिसर्च है और कोई साफ नतीजा नहीं मिला है.

रिसर्च का निष्कर्ष

यह पहली ऐसी स्टडी है जिसमें गांजा और तम्बाकू के असर को दिमाग के साइज से जोड़ा गया है. इसमें पाया गया कि तम्बाकू यूज से दिमाग के उन हिस्सों में कमी देखी गई जो मेमोरी और इमोशन से जुड़े होते हैं, जबकि गांजा के लिए सबूत उतने साफ नहीं थे.
तम्बाकू के नतीजे ज्यादा भरोसेमंद रहे, लेकिन कुछ और कारण भी हो सकते हैं. यह रिसर्च बताती है कि दोनों के साथ इस्तेमाल पर और रिसर्च की जरूरत है और इनके नुकसान को लेकर जागरूकता जरूरी है.

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80% मरीज ‘लो-रिस्क’ थे, फिर भी आया हार्ट अटैक! जानें क्यों फेल हो रहे विदेशी मेडिकल फॉर्मूले?

80% मरीज ‘लो-रिस्क’ थे, फिर भी आया हार्ट अटैक! जानें क्यों फेल हो रहे विदेशी मेडिकल फॉर्मूले?


Why Heart Attacks Are Rising In Indians: दिल का दौरा हमेशा उन लोगों को ही आए, जिनमें पहले से साफ चेतावनी संकेत हों कि यह धारणा अब बदलती नजर आ रही है. हाल ही में एक भारतीय अध्ययन ने दिखाया है कि कई ऐसे मरीज भी हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें पहले लो-रिस्क माना गया था. दिल्ली के जीबी पंत  में डॉ. मोहित दयाल गुप्ता के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में 5,000 से अधिक मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों को पहली बार हार्ट अटैक आया, उनमें से करीब 80 प्रतिशत को पहले से हाई-रिस्क कैटेगरी में नहीं रखा गया था. 

भारतीय में जोखिम की पहचान नहीं हुई

आमतौर पर डॉक्टर जिन ग्लोबल रिस्क कैलकुलेटर्स का इस्तेमाल करते हैं, वे यह तय करने में मदद करते हैं कि किसे इलाज या दवा की जरूरत है. लेकिन इस स्टडी में सामने आया कि ये मॉडल भारतीय मरीजों के जोखिम को सही तरीके से नहीं पहचान पा रहे हैं. अलग-अलग मॉडल्स के अनुसार सिर्फ 11 प्रतिशत से 20 प्रतिशत मरीजों को ही हाई-रिस्क बताया गया, जबकि सभी को बाद में हार्ट अटैक हुआ.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. गुप्ता के मुताबिक, भारतीय मरीजों का पैटर्न पश्चिमी देशों से अलग है. वहां दिल की बीमारी आमतौर पर ज्यादा उम्र में होती है, जबकि भारत में यह कम उम्र में ही देखने को मिल रही है. स्टडी में मरीजों की औसत उम्र सिर्फ 54 साल पाई गई, जो इस बात का संकेत है कि हार्ट डिजीज अब पहले से ज्यादा जल्दी असर डाल रही है. रिसर्च में यह भी सामने आया कि भारतीयों में एक खास साउथ एशियन फेनोटाइप देखा जाता है. इसमें सामान्य वजन होने के बावजूद डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस का खतरा रहता है. इसके अलावा कोलेस्ट्रॉल का पैटर्न भी अलग होता है HDL कम और ट्राइग्लिसराइड्स ज्यादा, जबकि LDL हमेशा ज्यादा नहीं होता.

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इन चीजों से भी बढ़ता है खतरा

कई लोगों में पेट के आसपास छिपी हुई चर्बी होती है, जो BMI से पकड़ में नहीं आती. इसके साथ ही स्मोकिंग, मानसिक तनाव और अन्य पारंपरिक जोखिम कारक भी मिलकर खतरे को बढ़ाते हैं. समस्या यह है कि ज्यादातर ग्लोबल मॉडल उम्र और LDL को ज्यादा महत्व देते हैं, जिससे युवा भारतीयों का जोखिम कम आंका जाता है. कई मरीज “इंटरमीडिएट रिस्क” कैटेगरी में चले जाते हैं, जहां इलाज अक्सर टल जाता है.

इसके अलावा, ये मॉडल कुछ अहम फैक्टर्स को शामिल ही नहीं करते, जैसे इंसुलिन रेसिस्टेंस, लिपोप्रोटीन(a), ApoB, सेंट्रल ओबेसिटी और क्रॉनिक किडनी डिजीज. यही वजह है कि असली खतरा छिपा रह जाता है और इलाज तब शुरू होता है, जब स्थिति गंभीर हो चुकी होती है.  इस स्टडी के बाद एक्सपर्ट्स  ने भारत के लिए अलग रिस्क कैलकुलेटर विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्यास लगने पर ही पीते हैं पानी? यह आदत आपकी किडनी को कर रही बीमार, जानें यूरोलॉजिस्ट की राय

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What Happens If You Don’t Drink Enough Water: हममें से ज्यादातर लोग पानी पीने को बहुत साधारण बात मानते हैं. प्यास लगी तो गिलास उठा लिया, नहीं लगी तो छोड़ दिया. लेकिन किडनी इतनी लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती. यही छोटे-से अंग खून को साफ करते हैं, शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालते हैं, इलेक्ट्रोलाइट संतुलित रखते हैं और तरल पदार्थों का स्तर कंट्रोल करते हैं. जब शरीर को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो किडनी को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. यह सिर्फ थकान की बात नहीं, बल्कि लंबे समय में पथरी, यूरिन इन्फेक्शन और क्रॉनिक किडनी डिजीज का खतरा बढ़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और हमें किस तरह की सावधानी रखने की जरूरत होती है. 

पानी को लेकर लोगों में क्या है गलतफहमी?

कई लोग मानते हैं कि दिनभर चाय, कॉफी या जूस पी लेना काफी है. जबकि कैफीन और शुगर वाले पेय शरीर से पानी तेजी से बाहर निकाल सकते हैं. एक और गलतफहमी है कि प्यास लगे तभी पानी पिएं. सच यह है कि जब प्यास लगती है, तब तक शरीर हल्का-सा डिहाइड्रेट हो चुका होता है और किडनी पर दबाव बढ़ चुका होता है. दूसरी तरफ कुछ लोग जरूरत से ज्यादा पानी पी लेते हैं, यह सोचकर कि ज्यादा पानी हमेशा फायदेमंद है. लेकिन बहुत कम समय में तीन से चार लीटर या उससे अधिक पानी पी लेना खतरनाक हो सकता है. इससे खून में सोडियम का स्तर गिर सकता है, जिसे हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है. गंभीर मामलों में यह दिमाग में सूजन, दौरे या कोमा तक की स्थिति पैदा कर सकता है.

क्या कहते हैं डॉक्टर?

यूरोलॉजिस्ट डॉ. अजय अग्रवाल ने TOI को बताया कि, किडनी को संतुलित मात्रा में पानी की जरूरत होती है. बहुत कम या बहुत ज्यादा, दोनों ही नुकसानदेह हैं. लगातार कम पानी पीने से पेशाब गाढ़ा हो जाता है, जिससे पथरी और इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है. वहीं डायबिटीज या हार्ट रोग से जूझ रहे लोगों में जरूरत से ज्यादा तरल लेने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.

कितना पानी किसको पीना चाहिए?

एक्सपर्ट  का कहना है कि 8 गिलास पानी वाला नियम हर किसी पर लागू नहीं होता. आम तौर पर महिलाओं को करीब 2.2 लीटर और पुरुषों को 3 लीटर तरल की जरूरत होती है, लेकिन यह मौसम, पसीना, व्यायाम और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। पेशाब का रंग अच्छा संकेत देता है, हल्का पीला रंग सही हाइड्रेशन दिखाता है, बहुत गहरा रंग पानी की कमी और बिल्कुल साफ रंग अधिक सेवन का संकेत हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गुड और बैड कोलेस्ट्रॉल का खेल, क्या आप जानते हैं असली जोखिम कहां है?

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Good vs Bad Cholestrol: खाने के शौकीन लोगों में अक्सर कोलेस्ट्रॉल की शिकायत देखी जाती है, जो उनकी अनहेल्दी फूड और अनियमित डाइट का नतीजा होती है. इन सब के बीच लोगों ने एक आसान सा निष्कर्ष निकाल लिया है, जिसमे कोलेस्ट्रॉल को दो हिस्सों में बांट दिया गया है- गुड और बैड. इसमें LDL को बैड और HDL को गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है. अपनी रिपोर्ट में HDL का नंबर देखकर लोग खुश हो जाते हैं, लेकिन क्या यह धारणा सच है या इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है? आइए जानते हैं.

कोलेस्ट्रॉल क्या है?

कोलेस्ट्रॉल एक वैक्स जैसा फैट होता है, जो हमारे शरीर में सेल, विटामिन D और हार्मोन बनाने में मदद करता है. हमारा लिवर शरीर की जरूरत के अनुसार कोलेस्ट्रॉल बनाता है, लेकिन हम खाने-पीने की चीजों के द्वारा भी इसे काफी मात्रा में लेते हैं. वैसे तो यह जरूरी होता है, लेकिन जब इसका स्तर बढ़ जाता है तो यह धमनियों (आर्टरी) की दीवारों में प्लाक जमा कर देता है, जिससे दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है.

क्या LDL वाकई बैड कोलेस्ट्रॉल है?

LDL को अक्सर दिल की बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन हर LDL एक जैसा नहीं होता, कुछ LDL कण बड़े और हल्के होते हैं, जबकि कुछ छोटे और घने होते हैं. छोटे और घने कण ही धमनियों में जाकर प्लाक बनने में ज्यादा भूमिका निभाते हैं. एशियन हॉस्पिटल के डॉ. दिवाकर कुमार के अनुसार, “हर LDL नुकसानदायक नहीं होता, सिर्फ LDL का एक नंबर पूरी तस्वीर नहीं बताता. दो लोगों में LDL का स्तर समान होकर भी उसका असर अलग-अलग हो सकता है.”

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क्या HDL सच में गुड कोलेस्ट्रॉल है?

HDL को आमतौर पर गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि यह खून से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को हटाने में मदद करता है, लेकिन इसका ज्यादा होना हमेशा सुरक्षित होने की गारंटी नहीं देता. डॉ. कुमार के अनुसार, “अगर HDL का स्तर बहुत ज्यादा है तो यह भी चिंता का कारण हो सकता है, खासकर जब लाइफस्टाइल सही न हो. डॉ. नेहा शाह के अनुसार, “यह सही है कि HDL शरीर की रक्षा करता है और LDL जोखिम बढ़ाता है, लेकिन सिर्फ इन नंबरों से पूरी सच्चाई नहीं पता चलती. जैसे- 44 HDL वाले दो लोगों में फर्क हो सकता है अगर उनके ट्राइग्लिसराइड्स अलग हों, एक में 90 और दूसरे में 210, नंबर वही है, लेकिन शरीर की स्थिति पे इसका प्रभाव अलग होता है. LDL में भी यही बात लागू होती है. रिपोर्ट में सिर्फ नंबर दिखता है, लेकिन असली फर्क इसके छोटे और घने कणों से पड़ता है, जो नसों को नुकसान पहुंचाते हैं.

कैसे बचें कोलेस्ट्रॉल के खतरे से?

कोलेस्ट्रॉल आपकी रोजमर्रा की आदतों से प्रभावित होता है. कम नींद, ज्यादा तनाव, स्मोकिंग और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आपको कोलेस्ट्रॉल के खतरे के करीब ला सकते हैं. इससे बचने के लिए नियमित एक्सरसाइज करना फायदेमंद होता है. इसके अलावा रोजाना संतुलित भोजन और हेल्दी डाइट लेना जरूरी है और तनाव कम करने के लिए योग या मेडिटेशन करना भी मददगार हो सकता है.

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सावधान! नॉर्मल नहीं होता सुबह आंखों में जमने वाला मैल, पीला या हरा रंग इस बीमारी का संकेत

सावधान! नॉर्मल नहीं होता सुबह आंखों में जमने वाला मैल, पीला या हरा रंग इस बीमारी का संकेत


Why Do I Wake Up With Crusty Eyes: सुबह उठते ही अगर आंखों के कोनों में चिपचिपा या सूखा जमा हुआ पदार्थ नजर आए, तो इसे आमतौर पर आई क्रस्ट या आंखों की मैल कहा जाता है. यह कई बार सामान्य होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह किसी समस्या का संकेत भी हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब आपको सावधान होने की जरूरत होती है और कब यह नॉर्मल होता है. 

क्यों निकलता है यह?

 हेल्थ जानकारी देने वाली वेबसाइट MedlinePlus के अनुसार, आंखों में बनने वाला यह क्रस्ट असल में डिस्चार्ज होता है, जो सूखकर सख्त या चिपचिपा रूप ले लेता है. कुछ लोगों में यह पीले रंग का और कठोर होता है, जबकि कुछ में यह साफ, पतला या पानी जैसा भी हो सकता है. इसकी एक सामान्य वजह नींद भी होती है। जब हम सोते हैं, तो आंखें बंद रहती हैं और पलकें झपकती नहीं हैं. ऐसे में आंखों का प्राकृतिक डिस्चार्ज कोनों में जमा हो जाता है, जो सुबह उठने पर क्रस्ट के रूप में दिखाई देता है.

इसके अलावा, आंसू की नली में ब्लॉकेज भी इसका कारण बन सकता है. इस स्थिति को नासोलैक्रिमल डक्ट ऑब्स्ट्रक्शन कहा जाता है, जिसमें आंसू सही तरीके से निकल नहीं पाते. इससे आंखों में पानी आना, लालिमा और पीले-हरे रंग का चिपचिपा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है.

एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी वजह

एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी एक बड़ी वजह है.  धूल, पालतू जानवरों के बाल या फफूंद जैसे एलर्जन के संपर्क में आने से आंखों में खुजली, पानी आना और सूजन हो सकती है. कई मामलों में इसके साथ हल्का क्रस्ट भी बनता है. ड्राई आई की समस्या में भी आंखों के आसपास म्यूकस जैसा जमा दिखाई दे सकता है. इसमें आंखों में जलन, चुभन, लालिमा और धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण शामिल होते हैं.

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वहीं, बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस में आंखों से ज्यादा मात्रा में डिस्चार्ज निकलता है, जो गाढ़ा और पीले या हरे रंग का हो सकता है. इसके साथ दर्द, खुजली और रोशनी से परेशानी भी हो सकती है. एक और स्थिति ब्लेफराइटिस है, जिसमें पलकों के किनारों पर सूजन और जलन होती है। इससे पलकें चिपचिपी हो जाती हैं और उन पर पपड़ी जमने लगती है. 

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?

कुछ कम मामलों में केराटाइटिस या आंख की कॉर्निया से जुड़ी समस्या और स्टाई (फुंसी) भी इसकी वजह हो सकती है. इन स्थितियों में दर्द, सूजन और पस जैसा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है. डॉक्टर से कब मिलें, यह समझना जरूरी है. अगर आंखों में दर्द, ज्यादा सूजन, धुंधली नजर, रोशनी से परेशानी या गाढ़ा पीला-हरा डिस्चार्ज हो, तो आंखों के एक्सपर्ट से जांच करानी चाहिए. इलाज के तौर पर हल्के मामलों में घर पर ही देखभाल की जा सकती है, जैसे गुनगुने पानी से आंखों की सफाई करना या साफ कपड़े से पपड़ी हटाना, लेकिन अगर समस्या एलर्जी या इंफेक्शन से जुड़ी हो, तो डॉक्टर दवा या आई ड्रॉप्स भी दे सकते हैं. 

साफ- सफाई के दौरान क्या ध्यान रखना जरूरी?

साफ-सफाई का ध्यान रखना सबसे जरूरी है. नियमित रूप से हाथ धोना, आंखों को साफ रखना और जरूरत पड़ने पर लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करना इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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