30 की उम्र में क्यों बढ़ रहा है ब्रेन फॉग? डॉक्टर ने बताए इसके कारण और बचाव के तरीके
इजरायल-अमेरिका के हमले में खामेनेई की मौत, 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा, ईरानी मीडिया ने किया कंफर्म
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कई महिलाओं के लिए पीरियड्स का पहला दिन सबसे मुश्किल होता है. अचानक पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द शुरू हो जाता है. शरीर भारी-भारी लगता है, कमर में दर्द होता है, कभी जी मिचलाता है तो कभी दस्त भी लग सकते हैं. ऐसे में रोज के साधारण काम जैसे ऑफिस जाना, पढ़ाई करना या घर का काम भी बहुत कठिन लगने लगते हैं. लेकिन आपने शायद नोटिस किया होगा कि यह दर्द तीसरे या चौथे दिन तक धीरे-धीरे कम हो जाता है. तब तक ऐंठन सहने लायक हो जाती है और शरीर थोड़ा सामान्य महसूस करने लगता है. ऐसे में कई बार मन में सवाल आता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है क्यों पीरियड्स का पहला दिन सबसे ज्यादा दर्दनाक होता है और फिर आराम मिलने लगता है. तो आइए जानते हैं कि पीरियड्स पेन पहले दिन ज्यादा और बाद में कम होने की वजह क्या है.
पहले दिन दर्द इतना ज्यादा क्यों होता है?
दिल्ली के सीके बिरला अस्पताल में प्रसूति एवं स्त्रीरोग विभाग की निदेशक डॉ. कीर्ति खेतान और रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में वरिष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. साक्षी गोयल के अनुसार, इसका सीधा संबंध शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव और प्रोस्टाग्लैंडिन नामक रसायन से है. पीरियड्स के पहले दिन शरीर में प्रोस्टाग्लैंडिन नामक रसायन का स्तर सबसे ज्यादा होता है. यह रसायन यूट्रस को सिकुड़ने में मदद करता है, ताकि वह अपनी परत बाहर निकाल सके. जब प्रोस्टाग्लैंडिन ज्यादा मात्रा में बनता है, तो यूट्रस तेजी और जोर से सिकुड़ता है, जितने ज्यादा और तेज ऐंठन होगी,दर्द उतना ज्यादा महसूस होगा. पहले 24 से 48 घंटों में यूट्रस की ज्यादातर परत बाहर निकल जाती है. इसके बाद प्रोस्टाग्लैंडिन का स्तर कम होने लगता है. इसलिए तीसरे-चौथे दिन तक दर्द भी कम हो जाता है.
यूट्रस में ऑक्सीजन की कमी से बढ़ता है दर्द
जब यूट्रस बार-बार और जोर से सिकुड़ता है, तो आसपास की ब्लड वेसल्स थोड़ी देर के लिए दब जाती हैं. इससे यूट्रस की मांसपेशियों तक खून और ऑक्सीजन कम पहुंचती है. जब किसी हिस्से को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो वहां तेज और ऐंठन जैसा दर्द होता है.इसी वजह से पहले दिन का दर्द धड़कन जैसा या बहुत तीखा महसूस हो सकता है. जैसे-जैसे ऐंठन कम होते हैं, खून का प्रवाह सामान्य होने लगता है और दर्द घट जाता है.
ज्यादा ब्लीडिंग मतलब ज्यादा ऐंठन
आमतौर पर पीरियड्स के पहले और दूसरे दिन ब्लीडिंग सबसे ज्यादा होती है. जब ज्यादा मात्रा में खून और ऊतक बाहर निकालने होते हैं, तो यूट्रस को ज्यादा ताकत लगानी पड़ती है. चौथे दिन तक ब्लीडिंग कम हो जाती है. जब निकालने के लिए ज्यादा परत नहीं बचती, तो यूट्रस को उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती, इससे आराम मिलता है.कम उम्र की लड़कियों में सर्विक्स का छिद्र थोड़ा संकरा हो सकता है. जब खून इस छोटे रास्ते से बाहर निकलता है, तो पहले एक-दो दिन दबाव ज्यादा महसूस हो सकता है. जैसे-जैसे फ्लो कम होता है, यह दबाव भी कम हो जाता है और दर्द घटने लगता है.
कब समझें कि दर्द सामान्य नहीं है?
हल्का या मध्यम दर्द आम बात है,लेकिन अगर दर्द बहुत ज्यादा हो, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डॉक्टर से सलाह लें. अगर दर्द इतना तेज हो कि उल्टी या बेहोशी होने लगे, हर साल दर्द बढ़ता जा रहा हो, बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो, दर्द निवारक दवा से भी आराम न मिले या पीरियड्स के बीच में भी दर्द होता हो. ऐसे मामलों में एंडोमेट्रियोसिस, एडिनोमायोसिस या फाइब्रॉएड जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जिनका इलाज जरूरी होता है.
पहले दिन के दर्द से राहत कैसे पाएं?
अगर आपको पता है कि पहले दिन दर्द ज्यादा होगा, तो पहले से तैयारी करना मददगार हो सकता है. पेट के निचले हिस्से पर हीटिंग पैड रखें, डॉक्टर की बताई गई दर्द निवारक दवा समय पर लें, हल्की स्ट्रेचिंग या धीमी वॉक करें, खूब पानी पिएं और अपने पीरियड्स का कैलेंडर बनाए रखें. तनाव, नींद की कमी और खराब खानपान से दर्द और बढ़ सकता है. इसलिए बैलेंस डाइट और स्वस्थ लाइफस्टाइल अपनाना भी जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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अगले सप्ताह होली 3 और 4 मार्च को मनाई जाएगी. वहीं होली का त्योहार शुरू आते ही रंग, मस्ती और फोटो खिंचवाने की तैयारी शुरू हो जाती है. कई लोग होली पर बलम पिचकारी जैसे मोमेंट्स को रिक्रिएट करने के लिए एक्साइटेड रहते हैं. लेकिन अक्सर रंगों का यह उत्साह बाद में स्किन प्रॉब्लम में बदल जाता है. रैशेज, पिंपल्स, जलन, और जिद्दी दाग-धब्बे कई लोगों को होली के बाद परेशान करते हैं. डर्मेलॉजिस्ट्स का कहना है कि असली समस्या सिर्फ रंग नहीं होते, बल्कि यह भी जरूरी है कि स्किन को पहले कैसे तैयार किया गया और बाद में उसकी देखभाल कैसे की गई. अगर प्री केयर और पोस्ट केयर सही तरीके से की जाए तो स्किन को काफी हद तक नुकसान से बचाया जा सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं प्री और पोस्ट होली के 12 जरूरी टिप्स.
होली से पहले अपनाएं ये जरूरी टिप्स
होली से कम से कम पांच से सात दिन पहले केमिकल पीलिंग, लेजर, ट्रीटमेंट, वैक्सिंग, थ्रेडिंग या ज्यादा एक्सफोलिएशन कराने से बचें. इन प्रक्रियाओं से स्किन की सुरक्षात्मक लेयर अस्थायी रूप से कमजोर हो जाती है, जिससे यह जलन, खुजली और सूजन के बाद होने वाले हाइपरपिगमेंटेशन के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाती है.
ज्यादातर लोग होली के समय लिप्स, कान और गर्दन पर ध्यान नहीं देते हैं. जबकि शरीर के इन्हीं हिस्सों में जल्दी ड्राइनेस और दाग होते हैं. ऐसे में एसपीएफ वाला लिप बाम लगाएं और हल्का मॉइस्चराइजर इन हिस्सों पर भी जरूर लगाएं. वहीं होली खेलने से पहले अपने नाखून काट लें और साफ नेल पॉलिश लगा लें, क्योंकि नाखून कई दिनों तक रंग को सोख सकते हैं.
होली के समय कई लोग मानते हैं कि हर्बल या ऑर्गेनिक रंग पूरी तरह से सुरक्षित होते हैं. लेकिन ऑर्गेनिक या हर्बल कहे जाने वाले रंग भी कुछ लोगों में एलर्जी कर सकते हैं. ऐसे में होली से पहले हाथ की अंदरूनी तरफ थोड़ा रंग लगाकर पैच टेस्ट कर लें.
अगर आपने एक्जिमा, रोसेसिया, फंगल इन्फेक्शन या हाल में स्किन ट्रीटमेंट लिया हो तो रंगों दूरी बनाए रखें. पहले से स्किन प्रॉब्लम होने पर कोशिश करें कि आप सूखे रंग से होली खेलें, धूप में कम समय बिताएं और तुरंत चेहरा साफ करें.
रंग खेलने से 30 से 60 मिनट पहले चेहरे, गर्दन, हाथ-पैर पर नारियल, बादाम या तिल का तेल अच्छी तरह लगा लें. इससे स्किन पर एक लेयर बनती है और रंग अंदर तक नहीं घुसता है.
होली के बाद अपनाएं ये जरूरी टिप्स
होली खेलने के बाद पहले गुनगुने पानी में तेल डालकर नहाएं. वहीं ज्यादा गर्म पानी से नहाने या स्किन को जोर से रगड़ने से बचें, क्योंकि इससे फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है. स्किन पर हल्के सल्फेट- फ्री क्लींजर का प्रयोग करें और उसके बाद तुरंत आराम पाने के लिए एलोवेरा जेल लगाएं.
नहाने के तुरंत बाद फ्रेगरेंस-फ्री मॉइस्चराइजर या सेरामाइड वाली क्रीम लगाएं. जरूरत हो तो रात में भी दोबारा लगाएं.
स्किन पर एलोवेरा जेल या गुलाब जल लगाने से आराम मिलता है. इसके अलावा स्किन से रेडनेस कम करने के लिए मुल्तानी मिट्टी या दही-शहद का हल्का पैक भी भी आप लगा सकते हैं.
होली खेलने के बाद कलर की वजह से अगर स्किन पर लगातार खुजली, छाले या पानी निकलने जैसी समस्या हो तो देर न करें और डॉक्टर को चेक कराएं.
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भारत में महिलाओं के बीच ब्रेस्ट कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. हाल ही में सामने आया आंकड़ों के अनुसार हर साल करीब 6 प्रतिशत की दर से नए केस सामने आ रहे हैं. यह खुलासा इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च से जुड़ी एक स्टडी में हुआ है. वहीं इसे लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ उम्र या पारिवारिक हिस्ट्री की वजह से ही नहीं बल्कि खराब लाइफस्टाइल भी महिलाओं में बढ़ते ब्रेस्ट कैंसर की बड़ी वजह मानी जा रही है. डॉक्टरों के अनुसार कम नींद, लगातार तनाव और खासकर पेट के आसपास जमा चर्बी यानी सेंट्रल ओबेसिटी अब बड़े रिस्क फैक्टर के तौर पर सामने आ रहे है. वहीं चिंता की बात यह है कि अब 35 से 50 साल की महिलाओं में भी ब्रेस्ट कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.
कम नींद बढ़ा रही है खतरा
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि नींद की कमी शरीर की नेचुरल बायोलॉजिकल क्लॉक को बिगाड़ देती है. इससे मेलाटोनिन हार्मोन का लेवल प्रभावित होता है जो एस्ट्रोजन को कंट्रोल करने और शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने में मदद करता है. जब लंबे समय तक नींद पूरी नहीं होती तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ सकती है और असामान्य कोशिकाओं को खत्म करने की ताकत भी घटती जाती है. वहीं डॉक्टरों के अनुसार सिर्फ कम नींद जब मोटापा, तनाव और कम फिजिकल एक्टिविटी के साथ जुड़ती है तो खतरा और बढ़ जाता है.
पेट की चर्बी भी है खतरनाक
सिर्फ वजन बढ़ना ही नहीं बल्कि पेट के आसपास जमा चर्बी और ज्यादा खतरनाक मानी जा रही है. एक्सपर्ट्स के अनुसार यह चर्बी शरीर में सूजन बढ़ाने वाले तत्व पैदा करती है, इन्सुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाती है और एस्ट्रोजन के स्तर को भी प्रभावित करती है. वहीं मेनोपॉज के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन का मुख्य सोर्स शरीर की चर्बी ही बन जाती है. ऐसे में पेट की चर्बी हार्मोन रिसेप्टर पॉजिटिव ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं. डॉक्टरों का कहना है की कमर का बढ़ता हिस्सा सिर्फ मोटापे का संकेत नहीं होता है, बल्कि मेटाबॉलिक तनाव और सूजन का भी यह संकेत होता है.
कम उम्र में बढ़ रहे केस
इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में पहले की तुलना में कम उम्र की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर ज्यादा देखा जा रहा है. इसके पीछे शहरी लाइफस्टाइल, देर से शादी या या मदरहुड, कम टाइम तक ब्रेस्टफीडिंग, नींद की कमी और मोटापा जैसी वजह मानी जा रही है. हालांकि उम्र और जेनेटिक कारण अभी भी इसके बड़े कारक है, लेकिन लाइफस्टाइल से जुड़े कारण अब तेजी से असर दिखा रहे हैं. वहीं डॉक्टरों का कहना है कि पूरी तरह डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर का खतरा पूरी तरह कम नहीं किया जा सकता है. लेकिन सही आदतों से इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है.इनमें नियमित और पर्याप्त नींद, स्ट्रेस को कंट्रोल करना, पेट की चर्बी कम करना, फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाना और संतुलित खानपान अपनाना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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भारत में दही लगभग हर घर की थाली का हिस्सा है. कोई इसे खाने के साथ लेता है, कोई रायता बनाकर तो कोई मीठा दही पसंद करता है. गर्मियों में दही को ठंडक देने वाला माना जाता है, तो वहीं सर्दियों में कुछ लोग इसे खाने से बचते हैं. इसी तरह दही को लेकर कई तरह की धारणाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं, जैसे दही खाने से सर्दी हो जाती है, रात में दही नहीं खाना चाहिए या फिर यह पेट के लिए भारी होता है.
इन सभी सवालों और भ्रमों पर अमेरिका के बोर्ड-प्रमाणित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट Dr. Palaniappan Manickam ने 27 फरवरी को अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने दही के फायदे, सही मात्रा, सही समय और इससे जुड़ी आम गलतफहमियों पर सरल शब्दों में सच बताया तो आइए दही से जुड़े 13 बड़े सवालों के आसान जवाब जानते हैं.
दही से जुड़ी 13 बड़ी गलतफहमियां
1. क्या दही सच में सेहत के लिए अच्छा है – दही सेहत के लिए फायदेमंद है. इसमें प्रोटीन, कैल्शियम और अच्छे बैक्टीरिया (प्रोबायोटिक्स) होते हैं. ये बैक्टीरिया हमारी आंत को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं और पाचन को बेहतर बनाते हैं. नियमित और सही मात्रा में दही खाने से शरीर को कई लाभ मिल सकते हैं.
2. क्या दही पाचन सुधारता है – अधिकतर लोगों के लिए दही पाचन में मदद करता है. इसमें मौजूद जीवित कल्चर आंत में अच्छे और बुरे बैक्टीरिया का संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं. इससे गैस, कब्ज या अपच जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं.
3. क्या दही खाने से खांसी और जुकाम होता है – यह एक आम धारणा है कि दही से सर्दी-खांसी होती है, लेकिन यह हर किसी के लिए सही नहीं है. ज्यादातर लोगों को दही खाने से सर्दी नहीं होती, अगर कोई व्यक्ति ठंडी चीजों के प्रति संवेदनशील है या पहले से जुकाम से परेशान है, तो उसे थोड़ी परेशानी महसूस हो सकती है.
4. क्या रात में दही खाना ठीक है – अगर किसी को दही रात में खाने से कोई दिक्कत नहीं होती, तो वह इसे खा सकता है. हालांकि, डॉक्टर की सलाह है कि रात का खाना बहुत देर से न खाएं. बेहतर है कि शाम 7 बजे के आसपास भोजन कर लिया जाए.
5. क्या दही दूध से बेहतर है – कई लोगों के लिए दही, दूध से ज्यादा आसानी से पच जाता है. दही में मौजूद बैक्टीरिया दूध के लैक्टोज को तोड़ने में मदद करते हैं, जिससे यह पेट पर हल्का पड़ता है. इसलिए पाचन के लिहाज से दही को दूध से बेहतर माना जा सकता है.
6. क्या दही से एसिडिटी होती है – सामान्य रूप से दही एसिडिटी को कम करने में मदद करता है. यह पेट को ठंडक देता है, लेकिन अगर दही बहुत ज्यादा खट्टा हो, तो कुछ लोगों में एसिडिटी बढ़ सकती है. इसलिए ताजा और हल्का दही खाना बेहतर है.
7. घर का दही बेहतर या पैकेट वाला – घर का बना दही आमतौर पर ज्यादा ताजा और कम मिलावट वाला होता है. इसमें अच्छे बैक्टीरिया ज्यादा एक्टिव रहते हैं. पैकेट वाला दही भी ठीक होता है, लेकिन घर का ताजा दही अक्सर ज्यादा फायदेमंद माना जाता है.
8. रोज कितना दही खाना चाहिए – एक सामान्य व्यक्ति के लिए रोजाना लगभग एक कप दही पर्याप्त है. ज्यादा मात्रा की जरूरत नहीं होती. संतुलित मात्रा में ही इसका लाभ मिलता है.
9. क्या डायबिटीज के मरीज दही खा सकते हैं – डायबिटीज के मरीज सादा, बिना चीनी वाला दही खा सकते हैं. इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ती, लेकिन मीठा या फ्लेवर्ड दही लेने से बचना चाहिए.
10. क्या दही से पेट फूलता है – ज्यादातर लोगों को दही से पेट नहीं फूलता, लेकिन जिन लोगों को लैक्टोज इनटॉलरेंस है, उन्हें थोड़ी गैस या पेट फूलने की समस्या हो सकती है.
11. क्या रोज दही खाना ठीक है – अगर आपका शरीर डेयरी उत्पादों को आसानी से पचा लेता है, तो रोज दही खाना सुरक्षित है. यह आपकी डाइट का हिस्सा बन सकता है.
12. दही खाने का सबसे अच्छा समय क्या है – दोपहर के खाने के साथ दही खाना सबसे अच्छा माना जाता है. यह खाने के साथ आसानी से पचता है और पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है.
13. क्या मछली या मांस के साथ दही खा सकते हैं – दही को मछली, चिकन या मटन जैसे प्रोटीन वाले भोजन के साथ खाया जा सकता है. इसे लेकर जो डर या भ्रम है, उसका कोई पक्का वैज्ञानिक आधार नहीं है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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