1.5 लाख का ‘जादुई’ कैंसर इंजेक्शन निकला नकली, ऐसे चल रहा था खौफनाक खेल

1.5 लाख का ‘जादुई’ कैंसर इंजेक्शन निकला नकली, ऐसे चल रहा था खौफनाक खेल


How Fake Keytruda Reached Cancer Patients In India: पंजाब के एक साधारण घर से शुरू हुई यह कहानी भारत में कैंसर इलाज की एक खतरनाक सच्चाई को उजागर करती है. साल 2022 की शुरुआत में चंडीगढ़ के पास रहने वाली 56 वर्षीय महिला का लिवर कैंसर का इलाज PGIMER में चल रहा था. डॉक्टरों ने उन्हें एक महंगी इम्यूनोथेरेपी दवा कीट्रूडा  लेने की सलाह दी, जिसकी कीमत 100 mg की एक वायल के लिए 1.5 लाख रुपये से ज्यादा है. इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था, इसलिए परिवार ने सितंबर से दिसंबर के बीच 12 वायल डिस्काउंट पर करीब 16 लाख रुपये में खरीदीं। लेकिन कुछ समय बाद दिल्ली पुलिस का फोन आया और पता चला कि ये दवाएं नकली थीं, जिनमें एंटीफंगल दवा भरी गई थी.

जांच में खुलासा

यह मामला अकेला नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस औरइंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स की संयुक्त जांच में सामने आया है कि भारत में महंगी कैंसर दवाओं, खासकर कीट्रूडा, का एक बड़ा नकली बाजार सक्रिय है. इस जांच में 12,500 से ज्यादा पन्नों के रिकॉर्ड, अस्पताल डेटा और डॉक्टरों से बातचीत शामिल रही.

बेहद संगठित तरीके से काम करता है नेटवर्क

जांच में पता चला कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता है. खाली वायल इकट्ठा की जाती हैं, उनमें दूसरी दवाएं भरकर दोबारा सील किया जाता है और फिर बाजार में सस्ती कीमत पर बेचा जाता है. कई बार यह कीमत असली से 40 प्रतिशत तक कम होती है, जिससे मरीजों को यह राहत लगती है, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन जाती है.

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में अस्पतालों के अंदर के लोग भी शामिल पाए गए. दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में काम करने वाले कुछ फार्मासिस्ट कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए या आधे भरे वायल बाहर ले जाते थे और उन्हें इस रैकेट को बेचते थे. पुलिस ने छापेमारी में कई वायल, खाली बॉक्स और संदिग्ध बैच नंबर बरामद किए, जो सीधे मरीजों को दी गई दवाओं से मेल खाते थे. जांच में जब पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलनी शुरू कीं, तो एक अहम नाम सामने आया, परवेज. वह पहले एक अस्पताल में फार्मासिस्ट के तौर पर काम कर चुका था और बाद में इस रैकेट का अहम हिस्सा बन गया. पुलिस के मुताबिक, परवेज ही वह कड़ी था जो अस्पताल के अंदर से दवाओं को बाहर लाने और उन्हें आगे सप्लाई करने का काम संभाल रहा था.

अस्पताल में काम करने वाले लोग शामिल

परवेज ने यह भी बताया कि उसने अस्पताल में काम करने वाले कोमल और अभय से संपर्क किया, जो उसे खाली और भरी हुई वायल उपलब्ध कराते थे. उसने बताया कि मैं खाली  वायल के 3000 दूंगा और अगर अगर वो इंजेक्शन भरा उपलब्ध करवाते हैं, तो उसके बदले में 40 हजार से 50 हजार दिया जाएगा. इस तरह 8 से 9 महीने में 10- 12 भरा वायल और 120 वायर कोमल से उसे मिला और अभय ने उसे 10 खाली और 10-12 भरा वायर दिया. जो बाद में इस अवैध नेटवर्क के जरिए बेची गईं.

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मरीज की हो गई मौत

जांच में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में सख्त प्रोटोकॉल होने के बावजूद एक बड़ी कमी थी कि खाली वायल की गिनती का कोई ठोस सिस्टम नहीं था. इसी खामी का फायदा उठाकर यह पूरा खेल चलाया गया. बाद में अस्पतालों ने निगरानी बढ़ाई, CCTV सिस्टम मजबूत किया और दवा निपटान की प्रक्रिया को और सख्त बनाया. इस रैकेट का सबसे दर्दनाक असर मरीजों पर पड़ता है. बिहार की एक महिला, जो सस्ती दवा की तलाश में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से इंजेक्शन खरीद रही थीं, इलाज के दौरान ही हालत बिगड़ने के बाद दम तोड़ गईं. बाद में परिवार को पता चला कि दवा नकली हो सकती थी. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक गैंग तक सीमित नहीं है. यह एक बड़े सिस्टम की कमजोरी को दिखाता है, जहां महंगे इलाज और आर्थिक दबाव के बीच मरीज आसानी से ठगी का शिकार बन जाते हैं.

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उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?

उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?


Roti or Rice Health Benefits : भारत में खाने की परंपरा बहुत अलग है. उत्तर भारत में जहां रोटी मुख्य खाना है, वहीं दक्षिण और पूर्व भारत में खाने में चावल का ज्यादा यूज होता है. अक्सर लोग इस बात पर बहस करते हैं कि रोटी ज्यादा हेल्दी है या चावल? कुछ लोग कहते हैं कि चावल खाने से वजन बढ़ता है, जबकि कई लोग मानते हैं कि चावल तो सदियों से हमारा मुख्य खाना रहा है और इसे खाने से लोग हेल्दी रहते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है. 

रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है

असल में रोटी और चावल के बीच कौन बेहतर है, इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह व्यक्ति के शरीर, उसकी पाचन शक्ति, लाइफस्टाइल और खाने की आदतों पर निर्भर करता है. आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इस बात को मानते हैं कि हर इंसान के लिए एक जैसी डाइट सही नहीं होती है. जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर होती है, उनके लिए चावल हल्का और आसानी से पचने वाला ऑप्शन होता है, जबकि जिनका शरीर ज्यादा एक्टिव है और जो शारीरिक मेहनत करते हैं, उनके लिए रोटी ज्यादा एनर्जी और लंबे समय तक पेट भरा रखने वाली होती है. 

चावल और गेहूं के फायदे 

1. चावल और गेहूं दोनों को ही जरूरी अनाज माना गया है, लेकिन इनके गुण और प्रभाव अलग-अलग बताए गए हैं. आयुर्वेद के अनुसार हर खाने का असर शरीर की प्रकृति (प्रकृति), पाचन शक्ति (अग्नि) और दोषों (वात, पित्त, कफ) पर पड़ता है.

 2. चावल को आयुर्वेद में मीठे टेस्ट वाला, शरीर को ठंडक देने वाला और हल्का अनाज माना गया है, जो आसानी से पच जाता है.
 
3. इसे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ तीनों को संतुलित करने में मददगार बताया गया है. इसी कारण चावल को रोज खाने योग्य खाना माना गया है, खासकर जब इसे सही तरीके से पकाया जाए और बैलेंस डाइट के साथ लिया जाए. 
 
4. वहीं रोटी को भारी, ज्यादा पोषण देने वाला और शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला अनाज कहा गया है.
 
5. यह शरीर में ताकत और एनर्जी बढ़ाने में मदद करता है और वात- पित्त दोष को शांत करता है. इसलिए गेहूं को विशेष रूप से उन लोगों के लिए अच्छा माना गया है जो शारीरिक रूप से ज्यादा एक्टिव रहते हैं या जिन्हें ज्यादा एनर्जी और ताकत की जरूरत होती है. 

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किन लोगों के लिए क्या बेहतर है?

चावल और रोटी दोनों ही अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरह से फायदेमंद होते हैं. चावल को हल्का और आसानी से पचने वाला माना जाता है, इसलिए यह बीमार लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और कमजोर पाचन शक्ति वाले व्यक्तियों के लिए बेहतर ऑप्शन है. ऐसे लोगों के लिए खिचड़ी या दाल-चावल जैसा हल्का खाना ज्यादा यूजफुल होता है क्योंकि ये पेट पर ज्यादा बोझ नहीं डालते और आसानी से पच जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रोटी, यानी गेहूं से बना खाना, ज्यादा एनर्जी और ताकत देने वाला माना जाता है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो शारीरिक मेहनत करते हैं, जैसे किसान या भारी काम करने वाले लोग, या जिनकी पाचन शक्ति मजबूत होती है. 

विज्ञान क्या कहता है?

विज्ञान के अनुसार, रोटी और चावल दोनों के अपने अलग-अलग पोषण गुण हैं, ऐसे में यह तय करना कि कौन बेहतर है, इसके लिए पूरा डाइट पैटर्न ज्यादा जरूरी होता है. गेहूं में चावल की तुलना में ज्यादा प्रोटीन और फाइबर पाया जाता है, जिससे यह पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है और एनर्जी धीरे-धीरे रिलीज करता है. वहीं चावल हल्का होता है और जल्दी पच जाता है. लेकिन जब इन्हें दाल, सब्जी और घी जैसे संतुलित आहार के साथ खाया जाता है, तो दोनों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) लगभग समान हो जाता है, यानी ब्लड शुगर पर इनका असर काफी हद तक संतुलित हो जाता है. इसलिए विज्ञान यह बताता है कि सिर्फ रोटी या चावल पर ध्यान देने की जगह पूरे खाने की क्वालिटी और बैलेंस ज्यादा फायदेमंद रखता है. 

किस अनाज से होता है शरीर को नुकसान 

आजकल हम जो अनाज खाते हैं वह बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड और रिफाइंड हो चुका है. पॉलिश किया हुआ सफेद चावल अपने छिलके और जर्म को खो देता है, जिससे उसमें फाइबर और जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं और उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बढ़ जाता है, जिसके कारण यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता है. इसी तरह मैदा, जो गेहूं को बहुत ज्यादा रिफाइन करके बनाया जाता है, उसमें भी फाइबर और पोषण लगभग खत्म हो जाते हैं, जिससे यह पाचन के लिए भारी और शरीर के लिए कम फायदेमंद हो जाता है. 

क्या है सही और बेस्ट ऑप्शन 

सही और बेस्ट ऑप्शन के लिए आप प्राकृतिक और कम प्रोसेस किए हुए अनाज चुनें, जैसे ब्राउन राइस या अनपॉलिश चावल, और होल व्हीट यानी साबुत गेहूं का आटा, क्योंकि इनमें फाइबर और पोषक तत्व अधिक मात्रा में सुरक्षित रहते हैं. इसके साथ ही खाने को हमेशा बैलेंस में लेना जरूरी है, जिसमें दाल, सब्जी और थोड़ी मात्रा में घी शामिल हो, ताकि शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें.

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खाना खाने से पहले पानी पीने के लिए क्यों कहते हैं डॉक्टर्स, इस आदत से शरीर को कितना फायदा?

खाना खाने से पहले पानी पीने के लिए क्यों कहते हैं डॉक्टर्स, इस आदत से शरीर को कितना फायदा?


Why Doctors Recommend Drinking Water Before Meals: अक्सर आपने सुना होगा कि खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी इस आदत को अपनाने की सलाह देते हैं. लेकिन क्या यह सच में फायदेमंद है या सिर्फ एक आम धारणा? इस सवाल का जवाब समझना जरूरी है, क्योंकि यह हमारी रोजमर्रा की हेल्थ से जुड़ा हुआ है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर डॉक्टर ऐसा क्यों कहते हैं.

क्यों खाने से पहले पानी पीना चाहिए?

Harvard Health की एक रिपोर्ट के अनुसार,  असल में, खाना खाने से पहले पानी पीने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे पेट पहले से थोड़ा भर जाता है, जिससे आप कम खाना खाते हैं. हमारे पेट में कुछ ऐसे नर्व्स होते हैं जो फैलाव को महसूस करके दिमाग को संकेत भेजते हैं कि अब खाना पर्याप्त है. माना जाता है कि अगर आप पहले पानी पी लेते हैं, तो यही सिग्नल जल्दी मिलने लगता है और ओवरईटिंग से बचाव होता है.

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क्या होता है इसका असर?

कुछ छोटे और सीमित समय वाली स्टडी में यह देखा भी गया है कि जो लोग खाने से पहले एक गिलास पानी पीते हैं, वे दूसरों के मुकाबले थोड़ा कम खाना खाते हैं. खासकर जो लोग वजन घटाने की कोशिश कर रहे होते हैं, उनमें यह आदत हल्का फायदा दे सकती है. हालांकि, लंबे समय में इसका असर कितना होता है, इस पर अभी भी पुख्ता सबूत नहीं हैं.

एक और कारण यह बताया जाता है कि कई बार हमें भूख नहीं बल्कि प्यास लगती है, लेकिन हम इसे समझ नहीं पाते और कुछ खा लेते हैं. ऐसे में अगर पहले पानी पी लिया जाए, तो अनावश्यक कैलोरी लेने से बचा जा सकता है. लेकिन इस थ्योरी को लेकर भी साइंटफिक प्रमाण बहुत मजबूत नहीं हैं.

वजन कम करने में मददगार

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पानी पीने से शरीर कैलोरी बर्न करता है, क्योंकि शरीर को पानी को अपने तापमान तक गर्म करना पड़ता है. लेकिन हाल के रिसर्च बताते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत कम कैलोरी खर्च होती है, इसलिए इसे वजन घटाने का बड़ा कारण नहीं माना जा सकता. हालांकि, एक बात साफ है कि अगर आप मीठे पेय या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीते हैं, तो यह आपकी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है और वजन कम करने में मदद कर सकता है.  तो क्या खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए? इसका जवाब पूरी तरह  हां या नहीं में नहीं है. कुछ लोगों के लिए यह आदत फायदेमंद हो सकती है, खासकर अगर इससे वे कम खाते हैं या ओवरईटिंग से बचते हैं. लेकिन इसे कोई जादुई उपाय भी नहीं माना जा सकता.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बाल झड़ने और रूखी त्वचा से परेशान? ये हैं ओमेगा-3 की कमी के सिग्नल, आज ही खाएं ये चीजें

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Symptoms Of Omega-3 Deficiency: दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी यानी करीब 76  प्रतिशत लोग ओमेगा-3 की पर्याप्त मात्रा नहीं ले रहे हैं. यह वही पोषक तत्व है जिसे हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता. हैरानी की बात यह है कि अगर आप ज्यादातर लोगों से पूछें कि वे ओमेगा-3 कितना लेते हैं, तो या तो उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं होगी या फिर वे कभी-कभार लिए गए फिश ऑयल सप्लीमेंट का जिक्र करेंगे.

क्या निकला रिसर्च में

यह कोई मामूली कमी नहीं है. साल 2025 में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन और हॉलैंड एंड बैरेट के रिसर्च के एक बड़े स्टडी में सामने आया कि दुनिया की 76 प्रतिशत आबादी EPA और DHA के रिकमंड स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है.  ये दोनों ओमेगा-3 के महत्वपूर्ण रूप हैं, जो दिल की सेहत, दिमाग के विकास, सूजन को कंट्रोल करने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

किम्स हॉस्पिटल्स, बेंगलुरु की चीफ ऑफ डाइटेटिक्स Ms. Chitra BK ने TOI Health को बताया कि ओमेगा-3 फैटी एसिड्स ऐसे जरूरी पोषक तत्व हैं, जो आधुनिक डाइट में अक्सर कम पाए जाते हैं. आजकल लोग प्रोटीन, विटामिन D और आयरन की बात तो करते हैं, लेकिन ओमेगा-3 की कमी को नजरअंदाज कर देते हैं. जबकि शरीर इन्हें खुद नहीं बना सकता, इसलिए इन्हें नियमित रूप से आहार में शामिल करना जरूरी है. 

लाइफस्टाइल में बदलाव आया

उन्होंने आगे बताया कि पिछले कुछ दशकों में खानपान के तरीके में बड़ा बदलाव आया है.  पहले लोग ज्यादा मछली, मेवे और बीज खाते थे, लेकिन अब प्रोसेस्ड फूड और रिफाइंड वेजिटेबल ऑयल का इस्तेमाल बढ़ गया है. इससे शरीर में ओमेगा-6 की मात्रा ज्यादा हो गई है, जो सूजन को बढ़ावा देती है और कई क्रॉनिक बीमारियों का कारण बन सकती है. इसके अलावा, खासकर शहरी युवाओं 18-25 साल और शाकाहारी लोगों में मछली का सेवन काफी कम हुआ है, जिससे DHA और EPA की कमी और बढ़ गई है.

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इसकी कमी से क्या दिक्कत होती है

अगर शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाए, तो इसके संकेत धीरे-धीरे नजर आते हैं. जैसे त्वचा का रूखा होना, बालों का कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत, मूड में बदलाव, थकान महसूस होना और जोड़ों में दर्द. अक्सर लोग इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.

इसकी कमी को कैसे दूर करें

इस कमी को दूर करने के लिए रोजाना के खानपान में कुछ बदलाव करना जरूरी है. हफ्ते में कम से कम दो बार फैटी फिश जैसे सैल्मन, सार्डिन, मैकेरल या टूना शामिल करें. इसके अलावा अलसी के बीज, चिया सीड्स, अखरोट, ब्राजील नट्स, एवोकाडो, सोया प्रोडक्ट्स और कैनोला ऑयल भी अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर ओमेगा-3 से भरपूर फोर्टिफाइड फूड या सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चोट लगने पर भूल जाएंगे एंटीसेप्टिक लोशन, ये देसी नुस्खे फटाफट भर देते हैं घाव

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Benefits Of Raw Honey For Skin: शहद को हम अक्सर सिर्फ मिठास के लिए जानते हैं, लेकिन यह नेचुरल उपचार का एक बेहद असरदार तरीका भी है. आजकल छोटे-मोटे घावों के इलाज में शहद फिर से चर्चा में हैय जब बागवानी करते समय या घर के काम में हल्की खरोंच लगती है, तो हम आमतौर पर एंटीसेप्टिक लोशन की तरफ बढ़ते हैं, लेकिन अब कई लोग रसोई में रखे शहद को ही प्राथमिक उपचार के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं.

पहले भी होते थे यूज

दरअसल, शहद का उपयोग घाव भरने के लिए कोई नया तरीका नहीं है. प्राचीन मिस्र और रोम में भी इसे त्वचा के उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता था. आज भी इसे एक बेहतरीन प्राकृतिक हीलिंग एजेंट माना जाता है. इसकी खासियत इसके केमिकल कंपोजिशन में छिपी है. जैसे ही शहद को किसी ताजा घाव पर लगाया जाता है, यह एक सुरक्षा परत बना देता है, जो धूल और बैक्टीरिया से बचाती हैय इस बारे में हनी: एन एडवांस्ड एंटीमाइक्रोबियल एंड वूंड हीलिंग बायोमटेरियल फॉर टिशू इंजीनियरिंग एप्लिकेशंस नामक रिसर्च में विस्तार से बताया गया है.

 बैक्टीरिया को खत्म करने में मददगार

शहद की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह त्वचा की नमी के संपर्क में आते ही हाइड्रोजन पेरॉक्साइड बनाता है, जो बैक्टीरिया को खत्म करने में मदद करता है. इसका असर बाजार में मिलने वाले केमिकल एंटीसेप्टिक जैसा ही होता है, लेकिन बिना जलन या दर्द के. इसके साथ ही, शहद का हल्का एसिडिक स्वभाव घाव के pH स्तर को कम कर देता है, जिससे बैक्टीरिया के लिए जीवित रहना मुश्किल हो जाता है.

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 घाव को नम बनाए रखने में भी मददगार

इतना ही नहीं, शहद घाव को नम बनाए रखने में भी मदद करता है. सूखा घाव अक्सर खुजली और पपड़ी बनने का कारण बनता है, जिससे नई त्वचा को नुकसान हो सकता है. इसके विपरीत, शहद नमी बनाए रखकर सेल्स को तेजी से जुड़ने में मदद करता है और घाव जल्दी भरता है. हनी, वूंड रिपेयर एंड रीजेनेरेटिव मेडिसिन में बताया गया है कि शहद नई सेल्स के विकास के लिए ऊर्जा का काम करता है. इसके साथ ही, यह सूजन को भी कम करता है. जब घाव लाल, गर्म और दर्दनाक लगता है, तो यह शरीर की सूजन प्रतिक्रिया होती है.  शहद इस सूजन को शांत करता है और फ्री रेडिकल्स को कम करके हीलिंग को तेज करता है.

कैसे कर सकते हैं इसका यूज?

घर पर शहद का इस्तेमाल करना आसान है. सबसे पहले घाव को साफ पानी से धो लें, ताकि गंदगी हट जाए. फिर उस पर शहद की एक पतली परत लगाएं. अगर जरूरत हो तो उस पर गॉज या पट्टी लगा सकते हैं, ताकि शहद अपनी जगह बना रहे। बेहतर परिणाम के लिए कच्चा या मेडिकल ग्रेड शहद इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि इनमें एंजाइम और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं.

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6 साल में डायबिटीज से कैसे उबरे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह? खुद बयां किया जंग जीतने का किस्सा

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Diabetes Control Without Insulin: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी सेहत को लेकर एक प्रेरणादायक अनुभव साझा किया. उन्होंने बताया कि कैसे एक समय डायबिटीज से जूझने के बाद उन्होंने अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव कर न सिर्फ बीमारी पर काबू पाया, बल्कि खुद को पहले से ज्यादा फिट बना लिया. चलिए आपको बताते हैं कि उन्होने डायबिटीज से लड़ने में क्या उपाय अपनाया.

अमित शाह ने क्या कहा?

वर्ल्ड लीवर डे के मौके 2025 पर आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि “मैं डायबिटिक था, लेकिन मई 2020 के बाद मैंने अपनी दिनचर्या में बड़े बदलाव किए.” उन्होंने बताया कि सही मात्रा में नींद लेना, पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार अपनाना और नियमित एक्सरसाइज करना उनकी सेहत के लिए गेमचेंजर साबित हुआ. उन्होंने आगे कहा कि “आज मैं आपके सामने बिना किसी एलोपैथिक दवा और इंसुलिन के खड़ा हूं.” 

 

टी-छोटी आदतों को लगातार अपनाना

उन्होंने यह भी बताया कि इन बदलावों की वजह से उनका वजन 20 किलो से ज्यादा कम हुआ. उनका मानना है कि कोई भी बड़ा बदलाव अचानक नहीं होता, बल्कि छोटी-छोटी आदतों को लगातार अपनाने से ही लंबे समय तक असर दिखता है.

युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि शरीर और दिमाग दोनों को स्वस्थ रखना जरूरी है. अपने शरीर के लिए रोजाना दो घंटे एक्सरसाइज और दिमाग के लिए कम से कम छह घंटे की नींद जरूर लें। यह मेरे अपने अनुभव से निकली सलाह है.

डिसिप्लिन और संतुलन

अगर उनकी इस जर्नी से कुछ सीखना हो, तो सबसे जरूरी है डिसिप्लिन और संतुलन. अच्छी नींद, भरपूर पानी और घर का संतुलित खाना शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है. प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा शुगर से दूरी बनाकर रखना भी उतना ही जरूरी है. नियमित एक्सरसाइज को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए. यह जरूरी नहीं कि हमेशा जिम ही जाएं, आप वॉक, योग, या कोई खेल भी चुन सकते हैं. सबसे अहम है निरंतरता. इसके अलावा, जल्दी परिणाम पाने के चक्कर में क्रैश डाइट या शॉर्टकट अपनाने से बचना चाहिए. असली बदलाव धीरे-धीरे आता है और वही टिकाऊ होता है.

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लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करना चाहिए?

उन्होंने यह भी बताया कि लिवर का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. इसके लिए शराब का सीमित सेवन, ज्यादा तैलीय खाने से बचाव और हरी सब्जियां, खट्टे फल और हल्दी जैसे खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना फायदेमंद होता है. अंत में उनका यही संदेश था कि शुरुआत छोटी करें, लेकिन लगातार करें. एक-एक बदलाव जोड़ते जाएं, और समय के साथ यही आदतें आपकी सेहत को पूरी तरह बदल सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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