गर्मियां शुरू होते ही नाक से निकलने लगता है खून, जानें कब नॉर्मल और कब खतरनाक

गर्मियां शुरू होते ही नाक से निकलने लगता है खून, जानें कब नॉर्मल और कब खतरनाक


Nose Bleeding: मार्च और अप्रैल का सुहाना समय खत्म होते ही तेज गर्मी कभी भी दस्तक दे सकती है. ऐसे में यह बात अभी से लोगों को परेशान करने लगी है. इस मौसम के आते ही सेहत को कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं. कई लोगों को नाक से खून आने की भी परेशानी होती है. यह समस्या खासकर तब बढ़ जाती है, जब तापमान तेजी से बढ़ने लगता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नाक से खून आना सिर्फ गर्मी का असर नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है?

इसके पीछे क्या कारण है?

नाक के अंदर की त्वचा बहुत पतली और संवेदनशील (Sensitive) होती है. इसमें छोटे-छोटे रक्त वाहिकाएं (vessels) होती हैं, जो सूखने पर कभी भी फट सकती हैं. इसके सूखने के पीछे गर्म हवाएं और कम नमी को कारण माना जाता है, जो त्वचा को बहुत खुष्क बना देता है. जोर से खांसने या छींकने पर ये नसें फट सकती हैं, जिससे खून आ सकता है. इसके अलावा एलर्जी, साइनस या अंदर लगी चोट भी इसका कारण हो सकती है. कुछ लोगों में हाई ब्लड प्रेशर या बिना डॉक्टर की सलाह के ली गई दवाएं भी नाक से खून आने की वजह बन सकती हैं

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नाक से खून आने पर क्या करें

  • सिर को थोड़ा ऊपर की ओर रखें, ताकि खून गले में न जाए.
  • नाक को हल्के से दबाकर रखें, इससे खून रुकने में मदद मिलती है.
  • नाक या गर्दन पर ठंडा पानी या कपड़ा रखें, इससे खून धीरे-धीरे रुक सकता है.
  • कमरे की हवा में नमी बनाए रखें, ताकि नाक अंदर से ज्यादा न सूखे.
  • अगर यह समस्या बार-बार हो या ज्यादा खून आए, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं.

नाक से खून आने पर  डॉक्टर को कब दिखाएं

  • अगर खून 30 मिनट से ज्यादा समय तक बंद न हो या बहुत ज्यादा बह रहा हो.
  • अगर खून गले तक आने लगे या निगलने जैसा लगे.
  • अगर नाक या सिर में चोट लगने के बाद खून आ रहा हो.
  • अगर बार-बार नाक से खून आता हो (हफ्ते में दो बार से ज्यादा).
  • अगर आप कोई दवा ले रहे हों या परिवार में पहले भी यह समस्या रही हो.

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किस बीमारी से जूझ रही है वरुण धवन की बेटी, जानें इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?

किस बीमारी से जूझ रही है वरुण धवन की बेटी, जानें इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?


Varun Dhawan Daughter DDH Disease: बॉलीवुड के फेमस एक्टर वरुण धवन ने हाल ही में अपनी बेटी की एक स्वास्थ्य समस्या के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को हिप डिस्प्लेसिया यानी डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) है. यह खबर सुनते ही लोगों में इस बीमारी के बारे में जानने की इच्छा बढ़ गई.

यह समस्या बहुत आम नहीं मानी जाती, लेकिन यह बच्चों में होने वाली हिप जॉइंट (hip joint) की एक गंभीर समस्या है. अगर समय पर इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह बच्चे की चलने-फिरने की क्षमता पर असर डाल सकती है और भविष्य में दर्द, चलने में परेशानी या जल्दी गठिया (arthritis) जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि DDH क्या है, इसके लक्षण, कारण और इलाज कैसे किया जाता है. यह कितनी खतरनाक है. 

DDH क्या है?

डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे की हिप जॉइंट सही तरीके से विकसित नहीं होती है. सामान्य स्थिति में, जांघ की हड्डी का ऊपर वाला हिस्सा हिप सॉकेट में मजबूती से फिट होता है. DDH में यह फिटिंग ढीली, अस्थिर या कभी-कभी पूरी तरह से डिस्लोकेट (dislocated) हो जाती है. यह समस्या जन्म के समय हमेशा दिखती नहीं है, इसलिए बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो बच्चे नॉर्मल लाइफ जी सकते हैं और चलने-फिरने में कोई दिक्कत नहीं होती है. 

यह बीमारी कितनी आम है?

दुनियाभर में करीब 0.5 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत बच्चों को यह समस्या होती है. कुछ मामलों में हल्की अस्थिरता अपने आप ठीक हो जाती है, जबकि कुछ बच्चों को इलाज की जरूरत पड़ती है. भारत में हर 1000 बच्चों में 0 से 2.6 मामलों की संभावना होती है. यह आंकड़ा सही से पता नहीं होता, क्योंकि हल्के मामलों में यह अनदेखी हो जाती है. इस बीमारी से लड़कियां, पहली बार जन्मे बच्चे, ब्रीच पोजीशन में जन्मे बच्चे या परिवार में किसी को DDH का इतिहास वाले लोग ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं. भारत में ज्यादातर बच्चे 1 या 2 साल की उम्र में ही डायग्नोस होते हैं, जो सही उम्र से काफी लेट है. इसलिए न्यू बोर्न बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है ताकि समस्या का सही समय पर पता चल सके और इलाज शुरू हो सके. 

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इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?

न्यू बोर्न बेबी में अक्सर नियमित चेकअप के दौरान डॉक्टर इस समस्या को पहचान लेते हैं. बच्चे के पेरेंट्स अक्सर शुरू में कोई संकेत नहीं देखते है. थोड़े बड़े बच्चों में पैरों की लंबाई असमान होना, एक पैर का सीमित हिलना या घुटनों के मुड़ने में दिक्कत और जांघ के झुर्री (thigh folds) में असमानता दिखाई दे सकते हैं. देर से पता चलने वाले मामलों में बच्चे देर से चलना शुरू करते हैं, लंपिंग करते हैं, असामान्य चाल रखते हैं या एक पैर छोटा दिख सकता है. 

DDH का इलाज

DDH का इलाज संभव है और यह अक्सर पूरी तरह ठीक हो जाता है, खासकर अगर समय पर पहचान हो. न्यू बोर्न बेबी का इलाज सॉफ्ट ब्रेस का यूज करके हिप को सही जगह पर रखा जाता है ताकि हिप सामान्य रूप से विकसित हो. वहीं 6 महीने से 2 साल के बच्चे का इलाज क्लोज्ड रिडक्शन (closed reduction) से किया जाता है, यानी बिना ऑपरेशन के हिप को सही जगह पर लाया जाता है. इसके बाद कास्ट में रखा जाता है. 2 साल से बड़े बच्चों में सर्जरी की जरूरत हो सकती है, जिसमें हिप को सही स्थिति में लाया जाता है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो ज्यादातर बच्चों को सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आप पर भी सवार है वजन घटाने की धुन, जानें किन चीजों की हो जाती है कमी?

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GLP-1 दवाएं लेने पर लोग जल्दी पेट भर जाने का अनुभव करते हैं. अक्सर लोग खाना छोड़ देते हैं या सिर्फ छोटे हिस्से खाते हैं. भारत में जहां कई लोग पहले से ही चावल, गेहूं और आलू जैसे कार्ब-भारी भोजन पर निर्भर हैं, भूख कम होना पोषक तत्वों की कमी को और बढ़ा सकता है.

वजन घटाने की धुन के चलते शरीर में सबसे आम कमी जो देखी जाती है, वो विटामिन B12 , आयरन (Iron), विटामिन D,  फोलेट और कैल्शियम हैं. विटामिन B12 की मांसाहारी नहीं खाने वालों में कमी ज्यादा होती है. वहीं GLP-1 थेरेपी के दौरान दूध और डेयरी उत्पादों की मात्रा कम हो सकती है. इसके अलावा आयरन महिलाओं में आमतौर पर कम होने वाला पोषक तत्व है.  विटामिन D मोटापे के कारण पहले से ही कम होता है. वहीं फोलेट और कैल्शियम खाने की कम विविधता के कारण कमी हो सकती है.

वजन घटाने की धुन के चलते शरीर में सबसे आम कमी जो देखी जाती है, वो विटामिन B12 , आयरन (Iron), विटामिन D, फोलेट और कैल्शियम हैं. विटामिन B12 की मांसाहारी नहीं खाने वालों में कमी ज्यादा होती है. वहीं GLP-1 थेरेपी के दौरान दूध और डेयरी उत्पादों की मात्रा कम हो सकती है. इसके अलावा आयरन महिलाओं में आमतौर पर कम होने वाला पोषक तत्व है. विटामिन D मोटापे के कारण पहले से ही कम होता है. वहीं फोलेट और कैल्शियम खाने की कम विविधता के कारण कमी हो सकती है.

Published at : 04 Apr 2026 04:01 PM (IST)

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कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक-अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान

कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक-अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान


Health Checkup Routine : आज के समय में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं. जिम जाना, हेल्दी खाना, योग करना ये सब अब आम बात हो गई है, लेकिन एक जरूरी सवाल अब भी लोगों के मन में रहता है कि हेल्थ चेक-अप कितनी बार कराना चाहिए. कई लोग सोचते हैं कि साल में एक बार ब्लड टेस्ट करा लेना ही काफी है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा अलग है. डॉक्टरों के अनुसार, हेल्थ चेक-अप हर व्यक्ति के लिए अलग होता है. यह आपकी उम्र, लाइफस्टाइल, बीमारी का इतिहास और परिवार की मेडिकल हिस्ट्री पर निर्भर करता है. इसलिए जरूरी है कि हम अपनी जरूरत के हिसाब से हेल्थ चेक-अप का सही समय और तरीका समझें. ऐसे में आइए जानते हैं कि हेल्थ चेक-अप कितने समय में कराना चाहिए. 

हेल्थ चेक-अप क्यों जरूरी है?

अक्सर लोग तभी डॉक्टर के पास जाते हैं जब उन्हें कोई समस्या होती है, लेकिन कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो शुरू में कोई लक्षण नहीं दिखातीं है. रेगुलर चेक-अप से आप बीमारी को शुरुआत में ही पकड़ सकते हैं. गंभीर समस्याओं से बच सकते हैं. अपने शरीर की सही स्थिति जान सकते हैं और भविष्य के जोखिम को कम कर सकते हैं. 

क्या सिर्फ ब्लड टेस्ट ही काफी है?

बहुत से लोग मानते हैं कि ब्लड टेस्ट ही पूरा हेल्थ चेक-अप है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है. एक कंप्लीट हेल्थ चेक-अप में ब्लड टेस्ट, एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड, ECG, इको, कैंसर स्क्रीनिंग, महिलाओं के लिए मैमोग्राम, हड्डियों की जांच शामिल हो सकते हैं. ये सभी टेस्ट शरीर के अंदर छिपी समस्याओं को समय रहते पकड़ने में मदद करते हैं. 

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हेल्थ चेक-अप कितने समय में कराना चाहिए

अगर आप फिट हैं, कोई बीमारी नहीं है और अच्छी लाइफस्टाइल फॉलो करते हैं, तो  साल में 1 बार पूरा हेल्थ चेक-अप काफी होता है. वहीं अगर आपके परिवार में दिल की बीमारी, डायबिटीज या अन्य गंभीर बीमारी हैं, तो साल में 2 बार चेक-अप कराना बेहतर है, साथ में खास टेस्ट भी कराए जाते हैं.  इसके अलावा अगर आपको पहले से डायबिटीज या कोई पुरानी बीमारी है, तो  साल में 2 बार पूरा चेक-अप जरूर कराना चाहिए, साथ ही हर 3 महीने में HbA1c टेस्ट कराएं. वहीं अगर आपका वजन ज्यादा है या लाइफस्टाइल ठीक नहीं है, तो आपको अतिरिक्त जांच की जरूरत हो सकती है. जैसे लिवर टेस्ट या फैटी लिवर की जांच. बुजुर्गों के लिए ज्यादा सावधानी जरूरी है. इसके लिए साल में कम से कम 2 बार हेल्थ चेक-अप कराना चाहिए. 

बच्चों के लिए हेल्थ चेक-अप प्लान

बच्चों के लिए हेल्थ चेक-अप का प्लान उनकी उम्र के हिसाब से अलग होता है. जैसे छोटे बेबी को हर 1 से 3 महीने में डॉक्टर के पास दिखाना चाहिए.  ताकि  वेकसीनेशन समय पर हो और उनकी ग्रोथ सही हो रही है या नहीं, यह देखा जा सके. वहीं 1 से 5 साल के बच्चों यानी टॉडलर्स को हर 3 से 6 महीने में चेक-अप कराने की जरूरत होती है, जिससे उनकी लंबाई-ऊंचाई, वजन, पोषण और सामान्य ग्रोथ की निगरानी की जा सके, इसके अलावा 6 से 12 साल के स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए अगर बच्चा हेल्दी है तो साल में एक बार चेक-अप काफी होता है. वहीं टीनेज के लिए भी साल में एक बार चेक-अप जरूरी है, जिसमें उनकी खान-पान की आदतें, मानसिक स्वास्थ्य और लाइफस्टाइल पर ध्यान दिया जाता है जिससे हेल्दी लाइफस्टाइल बनी रहे और किसी भी समस्या को समय रहते पहचाना जा सके. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं पुरानी एंटीबायोटिक्स, क्या है इसका तरीका?

दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं पुरानी एंटीबायोटिक्स, क्या है इसका तरीका?


Old Antibiotics : आज दुनिया भर में वैज्ञानिक एक बहुत बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं. यह समस्या एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (AMR) है. इसका मतलब है कि बैक्टीरिया धीरे-धीरे उन दवाओं के खिलाफ खुद को मजबूत बना रहे हैं, जिनसे हम उन्हें मार सकते थे. इसका असर इतना खतरनाक हो गया है कि हल्की-सी संक्रमण भी मुश्किल से ठीक होती है और कई बार जानलेवा साबित हो सकती है.

भारत में इसका असर साफ दिखता है. 2021 में लगभग 2.6 लाख लोग सिर्फ इसलिए मरे क्योंकि उनके शरीर में संक्रमण उस एंटीबायोटिक दवा से नहीं रुके. इसका मतलब यह है कि अगर दवाएं काम कर रही होतीं, तो ये मौतें रोकी जा सकती थीं, लेकिन अब आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) के शोधकर्ताओं ने एक नया तरीका निकाला है. उन्होंने नए एंटीबायोटिक बनाने की जगह पुरानी दवाओं को फिर से असरदार बनाने का रास्ता निकाला है. ऐसे में आइए जानते हैं कि पुरानी एंटीबायोटिक्स दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं और इसका तरीका क्या है.

एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया कैसे नहीं मार पाती हैं?

मैक्रोलाइड्स (Macrolides) एंटीबायोटिक की एक आम कैटेगरी है, जिसमें एजिथ्रोमाइसिन (Azithromycin) और एरिथ्रोमाइसिन (Erythromycin) जैसी दवाएं आती हैं. ये दवाएं बैक्टीरिया की प्रोटीन बनाने की मशीन यानी राइबोसोम (ribosome) पर हमला करती हैं. राइबोसोम को रोककर, बैक्टीरिया जरूरी प्रोटीन नहीं बना पाता और मर जाता है, लेकिन बैक्टीरिया भी पीछे नहीं रहते है. वे Erm एंजाइम्स का इस्तेमाल करके राइबोसोम को बदल देते हैं. इस वजह से एंटीबायोटिक दवा बैक्टीरिया को मार नहीं पाती हैं. 

पुरानी एंटीबायोटिक्स दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं?

आईआईटी बॉम्बे की टीम ने Erm एंजाइम को इनएक्टिव करने का तरीका निकाला है. उन्होंने एप्टामर्स (Aptamers) का इस्तेमाल किया. एप्टामर्स छोटे, सिंथेटिक DNA के टुकड़े होते हैं. ये DNA टुकड़े विशेष रूप से Erm 42 एंजाइम से जुड़ते हैं.  शोधकर्ताओं ने लाखों DNA सिक्वेंस में से दो सबसे प्रभावी एप्टामर्स चुने. एप्टामर्स को और ज्यादा सटीक बनाने के लिए, बेकार हिस्सों को हटा दिया गया. इसका मतलब है कि अब यह सीधे Erm एंजाइम को निशाना बनाता है और उसे काम करने से रोक देता है. 

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इसका तरीका क्या है?

DNA एप्टामर्स अकेले बैक्टीरिया में नहीं जा सकते. ये आसानी से टूट जाते हैं और बैक्टीरिया की झिल्ली पार नहीं कर पाते. टीम ने इसका हल लिपोसोम (Liposomes) निकाला है.  यह छोटे, गोल,  फैट से बने बबल्स होते हैं. ये बैक्टीरिया की झिल्ली से आसानी से घुल-मिल जाते हैं. इन लिपोसोम्स में DNA एप्टामर्स को पैक किया गया ताकि वे सुरक्षित तरीके से बैक्टीरिया के अंदर पहुंच सकें. 

कितना असरदार है नया शोध?

शोधकर्ताओं ने Staphylococcus aureus, एक मुश्किल बैक्टीरिया पर इस तकनीक का परीक्षण किया. जब एप्टामर्स को लिपोसोम के साथ भेजा गया, तो 90 प्रतिशत से ज्यादा बैक्टीरिया ने इन्हें स्वीकार किया. एप्टामर्स और एंटीबायोटिक को मिलाकर देने से बैक्टीरिया की मृत्यु बढ़ गई, जबकि एंटीबायोटिक अकेले बहुत कम असर करता है. ऐसे में Erm एंजाइम इनएक्टिव हो गया और दवा फिर से राइबोसोम पर काम कर सकी. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पेट की परेशानी को कहें अलविदा, रात में अपनाएं ये 10 आदतें, गट हेल्थ होगी बेहतर

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देर रात भारी खाना पचाने में समय लेता है और नींद को भी प्रभावित करता है. कोशिश करें कि रात का खाना सोने से 2-3 घंटे पहले खा लें. अगर फिर भी रात में भूख लगे, तो हल्के स्नैक्स जैसे नट्स, दूध या फलों का सेवन कर सकते हैं.



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