सेहत से समझौता! एवरेस्ट के मसालों में मिले कीटनाशक, जानें आपकी सेहत के लिए ये कितने खतरनाक?

सेहत से समझौता! एवरेस्ट के मसालों में मिले कीटनाशक, जानें आपकी सेहत के लिए ये कितने खतरनाक?


Everest Masala Lab Test Report: फेमस भारतीय मसाला ब्रांड एवरेस्ट के कुछ उत्पादों की क्वालिटी को लेकर हाल ही में सोशल मीडिया पर काफी चर्चा देखने को मिली. यह मामला तब सामने आया जब ट्रस्टिफाइड नाम के एक यूट्यूब चैनल ने 1 मार्च 2026 को एक वीडियो जारी किया, जिसमें दावा किया गया कि एवरेस्ट के कुछ मसाला उत्पाद लैब परीक्षण में तय मानकों पर खरे नहीं उतरे. वीडियो के अनुसार चैनल ने ये मसाले डी-मार्ट स्टोर से खरीदे और फिर उनके नमूनों को लैब में जांच के लिए भेजा.

तय मानकों को पूरा नहीं करते

वीडियो में बताया गया कि हर मसाले के तीन-तीन पैकेट खरीदे गए थे, जिनमें से एक पैकेट को परीक्षण के लिए भेजा गया. जिन उत्पादों की जांच की गई उनमें एवरेस्ट गरम मसाला, एवरेस्ट किचन किंग मसाला, एवरेस्ट कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर और एवरेस्ट मीट मसाला शामिल थे. चैनल का कहना था कि इन मसालों की जांच इसलिए कराई गई ताकि यह पता चल सके कि वे इंडियन फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया के तय सुरक्षा सीमाओं को पूरा करते हैं या नहीं.

क्या निकला रिजल्ट में?

वीडियो में साझा किए गए नतीजों के अनुसार एवरेस्ट गरम मसाला के नमूने में दो कीटनाशक तय सीमा से अधिक पाए गए. इनका नाम एसेटामिप्रिड और एजोक्सीस्ट्रोबिन बताया गया. इसके अलावा नमूने में एंटरोबैक्टीरिएसी परिवार के बैक्टीरिया की मात्रा भी अधिक बताई गई.

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यह मुद्दा बाद में सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी चर्चा में आ गया. एक उपयोगकर्ता ने एआई आधारित चैटबॉट ग्रोक से एंटरोबैक्टीरिएसी बैक्टीरिया के बारे में सवाल पूछा. उपयोगकर्ता ने बताया कि इस बैक्टीरिया समूह में ई. कोलाई और साल्मोनेला जैसे कई बैक्टीरिया शामिल होते हैं, जो अक्सर खाद्य पदार्थों के दूषित होने से जुड़े पाए जाते हैं. जवाब में ग्रोक ने बताया कि एंटरोबैक्टीरिएसी परिवार के कई बैक्टीरिया पेट से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकते हैं. यदि दूषित भोजन का सेवन किया जाए तो दस्त, उल्टी, पेट दर्द और फूड पॉइजनिंग जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट का कहना है कि मसालों में एंटरोबैक्टीरिएसी की मौजूदगी कई बार सफाई या प्रोसेसिंग से जुड़ी समस्याओं की ओर संकेत करती है. इसका मतलब यह हो सकता है कि कच्चे मसालों को ठीक से साफ नहीं किया गया या सुखाने और पैकिंग की प्रक्रिया में स्वच्छता का पूरा ध्यान नहीं रखा गया. International Journal of Current Microbiology and Applied Sciences में पब्लिश एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, यदि लंबे समय तक ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाए जिनमें कीटनाशकों की मात्रा अधिक हो तो इसका शरीर पर असर पड़ सकता है. समय के साथ इन रसायनों के अवशेष शरीर में जमा हो सकते हैं और यह लीवर, आंतों तथा नर्वस सिस्टम पर प्रभाव डाल सकते हैं. खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यून वाले लोगों के लिए इसका खतरा अधिक माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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होली पर खाया उल्टा-सीधा और अब हो रही ब्लोटिंग, बॉडी को ऐसे कर सकते हैं डिटॉक्स

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How To Detox Body After Holi Overeating: होली भारत के सबसे पसंदीदा त्योहारों में से एक है. रंगों, खुशियों और मिलन के इस पर्व पर लोग तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवानों का भी जमकर आनंद लेते हैं. होली के मौके पर गुजिया, लड्डू, मालपुआ, ठंडाई, नमकीन स्नैक्स और कई तरह की मिठाइयां और ड्रिंक्स का चलन रहता है. लेकिन त्योहार की मस्ती में कई बार लोग अपनी रोजमर्रा की डाइट का ध्यान नहीं रख पाते और जरूरत से ज्यादा तला-भुना, मीठा और जंक फूड खा लेते हैं.

होली खत्म होने के बाद अक्सर कई लोगों को पेट फूलने यानी ब्लोटिंग की समस्या होने लगती है. दरअसल, शरीर त्योहार के दौरान खाए गए ज्यादा तेल, चीनी और भारी खाने को पचाने और बाहर निकालने की कोशिश करता है. इसी वजह से पेट भारी लगना, गैस बनना, पाचन से जुड़ी दिक्कतें और थकान जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं. कई लोगों को वजन बढ़ने या ऊर्जा की कमी का एहसास भी होने लगता है.

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क्या कर सकते हैं आप?

डाइटिशियन सिमरत कथूरिया के अनुसार,  ऐसी स्थिति में सबसे पहले दो बातों पर ध्यान देना जरूरी होता है. पहला है शरीर को पर्याप्त मात्रा में पानी देना और दूसरा है डाइजेशन सिस्टम का संतुलन दोबारा ठीक करना. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स के अनुसार त्योहार के बाद शरीर को हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी है. इसके लिए दिनभर पर्याप्त पानी पीना चाहिए. इसके साथ ही नींबू पानी या सौंफ का पानी जैसे प्राकृतिक पेय भी फायदेमंद हो सकते हैं, क्योंकि ये पेट की सूजन कम करने और मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में मदद करते हैं.

खाना खाना नहीं छोड़ना चाहिए

कई लोग होली के बाद ज्यादा खा लेने की भरपाई करने के लिए खाना छोड़ने या क्रैश डाइट करने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा करना सही तरीका नहीं है. एक्सपर्ट  के अनुसार भोजन छोड़ने से शरीर कमजोर हो सकता है और डाइजेशन सिस्टम पर भी असर पड़ सकता है. इसलिए बेहतर है कि घर का हल्का और संतुलित भोजन किया जाए, ताकि शरीर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट सके.

सुस्ती आने पर क्या करना सही रहेगा?

अगर त्योहार के बाद पेट भारी महसूस हो रहा है या सुस्ती लग रही है, तो इसका मतलब हो सकता है कि ज्यादा तला-भुना और मीठा खाने से गट हेल्थ प्रभावित हुई है. ऐसे में दही और छाछ जैसे फर्मेंटेड फूड्स को डाइट में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है. ये आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को संतुलित करने में मदद करते हैं. इसके अलावा अदरक और हल्दी जैसे हल्के मसालों का सेवन भी डाइजेशन को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिना मेहनत किए भी सुबह उठते ही होता है बदन दर्द? ये हैं इसके छिपे हुए कारण

बिना मेहनत किए भी सुबह उठते ही होता है बदन दर्द? ये हैं इसके छिपे हुए कारण


Why Body Hurts Without Exercise: कई लोग सुबह उठते ही कंधों में दर्द, पीठ में जकड़न या पैरों में भारीपन महसूस करते हैं, जबकि उन्होंने कोई भारी काम या एक्सरसाइज भी नहीं की होती. न कोई चोट लगी होती है और न ही ज्यादा शारीरिक मेहनत की होती है, फिर भी शरीर थका-थका और दर्द से भरा महसूस होता है. आजकल इस तरह का रोजमर्रा का बॉडी पेन काफी आम होता जा रहा है.

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?

डॉक्टरों के मुताबिक यह दर्द हमेशा मांसपेशियों पर पड़े दबाव की वजह से नहीं होता. कई बार यह शरीर के अंदर चल रही कुछ प्रक्रियाओं का संकेत भी हो सकता है. आज की लाइफस्टाइल में लंबे समय तक बैठकर काम करना, नींद पूरी न होना, तनाव और असंतुलित खानपान जैसी आदतें धीरे-धीरे शरीर में हल्की सूजन यानी इंफ्लेमेशन पैदा कर सकती हैं. यही सूजन मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द या थकान का कारण बनती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. अभिषेक पाटिल बताते हैं कि लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव भी शरीर पर गहरा असर डालता है. जब व्यक्ति लगातार तनाव में रहता है तो शरीर में कॉर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे हार्मोन ज्यादा मात्रा में बनने लगते हैं. शुरुआत में ये हार्मोन शरीर को चुनौतियों से निपटने में मदद करते हैं, लेकिन जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो शरीर की नसें और मसल्स लगातार तनाव की स्थिति में रहती हैं. इसके कारण गर्दन, कंधों और पीठ में जकड़न या दर्द महसूस हो सकता है.

नींद की कमी बड़ा कारण

नींद की कमी भी शरीर में दर्द का एक बड़ा कारण बन सकती है. दरअसल, गहरी नींद के दौरान ही शरीर खुद की मरम्मत करता है, एनर्जी को फिर से संतुलित करता है और मांसपेशियों को आराम मिलता है. अगर नींद पूरी न हो या बार-बार टूटती रहे तो यह प्रक्रिया अधूरी रह जाती है. इसी वजह से कई लोग बिना ज्यादा काम किए भी सुबह उठते ही थकान या दर्द महसूस करते हैं. खानपान का भी शरीर के दर्द से गहरा संबंध होता है. ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, रिफाइंड शुगर और अनहेल्दी फैट्स वाले भोजन शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं. वहीं फल, सब्जियां, मेवे, बीज और ओमेगा-3 से भरपूर भोजन शरीर में सूजन को कम करने में मदद करते हैं और मांसपेशियों को स्वस्थ रखते हैं.

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क्या इसको कम किया जा सकता है?

रोजमर्रा के ऐसे दर्द को अक्सर छोटी-छोटी लाइफस्टाइल आदतों से काफी हद तक कम किया जा सकता है. नियमित हल्की एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और तनाव को कम करने वाली गतिविधियां शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करती हैं. अगर दर्द कई हफ्तों तक बना रहे या इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दें तो एक्सपर्ट से सलाह लेना बेहतर होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लगातार बुखार, थकान और हड्डियों में दर्द… बच्चों में दिखें ये लक्षण तो न करें इग्नोर, वरना…

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What Are The First Signs Of Cancer In A Child: बचपन में होने वाला कैंसर बाकी कैंसर की तुलना में कम दिखता है, लेकिन यह उतना रेयर भी नहीं है जितना आमतौर पर समझ लिया जाता है. भारत में हर साल लगभग 50,000 से 75,000 नए बच्चों के कैंसर के मामले सामने आते हैं, जिनमें ल्यूकेमिया और लिंफोमा प्रमुख हैं. अच्छी बात यह है कि समय पर पहचान और इलाज से 80 प्रतिशत से अधिक बच्चों के ठीक होने की संभावना रहती है. असली चुनौती शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचानने की है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉ. क्या कहते हैं. 

क्या करने की होती है जरूरत?

डॉ. श्रावण कुमार बोडेपुडी, मणिपाल हॉस्पिटल, विजयवाड़ा  बचपन के कई कैंसर बहुत हल्के और सामान्य से लगने वाले लक्षणों के साथ शुरू होते हैं. लंबे समय तक रहने वाला बुखार, लगातार थकान या शरीर पर छोटी-सी गांठ, ये सब अक्सर सामान्य बीमारी समझकर टाल दिए जाते हैं. कई बार सही जांच और इलाज में हफ्तों या महीनों की देरी हो जाती है, खासकर उन इलाकों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं. अगर माता-पिता सतर्क रहें और संकेतों को गंभीरता से लें, तो इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है.

किन लक्षणों पर ध्यान रखने की जरूरत होती है?

डॉ. श्रावण बताते हैं कि अगर कोई लक्षण दो हफ्तों से ज्यादा बना रहे या बार-बार लौटे, तो उसे नजरअंदाज न करें. बिना वजह गर्दन, बगल या पेट में गांठ या सूजन दिखाई देना, बार-बार नाक से खून आना, मसूड़ों से खून आना या त्वचा पर छोटे लाल धब्बे उभरना चेतावनी हो सकते हैं. लगातार बुखार, बार-बार इंफेक्शन, असामान्य थकान, बिना कारण वजन कम होना या भूख न लगना भी संकेत हैं. हड्डियों या जोड़ों में दर्द, जिससे बच्चा लंगड़ाकर चले या रात में दर्द की शिकायत करे, उसे भी गंभीरता से लें. सुबह के समय सिरदर्द के साथ उल्टी, दृष्टि या संतुलन में समस्या, पेट में सूजन या चेहरा पीला पड़ना, ये सब जांच की मांग करते हैं. तस्वीरों में आंखों में सफेद चमक दिखना दुर्लभ आंख के ट्यूमर का संकेत हो सकता है. जरूरी नहीं कि हर लक्षण कैंसर हो, लेकिन इनकी अनदेखी ठीक नहीं.

आपको क्या करना चाहिए?

ल्यूकेमिया में अक्सर बुखार, थकान, पीलापन और आसानी से चोट लगना दिखता है. लिंफोमा में गर्दन या बगल में सख्त और बढ़ती हुई गांठें नजर आती हैं. ब्रेन ट्यूमर सुबह के सिरदर्द और संतुलन की समस्या से जुड़ा हो सकता है, जबकि कुछ ठोस ट्यूमर पेट में सूजन या गांठ के रूप में दिखते हैं. अगर बच्चे के लक्षण बने रहें या बढ़ते जाएं, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें. सामान्य खून की जांच और इमेजिंग से शुरुआती संकेत मिल सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके

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Why Cervical Cancer Is Common In India: भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं के बीच सबसे गंभीर हेल्थ समस्याओं में से एक है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, देश में हर 8 मिनट में एक महिला की मौत इस बीमारी से होती है. सबसे दुखद बात यह है कि यह उन कैंसरों में से है जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है. डॉ. विश्वनाथ, सीनियर कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट ने TOI को बताया कि सर्वाइकल कैंसर धीरे-धीरे विकसित होता है. कई वर्षों तक सेल्स में बदलाव चुपचाप होता रहता है, जो समय रहते पहचान लिया जाए तो पूरी तरह रोका जा सकता है.  यही इसकी चुनौती भी है और अवसर भी. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे इसको रोका जा सकता है,

HPV वैक्सीन

अधिकांश सर्वाइकल कैंसर के पीछे हाई-रिस्क ह्यूमन पैपिलोमा वायरस जिम्मेदार होता है. एचपीवी वैक्सीन खतरनाक स्ट्रेन्स से बचाव करती है. यह 9 से 14 वर्ष की उम्र में सबसे प्रभावी मानी जाती है, लेकिन 26 वर्ष तक भी दी जा सकती है. जिन देशों ने बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन किया, वहां मामलों में काफी कमी देखी गई है. यह वैक्सीन लाइफस्टाइल नहीं, बल्कि कैंसर से सुरक्षा का कदम है.

रेगुलर स्क्रीनिंग

शुरुआती स्टेप में यह कैंसर कोई स्पष्ट संकेत नहीं देता. पैप स्मीयर, एचपीवी डीएनए टेस्ट या विजुअल इंस्पेक्शन जैसी जांचें सेल्स में होने वाले बदलाव को पहले ही पकड़ सकती हैं. 30 से 65 वर्ष की महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच करानी चाहिए. सब ठीक लग रहा है सोचकर जांच टालना दिक्कतों को बढ़ा सकता है.

सुरक्षित फिजिकल रिलेशन

एचवीपी मुख्य रूप से यौन संपर्क से फैलता है. कंडोम का नियमित उपयोग इंफेक्शन के खतरे को कम करता है, हालांकि पूरी तरह खत्म नहीं करता. बहुत कम उम्र में यौन सक्रियता और कई पार्टनर्स भी जोखिम बढ़ाते हैं. जागरूकता और खुली बातचीत ही बचाव का रास्ता है.

स्मोकिंग से दूरी

तंबाकू इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है, जिससे शरीर एचपीवी इंफेक्शन को साफ नहीं कर पाता. सिगरेट के हानिकारक रसायन सर्वाइकल म्यूकस में भी पाए गए हैं. स्मोकिंग छोड़ना धीरे-धीरे खतरा कम कर सकता है.

इन संकेतों को नजरअंदाज न करें

पीरियड्स के बीच ब्लीडिंग, संबंध के बाद खून आना, मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग, बदबूभरे डिस्चार्ज या लगातार पेल्विक दर्द जैसे लक्षणों को हल्के में न लें. शुरुआती पहचान होने पर इलाज के परिणाम बेहद बेहतर होते हैं. सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम संभव है, बस जरूरत है जागरूकता, समय पर जांच और सामूहिक सहयोग की. सही जानकारी और समय पर कदम उठाने से इस बड़ी बीमारी से बचा जा सकता है. 

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30 की उम्र में भूलने लगे हैं छोटी-छोटी बातें, कहीं आपके दिमाग पर ‘ब्रेन फॉग’ तो नहीं छा रहा?

30 की उम्र में भूलने लगे हैं छोटी-छोटी बातें, कहीं आपके दिमाग पर ‘ब्रेन फॉग’ तो नहीं छा रहा?


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Why Do I Feel Mentally Slow In My 30s: तीस की उम्र में याददाश्त कम होना आम बात नहीं है.  लेकिन कई लोग एक अलग तरह की परेशानी महसूस कर रहे हैं जैसे कि दिमाग में धुंध-सा छाया रहना, सोचने की रफ्तार धीमी पड़ जाना, मीटिंग में ध्यान न टिक पाना, या बात करते-करते साधारण शब्द भूल जाना. जो काम पहले आसानी से हो जाते थे, अब बोझ जैसे लगते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि यह किन कारणों के चलते हो रहा है और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है. 

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?

न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विवेक कुमार ने TOI को बताया कि यह डिमेंशिया नहीं, बल्कि ‘ब्रेन फॉग’ है. इसमें मेंटल थकान, उलझन और एकाग्रता में कमी की दिक्कत का सामना करना पड़ता है.  एक्सपर्ट के अनुसार,  लगातार तनाव, नींद की कमी, पोषण की कमी, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और कुछ मामलों में कोविड के बाद की रिकवरी इसकी बड़ी वजहें हैं. यानी दिमाग जवाब नहीं दे रहा, वह संकेत दे रहा है कि उसे संभालने की जरूरत है.

क्या यह कोई बीमारी है?

ब्रेन फॉग कोई आधिकारिक बीमारी नहीं, बल्कि लक्षणों का मेल है जिसमें मानसिक सुस्ती, छोटी-छोटी बातें भूलना, मल्टीटास्किंग में दिक्कत और दोपहर तक थकावट शामिल होती है. दिमाग शरीर की लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा इस्तेमाल करता है. जब नींद अधूरी हो, तनाव ज्यादा हो या पोषण कम मिले, तो सबसे पहले सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है. ब्रेन बंद नहीं होता, बस लो पावर मोड में चला जाता है.

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?

तीस की उम्र बॉयोलॉजिकल रूप से मेंटल क्षमता का अच्छा दौर माना जाता है, लेकिन लाइफस्टाइल बदल चुकी है. काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां, बच्चों की परवरिश, सोशल मीडिया की तुलना और लगातार डिजिटल एक्सपोजर तनाव बढ़ाते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन बताते हैं कि लंबी कार्य अवधि और कम नींद ध्यान और वर्किंग मेमोरी को कमजोर करती है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, एक तिहाई एडल्ट पर्याप्त नींद नहीं ले पाते, जबकि नींद के दौरान ही दिमाग खुद को रिपेयर करता है.

आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

पोषक तत्वों की कमी भी अहम कारण हो सकती है. विटामिन B12, विटामिन D3 और आयरन की कमी से एकाग्रता और एनर्जी घटती है. इसके साथ में थकान, झुनझुनी, बाल झड़ना या पीली त्वचा जैसे संकेत मिलें तो ब्लड टेस्ट कराना जरूरी है. नींद, नियमित व्यायाम और पानी की पर्याप्त मात्रा, ये तीन चीजें अक्सर नजरअंदाज होती हैं. रोज 30 मिनट हल्का-फुल्का एक्सराइज ब्लड फ्लो बढ़ाता है और ध्यान सुधारता है. हल्का डिहाइड्रेशन भी फोकस बिगाड़ सकता है. संतुलित आहार और स्क्रीन से दूरी भी मददगार है. अगर भूलने की समस्या रोजमर्रा के काम या नौकरी को प्रभावित करे, या अचानक भ्रम, तेज सिरदर्द, बोलने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

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