फोन के सामने खांसेंगे, ऐप बता देगा फेफड़ों का हाल! AIIMS ने इस AI ऐप को दी मंजूरी, जानें कैसे?

फोन के सामने खांसेंगे, ऐप बता देगा फेफड़ों का हाल! AIIMS ने इस AI ऐप को दी मंजूरी, जानें कैसे?


How Shwaasa AI App Detects COPD Through Cough: कर्नाटक के एक स्टार्टअप ने एआई आधारित मोबाइल एप ‘श्वासा’ तैयार किया है, जिसे एम्स से मान्यता मिल चुकी है. माना जा रहा है कि यह एप देश की प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था में जांच से जुड़ी एक बड़ी कमी को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है. यह एप खास एल्गोरिद्म तकनीक के जरिए मरीजों में क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज की स्क्रीनिंग करता है, जो भारत में बीमारियों का एक प्रमुख कारण है.

एम्स दिल्ली में हुआ टेस्ट

एम्स-दिल्ली ने पिछले साल अपने बल्लभगढ़ केंद्र में 460 लोगों पर इसका टेस्ट किया. लंग्स की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाली स्पाइरोमेट्री, जिसे इस एरिया का मानक परीक्षण माना जाता है, उससे तुलना करने पर एप के नतीजों में संतोषजनक समानता पाई गई. खासकर गंभीर मामलों में इसकी सटीकता ज्यादा मजबूत रही. सामान्य और असामान्य मामलों में अंतर पहचानने में यह करीब 90 प्रतिशत तक सही पाया गया, जबकि सीओपीडी और अस्थमा जैसी बीमारियों की पहचान में इसकी सटीकता 82 से 87 प्रतिशत के बीच रही. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

सीओपीडी भारत में बीमारी का दूसरा बड़ा कारण है, लेकिन अधिकतर जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्पाइरोमेट्री की सुविधा उपलब्ध नहीं है. एम्स से जुड़े डॉक्टर हर्षल रमेश साल्वे, जो इस टेस्ट का हिस्सा थे, उन्होंने कहा कि “कई जिला अस्पतालों में भी स्पाइरोमेट्री की सुविधा नहीं है. यह ज्यादातर मेडिकल कॉलेजों तक सीमित है.”

काफी आसानी से कर सकते हैं यूज

एप का काम करने का तरीका काफी सरल है. मरीज को सिर्फ स्मार्टफोन में खांसना होता है. फोन का माइक्रोफोन खांसी की आवाज रिकॉर्ड करता है और उसमें लगा एआई सॉफ्टवेयर तुरंत उसका एनालिसिस करता है. कुछ ही मिनटों में यह बता देता है कि लंग्स सामान्य हैं या सीओपीडी अथवा अस्थमा के संकेत दिख रहे हैं. पूरी जांच करीब आठ मिनट में पूरी हो जाती है. स्पाइरोमेट्री के उलट, इस एप को चलाने के लिए किसी खास टेस्ट या भारी उपकरण की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह है कि इसे संसाधन सीमित इलाकों के लिए उपयोगी माना जा रहा है. एम्स के डॉक्टरों ने सुझाव दिया है कि जहां स्पाइरोमेट्री उपलब्ध नहीं है, वहां प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य केंद्रों, यहां तक कि आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

टीवी को लेकर भी हो रहा है टेस्ट
एम्स एक अलग रिसर्च परियोजना के तहत टीवी की स्क्रीनिंग में भी इसकी उपयोगिता का आकलन कर रहा है. फिलहाल यह उपकरण कर्नाटक समेत कुछ राज्यों में इस्तेमाल हो रहा है. फरीदाबाद में निजी डॉक्टरों को जोड़कर इसके उपयोग को और बढ़ाने की योजना है, ताकि इसके नतीजों को दर्ज किया जा सके.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मौत से पहले एक बच्ची ने कैसे बचाई 4 लोगों की जान, मेडिकल फील्ड में कैसे होता है यह कमाल?

मौत से पहले एक बच्ची ने कैसे बचाई 4 लोगों की जान, मेडिकल फील्ड में कैसे होता है यह कमाल?


How Does Organ Donation and Transplantation Work: केरल में 10 महीने की मासूम आलिन शेरिन अब्राहम ने मिसाल कायम किया है. वे सबसे कम उम्र की डोनर बनी. इस बच्ची का पार्थिव शरीर पहले मल्लप्पल्ली के एक निजी अस्पताल के शवगृह में रखा गया था. बाद में इसे वेस्ट वालुम्मानिल स्थित उनके घर पर अंतिम दर्शन के लिए लाया गया, जहां दूर-दूर से लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे. पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया.

आलिन भले ही इस दुनिया से चली गईं, लेकिन अपने पीछे चार जिंदगियों में नई रोशनी छोड़ गईं. उनके अंगदान ने गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को जीवनदान दिया. यही अंगदान और ट्रांसप्लांट की असली ताकत है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कैसे काम करता है?

क्या होता है ऑर्गन डोनेशन?

हेल्थ विषयों पर जानकारी देने वाली बेवसाइट clevelandclinic के अनुसार, ऑर्गन डोनेशन वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति के स्वस्थ अंग को निकालकर ऐसे मरीज के शरीर में लगाया जाता है, जिसका कोई अंग काम करना बंद कर चुका हो. यह एक बेहद संवेदनशील और समय से जुड़ी मेडिकल प्रक्रिया है. आमतौर पर दो सर्जरी लगभग एक साथ होती हैं, एक में डोनर के शरीर से अंग निकाला जाता है और दूसरी में जरूरतमंद मरीज के शरीर में उसे ट्रांसप्लांट किया जाता है.

कितने तरह के होते हैं ऑर्गन डोनेशन?

ऑर्गन डोनेशन दो प्रकार का होता है, मृत्यु के बाद किया जाने वाला दान और जीवित व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला दान. अधिकांश मामलों में ब्रेन मृत्यु की पुष्टि के बाद परिजनों की सहमति से अंगदान किया जाता है. जीवित व्यक्ति भी किडनी जैसे कुछ अंग दान कर सकता है, बशर्ते उसकी सेहत पूरी तरह ठीक हो और उसका अंग जरूरतमंद मरीज के शरीर के अनुकूल हो. मृत्यु के बाद हार्ट, लिवर, किडनी, लंग्स, पैंक्रियास और आंत जैसे अंग दान किए जा सकते हैं. इसके अलावा आंख, स्किन, बोन मैरो और हार्ट  भी दान किए जा सकते हैं.

कौन होता है डोनर?

डॉक्टरों के मुताबिक, लगभग हर व्यक्ति संभावित अंगदाता हो सकता है. उम्र से ज्यादा महत्वपूर्ण है अंगों की सेहत और मेडिकल जांच. सही समय पर लिया गया एक निर्णय कई लोगों को दूसरी जिंदगी दे सकता है. अंगदान और ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया आसान नहीं होती. यह कई चरणों से होकर गुजरती है. शुरुआत दान के निर्णय से होती है और अंत उस मेडिकल प्रक्रिया पर होता है, जिसमें एक व्यक्ति का स्वस्थ अंग निकालकर दूसरे व्यक्ति के शरीर में सफलतापूर्वक लगाया जाता है. यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि अंगदाता जीवित है या मृत्यु के बाद दान किया गया है.

मृत्यु के बाद होने वाले अंगदान में समय बहुत कम होता है, क्योंकि मौत के कुछ ही घंटों के भीतर अंगों को सुरक्षित निकालना जरूरी होता है. देरी होने पर अंगों की उपयोगिता कम हो सकती है. वहीं, जीवित डोनर के मामले में पूरी तैयारी और योजना के साथ काम किया जाता है। इसमें स्वास्थ्य जांच, आवश्यक सहमति और सुरक्षा उपायों पर विशेष ध्यान दिया जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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AIIMS दिल्ली में AI से इलाज शुरू, इन बीमारियों की होगी जल्दी पहचान

AIIMS दिल्ली में AI से इलाज शुरू, इन बीमारियों की होगी जल्दी पहचान


दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अब इलाज का अंदाज तेजी से बदल रहा है. यहां ऐसी स्मार्ट तकनीक काम करने लगी है जो मरीज के डॉक्टर तक पहुंचने से पहले ही उसकी जांच रिपोर्ट का विश्लेषण कर देती है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से अब बीमारी की पहचान और इलाज की दिशा तय करने की प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक तेज और सटीक हो रही है.

एक्स-रे रिपोर्ट पर पहले नजर अब AI की

एम्स में छाती का एक्स-रे होने के बाद उसकी पहली जांच अब एक एडवांस्ड AI सिस्टम करता है. यह तकनीक कुछ ही सेकंड में इमेज को स्कैन कर संभावित संक्रमण, गांठ या अन्य असामान्यताओं की ओर संकेत दे देती है. डॉक्टर के पास रिपोर्ट पहुंचने तक शुरुआती विश्लेषण तैयार रहता है, जिससे निर्णय लेने में समय नहीं लगता. इससे न केवल भीड़भाड़ वाले सरकारी अस्पताल में काम का दबाव घटा है बल्कि मरीजों को रिपोर्ट के लिए लंबा इंतजार भी नहीं करना पड़ता.

शुरुआती चरण में कैंसर पकड़ने की तैयारी

देश में बढ़ते ब्रेस्ट कैंसर के मामलों को देखते हुए एम्स की विशेषज्ञ टीम एक नई AI-आधारित तकनीक विकसित कर रही है. डॉक्टर कृतिका रंगराजन और उनकी टीम ऐसी प्रणाली पर काम कर रही है जो कैंसर के बेहद शुरुआती संकेतों को पहचान सके. अक्सर यह बीमारी तब सामने आती है जब वह शरीर में फैल चुकी होती है. नई तकनीक का उद्देश्य इसी देरी को खत्म करना है.

इस सिस्टम का परीक्षण देश के कई प्रमुख मेडिकल केंद्रों में जारी है. यदि कैंसर शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए तो उपचार अधिक प्रभावी और जीवन रक्षा की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. AI आधारित विश्लेषण डॉक्टरों को समय रहते इलाज शुरू करने में मदद देगा.

‘मधुनेत्र’ से गांव तक पहुंचेगी हाईटेक आंख जांच

एम्स ने सरकार के सहयोग से ‘मधुनेत्र’ नामक एक विशेष कार्यक्रम शुरू किया है. यह AI आधारित सिस्टम आंखों की अंदरूनी तस्वीरों को स्कैन कर मधुमेह या अन्य कारणों से होने वाली रेटिना संबंधी समस्याओं की पहचान करता है. जांच के तुरंत बाद जोखिम की जानकारी मिल जाती है, जिससे समय पर इलाज संभव हो पाता है.

इस पहल को देशभर में लागू करने की योजना है ताकि ग्रामीण और दूरदराज इलाकों के लोगों को भी बड़े शहरों जैसी उन्नत जांच सुविधा मिल सके. विशेषज्ञों का मानना है कि मशीनें लगातार और बिना थके काम करती हैं, जिससे मानवीय त्रुटि की संभावना कम हो जाती है. हालांकि अंतिम निर्णय डॉक्टर ही लेते हैं, लेकिन AI अब उनके लिए एक मजबूत सहायक की भूमिका निभा रहा है.

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Heavy Makeup से खाली पेट रहने तक, डेंटिस्ट के पास जाने से पहले भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां

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Things To Avoid Before Dental Treatment: डेंटिस्ट के पास जाने से पहले खुशी से उछल पड़ना शायद ही किसी को पसंद हो. फिर भी दांतों और मुंह की सेहत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इसलिए हम समय निकालकर क्लिनिक तक पहुंचते ही हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि डेंटिस्ट के पास जाने से पहले कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है? कई बार अनजाने में की गई गलतियां इलाज को मुश्किल बना सकती हैं. StarsInsider की रिपोर्ट के अनुसार डेंटिस्ट से मिलने से पहले आपको इन बातों का ध्यान रखना चाहिए. 

भारी मेकअप से बचना चाहिए

मसलन, अपॉइंटमेंट पर जाते समय भारी मेकअप करना ठीक नहीं माना जाता. हल्का काजल या मस्कारा ठीक है, लेकिन फाउंडेशन और खासकर लिपस्टिक से बचना बेहतर है. इलाज के दौरान मुंह लंबे समय तक खुला रहता है, उपकरणों का इस्तेमाल होता है और कई बार एनेस्थीसिया भी दिया जाता है. इससे चेहरा सुन्न या थोड़ा गंदा हो सकता है, इसलिए सादगी बेहतर विकल्प है.

मुस्कान पर भी ध्यान देना चाहिए

कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री के लिए जाते समय किसी फिल्मी सितारे जैसी परफेक्ट मुस्कान की तस्वीर साथ ले जाना भी हमेशा काम नहीं आता. दांतों का आकार, रंग और बनावट हर व्यक्ति में अलग होती है. जैसे हर किसी पर एक जैसा हेयर कलर सूट नहीं करता, वैसे ही मुस्कान भी हर चेहरे के हिसाब से डिजाइन की जाती है. इसलिए अपने डेंटिस्ट की सलाह पर भरोसा करना ज्यादा समझदारी है.

मेडिकल हिस्ट्री बताना चाहिए

सबसे अहम बात है अपनी मेडिकल हिस्ट्री छिपाना नहीं. अगर आपको कोई पुरानी बीमारी है, हाल ही में सर्जरी हुई है या आप नियमित दवाएं लेते हैं, तो यह जानकारी पहले ही दे दें. कुछ स्थितियों में डेंटल प्रक्रिया से पहले एंटीबायोटिक या खास सावधानियां जरूरी हो सकती हैं. सही जानकारी से ही सुरक्षित इलाज संभव है.

क्या खाना खाया यह मायने रखता है?

अपॉइंटमेंट से पहले क्या खाना है, यह भी मायने रखता है. ऐसा भोजन लें जो ब्लड शुगर अचानक कम न करे और आपको पूरे समय ऊर्जा देता रहे. प्रोटीन और हेल्दी फैट वाला हल्का भोजन बेहतर रहता है. अगर आप खाली पेट जाएंगे या सिर्फ कुछ पीकर चले जाएंगे, तो इलाज के दौरान बेचैनी, चिड़चिड़ापन या हल्का चक्कर आ सकता है.

इन चीजों का भी रखें ध्यान

एक और अहम बात शराब से दूरी रखें. कुछ लोग घबराहट कम करने के लिए पी लेते हैं, लेकिन यह डेंटल दवाइयों के साथ प्रतिक्रिया कर सकती है और इलाज को जटिल बना सकती है. बेहतर है कि साफ दिमाग और सही तैयारी के साथ डेंटिस्ट के पास जाएं, ताकि आपकी मुस्कान भी सुरक्षित रहे और इलाज भी आसान हो. इलाज से पहले दर्द की दवा लेना कई लोगों को समझदारी भरा कदम लगता है, खासकर जब उन्हें लगता है कि प्रक्रिया दर्दनाक हो सकती है. लेकिन इसकी जरूरत अक्सर नहीं पड़ती. डेंटिस्ट इलाज के दौरान एनेस्थीसिया का इस्तेमाल करते हैं, जिससे आपको दर्द महसूस नहीं होता. साथ ही, प्रक्रिया के बाद जरूरत हो तो वही सही दवा भी लिखकर देते हैं. इसलिए पहले से खुद से पेनकिलर लेने की बजाय डॉक्टर की सलाह का इंतजार करना ज्यादा सुरक्षित और बेहतर विकल्प है.

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इफ्तारी में गलती से भी नहीं खानी चाहिए ये चीजें, वरना खराब हो जाएगी तबीयत

इफ्तारी में गलती से भी नहीं खानी चाहिए ये चीजें, वरना खराब हो जाएगी तबीयत


Which Foods Should Be Avoided At Iftar: इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र महीना रमजान में शुरू हो गया है. 19 फरवरी से भारत में भी माह-ए-रमजान का आगाज हो रहा है. त्योहारों की सबसे खास बात यह है कि ये सिर्फ जश्न का मौका नहीं होते, वे हमारी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं की याद भी दिलाते हैं. रमजान का महीना भी ऐसा ही पवित्र समय है, जो इबादत, सब्र और आत्मसंयम का संदेश देता है. रोजा रखना सिर्फ धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन और शरीर को संतुलित रखने का एक तरीका भी माना जाता है. सुबह सूर्योदय से पहले सेहरी की जाती है और सूर्यास्त पर इफ्तार के साथ रोज़ा खोला जाता है. यह 30 दिनों की आध्यात्मिक यात्रा होती है, जिसमें खाने-पीने की आदतों का विशेष महत्व होता है. चलिए आपको बताते हैं कि इफ्तारी में आपको कौन सी गलती नहीं करनी चाहिए, जिससे तबीयत खराब हो सकता है. 

बदल जाती है पूरी लाइफस्टाइल

रमजान के दौरान लाइफस्टाइल पूरी तरह बदल जाती है. लंबे समय तक भूखे-प्यासे रहने के बाद जब खाने का समय आता है, तो लोग अक्सर ऐसी चीजें चुन लेते हैं जो स्वाद में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन सेहत के लिए भारी पड़ सकती हैं. Hamad Medical Corporation की रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट की सलाह है कि इस महीने में खानपान को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि अनियमित भोजन और ज्यादा तला-भुना या मीठा खाना पाचन पर असर डाल सकता है.

रमजान में रोजा रखने वाले लोगों को अपने खानपान को लेकर खास सतर्क रहना चाहिए. दिनभर भूखे-प्यासे रहने के बाद इफ्तार के समय क्या खाया जा रहा है, यह सीधे तौर पर सेहत पर असर डालता है. अचानक बदली हुई दिनचर्या और लंबे गैप के बाद भारी या मीठा भोजन लेने से पेट में जलन, गैस, थकान या बेचैनी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं, खासकर ज्यादा शक्कर और फैट वाली चीजें खाली पेट जल्दी असर दिखाती हैं.

तली-भुनी और ज्यादा चिकनाई वाली चीजों से परहेज

इफ्तार में तली-भुनी और ज्यादा चिकनाई वाली चीजों से परहेज करना बेहतर होता है. समोसा, फ्राइड आलू या अन्य डीप-फ्राइड स्नैक्स स्वाद में भले अच्छे लगें, लेकिन इनमें फैट और सोडियम की मात्रा ज्यादा होती है. रोजे के बाद इन्हें ज्यादा मात्रा में खाने से सुस्ती, भारीपन और थकान बढ़ सकती है. इसी तरह ज्यादा नमक वाली चीजें, जैसे अचार या अत्यधिक नमकीन स्नैक्स, शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकती हैं. दिनभर की फास्टिंग के बाद शरीर को हाइड्रेशन की जरूरत होती है, ऐसे में ज्यादा सोडियम तरल संतुलन बिगाड़ सकता है.

मीठा भी सोच समझ कर खाना चाहिए

मीठे खाद्य पदार्थ भी सोच-समझकर लेने चाहिए. ज्यादा शक्कर वाली मिठाइयां या डेजर्ट तुरंत ऊर्जा तो देते हैं, लेकिन यह ऊर्जा ज्यादा देर तक टिकती नहीं. कुछ समय बाद फिर से कमजोरी या सुस्ती महसूस हो सकती है. इसके अलावा चॉकलेट, चाय, कॉफी या अन्य कैफीन युक्त पेय भी इफ्तार में सीमित मात्रा में ही लेने चाहिए,कैफीन शरीर से पानी और जरूरी मिनरल्स बाहर निकाल सकता है, जिससे डिहाइड्रेशन बढ़ने का खतरा रहता है. संतुलित और हल्का भोजन ही रोजे के बाद शरीर को सही तरीके से ऊर्जा देता है और सेहत को स्थिर रखता है.

इसे भी पढ़ें-Hidden Cancer Risks: सिर्फ सिगरेट-शराब से नहीं कैंसर का खतरा, आपकी ये 5 छोटी आदतें भी जिम्मेदार; एक्सपर्ट से जानें

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युवाओं में तेजी से बढ़ रहा जॉइंट पेन, 20-30 की उम्र और जोड़ों में दर्द? जानिए वजह और बचाव

युवाओं में तेजी से बढ़ रहा जॉइंट पेन, 20-30 की उम्र और जोड़ों में दर्द? जानिए वजह और बचाव


अक्सर यही माना जाता है कि जोड़ों का दर्द सिर्फ 60 या 70 साल की उम्र के बाद ही होता है. घुटनों का जवाब दे देना, सीढ़ियां चढ़ते समय दर्द होना या कमर का झुक जाना, इन्हें बुढ़ापे की निशानी माना जाता था, लेकिन आज की हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है. अब 20–30 साल के युवा भी घुटने, कमर, गर्दन और कंधों के दर्द से परेशान दिखाई दे रहे हैं. कई लोग सुबह उठते ही अकड़न महसूस करते हैं, थोड़ी देर बैठने के बाद खड़े होने में तकलीफ होती है या फिर हल्की-सी एक्सरसाइज के बाद भी जोड़ों में दर्द रहने लगता है.

यह बदलाव अचानक नहीं आया है. हमारी बदलती लाइफस्टाइल, काम करने का तरीका और शरीर के प्रति लापरवाही ने इस समस्या को कम उम्र में ही बढ़ा दिया है.अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यही हल्का दर्द आगे चलकर बड़ी समस्या बन सकता है. तो आइए आज जानते हैं कि युवाओं में तेजी से बढ़ रहे जॉइंट पेन की वजह और बचाव क्या है. 

युवाओं में जॉइंट पेन बढ़ने की मुख्य वजहें

1. ज्यादा बैठने वाली लाइफस्टाइल – आज का कामकाज ज्यादातर लैपटॉप और मोबाइल पर निर्भर है. घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करना, कम चलना-फिरना और फिजिकल एक्टिविटी की कमी से मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं. जब मांसपेशियां कमजोर होती हैं तो जोड़ों पर ज्यादा दबाव पड़ता है. 

2. गलत बॉडी पोस्चर – झुक कर बैठना, मोबाइल देखते समय गर्दन नीचे रखना, या लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठना, ये आदतें गर्दन, कंधे और पीठ के जोड़ों पर बुरा असर डालती हैं. 

3. गलत या जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज – एक्सरसाइज फायदेमंद है, लेकिन अगर सही तरीके से न किया जाए तो यह चोट का कारण बन सकता है. अचानक भारी वजन उठाना, वार्म-अप न करना या बिना ट्रेनर के कठिन एक्सरसाइज करना जोड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है. 

4. कमजोर कोर मसल्स – पेट और पीठ की मांसपेशियां यानी कोर मसल्स शरीर को सहारा देती हैं. इनके कमजोर होने से घुटनों और कमर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. 

5. दर्द को नजरअंदाज करना – कई युवा सोचते हैं कि अभी तो उम्र ही क्या है, अपने आप ठीक हो जाएगा, लेकिन बार-बार होने वाला दर्द शरीर का संकेत है कि कुछ गड़बड़ है. इसे अनदेखा करना आगे चलकर स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है. 

कौन-कौन से लक्षणों को हल्के में न लें?

सुबह उठते समय जोड़ों में अकड़न, सीढ़ियां चढ़ते या उतरते समय घुटनों में दर्द, कंधे घुमाने पर चटकने की आवाज, लंबे समय तक बैठने के बाद कमर दर्द, हल्की एक्सरसाइज के बाद भी सूजन या दर्द अगर ये लक्षण बार-बार दिखें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. अगर दर्द की शुरुआत में ही जांच कर ली जाए, तो समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है. देरी करने से जोड़ों की स्थिति खराब हो सकती है और इलाज लंबा चल सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, सही समय पर पहचान और सही इलाज से स्थायी नुकसान से बचा जा सकता है. 

बचाव के आसान और असरदार उपाय

1. हर दिन कम से कम 30 मिनट पैदल चलें या हल्की एक्सरसाइज करें. 

2. वर्कआउट से पहले और बाद में स्ट्रेचिंग जरूर करें. कोर मसल्स मजबूत करने वाली एक्सरसाइज अपनाएं. 

3. सीधे बैठें, स्क्रीन आंखों की सीध में रखें और हर 30–40 मिनट में ब्रेक लें. 

4. ज्यादा वजन से घुटनों पर ज्यादा दबाव पड़ता है, जिससे दर्द बढ़ सकता है. 

5. जोड़ों को भी आराम की जरूरत होती है. लगातार मेहनत के बाद शरीर को रिकवरी का समय दें. 

6. दर्द लंबे समय तक बना रहे तो ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से जांच करवाएं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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