डिमेंशिया से जूझते पेरेंट्स के लिए जरूरी तैयारी, जानें परिवारों के लिए सही गाइड क्या है?

डिमेंशिया से जूझते पेरेंट्स के लिए जरूरी तैयारी, जानें परिवारों के लिए सही गाइड क्या है?


जब कोई परिवार का सदस्य डिमेंशिया जैसी बीमारी से जूझता है, तो यह सिर्फ मरीज के लिए ही चुनौती नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के लिए इमोशनल और फिजिकल रूप से थकाने वाला एक्सपीरियंस बन जाता है. परिवार के सदस्य अक्सर केयर टेकर की भूमिका निभाते हैं और यह जिम्मेदारी समय के साथ बढ़ती जाती है. डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं है. यह दिमाग में तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली कई स्थितियों का समूह है. इसका असर स्मृति, सोचने समझने की क्षमता, बातचीत और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता पर पड़ता है. यह धीरे-धीरे बढ़ती है और इसके अलग-अलग चरण होते हैं जो परिवार समय से इस बीमारी को समझते हैं और तैयारी करते हैं. तो आइए जानते हैं कि डिमेंशिया से जूझते पेरेंट्स के लिए जरूरी तैयारी कैसे करें और परिवारों के लिए सही गाइड क्या है. 

डिमेंशिया के स्टेज

1. प्रारंभिक स्टेज – शुरुआत में लक्षण हल्के होते हैं. मरीज हाल ही की बातें भूल सकते हैं, चीजें रख-रखाव में गड़बड़ी कर सकते हैं या योजनाएं बनाने में मुश्किल महसूस कर सकते हैं.इस समय उन्हें थोड़ी मदद या याद दिलाने की जरूरत होती है.

2. मध्यम स्टेज – जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, स्मृति हानि साफ दिखने लगती है. मरीज समय, दिन या स्थान को लेकर भ्रमित हो सकते हैं, परिचित लोगों को पहचानने में कठिनाई हो सकती है और रोजमर्रा के कामों में सहायता की जरूरत होती है.

3. अंतिम स्टेज – इस स्टेज में मरीज को लगभग हर समय देखभाल की जरूरत होती है. उन्हें बातचीत करने, बुनियादी काम करने या अपने परिवार वालों को पहचानने में कठिनाई हो सकती है. 
 
डिमेंशिया से जूझते पेरेंट्स के लिए जरूरी तैयारी कैसे करें

डिमेंशिया के मरीजों के लिए घर का वातावरण बहुत मायने रखता है. कुछ छोटे बदलाव उन्हें सुरक्षित और आरामदायक महसूस करा सकते हैं. जैसे  रोजाना का एक समान कार्यक्रम भ्रम और चिंता को कम करता है. शांति से बात करना, छोटे वाक्य प्रयोग करें और जवाब देने के लिए पर्याप्त समय दें. मरीज कभी-कभी कुछ करना चाहते हैं जो संभव नहीं है. बहस करने की बजाय ध्यान दूसरी ओर मोड़ें.  कोई यात्रा करने की जिद करता है, सीधे नहीं कहने की बजाय उन्हें किसी और एक्टिविटी में लगाएं. मरीजों के साथ बहस करना, चिल्लाना या उन्हें समझाने की कोशिश करना स्थिति को और खराब कर सकता है. 

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परिवारों के लिए सही गाइड क्या है?

डिमेंशिया से पीड़ित माता-पिता की देखभाल अक्सर लंबी जिम्मेदारी बन जाती है.  परिवारों को इस यात्रा के लिए इमोशनल  और व्यावहारिक रूप से तैयार रहना चाहिए.  जिसमें वित्तीय तैयारी देखभाल की लागत का आकलन करें. बीमारी के बढ़ने के पैटर्न को समझें. घर आधारित मदद, डे-केयर और मेमोरी केयर सुविधाओं को जानें. प्रशिक्षित केयर टेकर की मदद लें और शिक्षा कार्यक्रमों में भाग लें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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नाखून बता सकते हैं सेहत का राज, आयरन की कमी से लेकर फेफड़ों की बीमारी तक देते हैं ये संकेत

नाखून बता सकते हैं सेहत का राज, आयरन की कमी से लेकर फेफड़ों की बीमारी तक देते हैं ये संकेत


हाथ और नाखून न सिर्फ हमारी पर्सनैलिटी और मैनर्स  का प्रतीक हैं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य के बारे में भी कई अहम बातें बताते हैं.अक्सर लोग नाखूनों को सिर्फ सुंदरता के लिए देखते हैं, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि नाखून शरीर की अंदरूनी स्थिति के संकेत देने वाले छोटे मेसेंजर होते हैं. नाखून लगभग 3 मिलीमीटर प्रति माह की धीमी दर से बढ़ते हैं. इस धीमी वृद्धि के कारण, नाखून समय के साथ शरीर में हो रहे सूक्ष्म बदलावों को रिकॉर्ड करते हैं. अगर नाखूनों का रंग, आकार, मोटाई या बनावट बदलती है, तो यह कभी-कभी किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है.

नाखूनों पर ध्यान क्यों जरूरी है?

स्किन विशेषज्ञ बताते हैं कि नाखूनों में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज करना सही नहीं है. उनके अनुसार, नाखूनों का रंग, बनावट और आकार कई बार शरीर की गंभीर बीमारियों के संकेत दे सकते हैं. जैसे पीले या चम्मच जैसे नाखून आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया का संकेत हो सकते हैं, पीले और मोटे नाखून  फंगल संक्रमण या फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं की ओर इशारा कर सकते हैं. नाखूनों पर गहरे धब्बे या रंग बदलना  कुछ मामलों में यह स्किन कैंसर जैसे गंभीर रोग का संकेत भी हो सकता है. अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH) के अनुसार, नाखूनों में बदलाव पोषण की कमी,  हार्ट डिजीज, फेफड़ों की बीमारियां और मेटाबॉलिक से जुड़ी स्थितियों को दर्शा सकते हैं. 

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आयरन की कमी से लेकर फेफड़ों की बीमारी तक देते हैं ये संकेत

1. आयरन की कमी का संकेत – आयरन शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद करता है. जब आयरन की कमी होती है, तो शरीर एनर्जी बचाने लगता है. नाखून जो केराटिन से बने होते हैं और अच्छे ब्लड फ्लो पर निर्भर करते हैं, वे सबसे पहले इस कमी का संकेत दिखाते हैं. आयरन की कमी के कारण नाखून पीले रंग के हो सकते हैं, पतले या कमजोर हो सकते हैं, कभी-कभी अंदर की ओर मुड़कर चम्मच जैसा आकार ले सकते हैं. आयरन की कमी पूरी करने से नाखून धीरे-धीरे सामान्य आकार और मजबूती में लौट आते हैं. 

2. फेफड़ों और संक्रमण से जुड़े संकेत – नाखून का पीला और मोटा होना अक्सर फंगल संक्रमण की ओर इशारा करता है. अगर पीले नाखून लंबे समय तक रहते हैं और सांस लेने में समस्या या सूजन भी हो, तो यह येलो नेल सिंड्रोम जैसी दुर्लभ स्थिति की ओर संकेत कर सकता है.  येलो नेल सिंड्रोम फेफड़ों की पुरानी समस्याओं जैसे ब्रोंकिएक्टेसिस या प्लूरल रोग से जुड़ा हो सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि हर पीला नाखून फेफड़ों की बीमारी का संकेत है, लेकिन लगातार बदलाव होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. 

3.  नाखून पर गहरे धब्बे या रंग बदलना – कभी-कभी नाखून पर दिखाई देने वाली पतली या गहरी रेखाएं हानिरहित होती हैं, लेकिन कुछ रेखाएं मेलानोन किया या नाखून के नीचे के कैंसर (subungual melanoma) का संकेत भी हो सकती हैं.

4. नाखून का आकार बदलना – नाखूनों का गोल या गुंबद जैसा आकार लेना (क्लबिंग) अक्सर लंबे समय तक रक्त में ऑक्सीजन की कमी का संकेत देता है. यह जन्मजात हार्ट डिजीज, क्रॉनिक फेफड़ों की बीमारियों या सूजन आंत्र रोग से जुड़ा हो सकता है. 

5. कमजोर या धारीदार नाखून – नाखूनों पर खड़ी धारियां, कमजोरी या आसानी से टूटना अक्सर पोषण की कमी, थायराइड विकार या लंबे समय के तनाव का संकेत दे सकते हैं. बायोटिन, जिंक, आयरन और प्रोटीन की कमी से नाखून कमजोर हो सकते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हैवी मील के तुरंत बाद फ्रूट्स खाने चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

हैवी मील के तुरंत बाद फ्रूट्स खाने चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?


हालांकि कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या खाना खाने के तुरंत बाद फल खाना सही है या नहीं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं की हैवी मिल के तुरंत बाद फ्रूट्स खाने चाहिए या नहीं और इसे लेकर एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं.

कई लोग भारी खाना खाने के बाद फल को मिठाई की तरह खा लेते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसा करना हर किसी के लिए सही नहीं होता है. फल में मौजूद नेचुरल शुगर और फाइबर जल्दी पर पच जाते हैं, जबकि भारी भोजन में मौजूद प्रोटीन और वसा को पचाने में ज्यादा समय लगता है.

कई लोग भारी खाना खाने के बाद फल को मिठाई की तरह खा लेते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसा करना हर किसी के लिए सही नहीं होता है. फल में मौजूद नेचुरल शुगर और फाइबर जल्दी पर पच जाते हैं, जबकि भारी भोजन में मौजूद प्रोटीन और वसा को पचाने में ज्यादा समय लगता है.

Published at : 07 Mar 2026 06:16 PM (IST)

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प्रेग्नेंसी में पहले महीने से डिलीवरी तक कैसी होनी चाहिए डाइट, एक्सपर्ट से जानें

प्रेग्नेंसी में पहले महीने से डिलीवरी तक कैसी होनी चाहिए डाइट, एक्सपर्ट से जानें


प्रेग्नेंसी हर महिला की लाइफ का बहुत खास और इमोशनल समय होता है. जब किसी महिला को यह पता चलता है कि वह मां बनने वाली है, तो उसकी लाइफ में कई तरह के बदलाव शुरू हो जाते हैं. इस दौरान शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, खान-पान की जरूरतें बदल जाती हैं और सेहत का खास ध्यान रखना जरूरी हो जाता है. प्रेग्नेंसी के दौरान सही डाइट लेना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि मां जो भी खाती है उसका सीधा असर बच्चे की ग्रोथ पर पड़ता है इसलिए प्रेग्नेंसी के पहले महीने से लेकर डिलीवरी तक संतुलित और पौष्टिक डाइट लेना बेहद जरूरी है. सही डाइट से मां स्वस्थ रहती है और बच्चे की ग्रोथ भी सही तरीके से होता है. तो आइए जानते हैं कि प्रेग्नेंसी में पहले महीने से डिलीवरी तक डाइट कैसी होनी चाहिए. 

प्रेग्नेंसी के दौरान सही डाइट क्यों जरूरी है

प्रेग्नेंसी के दौरान महिला के शरीर को सामान्य दिनों से ज्यादा पोषण की जरूरत होती है. विशेषज्ञों के अनुसार, एक प्रेग्नेंट महिला को रोजाना लगभग 300 अतिरिक्त कैलोरी की जरूरत होती है. यह एक्स्ट्रा एनर्जी बच्चे की ग्रोथ, मां के स्वास्थ्य और शरीर में हो रहे बदलावों को संभालने के लिए जरूरी होती है. अगर प्रेग्नेंट महिला सही मात्रा में पोषक तत्व नहीं लेती है, तो इससे बच्चे की ग्रोथ पर असर पड़ सकता है और मां को भी कमजोरी, एनीमिया और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए प्रेग्नेंसी के दौरान संतुलित और पौष्टिक डाइट लेना बहुत जरूरी होता है. 

प्रेग्नेंसी में पहले महीने से डिलीवरी तक डाइट कैसी होनी चाहिए

1. 1–3 महीना की डाइट – प्रेग्नेंसी में मां और बच्चे दोनों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित और पौष्टिक डाइट बहुत जरूरी होती है. प्रेग्नेंसी के 9 महीनों में शरीर की जरूरतें बदलती रहती हैं, इसलिए हर महीने सही पोषण लेना जरूरी है. जिसमें पहली तिमाही यानी 1–3 महीना बच्चे के दिमाग और रीढ़ की हड्डी का विकास शुरू होता है, इसलिए फोलिक एसिड और आयरन बहुत जरूरी होते हैं. ऐसे में हरी पत्तेदार सब्जियां, दाल और अंकुरित अनाज, दूध, दही और पनीर, फल, सूखे मेवे या नारियल पानी लें. 

2. 4–6 महीना की डाइट – दूसरी तिमाही यानी 4–6 महीना में बच्चे की हड्डियों और शरीर का तेजी से विकास होता है, इसलिए कैल्शियम और प्रोटीन की जरूरत बढ़ जाती है. इस समय दूध, दही, पनीर, दाल, राजमा, चना, अंडे , सोयाबीन, हरी सब्जियां, फल और सलाद लें. 

3. 7–9 महीना की डाइट – तीसरी तिमाही में बच्चे का वजन बढ़ता है और शरीर पूरी तरह विकसित होता है, इसलिए एनर्जी और आयरन की जरूरत ज्यादा होती है. ऐसे में आयरन वाली चीजें (पालक, चुकंदर, खजूर), प्रोटीन (दाल, पनीर, अंडे), कैल्शियम (दूध, दही), फल और फाइबर वाली चीजें खाएं. 

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प्रेग्नेंसी में किन चीजों से बचना चाहिए

1. कच्चा या अधपका खाना – कच्चे अंडे, अधपका मांस और मछली में बैक्टीरिया हो सकते हैं जो संक्रमण का कारण बन सकते हैं.

2. ज्यादा कैफीन – ज्यादा मात्रा में चाय, कॉफी और एनर्जी ड्रिंक पीना प्रेग्रेंसी में नुकसानदायक हो सकता है

3. शराब – शराब बच्चे के विकास पर बुरा असर डाल सकती है और जन्म दोष का खतरा बढ़ा सकती है. 

4. जंक फूड – पिज्जा, बर्गर, चिप्स और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड से बचना चाहिए क्योंकि इनमें पोषण कम और फैट ज्यादा होता है.

5. बिना धोए फल और सब्जियां – इनमें बैक्टीरिया हो सकते हैं, इसलिए हमेशा इन्हें अच्छी तरह धोकर ही खाएं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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छोटे बच्चों को काजल लगाना चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं डॉक्टर्स

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महिलाओं की आंखें मांगती हैं हर उम्र में खास देखभाल, जानें आई केयर टिप्स

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आमतौर पर 12 से 19 साल की उम्र के बीच लड़कियों की आंखें तेजी से बदलती हैं. जिसका मुख्य कारण स्मार्टफोन, लैपटॉप और टैबलेट पर ज्यादा समय बिताना है. ऐसे में डिजिटल आंखों का तनाव, मायोपिया, एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस जैसे संभावित समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच कराएं., धुंधली दूर दृष्टि या बार-बार सिरदर्द पर ध्यान दें.20-20-20 नियम अपनाएं यानी हर 20 मिनट में 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखें.

20 से 39 की उम्र में लाइफस्टाइल में बदलाव आंखों पर असर डालते हैं. लंबे समय तक काम, स्क्रीन का अधिक उपयोग, कॉन्टैक्ट लेंस. इनसे सूखी आंखें, संक्रमण, गर्भावस्था के दौरान अस्थायी दृष्टि बदलाव जैसे समस्याएं हो सकती है. ऐसे में हर साल आंखों की जांच करवाएं, कॉन्टैक्ट लेंस साफ रखें, स्क्रीन का समय कम करें, सूखी आंखों के लिए लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का यूज करें.

20 से 39 की उम्र में लाइफस्टाइल में बदलाव आंखों पर असर डालते हैं. लंबे समय तक काम, स्क्रीन का अधिक उपयोग, कॉन्टैक्ट लेंस. इनसे सूखी आंखें, संक्रमण, गर्भावस्था के दौरान अस्थायी दृष्टि बदलाव जैसे समस्याएं हो सकती है. ऐसे में हर साल आंखों की जांच करवाएं, कॉन्टैक्ट लेंस साफ रखें, स्क्रीन का समय कम करें, सूखी आंखों के लिए लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का यूज करें.

Published at : 07 Mar 2026 11:59 AM (IST)

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