क्या दिन से ज्यादा खतरनाक है रात की लू? अगर लग गई तो नतीजे गंभीर, MP में पहली बार अलर्ट

क्या दिन से ज्यादा खतरनाक है रात की लू? अगर लग गई तो नतीजे गंभीर, MP में पहली बार अलर्ट


भारत में गर्मी ने अप्रैल के महीने में ही बेहाल कर दिया है. राजस्थान में उदयपुर से टूरिस्ट गायब हो गए और सड़कें सुनसान हैं. उत्तर प्रदेश के 26 जिलों में लू का अलर्ट होने से स्कूल टाइम बदल गया. बिहार के 9 जिलों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया. छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, झारखंड और हिमाचल प्रदेश समेत सभी जगह लू का अलर्ट है. मध्य प्रदेश में तो पहली बार रात में लू का अल्टीमेटम दिया गया है, लेकिन लू तो धूप में चलती है, तो फिर रात की लू का माजरा क्या है? जानेंगे एक्सप्लेनर में…

सवाल 1: भारत में अभी गर्मी की स्थिति कितनी भयानक है?
जवाब: देश के कई इलाकों में अप्रैल 2026 के आखिरी सप्ताह में गर्मी ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में कई जगहों पर तापमान 40 से 44 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है. प्रयागराज में 44.4 डिग्री, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 43.8 डिग्री और कई जगहों पर 42-43 डिग्री तक पारा चढ़ा है. मौसम विभाग ने इन राज्यों में लू का अलर्ट जारी किया है. सबसे खास बात यह है कि मध्य प्रदेश में मंगलवार को पहली बार ‘रात में लू’ यानी गर्म रात का अलर्ट जारी किया गया.

मध्य प्रदेश के भोपाल, छिंदवाड़ा, मंडला, नर्मदापुरम, ग्वालियर, रतलाम और छतरपुर समेत 16 जिलों में यह अलर्ट है. इससे पहले रविवार-मंगलवार की रातों में इन इलाकों में रात का तापमान सामान्य से बहुत ज्यादा रहा, जिससे लोगों को दिन की गर्मी के बाद भी राहत नहीं मिली. महाराष्ट्र और ओडिशा में दिन में सिग्नल बंद कर दिए, ताकि लोगों को चौराहे पर धूप में खड़ा न होना पड़े.

 

मध्य प्रदेश के 16 जिलों में रात की लू का अलर्ट जारी है

सवाल 2: लू तो हमेशा दिन की धूप और गर्म हवा में चलती है, फिर रात की लू कैसी होती है?
जवाब: सामान्य लू दिन की घटना होती है. यह तेज धूप और गर्म, सूखी हवा होती है जो दोपहर में 40 डिग्री या उससे ऊपर चली जाती है, लेकिन ‘रात की लू’ या ‘गर्म रात’ बिल्कुल अलग है. यह हवा की तरह नहीं बहती, बल्कि रात का तापमान इतना ज्यादा रह जाता है कि सूरज ढलने के बाद भी दीवारें, जमीन और हवा ठंडी नहीं होती।

मौसम विभाग के नियम के मुताबिक, जब दिन का तापमान 40 डिग्री या उससे ज्यादा हो और रात का न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री ज्यादा हो, तो इसे ‘गर्म रात’ कहा जाता है. अगर 6.4 डिग्री से ज्यादा हो तो ‘बहुत गर्म रात’. मध्य प्रदेश में यही हो रहा है. रात में भी गर्मी बनी रहती है, ठंडक नहीं मिलती.

सवाल 3: दिन के मुकाबले रात की लू में शरीर पर क्या असर पड़ता है?
जवाब: हां, रात की गर्मी दिन की लू से भी ज्यादा चुपके से नुकसान पहुंचाती है. दिन में शरीर गर्म होता है, लेकिन रात में अगर तापमान कम न पड़े तो शरीर को ठंडक मिलने का मौका नहीं मिलता. शरीर का तापमान कंट्रोल करने वाला सिस्टम थक जाता है. इससे दिल, किडनी और दिमाग पर दबाव बढ़ता है. लोग बेचैनी की वजह से सो नहीं पाते, पसीना ज्यादा आता है और सुबह उठते ही थकान महसूस होती है.

गंभीर मामलों में चक्कर आना, उल्टी, बेहोशी और हीट स्ट्रोक के लक्षण दिख सकते हैं. मौसम विभाग और डॉक्टरों के मुताबिक गर्म रातों में नींद पूरी नहीं होती, जिससे अगले दिन शरीर कमजोर हो जाता है. खासकर बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और पहले से बीमार लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं.

 

लू लगने पर शरीर में गंभीर लक्षण दिख सकते हैं
लू लगने पर शरीर में गंभीर लक्षण दिख सकते हैं

सवाल 4: क्या दिन की लू से ज्यादा रात की लू खतरनाक मानी जाती है? हां तो क्यों?
जवाब: दिन की लू तेज होती है, लेकिन रात में राहत मिल जाती है. शरीर को रात में ठंडक मिलकर रिकवर करने का समय मिलता है, लेकिन जब रात भी गर्म हो तो यह रिकवरी नहीं होती. गर्मी का तनाव लगातार बढ़ता जाता है. इस पर कई रिसर्च स्टडीज हो चुकी हैं, जिसके मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से रातें दिन से ज्यादा तेजी से गर्म हो रही हैं. हवा में नमी ज्यादा होने से दिन की गर्मी रात में फंस जाती है. शहरों में कंक्रीट और इमारतें दिन में गर्मी सोख लेती हैं और रात में छोड़ती हैं.

नतीजा? कई दिनों तक लगातार गर्मी पड़ने पर मौत का खतरा बढ़ जाता है. एक अन्य स्टडी मानें तो अगर रात की गर्मी बढ़े तो सदी के अंत तक गर्मी से मौतें छह गुना बढ़ सकती हैं. रात की गर्मी नींद भी छीन लेती है. औसतन हर व्यक्ति साल में 44 घंटे कम सो रहा है.

सवाल 5: कब तक रात की लू से जूझना पड़ेगा और बचने के लिए क्या करें?
जवाब: रात की लू लगने पर बहुत प्यास लगना, थकान, सिरदर्द, चक्कर, उल्टी, शरीर का तापमान बढ़ना, भ्रम या बेहोशी जैसे लक्षण दिख सकते हैं. अगर रात में पसीना ज्यादा आए, नींद न आए या सुबह कमजोरी लगे तो सावधान रहें:

  • रात में भी ज्यादा पानी पिएं.
  • हल्के, ढीले कपड़े पहनें.
  • कमरे में पंखा या कूलर चलाएं, खिड़कियां खुली रखें.
  • दोपहर 12 से 4 बजे तक बाहर न निकलें.
  • बुजुर्गों और बच्चों पर खास नजर रखें.
  • अस्पतालों में बेड रिजर्व किए जा रहे हैं. कई राज्यों में स्कूलों का समय बदला गया है और मजदूरों को दोपहर में काम नहीं करने दिया जा रहा है.

मौसम विभाग के अनुसार अगले 4-5 दिनों तक उत्तर और मध्य भारत में गर्मी बनी रहेगी. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा में लू और गर्म रातों का अलर्ट जारी है. जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसे मौसम पहले से ज्यादा आम हो गए हैं. अगर बारिश न हुई तो स्थिति और बिगड़ सकती है. सरकारें और मौसम विभाग लगातार निगरानी कर रहे हैं. लोगों को सलाह दी जा रही है कि गर्मी को हल्के में न लें, यह चुपके से जान ले सकती है.

रात की लू कोई हवा नहीं, बल्कि रात भर न रुकने वाली गर्मी है जो शरीर को ठंडक का मौका नहीं देती. दिन की लू से अलग यह लगातार थकान बढ़ाती है और लंबे समय में ज्यादा खतरनाक साबित होती है. मध्य प्रदेश में पहली बार यह अलर्ट इसलिए जारी हुआ क्योंकि रात का तापमान सामान्य से बहुत ज्यादा है.

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भारत में तेजी से फैल रही हैं मेटाबॉलिक बीमारियां, कहीं आप भी तो नहीं इसके शिकार?

भारत में तेजी से फैल रही हैं मेटाबॉलिक बीमारियां, कहीं आप भी तो नहीं इसके शिकार?


Why Metabolic Diseases Are Rising In India: भारत में मेटाबॉलिक बीमारियों का बोझ तेजी से बढ़ता जा रहा है और अब यह गंभीर चिंता का विषय बन चुका है. हालिया स्टडी के मुताबिक, टाइप 2 डायबिटीज से होने वाली मौतों और डिसेबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर वर्षों के मामले में भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में पहले स्थान पर पहुंच गया है. चलिए आपको बताते हैं कि क्या निकला स्टडी में. 

स्टडी में क्या आया सामने?

11 देशों केएक्सपर्ट द्वारा किए गए इस अध्ययन में बताया गया कि वर्ष 1990 में टाइप 2 डायबिटीज के सबसे ज्यादा मामले चीन में थे, इसके बाद भारत, इंडोनेशिया, जापान और पाकिस्तान का स्थान था. लेकिन वर्ष 2023 तक स्थिति बदल गई और भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए सबसे अधिक मामलों वाला देश बन गया.  यह एनालिसिस ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के आंकड़ों पर आधारित है. स्टडी में यह भी सामने आया कि भारत और चीन एशिया-प्रशांत क्षेत्र में पांच प्रमुख मेटाबॉलिक बीमारियों टाइप 2 डायबिटीज, हाईबीपी, बॉडी मास इंडेक्स, खराब कोलेस्ट्रॉल और फैटी लिवर से जुड़ी बीमारी का सबसे ज्यादा बोझ उठा रहे हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

स्टजी के राइटर  अनूप मिश्रा के अनुसार, टाइप 2 डायबिटीज से जुड़े रोग भार और मौतों के मामले में भारत पहले स्थान पर है, जबकि बाकी चार बीमारियों में चीन पहले और भारत दूसरे स्थान पर है, जो गंभीर चिंता की बात है. उन्होंने कहा कि वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मेटाबॉलिक बीमारियों का सबसे बड़ा बोझ झेल रहा है. केवल टाइप 2 डायबिटीज के कारण ही देश में 2.1 करोड़ से अधिक मामले और करीब 5.8 लाख मौतें दर्ज की गईं, जो इसके भारी प्रभाव को दिखाता है.”

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उन्होंने यह भी बताया कि डायबिटीज, मोटापा, हाई बीपी, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और फैटी लिवर आपस में जुड़ी हुई स्थितियां हैं, जो मुख्य रूप से खराब खानपान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण बढ़ रही हैं. यही बीमारियां आगे चलकर किडनी फेल होना, दिल का दौरा, हार्ट फेलियर, लिवर की गंभीर बीमारी, लकवा और कई तरह के कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बनती हैं.

कितने लोग पीड़ित?

स्टडी के मुताबिक, वर्ष 2023 में भारत में टाइप 2 डायबिटीज से जुड़े 2,13,45,118 मामले और 5,78,367 मौतें दर्ज की गईं, जबकि चीन में यह आंकड़ा 1,09,40,382 मामले और 1,72,911 मौतों का रहा. पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में वर्ष 2023 के दौरान टाइप 2 डायबिटीज के कारण करीब 4.9 करोड़ मामले दर्ज किए गए, जिसमें 54.1 प्रतिशत हिस्सा पुरुषों का था। वहीं, इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा बोझ हाई बीपी का रहा, जिसके कारण करीब 13.8 करोड़ रोग-भार वर्ष और 62.7 लाख मौतें हुईं. इसके बाद अधिक शरीर भार, खराब कोलेस्ट्रॉल, टाइप 2 डायबिटीज और फैटी लिवर से जुड़ी बीमारी का स्थान रहा. वर्ष 1990 से 2023 के बीच कुल रोग-भार में 1.7 से 3.7 गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है. अनुमान है कि वर्ष 2030 तक इन बीमारियों का बोझ और बढ़ेगा, जिसमें हाई बीपी सबसे बड़ा कारण बना रहेगा.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अब दवाओं में इस्तेमाल नहीं होंगी अश्वगंधा की पत्तियां, जानें FSSAI ने इस पर क्यों लगाई रोक?

अब दवाओं में इस्तेमाल नहीं होंगी अश्वगंधा की पत्तियां, जानें FSSAI ने इस पर क्यों लगाई रोक?


FSSAI New Health Supplement Rules: अश्वगंधा को लंबे समय से एक ऐसे प्राकृतिक उपाय के रूप में पेश किया जाता रहा है, जो तनाव कम करने से लेकर नींद सुधारने तक हर समस्या में मददगार माना जाता है. आयुर्वेद की यह पुरानी जड़ी-बूटी आज के दौर में वेलनेस इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा बन चुकी है. लेकिन अब इसी अश्वगंधा को लेकर एक बड़ा फैसला सामने आया है, जिसने उपभोक्ताओं और सप्लीमेंट बनाने वाली कंपनियों दोनों को चौंका दिया है. 

क्या है मामला?

FSSAI और आयुष मंत्रालय ने अश्वगंधा की पत्तियों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. हालांकि यह पूरी तरह से बैन नहीं है, बल्कि एक सीमित प्रतिबंध है. यानी अश्वगंधा के पूरे पौधे पर नहीं, सिर्फ उसकी पत्तियों के उपयोग पर रोक लगाई गई है. वहीं, इसकी जड़ का इस्तेमाल पहले की तरह जारी रहेगा. 16 अप्रैल को जारी आदेश में FSSAI ने राज्यों को सख्त निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं. इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर कोई कंपनी अश्वगंधा की पत्तियों या उनके एक्सट्रैक्ट का इस्तेमाल करती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए. इसके अलावा कंपनियों को अब यह भी स्पष्ट रूप से बताना होगा कि उनके प्रोडक्ट में पौधे का कौन-सा हिस्सा इस्तेमाल किया गया है.

क्यों लिया गया यह फैसला?

दरअसल, यह फैसला साइंटफिक रिसर्च के आधार पर लिया गया है. रिसर्च में पाया गया है कि अश्वगंधा की पत्तियों में विदेनोलाइड्स नाम के तत्व ज्यादा मात्रा में होते हैं, खासकर विदाफेरिन-ए, जो शरीर पर काफी असर डाल सकते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, इन तत्वों की अधिकता से लिवर को नुकसान, पेट से जुड़ी समस्याएं और यहां तक कि नर्वस सिस्टम पर भी असर पड़ सकता है.

तेजी से बढ़ रहा अश्वगंधा का इस्तेमाल

इसी संभावित खतरे को देखते हुए सरकार ने एहतियात के तौर पर यह कदम उठाया है. खासतौर पर ऐसे समय में जब अश्वगंधा का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है और यह कैप्सूल, पाउडर और ड्रिंक्स के रूप में बाजार में आसानी से उपलब्ध है. दूसरी तरफ, अश्वगंधा की जड़ को सुरक्षित माना गया है. आयुर्वेद में सदियों से इसी हिस्से का इस्तेमाल होता आया है और आधुनिक रिसर्च भी इसे सही मात्रा में लेने पर सुरक्षित बताती है.  इसलिए नियामक संस्थाओं ने जड़ आधारित उत्पादों को अनुमति दी हुई है.

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क्या मानते हैं एक्सपर्ट?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रिकॉशनरी एप्रोच का हिस्सा है, यानी जब तक पूरी तरह से सुरक्षित साबित न हो, तब तक संभावित जोखिम वाले तत्वों से दूरी रखना बेहतर है. डाइटिशियन कनिका मल्होत्रा ने indian express को बताया कि अश्वगंधा शरीर को तनाव से निपटने में मदद करता है, नींद सुधारता है और ऊर्जा बढ़ाने में सहायक होता है, लेकिन पारंपरिक रूप से इसका इस्तेमाल सिर्फ जड़ के रूप में ही किया जाता रहा है.

वहीं, डाइटिशियन गरिमा गोयल कहती हैं कि यह प्रतिबंध उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद है, क्योंकि अब कंपनियों को साफ-साफ बताना होगा कि वे किस हिस्से का उपयोग कर रही हैं. इससे लोगों को यह समझने में आसानी होगी कि वे क्या खा रहे हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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उम्र सिर्फ एक नंबर! 80 साल की दादी रोज 90 मिनट करती हैं वर्कआउट, यहां जानिए उनका फिटनेस रूटीन

उम्र सिर्फ एक नंबर! 80 साल की दादी रोज 90 मिनट करती हैं वर्कआउट, यहां जानिए उनका फिटनेस रूटीन


Fitness Routine Tips : आज के समय में जहां लोग 40-50 की उम्र के बाद ही अपने शरीर को कमजोर मानने लगते हैं, वहीं एक 80 साल की दादी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि अगर इरादा मजबूत हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती है. यह कहानी एक ऐसी महिला की है , जिन्होंने अपने जीवन के 70वें साल में खुद को पूरी तरह बदलने का फैसला किया. कभी दवाइयों और बीमारियों पर निर्भर रहने वाली यह महिला आज जिम में घंटों पसीना बहाती हैं, भारी वजन उठाती हैं और हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. उनका मानना है कि हमारा शरीर किसी भी उम्र में बदल सकता है. इसके लिए सिर्फ सही दिशा और डेली रूटीन की जरूरत है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि 80 साल की दादी का फिटनेस रूटीन क्या है. 

कौन हैं 80 साल की यह दादी?

ये 80 साल की दादी कनाडा की रहने वाली जोन मैकडॉनल्ड है, जो आज के समय में फिटनेस की एक बड़ी मिसाल बन चुकी हैं. उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर इंसान के अंदर मजबूत इरादा हो, तो वह किसी भी उम्र में अपने शरीर को बदल सकता है.जोन पहले कई बीमारियों से जूझ रही थीं. उन्हें हाई ब्लड प्रेशर, एसिडिटी, चक्कर आना और गठिया जैसी समस्याएं थीं. लेकिन आज वही महिला जिम में भारी वजन उठाती हैं, रोजाना कसरत करती हैं और लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. उनकी कहानी बताती है कि फिटनेस का कोई एक्सपायरी डेट नहीं होता है.

दवाइयों से फिटनेस तक का सफर कैसे शुरू हुआ?

70 साल की उम्र में उनका वजन करीब 90 किलो था.  उन्हें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं थीं जैसे हाई ब्लड प्रेशर, एसिडिटी (acid reflux), चक्कर आना (vertigo), जोड़ों में दर्द (arthritis), डॉक्टर उनकी दवाइयों की मात्रा बढ़ा रहे थे, लेकिन उन्होंने हार मानने की जगह खुद को बदलने का फैसला लिया. इस बदलाव में उनकी बेटी ने उनका साथ दिया, जो फिटनेस एक्सपर्ट थीं. धीरे-धीरे उन्होंने एक्सरसाइज और सही खान-पान शुरू किया और लगभग 3 साल में 29 किलो वजन कम कर लिया. 

80 साल की दादी का फिटनेस रूटीन क्या है?

1. वॉर्म-अप से शुरुआत – हर वर्कआउट से पहले जोन अच्छे से वॉर्म-अप करती हैं. जिससे मांसपेशियां और जोड़ों को चोट से बचाया जा सके.

2. हफ्ते में 5 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग –  वह हफ्ते में पांच दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करती हैं. वह भारी वजन उठाने से नहीं डरतीं और अपने वर्कआउट में बेंच प्रेस, स्क्वाट्स, लैट पुल डाउन और मशीन एक्सरसाइज शामिल करती हैं. शुरुआत में उन्होंने मशीनों का ज्यादा इस्तेमाल किया. जिससे शरीर पर ज्यादा दबाव न पड़े, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद को मजबूत बनाकर फ्री वेट्स की तरफ कदम बढ़ाया.

3. कार्डियो – स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के साथ-साथ वह कार्डियो पर भी पूरा ध्यान देती हैं. वह हफ्ते में तीन से सात दिन तक कार्डियो करती हैं और हर बार 15 से 45 मिनट तक एक्सरसाइज करती हैं. इससे उनका दिल स्वस्थ रहता है और उनकी स्टैमिना भी बढ़ता है. 

4. स्ट्रेचिंग – जोन हर वर्कआउट के बाद 15 मिनट तक स्ट्रेचिंग करती हैं. इससे मांसपेशियों को आराम मिलता है, शरीर में लचीलापन बना रहता है और रिकवरी जल्दी होती है. यही वजह है कि वह लगातार एक्टिव और फिट बनी रहती हैं.

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जोन की डाइट और लाइफस्टाइल

फिटनेस सिर्फ जिम तक सीमित नहीं है, बल्कि खान-पान और सोच भी उतनी ही जरूरी है. ऐसे में जोन रोज करीब 150 ग्राम प्रोटीन लेती हैं, भरपूर 3 लीटर पानी पीती हैं और सिर्फ कैलोरी गिनने की जगह प्रोटीन, कार्ब्स और फैट यानी मैक्रो प्लानिंग पर फोकस करती हैं. खास बात यह है कि वह पूरी तरह नेचुरल तरीके से फिट बनी हैं और किसी भी तरह के स्टेरॉयड या दवाओं का सहारा नहीं लेतीं, इसके साथ ही वह अपने दिमाग को एक्टिव रखने के लिए मेडिटेशन ऐप्स का इस्तेमाल करती हैं, ब्रेन गेम्स खेलती हैं और नई भाषा सीखती रहती हैं. जोड़ों की देखभाल के लिए वह घुटनों पर सपोर्ट पहनती हैं और जरूरत पड़ने पर बैक सपोर्ट भी लेती हैं, जिससे वह बिना चोट के लगातार एक्टिव रह पाती हैं. 

WHO के नियमों से भी आगे

जोन का रूटीन विश्व स्वास्थ्य संगठन के फिटनेस नियमों से भी ज्यादा प्रभावी है. जहां 65  से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए 150 से 300 मिनट एक्टिविटी की सलाह दी जाती है, वहीं जोन इससे ज्यादा करती हैं. वह हफ्ते में 2 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की सलाह है, लेकिन वह 5 दिन करती हैं. बैलेंस और स्ट्रेंथ पर भी पूरा ध्यान देती हैं. 

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केमिकल से फल पकाने वालों की अब खैर नहीं, FSSAI ने दी यह वॉर्निंग

केमिकल से फल पकाने वालों की अब खैर नहीं, FSSAI ने दी यह वॉर्निंग


FSSAI: गर्मियां आते ही मौसम आता है आम का, गर्मियों में आम खाना किसको पसंद नहीं लेकिन क्या आपको पता है कि जो फल और आम आप खा रहे हैं वो प्राकृतिक रूप से पकाया गया है या उसे पकाने के लिए केमिकल का इस्तेमाल किया गया है,अगर आपको पता चले कि फल केमिकल से पकाया गया है तो भला ऐसे में कोई उन फलों को खाना चाहेगा, इसी के चलते FSSAI ने केमिकल्स से फलों को पकाने पर प्रतिबंध लगाया है, आइए जानते हैं पूरा मामला विस्तार से.

क्या है FSSAI का निर्देश?

दरअसल भारत सरकार के खाद्य सुरक्षा विभाग (FSSAI) ने 16 अप्रैल को एक नोटिस जारी किया है जिसमें उसने फलों को पकाए जाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले खतरनाक केमिकल्स जैसे कैल्शियम कार्बाइड और एथिलीन के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए कड़ी सख्ती बरतने को कहा है, FSSAI के मुताबिक ये केमिकल्स जानलेवा हैं और इनका इस्तेमाल किसी प्रकार से भी डायरेक्ट खाद्य पदार्थों के साथ नहीं होना चाहिए.

बाजारों और गोदामों में होगी छापेमारी

FSSAI ने सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में सख्ती बरतें और बड़ी मंडी और स्टोरेज पर अपनी नजर रखें, मौसमी फल जैसे आम के गोदामों में जाकर कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल की जांच करें और कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल पाए जाने पर FSS Act की धारा 59 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए, एसीटिलीन के इस्तेमाल की जांच करने के लिए टेस्टिंग पेपर के इस्तेमाल के निर्देश दिए हैं.

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क्यों होता है फलों में केमिकल का इस्तेमाल?

अब आपके मन में भी यह आता होगा कि आखिर इन फलों को पकाने में इन केमिकल्स का इस्तेमाल क्यों किया जाता है और इन फलों को प्राकृतिक रूप से क्यों नहीं पकाया जा सकता. इसके पीछे कई कारण हैं जैसे फलों को बाजार तक पहुंचने में और स्टोरेज में रखे रहने में काफी ज्यादा समय लगता है, इतने समय में प्राकृतिक रूप से पके हुए फल खराब हो सकते हैं इसलिए इन फलों को कच्चा ही एक जगह से दूसरी जगह लेके जाया जाता है और स्थान पर पहुंचाके उन्हें केमिकल्स से पकाया जाता है, दूसरा कारण है प्राकृतिक रूप से पकने में काफी ज्यादा समय लगता है जबकि कैल्शियम कार्बाइड जैसा केमिकल फलों को काफी कम समय में पका देता है.

कैसे करें केमिकल्स से पके फलों की पहचान?

केमिकल्स  से पके फलों की पहचान करना काफी आसान है, मौसमी फल जैसे आम की पहचान उसके रंग और स्वाद से की जा सकती है, केमिकल से पकाये जाने पर आम बाहर से बिल्कुल पका हुआ दिख सकता है लेकिन अंदर से वह कच्चा और कच्चेपन से थोड़ा खट्टा हो सकता है, साथ ही, केमिकल से पके फलों को खाने पर गले में हल्की जलन या अजीब सा स्वाद महसूस हो सकता है.

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क्या है एक्सरसाइज करने का सही वक्त, जानिए अचानक हार्ट अटैक के शिकार क्यों हो रहे युवा?

क्या है एक्सरसाइज करने का सही वक्त, जानिए अचानक हार्ट अटैक के शिकार क्यों हो रहे युवा?


Right Time For Exercise: आज के समय में फिट शरीर को लेकर युवाओं में काफी जागरूकता बढ़ गई है. हर कोई चाहता है कि उसका शरीर मजबूत, फिट और मस्कुलर दिखे. इसी वजह से जिम जाना और एक्सरसाइज करना अब एक आम आदत बन गई है, लेकिन चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ सालों में युवाओं में हार्ट अटैक और अचानक कार्डियक अरेस्ट के मामले तेजी से बढ़े हैं. खासकर वे लोग जो नियमित रूप से जिम जाते हैं या भारी वर्कआउट करते हैं, उनमें भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं. ऐसे में आइए आज हम आपको बताते हैं कि एक्सरसाइज का सही समय क्या है, और क्यों कुछ गलत आदतें या लापरवाही हार्ट अटैक का कारण बन सकती हैं. 

एक्सरसाइज करना हार्ट के लिए कितना फायदेमंद होती है?

आमतौर पर एक्सरसाइज को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है. यह वजन कम करने, मसल्स मजबूत करने और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करती है, लेकिन अगर एक्सरसाइज गलत तरीके से या जरूरत से ज्यादा की जाए, तो यह शरीर और दिल पर उल्टा असर भी डाल सकती है. 

क्यों बढ़ रहा है युवाओं में हार्ट अटैक का खतरा?

1. अचानक बहुत ज्यादा हार्ड वर्कआउट करना – कई लोग बिना तैयारी के सीधे भारी वजन उठाना, तेज दौड़ना या हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज शुरू कर देते हैं. इससे दिल पर अचानक दबाव पड़ता है, जो खतरनाक हो सकता है. 

2. पहले से मौजूद दिल की बीमारी का पता न होना – बहुत से लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हें ब्लॉकेज, हाई बीपी या दिल की कोई समस्या है. ऐसे में ज्यादा मेहनत वाली एक्सरसाइज दिल के लिए जोखिम बढ़ा सकती है. 

3.शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) –वर्कआउट के दौरान पसीना निकलता है. अगर पानी या इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाए तो दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर प्रभावित हो सकते हैं. 

4. गलत डाइट और सप्लीमेंट का इस्तेमाल – कुछ लोग एनर्जी ड्रिंक, स्टेरॉयड या बिना सलाह के सप्लीमेंट लेते हैं. ये चीजें दिल की धड़कन को तेज कर सकती हैं और खतरा बढ़ा सकती हैं. 

5. बहुत ज्यादा गर्मी या ठंड में एक्सरसाइज – बहुत ज्यादा गर्मी या ठंड के मौसम में एक्सरसाइज करने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे हार्ट पर असर हो सकता है.

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क्या है एक्सरसाइज करने का सही वक्त?

एक्सरसाइज का सही समय हर व्यक्ति के रूटीन और शरीर की जरूरत पर निर्भर करता है. सुबह एक्सरसाइज करने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है, शरीर दिनभर एक्टिव रहता है, मानसिक तनाव कम होता है और मूड बेहतर रहता है, हालांकि सुबह शरीर थोड़ा जकड़ा हुआ होता है इसलिए वार्म-अप जरूरी है. वहीं शाम के समय एक्सरसाइज करने से शरीर ज्यादा लचीला होता है, ताकत बेहतर महसूस होती है, चोट लगने का खतरा कम होता है और तनाव भी कम होता है, लेकिन कुछ लोगों में देर शाम की एक्सरसाइज नींद को प्रभावित कर सकती है. 

किन लोगों को ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए?

जिनको पहले से हार्ट प्रॉब्लम है, हाई बीपी या डायबिटीज वाले लोग, बहुत ज्यादा मोटापे से परेशान लोग, लंबे समय से एक्सरसाइज न करने वाले लोगों को ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए. साथ ही एकदम से भारी वर्कआउट शुरू करना गलत है. शरीर को समय देना जरूरी है. एक्सरसाइज से पहले और बाद में हल्की स्ट्रेचिंग करनी चाहिए. वर्कआउट के दौरान सांस रोकना दिल पर दबाव डाल सकता है. अगर चक्कर, सीने में दर्द या घबराहट महसूस हो तो तुरंत एक्सरसाइज रोक दें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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