3 साल में इस महिला ने घटाया 72 किलो वजन, केवल 7 आसान स्टेप्स फॉलो कर आप भी हो सकती हैं स्लिम

3 साल में इस महिला ने घटाया 72 किलो वजन, केवल 7 आसान स्टेप्स फॉलो कर आप भी हो सकती हैं स्लिम


आजकल बढ़ता वजन सिर्फ दिखने की समस्या नहीं है, बल्कि यह सेहत से जुड़ी कई परेशानियों की जड़ बन सकता है. कई लोग वजन कम करना चाहते हैं, लेकिन शुरुआत कैसे करें, क्या खाएं, कितनी एक्सरसाइज करें. इन सवालों में उलझकर वे बीच में ही हार मान लेते हैं. कुछ लोग तेजी से वजन घटाने के लिए सख्त डाइट या घंटों जिम में पसीना बहाने लगते हैं, लेकिन कुछ ही समय में थककर छोड़ देते हैं. 

ऐसे में फिटनेस और न्यूट्रिशन कोच Emma Hooker की कहानी प्रेरणा देती है.  उन्होंने 3 साल में लगभग 72 किलो वजन कम किया. खास बात यह है कि उन्होंने कोई जादुई डाइट या शॉर्टकट नहीं अपनाया, बल्कि कुछ आसान और टिकाऊ आदतों को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया. उनका मानना है कि वजन कम करना एक दौड़ नहीं, बल्कि एक लंबी यात्रा है, जिसमें पेशंस, बैलेंस और कंटिन्यूटी सबसे जरूरी हैं. तो आइए जानते हैं वे 7 आसान स्टेप्स, जिन्हें अपनाकर आप भी सुरक्षित और स्थायी तरीके से वजन घटा सकते हैं. 

इन 7 आसान स्टेप्स को फॉलो कर आप भी हो सकते हैं स्लिम

1. छोटी शुरुआत करें, बड़े सपने बाद में देखें – अक्सर लोग सोचते हैं कि वे एकदम से सब बदल देंगे. रोज 2 घंटे जिम जाएंगे, सिर्फ सलाद खाएंगे और कुछ ही दिनों में फिट हो जाएंगे. लेकिन यह तरीका ज्यादा दिन नहीं चलता. इसकी बजाय छोटी आदतों से शुरुआत करें. जैसे रोज पर्याप्त पानी पिएं, 15–20 मिनट टहलें, मीठा कम करें, एक समय पर सोने की आदत डालें. छोटे बदलाव ही आगे चलकर बड़े नतीजे देते हैं. 

2. शरीर को भूखा नहीं, पोषित रखें – बहुत कम खाना या सिर्फ सलाद पर जीना वजन घटाने का सही तरीका नहीं है. जब आप शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं देते, तो मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है. हर खाने में प्रोटीन शामिल करें. जैसे दाल, पनीर, अंडा, चिकन आदि. सब्जियां और फल खाएं. हेल्दी फैट जैसे मेवे सीमित मात्रा में लें. खुद को पूरी तरह किसी चीज से वंचित न करें. संतुलित खाना ही लंबे समय तक वजन कम रखने में मदद करता है. 

3. अकेले मत लड़िए, अपनी सपोर्ट टीम बनाइए – जब मोटिवेशन कम हो जाए, तो किसी का साथ बहुत काम आता है. आप किसी दोस्त के साथ वर्कआउट शुरू कर सकते हैं, फिटनेस ग्रुप जॉइन कर सकते हैं, किसी कोच की मदद ले सकते हैं. सपोर्ट सिस्टम होने से आप हार नहीं मानते हैं. 

4. आराम भी जरूरी है – बहुत से लोग सोचते हैं कि अगर उन्होंने एक दिन एक्सरसाइज नहीं की तो सब बेकार हो गया, लेकिन आराम भी उतना ही जरूरी है जितनी मेहनत, इसलिए अच्छी नींद लें, जरूरत हो तो झपकी लें, हफ्ते में एक रेस्ट डे रखें. आराम से शरीर रिकवर होता है और आप ज्यादा एनर्जी के साथ दोबारा शुरुआत कर पाते हैं. 

5. नियमित रहें, परफेक्ट बनने की कोशिश न करें – एक दिन 2 घंटे जिम जाने से बेहतर है कि आप हफ्ते में 4–5 दिन 20–30 मिनट एक्टिव रहें. वर्कआउट का समय तय करें, कम समय हो तो भी 10 मिनट जरूर करें.मन न हो तब भी हल्की एक्टिविटी करें. 

6. सिर्फ एक ही स्केल पर मत टिके रहें – वजन कम होना ही सफलता नहीं है. कई बार वजन धीरे घटता है, लेकिन शरीर में पॉजिटिव बदलाव आते रहते हैं. जब कपड़े ढीले होने लगें, एनर्जी बढ़े, नींद बेहतर हो और मूड अच्छा रहे, तब इन छोटी जीतों को लिखें और खुद को किसी अच्छी चीज से इनाम दें. जैसे नए वर्कआउट कपड़े या स्पा ट्रीटमेंट. 

7. वही करें जो आपको सच में पसंद हो – अगर आपको दौड़ना पसंद नहीं, तो खुद को मजबूर न करें. आप डांस कर सकते हैं, तैराकी कर सकते हैं, योग कर सकते हैं या साइकिलिंग कर सकते हैं. ऐसी एक्टिविटी चुनें जिसमें आपको मजा आए. जब आप आनंद लेते हैं, तो उसे लंबे समय तक जारी रखना आसान होता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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नहाते वक्त पेशाब आना क्या खराब सेहत की निशानी? प्रेमानंद महाराज ने बता दी इस दिक्कत की हकीकत

नहाते वक्त पेशाब आना क्या खराब सेहत की निशानी? प्रेमानंद महाराज ने बता दी इस दिक्कत की हकीकत


Is Urinating In The Shower A Health Problem: नहाते समय यूरिन आने की दिक्कत को हम सामान्य मानकर टाल देते हैं. इसको लेकर आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद महाराज जी ने विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि यह दिक्कत यूं ही नहीं होती, इसके पीछे कारण होते हैं. उनका कहना है कि जैसे ही व्यक्ति नहाना शुरू करता है, शरीर आराम की मुद्रा में चला जाता है. शरीर जब रिलैक्स होता है तो दबाव रिलीज करने की प्रक्रिया शुरू होती है. यह कभी यूरिन के रूप में, कभी थकान के रूप में और कभी तनाव के रूप में दिखाई देता है. उनके अनुसार नहाना केवल शरीर को साफ करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें शरीर, मन और चेतना भी जुड़ी होती है. पानी का स्पर्श और उससे मिलने वाला आराम इस प्रतिक्रिया को सक्रिय कर सकता है.

चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर साइंस और डॉक्टर क्या कहते हैं. क्या यह आदत सामान्य है या फिर आपकी सेहत को लेकर कोई गंभीर चेतावनी है, जिस पर आपको ध्यान देना चाहिए?

क्या इससे कोई बीमारी होती है?

नहाते वक्त पेशाब आना कई लोगों के लिए सामान्य बात लग सकती है, लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स इसे लेकर सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं. हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसके बाद इस आदत को लेकर चर्चा तेज हो गई. डॉक्टरों का कहना है कि खासकर महिलाओं के लिए शॉवर में खड़े होकर पेशाब करना लंबे समय में नुकसानदेह हो सकता है.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बहते पानी की आवाज दिमाग को यूरिन से जोड़ सकती है. बार-बार ऐसा करने से ब्लैडर उस साउंड के साथ कंडीशन हो सकता है, जिससे अचानक यूरिन की तीव्र इच्छा या लीकेज की समस्या बढ़ सकती है. ओबी-जीवाईएन डॉ. एम्मा कुरेशी ने चेतावनी दी है कि यह आदत पेल्विक फ्लोर मसल्स को कमजोर कर सकती है, क्योंकि खड़े होकर पेशाब करना शरीर की नेचुरल पोजीशन नहीं है. इसलिए बेहतर यूरिनरी हेल्थ के लिए बैठकर पेशाब करना अधिक उचित माना जाता है. पुरुषों के लिए भी, खासकर बढ़ती उम्र में, बैठकर पेशाब करने से ब्लैडर अधिक आराम से खाली हो सकता है. हाइजीन के लिहाज से भी यह आदत पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जाती. अगर बाथरूम साझा है तो बैक्टीरिया सतह पर रह सकते हैं.

New York Post की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि बेहतर यूरिनरी हेल्थ के लिए बैठकर पेशाब करें, पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज जैसे केगेल्स करें और अगर बार-बार अर्जेंसी या लीकेज हो तो डॉक्टर से सलाह लें. छोटी-सी सुविधा भविष्य में बड़ी समस्या बन सकती है, इसलिए सावधानी जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किस बीमारी से जूझ रहे रिंकू सिंह के पिता, जिसके लिए छोड़ा टी-20 वर्ल्ड कप, यह कितनी खतरनाक?

किस बीमारी से जूझ रहे रिंकू सिंह के पिता, जिसके लिए छोड़ा टी-20 वर्ल्ड कप, यह कितनी खतरनाक?


What Illness Is Rinku Singh’s Father Suffering From: भारतीय क्रिकेटर रिंकू सिंह ने पारिवारिक आपात स्थिति के कारण टीम कैंप छोड़ दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके पिता खचंद्र सिंह गंभीर रूप से बीमार हैं और इसी वजह से रिंकू को अचानक घर लौटना पड़ा. हालांकि बीसीसीआई की ओर से आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया है कि उनके पिता स्टेज-4 लिवर कैंसर से जूझ रहे हैं.

बताया जा रहा है कि पिछले एक साल से उनका इलाज चल रहा था, लेकिन हाल के दिनों में उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई. कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार उनकी हालत बेहद नाजुक है और वे ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं. इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए रिंकू सिंह ने टीम से अलग होने का फैसला किया.

कितनी खतरनाक है बीमारी?

लिवर कैंसर को गंभीर बीमारियों में गिना जाता है, खासकर जब यह चौथे चरण में पहुंच जाता है. स्टेज-4 का मतलब होता है कि कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल चुका है, जिससे इलाज जटिल हो जाता है और स्थिति बेहद संवेदनशील बन जाती है. ऐसे में मरीज को गहन चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत पड़ती है. रिंकू हाल ही में टीम के साथ चेन्नई पहुंचे थे, लेकिन पिता की बिगड़ती हालत की खबर मिलते ही अगली सुबह वापस लौट गए. उनकी उपलब्धता अब जिम्बाब्वे के खिलाफ होने वाले अहम टी-20 मुकाबले के लिए संदिग्ध मानी जा रही है. 

कितना खतरनाक है लिवर कैंसर?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली मायो क्लिनिक के अनुसार, लिवर कैंसर वह बीमारी है जिसकी शुरुआत लिवर की सेल्स से होती है. लिवर पेट के ऊपरी दाएं हिस्से में, डायफ्राम के नीचे और पेट के ऊपर स्थित एक महत्वपूर्ण अंग है. शरीर में यह कई जरूरी काम करता है, जैसे खून को साफ करना, पाचन में मदद करना और पोषक तत्वों को स्टोर करना. लिवर में कई तरह के कैंसर विकसित हो सकते हैं, लेकिन सबसे आम प्रकार हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा है, जो लिवर की मुख्य सेल्स यानी हेपेटोसाइट्स से शुरू होता है. इसके अलावा इंट्राहेपेटिक कोलैंजियोकार्सिनोमा और हेपेटोब्लास्टोमा जैसे अन्य प्रकार भी होते हैं, हालांकि ये अपेक्षाकृत कम देखे जाते हैं. कई मामलों में कैंसर लिवर से शुरू नहीं होता, बल्कि शरीर के किसी दूसरे हिस्से जैसे कोलन, फेफड़े या ब्रेस्ट से फैलकर लिवर तक पहुंचता है. ऐसे मामलों को मेटास्टेटिक कैंसर कहा जाता है और इसका नाम उस अंग के आधार पर रखा जाता है, जहां से इसकी शुरुआत हुई थी.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

प्राथमिक लिवर कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. जब बीमारी बढ़ने लगती है, तब कुछ संकेत सामने आ सकते हैं. इनमें बिना कोशिश के वजन कम होना, भूख न लगना, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, मतली या उल्टी, लगातार कमजोरी और थकान शामिल हैं. कुछ लोगों में पेट में सूजन, त्वचा और आंखों के सफेद हिस्से का पीला पड़ जाना जिसे पीलिया कहा जाता है, और मल का सफेद या फीका दिखना जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. यदि ऐसे किसी भी लक्षण का अनुभव हो जो चिंता पैदा करे या लंबे समय तक बना रहे, तो डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है. शुरुआती जांच और सही इलाज से स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मास्क, बीमारी और डर, दिल्ली-NCR की जहरीली हवा कैसे छीन रही बच्चों की मुस्कान?

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How Air Pollution Affects Children In Delhi: दिल्ली में पिछले कुछ सालों से वायुप्रदूषण ने कहर बरपा है. इसको लेकर  चिंतन एनवायरनमेंटल रिसर्च एंड एक्शन ग्रुप की नई रिपोर्ट में सामने आया है कि दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता वायु पॉल्यूशन बच्चों की सेहत, मेंटल स्थिति, पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर डाल रहा है. दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच, जब प्रदूषण अपने चरम पर था, 6 से 15 वर्ष की आयु के 1,257 बच्चों से बातचीत के आधार पर यह स्टडी तैयार किया गया. इनमें से 86 प्रतिशत बच्चों ने माना कि प्रदूषित हवा सीधे उनकी सेहत को नुकसान पहुंचा रही है. अक्टूबर 2025 के बाद करीब 44 प्रतिशत बच्चों को डॉक्टर के पास जाना पड़ा और कई बच्चों को सांस लेने में तकलीफ, खांसी, सिरदर्द और थकान जैसी समस्याओं के कारण एक से अधिक बार इलाज कराना पड़ा.

क्या बताया गया है रिपोर्ट में?

‘ए जेनरेशन अंडर सीज’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में बताया गया कि 77 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि जहरीली हवा उन्हें बेचैन, चिड़चिड़ा, डरा हुआ या तनावग्रस्त महसूस कराती है. लगभग 46.6 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि यदि मौका मिले तो वे दिल्ली-एनसीआर छोड़ना चाहेंगे. रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि प्रदूषण का असर सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके माता-पिता, भाई-बहन और दादा-दादी भी बीमार पड़ रहे हैं. करीब 55 प्रतिशत बच्चों ने माना कि प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उन्हें स्कूल से छुट्टी लेनी पड़ी, जिससे पढ़ाई पर भी असर पड़ा.

खुद को बचाने की कोशिश करते हैं बच्चे

जब हवा जहरीली हो जाती है तो बच्चे खुद को बचाने की कोशिश जरूर करते हैं. करीब 85 प्रतिशत बच्चों ने किसी न किसी तरह का बचाव अपनाया. इनमें 39 प्रतिशत ने N95 मास्क या एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल किया, जबकि 37 प्रतिशत ने घर के भीतर रहना या बाहरी गतिविधियां कम करना बेहतर समझा. इसके बावजूद 85 प्रतिशत बच्चों ने आंखों में जलन, खांसी, सिरदर्द और थकावट जैसे लक्षण महसूस करने की बात कही. इससे साफ है कि एहतियात बरतने के बाद भी वे पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं.

इसमें बताया गया है कि कई बच्चे गंभीर प्रदूषण के दौरान भी स्कूल जाने, खेलकूद या अन्य एक्टिविटी के लिए बाहर निकलने को मजबूर होते हैं. ऐसे में नीतियों को बच्चों के स्वास्थ्य और उनके अनुभवों को केंद्र में रखकर तैयार करने की जरूरत बताई गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ शहर के औसत आंकड़ों से काम नहीं चलेगा, बल्कि यह समझना होगा कि बच्चे घर, स्कूल और रोजाना के सफर में कैसी हवा में सांस ले रहे हैं.

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हल्की-सी चोट लगते ही होता है तेज दर्द, आखिर शरीर के बाहर ही क्यों लटके रहते हैं टेस्टिकल्स?

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Why Do Testicles Hang Outside The Body: हल्की-सी चोट लगते ही तेज दर्द क्यों होता है और आखिर टेस्टिकल्स शरीर के बाहर ही क्यों रहते हैं, यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है. दरअसल, मेल रिप्रोडक्टिव सिस्टम का यह हिस्सा बेहद संवेदनशील और खास बनावट वाला होता है. टेस्टिकल्स को घेरने वाली थैली को स्क्रोटम कहा जाता है, जो पीनस के नीचे स्थित स्किन और मांसपेशियों से बनी एक मजबूत लेकिन लचीली स्ट्रक्चर है. इसके अंदर दो अंडाकार ग्लैंड्स होती हैं, जो स्पर्म बनाने और टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन रिसाव करने का काम करती हैं.

क्यों होते हैं बाहर?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट clevelandclinic के अनुसार, टेस्टिकल्स शरीर के बाहर इसलिए होते हैं क्योंकि इन्हें सामान्य शरीर के तापमान से थोड़ा कम तापमान की जरूरत होती है. स्पर्म निर्माण सही तरीके से तभी हो पाता है जब तापमान शरीर से कुछ डिग्री कम रहे. स्क्रोटम एक तरह से क्लाइमेट कंट्रोल सिस्टम की तरह काम करता है. इसमें मौजूद क्रीमास्टर मांसपेशी जरूरत के मुताबिक टेस्टिकल्स को शरीर के करीब या दूर ले जाती है, ताकि तापमान संतुलित रहे. इसी कारण प्रकृति ने इन्हें पेट के भीतर नहीं, बल्कि बाहर लटकने की व्यवस्था दी है.

हल्का चोट होने पर दर्द क्यों होता है?

Medicalnewstoday की रिपोर्ट के अनुसार, अब सवाल आता है कि हल्की चोट पर इतना तेज दर्द क्यों होता है. इसका मुख्य कारण है नसों की की अधिकतम. टेस्टिकल्स में बहुत घनी और कोमल नर्व एंडिंग्स होती हैं. शरीर के छोटे से हिस्से में इतनी ज्यादा नसें होने की वजह से हल्का-सा झटका भी तेज दर्द में बदल जाता है. इसके अलावा यह हिस्सा बाहरी है और हड्डियों या मोटी मांसपेशियों से सुरक्षित नहीं है, इसलिए चोट का असर सीधे इन पर पड़ता है.

कैसे होता है बचाव?

हालांकि नेचर ने कुछ सुरक्षा उपाय भी दिए हैं. स्क्रोटम की त्वचा लचीली होती है, अंदर रेशेदार परत ट्यूनिका अल्बुजिनिया मौजूद रहती है और टेस्टिकल्स में हल्की-सी मोशन भी होती है, जिससे वे झटके को कुछ हद तक सह सकें. लेकिन ये सुरक्षा पूरी तरह दर्द से नहीं बचा पाती. कई बार टेस्टिकल्स पर चोट लगने के बाद पेट या निचले हिस्से में भी दर्द महसूस होता है. इसे रेफर्ड पेन कहा जाता है. दरअसल, भ्रूण विकास के दौरान टेस्टिकल्स शुरुआत में पेट के अंदर बनते हैं और बाद में नीचे की ओर उतरते हैं. इसी वजह से इनके कुछ नसों के संबंध पेट के हिस्से से जुड़े रहते हैं. जब चोट लगती है तो दिमाग को संकेत मिलता है, लेकिन वह हमेशा सटीक स्थान पहचान नहीं पाता, जिससे पेट में भी दर्द या मितली महसूस हो सकती है.

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गलती से भी एक बार में कभी मत पीना इतनी बियर, वरना हो जाएगी मौत

गलती से भी एक बार में कभी मत पीना इतनी बियर, वरना हो जाएगी मौत


How Much Beer Is Life Threatening: गलती से भी एक बार में बहुत ज्यादा बियर पी लेना जानलेवा साबित हो सकता है, लेकिन यह समझना आसान नहीं है कि आखिर कितनी मात्रा खतरनाक हो सकती है. दोस्तों के साथ बैठकर कुछ पेग लेते समय शायद ही कोई इस बात पर ध्यान देता है कि शरीर की अपनी एक सीमा होती है. सच यह है कि शराब से मौत की कोई एक तय मात्रा नहीं होती. चलिए आपको बताते हैं कि कितनी बियर पीना आपके लिए खतरनाक हो सकता है?

कितनी बियर आपके लिए खतरनाक?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline के अनुसार, शरीर शराब को एक निश्चित रफ्तार से ही तोड़ पाता है. आम तौर पर लिवर एक घंटे में लगभग एक स्टैंडर्ड ड्रिंक प्रोसेस करता है. अगर कोई व्यक्ति जल्दी-जल्दी पीता है, तो ब्लड में अल्कोहल की मात्रा तेजी से बढ़ने लगती है. ब्लड अल्कोहल कंसंट्रेशन यानी बीएसी अगर 0.08 प्रतिशत तक पहुंच जाए तो ज्यादातर जगहों पर व्यक्ति को नशे में माना जाता है. लेकिन जब यही स्तर 0.40 प्रतिशत या उससे ऊपर पहुंच जाता है, तो स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है. इस स्तर पर कोमा या मौत का जोखिम पैदा हो जाता है.

एक स्टैंडर्ड ड्रिंक में लगभग 14 ग्राम शुद्ध अल्कोहल होता है. यह करीब 12 औंस लगभग 350 मि.ली, 5 प्रतिशत अल्कोहल वाली बियर, 5 औंस वाइन या 1.5 औंस हार्ड ड्रिंक के बराबर होता है. सामान्य तौर पर एक स्टैंडर्ड ड्रिंक BAC को लगभग 0.02 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है. इसका मतलब है कि कुछ ही ड्रिंक में व्यक्ति कानूनी रूप से नशे में आ सकता है, लेकिन जानलेवा स्तर तक पहुंचने के लिए इससे काफी ज्यादा मात्रा चाहिएय औसतन किसी व्यक्ति को 0.40 प्रतिशत BAC तक पहुंचने के लिए लगभग 25 स्टैंडर्ड ड्रिंक लेने पड़ सकते हैं, हालांकि असल जिंदगी में यह संख्या व्यक्ति-विशेष पर निर्भर करती है. ध्यान रहे कि गिलास में परोसी गई बियर कई बार स्टैंडर्ड मात्रा से ज्यादा होती है या उसमें अल्कोहल प्रतिशत अधिक होता है, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है.

क्या होती है ओवर डोज की पहचान?

अल्कोहल ओवरडोज के संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी है. लगातार उल्टी होना, त्वचा का पीला या नीला पड़ना, दिल की धड़कन धीमी होना, शरीर का तापमान गिरना, सांसों का बहुत धीमा या अनियमित होना, भ्रम की स्थिति, दौरे पड़ना या बेहोशी, ये सभी गंभीर चेतावनी संकेत हैं. अगर किसी की सांस आठ प्रति मिनट से कम हो जाए या वह जाग न पाए, तो तुरंत मेडिकल मदद लेना जरूरी है. शराब का असर सिर्फ उसी रात तक सीमित नहीं रहता.

खाली पेट पीने से अल्कोहल तेजी से खून में पहुंचता है और कम मात्रा में भी ज्यादा नशा हो सकता है. पानी कम पीना, तेजी से ड्रिंक खत्म करना या अन्य पदार्थों के साथ मिलाकर पीना भी खतरा बढ़ाता है. इसलिए खाने के साथ पीना, हर ड्रिंक के बीच पानी लेना और एक घंटे में एक से ज्यादा ड्रिंक न लेना समझदारी मानी जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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