कमर दर्द, बार-बार यूरिन या चेहरे पर सूजन… शरीर के इन संकेतों को न लें हल्के में

कमर दर्द, बार-बार यूरिन या चेहरे पर सूजन… शरीर के इन संकेतों को न लें हल्के में


What Are The First Signs Of Kidney Failure: किडनी हमारे शरीर का बेहद अहम अंग है.  यह खून को साफ करती है, शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालती है और पानी व इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखती है. जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर कई तरह के संकेत देने लगता है. इन लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि समय पर इलाज न मिलने पर स्थिति किडनी फेलियर तक पहुंच सकती है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Newspoint की रिपोर्ट के अनुसार, किडनी से जुड़ी समस्या में अक्सर कमर के निचले हिस्से या पसलियों के नीचे दर्द महसूस होता है. यह दर्द कभी-कभी पेट के किनारों या कमर के आसपास तक फैल सकता है. शुरुआत में हल्का दर्द होता है, लेकिन धीरे-धीरे यह रीढ़, जांघों और पेट तक भी पहुंच सकता है. अगर लगातार कमर दर्द के साथ अन्य लक्षण भी दिखें, तो इसे हल्के में न लें.

किडनी खराब होने के शुरुआती संकेतों में बार-बार यूरिन आना शामिल है. यह सिर्फ ज्यादा पानी पीने की वजह से नहीं होता, बल्कि किडनी की कार्यक्षमता में गड़बड़ी के कारण भी हो सकता है. पेशाब करते समय जलन या दर्द महसूस होना भी गंभीर संकेत है, जो किडनी या यूरिनरी ट्रैक्ट में समस्या की ओर इशारा करता है. सामान्य तौर पर पेशाब का रंग हल्का पीला होता है, लेकिन अगर पर्याप्त पानी पीने के बावजूद रंग गहरा या धुंधला बना रहे, तो जांच करानी चाहिए. यूरिन में खून दिखना तो बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

चेहरे या आंखों से भी नजर आते हैं लक्षण?

सुबह उठते समय चेहरे या आंखों के नीचे सू जन दिखना भी किडनी की गड़बड़ी का संकेत हो सकता है. यह शरीर में पानी जमा होने की वजह से होता है. बिना ज्यादा मेहनत के लगातार थकान महसूस होना, भूख कम लगना, बार-बार उल्टी या मतली आना भी किडनी फेलियर के लक्षण हो सकते हैं. शरीर में विषैले तत्व जमा होने से एनर्जी की कमी और कमजोरी महसूस होती है. त्वचा में लगातार खुजली होना या सांस लेने में दिक्कत आना भी गंभीर संकेत हैं. शरीर में तरल पदार्थ जमा होने से सांस फूल सकती है, यहां तक कि सामान्य बातचीत या थोड़ी-सी चाल में भी.

कब मिलना चाहिए डॉक्टर से?

अगर इनमें से पांच या उससे अधिक लक्षण नजर आएं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. शुरुआती चरण में पहचान और इलाज से किडनी को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है. पर्याप्त पानी पिएं, लेकिन सोने से ठीक पहले ज्यादा तरल पदार्थ लेने से बचें. नमक का सेवन नियंत्रित रखें, नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं और ब्लड प्रेशर व वजन पर नजर रखें. समय पर सतर्कता ही किडनी की सुरक्षा की सबसे बड़ी कुंजी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिर्फ शराब ही नहीं, आपकी खराब लाइफस्टाइल भी बना रही है लिवर को बीमार; जानें कैसे बचें?

सिर्फ शराब ही नहीं, आपकी खराब लाइफस्टाइल भी बना रही है लिवर को बीमार; जानें कैसे बचें?


Why Fatty Liver Is Found During Routine Checkup: कई लोग बिल्कुल सामान्य महसूस करते हुए नियमित हेल्थ चेकअप के लिए जाते हैं और अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में चुपचाप लिखा मिलता है फैटी लिवर की दिक्कत. न तेज दर्द, न कोई गंभीर लक्षण. यही इस दिक्कत की सबसे बड़ी वजह है कि इसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. इसे मेडिकल टर्म में मेटाबॉलिक डिसफंक्शन एसोसिएटेड स्टियाटोटिक लिवर डिजीज कहा जाता है. जब लिवर के कुल वजन का 5 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा फैट बन जाए, तो इसे फैटी लिवर माना जाता है. शुरुआत शांत रहती है, लेकिन बढ़ने पर यह सिरोसिस तक पहुंच सकता है.

क्यों अक्सर इत्तफाक से पता चलता है?

लिवर बेहद सहनशील अंग है. शुरुआती चरण में यह सामान्य काम करता रहता है, डिटॉक्स, प्रोटीन बनाना, पाचन में मदद, सब चलता रहता है. थकान या दाहिने ऊपरी पेट में हल्की भारीपन जैसी शिकायतें अक्सर नजरअंदाज हो जाती हैं. ऑरो सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, पटना की विशेषज्ञ डॉ. अंजलि सौरभ बताती हैं कि फैटी लिवर अक्सर रूटीन अल्ट्रासाउंड या किसी और वजह से कराए गए स्कैन में सामने आता है. यहां तक कि शुरुआती दौर में लिवर फंक्शन टेस्ट भी सामान्य आ सकते हैं, क्योंकि लिवर में रीजनरेशन की क्षमता अधिक होती है.

शरीर के अंदर क्या हो रहा होता है?

अधिक कैलोरी खासकर रिफाइंड कार्ब्स और मीठे पेय लिवर में फैट के रूप में जमा होने लगती है. समय के साथ यह सूजन, फाइब्रोसिस और गंभीर मामलों में सिरोसिस का कारण बन सकता है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, यह स्थिति मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल और मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़ी है. यानी यह सिर्फ लिवर की बीमारी नहीं, बल्कि पूरे मेटाबॉलिज्म का संकेत है.

भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं इसके मामले

शहरी लाइफस्टाइल, लंबे समय तक बैठना, प्रोसेस्ड फूड, कम नींद और तनाव इसके मुख्य कारण हैं. अनुमान है कि शहरी भारत में लगभग हर तीसरा एडल्ट फैटी लिवर से प्रभावित हो सकता है . वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने भी लाइफस्टाइल से जुड़ी नॉन कम्युनिकेबल डिजीज के बढ़ते बोझ को लेकर चेतावनी दी है.

क्या शराब इसके पीछे जिम्मेदार?

इसका सीधा सा जवाब है नहीं. बड़ी संख्या में मरीज ऐसे हैं जो शराब नहीं पीते, फिर भी इससे प्रभावित हैं. यह गलतफहमी कई बार लोगों को समय पर कदम उठाने से रोकती है. अच्छी खबर यह है कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर रिवर्स हो सकता है. 5 से 10 प्रतिशत वजन कम करने से लिवर फैट घट सकता है. हफ्ते में कम से कम 150 मिनट व्यायाम, मीठे पेय कम करना, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल रखना, ये सभी कारगर कदम हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये हैं सबसे गलत और खतरनाक फूड कॉम्बिनेशन, आयुर्वेद में भी है इनका जिक्र

ये हैं सबसे गलत और खतरनाक फूड कॉम्बिनेशन, आयुर्वेद में भी है इनका जिक्र


Which Foods Should Not Be Eaten Together: खाना खाते समय हमें कुछ चीजों का ध्यान रखने की जरूरत होती है. हम क्या खाते हैं और किन चीजों को साथ में मिलाकर खाते हैं, इसका सीधा असर हमारे डाइजेशन शक्ति पर पड़ता है. गलत फूड कॉम्बिनेशन पाचन को बिगाड़ सकते हैं और शरीर में टॉक्सिक तत्व जमा कर सकते हैं. इसका नतीजा गैस, पेट फूलना, एसिडिटी, त्वचा संबंधी समस्याएं और लंबे समय में गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ सकता है. चलिए आपको आयुर्वेद के हिसाब से बताते हैं कि किन कॉम्बिनेशन से हमें बचना चाहिए. 

क्या कहता है आयुर्वेद?

आयुर्वेद के बारे में जानकारी देने वाली संस्था kevaayurveda के अनुसार, आयुर्वेद मानता है कि हर व्यक्ति की वात, पित्त, कफ और पाचन क्षमता अलग होती है कुछ खानें की चीजें एक-दूसरे के विपरीत गुण रखते हैं. यदि इन्हें बार-बार साथ में खाया जाए तो डाइजेशन सिस्टम पर अतिरिक्त प्रेशर पड़ता है. इससे गैस, कब्ज, सीने में जलन, मुंहासे, कमजोर इम्यूनिटी और डाइजेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

किन फूड कॉम्बिनेशन से बचना चाहिए?

kevaayurveda के अनुसार, कुछ प्रमुख गलत फूड कॉम्बिनेशन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है, उनमें सबसे पहले आता है दूध और मछली. आयुर्वेद के अनुसार दूध ठंडा और भारी होता है, जबकि मछली गर्म तासीर वाली मानी जाती है. दोनों को साथ लेने से पाचन गड़बड़ा सकता है और स्किन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसी तरह दूध के साथ खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू या अनानास भी ठीक नहीं माने जाते, क्योंकि ये पेट में दूध को फाड़ सकते हैं और गैस या एसिडिटी बढ़ा सकते हैं.

गरम भोजन के साथ शहद मिलाना भी आयुर्वेद में हानिकारक बताया गया है. शहद को गर्म करने से उसके गुण बदल सकते हैं और शरीर में टॉक्सिक प्रभाव पैदा हो सकता है. भारी भोजन के तुरंत बाद फल खाना भी उचित नहीं माना जाता, क्योंकि फल जल्दी पचते हैं और भारी भोजन के साथ पेट में फर्मेंटेशन शुरू कर सकते हैं. दही और चीनी का मेल भी पाचन के लिए अनुकूल नहीं माना जाता. दही पहले से ही खट्टा और ठंडा होता है, जबकि रिफाइंड चीनी शरीर में असंतुलन बढ़ा सकती है. रात में दही को फल या ठंडी चीजों के साथ लेना कफ बढ़ा सकता है, जिससे सर्दी-खांसी या साइनस की समस्या हो सकती है. बासी भोजन के साथ दूध लेना भी पाचन के लिए सही नहीं माना गया.

किन चीजों का सेवन करना चाहिए?

आयुर्वेद सलाह देता है कि मौसमी आहार लें, जरूरत से ज्यादा न खाएं और अदरक, जीरा, सौंफ जैसे मसालों का उपयोग करें, जो डाइजेशन को मजबूत बनाते हैं. सही फूड कॉम्बिनेशन अपनाने से डाइजेशन मजबूत रहती है, न्यूट्रिशन तत्वों का ऑब्जर्वेशन बेहतर होता है और शरीर संतुलित रहता है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए यह नियम और भी लाभकारी माने जाते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सच में नहीं होता सोराइसिस का कोई इलाज, जानें कितनी खतरनाक है यह बीमारी?

क्या सच में नहीं होता सोराइसिस का कोई इलाज, जानें कितनी खतरनाक है यह बीमारी?


What Are The Early Signs Of Psoriasis: सोरायसिस एक ऐसी स्किन की बीमारी है जिसमें त्वचा पर खुजलीदार, परतदार और लाल या गहरे रंग के चकत्ते उभर आते हैं. यह अक्सर घुटनों, कोहनियों, कमर के निचले हिस्से और सिर की त्वचा पर दिखाई देता है. यह इंफेक्शन नहीं है, यानी एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलता, लेकिन यह एक क्रॉनिक बीमारी है जो बार-बार उभर सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कितना खतरनाक है. 

कैसे होती है यह बीमारी?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट मायो क्लिनिक के अनुसार, यह एक इम्यून-मीडिएटेड बीमारी है, यानी इसमें शरीर की इम्यून सिस्टम असामान्य तरीके से सक्रिय हो जाती है और त्वचा की सेल्स जरूरत से ज्यादा तेजी से बनने लगती हैं. सामान्य रूप से त्वचा की सेल्स धीरे-धीरे बनती और झड़ती हैं, लेकिन सोरायसिस में यह प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे त्वचा पर मोटी, पपड़ीदार परतें जम जाती हैं, इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं है, हालांकि सही उपचार से इसे नियंत्रित किया जा सकता है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

सोरायसिस में त्वचा पर अलग-अलग तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं. किसी में रूसी जैसे छोटे धब्बे दिखते हैं तो किसी में बड़े हिस्से पर लाल या बैंगनी रंग के चकत्ते बन जाते हैं जिन पर सफेद या सिल्वर रंग की परत होती है. त्वचा सूखी और फटी हुई हो सकती है, जिससे कभी-कभी खून भी आ सकता है. खुजली, जलन या दर्द भी महसूस हो सकता है. यह बीमारी अक्सर चक्रों में चलती है, कुछ हफ्तों या महीनों तक लक्षण बढ़ते हैं, फिर कुछ समय के लिए कम हो जाते हैं.

कितने तरह की होती है सोरायसिस बीमारी?

इसके कई प्रकार होते हैं. प्लाक सोरायसिस सबसे सामान्य रूप है, जिसमें मोटी और उभरी हुई परतें बनती हैं. नेल सोरायसिस में नाखूनों पर गड्ढे, रंग में बदलाव या नाखून का ढीला पड़ना देखा जा सकता है. गुट्टेट सोरायसिस आमतौर पर बच्चों और युवाओं में होता है और अक्सर गले के इंफेक्शन के बाद दिखाई देता है. इनवर्स सोरायसिस शरीर की सिलवटों जैसे कमर या ब्रेस्ट के नीचे में चिकने और लाल धब्बों के रूप में दिखता है. पस्टुलर और एरिथ्रोडर्मिक सोरायसिस रेयर लेकिन गंभीर प्रकार हैं, जिनमें पस भरे फफोले या पूरे शरीर पर लाल, छिलती हुई त्वचा हो सकती है.

डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?

अगर त्वचा पर लगातार ऐसे लक्षण दिखें, जो बढ़ते जाएं, दर्द दें या इलाज के बावजूद ठीक न हों, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. समय पर पहचान और सही इलाज से इस बीमारी के प्रभाव को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है और नॉर्मल लाइफ जिया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चंद्र ग्रहण के दौरान किन बातों का ध्यान रखें गर्भवती महिलाएं, वरना बच्चे पर पड़ता है खराब असर?

चंद्र ग्रहण के दौरान किन बातों का ध्यान रखें गर्भवती महिलाएं, वरना बच्चे पर पड़ता है खराब असर?


Does Lunar Eclipse Affect Pregnancy: साल 2026 का पहला चंद्रग्रहण मंगलवार यानी 3 मार्च को लगने जा रहा है. इस साल लगने वाले सूर्य ग्रहण के सिर्फ 15 दिनों में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण हो रहा है. इसको लेकर हमारे समाज में गर्भावस्था के लिए कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं. प्राचीन समय में जब ग्रहण को रहस्यमयी और दुर्लभ घटना माना जाता था, तब यह विश्वास बन गया कि ऐसे समय में ब्रह्मांडीय शक्तियां सक्रिय होती हैं और उनका असर धरती पर पड़ सकता है. इसी वजह से गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के दौरान विशेष सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती रही है. हालांकि ये परंपराएं सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित हैं, आधुनिक साइंस इन दावों की पुष्टि नहीं करता. चलिए आपको बताते हैं. 

क्या ग्रहण की किरणें गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचाती हैं?

Dr. Shital Bankar MD Homeopath, Pune ने अपने एक ब्लॉग में बताया कि चंद्र ग्रहण से प्रेग्नेंसी में कोई नुकसान नहीं होता है, यह साइंटफिक तौर पर सिद्ध हो चुका है.  वैज्ञानिक रूप से ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि चंद्र ग्रहण से किसी प्रकार का हानिकारक विकिरण निकलता है. यह केवल पृथ्वी की छाया का चंद्रमा पर पड़ना है। इससे गर्भ में पल रहे शिशु पर कोई जैविक असर नहीं पड़ता. रिसर्च में भी ग्रहण और गर्भपात या भ्रूण के विकास में किसी समस्या के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया है।

क्या ग्रहण के दौरान खाना नहीं खाना चाहिए?

कुछ परंपराओं में ग्रहण के समय उपवास रखने की सलाह दी जाती है. लेकिन डॉक्टरों के अनुसार गर्भावस्था में नियमित और संतुलित भोजन जरूरी है. लंबे समय तक भूखे रहने से ब्लड शुगर कम हो सकता है, जिससे कमजोरी और डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है. इसलिए गर्भवती महिलाओं को समय पर भोजन और पर्याप्त पानी जरूर लेना चाहिए.

क्या ग्रहण के समय बाहर जाना खतरनाक है?

सौर ग्रहण के विपरीत, चंद्र ग्रहण को नंगी आंखों से देखना पूरी तरह सुरक्षित है. इससे आंखों या शरीर को कोई नुकसान नहीं होता. यदि मौसम अनुकूल हो और महिला सहज महसूस करे, तो बाहर जाकर चंद्रमा देखना सुरक्षित है. वास्तविक खतरा केवल असुविधाजनक मौसम या थकान हो सकता है, न कि ग्रहण स्वयं.

क्या तेज या नुकीली चीजों का इस्तेमाल नुकसानदेह है?

यह मान्यता भी वैज्ञानिक आधार से परे है कि ग्रहण के दौरान चाकू, सुई या कैंची का उपयोग करने से बच्चे में जन्म दोष हो सकते हैं. जन्म दोष जेनेटिक या एनवायरमेंट कारणों से होते हैं, खगोलीय घटनाओं से नहीं.

गर्भावती महिलाओं को क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट का मानना है कि गर्भावस्था में सबसे महत्वपूर्ण है संतुलित आहार, पर्याप्त आराम, तनाव से बचाव और नियमित जांच. यदि कोई महिला सांस्कृतिक परंपराओं का पालन करना चाहती है जैसे आराम करना, प्रार्थना करना या ग्रहण के बाद ताजा भोजन बनाना तो यह उसकी व्यक्तिगत पसंद है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बालों का झड़ना और पीरियड्स की समस्या? कहीं आप भी तो नहीं हैं इस जरूरी मिनरल की कमी की शिकार?

बालों का झड़ना और पीरियड्स की समस्या? कहीं आप भी तो नहीं हैं इस जरूरी मिनरल की कमी की शिकार?


How To Know If You Have Zinc Deficiency: लगातार झड़ते बाल, अनरेगुलर पीरियड्स, अचानक बढ़ते मुंहासे अक्सर महिलाएं इन समस्याओं का कारण तनाव, उम्र या हार्मोनल बदलाव को मान लेती हैं. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि एक छोटा-सा मिनलर, जिंक, इन लक्षणों के पीछे अहम भूमिका निभा सकता है. जिंक शरीर में कई जरूरी काम करता है कि हार्मोन संतुलन बनाए रखना, इम्यून सिस्टम को मजबूत करना और सेल्स की मरम्मत करना. फिर भी इसकी कमी अक्सर नजरअंदाज हो जाती है, जिसके चलते हमें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. 

क्या है इसको लेकर नियम?

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार, एडल्ट महिलाओं को रोज लगभग 8 से 12 मिलीग्राम जिंक की जरूरत होती है, लेकिन खासकर शाकाहारी भोजन में इसकी पर्याप्त मात्रा नहीं मिल पाती या उसका ऑब्जर्वेशन कम हो सकता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार, जिंक प्रजनन स्वास्थ्य, घाव भरने, डीएनए निर्माण और इम्यून सेल्स के विकास के लिए जरूरी है. इसके बावजूद इसके, इसे आयरन या कैल्शियम जितना महत्व नहीं दिया जाता.

इसकी कमी से क्या दिक्कत होती है?

एक्सपर्ट के मुताबिक, जिंक एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन को संतुलित रखने में मदद करता है. इसकी कमी से ओव्यूलेशन अनियमित हो सकता है, पीएमएस के लक्षण बढ़ सकते हैं और मुंहासे भी बढ़ सकते हैं. जिंक थायरॉयड फंक्शन से भी जुड़ा है, जो एनर्जी स्तर और पीरियड्स को प्रभावित करता है. यही वजह है कि थकान और पीरियड्स की गड़बड़ी अक्सर साथ दिखाई देती है.

इनको भी नहीं करना चाहिए

कमजोर इम्यूनिटी भी जिंक की कमी का संकेत हो सकती है. बार-बार इंफेक्शन होना, घाव का देर से भरना या लगातार सर्दी-जुकाम रहना इस ओर इशारा करते हैं. शरीर में सूजन बढ़ने और अनजाने में वजन घटने जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं. कुछ महिलाएं ज्यादा जोखिम में रहती हैं जैसे मेनोरेजिया पीसीओएस से जूझ रही महिलाएं, सख्त शाकाहारी या वे जो लंबे समय से तनाव में हैं.  गर्भावस्था के दौरान भी जिंक की जरूरत बढ़ जाती है. दालों और अनाज में मौजूद फाइटेट्स जिंक के ऑब्जर्वेशन को कम कर सकते हैं, इसलिए इन्हें भिगोकर पकाना लाभकारी होता है.

इसकी कमी कैसे पूरी करें?

जिंक के अच्छे सोर्स में कद्दू के बीज, चना, मसूर, काजू, बादाम, पालक, साबुत अनाज, अंडे, दही, सीफूड और लीन मीट शामिल हैं. चूंकि शरीर जिंक को लंबे समय तक स्टोर नहीं करता, इसलिए रोजाना संतुलित मात्रा में लेना जरूरी है. हालांकि सप्लीमेंट लेने से पहले जांच और एक्सपर्ट की सलाह जरूरी है, क्योंकि अधिक मात्रा में जिंक लेने से तांबे के ऑब्जर्वेशन में बाधा और डाइजेशन दिक्कतें हो सकती हैं. कभी-कभी बेहतर स्वास्थ्य किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि ऐसी छोटी कमी को पूरा करने से आता है, जिसे हम लंबे समय से नजरअंदाज कर रहे होते हैं.

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