फैटी लिवर को जड़ से खत्म कर देगी आपकी ये 5 आदतें! एकदम आसान है इन्हें करना

फैटी लिवर को जड़ से खत्म कर देगी आपकी ये 5 आदतें! एकदम आसान है इन्हें करना


फैटी लिवर से राहत पाने के लिए नियमित फिजिकल एक्टिविटी बहुत जरूरी है. ब्रिस्क वॉकिंग, साइकलिंग या स्विमिंग जैसी एक्सरसाइज लिवर में जमा फैट को कम करने में मदद करती है. रिसर्च के अनुसार हफ्ते में कम से कम 150 मिनट की मीडियम लेवल की एक्सरसाइज करनी चाहिए. इससे न सिर्फ फैट बर्न होता है बल्कि इंसुलिन सेंसिटिविटी और ब्लड सर्कुलेशन भी बेहतर होता है, जिससे लिवर सही तरीके से काम कर पाता है.

वहीं हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मेथी और ब्रोकली लिवर के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है. इनमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट लिवर की सफाई में मदद करते और सूजन को कम करते हैं. यह सब्जियां लिवर में फैट जमा होने की प्रक्रिया को धीमा करती है, जिससे फैटी लिवर की समस्या कंट्रोल में रहती है.

वहीं हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मेथी और ब्रोकली लिवर के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है. इनमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट लिवर की सफाई में मदद करते और सूजन को कम करते हैं. यह सब्जियां लिवर में फैट जमा होने की प्रक्रिया को धीमा करती है, जिससे फैटी लिवर की समस्या कंट्रोल में रहती है.

Published at : 18 Mar 2026 08:26 AM (IST)

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मुंह में दिखें ये संकेत तो हो सकता है आंत का कैंसर, इग्नोर न करें डेंटिस्ट की ये वॉर्निंग

मुंह में दिखें ये संकेत तो हो सकता है आंत का कैंसर, इग्नोर न करें डेंटिस्ट की ये वॉर्निंग


ब्रिटेन में हर 12 मिनट में किसी व्यक्ति को आंत का कैंसर (कोलोरेक्टल कैंसर) होने का पता चलता है और हर साल लगभग 17,000 लोग इस बीमारी के कारण अपनी जान गंवा देते हैं. यह कैंसर ब्रिटेन में कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा सबसे आम कारण है. आमतौर पर लोग इसके लक्षणों को पेट दर्द, मल की आदतों में बदलाव या दस्त और कब्ज जैसे संकेतों से पहचानते हैं, लेकिन नए शोध बताते हैं कि मुंह में होने वाले बदलाव भी इस गंभीर बीमारी की शुरुआती चेतावनी हो सकते हैं. 

मुंह के बैक्टीरिया और आंत का संबंध

दांतों और मसूड़ों की सामान्य समस्याएं मुंह में बैक्टीरिया के असंतुलन का संकेत दे सकती हैं. मुंह में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया आंत तक पहुंच सकते हैं और वहां सूजन पैदा कर सकते हैं, जो कुछ मामलों में कैंसर के विकास में मदद कर सकता है.  कुछ आदतें, जैसे दांत ठीक से ब्रश और फ्लॉस न करना, धूम्रपान, ज्यादा शराब का सेवन और ज्यादा चीनी व कम फाइबर वाला आहार, इस नाजुक बैक्टीरिया संतुलन को बिगाड़ सकते हैं. 

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मुंह में दिखने वाले आंत का कैंसर के संकेत 

1. मसूड़ों से खून आना – मसूड़ों से खून आना एक सामान्य लक्षण है जो मसूड़ों की बीमारी की ओर इशारा करता है. यह सूजन और संक्रमण का संकेत होता है, जिससे हानिकारक बैक्टीरिया ब्लड फ्लो में जा सकते हैं और पाचन तंत्र तक पहुंच सकते हैं. हार्वर्ड के शोध अनुसार, मसूड़ों की बीमारी वाले लोगों में प्री कैंसरस कोलोन पॉलीप्स का खतरा 17 21 प्रतिशत तक ज्यादा होता है. इसके अलावा, सूजे हुए या कोमल मसूड़े, जो बिना दिखाई देने वाले रक्तस्राव के होते हैं, प्रारंभिक जिंजिवल सूजन का संकेत दे सकते हैं. यह स्थिति अक्सर लक्षणहीन रहती है और वर्षों तक नजरअंदाज की जा सकती है. 

2. बदबूदार सांस – लगातार मुंह से बदबू आना भी एक चेतावनी हो सकती है. यह फ्यूसोबैक्टीरियम न्यूक्लियेटम नामक बैक्टीरिया से जुड़ा हो सकता है, जो मसूड़ों की बीमारी के साथ साथ आंत्र कैंसर के ट्यूमर में भी पाया गया है. यह बैक्टीरिया लार या रक्त कोशिकाओं के माध्यम से शरीर के अन्य हिस्सों में जा सकता है और इम्यूनिटी से बचकर कैंसर के विकास में योगदान कर सकता है. 

3. जीभ पर सफेद या पीली परत – जीभ पर सफेद या पीली परत बैक्टीरिया, गंदगी या मृत कोशिकाओं के जमा होने से बनती है. यह खराब मौखिक स्वच्छता, डिहाइड्रेशन या सूखे मुंह का भी संकेत हो सकती है. शोध बताते हैं कि कुछ परतें मुंह के बैक्टीरिया में बदलाव को दर्शा सकती हैं, जो आंत के कैंसर से जुड़ा हो सकता है. 

4. चार या ज्यादा दांत खोना – हार्वर्ड और एएसीआर के अनुसार, जिन लोगों ने चार या ज्यादा दांत खो दिए हैं, उनमें प्री कैंसरस कोलोन पॉलीप्स का खतरा 20 प्रतिशत ज्यादा होता है. यह लंबे समय से बिना इलाज की मसूड़ों की बीमारी का परिणाम हो सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लिवर में जमा फैट है खतरे की घंटी! क्यों होती है यह समस्या और अपनी ‘लिवर फैक्ट्री’ कैसे दुरुस्त?

लिवर में जमा फैट है खतरे की घंटी! क्यों होती है यह समस्या और अपनी ‘लिवर फैक्ट्री’ कैसे दुरुस्त?


What To Do If Ultrasound Shows Fatty Liver: अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में फैटी लिवर शब्द पढ़ना कई लोगों के लिए चिंता की वजह बन जाता है. फैटी लिवर, जिसे मेडिकल भाषा में MASLD कहा जाता है, तब होता है जब लिवर की सेल्स में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाती है। यह समस्या किसी को भी हो सकती है, युवा, बुजुर्ग, डायबिटीज के मरीज या सामान्य वजन वाले लोग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं. खास बात यह है कि अक्सर इसके कोई क्लियर लक्षण नहीं होते और जांच के दौरान ही इसका पता चलता है. अच्छी खबर यह है कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर स्थायी नहीं होता. समय रहते सही कदम उठाए जाएं तो इसे रोका और कई मामलों में ठीक भी किया जा सकता है.

किन वजहों से होती है दिक्कत?

मेडिकल तौर पर फैटी लिवर का मतलब है कि लिवर के टिश्यू में 5 प्रतिशत से ज्यादा फैट जमा हो चुका है. यह आमतौर पर मेटाबॉलिक समस्याओं जैसे मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, खून में ज्यादा फैट या असंतुलित खान-पान की वजह से होता है, न कि हमेशा शराब के कारण, अगर इस स्थिति को नजरअंदाज किया जाए तो समय के साथ यह सूजन, फाइब्रोसिस और लिवर की काम करने की क्षमता में कमी का कारण बन सकता है. लिवर को एक फैक्ट्री की तरह समझा जा सकता है, जब इसमें जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाती है तो इसकी काम की स्पीड़ धीमी पड़ने लगती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

 डॉ. अपूर्वा पांडे ने TOI को बताया कि अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर का जिक्र सुनकर घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह स्थिति उलटी भी हो सकती है. उनके अनुसार यह समस्या अक्सर मोटापा, डायबिटीज, ज्यादा कोलेस्ट्रॉल, कम फिजिकल एक्टिविटी या अत्यधिक शराब सेवन से जुड़ी होती है. फैटी लिवर के दो मुख्य प्रकार होते हैं, नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर और अल्कोहलिक फैटी लिवर. डॉक्टरों की सलाह है कि रिपोर्ट मिलने के बाद सबसे पहले घबराने के बजाय सही जानकारी लेना जरूरी है. अपने डॉक्टर से मिलकर लिवर फंक्शन टेस्ट, फाइब्रोसिस स्कोर और अन्य जोखिम कारकों जैसे ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल की जांच करानी चाहिए.

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क्या होता है इसका इलाज?

एक्सपर्ट मानते हैं कि फैटी लिवर के शुरुआती चरण में सबसे प्रभावी इलाज लाइफस्टाइल में बदलाव है. जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी में प्रकाशित एक स्टडी बताता है कि संतुलित आहार और नियमित व्यायाम लिवर में जमा फैट और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं. डॉ. पांडे के अनुसार वजन कम करना सबसे अहम कदमों में से एक है. शरीर के कुल वजन का लगभग 5 प्रतिशत कम होने से लिवर में जमा फैट घट सकता है, जबकि 7 से 10 प्रतिशत वजन कम होने से सूजन और फाइब्रोसिस में भी सुधार देखा गया है. इसके साथ-साथ संतुलित डाइट, नियमित व्यायाम, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना तथा शराब से दूरी बनाना भी जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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16-18 करोड़ रुपये में आता है ये छोटा सा इंजेक्शन, जानिए किस बीमारी में होता है इस्तेमाल

16-18 करोड़ रुपये में आता है ये छोटा सा इंजेक्शन, जानिए किस बीमारी में होता है इस्तेमाल


आज के समय में ज्यादातर बीमारियों का इलाज दवाइयों, इंजेक्शन या ऑपरेशन से हो जाता है, लेकिन कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो हमारे जीन यानी अनुवांशिक कारणों से होती हैं और उनका इलाज इतना आसान नहीं होता, खासकर छोटे बच्चों में होने वाली कुछ दुर्लभ बीमारियां बहुत गंभीर होती हैं, ऐसी ही एक बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) है, जिसके इलाज के लिए एक खास इंजेक्शन आता है, जिसकी कीमत करीब 16–18 करोड़ रुपये तक होती है. यह दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में से एक मानी जाती है. तो आइए जानते हैं कि 16-18 करोड़ रुपये में कौन सा छोटा सा इंजेक्शन आता है और किस बीमारी में इस्तेमाल होता है.

16-18 करोड़ रुपये में कौन सा छोटा सा इंजेक्शन आता है

16–18 करोड़ रुपये की कीमत वाला छोटा सा इंजेक्शन Zolgensma होता है. यह दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में से एक मानी जाती है और इसका यूज एक गंभीर जेनेटिक बीमारी Spinal Muscular Atrophy (SMA) के इलाज में किया जाता है. यह एक जीन थेरेपी इंजेक्शन है. इसे आमतौर पर 2 साल से कम उम्र के बच्चों को दिया जाता है. यह सिर्फ एक बार दिया जाने वाला इंजेक्शन है. 

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किस बीमारी में इस्तेमाल होता है

16–18 करोड़ रुपये के इस छोटे इंजेक्शन Zolgensma का इस्तेमाल Spinal Muscular Atrophy (SMA) बीमारी में किया जाता है.  SMA एक जेनेटिक न्यूरो-मस्कुलर डिसऑर्डर यानी अनुवांशिक बीमारी है, जो शरीर की नसों और मांसपेशियों को प्रभावित करती है. इसमें शरीर के मोटर न्यूरॉन्स ठीक से काम नहीं करते, जो मांसपेशियों को नियंत्रित करते हैं. इस बीमारी में SMN1 नाम का जीन खराब या गायब होता है, जिसकी वजह से जरूरी प्रोटीन नहीं बन पाता है.

इसके कारण बच्चे की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. उसे बैठने, खड़े होने या चलने में परेशानी होती है. गंभीर मामलों में सांस लेने और निगलने में भी दिक्कत हो सकती है. SMA बीमारी में बच्चे के शरीर में एक जरूरी जीन (SMN1) सही से काम नहीं करता है. Zolgensma उस खराब जीन की जगह सही जीन की कॉपी शरीर में पहुंचाता है, जिससे मांसपेशियों की ताकत बेहतर हो सकती है. 

इसके लक्षण क्या हैं?

SMA के लक्षण हर बच्चे में अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ आम संकेत जैसे बच्चा समय पर बैठना या चलना नहीं सीख पाता, हाथ-पैर कमजोर रहते हैं, सिर को संभालने में दिक्कत, जल्दी थकान महसूस होना, सांस लेने या निगलने में परेशानी है. अगर ये लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी है. 

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तरक्की में तेज गुजरात कुपोषित बच्चों के मामले में क्यों नंबर-1, क्या है इसकी वजह?

तरक्की में तेज गुजरात कुपोषित बच्चों के मामले में क्यों नंबर-1, क्या है इसकी वजह?


Why Child Malnutrition Is High In Gujarat: गुजरात में बच्चों में कुपोषण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है. राज्य की तरक्की के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर कुपोषण के मामले में स्थिति इतनी गंभीर क्यों बनी हुई है. हाल ही में विधानसभा में इस मुद्दे पर बहस हुई, जहां कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने दावा किया कि राज्य में 100 में से 40 बच्चे कुपोषित हैं और इनमें बड़ी संख्या आदिवासी समुदाय से आती है. इस पर महिला एवं बाल विकास मंत्री मनीषा वकील  ने जवाब देते हुए कहा कि विपक्ष पुराने आंकड़ों पर निर्भर है. उन्होंने बताया कि पोषण ट्रैकर के मुताबिक जनवरी 2026 तक गुजरात में सिर्फ 11.4 प्रतिशत बच्चे ही कुपोषित हैं और पिछले कुछ सालों में इसमें गिरावट आई है.

क्यों गुजराज में ज्यादा है कुपोषण?

हालांकि, यहां सबसे बड़ा सवाल आंकड़ों को लेकर है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) और पोषण ट्रैकर दोनों के आंकड़े अलग-अलग तरीके से तैयार होते हैं, इसलिए इन्हें सीधे तुलना करना सही नहीं माना जाता. NFHS पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करने वाला सर्वे है, जबकि पोषण ट्रैकर आंगनवाड़ी केंद्रों में दर्ज बच्चों के डेटा पर आधारित है.

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द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, इकोनॉमिस्ट रीतिका खेड़ा के अनुसार, पोषण ट्रैकर के डेटा को पूरी तरह भरोसेमंद मानना मुश्किल है, क्योंकि इसमें कई तकनीकी और ग्राउंड लेवल की दिक्कतें हैं. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर डेटा अपडेट करने का दबाव रहता है और कई बार ऐप या नेटवर्क की समस्या के कारण सही जानकारी दर्ज नहीं हो पाती. पोषण ट्रैकर के जुलाई 2025 के आंकड़ों के अनुसार, गुजरात में 32.7 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम लंबाई), 7.3 प्रतिशत वेस्टिंग (लंबाई के हिसाब से कम वजन) और 18.4 प्रतिशत अंडरवेट (उम्र के हिसाब से कम वजन) की श्रेणी में हैं.

NFHS की रिपोर्ट में क्या है?

वहीं, NFHS-5 (2019-21) के अनुसार, 5 साल से कम उम्र के 39 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड, 25.1 प्रतिशत वेस्टेड और 39.7 प्रतिशत अंडरवेट हैं. यानी अलग-अलग मानकों से देखें तो करीब 40 प्रतिशत बच्चों के कुपोषित होने की बात इन आंकड़ों से मेल खाती है. जिला स्तर के आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके वे हैं जो आदिवासी बहुल हैं, जैसे दाहोद, छोटा उदयपुर, नर्मदा और पंचमहल। यहां स्टंटिंग, वेस्टिंग और अंडरवेट के मामले सबसे ज्यादा हैं. यानी कुल मिलाकर, अलग-अलग डेटा के बावजूद यह साफ है कि गुजरात में कुपोषण एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, खासकर आदिवासी क्षेत्रों में इसका असर ज्यादा देखने को मिलता है.

क्या हो सकती है वजह?

गुजरात में बच्चों में कुपोषण की स्थिति के पीछे कई संभावित वजहें हो सकती हैं. आदिवासी इलाकों में रहने वाले परिवारों तक संतुलित और पौष्टिक आहार की पर्याप्त पहुंच नहीं हो पाती, जिससे बच्चों के पोषण पर असर पड़ता है.कई जगहों पर स्वास्थ्य सेवाओं और आंगनवाड़ी केंद्रों की गुणवत्ता और पहुंच भी चुनौती बनी रहती है. इसके अलावा, माता-पिता में पोषण और बच्चों की देखभाल को लेकर जागरूकता की कमी भी एक अहम कारण हो सकती है. खराब खानपान और सीमित संसाधनों के चलते बच्चों के विकास पर असर पड़ता है, जिससे स्टंटिंग, वेस्टिंग और अंडरवेट जैसे मामले बढ़ते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बाहर से फिट, अंदर से अनफिट? दुबले लोगों में तेजी से बढ़ रहा ‘साइलेंट’ फैटी लिवर, जानें कारण

बाहर से फिट, अंदर से अनफिट? दुबले लोगों में तेजी से बढ़ रहा ‘साइलेंट’ फैटी लिवर, जानें कारण


Can Thin People Get Fatty Liver: अक्सर लोग मानते हैं कि अगर पेट सपाट है और वजन सामान्य है, तो शरीर पूरी तरह स्वस्थ है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि कई बार सामान्य दिखने वाले शरीर के भीतर एक खामोश समस्या पनप रही होती है वह है फैटी लिवर. यह तब होता है जब लिवर की सेल्स में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाती है. खास बात यह है कि यह समस्या सिर्फ मोटे लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि पतले दिखने वाले लोगों में भी तेजी से बढ़ रही है. इसे लीन फैटी लिवर या लीन NAFLD यानी नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज कहा जाता है.

कब माना जाता है कि फैटी लिवर की दिक्कत है?

फैटी लिवर तब माना जाता है जब लिवर की सेल्स में 5 प्रतिशत से ज्यादा फैट जमा हो जाए. इससे लिवर के जरूरी काम प्रभावित होने लगते हैं, जैसे शरीर से विषैले पदार्थों को फिल्टर करना और शुगर व फैट के स्तर को संतुलित रखना. शुरुआत में यह बीमारी कोई खास दर्द या लक्षण नहीं देती, इसलिए अक्सर लोगों को इसका पता सामान्य ब्लड टेस्ट या अल्ट्रासाउंड के दौरान ही चलता है.

पतले लोगों को क्यों होती है दिक्कत?

कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि अगर कोई पतला है तो उसके लिवर में फैट कैसे जमा हो सकता है. US National Institutes of Health की एक स्टडी के अनुसार, सिर्फ वजन से लिवर की सेहत तय नहीं होती. कई बार शरीर के अंदर, खासकर अंगों के आसपास जमा होने वाला विसरल फैट ज्यादा नुकसान करता है. व्यक्ति बाहर से पतला दिख सकता है, लेकिन अंदरूनी फैट लिवर को प्रभावित कर सकता है. एक्सपर्ट बताते हैं कि खराब खान-पान, लंबे समय तक बैठे रहना, तनाव और जेनेटिक कारण भी इस जोखिम को बढ़ा देते हैं.

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लाइफस्टाइल भी जिम्मेदार

आजकल कई लोग कम खाना तो खाते हैं, लेकिन सही खाना नहीं खाते. पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय, सफेद ब्रेड, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और ज्यादा चीनी वाली चीजें धीरे-धीरे लिवर पर दबाव डालती हैं. अतिरिक्त शुगर को लिवर फैट में बदल देता है और यही फैट समय के साथ जमा होता जाता है. दक्षिण एशियाई लोगों, खासकर भारतीयों में यह खतरा और ज्यादा देखा गया है. रिसर्च बताते हैं कि भारतीयों के शरीर में फैट अक्सर पेट और लिवर के आसपास जमा होती है. इसके अलावा खराब गट हेल्थ भी लिवर में सूजन और फैट बढ़ाने का कारण बन सकती है.

कैसे इसको ठीक किया जा सकता है?

अच्छी बात यह है कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर को सुधारा जा सकता है. संतुलित आहार, रेगुलर एक्सरसाइज, पर्याप्त नींद और तनाव कंट्रोल से लिवर धीरे-धीरे ठीक होने लगता है. एक्सपर्ट के अनुसार भोजन के बाद थोड़ी देर टहलना भी लिवर के लिए फायदेमंद होता है. इसलिए सिर्फ शरीर के आकार से स्वास्थ्य का अंदाजा लगाना सही नहीं है. रेगुलर हेल्थ चेक-अप, ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड जैसे परीक्षण फैटी लिवर की समय रहते पहचान करने में मदद करते हैं.

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