क्या आजकल आप भी बुखार और पेटदर्द से हैं परेशान, जानें किस वजह से हो रहीं ये बीमारियां?

क्या आजकल आप भी बुखार और पेटदर्द से हैं परेशान, जानें किस वजह से हो रहीं ये बीमारियां?


Why Fever And Stomach Issues Increase In Summer: अगर आपको हाल ही में बुखार, तेज सिरदर्द और पेट खराब जैसी दिक्कतें एक साथ महसूस हो रही हैं, तो आप अकेले नहीं हैं. साल के इस समय में फूड और वाटर-बॉर्न बीमारियां तेजी से बढ़ती हैं. यह सिर्फ संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे मौसम की बड़ी भूमिका होती है. डॉ. सौरदीप  के अनुसार, गर्मी और नमी का मेल बैक्टीरिया और वायरस के लिए सबसे अनुकूल माहौल बना देता है. यानी जो मौसम हमें असहज लगता है, वही इन के पनपने के लिए परफेक्ट होता है. जैसे ही ये शरीर में प्रवेश करते हैं, सबसे पहले आपका डाइजेशन सिस्टम प्रभावित होता है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

शुरुआत पेट से होती है, मतली, उल्टी, पेट में ऐंठन, दस्त, गैस और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं सामने आती हैं. यह स्थिति काफी परेशान करने वाली होती है और इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है. असली समस्या तब बढ़ती है, जब उल्टी और दस्त के कारण शरीर से पानी तेजी से निकलने लगता है और डिहाइड्रेशन हो जाता है.

डिहाइड्रेशन से क्या होती है दिक्कत?

डिहाइड्रेशन सिर्फ प्यास लगने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे शरीर के संतुलन को बिगाड़ देता है. इसी वजह से बुखार और सिरदर्द भी शुरू हो जाते हैं. शरीर इंफेक्शन से लड़ने की कोशिश करता है, लेकिन जब पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है, तो रिकवरी और मुश्किल हो जाती है. सिरदर्द लंबे समय तक बना रहता है और कमजोरी बढ़ती जाती है. 

किन लोगों को इसका खतरा ज्यादा होता है?

कुछ लोग इस समय ज्यादा जोखिम में होते हैं. बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों को खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है. इसके अलावा जो लोग बाहर का खाना ज्यादा खाते हैं, बार-बार यात्रा करते हैं या साफ पानी नहीं पीते, उनमें इंफेक्शन का खतरा ज्यादा होता है. अगर शरीर पहले से ही डिहाइड्रेटेड या कमजोर है, तो बीमारी जल्दी पकड़ लेती है. 

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कैसे कर सकते हैं इससे बचाव?

बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि पानी और खाने को लेकर सख्ती. हमेशा उबला या फिल्टर किया हुआ पानी ही पिएं. बाहर का कच्चा या खुला खाना खाने से बचें, चाहे वह कितना भी अच्छा क्यों न लगे. हमेशा ताजा और गरम खाना ही खाएं, क्योंकि गर्मी से ज्यादातर बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं. हाथ धोना एक साधारण लेकिन बेहद जरूरी आदत है. खाने से पहले और टॉयलेट के बाद हाथ जरूर धोएं। यह छोटी सी आदत आपको कई बीमारियों से बचा सकती है. अगर आप बीमार हो जाते हैं, तो हाइड्रेशन सबसे जरूरी हो जाता है। सिर्फ पानी ही नहीं, बल्कि ओआरएस या नारियल पानी जैसे तरल पदार्थ लें, ताकि शरीर को जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स मिल सकें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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जन्म से बहरेपन का इलाज अब मुमकिन! इस इंजेक्शन से लौटेगी बच्चों की सुनने की शक्ति

जन्म से बहरेपन का इलाज अब मुमकिन! इस इंजेक्शन से लौटेगी बच्चों की सुनने की शक्ति


Can Gene Therapy Cure Congenital Deafness: जन्म से सुनने की समस्या झेल रहे लोगों के लिए दुनिया हमेशा से कुछ हद तक खामोश रही है. इस स्थिति को कंजेनिटल डेफनेस कहा जाता है, जो जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है और व्यक्ति के बातचीत, पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर डालती है. अक्सर इसके पीछे जेनेटिक कारण होते हैं, यानी कुछ खास जीन में बदलाव, जो पीढ़ियों के जरिए आगे बढ़ते हैं. अब तक ऐसे मामलों में हियरिंग एड या कॉक्लियर इम्प्लांट जैसे विकल्प ही उपलब्ध थे, जो मदद तो करते हैं, लेकिन पूरी तरह से प्राकृतिक सुनने की क्षमता वापस नहीं ला पाते. 

नई उम्मीद

इसी बीच स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टिट्यूट  से आई एक नई स्टडी ने उम्मीद की नई किरण जगाई है. यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है. इसमें बताया गया है कि जीन थेरेपी के जरिए एक खास तरह की जेनेटिक बहरापन को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है, वह भी बच्चों और युवाओं दोनों में. 

कहां हुई है खोज?

इस रिसर्च में साइंटिस्ट ने चीन के अस्पतालों और विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर 1 से 24 साल की उम्र के 10 मरीजों पर काम किया. इन सभी में सुनने की समस्या OTOF जीन में बदलाव के कारण थी. यह जीन ओटोफरलिन नाम के एक प्रोटीन को बनाने में अहम भूमिका निभाता है, जो कान से दिमाग तक ध्वनि संकेत पहुंचाने में मदद करता है. जब यह प्रोटीन ठीक से काम नहीं करता, तो कान आवाज को महसूस तो कर लेता है, लेकिन दिमाग तक सही तरीके से सिग्नल नहीं पहुंच पाता.

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ऐसे निकला समस्या का हल

इस समस्या के समाधान के लिए रिसर्चर ने जीन थेरेपी का इस्तेमाल किया. इसमें एक स्वस्थ जीन को शरीर में पहुंचाया जाता है. इसके लिए एक सुरक्षित वायरस एडेनो-असोसिएटेड वायरस का इस्तेमाल किया गया, जिसके जरिए काम करने वाला OTOF जीन सीधे कान के अंदर पहुंचाया गया. यह प्रक्रिया कॉक्लिया के निचले हिस्से में मौजूद राउंड विंडो नाम की जगह पर एक छोटे इंजेक्शन के जरिए की गई. नतीजे काफी उत्साहजनक रहे. कई मरीजों ने सिर्फ एक महीने के भीतर ही सुनने में सुधार महसूस करना शुरू कर दिया. छह महीने बाद सभी प्रतिभागियों में स्पष्ट रूप से फायदा देखा गया. वे पहले की तुलना में काफी धीमी आवाजें भी सुनने लगे, जो पहले उनके लिए असंभव था.

बच्चों में सुधार

खास बात यह रही कि बच्चों में सुधार सबसे ज्यादा देखा गया, खासकर 5 से 8 साल की उम्र के बीच. एक छोटी बच्ची ने तो इलाज के कुछ महीनों के भीतर लगभग सामान्य सुनने की क्षमता हासिल कर ली और अपनी मां से आसानी से बातचीत करने लगी. इससे यह भी संकेत मिलता है कि समय रहते इलाज शुरू किया जाए तो परिणाम और बेहतर हो सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! हफ्ते में एक दिन भी ज्यादा शराब पीना लिवर के लिए घातक, नई स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा

सावधान! हफ्ते में एक दिन भी ज्यादा शराब पीना लिवर के लिए घातक, नई स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा


Is Occasional Binge Drinking Dangerous: अक्सर लोग ऐसा ही सोचते हैं कि कभी-कभार ज्यादा शराब पी लेना कोई बड़ी बात नहीं है. खासकर तब, जब वे पूरे हफ्ते बहुत कम या बिल्कुल नहीं पीते. लेकिन अब एक नई स्टडी इस धारणा को चुनौती दे रही है और बता रही है कि ऐसी आदतें लिवर के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं. अमेरिका के केक मेडिसिन और निवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया के रिसर्चर के तरफ से की गई यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल क्लिनिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और हेपेटोलॉजी में पब्लिश हुई है. इसमें सामने आया है कि कभी-कभार भी ज्यादा मात्रा में शराब पीना लिवर डैमेज के खतरे को काफी बढ़ा सकता है.

क्या निकला रिसर्च में?  

यह रिसर्च खास तौर पर एक बीमारी मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) पर केंद्रित थी, जो आज दुनिया में तेजी से बढ़ती लिवर से जुड़ी समस्याओं में से एक है. इस बीमारी में लिवर में फैट जमा हो जाता है, जो आगे चलकर सूजन और स्कारिंग जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन सकता है. आमतौर पर यह समस्या मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे लोगों में ज्यादा देखी जाती है. 

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 शराब पीने पर कितना असर?

रिसर्चर ने सिर्फ यह नहीं देखा कि लोग कितनी शराब पीते हैं, बल्कि यह भी समझने की कोशिश की कि पीने का तरीका कितना असर डालता है. उन्होंने एपिसोडिक हेवी ड्रिंकिंग यानी एक ही दिन में ज्यादा शराब पीने की आदत पर फोकस किया. इसमें महिलाओं के लिए एक दिन में चार या उससे ज्यादा ड्रिंक और पुरुषों के लिए पांच या उससे ज्यादा ड्रिंक शामिल किए गए, वह भी महीने में कम से कम एक बार. यह भी सामने आया कि युवा और पुरुष इस तरह की ड्रिंकिंग के प्रति ज्यादा झुकाव रखते हैं. इसके साथ ही, एक बार में ज्यादा शराब पीने वालों में लिवर को होने वाला नुकसान भी ज्यादा गंभीर पाया गया. एक्सपर्ट का मानना है कि एक साथ ज्यादा शराब पीने से लिवर पर अचानक दबाव पड़ता है, जिससे सूजन और नुकसान का खतरा बढ़ जाता है. 

रिजल्ट चौंकाने वाले

2017 से 2023 के बीच 8,000 से ज्यादा एडल्ट के डेटा का एनालिसि करने पर चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. जिन लोगों को MASLD था और जो इस तरह की हेवी ड्रिंकिंग करते थे, उनमें एडवांस्ड लिवर फाइब्रोसिस का खतरा लगभग तीन गुना ज्यादा पाया गया. यह वह स्थिति है, जब लिवर में स्कार टिश्यू बन जाता है और उसकी काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है. स्टडी की एक अहम बात यह रही कि कुल शराब की मात्रा से ज्यादा मायने उसका सेवन करने का तरीका रखता है. यानी दो लोग अगर हफ्ते में बराबर मात्रा में शराब पीते हैं, तो जो व्यक्ति उसे एक ही दिन में खत्म करता है, उसके लिवर पर ज्यादा खतरा मंडराता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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टॉयलेट सीट पर बैठकर चलाते हैं फोन, डॉक्टर से जानें यह आदत आपको कैसे कर रही बीमार?

टॉयलेट सीट पर बैठकर चलाते हैं फोन, डॉक्टर से जानें यह आदत आपको कैसे कर रही बीमार?


Is It Bad To Use Phone On Toilet: हम में से ज्यादातर लोग ये आदत अपना चुके हैं कि टॉयलेट पर बैठते ही फोन निकाल लेना और फिर कब 10 से 15 मिनट निकल जाते हैं, पता ही नहीं चलता. यह आदत देखने में बिल्कुल सामान्य और हार्मलेस  लगती है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह आपकी पेल्विक हेल्थ को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रही है. चलिए आपको बताते हैं कि इससे क्या नुकसान होते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. प्रमोद कदम ने TOI को बताया कि  टॉयलेट का एक खास मकसद होता है और जितना ज्यादा समय आप वहां बिताते हैं, उतना ही शरीर पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है. जब आप टॉयलेट सीट पर बैठते हैं, तो आपके रेक्टम को वैसा सपोर्ट नहीं मिलता जैसा एक सामान्य कुर्सी पर मिलता है. ऐसे में ग्रैविटी के कारण खून नीचे की तरफ जमा होने लगता है और समय बढ़ने के साथ प्रेशर भी बढ़ता जाता है.

अगर आप 10 मिनट से ज्यादा बैठते हैं, तो यह दबाव आपके ब्लड वेसल्स पर असर डालने लगता है. इसका सबसे आम नतीजा होता है पाइल्स. यह दरअसल एनल कैनाल की सूजी हुई नसें होती हैं, जिनमें दर्द और ब्लीडिंग हो सकती है.

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बॉडी की नैचुरल सिस्टम भी प्रभावित

लेकिन समस्या सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती एक्सपर्ट बताते हैं कि फोन चलाते समय हमारी बॉडी की नैचुरल सिस्टम भी प्रभावित होती है. जब आप स्क्रीन में खो जाते हैं, तो शरीर के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. इससे मल ज्यादा देर तक कोलन में रहता है, सूख जाता है और बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. यही कारण है कि कब्ज, पाइल्स और एनल फिशर जैसी समस्याएं बढ़ती हैं.

क्या है बचने का तरीका?

डॉक्टर इसे स्ट्रेनिंग पैराडॉक्स भी कहते हैं. यानी आप जानबूझकर जोर नहीं लगा रहे होते, फिर भी लंबे समय तक बैठने से पेल्विक फ्लोर पर लगातार हल्का दबाव बना रहता है. इससे एनल कैनाल की नाजुक परत में दरार आ सकती है, जिसे फिशर कहा जाता है और यह काफी दर्दनाक होता है. इससे बचने का सबसे आसान तरीका है कि 5 मिनट का नियम. डॉ कदम के अनुसार, अगर 5 मिनट में काम पूरा नहीं होता, तो उठ जाना चाहिए और बाद में फिर कोशिश करनी चाहिए. टॉयलेट को लाइब्रेरी या ऑफिस की तरह इस्तेमाल करना सही नहीं है.

फोन को टॉयलेट से दूर रखा जाए

इस नियम को अपनाने के लिए सबसे जरूरी है कि फोन को टॉयलेट से दूर रखा जाए. बिना किसी डिस्ट्रैक्शन के आप अपने शरीर के संकेतों को बेहतर समझ पाएंगे और जरूरत से ज्यादा समय भी नहीं बिताएंगे. इसके अलावा, बैठने का तरीका भी मायने रखता है. पैरों के नीचे छोटा स्टूल रखने से शरीर का एंगल सही हो जाता है, जिससे प्रक्रिया आसान और जल्दी पूरी होती है. डॉक्टर्स यह भी सलाह देते हैं कि शरीर के संकेतों को कभी नजरअंदाज न करें, पर्याप्त पानी पिएं और फाइबर युक्त खाना खाएं. ये छोटी-छोटी आदतें मिलकर बड़ी समस्याओं से बचाती हैं. टॉयलेट पर फोन चलाना भले ही मामूली लगे, लेकिन इसका असर धीरे-धीरे शरीर पर पड़ता है. इसलिए अगली बार जब आप टॉयलेट जाएं, तो फोन बाहर ही छोड़ दें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर के इन छोटे संकेतों को न करें इग्नोर, वरना डैमेज हो सकते हैं लिवर और किडनी

शरीर के इन छोटे संकेतों को न करें इग्नोर, वरना डैमेज हो सकते हैं लिवर और किडनी


Early Signs Your Body Is In Trouble: हमारा शरीर कभी अचानक से बीमार नहीं पड़ता, बल्कि वह पहले छोटे-छोटे संकेत देता है. थकान, दिमाग का भारी लगना, त्वचा में बदलाव या हल्की-फुल्की असहजता, ये सब यूं ही नहीं होते. ये संकेत बताते हैं कि शरीर के अंदर कहीं न कहीं दबाव बन रहा है. समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इन संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं और तब ध्यान देते हैं जब दर्द शुरू हो जाता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. भानु मिश्रा ने TOI को बताया कि “ज्यादातर अंगों को होने वाला नुकसान बिना किसी स्पष्ट लक्षण के ही होता है. लोग इन संकेतों को इसलिए नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि ये साफ नजर नहीं आते.” यही सबसे बड़ा खतरा है कि जब तक लक्षण गंभीर बनते हैं, तब तक नुकसान गहरा हो चुका होता है. 

थकान सबसे आम समस्या

थकान एक आम समस्या है, लेकिन अगर सही नींद लेने के बाद भी थकावट बनी रहती है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह सिर्फ व्यस्त दिनचर्या की वजह से नहीं होता, बल्कि यह लिवर या किडनी पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है.  डॉ. भानु  के अनुसार, “क्रॉनिक थकान का मतलब सिर्फ नींद की कमी नहीं, बल्कि लिवर या किडनी में समस्या भी हो सकती है.” ऐसी थकान धीरे-धीरे आपकी सोच और ऊर्जा दोनों को प्रभावित करती है. 

ब्रेन के इन सिग्नल को न करें नजरअंदाज

दिमाग भी अपने तरीके से संकेत देता है। बार-बार सिरदर्द होना, ध्यान लगाने में दिक्कत या दिमाग का धुंधला लगना अक्सर लोग तनाव या स्क्रीन टाइम का असर मान लेते हैं. लेकिन  एक्सपर्ट बताते हैं कि यह डिहाइड्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर या शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ने का संकेत हो सकता है. याददाश्त में कमी या फोकस में गिरावट दिमाग पर पड़ रहे दबाव का संकेत है.

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इन संकेतों को भी न करें नजरअंदाज

शरीर के कुछ और संकेत भी बहुत कुछ बताते हैं. जैसे पेशाब का रंग बदलना, पैरों में सूजन या आंखों के आसपास फुलाव, ये सब किडनी स्ट्रेस की ओर इशारा कर सकते हैं. इसी तरह बार-बार पेट फूलना, भूख कम लगना या खाने के बाद असहजता महसूस होना लिवर या पैंक्रियाज की परेशानी का संकेत हो सकता है. त्वचा, बाल और नाखून भी शरीर के अंदर की स्थिति को दिखाते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, त्वचा का फीका पड़ना, खुजली या हल्का पीलापन इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर के अंदर कुछ ठीक नहीं है. इसके अलावा बालों का पतला होना या नाखूनों का कमजोर होना भी पोषण की कमी या आंतरिक असंतुलन दर्शाता है. कई बार हल्की-फुल्की समस्याएं जैसे पीठ में जकड़न, पैरों में सुन्नता या खड़े होने पर चक्कर आना भी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं.

इससे बचने के लिए क्या कर सकते हैं?

इन सभी संकेतों से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कि रोजमर्रा की अच्छी आदतें अपनाना. पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना, प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा नमक-चीनी से दूरी बनाना, नियमित व्यायाम और पूरी नींद, ये सब शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. इसके साथ ही, बिना लक्षण के भी समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना जरूरी है. यही नहीं, एक अहम स्टडी जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में पब्लिश हुई है, बताती है कि आजकल लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां चुपचाप बढ़ रही हैं और अक्सर इनका पता तब चलता है जब लोग रूटीन चेकअप करवाते हैं. यानी शरीर पहले संकेत देता है, लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पाते. इसलिए समय से चेकअप करवाना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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