सोते वक्त हाथ सुन्न हो जाए तो इसे फटाफट कैसे करें ठीक? अधिकतर लोग करते हैं ये मिस्टेक्स

सोते वक्त हाथ सुन्न हो जाए तो इसे फटाफट कैसे करें ठीक? अधिकतर लोग करते हैं ये मिस्टेक्स


Why Do Hands Go Numb While Sleeping: क्या कभी ऐसा हुआ है कि रात में नींद खुली और महसूस हुआ कि हाथ पूरी तरह सुन्न पड़ गया है, जैसे उसमें जान ही नहीं है? कई लोगों के साथ ऐसा होता है और यह कोई बहुत रेयर समस्या नहीं है. रिसर्च के अनुसार लगभग एक-तिहाई एडल्ट को हफ्ते में कम से कम एक बार सोते समय हाथ, कलाई या बाजू में सुन्नपन और झनझनाहट महसूस होती है. इस स्थिति को मेडिकल भाषा में नॉक्टर्नल पैरास्थीसिया कहा जाता है. ज्यादातर मामलों में यह गंभीर समस्या नहीं होती, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे या उठने के बाद भी लंबे समय तक बना रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है.

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था sleepfoundation के अनुसार, सोते समय हाथ सुन्न होने का सबसे आम कारण नसों पर दबाव पड़ना होता है. जब किसी वजह से नस दब जाती है या ब्लड फ्लो थोड़ी देर के लिए कम हो जाता है, तो हाथ में झनझनाहट या पिन्स एंड नीडल्स जैसा एहसास होने लगता है. यह शरीर का एक तरह का संकेत होता है कि किसी हिस्से पर दबाव पड़ रहा है और उसे सही स्थिति में लाने की जरूरत है.

गलत पोजीशन भी जिम्मेदार

कई बार सोने की गलत पोजीशन भी इसकी वजह बन जाती है. अगर आप कलाई को मोड़कर सोते हैं, हाथ को सिर के नीचे रख लेते हैं, बाजू पर सिर टिकाकर सोते हैं या शरीर का वजन हाथ पर आ जाता है, तो नसों पर दबाव पड़ सकता है. कुछ लोगों में तकिए की गलत ऊंचाई या गर्दन और रीढ़ की गलत स्थिति भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. ऐसे में हाथ तक जाने वाला ब्लड फ्लो कुछ समय के लिए कम हो जाता है और हाथ सुन्न महसूस होने लगता है.

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इनके कारण भी होती है दिक्कत

कभी-कभी हाथों का सुन्न होना नसों से जुड़ी दूसरी समस्याओं का संकेत भी हो सकता है. उदाहरण के लिए पेरिफेरल न्यूरोपैथी में नसें ठीक से काम नहीं कर पातीं, जिससे हाथ-पैरों में सुन्नपन या जलन महसूस हो सकती है. इसके पीछे डायबिटीज, विटामिन की कमी, इंफेक्शन, कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट या अत्यधिक शराब का सेवन भी जिम्मेदार हो सकता है.

कैसे करें बचाव?

अगर नींद खुलने पर हाथ सुन्न महसूस हो, तो घबराने की जरूरत नहीं होती. आमतौर पर शरीर की पोजीशन बदलने, हाथ-पैरों को हल्का हिलाने-डुलाने या उंगलियों को धीरे-धीरे स्ट्रेच करने से कुछ ही मिनट में यह समस्या ठीक हो जाती है. हल्की मालिश करने या हाथों को गुनगुने पानी के नीचे रखने से भी ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और झनझनाहट कम हो जाती है. हालांकि अगर यह समस्या बार-बार हो रही हो या दर्द और कमजोरी भी महसूस हो, तो डॉक्टर से जांच करवाना बेहतर होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिर्फ एक कॉमन वायरस की वजह से होता है पेट का कैंसर, जानें इससे बचने के तरीके

सिर्फ एक कॉमन वायरस की वजह से होता है पेट का कैंसर, जानें इससे बचने के तरीके


How H Pylori Causes Stomach Cancer: पेट में रहने वाला एक सामान्य बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पाइलोरी दुनिया भर में होने वाले पेट के कैंसर के बड़े कारणों में से एक माना जाता है. नेचर मेडिसिन में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार, गैस्ट्रिक कैंसर के करीब 76 प्रतिशत मामलों का संबंध इसी बैक्टीरिया से हो सकता है. रिसर्चर का अनुमान है कि 2008 से 2017 के बीच जन्मे लोगों में लगभग 1.6 करोड़ लोगों को जीवन में कभी न कभी पेट का कैंसर हो सकता है, जिनमें से करीब 1.2 करोड़ मामले सीधे तौर पर हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन से जुड़े हो सकते हैं. यह बैक्टीरिया पेट की अंदरूनी परत में रहता है और अक्सर लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के मौजूद रह सकता है. हालांकि कई लोगों को इसका पता ही नहीं चलता, लेकिन कुछ मामलों में यह पेट के अल्सर और गंभीर स्थिति में गैस्ट्रिक कैंसर का कारण बन सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट के अनुसार एशिया में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी से जुड़े पेट के कैंसर के सबसे ज्यादा मामले सामने आ सकते हैं, जहां करीब 80 लाख मामलों का अनुमान लगाया गया है, जबकि उत्तर और दक्षिण अमेरिका में मिलाकर करीब 15 लाख मामलों की संभावना जताई गई है. यही वजह है कि डॉक्टर इस इंफेक्शन को पहचानना बेहद जरूरी मानते हैं, क्योंकि यह कैंसर का ऐसा जोखिम कारक है जिसे समय रहते रोका जा सकता है.

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किन लोगों में रहता है इसका खतरा ज्यादा?

कुछ लोगों में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन का खतरा ज्यादा होता है. खासकर पूर्वी एशिया, पूर्वी यूरोप और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में इसका जोखिम अधिक देखा गया है. इन इलाकों से आने वाले प्रवासी भी बचपन में हुए इंफेक्शन की वजह से प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा जिन लोगों के परिवार में पेट के कैंसर का इतिहास रहा हो, धूम्रपान करने वाले, मोटापे से ग्रस्त लोग, अधिक नमक या प्रोसेस्ड फूड खाने वाले और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी ज्यादा जोखिम में माने जाते हैं.

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

हेलिकोबैक्टर पाइलोरी इंफेक्शन कई बार वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकता है, लेकिन लगभग 30 प्रतिशत लोगों में इससे जुड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं. इसके संकेतों में पेट में जलन या दर्द, थोड़ी मात्रा में खाने पर ही पेट भरा महसूस होना, मतली, बार-बार डकार आना, अपच, पेट फूलना या बिना कारण वजन कम होना शामिल हैं. अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है. पेट के कैंसर के खतरे को कम करने के लिए कुछ लाइफस्टाइल से जुड़े कदम भी मददगार हो सकते हैं. संतुलित आहार लेना, जिसमें फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल हों, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी करना, स्मोकिंग से दूरी रखना और शराब का सेवन सीमित करना महत्वपूर्ण माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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डायबिटीज सिर्फ शुगर लेवल नहीं, पैरों से भी देती है दस्तक; इन 7 लक्षणों को न करें नजरअंदाज

डायबिटीज सिर्फ शुगर लेवल नहीं, पैरों से भी देती है दस्तक; इन 7 लक्षणों को न करें नजरअंदाज


 

Early Diabetes Signs In Legs: डायबिटीज की बात आते ही लोगों के मन में सबसे पहले हाई ब्लड शुगर, बार-बार प्यास लगना या बार-बार यूरिन आने जैसे लक्षण आते हैं. लेकिन अक्सर यह नजरअंदाज हो जाता है कि यह बीमारी धीरे-धीरे पैरों में भी अपने संकेत देने लगती है. दरअसल हमारे पैर शरीर का पूरा वजन उठाते हैं और उनकी सेहत काफी हद तक सही ब्लड फ्लो और नसों के सही काम करने पर निर्भर करती है. TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार डायबिटीज इन दोनों चीजों को प्रभावित कर सकती है, इसलिए कई बार इसके शुरुआती संकेत पैरों में दिखाई देने लगते हैं.

 पैरों में झनझनाहट या सुई चुभन

कई लोगों को पैरों में झनझनाहट या सुई चुभने जैसा एहसास होता है. आम तौर पर लोग इसे लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने का परिणाम मान लेते हैं. लेकिन अगर यह एहसास बार-बार हो या लंबे समय तक बना रहे, तो यह नसों को होने वाले नुकसान का संकेत हो सकता है. इसे पेरिफेरल न्यूरोपैथी कहा जाता है, जो डायबिटीज से जुड़ी एक आम समस्या है. यह झनझनाहट खासकर रात के समय ज्यादा महसूस हो सकती है.

पिंडलियों में जलन का अनुभव

कुछ लोगों को पिंडलियों में जलन जैसा अनुभव भी होता है. कई बार इसे ज्यादा चलने-फिरने या थकान से जोड़ दिया जाता है, लेकिन डायबिटीज में यह नसों के ठीक से काम न करने का संकेत हो सकता है. कई मरीज बताते हैं कि रात के समय पैरों में तेज जलन महसूस होती है, जैसे किसी तरह की गर्मी या आग जैसी अनुभूति हो रही हो.

पैरों पर बाल का कम होना

पैरों पर अचानक बाल कम होना भी एक संकेत हो सकता है. आमतौर पर लोग इसे उम्र बढ़ने या त्वचा की सामान्य समस्या मान लेते हैं, लेकिन डायबिटीज में खराब ब्लड फ्लो के कारण बालों की जड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं पहुंच पाता. इससे पैरों पर बाल धीरे-धीरे कम होने लगते हैं या जगह-जगह से गायब हो सकते हैं.

त्वचा का रंग बदलना

कुछ मामलों में टखनों या पिंडलियों के आसपास त्वचा का रंग भी बदलने लगता है. यह काले या गहरे धब्बों के रूप में दिखाई दे सकता है. कई बार लोग इसे धूप या गंदगी समझ लेते हैं, लेकिन यह डायबिटिक डर्मोपैथी का संकेत भी हो सकता है. हाई ब्लड शुगर छोटे ब्लड वेसल्स को प्रभावित करती है, जिससे त्वचा में ऐसे बदलाव दिखाई देने लगते हैं.

पैरों में अचानक ऐंठन

रात के समय पैरों में अचानक ऐंठन होना भी डायबिटीज से जुड़ा हो सकता है. आमतौर पर लोग इसे पानी की कमी या शरीर में मिनरल की कमी से जोड़ते हैं, लेकिन कई बार यह खराब ब्लड फ्लो या नसों की समस्या के कारण भी हो सकता है. जब मांसपेशियों तक पर्याप्त ब्लड नहीं पहुंचता, तो दर्द भरी ऐंठन होने लगती है.

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 पैरों की त्वचा असामान्य रूप से चमकदार 

कुछ लोगों के पैरों की त्वचा असामान्य रूप से चमकदार और कसी हुई दिखाई देने लगती है. यह स्थिति शरीर में तरल पदार्थ जमा होने यानी सूजन के कारण हो सकती है, जो ब्लड फ्लो से जुड़ी समस्याओं का संकेत देती है. इसके अलावा पैरों पर छोटी-मोटी खरोंच या घाव का देर से भरना भी डायबिटीज का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है, क्योंकि हाई ब्लड शुगर शरीर की इम्यून  क्षमता को प्रभावित करती है.

 पैरों के तापमान में बदलाव

कई बार पैरों के तापमान में भी बदलाव महसूस होता है. कुछ लोगों को पैर असामान्य रूप से ठंडे लगते हैं, जबकि कुछ को उनमें ज्यादा गर्माहट महसूस होती है. यह स्थिति नसों और ब्लड वेसल्स के प्रभावित होने का संकेत हो सकती है. इसलिए अगर पैरों में ऐसे बदलाव लगातार दिखाई दें, तो समय रहते डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आपकी सेहत के लिए कितना खतरनाक है नेल एक्सटेंशन? जानें लंबे नाखूनों के नुकसान

आपकी सेहत के लिए कितना खतरनाक है नेल एक्सटेंशन? जानें लंबे नाखूनों के नुकसान


Can Acrylic Nails Cause Skin Damage: आजकल नेल एक्सटेंशन और एक्रिलिक नेल्स का ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ रहा है. लंबे, चमकदार और स्टाइलिश नाखून कई लोगों को बेहद सुंदर लगते हैं. लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि इनका बार-बार इस्तेमाल त्वचा और नाखूनों के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है. खासकर इन्हें लगाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली यूवी लाइट और कुछ केमिकल हेल्थ  से जुड़ी चिंताओं को बढ़ा सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

 ऑन्कोलॉजी सर्जन डॉ. जय आर अनाम ने HT के साथ इंटरव्यू के दौरान बताया कि एक्रिलिक नेल्स भले ही सुंदर और लंबे समय तक टिकने वाले लगते हों, लेकिन इनके इस्तेमाल से जुड़े कुछ छिपे हुए जोखिम भी होते हैं. उनका कहना है कि समस्या सीधे एक्रिलिक नेल्स से नहीं, बल्कि उन्हें लगाने की प्रक्रिया से जुड़ी होती है. इस प्रक्रिया में एक खास पाउडर और लिक्विड पदार्थ को मिलाकर नाखूनों पर लगाया जाता है, जिसे बाद में यूवी लैंप के नीचे सख्त किया जाता है. यही यूवी लाइट चिंता का कारण बन सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक यूवीए किरणें त्वचा की सेल्स के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकती हैं. समय के साथ यह नुकसान बढ़ता जाता है और लंबे समय तक बार-बार एक्सपोजर होने पर त्वचा से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि कभी-कभार नेल एक्सटेंशन करवाना ज्यादा खतरनाक नहीं माना जाता, लेकिन यदि कोई व्यक्ति लगातार लंबे समय तक यह प्रक्रिया करवाता है तो जोखिम धीरे-धीरे बढ़ सकता है.

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स्किन पर भी प्रभाव

कुछ रिसर्च में यह भी बताया गया है कि यूवी लैंप के नीचे सैकड़ों बार हाथ रखने से त्वचा पर निगेटिव प्रभाव पड़ सकता है. इसके अलावा कई एक्रिलिक उत्पादों में फॉर्मल्डिहाइड और टोल्यून जैसे केमिकल भी पाए जाते हैं, जो त्वचा में जलन या एलर्जी पैदा कर सकते हैं. जब ये रसायन और यूवी किरणें एक साथ प्रभाव डालते हैं तो त्वचा पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.

हालांकि एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि थोड़ी सावधानी बरतकर जोखिम को कम किया जा सकता है. नेल एक्सटेंशन करवाने से पहले उंगलियों पर सनस्क्रीन लगाना एक अच्छा उपाय माना जाता है. इसके अलावा पारंपरिक यूवी लैंप की जगह एलईडी लैंप का इस्तेमाल अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि इसमें अल्ट्रावायलेट किरणें कम होती हैं.

किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?

डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि नेल एक्सटेंशन को रोजमर्रा की आदत बनाने के बजाय खास मौकों तक ही सीमित रखना बेहतर है. इसके साथ ही हमेशा विश्वसनीय सैलून में ही यह प्रक्रिया करवानी चाहिए. एक और आम गलती जो लोग करते हैं, वह है घर पर ही एक्रिलिक नेल्स हटाने की कोशिश करना. इससे त्वचा और नाखूनों को नुकसान हो सकता है, इसलिए इन्हें हटाने के लिए एक्सपर्ट की मदद लेना ही सुरक्षित तरीका माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आंखों में दिखें ये लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना लिवर में हो जाएगा कैंसर

आंखों में दिखें ये लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना लिवर में हो जाएगा कैंसर


Eye Symptoms Of Liver Disease: लिवर हमारे शरीर का एक बेहद अहम अंग है, जो शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने, पाचन में मदद करने और पोषक तत्वों को प्रोसेस करने का काम करता है. जब किसी कारण से लिवर ठीक तरह से काम करना बंद कर देता है, तो इस स्थिति को लिवर फेलियर कहा जाता है. यह एक गंभीर और जानलेवा समस्या हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि आंखों में लिवर कैंसर के कौन से लक्षण दिखाई देते हैं. 

क्यों होती है दिक्कत?

लिवर फेलियर अक्सर किसी दूसरी बीमारी के कारण होता है. लंबे समय तक शराब का सेवन, हेपेटाइटिस बी या सी इंफेक्शन, फैटी लिवर, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज जैसी स्थितियां लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं. अगर यह नुकसान लंबे समय तक बना रहे तो लिवर में स्थायी दाग पड़ जाते हैं, जिसे सिरोसिस कहा जाता है. यही स्थिति आगे चलकर लिवर फेलियर में बदल सकती है और कई मामलों में मरीज को लिवर ट्रांसप्लांट तक की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि शुरुआती चरण में इलाज और लाइफस्टाइल में बदलाव से लिवर को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

आंखों में दिखती है समस्या

आंखों के बारे में जानकारी देने वाली allaboutvision के अनुसार, शुरुआत में लिवर की समस्या के लक्षण बहुत साफ दिखाई नहीं देते. कई लोगों को लंबे समय तक कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती. लेकिन जब बीमारी बढ़ने लगती है तो कुछ सामान्य संकेत दिख सकते हैं, जैसे लगातार थकान महसूस होना, मांसपेशियों में कमजोरी या ऐंठन, भूख कम लगना, त्वचा में खुजली, पेट दर्द, मतली या उल्टी जैसी समस्याएं.

जब लिवर की बीमारी ज्यादा गंभीर हो जाती है, तब इसका असर आंखों पर भी दिखाई देने लगता है. सबसे आम लक्षण आंखों का पीला पड़ना है, जिसे पीलिया कहा जाता है. यह तब होता है जब शरीर में बिलीरुबिन नाम का पीला पिगमेंट ज्यादा मात्रा में जमा हो जाता है. सामान्य स्थिति में लिवर पुराने रक्त कोशिकाओं से बनने वाले इस पिगमेंट को शरीर से बाहर निकाल देता है, लेकिन लिवर खराब होने पर यह प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है.

कुछ मामलों में लिवर से जुड़ी समस्याएं आंखों में सूखापन भी पैदा कर सकती हैं. इसके अलावा लंबे समय तक लिवर की बीमारी रहने पर शरीर में विटामिन ए की कमी हो सकती है, जिससे रात में देखने में दिक्कत, आंखों में सूखापन या कॉर्निया से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं. कुछ लोगों की पलकों के आसपास पीले रंग की छोटी गांठें भी दिखाई दे सकती हैं, जिन्हें जैंथेलाज़्मा कहा जाता है.

आंखों में कब दिखते हैं कैंसर के लक्षण?

vinmec की रिपोर्ट के अनुसार, पीलिया लिवर कैंसर के आखिरी चरण में दिखने वाला एक अहम लक्षण हो सकता है. जब लिवर में ट्यूमर बढ़ने लगते हैं, तो वे बाइल डक्ट पर दबाव डालते हैं, जिससे बिलीरुबिन बढ़ जाता है. इसके कारण आंखें और त्वचा पीली पड़ सकती हैं, इसके साथ ही गहरा यूरिन और खुजली जैसी परेशानी भी हो सकती है.

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क्या परमाणु हमले से होने वाले रेडिएशन से बचा सकती है कोई दवा, जानें यह कितनी कारगर?

क्या परमाणु हमले से होने वाले रेडिएशन से बचा सकती है कोई दवा, जानें यह कितनी कारगर?


Can Medicine Protect From Nuclear Radiation: ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद पर्शियन गल्फ के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. इस बीच अटकलें लगने लगी हैं कि अगर हालात ऐसे ही बिगड़ते रहे तो वर्ल्ड वॉर 3 भी छिड़ सकता है, जिसके बाद लोगों के मन में परमाणु हमलों का डर बढ़ रहा है. इसके चलते दुनिया के कई देशों में पोटेशियम आयोडाइड की डिमांड काफी तेजी से बढ़ गई है. माना जाता है कि यह परमाणु हमले के बाद होने वाले रेडिएशन से बचा सकती है. आइए जानते हैं कि क्या वाकई ऐसी दवा है? अगर कोई दवा है तो वह कितनी असरदार है?

परमाणु हमले से क्या होता है?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार, परमाणु दुर्घटना या हमले की स्थिति में वातावरण में रेडियोएक्टिव आयोडीन फैल सकता है. यह हवा के साथ फैलकर मिट्टी, पानी, भोजन और आसपास की चीजों को भी दूषित कर सकता है. कई बार यह त्वचा और कपड़ों पर भी जम सकता है, जिससे शरीर को बाहरी रेडिएशन का खतरा होता है. अगर ऐसा पदार्थ त्वचा पर लग जाए तो उसे गर्म पानी और साबुन से धोकर काफी हद तक हटाया जा सकता है.

लेकिन असली खतरा तब होता है जब यह रेडियोएक्टिव आयोडीन सांस के जरिए शरीर के अंदर चला जाए या दूषित भोजन और पानी के माध्यम से शरीर में पहुंच जाए. शरीर के अंदर जाने के बाद यह थायरॉयड ग्रंथि में जमा होने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानव शरीर आयोडीन को स्वाभाविक रूप से थायरॉयड में ही इकट्ठा करता है, चाहे वह सामान्य आयोडीन हो या रेडियोएक्टिव आयोडीन.

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कौन सी दवा काम आ सकती है?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने रेडियोलॉजिकल और परमाणु आपात स्थितियों के लिए जरूरी दवाओं की एक सूची तैयार की है, जिनमें पोटैशियम आयोडाइड का नाम भी शामिल है. ईरान पर हमलों और खाड़ी देशों पर पलटवार के बाद पोटैशियम आयोडाइड की डिमांड काफी ज्यादा बढ़ गई है और लोग लगातार इसका स्टॉक कर रहे हैं. दरअसल, इन दवाओं का मकसद रेडिएशन के असर को रोकना, कम करना या रेडिएशन से हुई क्षति का इलाज करना होता है. उदाहरण के तौर पर आयोडीन की गोलियां थायरॉयड ग्लैंड को रेडियोएक्टिव आयोडीन को यूज करने से इसको रोकने में मदद कर सकती हैं. इसी तरह कुछ खास दवाएं शरीर से रेडियोएक्टिव तत्वों को बाहर निकालने में मदद करती हैं.

इसके अलावा कुछ दवाएं ऐसी भी होती हैं जो तीव्र रेडिएशन सिंड्रोम की स्थिति में बोन मैरो को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद कर सकती हैं. वहीं उल्टी, दस्त और इंफेक्शन जैसे लक्षणों को कंट्रोल करने के लिए भी अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. एक्सपर्ट के अनुसार परमाणु या रेडिएशन आपात स्थिति में दवाएं कुछ हद तक सुरक्षा दे सकती हैं, लेकिन यह पूरी तरह से बचाव का उपाय नहीं होतीं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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