भारत में तेजी से पांव पसार रहे हैं ये 5 कैंसर, ऑन्कोलॉजिस्ट से जानें कैसे खराब लाइफस्टाइल बढ़ा

भारत में तेजी से पांव पसार रहे हैं ये 5 कैंसर, ऑन्कोलॉजिस्ट से जानें कैसे खराब लाइफस्टाइल बढ़ा


Which Cancer Is Most Common in India: कैंसर दुनिया की सबसे गंभीर बीमारियों में से एक माना जाता है. कैंसर रिसर्च यूके के मुताबिक, कैंसर के 200 से ज्यादा प्रकार हैं, जिन्हें उस सेल्स के आधार पर पांच मुख्य कैटेगरी में बांटा जाता है, जहां से वे शुरू होते हैं. कार्सिनोमा स्किन या अंदरूनी अंगों की परत से शुरू होता है. सारकोमा हड्डी, मांसपेशी, वसा या ब्लड वेसल्स जैसे सहायक टिश्यू से जुड़ा होता है. ल्यूकेमिया ब्लड बनाने वाले टिश्यू, खासकर बोन मैरो, में शुरू होकर व्हाइट ब्लड सेल्स को प्रभावित करता है. लिम्फोमा और मायलोमा इम्यून सिस्टम की सेल्स से जुड़े होते हैं. वहीं ब्रेन और रीढ़ की हड्डी से संबंधित कैंसर को सेंट्रल नर्वस सिस्टम का कैंसर कहा जाता है.

भारत में इस समय कौन से कैंसर सबसे ज्यादा

इन कैटेगरी के भीतर कई विशेष प्रकार कैंसर भी शामिल हैं. 9 फरवरी को एमएचबी बाइट्स पॉडकास्ट में रायपुर के वरिष्ठ सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. जयेश शर्मा ने बताया कि इस समय भारत में कौन-कौन से कैंसर सबसे अधिक देखे जा रहे हैं. 25 वर्षों के अनुभव वाले डॉ. शर्मा ने कहा कि कुछ साल पहले महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर सबसे आम था और ब्रेस्ट कैंसर दूसरे स्थान पर था. लेकिन अब ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों में भी सबसे अधिक पाया जा रहा है. इस बदलाव के पीछे बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ती उम्र और ब्रेस्टफीडिंग में कमी जैसे कारण माने जा रहे हैं.

इन कैंसर का भी खतरा

वर्तमान में माउथ कैंसर दूसरे स्थान पर है, जो मुख्य रूप से तंबाकू चबाने की आदत से जुड़ा है. तीसरे और चौथे स्थान के लिए सर्वाइकल और लंग्स का कैंसर करीब-करीब बराबरी पर हैं, जबकि कोलन कैंसर पांचवें स्थान पर है. ब्रेस्ट कैंसर का खतरा उम्र बढ़ने, मोटापा, मेनोपॉज, शारीरिक निष्क्रियता, शराब के सेवन और पारिवारिक हिस्ट्री से बढ़ता है. समय रहते जांच, स्वयं परीक्षण और मैमोग्राफी जीवन बचा सकते हैं. सर्वाइकल कैंसर ज्यादातर एचपीवी इंफेक्शन से जुड़ा होता है और टीकाकरण तथा नियमित जांच से इसे काफी हद तक रोका जा सकता है.

 

माउथ का कैंसर धूम्रपान और गुटखा-पान जैसी तंबाकू आदतों से गहराई से जुड़ा है. भारत में इसकी बड़ी वजह चबाने वाले तंबाकू का प्रचलन है. लंग्स का कैंसर मुख्य रूप से धूम्रपान से होता है. वहीं शहरी भारत में कोलन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं, जिसका संबंध कम फाइबर वाले भोजन, अधिक प्रोसेस्ड मीट, मोटापा, फिजिकल एक्टिविटी न होना और मेटाबॉलिक समस्याओं से जोड़ा जाता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ. शर्मा का कहना है कि कैंसर पूरी तरह अचानक होने वाली बीमारी नहीं है. इसमें जैनेटिक कारणों के साथ लाइफस्टाइल और पर्यावरण की भूमिका भी अहम होती है. तंबाकू का सेवन, मोटापा, शराब, कम शारीरिक गतिविधि, असंतुलित आहार और लंबे समय तक सूजन जैसी स्थितियां जोखिम बढ़ाती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आयरन, पोटैशियम से लेकर आयोडीन तक… शरीर में हो जाए इन जरूरी मिनरल्स की कमी तो दिखते हैं ये संक

आयरन, पोटैशियम से लेकर आयोडीन तक… शरीर में हो जाए इन जरूरी मिनरल्स की कमी तो दिखते हैं ये संक


How to Identify Mineral Deficiency Symptoms: ज्यादातर लोग जानते हैं कि शरीर में विटामिन की कमी हो सकती है, लेकिन कई बार जरूरी मिनरल्स की कमी भी बड़ी समस्या बन जाती है. ये माइक्रो और मैक्रो मिनरल शरीर के सही कामकाज के लिए बेहद जरूरी होते हैं. कई मामलों में एक साधारण ब्लड टेस्ट से पता चल सकता है कि किस तत्व की कमी है, लेकिन कुछ संकेत ऐसे भी होते हैं जो पहले ही शरीर में बदलाव का इशारा दे देते हैं. सही समय पर खानपान में बदलाव करके इन कमियों को दूर किया जा सकता है. StarsInsider की रिपोर्ट के अनुसार, शरीर में कुछ ऐसे लक्षण दिखते हैं, जिनसे हम इनकी कमी को पहचान सकते हैं. 

क्रोमियम
क्रोमियम की कमी होने पर शरीर में शुगर को संभालने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और वजन कम होने लगता है. इसे बढ़ाने के लिए मशरूम, हरी पत्तेदार सब्जियां, सोयाबीन, सूरजमुखी के बीज, चना, काजू और गुड़ जैसे खाद्य पदार्थ फायदेमंद होते हैं.

मैंगनीज
मैंगनीज की कमी रेयर है, लेकिन होने पर हड्डियों के विकास में रुकावट, प्रजनन क्षमता में कमी और ग्लूकोज सहनशीलता में गड़बड़ी हो सकती है. इसके लिए हरी सब्जियां, जामुन, ओट्स, ब्राउन राइस, अनानास और चना आहार में शामिल किए जा सकते हैं.

फ्लोराइड
फ्लोराइड की कमी दांतों को कमजोर बना सकती है और कैविटी का खतरा बढ़ जाता है.

सोडियम क्लोराइड
सोडियम क्लोराइड यानी नमक की कमी अक्सर खाने से नहीं, बल्कि शरीर में तरल असंतुलन के कारण होती है. ऐसे में पानी और नमक के संतुलन पर ध्यान देना जरूरी है.

पोटैशियम 
पोटैशियम की कमी आमतौर पर उल्टी, दस्त या ज्यादा पेशाब के कारण होती है. इसे पूरा करने के लिए शकरकंद, टमाटर, गाजर, पालक, केला, खरबूजा, आलू, खजूर, किशमिश और मछली जैसे खाद्य पदार्थ मददगार हैं.

आयोडीन
आयोडीन की कमी से शरीर का विकास और दिमागी कार्य प्रभावित हो सकते हैं. गले के सामने सूजन इसका सामान्य लक्षण है. इससे बचने के लिए आयोडीन युक्त नमक, समुद्री शैवाल, अंडे और हरी सब्जियां खाना जरूरी है.

मैग्नीशियम
मैग्नीशियम कई खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, फिर भी कमी संभव है. इसके लिए दालें, मेवे, बीज, साबुत अनाज, फल और एवोकाडो फायदेमंद हैं.

जिंक 
जिंक की कमी से रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है. सीप, मांस, बीन्स और मेवे इसके अच्छे सोर्स हैं.

आयरन
आयरन रेड ब्लड सेल्स के लिए जरूरी है. इसकी कमी से एनीमिया हो सकता है. बादाम, सूखे मेवे, राजमा, पालक, ब्रोकली, कद्दू के बीज और मांस जैसे खाद्य पदार्थ आयरन से भरपूर होते हैं.

सेलेनियम
सेलेनियम की कमी कम देखने को मिलती है, लेकिन होने पर थकान, मांसपेशियों की कमजोरी और प्रतिरोधक क्षमता में कमी हो सकती है. ब्राजील नट्स, मशरूम, साबुत अनाज, सैल्मन और अंडे इसके अच्छे सोर्स हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कौन-सी बीमारी कहलाती है दुनिया की सबसे दर्दनाक बीमारी, कैसे नजर आते हैं इसके लक्षण?

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Which Is the Most Painful Disease in the World: दर्द एक ऐसा एहसास है जो हमें संकेत देता है कि शरीर में कुछ ठीक नहीं है. सामान्य तौर पर लोगों को समय-समय पर दर्द होता है, लेकिन लगातार बना रहने वाला दर्द अलग होता है. जब दर्द छह महीने या उससे ज्यादा समय तक बना रहे, तो उसे क्रॉनिक यानी दीर्घकालिक दर्द कहा जाता है. यह दर्द हमारे नर्वस सिस्टम का संकेत होता है. यह हल्का, चुभने वाला, सुन्न करने वाला या तेज हो सकता है. कभी यह शरीर के किसी एक हिस्से तक सीमित रहता है, तो कभी पूरे शरीर में महसूस होता है. इसमें नसों, रीढ़ की हड्डी और ब्रेन के बीच मुश्किल कोऑर्डिनेशन काम करता है. 

दर्द दो तरह का माना जाता है एक्यूट ये थोड़े समय के लिए होते हैं और क्रॉनिक जिसका प्रभाव लंबे समय तक देखने को मिलता है. कम समय तक रहने वाले दर्द आमतौर पर चोट, कट, घाव या मोच जैसी समस्या से जुड़ा होता है और तीन से छह महीने के भीतर ठीक हो जाता है. यह अक्सर तेज और तीव्र होता है, वहीं, क्रॉनिक दर्द छह महीने से ज्यादा समय तक बना रहता है, यह अक्सर गठिया जैसी किसी अंदरूनी बीमारी से जुड़ा होता है. इसकी तीव्रता कम-ज्यादा होती रहती है, लेकिन बीच-बीच में दर्द के दौरे भी आ सकते हैं. क्रॉनिक दर्द व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकता है. हेल् कुछ बीमारियां ऐसी हैं जिन्हें दुनिया की सबसे दर्दनाक स्थितियों में गिना जाता है. चलिए आपको बताते हैं इसके बारे में. 

क्लस्टर सिरदर्द

यह सिरदर्द का एक रेयर लेकिन बेहद तीव्र प्रकार है. इसमें दर्द अचानक आता है और एक खास अवधि में बार-बार होता है. बेचैनी और घबराहट जैसे लक्षण भी साथ दिख सकते हैं. दर्द अक्सर सिर के एक तरफ होता है और कुछ ही मिनटों में बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. यह कई घंटों तक रह सकता है और दिन में कई बार लौट सकता है.

हरपीज जोस्टर 

यह एक वायरल इंफेक्शन है जो नसों को प्रभावित करता है. इसमें जलन, चुभन, तेज दर्द के साथ खुजली और फफोले हो सकते हैं. चिकनपॉक्स का वही वायरस बाद में दोबारा सक्रिय होकर यह बीमारी पैदा कर सकता है. उम्र बढ़ने और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है.

फ्रोजन शोल्डर

इस स्थिति में कंधे के जोड़ में जकड़न और तेज दर्द होता है. हाथ को घुमाने या ऊपर उठाने में कठिनाई होती है. लक्षण धीरे-धीरे शुरू होते हैं और समय के साथ बढ़ते हैं. आमतौर पर यह समस्या एक से तीन साल में धीरे-धीरे ठीक होती है.

हड्डी का फ्रैक्चर

हड्डी में दरार या टूटने को फ्रैक्चर कहा जाता है. यह शरीर की किसी भी हड्डी में हो सकता है. इसमें तेज दर्द, सूजन और उस हिस्से को हिलाने में परेशानी होती है. फ्रैक्चर का प्रकार चोट की तीव्रता पर निर्भर करता है.

कॉम्प्लेक्स रीजनल पेन सिंड्रोम

यह एक लंबे समय के दर्द की स्थिति है, जो अक्सर किसी चोट के बाद एक हाथ या पैर को प्रभावित करती है. माना जाता है कि यह नसों की गड़बड़ी से जुड़ी होती है. दर्द जलन या चुभन जैसा महसूस होता है. प्रभावित हिस्से की त्वचा का रंग, तापमान या सूजन भी बदल सकती है.

हार्ट अटैक

हार्ट अटैक तब होता है जब हार्ट की मांसपेशियों तक ब्लड का फ्लो रुक जाता है. यह जानलेवा स्थिति हो सकती है. इसमें सीने में दबाव या जकड़न जैसा दर्द महसूस होता है, जो हाथ, गर्दन या जबड़े तक फैल सकता है. समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति गंभीर हो सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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How Shwaasa AI App Detects COPD Through Cough: कर्नाटक के एक स्टार्टअप ने एआई आधारित मोबाइल एप ‘श्वासा’ तैयार किया है, जिसे एम्स से मान्यता मिल चुकी है. माना जा रहा है कि यह एप देश की प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था में जांच से जुड़ी एक बड़ी कमी को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है. यह एप खास एल्गोरिद्म तकनीक के जरिए मरीजों में क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज की स्क्रीनिंग करता है, जो भारत में बीमारियों का एक प्रमुख कारण है.

एम्स दिल्ली में हुआ टेस्ट

एम्स-दिल्ली ने पिछले साल अपने बल्लभगढ़ केंद्र में 460 लोगों पर इसका टेस्ट किया. लंग्स की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाली स्पाइरोमेट्री, जिसे इस एरिया का मानक परीक्षण माना जाता है, उससे तुलना करने पर एप के नतीजों में संतोषजनक समानता पाई गई. खासकर गंभीर मामलों में इसकी सटीकता ज्यादा मजबूत रही. सामान्य और असामान्य मामलों में अंतर पहचानने में यह करीब 90 प्रतिशत तक सही पाया गया, जबकि सीओपीडी और अस्थमा जैसी बीमारियों की पहचान में इसकी सटीकता 82 से 87 प्रतिशत के बीच रही. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

सीओपीडी भारत में बीमारी का दूसरा बड़ा कारण है, लेकिन अधिकतर जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्पाइरोमेट्री की सुविधा उपलब्ध नहीं है. एम्स से जुड़े डॉक्टर हर्षल रमेश साल्वे, जो इस टेस्ट का हिस्सा थे, उन्होंने कहा कि “कई जिला अस्पतालों में भी स्पाइरोमेट्री की सुविधा नहीं है. यह ज्यादातर मेडिकल कॉलेजों तक सीमित है.”

काफी आसानी से कर सकते हैं यूज

एप का काम करने का तरीका काफी सरल है. मरीज को सिर्फ स्मार्टफोन में खांसना होता है. फोन का माइक्रोफोन खांसी की आवाज रिकॉर्ड करता है और उसमें लगा एआई सॉफ्टवेयर तुरंत उसका एनालिसिस करता है. कुछ ही मिनटों में यह बता देता है कि लंग्स सामान्य हैं या सीओपीडी अथवा अस्थमा के संकेत दिख रहे हैं. पूरी जांच करीब आठ मिनट में पूरी हो जाती है. स्पाइरोमेट्री के उलट, इस एप को चलाने के लिए किसी खास टेस्ट या भारी उपकरण की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह है कि इसे संसाधन सीमित इलाकों के लिए उपयोगी माना जा रहा है. एम्स के डॉक्टरों ने सुझाव दिया है कि जहां स्पाइरोमेट्री उपलब्ध नहीं है, वहां प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य केंद्रों, यहां तक कि आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

टीवी को लेकर भी हो रहा है टेस्ट
एम्स एक अलग रिसर्च परियोजना के तहत टीवी की स्क्रीनिंग में भी इसकी उपयोगिता का आकलन कर रहा है. फिलहाल यह उपकरण कर्नाटक समेत कुछ राज्यों में इस्तेमाल हो रहा है. फरीदाबाद में निजी डॉक्टरों को जोड़कर इसके उपयोग को और बढ़ाने की योजना है, ताकि इसके नतीजों को दर्ज किया जा सके.

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मौत से पहले एक बच्ची ने कैसे बचाई 4 लोगों की जान, मेडिकल फील्ड में कैसे होता है यह कमाल?

मौत से पहले एक बच्ची ने कैसे बचाई 4 लोगों की जान, मेडिकल फील्ड में कैसे होता है यह कमाल?


How Does Organ Donation and Transplantation Work: केरल में 10 महीने की मासूम आलिन शेरिन अब्राहम ने मिसाल कायम किया है. वे सबसे कम उम्र की डोनर बनी. इस बच्ची का पार्थिव शरीर पहले मल्लप्पल्ली के एक निजी अस्पताल के शवगृह में रखा गया था. बाद में इसे वेस्ट वालुम्मानिल स्थित उनके घर पर अंतिम दर्शन के लिए लाया गया, जहां दूर-दूर से लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे. पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया.

आलिन भले ही इस दुनिया से चली गईं, लेकिन अपने पीछे चार जिंदगियों में नई रोशनी छोड़ गईं. उनके अंगदान ने गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को जीवनदान दिया. यही अंगदान और ट्रांसप्लांट की असली ताकत है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कैसे काम करता है?

क्या होता है ऑर्गन डोनेशन?

हेल्थ विषयों पर जानकारी देने वाली बेवसाइट clevelandclinic के अनुसार, ऑर्गन डोनेशन वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति के स्वस्थ अंग को निकालकर ऐसे मरीज के शरीर में लगाया जाता है, जिसका कोई अंग काम करना बंद कर चुका हो. यह एक बेहद संवेदनशील और समय से जुड़ी मेडिकल प्रक्रिया है. आमतौर पर दो सर्जरी लगभग एक साथ होती हैं, एक में डोनर के शरीर से अंग निकाला जाता है और दूसरी में जरूरतमंद मरीज के शरीर में उसे ट्रांसप्लांट किया जाता है.

कितने तरह के होते हैं ऑर्गन डोनेशन?

ऑर्गन डोनेशन दो प्रकार का होता है, मृत्यु के बाद किया जाने वाला दान और जीवित व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला दान. अधिकांश मामलों में ब्रेन मृत्यु की पुष्टि के बाद परिजनों की सहमति से अंगदान किया जाता है. जीवित व्यक्ति भी किडनी जैसे कुछ अंग दान कर सकता है, बशर्ते उसकी सेहत पूरी तरह ठीक हो और उसका अंग जरूरतमंद मरीज के शरीर के अनुकूल हो. मृत्यु के बाद हार्ट, लिवर, किडनी, लंग्स, पैंक्रियास और आंत जैसे अंग दान किए जा सकते हैं. इसके अलावा आंख, स्किन, बोन मैरो और हार्ट  भी दान किए जा सकते हैं.

कौन होता है डोनर?

डॉक्टरों के मुताबिक, लगभग हर व्यक्ति संभावित अंगदाता हो सकता है. उम्र से ज्यादा महत्वपूर्ण है अंगों की सेहत और मेडिकल जांच. सही समय पर लिया गया एक निर्णय कई लोगों को दूसरी जिंदगी दे सकता है. अंगदान और ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया आसान नहीं होती. यह कई चरणों से होकर गुजरती है. शुरुआत दान के निर्णय से होती है और अंत उस मेडिकल प्रक्रिया पर होता है, जिसमें एक व्यक्ति का स्वस्थ अंग निकालकर दूसरे व्यक्ति के शरीर में सफलतापूर्वक लगाया जाता है. यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि अंगदाता जीवित है या मृत्यु के बाद दान किया गया है.

मृत्यु के बाद होने वाले अंगदान में समय बहुत कम होता है, क्योंकि मौत के कुछ ही घंटों के भीतर अंगों को सुरक्षित निकालना जरूरी होता है. देरी होने पर अंगों की उपयोगिता कम हो सकती है. वहीं, जीवित डोनर के मामले में पूरी तैयारी और योजना के साथ काम किया जाता है। इसमें स्वास्थ्य जांच, आवश्यक सहमति और सुरक्षा उपायों पर विशेष ध्यान दिया जाता है.

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AIIMS दिल्ली में AI से इलाज शुरू, इन बीमारियों की होगी जल्दी पहचान

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दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अब इलाज का अंदाज तेजी से बदल रहा है. यहां ऐसी स्मार्ट तकनीक काम करने लगी है जो मरीज के डॉक्टर तक पहुंचने से पहले ही उसकी जांच रिपोर्ट का विश्लेषण कर देती है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से अब बीमारी की पहचान और इलाज की दिशा तय करने की प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक तेज और सटीक हो रही है.

एक्स-रे रिपोर्ट पर पहले नजर अब AI की

एम्स में छाती का एक्स-रे होने के बाद उसकी पहली जांच अब एक एडवांस्ड AI सिस्टम करता है. यह तकनीक कुछ ही सेकंड में इमेज को स्कैन कर संभावित संक्रमण, गांठ या अन्य असामान्यताओं की ओर संकेत दे देती है. डॉक्टर के पास रिपोर्ट पहुंचने तक शुरुआती विश्लेषण तैयार रहता है, जिससे निर्णय लेने में समय नहीं लगता. इससे न केवल भीड़भाड़ वाले सरकारी अस्पताल में काम का दबाव घटा है बल्कि मरीजों को रिपोर्ट के लिए लंबा इंतजार भी नहीं करना पड़ता.

शुरुआती चरण में कैंसर पकड़ने की तैयारी

देश में बढ़ते ब्रेस्ट कैंसर के मामलों को देखते हुए एम्स की विशेषज्ञ टीम एक नई AI-आधारित तकनीक विकसित कर रही है. डॉक्टर कृतिका रंगराजन और उनकी टीम ऐसी प्रणाली पर काम कर रही है जो कैंसर के बेहद शुरुआती संकेतों को पहचान सके. अक्सर यह बीमारी तब सामने आती है जब वह शरीर में फैल चुकी होती है. नई तकनीक का उद्देश्य इसी देरी को खत्म करना है.

इस सिस्टम का परीक्षण देश के कई प्रमुख मेडिकल केंद्रों में जारी है. यदि कैंसर शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए तो उपचार अधिक प्रभावी और जीवन रक्षा की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. AI आधारित विश्लेषण डॉक्टरों को समय रहते इलाज शुरू करने में मदद देगा.

‘मधुनेत्र’ से गांव तक पहुंचेगी हाईटेक आंख जांच

एम्स ने सरकार के सहयोग से ‘मधुनेत्र’ नामक एक विशेष कार्यक्रम शुरू किया है. यह AI आधारित सिस्टम आंखों की अंदरूनी तस्वीरों को स्कैन कर मधुमेह या अन्य कारणों से होने वाली रेटिना संबंधी समस्याओं की पहचान करता है. जांच के तुरंत बाद जोखिम की जानकारी मिल जाती है, जिससे समय पर इलाज संभव हो पाता है.

इस पहल को देशभर में लागू करने की योजना है ताकि ग्रामीण और दूरदराज इलाकों के लोगों को भी बड़े शहरों जैसी उन्नत जांच सुविधा मिल सके. विशेषज्ञों का मानना है कि मशीनें लगातार और बिना थके काम करती हैं, जिससे मानवीय त्रुटि की संभावना कम हो जाती है. हालांकि अंतिम निर्णय डॉक्टर ही लेते हैं, लेकिन AI अब उनके लिए एक मजबूत सहायक की भूमिका निभा रहा है.

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