हेल्दी डाइट लेते हैं, फिर भी क्यों रहती है डेफिशिएंसी? डॉक्टर ने बता दी हकीकत

हेल्दी डाइट लेते हैं, फिर भी क्यों रहती है डेफिशिएंसी? डॉक्टर ने बता दी हकीकत


Nutrient Deficiency Causes: आज के समय में लोग हेल्दी खाने पर काफी ध्यान देने लगे हैं. घर का बना खाना, फल, सब्जियां और संतुलित डाइट लेने के बावजूद कई लोग कमजोरी, थकान या बार-बार बीमार होने की शिकायत करते हैं. जांच करने पर आयरन, विटामिन बी12 या विटामिन डी की कमी सामने आती है. डॉक्टरों का कहना है कि यह समस्या सिर्फ खाने में नहीं बल्कि शरीर की ओर से पोषक तत्वों को सही तरीके से न सोख पाने में भी हो सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या आपको भी हेल्दी डाइट लेने के बाद भी डेफिशिएंसी रहती है और डॉक्टर ने इसके पीछे की हकीकत क्या बताई.

पाचन की गड़बड़ी बन सकती है बड़ी वजह 

डॉक्टरों के अनुसार, खाना खाने के बाद उसका सही तरीके से पाचन बहुत जरूरी है. अगर पेट में एसिड कम बनता है या डाइजेस्टिव एंजाइम्स कमजोर होते हैं तो खाना सही तरीके से टूट नहीं पाता है. ऐसी कंडीशन में शरीर जरूरी पोषक तत्व को सूचित नहीं कर पाता और धीरे-धीरे शरीर में पोषक तत्व की कमी होने लगती है. 

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आंतों की सेहत भी है जरूरी

छोटी आंत में मौजूद सूक्ष्म संरचनाएं पोषक तत्वों को खून में पहुंचाने का काम करती है. अगर इनमें किसी तरह की सूजन या नुकसान होता है तो आयरन, कैल्शियम और विटामिन बी12 जैसे पोषक तत्व शरीर तक नहीं पहुंच पाते. कई बार सीलिएक डिजीज या आतों से जुड़ी समस्याएं लंबे समय तक बिना लक्षण के बनी रहती है और शरीर में पोषक तत्व की कमी बढ़ती रहती है. 

खाने खाने की क्वालिटी भी बदल रही है सेहत 

एक्सपर्ट का मानना है की मिट्टी के गुणवत्ता में गिरावट और आधुनिक खेती के तरीकों के कारण फसलों में पोषक तत्व पहले जैसे नहीं रहे. वहीं प्रोसेस्ड फूड पेट तो भर देता है, लेकिन पर्याप्त पोषण नहीं देता. जिससे हमेशा पोषण की कमी की स्थिति बनी रहती है. वहीं डॉक्टर के अनुसार हर शरीर की पोषण संबंधी जरूरत एक जैसी नहीं होती है. तनाव, बीमारी या लाइफस्टाइल के अनुसार बदलती रहती है. वही प्रेग्नेंट महिलाओं, स्पोर्ट्स पर्सन या लंबे समय तक काम करने वालों को सामान्य से ज्यादा पोषक तत्व की जरूरत होती है. 

रोजाना की आदतें भी डालती है असर 

ज्यादा चाय कॉफी पीने से आयरन का अवशोषण कम हो सकता है. शराब का सेवन विटामिन स्टोरेज और आंतों की सेहत को प्रभावित करता है. वहीं कुछ दवाइयां जैसे एंटासिड, एंटीबायोटिक या मेटफार्मिन के लंबे इस्तेमाल से शरीर में पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो सकता है. इसके अलावा पोषक तत्व की कमी अचानक नहीं होती, बल्कि समय के साथ बढ़ती है. लगातार थकान, बाल झड़ना या बार-बार संक्रमण होना या ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत जैसे लक्षण इसके संकेत हो सकते हैं. 

सिर्फ डाइट नहीं अब्जॉर्प्शन भी जरूर सुधारना भी जरूरी 

डॉक्टरों के अनुसार, समस्या को ठीक करने के लिए सिर्फ ज्यादा खाना ही काफी नहीं है. आंतों की सेहत सुधारना जरूरी है. इसके लिए दही या छाछ जैसे फर्मेंटेड फूड, फाइबर से भरपूर आहार और सही फूड कांबिनेशन अपनाना जरूरी है. डॉक्टरों के अनुसार कैफीन और शराब का सेवन भी कम करना चाहिए. अगर पोषक तत्वों की कमी बनी रहती है तो डॉक्टरों से परामर्श भी ले सकते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या होती है आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज, हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए यह कितनी फायदेमंद?

क्या होती है आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज, हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए यह कितनी फायदेमंद?


How Isometric Exercise Helps Lower Blood Pressure: हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन आज के समय की एक आम लेकिन गंभीर समस्या बन चुका है. यह स्थिति तब होती है जब दिल से पंप होने वाला खून धमनियों की दीवारों पर ज्यादा दबाव डालता है. ब्लड प्रेशर को दो हिस्सों में मापा जाता है सिस्टोलि और डायस्टोलिक. आमतौर पर 120/80 को सामान्य माना जाता है, जबकि 130/80 से ऊपर जाने पर इसे हाई ब्लड प्रेशर की श्रेणी में रखा जाता है.

दिनभर में ब्लड प्रेशर का थोड़ा ऊपर-नीचे होना सामान्य है, लेकिन अगर यह लंबे समय तक हाई बना रहे तो खतरा बढ़ जाता है. इससे दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और धीरे-धीरे आर्टरीज अपनी लचक खोने लगती हैं. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह हार्ट, किडनी, आंखों और दिमाग तक को नुकसान पहुंचा सकता है.

एक्सरसाइज असरदार

ऐसे में एक्सरसाइज को ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने का सबसे असरदार तरीका माना जाता है। हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने इस दिशा में एक नया पहलू जोड़ा है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट uclahealth के अनुसार,  इंग्लैंड के रिसर्चर्स ने 13 साल में की गई 270 स्टडीज के डेटा का एनालिसिस किया, जिसमें 15 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया. इसमें पाया गया कि ब्लड प्रेशर कम करने में आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है. 

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आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज

आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज वह होती है, जिसमें मसल्स तो सिकुड़ती हैं, लेकिन शरीर के जॉइंट्स हिलते नहीं हैं. यानी आप एक ही पोजिशन में रहते हुए मसल्स पर दबाव डालते हैं. उदाहरण के तौर पर दीवार के सहारे बैठकर स्क्वाट करना, हैंडग्रिप को दबाना या पैरों से किसी स्थिर चीज पर दबाव डालना इसमें शामिल है. एक्सपर्ट के अनुसार, जब मसल्स लंबे समय तक सिकुड़ी रहती हैं, तो उस हिस्से में ब्लड फ्लो कुछ समय के लिए कम हो जाता है. लेकिन जैसे ही यह दबाव हटता है, खून तेजी से वापस आता है, जिससे ब्लड वेसल्स रिलैक्स होती हैं. यही प्रक्रिया ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करती है.

इस बात का रखना चाहिए ध्यान 

हालांकि, इसे पूरी तरह सुरक्षित मान लेना सही नहीं होगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबे समय तक मसल्स को सिकोड़कर रखने से कुछ समय के लिए ब्लड प्रेशर बढ़ भी सकता है. इसलिए जिन लोगों को पहले से दिल की बीमारी है या जिनका ब्लड प्रेशर कंट्रोल में नहीं है, उन्हें यह एक्सरसाइज शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए. आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है, लेकिन इसे सही तरीके और सावधानी के साथ करना बेहद जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिना जिम-डाइट वजन घटाने वाली दवाओं का काला सच, एक्सपर्ट्स ने बताया क्यों हैं ये खतरनाक!

बिना जिम-डाइट वजन घटाने वाली दवाओं का काला सच, एक्सपर्ट्स ने बताया क्यों हैं ये खतरनाक!


Are GLP-1 Weight Loss Drugs Safe Without Prescription: भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रही वेट लॉस दवाओं को लेकर अब बड़ा अलर्ट जारी किया गया है. खासतौर पर GLP-1 ग्लूकागन-लाइक पेप्टाइड-1 दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल पर एक्सपर्ट ने चिंता जताई है. मेदांता हॉस्पिटल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रसिद्ध कार्डियोवैस्कुलर सर्जन डॉ. नरेश त्रेहान  ने बिना डॉक्टर की सलाह के इन दवाओं के इस्तेमाल को खतरनाक बताया है, उनका कहना है कि ये दवाएं लाइफस्टाइल प्रोडक्ट नहीं हैं, बल्कि गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए बनाई गई हैं. 

दरअसल, हाल ही में इन दवाओं का पेटेंट खत्म होने के बाद भारत में इनके सस्ते जेनेरिक वर्जन बड़ी संख्या में उपलब्ध हो गए हैं. इसके चलते ऑनलाइन फार्मेसी और वेलनेस क्लीनिक के जरिए इनकी बिक्री तेजी से बढ़ी है. सोशल मीडिया पर तेजी से वजन घटाने के ट्रेंड ने भी इसकी मांग को और बढ़ा दिया है, जिससे लोग बिना पूरी जानकारी के इनका इस्तेमाल करने लगे हैं. 

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सरकार ने सख्ती की

सरकार ने इस बढ़ते चलन को देखते हुए सख्ती शुरू कर दी है. देशभर में 49 जगहों पर छापेमारी की गई, जिसमें वेयरहाउस, मेडिकल स्टोर और वेलनेस सेंटर शामिल थे. जांच में सामने आया कि कई जगहों पर ये दवाएं बिना प्रिस्क्रिप्शन के बेची जा रही थीं या नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा था. इसके बाद ड्रग रेगुलेटर ने साफ चेतावनी दी है कि ऐसी गतिविधियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी. 

एक्सपर्ट का क्या है कहना?

डॉ. नरेश त्रेहान के मुताबिक, ये दवाएं वजन कम करने में असरदार जरूर हैं, लेकिन इनके साइड इफेक्ट्स भी कम नहीं हैं. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति खुद से दवा लेना शुरू कर देता है, तो उसके लिए जोखिम काफी बढ़ सकता है.डॉ. त्रेहान ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की दवाएं ओवर-द-काउंटर या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध नहीं होनी चाहिए. उनके अनुसार, कई लोग इसे आसान तरीका मानकर बिना एक्सरसाइज या डाइट के वजन कम करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जो बेहद खतरनाक हो सकता है. इन दवाओं के दुष्प्रभावों में पैंक्रियाटाइटिस, मितली, उल्टी और लीवर पर असर जैसी समस्याएं शामिल हैं, जो गंभीर रूप ले सकती हैं.

 

लोगों को भी रखना चाहिए ध्यान

डॉ. त्रेहान ने कहा कि मरीजों की जिम्मेदारी है कि वे किसी भी दवा का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह से ही करें. उन्होंने लोगों को चेतावनी दी कि सेल्फ-मेडिकेशन से बचें और किसी भी इलाज के लिए एक्सपर्ट की निगरानी को प्राथमिकता दें, ताकि संभावित खतरों से बचा जा सके. सरकार अब इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर भी लगाम लगाने की तैयारी कर रही है. खासकर सरोगेट एडवरटाइजिंग और गलत तरीके से प्रमोशन करने पर सख्त कदम उठाए जाएंगे. इसके साथ ही यह भी प्रस्ताव है कि इन दवाओं को केवल एक्सपर्ट डॉक्टर ही लिख सकें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्लास्टिक के काले डब्बों में पैक करवाते हैं खाना, जानिए सेहत के लिए यह कितना खतरनाक?

प्लास्टिक के काले डब्बों में पैक करवाते हैं खाना, जानिए सेहत के लिए यह कितना खतरनाक?


Is It Safe To Reheat Food In Black Plastic: 25 मार्च 2026 को राज्यसभा में जनहित से जुड़े मामलों पर चर्चा के दौरान भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी ने ढाबों,होटल, और अन्य स्थानों पर काले रंग के प्लास्टिक बर्तनों के यूज को लेकर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि ये सामान्य प्लास्टिक नहीं होते हैं, इनको ज्य् इलेक्ट्रॉनिक कचरे या अन्य अवशिष्ट प्लास्टिक सामग्री से तैयार किया जाता है. घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि अगर इसमें गर्म खाना रखा जाता है, तो माइक्रोप्लास्टिक कण खाने में मिल सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

इसको कैसे बनाया जाता है?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, काले प्लास्टिक में अक्सर इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट और इंडस्ट्रियल प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है. इसे आग से बचाने के लिए डेकाबीडीई जैसे फ्लेम रिटार्डेंट केमिकल मिलाए जाते हैं. समस्या यह है कि ये केमिकल प्लास्टिक में पूरी तरह बंधे नहीं रहते और गर्म होने पर खाने में मिल सकते हैं, खासकर जब खाना गरम या तैलीय हो. इसके अलावा, इस प्लास्टिक में BPA और फ्थेलेट्स जैसे केमिकल भी पाए जाते हैं, जो हार्मोन को प्रभावित करने वाले तत्व माने जाते हैं. जब आप ऐसे डिब्बों में खाना गरम करते हैं या बार-बार इस्तेमाल करते हैं, तो ये केमिकल धीरे-धीरे शरीर में जमा हो सकते हैं और लंबे समय में नुकसान पहुंचा सकते हैं.

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

2024 की एक स्टडी में 200 से ज्यादा ब्लैक प्लास्टिक प्रोडक्ट्स का एनालिसिस किया गया, जिसमें करीब 85 प्रतिशत में टॉक्सिक फ्लेम रिटार्डेंट पाए गए. TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार,  Dr Aravind Badiger के अनुसार, इन केमिकल्स के लंबे समय तक संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. वहीं, Dr Sachin Trivedi बताते हैं कि BPA और फ्थेलेट्स जैसे तत्व न सिर्फ हार्मोनल गड़बड़ी पैदा करते हैं, बल्कि दिल की बीमारी, डायबिटीज और प्रजनन से जुड़ी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा, Prof Chintamani का कहना है कि ब्लैक प्लास्टिक से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक भी शरीर में पहुंचकर टॉक्सिक लोड बढ़ाते हैं, जिससे लंबे समय में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. 

 

किन लोगों को ज्यादा दिक्कत?

एक्सपर्च यह भी चेतावनी देते हैं कि बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों पर इसका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है. हालांकि अभी तक सीधे तौर पर कैंसर से इसका संबंध पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन इसके केमिकल्स को देखते हुए सतर्क रहना जरूरी है.एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि काले प्लास्टिक के डिब्बों की जगह ग्लास, स्टील या लकड़ी के बर्तन इस्तेमाल करें. खासकर खाने को गरम करने के लिए प्लास्टिक से बचना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है.

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अमेरिका में अचानक बढ़ने लगे कोरोना के मामले, भारत को कितना खतरा?

अमेरिका में अचानक बढ़ने लगे कोरोना के मामले, भारत को कितना खतरा?


Will COVID Surge In US Affect India: अमेरिका में एक बार फिर कोरोना के मामलों में अचानक बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ा दी है. नई रिपोर्ट्स के मुताबिक, वायरस का एक नया BA.3.2 वेरिएंट सामने आया है. CDC के अनुसार, 11 फरवरी तक BA.3.2 वेरिएंट 23 देशों में पाया गया है. एक्सपर्ट का कहना है कि यह वेरिएंट इम्यून सिस्टम को आंशिक रूप से चकमा देने की क्षमता रखता है, जिससे दोबारा इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि डॉक्टरों का मानना है कि मौजूदा स्थिति पहले जैसी गंभीर नहीं है. पिछले कुछ सालों में बड़ी संख्या में लोग वैक्सीन ले चुके हैं या इंफेक्शन से गुजर चुके हैं, जिससे उनमें हाइब्रिड इम्यूनिटी विकसित हो चुकी है. यही वजह है कि भले ही इंफेक्शन बढ़े, लेकिन गंभीर मामलों की संभावना पहले की तुलना में कम हो सकती है. 

भारत में क्या होगी स्थिति?

अब सवाल यह उठता है कि क्या इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कोरोना वायरस अब पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि यह एक एंडेमिक वायरस बन चुका है, यानी समय-समय पर इसके केस बढ़ते-घटते रहेंगे. हालांकि, एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ नए वेरिएंट के आने का मतलब यह नहीं है कि फिर से महामारी जैसी स्थिति बनेगी. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

Dr. S M Fayaz ने TOI को बताया कि कोरोना वायरस अब एक एंडेमिक बीमारी बन चुका है, यानी यह पूरी तरह खत्म नहीं होगा बल्कि समय-समय पर नए रूप में सामने आता रहेगा. डॉक्टर का कहना है कि नए वेरिएंट की वजह से इंफेक्शन के मामले बढ़ सकते हैं. लेकिन ज्यादातर मामलों में लक्षण हल्के से मध्यम रह सकते हैं, जैसे बुखार, खांसी और थकान. ऐसे लक्षण आमतौर पर घर पर ही संभाले जा सकते हैं. कुछ लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है. बुजुर्ग, पहले से बीमार लोग, गर्भवती महिलाएं और कमजोर इम्यूनिटी वाले मरीज इस इंफेक्शन से ज्यादा प्रभावित हो सकते है.

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घबराने की जरूरत नहीं

एक्सपर्ट का मानना है कि घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है.  हेल्थ सिस्टम अब पहले से ज्यादा तैयार है और टेस्टिंग, इलाज और वैक्सीनेशन के बेहतर इंतजाम मौजूद हैं. इसके बावजूद, निगरानी बनाए रखना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके. कोरोना मामलों को एक चेतावनी के तौर पर देखा जा सकता है. भारत में अभी स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन लापरवाही से हालात बदल सकते हैं. ऐसे में जरूरी है कि लोग वैक्सीनेशन, समय पर जांच और बेसिक सावधानियों को नजरअंदाज न करें, ताकि किसी भी नए खतरे से बचा जा सके.

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आपकी ये 5 मामूली आदतें चुपचाप सड़ा रही हैं किडनी, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती

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किडनी हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी अंग है, जो खून को साफ करने, फ्लूइड बैलेंस रखने और ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने का काम करती है. एक्सपर्ट के अनुसार, दुनिया की करीब 10 प्रतिशत आबादी क्रॉनिक किडनी डिजीज से प्रभावित है.



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