भारत जैसे गरीब देशों में कैंसर से जान गंवा रहे 10 में से 9 बच्चे, डरा देगी लैंसेट की रिपोर्ट

भारत जैसे गरीब देशों में कैंसर से जान गंवा रहे 10 में से 9 बच्चे, डरा देगी लैंसेट की रिपोर्ट


Why Childhood Cancer Deaths Are Higher In Poor Countries: दुनिया भर में बच्चों में कैंसर एक गंभीर और बढ़ती हुई चिंता बनता जा रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसके ज्यादातर मामले और मौतें गरीब और मध्यम आय वाले देशों में हो रही हैं.  द लैंसेट में पब्लिश ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2023 स्टडी ने इस असमानता को लेकर कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं.  रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में दुनिया भर में बच्चों में कैंसर के लगभग 3.77 लाख नए मामले सामने आए, जबकि करीब 1.44 लाख बच्चों की मौत हो गई, यह बीमारी बच्चों में मौत के प्रमुख कारणों में शामिल हो चुकी है और खसरा, टीबी और HIV/AIDS जैसी बीमारियों से भी ज्यादा जान ले रही है. 

लो और मिडिल इनकम वाले देशों में ज्यादा मौतें

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन मौतों में से करीब 94 प्रतिशत मामले लो और मिडिल इनकम देशों में दर्ज किए गए. यानी जहां संसाधन कम हैं, वहीं बच्चों के लिए यह बीमारी सबसे ज्यादा घातक साबित हो रही है. भारत की बात करें तो यहां 2023 में करीब 17,000 बच्चों की मौत कैंसर के कारण हुई, जिससे यह बच्चों में मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण बन गया. कैंसर केयर अस्पताल, दरभंगा के कर्क रोग एक्सपर्ट डॉक्टर स्वरूप मित्रा के अनुसार,, इसके बावजूद भारत के राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम में बचपन के कैंसर को अभी तक प्राथमिकता नहीं दी गई है.  इसके लिए जरूरी है कि बचपन के कैंसर को राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजनाओं में तुरंत शामिल किया जाए.

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दक्षिण एशिया की स्थिति

दक्षिण एशिया इस संकट का बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां दुनिया के कुल चाइल्डहुड कैंसर से होने वाली मौतों का लगभग 20.5 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया. इसके अलावा, 1990 से 2023 के बीच इन मौतों में करीब 16.9 प्रतिशत  की बढ़ोतरी भी देखी गई है. हालांकि एक पॉजिटिव पहलू यह भी है कि वैश्विक स्तर पर मौतों में कुछ कमी आई है, लेकिन इसका लाभ सभी देशों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है. उच्च आय वाले देशों में इलाज बेहतर होने से बच्चों के बचने की संभावना ज्यादा है, जबकि गरीब देशों में समय पर जांच और इलाज की कमी बड़ी बाधा बन रही है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इस स्टडी की प्रमुख लेखक लिसा फोर्स कहती हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता के कारण ही यह अंतर पैदा हो रहा है. देर से डायग्नोसिस, जरूरी इलाज की कमी और स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियां बच्चों की जान जोखिम में डाल रही हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चाइल्डहुड कैंसर के 85 प्रतिशत नए मामले और 94 प्रतिशत मौतें इन्हीं लो और मिडिल इनकम देशों में होती हैं. इसके अलावा, DALYs यानी “डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स” का भी 94 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं देशों में दर्ज किया गया, जो यह दिखाता है कि बीमारी का असर सिर्फ मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की जिंदगी की क्वालिटी पर भी पड़ता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपके हाथ में भी होती है झुनझुनी और सुन्नपन, जानें किस वजह से होता है ऐसा?

क्या आपके हाथ में भी होती है झुनझुनी और सुन्नपन, जानें किस वजह से होता है ऐसा?


Why Do My Hands Tingle Frequently: क्या आपके हाथों में बार-बार झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होता है? कई लोग इसे मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह शरीर का एक संकेत भी हो सकता है, जिसे समझना जरूरी है.  अक्सर यह समस्या तब महसूस होती है जब हम गलत पोजीशन में सो जाते हैं या लंबे समय तक एक ही स्थिति में हाथ रखते हैं. ऐसे में नसों पर दबाव पड़ता है या खून का प्रवाह कुछ समय के लिए कम हो जाता है, जिससे झुनझुनी होने लगती है.

कब होती है दिक्कत?

लेकिन अगर यह परेशानी बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसके पीछे कोई खास कारण भी हो सकता है. theheartysoul की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे आम वजहों में से एक है कार्पल टनल सिंड्रोम, जिसमें कलाई की नस दब जाती है और अंगूठे, उंगलियों में झुनझुनी या दर्द होने लगता है. कभी-कभी समस्या कलाई में नहीं, बल्कि कोहनी या गर्दन से भी जुड़ी हो सकती है. नसों में कहीं भी दबाव आने से हाथ तक इसका असर पहुंच सकता है, जिससे झुनझुनी और कमजोरी महसूस होती है.

ब्लड सर्कुलेशन और डायबिटीड भी कारण

खराब ब्लड सर्कुलेशन भी इसका एक कारण हो सकता है.  ठंड में या अचानक तापमान बदलने पर उंगलियां सुन्न पड़ सकती हैं और रंग भी बदल सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसके अलावा, डायबिटीज जैसी बीमारियां भी नसों को प्रभावित कर सकती हैं. जब नसें कमजोर होने लगती हैं, तो हाथ-पैरों में झुनझुनी, जलन या सुन्नपन महसूस होने लगता है.

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विटामिन B12 की कमी 

विटामिन B12 की कमी भी एक अहम कारण है, जो धीरे-धीरे नसों को नुकसान पहुंचा सकती है. कई बार लोग थकान या कमजोरी को नजरअंदाज करते रहते हैं, लेकिन यह संकेत हो सकता है कि शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी है. कुछ मामलों में थायरॉयड की समस्या भी हाथों में झुनझुनी का कारण बन सकती है. शरीर का मेटाबॉलिज्म बिगड़ने से नसों पर असर पड़ता है और यह समस्या बढ़ सकती है. 

ये भी होता है कारण

कंधे और गर्दन के बीच नसों या ब्लड वेसल्स पर दबाव पड़ने से भी हाथों में झुनझुनी हो सकती है. खासतौर पर जब हाथ लंबे समय तक ऊपर रखा जाए या भारी वजन उठाया जाए.  अगर झुनझुनी के साथ कमजोरी, चीजें गिरना, या दर्द बढ़ने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह संकेत हो सकता है कि नसों पर लगातार दबाव पड़ रहा है या कोई गंभीर समस्या विकसित हो रही है. अचानक एक तरफ हाथ सुन्न हो जाना, बोलने में दिक्कत या चक्कर आना जैसी स्थिति स्ट्रोक का संकेत भी हो सकती है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी हो सकती है जोखिम भरी? जानें बच्चे को जन्म देने की सही उम्र

कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी हो सकती है जोखिम भरी? जानें बच्चे को जन्म देने की सही उम्र


Right Age for Pregnancy : आज के समय में महिलाओं की जिंदगी पहले से काफी बदल चुकी है. पढ़ाई, करियर, आर्थिक स्वतंत्रता और अपने फैसले खुद लेने की आजादी, इन सब वजहों से कई महिलाएं मां बनने का फैसला पहले की तुलना में देर से ले रही हैं, जहां पहले कम उम्र में शादी और जल्दी प्रेग्नेंसी आम बात थी, वहीं अब महिलाएं 30 या 35 की उम्र के बाद भी मां बनने का सोचती हैं. ऐसे में कई महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है कि क्या ज्यादा उम्र में प्रेग्नेंसी सुरक्षित होती है, क्या इसके कुछ जोखिम भी हैं और आखिर मां बनने के लिए सही उम्र क्या मानी जाती है. तो आइए जानते हैं कि कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी जोखिम भरी हो सकती है. 

प्रेग्नेंसी के लिए सही उम्र क्या है?

महिलाओं में प्रेग्नेंसी की फर्टिलिटी टीनेज में पीरियड्स शुरू होने के साथ ही शुरू हो जाती है और मेनोपॉज तक रहती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर उम्र प्रेग्नेंसी के लिए समान रूप से सुरक्षित होती है. 20 से 30 साल की उम्र को प्रेग्नेंसी के लिए सबसे बेहतर माना जाता है. 30 के बाद धीरे-धीरे प्रेग्नेंसी की क्षमता कम होने लगती है और 35 के बाद जोखिम बढ़ने लगते हैं, इसलिए इस उम्र को एडवांस्ड मैटरनल एज कहा जाता है. 

30 के बाद क्यों घटती है फर्टिलिटी?

महिलाओं के शरीर में एग्स की संख्या जन्म से ही तय होती है. उम्र बढ़ने के साथ ये संख्या और उनकी क्वालिटी दोनों कम होती जाती हैं. 30 के बाद कंसीव करने में समय ज्यादा लग सकता है. 35 के बाद कई महिलाओं को मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है और एग्स की क्वालिटी घटने से प्रेग्नेंसी की संभावना कम हो जाती है. 

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कितनी उम्र के बाद प्रेग्नेंसी जोखिम भरी हो सकती है

35 साल के बाद प्रेग्नेंट होने पर कुछ समस्याएं बढ़ सकती हैं. जिसमें मां के लिए हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, ज्यादा ब्लीडिंग (डिलीवरी के समय या बाद में) या सी-सेक्शन (ऑपरेशन से डिलीवरी) की संभावना ज्यादा होती है. वहीं प्रेग्नेंसी से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. जैसे समय से पहले डिलीवरी (प्रीमेच्योर बर्थ), जुड़वां बच्चों की संभावना बढ़ना, प्लेसेंटा से जुड़ी दिक्कतें और ICU में भर्ती होने की जरूरत हो सकती है. ज्यादा उम्र में मां बनने से बच्चे पर भी कुछ प्रभाव पड़ सकते हैं. जिसमें कम वजन के साथ जन्म, समय से पहले जन्म, NICU में भर्ती होने की जरूरत और कुछ जेनेटिक बीमारियों का खतरा भी होता है. 

सही देखभाल कैसे करें?

आपकी उम्र कोई भी हो, प्रेग्नेंसी के दौरान सही देखभाल बहुत जरूरी है. जिसमें नियमित चेकअप, समय पर टेस्ट, किसी भी समस्या का जल्दी पता लगाना और डॉक्टर की सलाह का पालन करना जरूरी है. इससे मां और बच्चे दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है.  

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आपकी हंसी भी हो सकती है खतरनाक बीमारी, जानें इसके लक्षण और इलाज का तरीका

आपकी हंसी भी हो सकती है खतरनाक बीमारी, जानें इसके लक्षण और इलाज का तरीका


अब हंसी भी बीमारी का संकेत बन सकती है, लेकिन अच्छी बात यह है कि अब इसका इलाज भी भारत में उपलब्ध है. दरअसल, जोधपुर के एम्स अस्पताल में डॉक्टरों ने दुर्लभ बीमारी ‘लाफिंग एपिलेप्सी’ (हंसने वाली मिर्गी) के चार मरीजों का सफल इलाज किया. आइए इसके बारे में जानते हैं.

क्या है यह बीमारी?

यह बीमारी ऐसी है, जिसमें मरीज को बिना किसी वजह बार-बार हंसी के दौरे पड़ते हैं. यह सामान्य हंसी नहीं होती. यह मिर्गी का एक खास प्रकार है, जो दवाओं से कंट्रोल नहीं होता. सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन यह मरीज के लिए बहुत परेशानी भरा होता है.

क्या है लाफिंग एपिलेप्सी?

लाफिंग एपिलेप्सी को गेलास्टिक सीजर्स भी कहते हैं. इसमें मरीज अचानक हंसने लगता है, जैसे कोई मजाक सुन लिया हो. असल में यह दिमाग के किसी खास हिस्से से शुरू होने वाले दौरे होते हैं. कई बार हंसी के साथ अन्य लक्षण भी दिखते हैं, जैसे शरीर में अकड़न या बेहोशी. अगर समय पर सही इलाज न हो तो यह समस्या बढ़ सकती है. इस बीमारी के मरीजों को आमतौर पर दवाओं से आराम नहीं मिलता है. ऐसे में सर्जरी की जरूरत पड़ती है. जोधपुर एम्स के डॉक्टरों ने ऐसे ही चार मरीजों की सर्जरी नई तकनीक से की.

कैसे की गई मरीजों की सर्जरी?

डॉक्टरों ने मिनिमली इनवेसिव स्टीरियोटैक्टिक रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया. इसमें दिमाग के उस छोटे से हिस्से को टारगेट किया जाता है, जहां से दौरे शुरू होते हैं. यह सर्जरी बड़े चीरे के बिना की गई. सिर्फ छोटे से चीरे से काम चलाया गया. इससे मरीज को कम दर्द होता है और जल्दी रिकवर भी हो जाता है. 

इन डॉक्टरों ने की सफल सर्जरी

इस सर्जरी के लिए न्यूरोलॉजी विभाग से डॉ. सम्हिता पांडा और डॉ. लोकेश सैनी ने मरीजों की जांच की. वहीं, डॉ. सरबेश तिवारी ने एमआरआई से सही जगह का पता लगाया. एनेस्थीसिया की टीम में डॉ. स्वाति छाबड़ा और डॉ. मनबीर कौर शामिल थीं तो डॉ. मोहित अग्रवाल ने सर्जरी की. वहीं, डॉ. दीपक के झा और डॉ. सूर्यनारायणन भास्कर भी इसमें शामिल रहे. 

एम्स जोधपुर का मिर्गी सर्जरी कार्यक्रम

एम्स जोधपुर में साल 2019 से मिर्गी की सर्जरी का कार्यक्रम चल रहा है. अब तक यहां 100 से ज्यादा ऐसी सर्जरी हो चुकी हैं. इनमें कई मरीज ऐसे थे, जिन पर दवाएं काम नहीं कर रही थीं. इन सर्जरी में कई मरीजों का इलाज आयुष्मान भारत योजना के तहत मुफ्त में किया गया. 

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अचानक टूटने लगे जरूरत से ज्यादा बाल, शरीर में छुपी हो सकती है यह बीमारी

अचानक टूटने लगे जरूरत से ज्यादा बाल, शरीर में छुपी हो सकती है यह बीमारी


आजकल बालों का झड़ना एक आम समस्या बन चुकी है. आमतौर पर यह माना जाता है कि 50 से 100 रोजाना बाल का गिरना सामान्य होता है. हजारों लाखों बालों में 50-60 बालों का गिरना कोई परेशानी की बात नहीं होती, लेकिन जब अचानक बाल जरूरत से ज्यादा टूटने लगें तो इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है. कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिनके बाल गुच्छों में झड़ते हैं, कंघी करने पर बाल का एक मोटा हिस्सा हाथ में आ जाता है और सिर से बाल गायब हो जाते हैं. कई लोग इसे सिर्फ मौसम , हेयर केयर की कमी या तनाव का असर समझकर टाल देते हैं, लेकिन कई बार यह शरीर में छुपी किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है, इसलिए समय रहते इसके कारण को समझ लेना बेहद जरूरी है

क्या है बालों का टूटने का कारण? 

यह बात सच है कि अच्छे बालों के लिए अच्छी सेहत, सही खानपान और कसरत बहुत ज़रूरी है. हालांकि, कभी-कभी शरीर में कोई बीमारी हमारे शरीर मे अपना घर बनाने लगती है, जिसकी वजह से बाल झड़ने लगते हैं साथ ही शरीर में दर्द और कमजोरी महसूस होने लगती है. इन छोटे-मोटे दिखने वाले लक्षणों के पीछे कोई बड़ी बीमारी भी हो सकती है जिसे आमतौर पर काफी लोग नजरअंदाज कर देते है.  

 

थायरॉइड की समस्या हो सकती है वजह

आजकल थायरॉइड एक आम बीमारी बन गई है. अधिकतर लोगों में थॉयरायड की बीमारी देखने को मिलती है चाहे वह पुरूष हो या महिला. आपको बता दें कि थॉयरायड गर्दन के सामने की तरफ तितली की तरह ग्लैंड होता है जो शरीर के मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने मे मदद करती है, जब इसमें गड़बड़ी होती है तो इसका असर बालों पर भी पड़ता है. हाइपोथायरॉइड या हाइपरथायरॉइड दोनों ही स्थितियों में बाल तेजी से झड़ने लगते हैं और कमजोर हो जाते हैं. 

ऐलोपेशिया एराइटा

यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से बालों की जड़ों पर हमला करने लगता है इससे बाल अचानक झड़ने लगते हैं. इस बीमारी में स्कैल्प पर गोल-गोल चकती (पैचेस) जैसा गंजापन होते दिखने लगता है. ऐलोपेशिया एराइटा में कुछ भी निश्चित होकर नहीं कह सकते हैं कि बाल बिल्कुल गिर जायेंगे या फिर से वापस आयेंगे, ये शरीर पर निर्भर करता है क्योंकि बाल गिरकर कभी भी वापस आ सकता है या आने के बाद फिर से गिर सकता है.

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एनीमिया (खून की कमी)

खून की कमी यानी एनीमिया, विशेष रूप से आयरन की कमी, बालों के झड़ने के प्रमुख कारणों में से एक है. खून में हीमोग्लोबिन का स्तर कम होने से बालों की जड़ों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व ठीक से नहीं पहुंच पाते हैं. साथ ही जब शरीर में आयरन की कमी होती है, तो शरीर बालों को पोषण देने के बजाय उसे महत्वपूर्ण अंगों जैसे दिल, लिवर को बचाने में खर्च करता है. इससे बालों के विकास चक्र को बाधित करती है, जिससे बाल अपने विकास चरण (growth phase) को पूरा करने से पहले ही झड़ने और टूटने लगते हैं. खासकर महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. 

 

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बढ़ती उम्र में विटामिन D और B12 क्यों हैं जरूरी? उम्र को मात देने के लिए अपनाएं ये डाइट टिप्स

बढ़ती उम्र में विटामिन D और B12 क्यों हैं जरूरी? उम्र को मात देने के लिए अपनाएं ये डाइट टिप्स


Which Vitamins Are Important After 50: उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आने लगते हैं. इसका असर ऊर्जा, हड्डियों की मजबूती, याददाश्त और इम्यून सिस्टम पर साफ दिखाई देता है. खासकर 50 की उम्र के बाद शरीर पोषक तत्वों को पहले जितनी आसानी से एब्जॉर्ब नहीं कर पाता, इसलिए सही खानपान और विटामिन्स पर ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है. विटामिन्स भले ही मात्रा में छोटे होते हैं, लेकिन शरीर को सही तरीके से चलाने में इनकी भूमिका बहुत बड़ी होती है. सही विटामिन्स मिलने से न सिर्फ बीमारियों का खतरा कम होता है, बल्कि उम्र बढ़ने के बावजूद शरीर एक्टिव और फिट बना रहता है.

विटामिन D की जरूरत

knowridge की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे पहले बात करें विटामिन D की, जिसे सनशाइन विटामिन भी कहा जाता है. यह शरीर में तब बनता है जब त्वचा धूप के संपर्क में आती है. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ शरीर की यह क्षमता कम हो जाती है. यही कारण है कि बुजुर्गों में इसकी कमी ज्यादा देखने को मिलती है. विटामिन D का मुख्य काम कैल्शियम को एब्जॉर्ब करना है, जो हड्डियों को मजबूत रखने के लिए जरूरी होता है. इसकी कमी से हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है. रिसर्च यह भी बताती है कि पर्याप्त विटामिन D लेने से ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम कम हो सकता है.

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कैल्शियम और विटामिन B12 की जरूरत

कैल्शियम भी उतना ही जरूरी है, खासकर 50 के बाद. उम्र के साथ हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है, और महिलाओं में मेनोपॉज के बाद यह प्रक्रिया तेज हो जाती है. दूध, दही, पनीर और हरी सब्जियां कैल्शियम के अच्छे सोर्स हैं. इसके अलावा, विटामिन B12 का भी खास महत्व है. यह दिमाग के सही काम करने और रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करता है. उम्र बढ़ने के साथ शरीर में B12 का अवशोषण कम हो जाता है, जिससे थकान, कमजोरी और याददाश्त से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं.

विटामिन  C और विटामिन E की जरूरत

विटामिन C इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। यह शरीर की मरम्मत में मदद करता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है. संतरा, स्ट्रॉबेरी, कीवी और ब्रोकोली जैसे खाद्य पदार्थ इसके अच्छे सोर्स हैं. विटामिन E एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है, जो सेल्स को नुकसान से बचाता है. वहीं, विटामिन K खून के थक्के बनने और हड्डियों को मजबूत रखने में मदद करता है. पालक, केल और ब्रोकोली जैसी हरी सब्जियों में यह भरपूर मात्रा में पाया जाता है.

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