मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए इस देश में बन रहे स्पेशल थिएटर, यहां कैसे होता है इलाज?

मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए इस देश में बन रहे स्पेशल थिएटर, यहां कैसे होता है इलाज?


Mental Health Special Theaters : हॉस्पिटल का नाम सुनते ही सबसे पहले मशीनों की आवाज, दवाइयों, इलाज की चिंता और तनाव भरा माहौल याद आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसा देश है जहां हॉस्पिटल्स के अंदर खास थिएटर बनाए गए हैं. इन थिएटरों का मकसद मरीजों को कुछ समय के लिए हॉस्पिटल के माहौल से बाहर निकालकर उन्हें नॉर्मल लाइफ जैसा एहसास कराना और उनकी मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने में मदद करना है.  तो आइए जानते हैं कि मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए किस देश में स्पेशल थिएटर बन रहे और यहां इलाज कैसे होता है.

मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए किस देश में स्पेशल थिएटर बन रहे?

ब्रिटेन में मरीजों की मानसिक सेहत बेहतर बनाने के लिए हॉस्पिटल्स के अंदर मेडिसिनेमा नाम से खास थिएटर बनाए गए हैं. इन थिएटरों में हॉस्पिटल में भर्ती बच्चे और बड़े मरीज नई फिल्मों का आनंद ले सकते हैं, जिससे कुछ समय के लिए दर्द, तनाव और हॉस्पिटल के माहौल को भूल सकें. अभी ब्रिटेन के अलग-अलग हॉस्पिटल्स में ऐसे 9 मेडिसिनेमा थिएटर संचालित हो रहे हैं. यहां डॉक्टर और नर्स मरीजों की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय करते हैं कि कौन फिल्म देखने जा सकता है. इस पहल का उद्देश्य इलाज के साथ-साथ मरीजों को मानसिक राहत देना और उन्हें नॉर्मल लाइफ जैसा एक्सपीरियंस कराना है 

यहां इलाज कैसे होता है?

मेडिसिनेमा के संचालन की जिम्मेदारी साइमन हिक्सन संभालते हैं. वे हर सुबह हॉस्पिटल के अलग-अलग वार्ड में जाकर डॉक्टरों और नर्सों से बात करते हैं और यह तय करते हैं कि कौन-से मरीज फिल्म देखने की स्थिति में हैं.  फिल्म शुरू होने से पहले नर्स और मरीजों को उनके वार्ड से थिएटर तक लेकर आते हैं. थिएटर में सिर्फ सीटें ही नहीं हैं, बल्कि ऐसे विशेष स्थान भी बनाए गए हैं, जहां चार बेड पर लेटे मरीज और तीन रिक्लाइनर पर बैठने वाले मरीज भी आराम से फिल्म देख सकते हैं.

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हर उम्र के मरीजों के लिए खुला है यह थिएटर

एक स्क्रीनिंग के दौरान यहां अलग-अलग उम्र और स्वास्थ्य स्थिति वाले मरीज मौजूद थे. इनमें एक प्रेगनेंट महिला, ऑटोइम्यून बीमारी से जूझ रहा 4 वर्षीय बच्चा, हड्डी की बीमारी से पीड़ित 71 वर्षीय महिला और अन्य मरीज शामिल थे.  72 वर्षीय गैरी कुक, जो एक दुर्घटना में अपने पैरों में गंभीर चोट लगने के बाद भर्ती थे, ने फिल्म शुरू होने से पहले मजाक में पूछा कि अगर फिल्म के दौरान किसी को बाथरूम जाना पड़े या किसी मरीज को अचानक हार्ट अटैक आ जाए तो क्या होगा. इस पर पास मौजूद नर्स ने बताया कि जरूरत पड़ने पर मेडिकल स्टाफ तुरंत मदद के लिए मौजूद रहेगा. 

कैसे हुई मेडिसिनेमा की शुरुआत?

करीब 30 साल पहले क्रिस्टीन हिल ने सेंट थॉमस हॉस्पिटल में कुछ बच्चों को हॉस्पिटल के बगीचे में खुशी से समय बिताते देखा. तभी उनके मन में हॉस्पिटल के अंदर सिनेमा शुरू करने का विचार आया, जिससे मरीज भी फिल्मों के जरिए कुछ समय के लिए अपनी परेशानी भूल सकें. शुरुआती विरोध के बाद भी उन्होंने हॉस्पिटल के एक लेक्चर थिएटर को सिनेमा में बदलने के लिए पैसे इकट्ठा किए. इसके बाद दिसंबर 1999 में पहला मेडिसिनेमा शुरू हुआ, जहां सबसे पहले इंस्पेक्टर गैजेट फिल्म दिखाई गई. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कीड़े के काटने से होने वाला इंफेक्शन कितना खतरनाक, जिससे जूझ रहे एक्टर राजेश शर्मा?

कीड़े के काटने से होने वाला इंफेक्शन कितना खतरनाक, जिससे जूझ रहे एक्टर राजेश शर्मा?


Rajesh Sharma Health Update: बॉलीवुड और बंगाली फिल्मों के जाने-माने अभिनेता राजेश शर्मा इन दिनों अस्पताल में भर्ती हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रभास की फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें किसी कीड़े या जहरीली मकड़ी ने काट लिया था. शुरुआत में उन्होंने इसे मामूली समझकर शूटिंग पूरी कर ली, लेकिन कुछ घंटों बाद उनके पैर में तेज दर्द शुरू हो गया और तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी. कोलकाता लौटने तक उन्हें तेज बुखार भी आ गया, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर किसी कीड़े के काटने से होने वाला इंफेक्शन कितना खतरनाक हो सकता है?

कितना खतरनाक होता है कीड़े का काटना?

आमतौर पर मच्छर, चींटी, मधुमक्खी या दूसरे छोटे कीड़ों के काटने पर हल्की खुजली, लालपन या सूजन होना सामान्य माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यही छोटा-सा घाव गंभीर इंफेक्शन का कारण बन सकता है. अगर काटने वाला कीड़ा जहरीला हो या उसके जरिए बैक्टीरिया शरीर में पहुंच जाएं तो स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है.

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के एक्सपर्ट के अनुसार, अगर कीड़े के काटने वाली जगह पर लालपन लगातार बढ़ने लगे, सूजन फैलने लगे, तेज दर्द हो, पस निकलने लगे या बुखार आने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. ये सभी संकेत बताते हैं कि इंफेक्शन शरीर में फैल रहा है और समय रहते इलाज न मिलने पर यह त्वचा की गहरी परतों तक पहुंच सकता है. 

कब गंभीर हो सकती है समस्या?

कुछ मामलों में यह इंफेक्शन सेल्युलाइटिस जैसी गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है. इसमें त्वचा और उसके नीचे के ऊतकों में बैक्टीरिया तेजी से फैलने लगते हैं. अगर इसका इलाज समय पर न किया जाए, तो इंफेक्शन खून तक पहुंच सकता है और जानलेवा स्थिति भी पैदा कर सकता है. यही वजह है कि डॉक्टर लगातार सलाह देते हैं कि कीड़े के काटने के बाद होने वाले असामान्य बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. 

कब डॉक्टर के पास जाना चाहिए?

अगर काटने वाली जगह से लाल लकीरें शरीर के दूसरे हिस्सों की ओर बढ़ती दिखाई दें, लिम्फ नोड्स में सूजन आ जाए या तेज ठंड के साथ बुखार आने लगे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. कुछ लोगों में कीड़े के जहर या एलर्जी की वजह से सांस लेने में तकलीफ, चेहरे या गले में सूजन और बेहोशी जैसी गंभीर समस्या भी हो सकती है. ऐसी स्थिति मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है. 

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बचाव के लिए ये हैं उपाय?

इंफेक्शन से बचने के लिए सबसे पहले काटे गए हिस्से को साबुन और साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए. खुजली होने पर बार-बार उसे खरोंचने से बचें, क्योंकि इससे बैक्टीरिया घाव के अंदर पहुंच सकते हैं. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से एंटीबायोटिक क्रीम या दूसरी दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर दर्द, सूजन या बुखार लगातार बढ़ रहा हो, तो बिना देर किए अस्पताल पहुंचना सबसे सुरक्षित विकल्प है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लगातार 30 मिनट से ज्यादा बैठना बढ़ा सकता है कैंसर का खतरा, नई रिसर्च में दावा, जानें इसकी वजह

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Prolonged Sitting Cancer Risk Study: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में घंटों एक ही जगह बैठकर काम करना आम बात हो गई है. ऑफिस में लंबे समय तक कंप्यूटर के सामने बैठना, घर से काम करना, टीवी देखना या मोबाइल पर लगातार समय बिताना लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है. पहले से ही माना जाता रहा है कि लंबे समय तक बैठे रहने से मोटापा, डायबिटीज और हार्ट रोग का खतरा बढ़ता है. अब एक नई रिसर्च में यह भी सामने आया है कि अगर कोई व्यक्ति बिना उठे लगातार 30 मिनट या उससे ज्यादा समय तक बैठा रहता है, तो इससे कैंसर से मौत का खतरा भी बढ़ सकता है. 

12 साल तक हेल्थ ट्रैक किया गया

यह स्टडी यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो  के रिसर्चर ने किया है, जिसे मेडिकल जर्नल पीएलओएस मेडिसिन में प्रकाशित किया गया. रिसर्च में यूके बायोबैंक से जुड़े 91 हजार से अधिक लोगों के आंकड़ों का एनालिसीस किया गया. खास बात यह रही कि प्रतिभागियों से सिर्फ सवाल नहीं पूछे गए, बल्कि उन्हें एक सप्ताह तक कलाई पर पहनने वाले ट्रैकर दिए गए, जिससे उनकी वास्तविक फिजिकल एक्टिविटी और बैठने के समय को रिकॉर्ड किया गया. इसके बाद लगभग 12 वर्षों तक उनकी सेहत पर नजर रखी गई.

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किन लोगों में कैंसर का खतरा ज्यादा?

रिसर्च में पाया गया कि जो लोग दिनभर में बार-बार 30 मिनट या उससे ज्यादा समय तक लगातार बैठे रहते थे, उनमें कैंसर से मौत का खतरा अधिक देखा गया. रिसर्चर के मुताबिक, लंबे समय तक लगातार बैठने के हर अतिरिक्त एक घंटे के साथ यह खतरा करीब 9 से 10 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. दिलचस्प बात यह है कि पूरे दिन कुल कितने घंटे बैठे रहे, उससे ज्यादा असर लगातार बिना उठे बैठे रहने की आदत का देखा गया. 

कैसे कर सकते हैं बचाव?

हालांकि, इस रिसर्च में एक अच्छी खबर भी सामने आई. अगर लंबे समय तक बैठे रहने की बजाय बीच-बीच में हल्की-फुल्की गतिविधियां की जाएं तो जोखिम कम हो सकता है. स्टडी के अनुसार, लगातार बैठने के एक घंटे की जगह हल्की शारीरिक गतिविधि, जैसे कुछ देर टहलना, घर के छोटे-मोटे काम करना या थोड़ा इधर-उधर चलना, कैंसर से मौत के खतरे को करीब 12 प्रतिशत तक कम कर सकता है. वहीं लगभग 30 मिनट की तेज चाल से वॉक करने जैसी मध्यम गतिविधि से यह जोखिम करीब 8 प्रतिशत घट सकता है. इतना ही नहीं, सिर्फ 5 मिनट की तेज एक्सरसाइज भी कैंसर से मौत के खतरे को करीब 22 प्रतिशत तक कम करने से जुड़ी पाई गई.

आदत को भी बदलने की जरूरत

इस  स्टडी का नेतृत्व करने वाले डॉ. फ्रेडरिक हो ने किया, जो यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो में पब्लिक हेल्थ के सीनियर लेक्चरर हैं. उनका कहना है कि लोगों को सिर्फ नियमित व्यायाम पर ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत को भी बदलने की जरूरत है. उनके अनुसार, अगर कोई व्यक्ति रोज जिम नहीं जा सकता, तब भी हर आधे घंटे में कुछ मिनट के लिए उठकर चलना या हल्की गतिविधि करना फायदेमंद हो सकता है. एक्सपर्ट का मानना है कि लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने से शरीर की मांसपेशियां कम सक्रिय हो जाती हैं. इससे ब्लड शुगर का संतुलन बिगड़ सकता है, इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ सकती है और शरीर में सूजन की प्रक्रिया तेज हो सकती है.  हालांकि, रिसर्चर ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल एक संबंध दिखाता है. इससे यह साबित नहीं होता कि लंबे समय तक बैठना सीधे कैंसर से मौत का कारण बनता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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एक बेसिल इंसुलिन और पूरे हफ्ते डायबिटीज की छुट्टी! जानें 40% सस्ती दवा कब, कहां और कैसे मिलेगी?

एक बेसिल इंसुलिन और पूरे हफ्ते डायबिटीज की छुट्टी! जानें 40% सस्ती दवा कब, कहां और कैसे मिलेगी?


9 जुलाई 2026 को डेनमार्क की दिग्गज दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने भारत में इंसुलिन आइकोडेक अविक्लि लॉन्च कर दिया है. यह दुनिया का पहला हफ्ते में एक बार लगने वाला बेसल इंसुलिन है. भारत इस दवा को लॉन्च करने वाला दुनिया का छठा देश बन गया है. अब तक डायबिटीज के मरीजों को रोजाना इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना पड़ता था यानी साल में 365 इंजेक्शन. अविक्लि आने के बाद यह संख्या घटकर साल में सिर्फ 52 इंजेक्शन रह जाएगी. तो आइए जानते हैं कि नई दवा के फायदे क्या हैं, कीमत कितनी है और डायबिटीज से हमेशा छुटकारा दिलाएगी या नहीं…

आखिर यह नया इंसुलिन है क्या चीज?

अमेरिका की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एंड डाइजेस्टिव एंड किडनी डिसीज की रिपोर्ट के मुताबिक, यह एक तरह का बेसल इंसुलिन है. बेसल इंसुलिन वो होता है जो दिनभर शरीर में बैकग्राउंड में काम करता है और ब्लड शुगर को एक समान बनाए रखता है. अभी तक भारत में जितने भी बेसल इंसुलिन उपलब्ध थे, उन्हें रोजाना एक या दो बार लगाने की जरूरत पड़ती थी. लेकिन यह नया इंसुलिन आइकोडेक शरीर में धीरे-धीरे और लगातार रिलीज होता है, जिससे इसका असर पूरे एक हफ्ते तक बना रहता है.

कीमत का गणित: 40% तक सस्ती कैसे पड़ेगी डोज?

यहीं पर पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है. इस नए इंसुलिन के एक प्री-फिल्ड पेन की कीमत 2,611 रुपये रखी गई है. अब आप सोचेंगे कि इतनी महंगी कीमत में 40% सस्ता होने का दावा कैसे सही हो सकता है? दरअसल, यह बचत कीमत की नहीं, बल्कि इंजेक्शन की संख्या की है.

  • अगर आप रोजाना लगने वाला बेसल इंसुलिन लेते हैं तो आपको हफ्ते में 7 इंजेक्शन लगाने पड़ते हैं.
  • इस नए इंसुलिन का सिर्फ 1 इंजेक्शन पूरे हफ्ते का काम कर देता है.

कंपनी का दावा है कि मरीजों को अपनी पूरी इंसुलिन जरूरत (बेसल और भोजन के समय वाली दोनों) मिलाकर देखें तो यह थेरेपी लगभग 40% तक ज्यादा किफायती साबित हो सकती है. इसका कारण है कि इंजेक्शन की संख्या साल में 365 से घटकर सिर्फ 52 रह जाएगी. सुई, सीरिंज और बार-बार डॉक्टर के पास जाने का खर्च भी बचेगा.

कैसे काम करता है यह हफ्ते भर चलने वाला इंजेक्शन?

यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी (EMA) के मुताबिक, इस इंसुलिन की खासियत इसके मॉलीक्यूल की बनावट में छिपी है. सामान्य इंसुलिन शरीर में जल्दी घुलकर खून में मिल जाता है. लेकिन इंसुलिन आइकोडेक को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह खून में मौजूद एल्ब्यूमिन नाम के प्रोटीन से चिपक जाता है. इससे यह बहुत धीरे-धीरे और लगातार रिलीज होता रहता है और शुगर पर इसका असर सात दिनों तक एक समान बना रहता है. यह कोई जादू नहीं, बल्कि बायोटेक्नोलॉजी का कमाल है.

लगाने का तरीका और खुराक: पहली बार डॉक्टर की सलाह है जरूरी

EMA के मुताबिक, यह इंजेक्शन पहले से भरे हुए पेन (प्री-फिल्ड पेन) में आता है, जिसे लगाना बहुत आसान है. मरीज इसे बिना किसी परेशानी के खुद लगा सकते हैं. लेकिन एक बेहद अहम बात:

  • यह इंसुलिन सिर्फ उन्हीं वयस्क मरीजों के लिए है जिन्हें टाइप-2 डायबिटीज है.
  • इसकी शुरुआती खुराक और इसे शुरू करने का फैसला कभी भी खुद से नहीं करना चाहिए. डॉक्टर मरीज की पूरी जांच करेंगे और पुराने डेली इंसुलिन की डोज के हिसाब से हफ्ते वाली डोज का सटीक गणित बैठाएंगे.
  • इसे हफ्ते के एक ही तय दिन, एक ही समय पर लगाना होगा.

उपलब्धता: आपको कहां मिलेगा?

कंपनी ने इसे देशभर के प्रमुख शहरों में मेडिकल स्टोर्स और अस्पतालों के जरिए उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है. उम्मीद है कि जल्द ही यह ऑनलाइन फार्मेसी पर भी उपलब्ध होगा. यह सिर्फ डॉक्टर के पर्चे पर ही मिलेगा, इसलिए बिना डॉक्टरी सलाह के इसे खरीदने न जाएं.

किन लोगों को बिल्कुल नहीं लेना चाहिए?

यह दवा भले ही एक बड़ी उपलब्धि हो, लेकिन हर किसी के लिए नहीं है:

  • टाइप-1 डायबिटीज के मरीज: यह इंसुलिन फिलहाल उनके लिए नहीं है.
  • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं: इस पर अभी स्टडी पूरी नहीं हुई है.
  • लिवर या किडनी की गंभीर बीमारी वाले मरीज: ऐसे में डॉक्टर को खास सावधानी बरतनी होगी.
  • हाइपोग्लाइसीमिया (लो ब्लड शुगर) का खतरा: किसी भी इंसुलिन की तरह, अगर खुराक ज्यादा हो जाए या खाना समय से न खाया जाए तो शुगर बहुत कम हो सकती है. इस नए इंसुलिन का असर लंबा होने के कारण यह स्थिति ज्यादा गंभीर हो सकती है, इसलिए लक्षणों की पहचान जरूरी है.

डॉक्टर क्या सलाह देते हैं?

जाने-माने डायबिटोलॉजिस्ट और डॉ. मोहन डायबिटीज स्पेशलिटीज सेंटर के चेयरमैन डॉ. वी. मोहन ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इस इंसुलिन इसे डायबिटीज केयर में एक बड़ा बदलाव मानते हैं. उनका कहना है कि रोजाना इंजेक्शन का दर्द और झिझक कई मरीजों को इलाज बीच में ही छोड़ने पर मजबूर कर देती है. हफ्ते का एक इंजेक्शन इस परेशानी को काफी हद तक खत्म करेगा और मरीज नियमित इलाज कर पाएंगे. हालांकि, वे यह भी चेतावनी देते हैं कि शुरुआत में डॉक्टरों को इसकी डोज एडजस्टमेंट पर खास ध्यान देना होगा.

नई दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. एस. के. वांगनू के मुताबिक, इंसुलिन कई मरीजों के लिए डायबिटीज मैनेजमेंट की नींव बना हुआ है, फिर भी देरी से शुरू रना और लापरवाही क्लिनिकल प्रैक्टिस में रिजल्ट को कमजोर करता रहता है.

तो क्या यह सचमुच संजीवनी है?

अगर आप टाइप-2 डायबिटीज से जूझ रहे हैं और रोजाना इंसुलिन लेने की परेशानी से गुजर रहे हैं, तो यह दवा आपकी जिंदगी बदल सकती है. साल में 365 की जगह 52 इंजेक्शन लगाना एक बहुत बड़ी राहत है. कीमत के मामले में शुरुआती निवेश ज्यादा लग सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह जेब पर भी हल्की पड़ेगी और सबसे बढ़कर, मानसिक तनाव को कम करेगी. बस, इसे शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से पूरी सलाह जरूर लें. यह इंसुलिन डायबिटीज को जड़ से खत्म नहीं करती है.

लीलावती हॉस्पिटल के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. शशांक जोशी कहते हैं, ‘यह हमारे उपचार विकल्पों में एक उपयोगी जोड़ है, लेकिन यह उन मरीजों के लिए सबसे उपयुक्त होगा जो अपनी डायबिटीज प्रबंधित करने के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग करने को तैयार हैं.’

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रोज का खर्च सिर्फ ₹50! भारत में लॉन्च हुआ हफ्ते में 1 बार वाला इंसुलिन, जानें पूरी डिटेल

रोज का खर्च सिर्फ ₹50! भारत में लॉन्च हुआ हफ्ते में 1 बार वाला इंसुलिन, जानें पूरी डिटेल


Weekly Insulin Launch In India 2026: डायबिटीज के मरीजों के लिए अच्छी खबर है. भारत में अब ऐसा इंसुलिन उपलब्ध हो गया है, जिसे हर दिन नहीं बल्कि पूरे हफ्ते में सिर्फ एक बार लेना होगा. फार्मास्युटिकल कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने ‘अवीक्ली’ ब्रांड नाम से अपना वीकली इंसुलिन लॉन्च किया है. कंपनी का दावा है कि यह दवा उन मरीजों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है, जिन्हें रोजाना इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं या जो बार-बार सुई लगवाने से बचते हैं.

किन लोगों लिए फायदेमंद?

डॉक्टरों का कहना है कि कई डायबिटीज मरीज इंसुलिन शुरू करने से सिर्फ इसलिए बचते हैं क्योंकि उन्हें रोज इंजेक्शन लेने का डर रहता है. कुछ लोग लगातार यात्रा करते हैं, जबकि कई लोगों की व्यस्त दिनचर्या के कारण रोजाना समय पर इंसुलिन लेना मुश्किल हो जाता है. ऐसे मरीजों के लिए सप्ताह में एक बार लगने वाला यह इंसुलिन इलाज को पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान बना सकता है. 

बड़ी संख्या में मरीज इंसुलिन लेने से बचते हैं

इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के डायबिटीज एक्सपर्ट डॉ. एस. के. वांगनू के अनुसार, जिन मरीजों को डायबिटीज हुए 8 से 10 साल हो चुके हैं और जिनकी ब्लड शुगर दवाइयों से नियंत्रित नहीं हो रही है, उन्हें समय पर इंसुलिन शुरू कर देना चाहिए. ऐसा करने से आंखों, किडनी, नसों और शरीर के अन्य अंगों को होने वाले नुकसान का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसके बावजूद बड़ी संख्या में मरीज इंसुलिन लेने से बचते हैं, जिससे भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं. 

नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत श्रोत्रिया  का कहना है कि फिलहाल भारत में करीब 60 लाख लोग इंसुलिन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि इसकी जरूरत इससे कहीं ज्यादा लोगों को है. उनका मानना है कि सप्ताह में सिर्फ एक बार लगने वाला इंसुलिन इलाज को आसान बनाएगा और इससे ज्यादा मरीज डॉक्टर की सलाह पर इंसुलिन लेना शुरू करेंगे.

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कितनी होगी कीमत

अगर कीमत की बात करें तो यह नया इंसुलिन बाजार में मौजूद कई दूसरे इंसुलिन विकल्पों की तुलना में सस्ता बताया जा रहा है. कंपनी के मुताबिक इसकी औसत लागत करीब 261 रुपये प्रति सप्ताह यानी लगभग 50 रुपये प्रतिदिन पड़ती है. यह दवा दो प्री-फिल्ड पेन में उपलब्ध होगी. पहला 700 यूनिट/मिली वाला पेन 2,611 रुपये और दूसरा 2,100 यूनिट/मिली वाला पेन 7,883 रुपये का है.  आमतौर पर एक मरीज को सप्ताह में करीब 70 यूनिट इंसुलिन की जरूरत पड़ती है, हालांकि डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार इसकी मात्रा तय करेंगे.  कंपनी का मानना है कि इस नई तकनीक से ज्यादा से ज्यादा मरीज समय पर इंसुलिन लेना शुरू करेंगे. इससे ब्लड शुगर को लंबे समय तक नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी और HbA1c का स्तर भी बेहतर हो सकता है. HbA1c वह टेस्ट होता है, जिससे पिछले लगभग तीन महीनों की औसत ब्लड शुगर का पता चलता है.

क्या इसके नुकसान भी हैं?

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इस दवा के कुछ संभावित साइड इफेक्ट भी हैं. सबसे सामान्य दुष्प्रभाव हाइपोग्लाइसीमिया है, यानी ब्लड शुगर का जरूरत से ज्यादा कम हो जाना. डॉक्टरों के अनुसार यह जोखिम रोजाना लगाए जाने वाले इंसुलिन जितना ही है. वहीं टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों में लो ब्लड शुगर की समस्या कुछ अधिक देखने को मिल सकती है. ऐसे मरीजों को भोजन से पहले लगने वाला फास्ट-एक्टिंग इंसुलिन पहले की तरह जारी रखना होगा, जबकि रोज लगने वाले लॉन्ग-एक्टिंग इंसुलिन की जगह इस साप्ताहिक इंसुलिन का इस्तेमाल किया जा सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि यह नया इंसुलिन मरीजों के लिए सुविधा जरूर बढ़ाता है, लेकिन इसे डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू या बंद नहीं करना चाहिए.

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मानसून में सर्दी-खांसी से रहना है दूर? रोज पिएं अदरक-हल्दी की ये गर्म चाय

मानसून में सर्दी-खांसी से रहना है दूर? रोज पिएं अदरक-हल्दी की ये गर्म चाय


अदरक-हल्दी की चाय भारतीय घरों में कई पीढ़ियों से बनाई और पी जाती रही है. यह सामान्य दूध वाली चाय से अलग होती है. इसमें चायपत्ती, दूध और चीनी की जगह ताजा अदरक, हल्दी, काली मिर्च और नींबू का इस्तेमाल किया जाता है. इन सभी चीजों को पानी में धीमी आंच पर उबालकर यह हर्बल चाय तैयार की जाती है. हल्दी का मिट्टी जैसा टेस्ट और अदरक का हल्का तीखापन मिलकर इसे खास टेस्ट और खुशबू देते हैं.

अदरक में जिंजरोल (Gingerol) और हल्दी में करक्यूमिन (Curcumin) नाम के नेचुरल तत्व  पाए जाते हैं. ये दोनों अपने एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के लिए जाने जाते हैं. साथ मिलकर ये शरीर की इम्यूनिटी, पाचन, सांस लेने की समस्या और जोड़ों की सेहत को सपोर्ट करने में मदद करते हैं.

अदरक में जिंजरोल (Gingerol) और हल्दी में करक्यूमिन (Curcumin) नाम के नेचुरल तत्व पाए जाते हैं. ये दोनों अपने एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के लिए जाने जाते हैं. साथ मिलकर ये शरीर की इम्यूनिटी, पाचन, सांस लेने की समस्या और जोड़ों की सेहत को सपोर्ट करने में मदद करते हैं.

इस चाय में डाली जाने वाली काली मिर्च करक्यूमिन के अवशोषण को बेहतर बनाने में मदद करती है. वहीं अदरक पाचन को सपोर्ट करता है और मौसम बदलने के दौरान होने वाली मतली, पेट फूलना और गले की हल्की जलन जैसी समस्याओं में राहत देने में मददगार माना जाता है.

इस चाय में डाली जाने वाली काली मिर्च करक्यूमिन के अवशोषण को बेहतर बनाने में मदद करती है. वहीं अदरक पाचन को सपोर्ट करता है और मौसम बदलने के दौरान होने वाली मतली, पेट फूलना और गले की हल्की जलन जैसी समस्याओं में राहत देने में मददगार माना जाता है.

दूध वाली चाय में चायपत्ती, दूध और अक्सर चीनी का इस्तेमाल होता है, जबकि अदरक-हल्दी की चाय एक हर्बल ड्रिंक है. इसमें चायपत्ती नहीं डाली जाती, इसलिए यह नेचुरली कैफीन-फ्री होती है. जो लोग कैफीन कम लेना चाहते हैं, उनके लिए यह एक हल्का ऑप्शन माना जाता है.

दूध वाली चाय में चायपत्ती, दूध और अक्सर चीनी का इस्तेमाल होता है, जबकि अदरक-हल्दी की चाय एक हर्बल ड्रिंक है. इसमें चायपत्ती नहीं डाली जाती, इसलिए यह नेचुरली कैफीन-फ्री होती है. जो लोग कैफीन कम लेना चाहते हैं, उनके लिए यह एक हल्का ऑप्शन माना जाता है.

अदरक-हल्दी की चाय बनाने के लिए ताजा अदरक और ताजी हल्दी का इस्तेमाल करें. इसमें थोड़ी काली मिर्च जरूर डालें. चीनी की जगह शहद का इस्तेमाल किया जा सकता है. चाहें तो इसमें ताजी तुलसी की पत्तियां भी डाल सकते हैं. नींबू का रस हमेशा चाय बनने के बाद मिलाएं, साथ ही चाय को जरूरत से ज्यादा न उबालें और हमेशा ताजा बनाकर ही पिएं.

अदरक-हल्दी की चाय बनाने के लिए ताजा अदरक और ताजी हल्दी का इस्तेमाल करें. इसमें थोड़ी काली मिर्च जरूर डालें. चीनी की जगह शहद का इस्तेमाल किया जा सकता है. चाहें तो इसमें ताजी तुलसी की पत्तियां भी डाल सकते हैं. नींबू का रस हमेशा चाय बनने के बाद मिलाएं, साथ ही चाय को जरूरत से ज्यादा न उबालें और हमेशा ताजा बनाकर ही पिएं.

अदरक-हल्दी की चाय में कैलोरी बहुत कम होती है. इसके साथ ही इसमें ताजी जड़ी-बूटियों और मसालों से मिलने वाले नेचुरल पौधों के तत्व और एंटीऑक्सीडेंट मौजूद रहते हैं. इसमें कैफीन भी नहीं होता, इसलिए इसे मानसून के दौरान बैलेंस डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है.

अदरक-हल्दी की चाय में कैलोरी बहुत कम होती है. इसके साथ ही इसमें ताजी जड़ी-बूटियों और मसालों से मिलने वाले नेचुरल पौधों के तत्व और एंटीऑक्सीडेंट मौजूद रहते हैं. इसमें कैफीन भी नहीं होता, इसलिए इसे मानसून के दौरान बैलेंस डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है.

Published at : 10 Jul 2026 01:05 AM (IST)

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