हो गए हैं इरेक्टाइल डिसफंक्शन का शिकार, समझ लीजिए बढ़ गया है हार्ट अटैक, शुगर और स्ट्रोक का खतर

हो गए हैं इरेक्टाइल डिसफंक्शन का शिकार, समझ लीजिए बढ़ गया है हार्ट अटैक, शुगर और स्ट्रोक का खतर


Erectile Dysfunction May Increase Heart Attack Risk: अधिकांश लोग इरेक्टाइल डिसफंक्शन को केवल यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या मानते हैं, लेकिन हालिया रिसर्च कुछ और ही कहानी बयां करते हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि यह समस्या कई गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत हो सकती है. हार्ट अटैक, स्ट्रोक, डायबिटीज और यहां तक कि डिमेंशिया जैसी बीमारियों का खतरा इरेक्टाइल डिसफंक्शन से जुड़ा हो सकता है. 

कितनी खतरनाक है यह समस्या?

रोम यूनिवर्सिटी ऑफ टोर वर्गाटा के सेक्सोलॉजिस्ट इमैनुएले जैनिनी का कहना है कि इरेक्टाइल डिसफंक्शन को “कोयले की खदान में कैनरी” की तरह देखा जाना चाहिए. यानी यह शरीर में छिपी किसी बड़ी समस्या का शुरुआती संकेत हो सकता है. दुर्भाग्य से अधिकांश पुरुष इस विषय पर खुलकर बात नहीं करते, जिससे समय रहते बीमारी की पहचान का मौका छूट जाता है. 

किन लोगों को होती है यह दिक्कत ज्यादा?

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, 40 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में यह समस्या काफी आम है. एक बड़े सर्वे में पाया गया कि 40 साल की उम्र के करीब 39 प्रतिशत पुरुष किसी न किसी स्तर पर इरेक्टाइल डिसफंक्शन का अनुभव करते हैं, जबकि 70 वर्ष की उम्र तक यह आंकड़ा 67 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. एक्सपर्ट बताते हैं कि इरेक्शन का सीधा संबंध ब्लड फ्लो से होता है. जब आर्टरीज स्वस्थ रहती हैं तो ब्लड का प्रवाह बेहतर होता है. लेकिन अगर ब्लड बेसल्स संकरी या कठोर होने लगें, तो इसका असर सबसे पहले शरीर की छोटी आर्टरीज पर दिखाई देता है. चूंकि लिंग की धमनियां बेहद पतली होती हैं, इसलिए इरेक्टाइल डिसफंक्शन कई बार हार्ट रोग का शुरुआती संकेत बन जाता है.

हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का खतरा

करीब 1.5 लाख लोगों के आंकड़ों के एनालिसिस में पाया गया कि इरेक्टाइल डिसफंक्शन से पीड़ित पुरुषों में कोरोनरी हार्ट डिजीज का खतरा 59 प्रतिशत अधिक था, जबकि स्ट्रोक का जोखिम 34 प्रतिशत तक ज्यादा देखा गया. ब्रिटेन के मैनचेस्टर मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट माइकल कैरोल कहते हैं कि अच्छी इरेक्शन को ब्लड वेसल्स के अच्छे स्वास्थ्य का संकेत माना जा सकता है.

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डायबिटीज का खतरा

डायबिटीज के साथ इसका संबंध भी बेहद मजबूत माना जाता है. बार्सिलोना स्थित सैंट पाउ रिसर्च इंस्टीट्यूट के रिसर्चर बोगदान व्लाचो के मुताबिक, टाइप-2 डायबिटीज वाले पुरुषों में इरेक्टाइल डिसफंक्शन होने की संभावना सामान्य लोगों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक होती है. वहीं सैंटियागो मार्टिनेज, जो यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना में एंडोक्राइनोलॉजिस्ट हैं, बताते हैं कि डायबिटीज और इरेक्टाइल डिसफंक्शन साथ होने पर नसों को नुकसान, आंखों की बीमारी और घाव भरने में दिक्कत जैसी दिक्कतों का खतरा भी बढ़ जाता है.

कैसे कर सकते हैं सुधार

एक्सपर्ट का मानना है कि इरेक्टाइल डिसफंक्शन को नजरअंदाज करना बड़ी भूल हो सकती है. यदि यह समस्या लगातार बनी हुई है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. समय पर जांच कराने से हार्ट रोग, हाई बीपी, डायबिटीज और अन्य गंभीर बीमारियों का पता शुरुआती चरण में लगाया जा सकता है. कई मामलों में बेहतर खानपान, नियमित व्यायाम और लाइपस्टाल में बदलाव से स्थिति में सुधार भी संभव है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बहरा होने से पहले कानों में दिखते हैं ये कई शुरुआती लक्षण, डॉक्टरों ने दी बड़ी चेतावनी

बहरा होने से पहले कानों में दिखते हैं ये कई शुरुआती लक्षण, डॉक्टरों ने दी बड़ी चेतावनी


Early Signs Of Hearing Loss You Should Not Ignore: अक्सर लोग मानते हैं कि सुनने की क्षमता कम होने का मतलब है कि व्यक्ति अचानक आवाजें सुनना बंद कर दे. लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. ज्यादातर मामलों में सुनने की समस्या धीरे-धीरे शुरू होती है और शुरुआती संकेत इतने सामान्य लगते हैं कि लोग उन्हें उम्र, थकान या आसपास के शोर का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही वजह है कि कई लोगों को तब तक अपनी समस्या का एहसास नहीं होता, जब तक बातचीत करना मुश्किल न होने लगे. 

क्यों जरूरी है इसको शुरू से पहचानना?

यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन डेफनेस एंड अदर कम्युनिकेशन डिसऑर्डर्स के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सुनने की क्षमता में कमी धीरे-धीरे विकसित होती है और दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है. फोर्टिस हॉस्पिटल, मुलुंड, मुंबई में सीनियर कंसल्टेंट ईएनटी डॉ. संजय भाटिया का कहना है कि अगर शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए तो लंबे समय तक सुनने की क्षमता और लाइफ की क्वालिटी को बेहतर बनाए रखा जा सकता है.

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क्या होते हैं इसके लक्षण?

सुनने की समस्या का पहला संकेत हमेशा आवाज का कम सुनाई देना नहीं होता. कई बार लोग सुन तो लेते हैं कि कोई बात कर रहा है, लेकिन शब्द साफ समझ नहीं आते. खासकर भीड़भाड़ वाली जगहों, पारिवारिक समारोहों या रेस्तरां जैसे माहौल में बातचीत समझना मुश्किल हो जाता है. डॉ. संजय भाटिया के अनुसार, यह शुरुआती सुनने की समस्या का एक सामान्य संकेत हो सकता है.

अपनी ही बात दोहरानी पड़े, तो दिक्कत

यदि आपको बार-बार लोगों से अपनी बात दोहराने के लिए कहना पड़ता है, तो यह भी चेतावनी का संकेत हो सकता है. शुरुआत में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन जब यह आदत रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन जाए तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार परिवार के सदस्य या दोस्त सबसे पहले इस बदलाव को नोटिस करते हैं.

लगातार आवाज बढ़ाना भी संकेत

एक और आम संकेत है टीवी, मोबाइल या रेडियो की आवाज लगातार बढ़ाना. अक्सर घर के दूसरे लोगों को आवाज बहुत तेज लगती है, जबकि सुनने में परेशानी महसूस कर रहा व्यक्ति उसे सामान्य मानता है. यह बदलाव धीरे-धीरे होता है, इसलिए कई लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते.

फोन पर बातचीत में दिक्कत महसूस होना?

फोन पर बातचीत करने में कठिनाई भी सुनने की क्षमता कम होने का संकेत हो सकती है.  आमने-सामने की बातचीत में चेहरे के हावभाव और होंठों की गतिविधि समझने में मदद करती है, लेकिन फोन पर केवल आवाज के आधार पर बात समझनी होती है. ऐसे में सुनने में हल्की कमी भी साफ नजर आने लगती है.

घंटी बजने, भिनभिनाहट या सीटी जैसी आवाज

इसके अलावा कानों में लगातार घंटी बजने, भिनभिनाहट या सीटी जैसी आवाज सुनाई देना भी चिंता का विषय हो सकता है. इस स्थिति को टिनिटस कहा जाता है, जो कई बार किसी इम्प्लिसिट लिसनिंग  समस्या का संकेत होता है. डॉ. संजय भाटिया चेतावनी देते हैं कि सुनने की समस्या को नजरअंदाज करना केवल कानों तक सीमित नहीं रहता. समय के साथ यह सामाजिक दूरी, निराशा, तनाव और अवसाद का कारण भी बन सकता है. इसलिए यदि ये लक्षण लगातार दिखाई दें तो एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस वजह से आपके घर में पैदा नहीं हो रहे बच्चे, पुरुषों और महिलाओं में लगातार बढ़ रहा बांझपन

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How Microplastics Affect Fertility: प्लास्टिक आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. पीने के पानी से लेकर खाने की पैकेजिंग, घर की धूल और यहां तक कि हवा में भी प्लास्टिक के बेहद छोटे कण मौजूद हैं. इन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है. पहले इन्हें केवल पर्यावरण की समस्या माना जाता था, लेकिन अब साइंटिस्ट की चिंता इस बात को लेकर बढ़ रही है कि ये कण इंसानी शरीर के अंदर भी पहुंच चुके हैं और स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं. 

मनुष्य तक बढ़ी इनकी पहुंच

माइक्रोप्लास्टिक ऐसे छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार पांच मिलीमीटर से भी कम होता है.  समय के साथ बड़े प्लास्टिक उत्पाद टूटकर इन सूक्ष्म कणों में बदल जाते हैं. हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने इन्हें ह्यूमन ब्लड, फेफड़ों, प्लेसेंटा, स्पर्म और यहां तक कि महिलाओं के ओवरी में मौजूद फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी पाया है. यही वजह है कि अब इनके फर्टिलिटी पर प्रभाव को लेकर रिसर्च तेज हो गए हैं. 

क्या यह बांझपन का कारण बन सकता है?

साल 2024 में यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के रिसर्चर की तरफ से पब्लिश एक स्टडी में मानव टेस्टिकुलर टिश्यू में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए. वहीं कुछ अन्य स्टजी में महिलाओं के फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है. हालांकि साइंटिस्ट अभी सीधे तौर पर यह नहीं कह रहे कि माइक्रोप्लास्टिक ही बांझपन का कारण है, लेकिन इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जरूर बढ़ी है. 

इंसानों को क्या हो रही है दिक्कत?

कोलकाता स्थित नोवा आईवीएफ की फर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. अनिंदिता सिंह के अनुसार, रिसर्च बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं. इस स्थिति में शरीर में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीजनामक हानिकारक अणु तेजी से बढ़ने लगते हैं, जो सेल्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं. डॉ. अनिंदिता सिंह बताती हैं कि माइक्रोप्लास्टिक माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं और एस्ट्रोजन व टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन के संतुलन में भी हस्तक्षेप कर सकते हैं.

एक्सपर्ट का मानना है कि लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में रहने से पुरुषों में स्पर्म की गतिशीलता कम हो सकती है, डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है और फर्टिलिटी प्रभावित हो सकती है. वहीं महिलाओं में ओवरी की क्षमता, अंडों की गुणवत्ता और फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

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फर्टिलिटी के अलावा बाकी क्या दिक्कत?

फर्टिलिटी के अलावा माइक्रोप्लास्टिक को इम्यून सिस्टम, हार्ट स्वास्थ्य, मेटाबॉलिज्म और एंडोक्राइन सिस्टम के लिए भी संभावित खतरा माना जा रहा है. हालांकि साइंटिस्ट अभी इस विषय पर और रिसर्च कर रहे हैं, लेकिनएक्सपर्ट एहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं. डॉ. अनिंदिता सिंह के मुताबिक, प्लास्टिक की बोतलों की जगह कांच या स्टील का इस्तेमाल करना, प्लास्टिक कंटेनर में खाना गर्म करने से बचना, कम पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का सेवन करना, फिल्टर किया हुआ पानी पीना और फल, सब्जियां व साबुत अनाज से भरपूर एंटी-इन्फ्लेमेटरी डाइट अपनाना माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अचानक क्यों फड़फड़ाने लगती है आंख, यह शुभ-अशुभ का संकेत या कोई और लोचा?

अचानक क्यों फड़फड़ाने लगती है आंख, यह शुभ-अशुभ का संकेत या कोई और लोचा?


Why Does My Eye Twitch Suddenly: अक्सर ऐसा होता है कि अचानक आंख या पलक फड़फड़ाने लगती है. कई लोग इसे शुभ-अशुभ संकेतों से जोड़कर देखते हैं, जबकि कुछ लोग इसे किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत मानते हैं. सच यह है कि ज्यादातर मामलों में आंख फड़कना कोई गंभीर बीमारी नहीं होती, लेकिन अगर यह बार-बार हो रहा है या लंबे समय तक बना रहता है, तो इसके पीछे कुछ मेडिकल कारण भी हो सकते हैं.

क्या होते हैं कारण?

fortishealthcare की एक रिपोर्ट के अनुसार,  आंख फड़कना दरअसल आंख, पलकों या आंखों के आसपास की मांसपेशियों की अनैच्छिक गतिविधि होती है. यह कई तरह की हो सकती है. कभी सिर्फ पलक हल्के-हल्के कांपती है, तो कभी आंख के आसपास की मांसपेशियों में बार-बार झटके महसूस होते हैं. कुछ मामलों में यह इतना तेज हो सकता है कि आंख बार-बार बंद होने लगे. 

नींद की कमी भी कारण

एक्सपर्ट के अनुसार तनाव और नींद की कमी आंख फड़कने की सबसे आम वजहों में शामिल हैं. जब शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिलता या व्यक्ति मानसिक दबाव में रहता है, तो पलकों की मांसपेशियों में ऐंठन शुरू हो सकती है. इसके अलावा लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप या अन्य डिजिटल स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव बढ़ता है, जिससे भी यह समस्या हो सकती है. 

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ये कारण भी होते हैं शामिल

जरूरत से ज्यादा कॉफी, चाय, एनर्जी ड्रिंक या शराब का सेवन भी आंख फड़कने का कारण बन सकता है. शरीर में मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे जरूरी मिनरल्स की कमी होने पर भी मांसपेशियों में ऐंठन और झटके महसूस हो सकते हैं. वहीं एलर्जी, आंखों में सूखापन या जलन की समस्या भी बार-बार पलक फड़कने की वजह बन सकती है. भारतीय समाज में आंख फड़कने को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं. माना जाता है कि महिलाओं की बाईं आंख फड़कना शुभ और दाईं आंख फड़कना अशुभ संकेत हो सकता है. हालांकि इन मान्यताओं का कोई साइंटफिक आधार नहीं है. एक्सपर्ट का कहना है कि आंख फड़कने के पीछे ज्यादातर मामलों में शारीरिक या लाइफस्टाइल से जुड़े कारण होते हैं, न कि भविष्य से जुड़ा कोई संकेत. 

इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए?

हालांकि अगर आंख फड़कना कई दिनों तक लगातार बना रहे, आंख पूरी तरह बंद होने लगे, चेहरे के अन्य हिस्सों में भी झटके महसूस हों या इसके साथ कोई अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.  कुछ रेयर मामलों में यह ब्लेफेरोस्पाज्म, हेमीफेशियल स्पाज्म, मल्टीपल स्क्लेरोसिस या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से भी जुड़ा हो सकता है. आंख फड़कने से बचने के लिए पर्याप्त नींद लें, तनाव कम करने की कोशिश करें, स्क्रीन टाइम सीमित रखें और संतुलित आहार का सेवन करें. ज्यादातर मामलों में ये छोटी-छोटी आदतें ही समस्या को दूर करने में मदद करती हैं. 

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रात में बार-बार खुल रही आंख, जानें यह किसी चीज का है संकेत?

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Why Do I Keep Waking Up At Night: रात में एक-दो बार नींद खुलना सामान्य बात हो सकती है, लेकिन अगर आपकी आंख बार-बार खुल रही है और फिर दोबारा सोने में परेशानी हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार, बार-बार नींद टूटना कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं का संकेत हो सकता है, जो समय के साथ आपकी सेहत पर असर डाल सकते हैं. 

क्या होता है इसका कारण?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट Medicalnewstoday के अनुसार, नींद का सबसे बड़ा दुश्मन स्लीप एपनिया को माना जाता है. इस स्थिति में सोते समय सांस बार-बार रुकती या धीमी हो जाती है, जिससे व्यक्ति की नींद टूट सकती है. कई बार लोगों को खुद यह एहसास भी नहीं होता कि उनकी नींद बार-बार बाधित हो रही है. सुबह सिरदर्द, दिनभर थकान, खर्राटे लेना और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई इसके सामान्य लक्षण हो सकते हैं.

किन लोगों में होती है यह दिक्कत?

अनिद्रा यानी इंसोम्निया भी रात में बार-बार जागने की एक बड़ी वजह है. तनाव, चिंता और डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है. ऐसे लोग रात में कई बार जाग जाते हैं और फिर दोबारा नींद नहीं आ पाती. इसके कारण दिनभर चिड़चिड़ापन और थकान महसूस हो सकती है. अगर रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता है, तो यह भी नींद टूटने का कारण बन सकता है. गर्भावस्था, डायबिटीज, बढ़ा हुआ प्रोस्टेट, ओवरएक्टिव ब्लैडर या कुछ दवाएं इसकी वजह हो सकती हैं. ऐसे मामलों में मूल कारण का इलाज करना जरूरी होता है. 

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कमरे का तापमान भी जिम्मेदार

कई बार कमरे का तापमान भी नींद पर असर डालता है. यदि कमरा बहुत गर्म है या रात में अत्यधिक पसीना आता है, तो नींद बार-बार खुल सकती है. एक्सपर्ट का मानना है कि ठंडा, शांत और अंधेरा कमरा अच्छी नींद के लिए सबसे बेहतर वातावरण बनाता है. सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप या अन्य स्क्रीन का अधिक इस्तेमाल भी नींद की क्वालिटी को प्रभावित कर सकता है. स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी शरीर की प्राकृतिक सर्कैडियन रिदम को प्रभावित करती है, जिससे नींद आने और उसे बनाए रखने में परेशानी हो सकती है. इसलिए सोने से कम से कम 30 मिनट पहले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूरी बनाना फायदेमंद माना जाता है.

यदि आपकी नींद लगातार टूट रही है, दिनभर थकान बनी रहती है या समस्या लंबे समय से बनी हुई है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. समय पर कारण की पहचान और सही उपचार न सिर्फ नींद को बेहतर बना सकता है, बल्कि कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से भी बचा सकता है.

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कंधे के दर्द से लेकर जकड़न तक, ये लक्षण न करें इग्नोर, डॉक्टर ने डायबिटीज को लेकर दी चेतावनी

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Why Diabetes Increases The Risk Of Frozen Shoulder: अगर आपको डायबिटीज है और पिछले कुछ समय से कंधे में दर्द, जकड़न या हाथ घुमाने में परेशानी महसूस हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डायबिटीज से जुड़ी एक ऐसी समस्या भी है जिसके बारे में कम लोग जानते हैं, लेकिन यह काफी आम है. इसे आम बोलचाल में डायबिटीज शोल्डर कहा जाता है, जबकि मेडिकल टर्म में इसे फ्रोजन शोल्डर कहा जाता है. यह स्थिति धीरे-धीरे कंधे की गतिविधियों को सीमित कर सकती है और रोजमर्रा के कामों को मुश्किल बना सकती है.

इस संबंध में जर्नल ऑफ डायबिटीज इन्वेस्टिगेशन में पब्लिश एक स्टडी में पाया गया कि डायबिटीज से पीड़ित लोगों में कंधे संबंधी समस्याओं की दर लगभग 27.5 प्रतिशत थी, जबकि सामान्य मरीजों में यह आंकड़ा केवल 5 प्रतिशत के आसपास देखा गया. यह अंतर बताता है कि डायबिटीज और फ्रोजन शोल्डर के बीच गहरा संबंध है.

क्या है फ्रोजन शोल्डर?

फ्रोजन शोल्डर एक ऐसी स्थिति है जिसमें कंधे के जोड़ के आसपास मौजूद कनेक्टिव टिश्यू मोटे और कड़े हो जाते हैं. इसके कारण कंधे को हिलाना-डुलाना मुश्किल होने लगता है. शुरुआत में दर्द महसूस होता है और समय के साथ कंधे की मूवमेंट काफी सीमित हो सकती है.

डायबिटीज में क्यों बढ़ जाता है इसका खतरा?

एक्सपर्ट के अनुसार लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर अधिक रहने से शरीर के टिश्यू में बदलाव आने लगते हैं. अतिरिक्त ग्लूकोज कोलेजन नामक प्रोटीन को प्रभावित कर सकता है, जिससे टिश्यू अपनी लचक खोने लगते हैं. यही प्रक्रिया कंधे के जोड़ को भी प्रभावित कर सकती है. इसके अलावा लगातार रहने वाली सूजन और टिश्यू तक कम ब्लड फ्लो भी इस समस्या को बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं.

फ्रोजन शोल्डर के तीन चरण

यह समस्या आमतौर पर तीन चरणों में विकसित होती है. पहला चरण फ्रीजिंग स्टेज कहलाता है, जिसमें दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है और कंधे की मूवमेंट कम होने लगती है. इसके बाद फ्रोजन स्टेज आता है, जहां दर्द कुछ हद तक कम हो सकता है, लेकिन जकड़न बनी रहती है. अंतिम चरण थॉइंग स्टेज होता है, जिसमें धीरे-धीरे कंधे की गतिशीलता वापस आने लगती है. पूरी प्रक्रिया कई महीनों से लेकर दो साल तक चल सकती है.

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कैसे होती है पहचान?

डॉक्टर आमतौर पर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, खासकर डायबिटीज की जानकारी, शारीरिक जांच और जरूरत पड़ने पर एक्स-रे या एमआरआई जैसे इमेजिंग टेस्ट की मदद से इस समस्या का निदान करते हैं. समय पर पहचान होने से स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है.

क्या है इसका इलाज?

फ्रोजन शोल्डर के इलाज का मुख्य उद्देश्य दर्द कम करना और कंधे की सामान्य गतिविधि को वापस लाना होता है. इसके लिए दर्द और सूजन कम करने वाली दवाएं दी जा सकती हैं. फिजियोथेरेपी और नियमित स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज रिकवरी में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं. इसके साथ ही ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना भी बेहद जरूरी है. गंभीर मामलों में डॉक्टर इंजेक्शन या अन्य चिकित्सा प्रक्रियाओं की सलाह दे सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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