तरबूज खाने से पूरे परिवार की मौत! बाजार से खरीदें फल तो इन बातों का रखें ध्यान

तरबूज खाने से पूरे परिवार की मौत! बाजार से खरीदें फल तो इन बातों का रखें ध्यान


Mumbai Watermelon Death Case: मुंबई से एक चौंकाने वाला सामने आया है, जहां कथित तौर पर एक ही परिवार के 4 लोगों की तरबूज खाने से मौत हो गई. सुबह जब परिवार के लोग उठे तो उनमें उल्टी और पेट दर्द की समस्या देखी गई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया. हालत इतनी गंभीर हो चुकी थी कि परिवार के चारों लोगों की ही मौत हो गई है. इस घटना के बाद गर्मियों का पसंदीदा तरबूज खाने को लेकर चिंताएं बढ़ गई है. 

क्या है पूरा मामला? 

जानकारी के मुताबिक, परिवार के लोगों ने अपने रिश्तेदारों के साथ रात को पार्टी की थी, जब रिश्तेदार चले गए तो परिवार के सभी लोगों ने तरबूज खाया और सो गए. सुबह जब लोग उठे तो सभी लोगों को पेट दर्द और उल्टी जैसी समस्या थी, जिसके बाद उन्होंने अपने फैमिली डॉक्टर को दिखाया. इसके बाद भी हालत में कोई सुधार नहीं आया और परिवार के लोगों की तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई. हालत इतनी बिगड़ गई कि लोगों का शरीर नीला पड़ने लगा. परिवार के चारों लोगों को अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई.  डॉक्टरों द्वारा बताया गया है कि उनके शरीर में किसी प्रकार का टॉक्सिन गया है, जिससे उनकी मौत हुई है.

क्यों और कैसे होती है फूड पॉइजनिंग? 

फूड पॉइजनिंग तब होती है जब हम ऐसा खाना या पेय पदार्थ लेते हैं जिसमें हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी या जहरीले पदार्थ (टॉक्सिन्स) मौजूद होते हैं. यह समस्या अक्सर खराब, केमिकल्स के इस्तेमाल, या गलत तरीके से स्टोर किए गए खाने से होती है. फूड पॉइजनिंग होने पर पेट दर्द, उल्टी, दस्त, कमजोरी और बुखार जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. गंभीर मामलों में शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) भी हो सकती है. अगर समय पर इलाज न मिले तो फूड पॉइजनिंग जानलेवा हो सकती है, खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों के लिए.

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बाजार से तरबूज और अन्य फल खरीदते समय रखें इन बातों का ध्यान

बाजार से फल खरीदते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. सबसे पहले फल की बाहरी सतह को अच्छे से देखें कि कहीं उस पर कोई कट, दरार या सड़न के निशान तो नहीं हैं. पहले से कटे हुए फल खरीदने से बचें क्योंकि उनके अंदर भी केमिकल होने का खतरा हो सकता है. साथ ही खुले में रखे फल जल्दी खराब हो सकते हैं और उनमें बैक्टीरिया पनपने का खतरा रहता है. फल खरीदने के बाद उन्हें अच्छे से धोकर ही खाएं ताकि उन पर लगी गंदगी या केमिकल हट जाएं, क्योंकि आजकल फलों को पकाने के लिए काफी ज्यादा केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है. हो सके तो फलों को गुनगुने पानी से भी धो सकते हैं, जिससे केमिकल्स अच्छे से साफ हो जाते हैं.

तरबूज हो लेकर बरतें खास सावधानी

गर्मियों में तरबूज खाना हर किसी को पसंद होता है, लेकिन इसको लेकर कुछ सावधानी बरतनी जरूरी है. बाजार से लाए गए तरबूज को खाने से पहले उसे नॉर्मल टेंपरेचर पर ठंडा जरूर करें. गर्म फल खाने से बीमार पड़ सकते हैं. इसके अलावा सीधे धूप से आकर भी तरबूज को नहीं खाना चाहिए. तरबूज को अधिक मात्रा में खाने से भी बचना चाहिए.

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शाम के मनपसंद स्नैक्स हो सकते हैं मोटापा बढ़ने का कारण, ऐसे दूर करें अपनी क्रेविंग

शाम के मनपसंद स्नैक्स हो सकते हैं मोटापा बढ़ने का कारण, ऐसे दूर करें अपनी क्रेविंग


Evening Snacks Craving: क्या आपको भी शाम में स्नैक्स की क्रेविंग होती है? इससे निपटने के लिए आप तरह-तरह के पकवानों का स्वाद लेते हैं. आपके यही मनपसंद और चटपटे स्नैक्स मोटापा कम न होने का बड़ा कारण हैं. चौंक गए? यह हमारी नहीं, बल्कि एक्सपर्ट्स की राय है.

शाम के समय होने वाली क्रेविंग्स काफी सामान्य है. इसके पीछे कई वैज्ञानिक कारण होते हैं. थकान भरी दिनचर्या के बाद शरीर की ऊर्जा कम होने लगती है, जिससे ग्लूकोज लेवल कम हो जाता है और कुछ चटपटा खाने की इच्छा बढ़ने लगती है. शाम के समय हंगर हार्मोन घ्रेलिन (Ghrelin) बढ़ सकता है और अगर दिन का खाना सही से न हुआ हो तो क्रेविंग और ज्यादा होती है.

कितना हानिकारक हो सकता है मोटापा?

ओवरईटिंग और शाम की क्रेविंग्स धीरे-धीरे मोटापे का बड़ा कारण बन जाती हैं, क्योंकि इन दोनों का सीधा असर शरीर की कैलोरी बैलेंस और फैट स्टोरेज पर पड़ता है. दिनभर के बाद जब शाम को बार-बार भूख लगती है, तो लोग अक्सर ज्यादा कैलोरी वाले स्नैक्स, जैसे तला-भुना, मीठा या पैकेज्ड फूड खा लेते हैं. इससे शरीर में जरूरत से ज्यादा कैलोरी पहुंचती है, जो तुरंत इस्तेमाल नहीं हो पाती और फैट के रूप में जमा होने लगती है.इसके अलावा, बार-बार स्नैक्स लेने से इंसुलिन लेवल बढ़ जाता है, जो फैट स्टोरेज को बढ़ावा देता है. खासकर मीठा और रिफाइंड कार्ब्स खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता और फिर गिरता है, जिससे फिर से भूख लगती है और यह एक चक्र बन जाता है.

क्यों लगती है भूख?

कई रिसर्च से पता चलता है कि जो लोग सुबह और दोपहर के खाने में सही मात्रा में प्रोटीन और फाइबर नहीं लेते, उन्हें शाम को ज्यादा भूख लगती है, जिससे वे Unhealthy खाना खाने लगते हैं. रोजमर्रा के जीवन में होने वाला तनाव भी इसका एक बड़ा कारण हो सकता है.

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कैसे निपटें ईवनिंग क्रेविंग से

नमामी ने आगे बताया कि ‘क्रेविंग से लड़ने के बजाय हमें उनसे समझदारी से निपटना चाहिए. जो लोग वेट लॉस करना चाहते हैं और अपनी ईवनिंग क्रेविंग को कंट्रोल करना चाहते हैं, उन्हें अपने स्नैक्स में प्रोटीन और फाइबर से भरपूर चीजें शामिल करनी चाहिए. इससे आपका शुगर लेवल कंट्रोल में रहेगा और पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होगा, जिससे आप ओवरईटिंग से बच पाएंगे.’

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

न्यूट्रिशनिस्ट नमामी अग्रवाल ने हाल ही में एक रील के जरिए बताया कि ‘खाने की क्रेविंग शाम में सबसे ज्यादा होती है? यह हार्मोन की वजह से होता है. जैसे-जैसे शाम होती है, लेप्टिन (Leptin) नाम का हार्मोन, जो भूख को नियंत्रित करता है, कम होने लगता है. लेप्टिन के गिरते ही शरीर की ऊर्जा भी कम होने लगती है, जिसके बाद दिमाग को शुगर या कार्ब्स की क्रेविंग होने लगती है.’

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गर्मी के साथ बच्चों में बढ़ रहा हीट स्ट्रोक का खतरा, डॉक्टर से जाने कैसे रखें उनका ख्याल

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सबसे खतरनाक कैंसर के खिलाफ दमदार वैक्सीन, जानें इससे कितना सफल होगा पैनक्रिएटिक कैंसर का इलाज

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Pancreatic cancer Vaccine: कैंसर एक गंभीर समस्या है जिसके बारे में सुनते ही इंसान अंदर से टूट जाता है. इसी में अगर बात करें पैनक्रिएटिक कैंसर की, तो यह एक बेहद गंभीर और तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है जो पैनक्रियास (Pancreas) में होता है. पैनक्रियास शरीर का वह अंग है जो पाचन एंजाइम और इंसुलिन जैसे हार्मोन बनाने में अहम भूमिका निभाता है. यह कैंसर अक्सर शुरुआती चरण में पकड़ में नहीं आता क्योंकि पैनक्रियास शरीर में काफी अंदर होता है और शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य या अस्पष्ट होते हैं, जैसे पेट दर्द, वजन कम होना या पाचन संबंधी समस्याएं, जो इतने गंभीर नहीं लगते. जब तक इसका पता चलता है, तब तक कई मामलों में यह शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका होता है, जिससे इसका इलाज और भी कठिन हो जाता है.

इसी वजह से इसे सबसे खतरनाक और जानलेवा कैंसर में गिना जाता है. आंकड़ों के मुताबिक, मुताबिक दो दशकों में पैनक्रिएटिक कैंसर होने का आंकड़ा दोगुना बढ़ गया है. यह पहले 1000000 व्यक्तियों में से लगभग 2.5 से 3 था, अब बढ़कर 6 से 7 हो गया है. हाल ही में इस कैंसर के इलाज को लेकर एक वैक्सीन का ट्रायल संभव हुआ है, जिससे इसके इलाज में एक नई दिशा मिली है, जानते हैं पूरी बात. 

पैनक्रिएटिक कैंसर का इलाज करने वाली mRNA वैक्सीन क्या है?

हाल ही में पैनक्रिएटिक कैंसर के इलाज में ऑटोजीन सेव्युमेरन नाम की वैक्सीन के ट्रायल ने एक नई उम्मीद जगाई है. यह एक पर्सनलाइज्ड वैक्सीन है जो मरीज के ट्यूमर की जेनेटिक जानकारी (neoantigens) के आधार पर तैयार की जाती है और शरीर की इम्यून सिस्टम को कैंसर सेल्स को पहचानने और खत्म करने के संकेत देती है. शोध करने वालों के अनुसार, यह mRNA टेक्नोलॉजी पर आधारित है- यानी मैसेंजर राइबो-न्यूक्लिक एसिड (mRNA) पर आधारित एक ऐसी तकनीक जिसे इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है, न कि बीमारी होने की संभावना को कम करने के लिए. यह वैक्सीन सर्जरी के बाद दी जाती है ताकि शरीर में बची हुई माइक्रोस्कोपिक कैंसर कोशिकाओं को खत्म किया जा सके और दोबारा कैंसर होने के खतरे को कम किया जा सके.

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क्लिनिकल ट्रायल्स के नतीजे – कितनी सफलता मिली

क्लिनिकल ट्रायल्स के नतीजों की बात करें तो फेज-1 स्टडी में कुल 16 मरीजों को पैनक्रिएटिक कैंसर की सर्जरी के बाद ऑटोजीन सेव्युमेरन वैक्सीन दी गई थी. इसके साथ मरीजों को कीमोथेरेपी और एक इम्यूनोथेरेपी दवा (चेकपॉइंट इनहिबिटर) भी दी गई. वैक्सीन हर मरीज के ट्यूमर के DNA के हिसाब से अलग-अलग तैयार की गई थी. इन 16 में से 8 मरीजों में वैक्सीन का अच्छा असर हुआ. इनके शरीर के इम्यून सिस्टम ने ट्यूमर को पहचाना और कैंसर सेल्स पर हमला करने वाले टी-सेल्स बनने लगे. 8 मरीजों में से 7 लोग सर्जरी के 4 से 6 साल बाद भी जिंदा रहे. दूसरी तरफ जिन 8 मरीजों में वैक्सीन का असर नहीं हुआ, उनमें से सिर्फ 2 ही जिंदा रहे. इन अच्छे शुरुआती नतीजों के बाद अब इस वैक्सीन का फेज-2 क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया गया है, जिसमें इसे ज्यादा मरीजों पर टेस्ट किया जा रहा है. यह स्टडी न्यूयॉर्क के MSK (मेमोरियल स्लोन केटरिंग) समेत कई दूसरी जगहों पर चल रही है, ताकि इसके असर और सुरक्षा को और अच्छे से समझा जा सके.

mRNA वैक्सीन पैनक्रिएटिक कैंसर के इलाज के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आई है. हालांकि इसका फेज-2 अभी शुरू ही हुआ है, लेकिन मेडिकल साइंस के क्षेत्र में इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर फेज-2 और फेज-3 में भी ऐसे ही नतीजे आते हैं, तो यह मेडिकल क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.

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पेट की समस्या IBS में कारगर है सॉल्युबल फाइबर, जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट

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क्या आपको भी गर्मी में आ रहा है बुखार? इग्नोर किया तो जा सकती है जान!

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How To Identify Malaria Symptoms Early: गर्मियों में आने वाला बुखार अक्सर सामान्य वायरल कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. घरों और क्लीनिकों में हर साल यही पैटर्न देखने को मिलता है कि बुखार, शरीर में दर्द और थकान, और फिर इसे हल्का समझकर छोड़ दिया जाता है. ज्यादातर मामलों में यह सही भी होता है, लेकिन हर बार नहीं. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉक्टर क्या कहते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. संदीप रेड्डी कोप्पुला ने TOI को बताया  कि गर्मियों में ऐसे कई मामले आते हैं जिन्हें सीधे वायरल मान लिया जाता है, जबकि उनमें कुछ और गंभीर छिपा हो सकता है. असल चिंता यहीं से शुरू होती है. क्योंकि जब मलेरिया जैसे संक्रमण को साधारण बुखार समझ लिया जाता है, तो इलाज में देरी हो जाती है और स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ सकती है, सामान्य बुखार आमतौर पर तीन से चार दिनों में आराम, तरल पदार्थ और बुनियादी देखभाल से ठीक हो जाता है, लेकिन हर बुखार ऐसा नहीं होता. 

किस बात का आपको रखना चाहिए ध्यान?

वे बताते हैं कि कुछ बुखार लंबे समय तक बने रहते हैं, कुछ रुक-रुक कर आते हैं, और कुछ के साथ तेज ठंड लगना महसूस होता है. ये कोई सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि संकेत हैं. भारत सरकार के वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र के अनुसार, मलेरिया के लक्षण शुरुआत में हल्के हो सकते हैं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने पर यह गंभीर रूप ले सकता है. अक्सर लोग बुखार को सिर्फ शरीर के तापमान से जोड़कर देखते हैं, जबकि शरीर और भी संकेत देता है. अचानक ठंड लगना, फिर तेज बुखार आना और उसके बाद पसीना आना यह एक खास तरह का क्रम होता है. डॉ. संदीप बताते हैं कि ठंड और पसीना सिर्फ बुखार का हिस्सा नहीं, बल्कि एक अहम संकेत हो सकता है. 

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थकान भी अहम संकेत

थकान भी एक अहम संकेत है. सामान्य थकान और इस तरह की कमजोरी में फर्क होता है. कभी-कभी यह इतनी ज्यादा होती है कि छोटे-छोटे काम भी मुश्किल लगते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, मलेरिया शरीर के रेड ब्लड सेल्स को प्रभावित करता है, जिससे एनर्जी स्तर पर असर पड़ता है और थकान बढ़ जाती है. कई लोग यह सोचकर इंतजार करते हैं कि दो-तीन दिन में बुखार अपने आप ठीक हो जाएगा. हल्के मामलों में यह तरीका ठीक हो सकता है, लेकिन अगर बुखार इससे ज्यादा समय तक बना रहे, तो जांच जरूरी हो जाती है. साधारण खून की जांच से मलेरिया जैसे संक्रमण का जल्दी पता लगाया जा सकता है, 

कैसे फैलती हैं ये बीमारियां?

गर्मी और बरसात के मौसम में मलेरिया, डेंगू और टाइफाइड जैसे कई इंफेक्शन एक साथ फैलते हैं. शुरुआती लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं, हल्का बुखार, सिरदर्द और बदन दर्द. यही समानता भ्रम पैदा करती है और हर बुखार को वायरल मान लेना आसान रास्ता बन जाता है, लेकिन यह जोखिम भरा हो सकता है. बचाव के लिए जरूरी है कि बुखार के व्यवहार पर ध्यान दिया जाए, सिर्फ तापमान पर नहीं. अगर बुखार दो-तीन दिन से ज्यादा बना रहे, ठंड और पसीने का पैटर्न दिखे या असामान्य थकान हो, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. इसके साथ ही, आसपास पानी जमा न होने दें, मच्छरों से बचाव के उपाय अपनाएं और साफ-सफाई का ध्यान रखें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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