सर्दियों में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए रामदेव बाबा ने दिए टिप्स; च्यवनप्राश को बताया सुरक्षा कवच

सर्दियों में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए रामदेव बाबा ने दिए टिप्स; च्यवनप्राश को बताया सुरक्षा कवच


कड़ाके की ठंड और बदलते मौसम के साथ ही बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. ऐसे में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी ‘इम्यूनिटी’ को मजबूत बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है. हाल ही में एक फेसबुक लाइव सत्र के दौरान योग गुरु स्वामी रामदेव ने सर्दियों में स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने और बीमारियों से लड़ने के लिए जरूरी सुझाव साझा किए.

इम्यूनिटी रातों-रात नहीं, निरंतरता से बनती है

रामदेव बाबा ने अपने खास अंदाज में दर्शकों को समझाते हुए कहा कि इम्यूनिटी कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे रातों-रात हासिल किया जा सके. उन्होंने इसकी तुलना ‘कंपाउंड इंटरेस्ट’ (चक्रवृद्धि ब्याज) से की. उन्होंने बताया कि जिस तरह धीरे-धीरे जमा किया गया धन समय के साथ कई गुना बढ़ जाता है, उसी तरह जब हम शरीर को लंबे समय तक सही पोषण और अच्छी आदतें देते हैं तो उसके फायदे कई गुना बढ़कर मिलते हैं. यही अनुशासन हमें लंबी उम्र, बेहतर स्टैमिना और बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है.

पतंजलि च्यवनप्राश: 51 जड़ी-बूटियों का संगम

सत्र के दौरान उन्होंने पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधि ‘च्यवनप्राश’ के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने बताया कि पतंजलि बैलेंस सेंटर्स में अलग-अलग उम्र और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के हिसाब से कई तरह के च्यवनप्राश उपलब्ध हैं. एक विशेष फार्मूले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें 51 जड़ी-बूटियों से निकले 5,000 से अधिक औषधीय यौगिक शामिल हैं. ये तत्व शरीर के प्राकृतिक रक्षा तंत्र को मजबूत करते हैं और सर्दियों के दौरान होने वाली थकान और संक्रमण से बचाते हैं.

शुगर के मरीजों के लिए खास विकल्प

अक्सर मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित लोग मीठा होने के कारण च्यवनप्राश के सेवन से बचते हैं. इस समस्या का समाधान बताते हुए रामदेव बाबा ने कहा कि अब शुगर-फ्री विकल्प भी मौजूद हैं. इससे मधुमेह रोगी भी बिना किसी चिंता के अपनी इम्यूनिटी बढ़ा सकते हैं और सर्दियों की बीमारियों से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं.

अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी औषधि तभी असरदार होती है जब आपकी जीवनशैली सही हो. उन्होंने लोगों से अपील की कि वे च्यवनप्राश जैसे पारंपरिक सप्लीमेंट्स के साथ-साथ:

  • प्रतिदिन योगाभ्यास करें.
  • अनुशासित जीवन जिएं.
  • खान-पान में सावधानी बरतें.

स्वामी रामदेव के अनुसार, पारंपरिक आयुर्वेद और आधुनिक अनुशासन का मेल ही हमें स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रख सकता है.

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बार-बार चटकाने से कमजोर हो जाती हैं उंगलियों की हड्डियां, कितनी सही है यह बात?

बार-बार चटकाने से कमजोर हो जाती हैं उंगलियों की हड्डियां, कितनी सही है यह बात?


Scientific Truth Behind Knuckle Cracking: कई लोगों का मानना है कि उंगलियां चटकाने से हाथों की पकड़ कमजोर हो जाती है. लेकिन साइंटफिक रिसर्च इस धारणा का समर्थन नहीं करते. स्टडी में सामने आया है कि इस आदत से न तो ग्रिप स्ट्रेंथ कम होती है और न ही आर्थराइटिस का कोई पुख्ता संबंध पाया गया हैय एक डॉक्टर ने तो 50 साल तक रोज एक हाथ की उंगलियां चटकाईं, फिर भी उन्हें किसी तरह की समस्या नहीं हुईय हालांकि, अगर उंगलियां चटकाने के बाद दर्द या सूजन हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. ज्यादातर लोगों के लिए यह आदत सुरक्षित मानी जाती है.

उंगलियां चटकाने में एक अजीब-सी सुकून मिलता है, लेकिन इसके साथ अक्सर यह चेतावनी भी सुनने को मिलती है कि इससे हाथ कमजोर हो सकते हैं. इस आवाज के पीछे अनुमान और वर्षों से चली आ रही धारणाओं का मिक्सअप है, जो लोगों को सोचने पर मजबूर करता है क्या यह मामूली-सी आदत वाकई हाथों को नुकसान पहुंचा सकती है?

उंगलियाँ चटकाने पर आवाज क्यों आती है?

उंगलियां या जोड़ चटकाने पर जो चट-चट या दूसरी तरह की आवाज आती है, वह हड्डियों के टकराने से नहीं होती. एक्सपर्ट के मुताबिक, यह आवाज जोड़ों में मौजूद तरल साइनोवियल फ्लूइड में गैस के बुलबुले बनने और फूटने से आती हैय एक बार आवाज आने के बाद इन गैसों को दोबारा घुलने में समय लगता है, इसलिए तुरंत उसी जोड़ को फिर से चटकाया नहीं जा सकता.

रिसर्च क्या कहती है?

ग्रिप स्ट्रेंथ और कार्टिलेज एक चर्चित स्टडी में नियमित रूप से उंगलियां चटकाने वालों और न चटकाने वालों की पकड़ की ताकत और कार्टिलेज की मोटाई की तुलना की गई. नतीजा यह रहा कि रोज कई बार उंगलियां चटकाने वालों की ग्रिप स्ट्रेंथ दूसरों से कम नहीं थी.

लंबे समय में जोड़ों पर असर

लंबे समय के अध्ययनों में भी यह साबित नहीं हो पाया कि उंगलियां चटकाने से गठिया होता है। शोध बताते हैं कि अगर चटकाने में दर्द नहीं हो रहा, तो इससे लिगामेंट्स या जोड़ों को स्थायी नुकसान नहीं पहुंचता.

कब सावधान होने की जरूरत है?

हालांकि यह आदत आमतौर पर सुरक्षित है, लेकिन अगर उंगलियां चटकाने के बाद दर्द या सूजन हो, जोड़ों में कमजोरी महसूस हो या फिर किसी असामान्य जोड़ में चटकाने पर तकलीफ हो तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है. इसी के साथ आपको एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि अब तक के साइंटफिक सबूत यही बताते हैं कि बिना दर्द के नियमित रूप से उंगलियां चटकाने से न तो हाथ कमजोर होते हैं और न ही जोड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है.

इसे भी पढ़ें- Oversleeping Side Effects: कहीं जरूरत से ज्यादा तो नहीं सो रहे आप? हो सकती है यह गंभीर समस्या, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शकरकंद या आलू… गट हेल्थ के लिए क्या है बेस्ट ऑप्शन?

शकरकंद या आलू… गट हेल्थ के लिए क्या है बेस्ट ऑप्शन?


भारतीय रसोई में आलू और शकरकंद दोनों को ही जरूरी माना जाता है. एक तरफ आलू है, जिसे सब्जियों का राजा कहा जाता है तो वहीं  दूसरी तरफ शकरकंद अपने मीठे स्वाद और न्यूट्रिएंट्स की वजह से जाना जाता है. दोनों ही जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियां है और अंग्रेजी में इनके नाम भी मिलते-जुलते हैं. लेकिन जब बात गट हेल्थ की आती है, तो अक्सर यह सवाल उठता है कि इनमें से कौन-सा ज्यादा फायदेमंद है. ऐसे में चलिए आज आपको बताते हैं कि शकरकंद या आलू गट हेल्थ के लिए बेस्ट ऑप्शन क्या है

आलू और गट हेल्थ का कनेक्शन

गट हेल्थ सिर्फ पाचन तक सीमित नहीं है. अच्छी आंतों की सेहत का सीधा कनेक्शन इम्यूनिटी, ब्लड शुगर कंट्रोल, वजन और यहां तक कि मूड से भी जुड़ा होता है. ऐसे में आ डाइट में क्या खाते हैं यह बहुत जरूरी माना जाता है. आलू को सिर्फ कार्बोहाइड्रेट से भरपूर माना जाता है, लेकिन इसमें कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो आंतों के लिए फायदेमंद माने जाते हैं. दरअसल आलू में पाया जाने वाला रेसिस्टेंट स्टार्च छोटी आंत में पचता नहीं है, बल्कि सीधे बड़ी आंत तक पहुंचता है. यहां यह गुड बैक्टीरिया के लिए फूड की तरह काम करता है और गट माइक्रोबायोम को मजबूत करता है. इसके अलावा आलू में फाइबर, विटामिन C और B6 भी होता है, जो पाचन के प्रोसेस को सपोर्ट करता है. हालांकि अगर किसी को गैस, एसिडिटी या पेट फूलने की समस्या रहती है, तो ज्यादा मात्रा में आलू खतरनाक हो सकता है.

शकरकंद को माना जाता है गट फ्रेंडली

शकरकंद को गट हेल्थ के लिए आलू से ज्यादा बेहतर ऑप्शन माना जाता है और इसकी वजह इसमें मौजूद फाइबर और प्रीबायोटिक गुण है. शकरकंद के छिलके में भरपूर फाइबर होता है, जो आंतों में गुड बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करता है. यही बैक्टीरिया पाचन को बेहतर बनाते हैं और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाते हैं. इसके अलावा शकरकंद में भी रेसिस्टेंट स्टार्च पाया जाता है, जो ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ने देता है और पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करता है. 

किसका फाइबर ज्यादा असरदार?

शकरकंद में आलू की तुलना में लगभग दोगुना फाइबर पाया जाता है. यह फाइबर पाचन को दुरुस्त रखने, सूजन कम करने और आंतों की एक्टिविटी को नियमित बनाने में मदद करता है. वहीं आलू में फाइबर की मात्रा कम होती है, लेकिन उसका रेसिस्टेंट स्टार्च गट बैक्टीरिया के लिए फायदेमंद रहता है. आलू हो या शकरकंद दोनों को ही डीप फ्राई करने या ज्यादा नमक और मसालों के साथ खाने से इनके गुण कम हो जाते हैं. ऐसे में इन्हें उबालकर, भूनकर या सब्जी के रूप में खाना ही गट हेल्थ के लिए सही माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्रिकेट मैदान पर पूर्व रणजी प्लेयर की मौत, जानें फिट खिलाड़ियों को क्यों पड़ रहा हार्ट अटैक?

क्रिकेट मैदान पर पूर्व रणजी प्लेयर की मौत, जानें फिट खिलाड़ियों को क्यों पड़ रहा हार्ट अटैक?


मिजोरम में पूर्व रणजी ट्रॉफी खिलाड़ी के. लालरेमरूआता की क्रिकेट मैदान पर ही हार्ट अटैक से मौत हो गई. मिजोरम के लिए रणजी ट्रॉफी और सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी खेल चुके लालरेमरूआता महज 38 साल के थे और पूरी तरह फिट लगते थे. इससे पहले 2024 के दौरान कर्नाटक के पूर्व क्रिकेटर के. होयसाला की मैच के दौरान मौत हो गई थी तो 2025 के दौरान पंजाब में हरजीत सिंह नाम के एक स्थानीय क्रिकेटर छक्का मारने के तुरंत बाद गिर पड़े और उनकी मौत हो गई थी. ये सभी खिलाड़ी युवा थे और नियमित रूप से क्रिकेट खेलते थे. ऐसे में सवाल उठता है कि फिट खिलाड़ियों को भी हार्ट अटैक क्यों पड़ रहा है?

क्या है पूरा मामला?

आइजॉल के पास सिहमुई में स्थानीय सेकंड डिवीजन टूर्नामेंट चल रहा था. 8 जनवरी के मैच में लालरेमरूआता बैटिंग कर रहे थे. बैटिंग खत्म करके वह पवेलियन की तरफ लौट रहे थे. अचानक उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ और वह मैदान पर ही गिर पड़े. साथी खिलाड़ी और दर्शक उन्हें तुरंत अस्पताल ले गए, लेकिन उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. मिजोरम क्रिकेट असोसिएशन ने बताया कि स्ट्रोक या हार्ट अटैक की वजह से ऐसा हुआ.

फिट दिखने वालों को क्यों पड़ रहा हार्ट अटैक?

मुंबई के सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल के सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अजित मेनन कहते हैं कि जिम जाने वाले या खेलने वाले जवान लोग अचानक हार्ट अटैक के शिकार हो रहे हैं. इसका कारण नींद की कमी, ज्यादा तनाव, गलत खान-पान, देर रात पार्टी करके सुबह जिम जाना और कभी-कभी नशीले पदार्थों का इस्तेमाल है. दरअसल, कई बार नसों में पहले से प्लाक जमा होता है, जो फट जाता है और खून का थक्का बन जाता है.

यह दिक्कत भी आई सामने

विजयवाड़ा स्थित मणिपाल हॉस्पिटल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. लक्ष्मी नव्या के मुताबिक, खेलते या एक्सरसाइज करते वक्त दिल तेज धड़कता है. अगर संबंधित व्यक्ति को पहले से ब्लॉकेज है तो अचानक दिक्कत हो सकती है और हार्ट अटैक पड़ सकता है. युवा खिलाड़ियों में जेनेटिक कारण भी होते हैं. साउथ एशियन लोगों में हार्ट की बीमारी का खतरा ज्यादा होता है. इसके अलावा मोटापे, धूम्रपान, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और परिवार में हार्ट की बीमारी की हिस्ट्री से भी खतरा बढ़ता है. 

फिट लोग भी हो सकते हैं बीमार

डॉक्टरों का कहना है कि फिट दिखने वाले लोग भी हार्ट की समस्या के शिकार हो सकते हैं. कई बार दिल की नसों में ब्लॉकेज पहले से होती है, लेकिन पता नहीं चलता. खेलते समय दिल पर ज्यादा जोर पड़ता है तो ब्लॉकेज फट सकता है और हार्ट अटैक पड़ जाता है. पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में लोग 10 साल पहले ही हार्ट की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं.

कैसे रखें अपना ध्यान?

  • रोजाना कम से कम 7-8 घंटे की नींद लें. नींद की कमी दिल पर बुरा असर डालती है.
  • तनाव कम करें. योग, ध्यान या घूमना-फिरना मदद करता है.
  • खान-पान संतुलित रखें. ज्यादा तला-भुना, जंक फूड से बचें. फल, सब्जियां, साबुत अनाज ज्यादा खाएं.
  • व्यायाम धीरे-धीरे बढ़ाएं. अचानक ज्यादा इंटेंस ट्रेनिंग न करें.
  • खेलने या जिम जाने से पहले डॉक्टर से दिल की जांच करवाएं. ईसीजी, ट्रेडमिल टेस्ट या ईको जरूरी है.
  • अगर परिवार में किसी को हार्ट की समस्या है तो ज्यादा अलर्ट रहें.
  • धूम्रपान और शराब बिल्कुल छोड़ दें.
  • खेलते समय अगर सीने में दर्द, सांस फूलना या चक्कर आएं तो तुरंत रुकें और डॉक्टर से मिलें.
  • इनके अलावा व्यायाम के साथ रेस्ट जरूरी है. हफ्ते में एक-दो दिन आराम भी करें.
  • हाइड्रेटेड रहें. खेलते समय खूब पानी पिएं.
  • संतुलित डाइट लें. बादाम, अखरोट जैसे ड्राई फ्रूट्स दिल के लिए अच्छे होते हैं.
  • ब्लड प्रेशर और शुगर चेक नियमित रूप से कराएं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हार्ट अटैक से कितना अलग होता है कार्डियक अरेस्ट, वेदांता चीफ के बेटे की इसी से हुई मौत 

हार्ट अटैक से कितना अलग होता है कार्डियक अरेस्ट, वेदांता चीफ के बेटे की इसी से हुई मौत 


वेदांता ग्रुप के चीफ अनिल अग्रवाल के बेटे अग्निवेश अग्रवाल की अमेरिका में मौत हो गई है. 49 साल की उम्र में अग्निवेश अग्रवाल की मौत कार्डियक अरेस्ट की वजह से हुई. रिपोर्ट्स के अनुसार, न्यूयॉर्क में स्कीइंग के दौरान हुए एक हादसे के बाद अग्निवेश अग्रवाल हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था.  वहीं इलाज के दौरान उनकी हालत में सुधार बताया जा रहा था, लेकिन अचानक आए कार्डियक अरेस्ट ने उनकी जान ले ली.

इस घटना के बाद एक बार फिर हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट की चर्चा तेज हो गई है. आमतौर पर लोग हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट को एक ही बीमारी समझ लेते हैं, लेकिन असल में मेडिकल सेक्टर में ये दोनों बिल्कुल अलग कंडीशन होती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि कार्डियक अरेस्ट, हार्ट अटैक से कितना अलग होता है. 

कार्डियक अरेस्ट क्या होता है?

कार्डियक अरेस्ट दिल से जुड़ा एक इलेक्ट्रिकल फेल्योर होता है, जो कि दिल में नेचुरल पेसमेकर होता है जो कि बिजली के सिग्नल भेजता है, जब ये इलेक्ट्रिकल सिग्नल अचानक बिगड़ जाते हैं या पूरी तरह रुक जाते हैं, तो दिल धड़कना बंद कर देता है. ऐसे में व्यक्ति अचानक बेहोश होकर गिर सकता है और सांस भी रुक सकती है. इसी वजह से इसे सडन कार्डियक भी अरेस्ट कहा जाता है.

हार्ट अटैक से कैसे अलग है कार्डियक अरेस्ट?

हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट के बीच सबसे बड़ा फर्क यही है कि हार्ट अटैक में दिल तक पहुंचने वाले खून के रास्ते में रुकावट आ जाती है. यानी दिल को पर्याप्त ब्लड सप्लाई नहीं मिलती, लेकिन दिल धड़कता रहता है और मरीज अक्सर होश में रहता है. वहीं कार्डियक अरेस्ट में दिल की धड़कन चलाने वाले इलेक्ट्रिकल इम्पल्स ही बंद हो जाते हैं, जिससे दिल पूरी तरह रुक जाता है. इसमें मरीज कुछ ही सेकंड में बेहोश हो जाता है और तुरंत इलाज न मिलने पर जान का खतरा बहुत ज्यादा होता है.

कार्डियक अरेस्ट क्यों आता है?

डॉक्टरों के अनुसार कार्डियक अरेस्ट हमेशा पहले से दिल की बीमारी होने की वजह से नहीं आता. यह अचानक भी हो सकता है. कई बार कार्डियक अरेस्ट दिल की धड़कन का असामान्य हो जाने की वजह से भी आ सकता है, जिसे एरिथमिया कहते हैं. वहीं वेंट्रिकुलर फिब्रिलेशन, जिसमें दिल का निचला हिस्सा खून पंप करने की बजाय कांपने लगता है इससे भी कार्डियक अरेस्ट आ सकता है. दिल की मांसपेशियों से जुड़ी बीमारी के चलते भी कार्डियक अरेस्ट हो सकता है. इनके अलावा दिल की नसों में रुकावट या लंबे समय से चल रही कोरोनरी आर्टरी डिजीज की वजह से भी कार्डियक अरेस्ट आ सकता है. 

रिकवरी में क्यों बढ़ जाता है कार्डियक अरेस्ट का खतरा?

किसी बड़े हादसे या सर्जरी के बाद शरीर पहले से कमजोर होता है. ऐसे में खून की कमी, ऑक्सीजन लेवल गिरना, छाती पर चोट या ज्यादा तनाव दिल की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को प्रभावित कर सकता है. यही वजह होती है कि कई बार हॉस्पिटल में इलाज के दौरान भी कार्डियक अरेस्ट का खतरा रहता है. वहीं कार्डियक अरेस्ट के लक्षणों में अचानक चक्कर आना या बेहोशी, सांस लेने में परेशानी, दिल की धड़कन बहुत तेज या अनियमित होना, सीने में दर्द और कमजोरी  जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. 

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24 की उम्र में 70 साल जैसा दिमाग, पढ़ें कैसे खतरनाक बीमारी ने छीन ली आंद्रे यारहम की जिंदगी?

24 की उम्र में 70 साल जैसा दिमाग, पढ़ें कैसे खतरनाक बीमारी ने छीन ली आंद्रे यारहम की जिंदगी?


Dementia Research Brain Donation: इंग्लैंड के नॉरफोक स्थित डेरेहम में रहने वाले आंद्रे यारहम की उम्र महज 22 साल थी, जब उनकी मां सामंथा फेयरबेयरन ने उनके व्यवहार में चिंताजनक बदलाव महसूस किए. उन्हें लगने लगा कि बेटा छोटी-छोटी बातें भूलने लगा है और कई बार उसका व्यवहार उम्र के हिसाब से असामान्य हो जाता है.  इसी वजह से वे उसे डॉक्टर के पास ले गईं और वहां डॉक्टर के मुंह से जो निकला वह सुनकर हैरान रह गईं, चलिए आपको बताते हैं कि डॉक्टर ने किस बीमारी के बारे में बताया था?

डॉक्टर ने किस बीमारी के बारे में बताया?

जांच के बाद डॉक्टरों ने आंद्रे को फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया  होने की पुष्टि की. यह डिमेंशिया का एक रेयर प्रकार है, जो दिमाग में एक खास प्रोटीन म्यूटेशन के कारण होता है. इस बीमारी में याददाश्त के साथ-साथ व्यक्ति के व्यवहार, सोचने-समझने और बोलने की क्षमता पर भी तेजी से असर पड़ता है. बीमारी का पता चलने पर किए गए ब्रेन स्कैन में दिमाग के असामान्य रूप से सिकुड़ने के संकेत मिल. इसके बाद उन्हें कैम्ब्रिज स्थित  रेफर किया गया, जहां डिमेंशिया की पुष्टि हुई. 

24 साल की उम्र में निधन

आंद्रे यारमन की 24 साल की उम्र में दर्दनाक बीमारी के चलते मौत हो गई. यह बीमारी आमतौर पर उम्रदराज लोगों की होती है. एमआरआई के दौरान जो मिला, उसने काफी हैरान किया. दरअसल पता चलता कि उसका ब्रेन 70 साल जैसे इंसान की तरह हो गया था.  BBC से बातचीत में आंद्रे की मां ने कहा कि यह जानना बेहद दर्दनाक था कि इतनी कम उम्र में उनके बेटे को डिमेंशिया हो गया. उन्होंने बताया कि यह बीमारी उम्र नहीं देखती और उनका बेटा शायद सबसे कम उम्र के मरीजों में से एक था.

देखभाल मुश्किल

जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती गई, परिवार के लिए उसकी देखभाल करना मुश्किल होता चला गया. सितंबर में आंद्रे को केयर होम में शिफ्ट करना पड़ा और कुछ ही हफ्तों बाद वह व्हीलचेयर पर आ गया. मौत से करीब एक महीने पहले उसने बोलने की क्षमता भी खो दी थी और केवल आवाजें निकाल पाता था. हालांकि, उनकी मां के मुताबिक, बीमारी के आखिरी दौर तक आंद्रे की मुस्कान, ह्यूमर और व्यक्तित्व बना रहा, 27 दिसंबर को उनकी मौत हो गई. मरने से पहले आंद्रे ने अपना दिमाग रिसर्च के लिए दान करने का फैसला किया, ताकि भविष्य में इस बीमारी पर बेहतर इलाज और समझ विकसित की जा सके. उनकी मां का कहना है कि अगर उनके बेटे का यह फैसला किसी एक परिवार को भी अपने प्रिय के साथ कुछ साल ज्यादा बिताने का मौका दे सके, तो यह सार्थक होगा. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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