क्या रील देखने से भी हो सकती है मौत, डॉक्टर से जानें अमरोहा में क्यों गई बच्चे की जान?

क्या रील देखने से भी हो सकती है मौत, डॉक्टर से जानें अमरोहा में क्यों गई बच्चे की जान?


Can Children Die While Watching Reels: उत्तर प्रदेश का अमरोहा जिला एक बार फिर सुर्खियों में है. पहले फास्ट-फूड से एक बच्ची की मौत का मामला सामने आया था और अब रील देखते-देखते 10 साल के बच्चे की मौत की खबर सामने आई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्चा रोज़ की तरह फोन पर रील देख रहा था, तभी अचानक वह बेहोश होकर गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई. पलभर में हंसता-खेलता परिवार मातम में बदल गया. आइए जानते हैं कि क्या सच में रील देखते-देखते किसी की मौत हो सकती है.

क्या बच्चे को पहले से कोई दिक्कत थी

रिपोर्ट्स के अनुसार, बच्चे के परिजनों ने बताया कि उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी और वह पूरी तरह स्वस्थ था. रील देखने के दौरान वह अचानक पीछे की ओर गिर गया और बेहोश हो गया. परिजन उसे पहले गांव के पास एक निजी अस्पताल लेकर गए, लेकिन वहां उसकी गंभीर हालत को देखते हुए दूसरे निजी अस्पताल रेफर कर दिया गया. समय के साथ उसकी हालत बिगड़ती गई और अस्पताल पहुंचने से पहले ही स्थिति काफी नाजुक हो गई. डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया.

बच्चे के पिता का कहना है कि उसे कभी किसी तरह की कोई गंभीर बीमारी नहीं थी और वह पूरी तरह फिट था. इस मामले में डॉक्टरों ने हार्ट अटैक की आशंका जताई है, हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि मौत की असली वजह क्या थी. इतनी कम उम्र में बच्चे की मौत की खबर से पूरे गांव में शोक का माहौल है.

क्या पहले भी आ चुके हैं ऐसे मामले?

ऐसे मामले बेहद कम हैं, जिनमें कोई व्यक्ति रील देखते-देखते अचानक दम तोड़ दे. रील बनाते समय या रास्ते में चलते हुए रील देखने के दौरान वाहन से टकराकर मौत के कई मामले सामने आए हैं, लेकिन सिर्फ रील देखते हुए मौत के मामले लगभग नहीं के बराबर हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

समस्तीपुर जिला चिकित्सालय के वरीय फिजिशियन डॉ. रामचंद्र सिंह का साफ कहना है कि “सिर्फ रील देखना किसी की मौत की सीधी वजह नहीं बन सकता. मेडिकल साइंस में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि मोबाइल स्क्रीन देखने से अचानक जान चली जाए”. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ऐसे मामलों में मौत की असली वजह अक्सर कोई छिपी हुई मेडिकल समस्या होती है, जैसे अचानक कार्डियक अरेस्ट, जन्मजात दिल की बीमारी, हार्ट की इलेक्ट्रिकल गड़बड़ी या ब्रेन से जुड़ी परेशानी. इन समस्याओं के लक्षण पहले नजर नहीं आते और बच्चा पूरी तरह स्वस्थ दिख सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि बहुत ज्यादा भावनात्मक उत्तेजना या अचानक स्ट्रेस दुर्लभ मामलों में पहले से मौजूद हार्ट कंडीशन को ट्रिगर कर सकता है, लेकिन यह बेहद कम होता है. 10 साल के बच्चे में हार्ट अटैक होना बहुत ही दुर्लभ माना जाता है. डॉ. रामचंद्र सिंह के अनुसार, अमरोहा मामले में रील देखना सिर्फ एक संयोग हो सकता है, न कि मौत का कारण. असली वजह पोस्टमार्टम और मेडिकल जांच के बाद ही साफ हो पाएगी.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कैसे काम करती है जोमैटो के दीपेंदर हुड्डा की टेंपल डिवाइस, एम्स के डॉक्टर ने क्यों जताई चिंता?

कैसे काम करती है जोमैटो के दीपेंदर हुड्डा की टेंपल डिवाइस, एम्स के डॉक्टर ने क्यों जताई चिंता?


हाल ही में जोमैटो के सीईओ दीपेंदर गोयल का एक पॉडकास्ट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और बड़े न्यूज चैनलों पर ट्रेंड कर रहा है. यह पॉडकास्ट राज शमानी के यूट्यूब चैनल पर अपलोड हुआ है, जिसने लोगों को हैरानी में डाल दिया है. दरअसल, इस पॉडकास्ट में दीपेंदर गोयल ने अपनी कनपटी के पास सिल्वर रंग का एक छोटा सा डिवाइस लगाया हुआ था. इसे देखकर लोग सोच में पड़ गए कि आखिर यह डिवाइस क्या है और इसका काम क्या है. रिपोर्ट्स के अनुसार, यह छोटा सा डिवाइस एक सेंसर की तरह काम करता है, जिसे कनपटी के पास लगाया जाता है. इसका मुख्य काम दिमाग में होने वाले रक्त यानी ब्लड के बहाव को लगातार मापना बताया जा रहा है.इस डिवाइस की रिसर्च और निर्माण के लिए दीपेंदर गोयल ने अपनी कंपनी Eternal and Continuous Research के जरिए निवेश किया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसमें करीब 25 मिलियन डॉलर का निवेश किया गया है. गोयल का मानना है कि ग्रेविटी यानी गुरुत्वाकर्षण बल दिमाग में ब्लड की आपूर्ति को प्रभावित करता है, जिससे समय के साथ याददाश्त और सोचने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. इस डिवाइस की मदद से दिमाग में खून के बहाव से जुड़ी सटीक जानकारी मिलने का दावा किया जा रहा है.

डॉक्टरों और विशेषज्ञों की राय

जोमैटो के सीईओ दीपेंदर गोयल की आंखों के पास लगाया गया यह डिवाइस सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. लोग इस डिवाइस या चिप के बारे में जानना चाहते हैं. इसी बीच कई डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने इस डिवाइस को लेकर सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि ऐसे किसी भी डिवाइस का इस्तेमाल करने से पहले पर्याप्त रिसर्च और वैज्ञानिक सबूत होना जरूरी है.

कुछ डॉक्टरों का मानना है कि यह डिवाइस केवल सतही संकेतों को ही पकड़ सकता है और यह एमआरआई (MRI) की तरह सीधे दिमाग में ब्लड के बहाव को मापने में सक्षम नहीं है. विशेषज्ञों के अनुसार, यह डिवाइस एमआरआई मशीन जितनी प्रभावी नहीं मानी जा सकती. डॉक्टरों का यह भी कहना है कि यह डिवाइस केवल बाहरी या त्वचा से जुड़े संकेतों को मैप कर सकता है, लेकिन दिमाग के अंदर यानी मस्तिष्क में होने वाले बदलावों को सही तरीके से मापने में सक्षम नहीं है.

AIIMS डॉक्टर की चेतावनी

AIIMS Delhi के रेडियोलॉजिस्ट डॉ. सुव्रंकार दत्ता, जो वर्ष 2017 से धमनियों की कठोरता (arterial stiffness) पर शोध कर रहे हैं, ने दीपेंदर गोयल के इस डिवाइस की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने इसे केवल अमीर लोगों के लिए एक “फैंसी खिलौना” बताया है और कहा है कि एक चिकित्सा उपकरण के रूप में इसकी कोई ठोस वैज्ञानिक मान्यता नहीं है. डॉ. दत्ता ने लोगों को सलाह दी है कि वे बिना प्रमाणित तकनीक पर पैसा खर्च करने से बचें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ज्यादा ऊंचाई पर ट्रैवलिंग से क्यों गड़बड़ा जाता है हमारा पेट? जान लीजिए कारण

ज्यादा ऊंचाई पर ट्रैवलिंग से क्यों गड़बड़ा जाता है हमारा पेट? जान लीजिए कारण


नया साल आते ही बहुत से लोग पहाड़ों पर घूमने का प्लान बना लेते हैं. कोई मनाली जाना चाहता है, कोई शिमला, तो कोई लेह-लद्दाख या मसूरी. बर्फ से ढकी पहाड़ियां, ठंडी हवा, खूबसूरत नजारे और सुकून भरा माहौल हर किसी को अपनी ओर खींच लेता है. लेकिन जितनी खूबसूरत ये जगहें होती हैं, उतनी ही परेशानियां भी साथ लेकर आती हैं. अक्सर ऐसा देखा गया है कि जैसे ही लोग ऊंचाई वाली जगहों पर पहुंचते हैं, उनका पेट गड़बड़ होने लगता है. किसी को गैस बनने लगती है, किसी का पेट फूल जाता है, तो किसी को कब्ज, भारीपन या उलझन जैसी दिक्कत होने लगती है.

कई बार तो भूख भी खत्म हो जाती है और खाने का मन नहीं करता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पहाड़ों पर जाते ही पेट क्यों खराब हो जाता है. क्या यह सिर्फ ठंड या बाहर का खाना खाने की वजह से होता है, या इसके पीछे कोई और बड़ी वजह छुपी है. न्यूट्रिशनिस्ट के अनुसार, ऊंचाई पर पेट खराब होने की वजह सिर्फ मौसम या ट्रैवल थकान नहीं है, बल्कि इसका सीधा कनेक्शन हमारे शरीर के ऑक्सीजन लेवल, नर्वस सिस्टम और पाचन तंत्र से जुड़ा हुआ है. तो आइए जानते हैं कि ज्यादा ऊंचाई पर पेट क्यों बिगड़ता है और इससे कैसे बचा जा सकता है. 

ज्यादा ऊंचाई पर ट्रैवलिंग से क्यों गड़बड़ा जाता है हमारा पेट?

न्यूट्रिशनिस्ट बताते हैं कि ऊंचाई पर पेट की समस्या की सबसे बड़ी वजह है हाइपोक्सिया, यानी शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिल पाना है. जैसे-जैसे हम समुद्र तल से ऊपर जाते हैं, हवा में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जाती है. इसका असर सिर्फ हमारी सांसों पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरे शरीर पर पड़ता है, खासकर नर्वस सिस्टम और पाचन तंत्र पर. हमारे शरीर में एक खास नर्व होती है, जिसे वेगस नर्व कहा जाता है.

यह नर्व हमारे पाचन तंत्र को कंट्रोल करती है यानी आंतों की मूवमेंट, खाना पचाने वाले एंजाइम्स का रिलीज, पेट का सही समय पर खाली होना ये सब काम वेगस नर्व की मदद से होते हैं. लेकिन जब हम ज्यादा ऊंचाई पर जाते हैं और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो वेगस नर्व ठीक से काम नहीं कर पाती है. इसका नतीजा यह होता है कि पाचन धीमा हो जाता है, पेट देर से खाली होता है, गैस बनने लगती है, पेट फूल जाता है, भारीपन और बेचैनी महसूस होती है. यही वजह है कि पहाड़ों पर बिना ज्यादा खाए भी पेट भरा-भरा सा लगता है. 

स्टडी क्या कहती है?

न्यूट्रिशनिस्ट के अनुसार, एक स्टडी में यह पाया गया है कि हाइपोक्सिया GI मोटिलिटी यानी आंतों की गति को धीमा कर देता है. जब खाना आंतों में धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, तो वह ज्यादा देर तक पेट में रहता है. इससे खाना फर्मेंट होने लगता है और ज्यादा गैस बनती है. यही कारण है कि ऊंचाई पर लोगों को अक्सर ब्लोटिंग और गैस की शिकायत होती है. 

ठंड भी बिगाड़ देती है पाचन

ऊंचाई वाली जगहों पर सिर्फ ऑक्सीजन ही कम नहीं होती, बल्कि ठंड भी काफी ज्यादा होती है. ठंड के कारण शरीर का सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम एक्टिव हो जाता है, जिसे आम भाषा में फाइट या फ्लाइट मोड कहा जाता है. इस मोड में शरीर का ध्यान एनर्जी बचाने पर होता है, न कि पाचन पर, इसका असर यह होता है कि पाचन और धीमा हो जाता है, भूख कम लगने लगती है, पेट भारी और सुस्त महसूस होता है

सफर से पहले पेट को कैसे करें तैयार?

जैसे हम ट्रैवल से पहले सूटकेस सोच-समझकर पैक करते हैं, वैसे ही पेट की तैयारी भी जरूरी है. इसलिए जाने से पहले बहुत भारी, तला-भुना या मसालेदार खाना न खाएं, हल्का और आसानी से पचने वाला खाना लें, पर्याप्त पानी पिएं, डिहाइड्रेशन से बचें, फाइबर और प्रोबायोटिक फूड्स डाइट में शामिल करें, यात्रा के दौरान छोटे-छोटे मील लें, ओवरईटिंग से बचें. 

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रागी, बेसन या फिर गेहूं… किस आटे की रोटी खाना होता है बेस्ट, कब्ज में सबसे फायदेमंद कौन?

रागी, बेसन या फिर गेहूं… किस आटे की रोटी खाना होता है बेस्ट, कब्ज में सबसे फायदेमंद कौन?


आज के समय में कब्ज (Constipation) एक ऐसी समस्या है, जिसने कभी न कभी सभी लोगों को परेशान किया है. यह एक आम समस्या बन गई है, जो पेट संबंधी बीमारियों को बढ़ा रही है. जब किसी व्यक्ति को कब्ज की समस्या होती है, तो उसे अपने मल यानी स्टूल को त्यागने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि यह समस्या तब होती है, जब मल काफी कठोर और सूखा हो जाता है. ऐसे में मल त्यागने के दौरान दर्द होता है और पेट सही से साफ नहीं हो पाता. अगर आप हफ्ते में 3 बार से कम मल त्याग कर पाते हैं, तो आपको कब्ज की समस्या हो सकती है. ऐसे में समय पर इलाज और चिकित्सकीय परामर्श लेना बहुत जरूरी है, नहीं तो यह समस्या काफी बढ़ सकती है.

कब्ज में किस आटे की रोटी खानी चाहिए?

चोकर वाला गेहूं का आटा

बहुत से लोगों का यह सवाल होता है कि कब्ज से छुटकारा पाने के लिए किस आटे की रोटी का सेवन करना चाहिए, जिससे कब्ज से राहत और बचाव हो सके. आइए इस लेख के माध्यम से जानते हैं कि कब्ज के लिए कौन सा आटा सबसे बेहतर है. गेहूं का आटा हमारी डेली डाइट में शामिल होता है, खासकर उत्तर भारत में. गेहूं की रोटियों के बिना भोजन की कल्पना करना भी मुश्किल है. गेहूं का आटा हमारा मुख्य खाद्य पदार्थ है. लेकिन अगर आपको कब्ज की परेशानी है, तो चोकर मिला हुआ गेहूं का आटा कब्ज के लिए अधिक फायदेमंद माना जाता है.
चोकर वह परत होती है, जो गेहूं पिसवाने के दौरान सबसे ऊपर से निकल जाती है. अगर आप चोकर निकाले बिना उसी आटे की रोटियां खाते हैं, तो यह कब्ज की समस्या से राहत दिलाने में मदद कर सकता है. चोकर मिले गेहूं के आटे में फाइबर की भरपूर मात्रा होती है, जो मल को मुलायम बनाती है और कब्ज की समस्या को कम करती है.

रागी के आटे की रोटियां

रागी का आटा शरीर और पेट के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है. रागी को सुपरफूड के रूप में भी जाना जाता है. रागी का आटा ग्लूटेन फ्री होता है और इसमें कैल्शियम की अच्छी मात्रा पाई जाती है. अगर आप रागी के आटे की रोटियां अपनी डेली डाइट में शामिल करते हैं, तो यह शरीर और हड्डियों की मजबूती के लिए फायदेमंद होता है. इसके अलावा रागी के आटे में फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो कब्ज और पेट संबंधी समस्याओं से राहत दिलाने में मदद करती है. यह आसानी से पच जाता है, जिससे पाचन संबंधी बीमारियों का खतरा कम रहता है.

बेसन के आटे की रोटियों

बेसन के आटे की रोटियों को डेली डाइट में शामिल करने से शरीर को कई फायदे मिलते हैं. बेसन के आटे में प्रोटीन की अच्छी मात्रा पाई जाती है, जो शरीर को मजबूत बनाने में मदद करती है. अगर किसी व्यक्ति को कब्ज की समस्या है, तो बेसन के आटे की रोटियों का सेवन फायदेमंद हो सकता है. बेसन में फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो पेट की सेहत और गट हेल्थ के लिए लाभकारी है. बेसन का सेवन मल को मुलायम बनाता है, जिससे मल त्यागने में परेशानी नहीं होती और आंतों की मूवमेंट भी बेहतर रहती है. इससे पेट संबंधी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है.

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डायबिटीज है तो सोच समझ कर खाएं फल, जानें क्या खा सकते हैं क्या नहीं?

डायबिटीज है तो सोच समझ कर खाएं फल, जानें क्या खा सकते हैं क्या नहीं?


डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर ब्लड शुगर को सही तरीके से कंट्रोल नहीं कर पाता है. वहीं भारत में भी बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं. गलत लाइफस्टाइल, खानपान, कम फिजिकल और स्ट्रेस इसके बड़े कारण माने जाते हैं. वहीं डायबिटीज को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन सही डाइट और लाइफस्टाइल अपनाकर इसे कंट्रोल में जरूर रखा जा सकता है. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि डायबिटीज में फल खाना सही है या नहीं. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि डायबिटीज है तो आपको फल सोच समझकर क्यों खाने चाहिए और डायबिटीज में आप क्या खा सकते हैं और क्या नहीं.

क्या डायबिटीज में फल खा सकते हैं?

आमतौर पर डायबिटीज के मरीज फल खा सकते हैं. दरअसल फलों में मौजूद नेचुरल शुगर के साथ-साथ फाइबर भी होता है, जो ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने से रोकता है. वहीं फाइबर पाचन को धीमा करता है, जिससे शुगर लेवल अचानक नहीं बढ़ता और पेट भी लंबे समय तक भरा रहता है. इसके अलावा फल विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं जो सेहत के लिए जरूरी हैं. डायबिटीज में फल खा तो सकते हैं लेकिन कई प्रकार के फलों को खाने से डायबिटीज के मरीजों को परेशानी भी हो सकती है. दरअसल फल खाने पर शरीर उसमें मौजूद फ्रुक्टोज को ग्लूकोज में बदलता है, जिससे ब्लड शुगर बढ़ सकता है. लेकिन फलों में मौजूद फाइबर इस प्रक्रिया को धीरे कर देता है. इसकी वजह से डायबिटीज के मरीजों के लिए फल मिठाइयों और मीठे ड्रिंक्स की तुलना में भी ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं, क्योंकि उनमें फाइबर नहीं होता.

डायबिटीज में कौन-से फल ज्यादा सही माने जाते हैं?

डायबिटीज के मरीजों के लिए लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल ज्यादा सही होते हैं, क्योंकि ये ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ाते हैं. ऐसे फलों में सेब, नाशपाती, संतरा, अंगूर, अनार, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, चेरी, कीवी, आड़ू, अंजीर और एवाकाडो शामिल होते हैं. इन फलों को सीमित मात्रा में डायबिटीज के मरीज रोजाना की डाइट में शामिल कर सकते हैं.

डायबिटीज में किन फलों से बरतनी चाहिए सावधानी?

कुछ फल ऐसे होते हैं जिनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा होता है. ये फल शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकते हैं, इसलिए इन्हें बहुत सीमित मात्रा में ही खाने की सलाह दी जाती है. इन फलों में केला, आम, अनानास, तरबूज और किशमिश शामिल है. इसके अलावा पैकेट वाले जूस, कैन्ड फल और मीठा सेब का सॉस डायबिटीज में खतरनाक हो सकते हैं क्योंकि इनमें फाइबर कम और शुगर ज्यादा होती है. वहीं आपको बता दे कि फ्रूट जूस में फाइबर नहीं होता और शुगर ज्यादा कंसंट्रेट होती है, जिससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकती है. इसलिए डायबिटीज के मरीजों को जूस की जगह पूरा फल खाने की सलाह दी जाती है.

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मछली या फिर मुर्गा… वजन बढ़ाना चाहते हैं तो कौन सी चीज है खाने में बेस्ट?

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मुर्गा, खासकर चिकन थाई और ड्रमस्टिक, फैट और कैलोरी में ज्यादा होता है. इससे कैलोरी सरप्लस बनाना आसान हो जाता है, जो वजन बढ़ाने के लिए जरूरी है. साथ ही इसमें आयरन, जिंक और सेलेनियम भी भरपूर होते हैं.



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