कहीं आपके दिल की धड़कन भी धीमी तो नहीं? बॉडी में चुपके-चुपके घर बनाती है यह बीमारी

कहीं आपके दिल की धड़कन भी धीमी तो नहीं? बॉडी में चुपके-चुपके घर बनाती है यह बीमारी


Can Slow Heart Rate Affect Health: दिल की धड़कन की रफ्तार और उसका पैटर्न हमारी दिल की सेहत के बारे में कई अहम संकेत देता है. दिल की धड़कन में होने वाले बदलाव न सिर्फ शरीर की स्थिति बताते हैं, बल्कि कई बार गंभीर बीमारियों की चेतावनी भी दे सकते हैं. जरूरत से ज्यादा धीमी धड़कन भी हमेशा सामान्य नहीं होती. यह ब्रैडीकार्डिया की गंभीर स्थिति का संकेत हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि यह आपके लिए कितना खतरनाक है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल, नई दिल्ली के हृदय रोग विशेषज्ञ और डिवाइस स्पेशलिस्ट डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं कि “यह वह स्थिति है, जब दिल की धड़कन लगातार 60 बीट प्रति मिनट (BPM) से कम रहती है. यह स्थिति इसलिए चिंता का विषय बन सकती है, क्योंकि ऐसी हालत में दिल शरीर तक पर्याप्त ऑक्सीजन युक्त खून नहीं पहुंचा पाता, जिससे ऊर्जा स्तर और ओवरऑल हेल्थ पर असर पड़ता है. एक मिनट में सामान्य इंसान की धड़कन 60 से 100 बार धड़कता है.”

किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत?

धीमी दिल की धड़कन किसी को भी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में इसका जोखिम ज्यादा रहता है. डॉ. प्रमोद बताते हैं कि बुजुर्ग, पहले से दिल की बीमारी से जूझ रहे लोग, डायबिटीज या किडनी की समस्या वाले मरीज और कुछ खास दवाएं लेने वाले लोगों को खासतौर पर सतर्क रहना चाहिए. ऐसे लोगों के लिए नियमित रूप से हार्ट रेट की जांच और डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है, ताकि चक्कर आना, थकान या बेहोशी जैसी दिक्कतों से बचा जा सके.

जब दिल की इलेक्ट्रिकल सिस्टम, जो उसकी धड़कन को कंट्रोल करती है, सही तरीके से काम नहीं करती, तो दिल की रफ्तार धीमी हो सकती है. हालांकि एथलीट्स में धीमी धड़कन सामान्य मानी जाती है, लेकिन आम लोगों के लिए यह किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है.

किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?

 एक्सपर्ट बताते हैं कि अगर लगातार थकान और कमजोरी महसूस हो, चक्कर आए या हल्कापन लगे, अचानक बेहोशी जैसा एहसास हो, हल्की गतिविधि में भी सांस फूलने लगे या सीने में दर्द और बेचैनी महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ये सभी लक्षण धीमी दिल की धड़कन का संकेत हो सकते हैं और समय रहते जांच और इलाज के लिए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है. हालांकि, एक्सपर्ट बताते हैं कि ब्रैडीकार्डिया के सभी कारणों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन सही लाइफस्टाइल अपनाकर इसके जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है. नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, तनाव से दूरी और समय-समय पर हेल्थ चेकअप दिल की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सच में हमारे इमोशंस हमें कर सकते हैं बीमार, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर?

क्या सच में हमारे इमोशंस हमें कर सकते हैं बीमार, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर?


How Thoughts Affect Physical Health: क्या हमारे विचार और भावनाएं हमारी सेहत को प्रभावित कर सकती हैं? इस सवाल पर मेडिकल और साइकोलॉजी की दुनिया में लंबे समय से चर्चा होती रही है. इसी सवाल को एबीपी के यूथ कॉनक्लेव में डॉ. अमोद सचान निदेशक, हिंद कैंसर संस्थान से भी पूछा गया.

उन्होंने कहा कि मैं पिछले चालीस वर्षों से मरीजों का इलाज कर रहा हूं. इसके अलावा हमने डॉक्टरों को पढ़ाया भी है. जब इस पूरे अनुभव को विस्तार से देखा गया तो यह सामने आया कि जो इलाज हम कर रहे हैं, वह कई मामलों में अधूरा है और यह स्थिति पूरी दुनिया में देखी जा रही है. अब लोग धीरे-धीरे जागरूक हो रहे हैं और सवाल उठा रहे हैं कि बीमारी पैदा कैसे होती है. इसके पीछे एक बड़ा कारण हमारे विचार और इमोशन माने जा रहे हैं. जब हमारे विचार और भावनाएं लंबे समय तक नहीं बदलतीं, तो हम उसी मानसिक ट्रैप में फंसे रहते हैं.

कैसे काम करते हैं हमारे विचार और इमोशन, इन्हें कैसे बदला जाए?

डॉ. अमोद सचान बताते हैं कि हमारा मन दो हिस्सों में काम करता है. पहला है चेतन मन ( जो कुल मिलाकर लगभग 5 प्रतिशत होता है. दूसरा है अवचेतन मन जो करीब 95 प्रतिशत तक सक्रिय रहता है. इसकी खासियत यह है कि हमारे पूरे जीवनकाल की यादें इसमें स्टोर रहती हैं. इसे एक तरह का डेटा सेंटर समझा जा सकता है, जहां हमारे विचारों और अनुभवों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग जमा रहती है.

कई बार ऐसे सपने भी आते हैं, जिनका हमारे वर्तमान जीवन से सीधा संबंध नहीं होता. ये अवचेतन मन में मौजूद पुरानी रिकॉर्डिंग का ही प्रभाव हो सकता है, जो दोबारा रिप्ले होती है. यही रिकॉर्डिंग आगे चलकर हमारे चेतन मन में नए विचार भी पैदा करती है. इसी वजह से इंसान चाहकर भी खुद को आसानी से बदल नहीं पाता.

पॉजिटिव और निगेटिव विचारों का प्रभाव

डॉ. अमोद बताते हैं कि हमारे विचार दो तरह के होते हैं पॉजिटिव और निगेटिव. पॉजिटिव विचारों में प्रेम, करुणा, दया और सद्भावना जैसे भाव आते हैं, जिनसे सुख, शांति और आनंद की अनुभूति होती है. वहीं निगेटिव विचारों में ईर्ष्या, गुस्सा, अहंकार और वासना जैसे भाव शामिल हैं, जो लगातार सक्रिय रहते हैं. पॉजिटिव विचार शरीर के अंदर हीलिंग प्रक्रिया को सपोर्ट करते हैं और ऐसे हार्मोन के बनने में मदद करते हैं, जो बीमारी को कम करते हैं. वहीं लंबे समय तक बने रहने वाले निगेटिव विचार शरीर में तनाव बढ़ा सकते हैं.  डॉ. अमोद  के अनुसार, निगेटिव सोच की जड़ अक्सर अत्यधिक लालसा या असंतोष होता है. काम करना गलत नहीं है, लेकिन जब काम केवल लालच के भाव से किया जाता है, तो मानसिक तनाव बढ़ता है. बेहतर यह है कि काम को कर्तव्य मानकर किया जाए.

विचार बदलना क्यों है मुश्किल?

डॉ. अमोद कहते हैं कि जब हम यह तय कर लेते हैं कि मन में निगेटिव विचार नहीं आने चाहिए, तब भी काम करते समय वही विचार उभर आते हैं. इसकी वजह हमारे न्यूरॉन्स के बीच होने वाला तेज संदेश संचार है. यह संदेश एक मिलीसेकेंड से भी कम समय में एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंच जाता है. इसके अलावा हमारा दिमाग लोअर ब्रेन  से भी संचालित होता है, जो भावनात्मक प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार होता है. वहीं हमारे शरीर का मुख्य प्रोसेसर प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स  है, जो सोच-समझकर निर्णय लेने में मदद करता है. चूंकि लोअर ब्रेन पहले एक्टिव हो जाता है, इसलिए हम अक्सर तुरंत रिएक्ट कर देते हैं, जबकि सही रिस्पॉन्स देने में 1 से 2 सेकेंड का समय लगता है. बाद में हमें एहसास होता है कि हमने ऐसा क्यों कर दिया.

समाधान क्या है?

डॉ. अमोद के मुताबिक, जिन विचारों के साथ हम पैदा होते हैं, वे अपने आप नहीं बदलते. इन्हें बदलने के लिए एक्टिव प्रोसेस जरूरी है. इसके लिए ध्यान यानी मेडिटेशन को एक प्रभावी तरीका माना जाता है. ध्यान के दौरान हम अपने विचारों को बहने देने के बजाय उन्हें देखना सीखते हैं. जब हम बार-बार ध्यान करते हैं या अपने नए विचार लिखते हैं, तो धीरे-धीरे अवचेतन मन के पुराने पैटर्न बदलने लगते हैं. डॉक्टर बताते हैं कि हमारा दिमाग वास्तविक अनुभव और कल्पना में फर्क नहीं कर पाता. यानी जो हम बार-बार सोचते हैं, दिमाग उसे सच मानने लगता है. इसी वजह से सकारात्मक सोच और कल्पना का असर हमारे व्यवहार और भावनाओं पर पड़ता है.

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हर आठ मिनट में सर्वाइकल कैंसर ले रहा एक महिला की जान, जानें क्या है कारण और इसका इलाज?

हर आठ मिनट में सर्वाइकल कैंसर ले रहा एक महिला की जान, जानें क्या है कारण और इसका इलाज?


भारत में महिलाओं की सेहत से जुड़ी एक गंभीर और चिंताजनक सच्चाई सामने आ रही है. एक ऐसी बीमारी, जिसके बारे में आज भी बहुत सी महिलाएं खुलकर बात नहीं कर पाती हैं, हर साल हजारों जिंदगियों को निगल रही है. यह बीमारी सर्वाइकल कैंसर है, जिसे हिंदी में गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर कहा जाता है. 

आंकड़े बताते हैं कि देश में हर आठ मिनट में एक महिला की मौत सिर्फ इसी बीमारी के कारण हो रही है. यह स्थिति इसलिए और भी दुखद है क्योंकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते जांच और टीकाकरण हो जाए, तो इस कैंसर को काफी हद तक रोका जा सकता है.  

कितनी गंभीर है स्थिति?

एम्स और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल करीब 1.23 लाख महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के नए मामले सामने आते हैं, जिनमें से लगभग 77 हजार महिलाओं की जान चली जाती है. यह कैंसर महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक बन चुका है. खासतौर पर इसका असर ग्रामीण इलाकों और गरीब परिवारों की महिलाओं पर ज्यादा देखा जा रहा है, जहां जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है. 

सर्वाइकल कैंसर क्या है और क्यों होता है?

सर्वाइकल कैंसर मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) नामक वायरस के संक्रमण के कारण होता है. यह वायरस लंबे समय तक शरीर में रहने पर आर्ट्स की सर्विस के सेल्स को नुकसान पहुंचाता है, जिससे कैंसर विकसित हो सकता है. ज्यादातर मामलों में शुरुआती दौर में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए महिलाएं समय पर डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाती हैं. 

इसके लक्षण जिन पर ध्यान देना जरूरी

सर्वाइकल कैंसर के लक्षण में असामान्य योनि से इंटरनल ब्लीडिंग, पीरियड्स के बीच या संबंध के बाद खून आना, पेट या कमर में लगातार दर्द, खराब स्मैल डिस्चार्ज, थकान और कमजोरी शामिल हैं. अगर इनमें से कोई भी लक्षण लंबे समय तक बना रहे, तो तुरंत जांच कराना जरूरी है. 

इसका इलाज क्या है?

विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वाइकल कैंसर को टीकाकरण और नियमित जांच से रोका जा सकता है. HPV टीकाकरण में 9 से 14 साल की लड़कियों को दो डोज, 15 साल से अधिक उम्र में तीन डोज. यह टीका HPV वायरस से बचाव करता है. भारत में विकसित स्वदेशी वैक्सीन सर्वाविक कुछ राज्यों में सरकार से मुफ्त या 200–400 रुपये प्रति डोज की दर से उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि निजी अस्पतालों में इसकी कीमत ज्यादा होती है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत अब तक 10 करोड़ से ज्यादा महिलाओं की जांच की जा चुकी है. 

अब पारंपरिक जांच की जगह HPV डीएनए टेस्ट को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि दूर-दराज की महिलाएं भी लाभ उठा सकें. स्क्रीनिंग के बाद इलाज तक महिला को पहुंचाना एक बड़ी चुनौती रही है. इसे दूर करने के लिए सरकार ने मानक संचालन प्रक्रिया (SOP), हब और स्पोक मॉडल, इलाज और फॉलोअप की मजबूत व्यवस्था लागू की है, ताकि जांच में पॉजिटिव पाई गई कोई भी महिला इलाज से वंचित न रह जाए. 

सामाजिक मुद्दा भी है यह बीमारी

विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वाइकल कैंसर सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा भी है. क्योंकि इसका सबसे ज्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ता है, जो आर्थिक, सामाजिक या भौगोलिक कारणों से अस्पताल नहीं पहुंच पाती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस शख्स ने एक-दो बार नहीं 5 बार दी कैंसर को मात… ब्रेस्ट कैंसर ने भी नहीं बख्शा, ऐसे जीती जंग

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Battle Beyond Cancer: अमेरिका के नॉर्थ कैरोलाइना राज्य में रहने वाले एक शख्स ने जानलेवा बीमारी कैंसर का 5 बार सामना किया है और अब अपने अनुभव के जरिए लोगों को समय रहते जांच कराने के लिए जागरूक कर रहे हैं. जॉनस्टन काउंटी के डेविड और पैट पेनी की शादी को 51 साल से ज्यादा हो चुके हैं.

डेविड पहले सेना में थे और फिर बाद में फायरफाइटर के रूप में कार्यरत थे. वह अब तक पांच बार कैंसर से जूझ चुके हैं. इनमें नॉन-हॉजकिन्स लिंफोमा, सारकोमा और हाल ही में पुरुषों में होने वाला ब्रेस्ट कैंसर शामिल है. जो पुरूषों में बहुत ही ज्यादा गंभीर होते हैं और इसके मामले लगभग 1% ही होते हैं, जैसा कि People.com की रिपोर्ट में बताया गया है. 

30 साल की उम्र में बचा पाना था मुश्किल

पैट का कहना है कि उनके पति को 30 साल की उम्र में ही बचा पाना मुश्किल था, लेकिन वह अविश्वसनीय साहस और दृढ़ता का एक प्रतीक हैं. पैट हमेशा उन्हें “एवर-रेडी बनी” कहती हैं, क्योंकि वह हमेशा सक्रिय और ऊर्जा से भरे रहते हैं.

डेविड को अपने कैंसर का पता 2025 की वसंत ऋतु में चला, जब वह खुद की जांच कर रहे थे, तब उन्होंने अपने सीने में एक छोटी-सी गांठ महसूस की. उन्हें यह असामान्य लगा. अगले ही हफ्ते उनकी लम्पेक्टॉमी (गांठ निकालने की सर्जरी) हुई और अब उनकी सभी जांच रिपोर्ट साफ हैं.

जागरूकता से कैंसर पर मिली समय रहते जीत

पैट को 2009 में 56 वर्ष की आयु में एक नियमित मैमोग्राम के दौरान ब्रेस्ट कैंसर का पता चला था. उन्होंने बताया कि समय पर अपॉइंटमेंट मिलने से उनकी जान बच गई, क्योंकि कैंसर शरीर के गहरे हिस्सों में फैल चुका था और अगर उन्होंने खुद इसे देखा होता, तो शायद बहुत देर हो चुकी होती.

आज डेविड और पैट दोनों अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के लिए वॉलंटियर के रूप में काम कर रहे हैं. वे अपनी कहानी सोशल मीडिया पर साझा करते हैं ताकि दूसरों को अपने शरीर के प्रति जागरूक होने और नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच कराने के लिए उजागर कर सकें. डेविड का कहना है कि आपके शरीर को आपसे बेहतर कोई नहीं जानता. अगर आपको कुछ गड़बड़ लगे, तो उसे एक-दो हफ्ते के लिए टालें नहीं.

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हर किसी के लिए नहीं होता दूध, जानें किसके लिए बन जाता है जहर?

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Can Milk Be Harmful For Some People: दूध को लंबे समय से सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता रहा है. कैल्शियम, प्रोटीन और जरूरी विटामिन्स से भरपूर होने की वजह से इसे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए फायदेमंद बताया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही दूध कुछ लोगों के लिए फायदे की जगह नुकसान भी पहुंचा सकता है? जी हां, हर किसी का शरीर दूध को एक जैसा स्वीकार नहीं करता. कुछ लोगों के लिए यह धीरे-धीरे सेहत पर भारी पड़ सकता है. चलिए आपको इनको बारे में बताते हैं. 

लैक्टोज इनटॉलरेंस वाले लोग

आज के समय में बड़ी संख्या में लोग लैक्टोज इनटॉलरेंस से जूझ रहे हैं. ऐसे लोगों के शरीर में लैक्टेज एंजाइम की कमी होती है, जिससे दूध पच नहीं पाता. नतीजा यह होता है कि दूध पीने के बाद पेट फूलना, गैस, दर्द या दस्त जैसी समस्याएं होने लगती हैं.

दूध से एलर्जी वाले लोग

कुछ लोगों को दूध में मौजूद प्रोटीन से एलर्जी होती है. ऐसे मामलों में दूध पीने से स्किन पर रैशेज, खुजली, सूजन या सांस लेने में दिक्कत तक हो सकती है. इस स्थिति में दूध का सेवन पूरी तरह से नुकसानदायक साबित हो सकता है.

हार्ट के मरीज और हाई कोलेस्ट्रॉल वाले लोग

फुल फैट दूध और उससे बने प्रोडक्ट्स में सैचुरेटेड फैट ज्यादा होता है. ज्यादा मात्रा में इसका सेवन बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है, जिससे हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे लोगों को दूध की मात्रा और उसका प्रकार सोच-समझकर चुनना चाहिए.

कैंसर के जोखिम वाले लोग

कुछ रिसर्च में यह संकेत मिले हैं कि ज्यादा मात्रा में दूध का सेवन प्रोस्टेट कैंसर जैसी बीमारियों के जोखिम से जुड़ा हो सकता है. हालांकि इस पर अभी और रिसर्च की जरूरत है, लेकिन हाई रिस्क वाले लोगों को सतर्क रहना चाहिए.

आयरन की कमी वाले बच्चे

छोटे बच्चों में जरूरत से ज्यादा गाय का दूध पिलाने से आयरन की कमी हो सकती है. इससे एनीमिया का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए बच्चों की डाइट में संतुलन बेहद जरूरी है.

कमजोर इम्युनिटी वाले लोग

कच्चा दूध कुछ लोगों के लिए खतरनाक हो सकता है. इसमें बैक्टीरिया होने का खतरा रहता है, जो कमजोर इम्युनिटी वालों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है.

दूध सेहत के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन यह हर किसी के लिए जरूरी या सुरक्षित हो, ऐसा नहीं है. अगर दूध पीने के बाद आपको कोई परेशानी महसूस होती है, तो इसे नजरअंदाज न करें. अपने शरीर के संकेत समझें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या न्यूट्रिशन एक्सपर्ट की सलाह लें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये हैं तिल खाने के जबरदस्त फायदे? ज्यादातर लोगों नहीं पता होगी ये बात

ये हैं तिल खाने के जबरदस्त फायदे? ज्यादातर लोगों नहीं पता होगी ये बात


आज के समय में लोग अच्छी सेहत के लिए मल्टीविटामिन और मिनरल सप्लीमेंट्स पर हजारों रुपये खर्च कर रहे हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारी रसोई में मौजूद एक छोटा-सा बीज कई महंगी गोलियों से ज्यादा असरदार है. दरअसल यह बीज तिल है जिसे आयुर्वेद में महाऔषधि और साइंस में न्यूट्रिएंट्स सुपर फूड माना गया है. तिल में मौजूद पोषक तत्व शरीर से आसानी से अवशोषित हो जाते हैं. यानी नेचुरल तरीके से शरीर को जरूरी विटामिन और मिनरल्स देता है. यही वजह है कि सर्दियों के मौसम में तिल को खास महत्व दिया जाता है और दादी-नानी के नुस्खों में तिल से बनी चीजें जरूर शामिल होती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि तिल खाने के जबरदस्त फायदे क्या-क्या है. 

तिल को क्यों कहा जाता है सुपरफूड?

तिल कैल्शियम, आयरन, मैग्निशियम, फास्फोरस, जिंक और मैंगनीज जैसे मिनरल्स से भरपूर होता है. 100 ग्राम सफेद तिल में लगभग 975 मिलीग्राम कैल्शियम पाया जाता है जो एक गिलास दूध से भी ज्यादा है. कैल्शियम हड्डियों और जोड़ों की मजबूती के लिए जरूरी होता है और तिल इसे प्राकृतिक रूप से पूरा करता है. इसके अलावा तिल में मौजूद आयरन और कॉपर खून की कमी यानी एनीमिया से लड़ने में मदद करता है. जिम जाने वाले युवाओं के लिए यह प्रोटीन का भी अच्छा सोर्स माना जाता है. 
 
दिल और पाचन के लिए भी फायदेमंद 

तिल में सेसामिन और सेसामोलिन जैसे तत्व पाए जाते हैं जो खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने मदद करते हैं. इससे दिल की सेहत बेहतर रहती है और ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है. तिल में मौजूद फाइबर पाचन को सुधारता है और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में मदद करता है. 

कौन सा तिल ज्यादा होता है फायदेमंद?

सेहत के लिएए काले और सफेद तिल दोनों ही सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं, लेकिन इनके गुण थोड़े अलग होते हैं. सफेद तिल पचाने में आसान होते हैं और इनमें कैल्शियम और हेल्दी फैट्स अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. वहीं काले तिल छिलके के साथ होते हैं, इसलिए इनमें आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स ज्यादा होते हैं.  कम हीमोग्लोबिन कमजोरी और बालों से जुड़ी समस्याओं में काला तिल ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. 

सर्दियों में तिल खाने के फायदे 

आयुर्वेद के अनुसार तिल की तासीर गर्म होती है. सर्दियों में इसका सेवन करने से शरीर अंदर से गर्म रहता है और ठंड से होने वाली समस्याओं से बचाव होता है. यही वजह है कि सर्दियों में तिल के लड्डू, गजक और दूसरी चीजें खूब खाई जाती है. वहीं रोजाना सीमित मात्रा में तिल खाने से हड्डियां मजबूत होती है, पाचन सुधरता है, दिल की सेहत अच्छी रहती है और शरीर में एनर्जी बनी रहती है. इसके अलावा तिल कब्ज से राहत दिलाने में भी मदद करता है 

एक दिन में कितना तिल खाना चाहिए?

तिल की तासीर गर्म होती है, इसलिए इसका ज्यादा मात्रा में सेवन नुकसानदायक हो सकता है. रोजाना 1 से 2 चम्मच यानी लगभग 10 से 15 ग्राम तिल खाना पर्याप्त और सुरक्षित माना जाता है. ज्यादा मात्रा में सेवन करने से पेट में गर्मी, वजन बढ़ने या पाचन की समस्या हो सकती है. वहीं तिल को हल्का भूनकर खाना ज्यादा फायदेमंद होता है. तिल को लड्डू, सलाद, खिचड़ी में या सीधे चबाकर भी खाया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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